Tuesday, April 21, 2020

मुश्किल दौर में प्रभावी उपाय

कोविड -19 कोरोना वायरस के  देश भर में फैल जाने  के बादमरीज़ों और डॉक्टरों दोनों के लिए आमने-सामने बैठ कर इलाज करना और करवाना जोखिम भरा काम हो गया है इसका परिणाम यह हुआ है कि देश की ज़्यादातर निजी मेडिकल सेवाएं बंद है और सरकारी अस्पतालों का सारा जोर  करोना वायरस से ग्रसित  मरीज़ों के उपचार पर है |देश की स्वास्थ्य सेवाओं का  आधारभूत ढांचा खुद रोगग्रस्त है|ऐसे में ऐसे लोग जो डायबिटीजह्रदय रोग या अन्य सामान्य  जीवन शैली आधारित  बीमारियों से ग्रसित है| जिसमें चिकित्सकों से नियमित जांच की जरुरत होती है|उन लोगों के स्वास्थ्य पर भारी संकट आ गया है |
मोदी सरकार की खासियत यह है कि यह समस्याओं में अवसर खोज लेती है जैसे नोटबंदी के समय लोगों को डिजीटल भुगतान की करने के लिए प्रेरित किया गया,जिसका अब असर भी दिख रहा है |उसी तरह कोरोना जैसी भयानक महामारी में सरकार टेलीमेडिसिन को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है |दुनिया में दूसरे नम्बर पर सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर्स भारत में है जिसमें बड़ी भूमिका स्मार्टफोन धारकों की है |स्पीच रीकिग्निशन टूल की सहायता से इंटरनेट इस्तेमाल में अंग्रेजी आने की बाध्यता कब का समाप्त हो चुकी है और इंटरनेट विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है|ऐसे में सबको बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ देने में टेलीमेडिसिन का इस्तेमाल गेम चेंजर साबित हो सकता है |
सरकार की टेलीमेडिसिन प्रेक्टीस गाईड लाईन्स  देश के सुदूर इलाकों में चिकित्सकों को इंटरनेट के माध्यम से अपनी सेवाएँ देने को विधिक स्वरुप प्रदान करती है जिसे बीस मार्च को जारी किया गया है |चिकित्सा का यह तरीका न केवल संकट के इस समय बल्कि भविष्य में भी लोगों को फायदा पहुंचाएगा टेलीमेडिसिन प्रेक्टीस गाईड लाईन्स  को मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इण्डिया और नीति आयोग के द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है |  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने टेलीमेडिसिन को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच उन लोगों तक जहाँ दूरी एक महत्वपूर्ण कारक है वहां रोगों और चोटों में अनुसंधानमूल्यांकन और स्वास्थ्य सेवा की सतत शिक्षा के लिए निदान,उपचार और उनके रोकथाम के लिए वैध जानकारी के आदान प्रदान में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग स्वास्थ्य पेशेवरों  द्वारा किया जाना है |शाब्दिक रूप से टेलीमेडिसिन का तात्पर्य इंटरनेट के माध्यम से  दूरी से किया गया उपचार है |देश में टेलीमेडिसिन के क्षेत्र में वर्तमान समय में काफी वृद्धि देखी जा रही है डॉक्सऐपएमफाइन और प्रेक्टो जैसे इंटरनेट  प्लेटफॉर्म मरीजों को डॉक्टरों से जुड़ने और आभासी परामर्श को शेड्यूल करने में सहायता प्रदान कर रहे हैं |हालाँकि अभी यह प्रयोग बहुत ही सीमित मात्रा में है क्योंकि इसमें सबसे बड़ी बाधा रोगी की उस मानसिकता में जिसमें वह डॉक्टरों से आमने सामने मिल कर ही अपने रोग का निदान चाहता है |ये मानसिकता अस्पतालों में अनावश्यक भीड़ बढाती है |दूसरा स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में अनिश्चतता इस क्षेत्र के धीमे विस्तार का बड़ा कारण है |उदाहरण के लिए ई फार्मेसी कम्पनियां अभी भी सरकार के उन नियमों को इन्तजार कर रही हैं जिसमें सरकार को उन नियमों को अंतिम रूप देना है जिससे उनके  प्लेटफोर्म नियंत्रित होंगे |विदित हो कि साल 2018 में  दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश ने ऑनलाइन दवाओं की अवैध बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था |
ऐसे में इस क्षेत्र को मान्यता देने से टेलीमेडिसिन के क्षेत्र में मौजूदा व्यवसायी और संभावित निवेशकों के लिए बहुत आवश्यक स्पष्टता प्रदान करती है  जो इस क्षेत्र में निवेश करने के लिए इन्तजार कर रहे हैं |इस गाईड लाईन्स के अनुसार अब डॉक्टर रोगियों को वीडियोऑडियोईमेल द्वारा परामर्श प्रदान कर सकते हैं यह गाईड लाईन्स उन दवाओं को भी श्रेणी बद्ध करती है जिन्हें टेलीमेडिसिन द्वारा रोगियों को नियत किया जा सकता है |जैसे पैरासिटामोल और इसके जैसी हल्की दवाएं किसी भी परामर्श द्वारा रोगी को दी जा सकती हैं लेकिन उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे रोगों की दवाएं निरन्तरता परामर्श में ही रोगी को टेलीमेडिसिन द्वारा दी जा सकती हैं जिसमें अनिवार्य रूप से सबसे पहला परामर्श रोगी  और डॉक्टर का आमने सामने का होगा |गंभीर रोगों के विषय में डॉक्टर टेलीमेडिसिन के इस्तेमाल से दवाएं नहीं निर्धारित करेंगे |इस बात का निर्धारण कि रोगी का  दूर से इलाज (टेलीमेडिसिन) किया  जाए या नहीं डॉक्टर के अपने पेशेवर निर्णय के अधीन होगा आगे जाकरडॉक्टरों को दूरस्थ परामर्श प्रदान करने के लिए एमसीआई के बोर्ड द्वारा प्रशासित एक ऑनलाइन कोर्स पूरा करना होगा।चूँकि ऑनलाईन कोर्स के विकसित होने में अभी समय लगेगा तब तक डॉक्टर अंतरिम रूप से सरकार द्वारा निर्धारित गाईडलाईन्स के अनुसार मरीज देख सकते हैं |महत्वपूर्ण रूप से यह गाईड लाईन्स रोगी को परामर्श देने में एक चिकित्सक को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग टूल के इस्तेमाल  की अनुमति देती है |हालाँकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का प्रयोग सीधे मरीजों के परामर्श के लिए नहीं किया जा सकता है जिसमें बाट्स का इस्तेमाल न करना भी शामिल है |रोगी को इलाज का परामर्श सीधे डॉक्टर से ही मिलना चाहिए |
टेलीमेडिसिन का यह प्रारूप भविष्यमें  ई-स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापक रूप देने में मदद करेगा इसमें न केवल दूरस्थ परामर्श को लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी बल्कि यह ऐसे समाधान भी निकालेगा  जो रोगियोंडॉक्टरोंडाइग्निसोटिक क्लीनिकों और फार्मेसियों को आपस में जोड़ देंगे।जिसका फायदा निश्चित रूप से रोगी को जल्दी स्वस्थ होने में मिलेगा टेलीमेडिसिन भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद लाभकारी  हो सकता है जहां डॉक्टरों की भारी कमी है।देश की आधी आबादी विशेषकर वे महिलायें इससे ज्यादा लाभान्वित होंगी जो सामाजिक रूप से किसी पुरुष साथी के बगैर डॉक्टरों तक पहुँचने में असमर्थ होती हैं|यह विशेष रूप से उन महिलाओं को लाभान्वित कर सकता है जो अक्सर स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंचने में अतिरिक्त बाधाओं का सामना करते हैंजैसे कि पुरुष साथी के बिना स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों का दौरा करने में असमर्थ होना। यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारत के सुदूर कस्बों में ई-स्वास्थ्य के उद्देश्य से पहले से ही कई सार्वजनिक-निजी भागीदारी हैं। भारत के सुदूर कस्बों जिलों में ई-स्वास्थ्य के उद्देश्य से पहले से ही कई सार्वजनिक-निजी भागीदारी हैं।
एसोचेम के एक शोध के अनुसार देश में टेलिमेडिसिन का कारोबार  बीस प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है जिसकी साल 2020 के अंत में बत्तीस मिलीयन डॉलर हो जाने की उम्मीद है|सरकार द्वारा जारी आरोग्य सेतु एप कोरोना के खिलाफ जारी देश की लड़ाई में अहम् भूमिका निभा सकता है|प्रधानमंत्री मोदी ने देश के निवासियों को इसे अपने मोबाईल पर डाउनलोड करने की सलाह दी है|
भारत जैसे गरीब देशों में मेडिकल सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने में टेलिमेडिसिन अहम टूल साबित हो सकता है टेलिमेडिसिन को सभी जगहों तक पहुंचाने के लिए हेल्थ रिकॉर्ड को डिजिटाइज करना पहला अहम कदम है स्वास्थ्य और स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में टेलीमेडिसिन के बहुत से फायदे देखने को मिले हैं दुनिया के एक कोने में बैठा विशेषज्ञ और रोगी  दुनिया के दूसरे कोने में बैठे विशेषज्ञ की राय ले सकता है |वर्तमान स्थिति,सरकार का संरक्षण और विभिन्न स्टार्टअप्स की शुरुआत   भारत को टेलीमेडिसिन को अपनाने के लिए आवश्यक गति  प्रदान कर सकता है। देश में टेलिमेडिसिन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि लोग स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक का इस्तेमाल कितनी जल्दी अपने व्यवहार में ले आयेंगे |
 दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 21/04/2020 को प्रकाशित 

Wednesday, April 8, 2020

जरुरी है दायरा

लॉक  डाउन के इस समय घर की सफाई में एक पुरानी किताब मिली जानते हैं उसका विषय था ज्योमेट्री जी हाँ रेखा गणित और क्या कुछ आँखों के आगे घूम गया. वो स्कूल के दिन वो एल एच एस इस ईक्युल टू आर एच एस और इतिसिद्धम. तब लगता था हम ये सब क्यूँ पढते हैं वैसे भी गणित मुझे बहुत बोर करती थी. जिंदगी तो आगे बढ़ चली पर अब समझ आ रहा है जीवन में रेखा का क्या महत्व है क्योंकि इसी पर जिंदगी का गणित टिका हुआ है.
रेखा मतलब लाइनलिमिट ,सीमा या फिर कुछ आड़ी तिरछी सीधी पंक्ति वैसे इनका कोई मतलब नहीं है, पर इन्हें सिलसिलेवार लगा दिया जाए तो किसी के घर का नक्शा बन जाता है या कोई कुछ ऐसा जान जाता है जिसे कल तक कोई नहीं जानता था.रेखा ही है वो टूल है जिससे आप अपने सपनों को वास्तविकता का जामा पहना सकते हैं पर ये ध्यान रहे कि उस रेखा का डायरेक्शन किस तरफ है क्योंकि वो चाहे गणित का सवाल हो या जिंदगी की उलझन काफी कुछ आपके दिमाग के डायरेक्शन पर निर्भर करता है.

विषय कोई भी हो चाहे इतिहासभूगोल गणित या फिर साहित्य बगैर रेखाओं के इनका कोई अस्तित्व नहीं है अब देखिये ना लिपि या स्क्रिप्ट भी तो कुछ रेखाओं का कॉम्बिनेशन है यानि दुनिया को समझने के लिए हमें रेखाओं की जरुरत है. इतिहास में समयरेखा है, तो भूगोल में अक्षांश और भूमध्य जैसी रेखाएं. कॉपियों में लिखने का अभ्यास पहले लाईनदार पन्नों से होता है बाद में जब हम अभ्यस्त हो जाते हैं तो उनकी जगह सफ़ेद पन्ने ले लेते है और तब हम कितनी भी जल्दी क्यूँ ना लिखें शब्द अपनी जगह से नहीं भागते. वे उसी तरह लिखें जाते हैं जैसे हम लाईनदार कॉपियों में लिखते हैं. जीवन में इन रेखाओं का कितना बड़ा दायरा है वो जीवन की रेखा से लेकर गरीबी रेखा तक देखा और समझा जा सकता है. जीवन में स्वछंदता और उन्मुक्तता मौज मस्ती अच्छी है पर उसकी भी  एक सीमा होनी चाहिए और इस रेखा को हमें ही खींचना होगा. ये बात कोई दूसरा हमें ना बताये क्योंकि सेल्फ रेग्युलेशन,सेल्फ से आता है और यही सेल्फ रेग्युलेशन जो हमें अनुशासित करता है.जब हम दूसरे की सीमाओं का सम्मान करेंगे तो लोग खुद ब खुद हमें अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ देंगे पर हम ये सोचें कि हम सबके बारे में कुछ भी गॉसिप कर सकते हैं पर कोई हमारे बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा ऐसा होना मुश्किल है. सफल होने की कोई सीमा नहीं है पर ख्वाब अगर हकीकत के आइने में देखें जाएँ तो उनके सफल होने की गुंजाईश ज्यादा होती है. मतलब अपनी सीमाओं को जानकर उसके हिसाब से जब योजनाएं बनाई जाती हैं तो वो निश्चित रूप से सफल होती हैं.कोरोना लॉक डाउन में घर को हमने अपनी लक्ष्मण रेखा बना रखा पर अगर आप ये मान लेंगे  कि सब तो अपने घर में बंद है मैं थोडा घूम लेता हूँ तो हम अपनी लक्ष्मण का अतिक्रमण करते हैं और इसका असर दूसरों पर पड़ेगा.तो कोरोना से लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब हम अपनी लक्ष्मण रेखा न लाघें. मुझे तो अपनी सीमाओं  का अंदाजा है और अपनी जीवन रेखा को इसी तरह बना रहा हूँ कि मेरी जिंदगी के कुछ मायने निकले पर आप क्या कर रहे हैं जरुर बताइयेगा.
प्रभात खबर में 08/04/2020 को प्रकाशित 

Tuesday, April 7, 2020

लॉकडाउन में बढ़े फेक विडियो, देखिए यह है हकीकत



बरसों पुराने विडियो हो रहे वायरल


गूगल के सर्टिफाइड फैक्ट चेकर के साथ एनबीटी ने किया फैक्ट चेक• एनबीटी संवाददाता, लखनऊ : कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए पूरा देश एकजुट है, लेकिन इस बीच कुछ अराजकतत्व फेक विडियो के जरिए माहौल बिगाड़ने में लगे हैं। लॉकडाउन के बीच तबलीगी जमात की घटना के बाद मुस्लिम समाज से जुड़े कई विडियो वायरल हो रहे हैं। किसी विडियो में पुलिस वैन के भीतर सिपाही पर थूकते हुए युवक को कोरोना संक्रमित बताया जा रहा है तो किसी में सूफी पद्धति से हो रही उपासना को संक्रमण फैलाने की साजिश करार दिया जा रहा है। एनबीटी ने गूगल के सर्टिफाइड फैक्ट चेकर प्रो. मुकुल श्रीवास्तव के साथ ऐसे कई विडियो की पड़ताल कर उनका सच जाना...


(जैसा कि गूगल सर्टिफाइड फैक्ट चेकर प्रो़ मुकुल श्रीवास्तव ने बताया।)
थोड़ी सी एहतियात से समझ सकते हैं फेक विडियो का खेल

हकीकत• 90% विडियो सही होते हैं, लेकिन उन्हें गलत संदर्भ के साथ वायरल किया जाता है। किसी विडियो की जांच करने के लिए ध्यान से देखना चाहिए। • क्रोम ब्राउजर में इनविड (InVID) एक्सटेंशन जोड़कर विडियो की पड़ताल आसानी से की जा सकती है। इनविड विडियो को फ्रेम दर फ्रेम देखने में मदद करता है। इसमें किसी दृश्य को बड़ा करके भी देखा जा सकता है। • किसी विडियो को समझने के लिए उसमें मौजूद पोस्टर-बैनर, गाड़ियों की नंबर प्लेट और फोन नंबर की तलाश करनी चाहिए या कोई लैंडमार्क ताकि उसके भौगोलिक जुड़ाव की पहचान हो सके। • विडियो में दिख रहे लोगों के कपड़े, भाषा या बोली पर भी ध्यान देना चाहिए। • इंटरनेट पर ऐसे कई सॉफ्टवेयर हैं, जो विडियो और फोटो की सत्यता पता लगाने में मदद कर सकते हैं।

07/04/2020 को नवभारत टाईम्स लखनऊ में प्रकाशित समाचार 

Saturday, April 4, 2020

घर के लिए अच्छा हो ये बुरा वक्त

वैश्विक महामारी कोरोना ने दुनिया के सभी देशों की दिनचर्या बदल को बदल कर रख दिया है  | घर और ऑफिस के बीच का अंतर खत्म हो गया है लोग घरों में बंद हैं |भारत भी इससे अछूता नहीं परंतु सभी का ध्यान इस महामारी से बचाव और लॉक-डाउन से दिखने वाले  प्रभाव पर है |  संस्थान घर से काम  करने को प्राथमिकता दे रहे हैं |इस नए तरीके की कार्य पद्धति में भी महिलायें दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं | कोरोनोवायरस लॉकडाउन के इस साइड इफेक्ट में कामकाजी महिलाओं के लिए  विडंबना यह है कि उनका बोझ दोगुना हो गया है | प्रोफेशनल प्रतिबद्धता की मांग  है कि घर से काम करोऔर परिवार चाहता है कि घर के लिए काम करो | 
            भारत में सामाजिक मानदंडों के कारण घर के काम  और बच्चों की परवरिश को महिलाओं  का कार्य माना जाता है | पुरुषों का घरेलू काम  करना सामजिक रूप में  हेय दृष्टि से देखा जाता है | कुछ प्रगतिशील पुरुष गर्व से कहते हैं कि वे महिलाओं के काम में हाथ बंटाते हैंपरंतु यह समझ से परे है कि ऐसा कौन सा कार्य है जो महिलाओं का है घर का नहीं ?
पिछले कई दिनों से,घरों में कामकाजी  महिलाओं के  लिए मदद देने वाली मेड ,कपडा धोने वाली और झाड़ू पोंछा का आना बंद हो चुका है ऐसे में घर से काम करना साथ ही साथ नौकरानी के बिनाएक बच्चे  की देखभाल करनापरिवार के लिए खाना पकाना और स्वच्छता बनाए रखना लगभग असंभव है | जिससे वे बारह घंटे की शिफ्ट के दौरानभारत की महिलायें अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक बोझ झेल रही  है |कारण सीधा है  भारतीय परिवारों में यह सहज नियम है कि पुरुष सदस्य से घर के काम करने की उम्मीद नहीं की जाती है | ज्यादातर भारतीय घरों में घरेलू काम काज का बंटवारा नहीं  होता है। भले ही पति और पत्नी दोनों घर से काम कर रहे होंलेकिन भार महिलाओं द्वारा पूरी तरह से वहन किया जाएगा | पर इससे  यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए  है कि पूरी तरह से  घरेलू काम काज करने वाली महिलायें  बेहतर स्थिति में हैं | उनके पास ससुराली  रिश्तों की मांगों को पूरा करना एक बड़ी जिम्मेदारी है जैसे पति के  माता -पिताया ननददेवर  आदि  का अतिरिक्त काम होता है | ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इकोनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवेलपमेंट 2015 के एक सर्वे के अनुसार एक भारतीय महिला अन्य देशों के  मुकाबले   हर दिन औसतन छह-घंटे  बगैर भुगतान का घरेलू श्रम करती है  |सर्वे में भारत के बाद मेक्सिको की महिलायें इस लिस्ट में हैं जो औसतन छ घंटे तेईस मिनट का बगैर भुगतान घरेलू श्रम करती हैं जबकि जापानफ्रांस और कनाडा की महिलायें क्रमशः तीन घंटे  चौआलीस मिनट ,तीन घंटे तैंतालीस मिनट बगैर भुगतान का घरेलू श्रम करती हैं |दूसरी ओरभारतीय पुरुष इस मोर्चे पर सबसे खराब हैंवे प्रत्येक दिन एक घंटे से भी कम बावन मिनट का  घरेलू काम करते है | घरेलू मामले में ज्यादातर फैसले महिलाओं  को लेने होते है | जैसे खाना क्या बनेगा खाना पकानासब्जियाँ खरीदना और फिर बच्चों को खाना खिलाना  ऐसी परिस्थिति में घरेलू काम वाली मेड ही वह कड़ी थी जो थोडा बहुत शक्ति संतुलन साधती थी पर अब वह कड़ी भी टूटी हुई है |
इन  बदली  परिस्थितियों में घर में महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ आन पड़ा है | घरेलू कार्यबच्चों की जवाबदेही और घर में रहने के कारण बच्चों और पुरुषों की विभिन्न फरमाइशों के बीच कामवाली बाई की अनुपस्थिति समस्या को और गंभीर बना रहें हैं | घर से दूर बाहर रह कर पढ़ाई करने वाले बच्चे भी लम्बे समय बाद घर में हैं | लेकिन मां की ममता और ख्वाहिशों के बीच सब्जियों की किल्लत रसोई के विकल्पों को सीमित करने के लिए पर्याप्त हैं |
घरेलु माहौल को खुशनुमा बनाये रखने की चुनौती
ज्यादा काम का बोझ और घर के सभी सदस्यों की आशाओं पर खरा उतरने की कोशिश महिलाओं  को चिड़चिड़ा बना देती  है | लॉक डाउन से पैदा हुई  समस्याएं और उससे उपजी दैनिक गतिविधियों में  एकरूपता के कारण इसकी संभावना और बढ़ जाती है | जिससे  घरेलू माहौल भी प्रभावित होता है लॉक डाउन से  उपजा तनावकल क्या होगा जैसी अनिश्चित स्थिति में घर में सामंजस्य बनाये रखने की अलिखित जिम्मेदारी भी महिलाओं की है क्योंकि ये वे ही हैं जिनके इर्द गिर्द पूरा घर घूमता है |
खाना बनानाकपड़े साफ करना या घर का अन्य कार्य महिलाओं का नहीं घर का काम और जीवन का कौशल है |भारतीय पुरुषों को  अब यह समझने का वक्त आ चुका  है |जेंडर स्टीरियो टाइपिंग की कैद से जितनी जल्दी हम बाहर निकलेंगे उतना ही परिवार के लिए बेहतर होगा और बच्चे भी अपने पिता से सीखेंगे कि घर का काम करने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं  की नहीं होती है बल्कि पुरुष भी इसमें बराबर के भागीदार हैं इस  लॉक डाउन का प्रयोग एक अवसर के रूप में किया जाना चाहिए  |बच्चे भी  इन जीवन कौशल से जब परिचित होंगे तो आने वाले कल में जब ऐसी परिस्थतियाँ पैदा हों तो वे बेहतर अभिभावक साबित होंगे और  ऐसी परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से करपायेंगे  | पिता जब बाहर होते हैं तब बच्चों के अपेक्षाएं भिन्न होती हैं. लेकिन घर पर रहते हुए भी पिता बच्चों पर ध्यान ना दें तो बच्चे उपेक्षित महसूस करते हैं. अतः कार्यालय की जिम्मेदारी रूटीन पूर्वक घर से पूर्ण करें लेकिन दिन में भी बच्चों के लिए भी कुछ समय अवश्य निर्धारित अवश्य करें. कोरोना से सुरक्षा के साथ-साथ पारिवारिक एकजुटतामाधुर्यताभविष्य की योजनाओं पर भी ध्यान दें.महिलाएं जब घर का कार्य निबटा कर आराम करती हैं तो ऐसा न हो कि बाकि लोग पहले आराम कर लें और उनके आराम के वक्त फरमाइश करने लगें. हम अपनी दिनचर्या को घर की  महिलाओं के सुविधानुसार ढाल कर इस बुरे वक्त को अच्छे वक्त में तब्दील किया जा सकता है |
नवभारत टाईम्स में 04/04/2020 को प्रकाशित 

Friday, March 20, 2020

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :तीसरा भाग

कैदियों को दी जाने वाली यातना का प्रतीकातमक चित्र 
फांसी घर 
फांसी घर 
दूसरे दिन सुबह धुप निकली हुई थी ,हालाँकि जून महीने में आने के लिए कई लोगों ने शंका जताई थी कि मेरी यात्रा बरसात के कारण चौपट हो सकती है पर सौभाग्य से बरसात से फिलहाल अभी तक कोई समस्या नहीं नजर आ रही थी |पहले सेल्यूलर जेल के भ्रमण का कार्यक्रम था |हालाँकि हम पिछली रात में इसके दर्शन कर चुके थे पर आज दिन की रौशनी में क्रांतिकारियों  के तीर्थ को देखने का मजा अलग था |हमारे होटल से सेल्यूलर जेल का रास्ता मुश्किल से दस मिनट का था |
सेलूलर जेल 
जहाँ आज जेल है कभी यहाँ एक विशाल पहाड़ हुआ करता था |उस पहाड़ को इस जेल बनाने के लिए काट दिया गया |सेलुलर जेल का बचा हिस्सा आज एक तीर्थ है जो हमें याद दिलाता है कि ये स्वतंत्रता कितने संघर्ष और मानव जानों की कीमत पर मिली है |हम समय से पहले सेलुलर जेल पहुँच गए थे |जेल के सामने एक पार्क बना हुआ है |मेरा कौतुहल मुझे वहां ले गया |इस पार्क का नाम था वीर सावरकर पार्क जहाँ
यहां स्वतंत्रता  की लड़ाई में शामिल उन सात वीरों का प्रतिमाएं हैं। जिन्होने जेल की अमानुषिक यातना के बीच यहीं पर अंतिम सांस ली। जिनके नाम हैं  इंदू भूषण रे, बाबा भान सिंह, मोहित मोइत्रा पंडित राम रक्खा बाली, महावीर सिंह, मोहन किशोर नामदास | ये सभी जेल में हुई भूख हड़ताल में अंग्रेजों द्वारा जबरदस्ती नली द्वारा हड़ताल तुडवाने की कोशिश में शहीद हुए |इस पार्क के पीछे एक खूबसूरत स्टेडियम बना हुआ था |
सेलूलर जेल का बाहरी भाग 
मैं अभी उस दौर की यादों में खोया हुआ ही था कि जेल के अन्दर जाने का समय हो गया |जेल के द्वार पर वीर सावरकर का उद्भोधन लिखा हुआ है “यह तीर्थ महातीर्थों का है
, मत कहो इसे काला पानी, तुम सुनो यहां की धरती के कण कण से गाथा बलिदानी” |सामने जेल का परिसर दिखता है उस परिसर में सबसे पहले 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इस जेल की कैद में शहीद हुए लोगों की याद में एक स्मारक बना है वहीं उन सेनानियों की याद में एक ज्योति भी अनवरत जलती रहती है |जेल का एक चक्कर लगाते हुए मैं सोच रहा था| इन छोटे से कमरों में आज से नब्बे साल पहले बगैर बिजली और पंखे के कैसे लोग रहते होंगे |जून के पहले हफ्ते में यहाँ खासी गर्मी पड़ रही थी उस वक्त क्या हाल होता होगा जब चारों ओर समुद्र ,उमस बोलने बतियाने के लिए कोई नहीं |दिन भर जानवरों के काम को इंसानों द्वारा लिया जाता था |
सावरकर पार्क 
थकने पर बेइंतहा मार जिसकी गवाह इस जेल की दरो दीवारें थी |आखिर कौन थे वो आजादी के मतवाले जो फिर भी नहीं झुके |यहाँ दो घंटे में में हमारा प्यास से बुरा हाल था |जेल परिसर से बाहर निकलते ही हम लोगों ने नारियल पानी पिया और आधे घंटे सुस्ताये |जब यह जेल अपने पूरे आकार में रही होगी कितना वीभत्स माहौल यहाँ रहा होगा |इसका नाम सेल्युलर जेल इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें हर कैदी के लिए अलग अलग सेल बनाए गए थे। इसका उद्देश्य था कि हर कैदी बिल्कुल एकांत में रहे और मनोवैज्ञानिक तौर पर बिल्कुल टूट जाए। जेल तीन मंजिला है।
बची हुई जेल की इमारत में सौभाग्य से वीर सावरकर की कोठरी सुरक्षित रह गयी |राजनैतिक कारणों से सावरकर अक्सर चर्चा में रहते हैं |देश के दो राजनैतिक दल अक्सर उनकी विरासत पर सवाल जवाब करते हैं |उन्हें दो उम्रकैद की सजा एक साथ मिली थी | इस हिसाब से उन्हें 1961 में जेल से बाहर आना चाहिए था |
वे इस जेल में दस साल रहे |उस वक्त के माहौल में कोई यहाँ दस दिन बिता दे मेरे लिए व
ही बड़ी बात थी ,दस साल तो बहुत बड़ी बात है वो भी देश के नाम पर ,यहीं मुझे बताया गया कि उनके भाई भी इसी जेल में कैद थे जिसकी उनसे मुलाक़ात तीन साल बाद हुई |सवालों से तो परे भगवान भी नहीं पर उनकी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता |उनकी कोठरी के ठीक नीचे फांसी घर था ,जहाँ एक साथ तीन लोगों को फांसी दी जाती थी |मैं सावरकर की कोठरी के सामने खड़े होकर नीचे देखते हुए सोच रहा था ,दस साल में उन्होंने न जाने कितने हँसते बोलते इंसानों को लाश में बदलते  देखा होगा |कितना मुश्किल होता होगा एक इंसान के तौर पर अपनी आँखों के सामने यह सब होते हुए देखना |फांसी घर में घुसते ही मेरे हाथ उस जमीन को प्रणाम  किये हुए बगैर न रह सके |हमारे असली तीर्थ तो यही हैं मैं उस कमरे में चुपचाप उन दृश्यों की कल्पना कर रहा था |जब आजादी के मतवालों को फांसी दी जा रही होगी |उसके नीचे वह कमरा जहाँ मृतशरीर  हवा में झूल रहा होता था और उसे रस्सी से उतार कर समुद्र में बहा दिया जाता है |मैं उस कमरों को दीवारों को छू कर देख रहा था |काश ये बोल सकती तो क्या बोलती ?क्या –क्या इन दीवारों ने देखा और सहा होगा ?अतीत से संवाद करते –करते मुझे वक्त का ख्याल न रहा अब चलना है |11 फरवरी 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सेल्युलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक के तौर पर राष्ट्र को समर्पित किया। |अंडमान का हेवेलोक द्वीप हमारा इन्तजार कर रहा था |

जारी ...........................

Thursday, March 19, 2020

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :दूसरा भाग

हमारे पोर्ट ब्लेयर पहुँचते वहां का मौसम बदल गया |उमस की जगह बारिश की रिम झिम ने ले लिया |वीर सावरकर एक छोटा सा एयरपोर्ट है जो किसी बस स्टैंड जैसा लगता है |अब पर्यटकों की आवक साल भर रहती हैं पर एयरपोर्ट बदहाल है |हमारा होटल एयरपोर्ट से दस मिनट की दूरी पर था थोड़ी देर मे हम अपने होटल के कमरे में पसरे पड़े थे और ऐसा लग रहा था बस अगले पांच दिन यहीं सोते –सोते गुजार दें ,पर नींद न आई |सोचा क्यों न बाहर का एक चक्कर लगा लिया जाए |हालांकि बारिश हो रही थी पर यहाँ मैं बारिश के एक नए अनुभव से रुबरु होने जा रहा था |
रात के समय लाईट साउंड शो के समय सेलुलर जेल 
जब आप बाहर से देखते हैं तो लगता है बहुत तेज बारिश है पर जब आप बाहर निकल जाएँ तो आप कम भीगते हैं |शायद इस का कारण तेज चलने हवाएं थी तो उस बारिश में मैंने होटल के आस –पास चक्कर लगाया |कु
छ दुकानें थी और लोग अलसाए से पड़े थे |बारह से तीन लंच टाईम ,तीन घंटे लंच कौन करता है काम भी होते रहते हैं पर सिस्टम तो यही है शायद इसका कारण यहाँ सुबह का जल्दी होना भी हो सुबह चार बजे उजाला हो जाता है और पांच बजे सूरज देवता आ जाते हैं इसकी भरपाई शाम को होती है और सूरज साधे पांच बजे तक डूब जाता है |ज्यादा कुछ करने को नहीं था क्योंकि हमारा पहला कार्यक्रम प्रख्यात सेलूलर जेल में होने वाले लाईट और साउंड शो को देखने का था |जिसके लिए साढ़े छ बजे तक इन्तजार करना था तो सोचा क्यों न थोड़ी पेट पूजा कर ली जाए |होटल के कुछ वेटर चेन्नई या दक्षिण भारत के थे तो कुछ यहीं के स्थानीय निवासी पर किसी ने उत्तर भारत न देखा था |उनके लिए दिल्ली उतनी ही दूर थी जितना हमारे लिए अंडमान |कभी उधर जाने का मन नहीं करता ?मैंने बात बढाने के लिए सवाल उछाला |क्या करेगा उधर जाकर अगर वो जगह इतना अच्छा होता तो लोग यहाँ क्यों आता |बात में दम था |होटल का रिशेप्सनिस्ट बीस साल का एक बिहारी लड़का था जो गया से तीन महीने पहले यहाँ आया था |उसने होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर रखा था |




यहाँ क्यों आये ?मेरे एक रिश्तेदार हैं उन्होंने बुलाया |
ऐसी दिखती थी पूरी सेलुलर जेल :फोटो साभार 
घर की याद आती है ?कभी –कभी तो लौट क्यों नहीं जाते ?क्या करेंगे वहां जाकर यहाँ पैसा तो मिल रहा है |होटल के रेस्टोरेंट से पूरा पोर्ट ब्लेयर दिखता है |समुद्र में आते –जाते जहाज ,हरे भरे छोटे –छोटे पहाड़ दूर लाईट हाउस जिसकी बत्तियां शाम के धुंधलके में चमकना शुरू कर रहीं थी और मैं सडक
 पर आते जाते लोगों को देख रहा था |ट्रैफिक एकदम व्यवस्थित कोई भी दुपहिया चालाक बगैर हेलमेट के गाडी नहीं चला रहा था |तभी खतरनाक गति से डीजे की आवाज और सड़क पर कई दुपहिये वाहन चालकों को हुल्लड़ करते निकलते देखा ,अचानक लगा मैं उत्तर प्रदेश के अपने घर में हूँ पर ये पोर्टब्लेयर था और मौका था एक लडकी की शादी की विदाई का |एक सजी धजी कार उसके आगे बाढ़ पंद्रह लोग अपनी दुपहिया में और पीछे एक छोटे हाथी जैसी गाडी में विशाल स्पीकर और मैंने सैयां जी से आज ब्रेकअप कर लिया बजता गाना |थोड़ी देर में ये शोर खत्म हुआ पर आधे घंटे में वही काफिला फिर सड़क पर था |थोड़ी देर बाद वे सब अपनी मंजिल पहुँच गए होंगे और शोर खत्म हुआ पर ये परम्परा मुझे ये सोचने पर मजबूर कर रही थी ,क्या हमारी सभ्यता शोर की सभ्यता है ?खुशी या गमी बगैर शोर मचाये पूरी हो ही नहीं सकती |मैंने सर को झटका दिया मैं यहाँ  घूमने आया हूँ सिर्फ घूमने पर इस मुए दिमाग का क्या करूँ जो हर वक्त सवाल करता रहता है |हमारे होटल से सेलुलर जेल का प्रांगण मुश्किल से पंद्रह मिनट की दूरी पर था |हम नियत समय पर पहुँच गए थे |अंदर एक शो खत्म होने को था और हमें बाहर लाइन लगा के खड़ा कर दिया गया |सडक पर पुलिस वाले ट्रैफिक और लोगों दोनों को ही व्यवस्थित कर रहे थे पर लोग कहाँ मानने वाले और उन्हें बार –बार सीटियाँ बजा कर भीड़ को किनारे करना पड़ रहा था |रात हो चुकी थी सेलुलर जेल की ईमारत खामोशी से आने वालों का स्वागत कर रही थीं |चूँकि अँधेरे में जेल का कुछ भाग ही दिख रहा था इसलिए मुझे लगा कि इसको कल दिन में आराम से देखूंगा |जेल का वह हिस्सा न जाने कितना इतिहास अपने सीने में दबाये पड़ा था |इस शो को अंडमान के सेलूलर जेल के अन्दर ला लाईट और साउंड शो आप इस लिंक पर जाकर देख और सुन सकते हैं |जब तब ये शो चल रहा था मैं बस इस जेल की दीवारों को ही देखे जा रहा था जो अलग अलग रौशनियों में अलग –अलग भाव दे रही थीं |कितनी हिंसक ,भयानक और वीभत्स दौर की साक्षी रही है ये जेल | अंडमान में ब्रिटिश सरकार ने कैदियों को भेजने का सिलसिला 1789 से ही शुरू कर दिया था। 
रात में जगमगाती सेलुलर जेल :फोटो साभार 
एक बार जो यहां आ गया उसके वापस जाने की उम्मीद कम रहती थी
, इसलिए देश में अंडमान कालापानी के नाम से मशहूर हो गया। 
सेल्युलर जेल से पहले ज्यादातर कैदी वाईपर द्वीप पर खुली जेल में रखे जाते थे। पर यहां एक विशाल जेल बनाने का ख्याल बाद में आया।  25 अक्तूबर 1789 को सबसे पहले 820 कैदियों को इस द्वीप पर लाया गया। सेल्युलर जेल जिसे इंडियन बैस्टिल भी कहा जाता है इसका निर्माण 1896 में आरंभ हुआ। 10 साल में 1906 में यह जेल बनकर तैयार हुई। यह जेल शहर के उत्तर पूर्व दिशा में अटलांटा प्वाइंट पर बनाई गई। आजकल इस जेल के बगल में मेडिकल कालेज और अस्पताल है। यह जेल ब्रिटिश काल की राजधानी रॉस द्वीप के बिल्कुल सामने है। स्थान का चयन काफी सोच समझ कर किया गया था। इसका नाम सेल्युलर जेल इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें हर कैदी के लिए अलग अलग सेल बनाए गए थे। इसका उद्देश्य था कि हर कैदी बिल्कुल एकांत में रहे और मनोवैज्ञानिक तौर पर बिल्कुल टूट जाए। हर सेल का आकार 13.5 फीट लंबा, 7 फीट चौड़ा और 10 फीट ऊंचा है। कोठरी में एक तरफ लोहे  के विशाल दरवाजे और दूसरी तरफ एक रोशनदान है जो तीन फीट चौड़ा और एक फीट ऊंचा है। जेल तीन मंजिला है।हम अगले दिन फुर्सत से इस जेल को देखने की उम्मीद लिए होटल लौट आये |
जारी .........................

Wednesday, March 18, 2020

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :पहला भाग

पोर्ट ब्लेयर का खुबसूरत नजारा 
क और यात्रा सच कहूँ तो मुझे यात्राएँ मुझे सुकून की बजाय तनाव देती हैं पर इस तनाव से मुझे जीवन जीने की गति मिलती है |वैसे मैं बड़ा सुकून पसंद आदमी हूँ पर यात्राओं  में  मेरे मन में बंसा बंजारा जग जाता है फिर क्या मैं निकल पड़ता हूँ जीवन को देखने की एक नयी द्रष्टि की तलाश में इस बार मैं एक ऐसी जगह की यात्रा में निकल रहा हूँ जहाँ जाने का मौका भाग्यशाली लोगों को मिलता है |इस बार यात्रा थी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की |
वहां पहुँचने से पहले मेरे मन में अंडमान और निकोबार यात्रा करने का एक मात्र मकसद भारत की जमीनी आख़िरी सीमा को देखने भर का था |आठवीं कक्षा में था जब भारत के राजनैतिक मानचित्र में बंगाल की खाड़ी में सुदूर बिखरे जमीन के कुछ हिस्से दिखा करते थे और मन में कौतुहल होता था ,कैसी होती होगी वहां की दुनिया ?अंडमान और निकोबार के राजनैतिक सामाजिक जीवन के बारे में हमें ज्यादा नहीं बताया गया |हो सकता है कि अब बताया जाता हो |अंडमान जाने से पहले मुझे बस इतना पता था कि वहां की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है और कुछ बढ़िया समुद्री बीच हैं |पर अंडमान इन सब से कहीं अलग है जिसके बारे में आज भी लोगों को काफी कम पता है | अंडमान मलयालम भाषा के हांदुमन शब्द से आया है जो  भगवान हनुमान के लिए प्रयोग किया जाने वाले शब्द  अंडमाणु का परिवर्तित रूप है। उन्होंने ही  श्रीलंका जाते समय इस द्वीप की पहचान की थी । रामायण से जुड़ा हुआ एक मिथक अंडमान का नील द्वीप है |माना जाता है राजा नील इस द्वीप पर आये थे और उन्हीं की याद में इसका नाम नील पड़ गया |
अंडमान और निकोबार नक़्शे में :चित्र गूगल इमेजेस 
 निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है- नग्न लोगों की भूमि बंगाल की खाड़ी में स्थित ये दोनों द्वीप समूह रणनीतिक तौर पर जहाँ भारत के लिए अहम् हैं वहीं पर्यटन का प्रमुख केंद्र भी है |जब कोई अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की यात्रा पर निकट है तो अंडमान और निकोबार के बीच अंतर नहीं पता होता है | यहाँ पर कुल 572 द्वीप हैं। अंडमान द्वीप का छियासी  प्रतिशत क्षेत्रफल वन संपदा से ढका हुआ है। न में से मात्र उनतालीस द्वीपों पर ही लोग निवास करते हैं शेष द्वीप जनसँख्या विहीन हैं |अंडमान को 

निकोबार से अलग करने वाली जलरेखा दस डिग्री चैनल है |निकोबार में पर्यटकों के जाने की मनाही है |आप निकोबार तभी जा सकते हैं जब आप वहां काम करते हों |अंडमान जहाँ पिछले पचास हजार साल जारवा जनजाति का घर है वहीं निकोबार में शोम्पेन और सेनटेलीस जनजातियों का आवास है |
ये सभी जनजातियाँ तथा कथित सभ्य इंसानों से दूर रहना पसंद करती हैं और कुछ हद तक आज भी हिंसक हैं | 1858 से यहां भारत के मुख्य हिस्सों से लोगों के बसने का सिलसिला शुरू हो गया। 10 मार्च 1858 को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े 200 सेनानियों को समुद्री जहाज से अंदमान लाया गया। तब उन्हे सजा-ए-कालापानी के तौर पर यहां लाया गया था। चाथम में उन सबसे पहले आने वाले सेनानियों की याद में स्मारक का निर्माण कराया गया है। भले ही वे कैदी के तौर पर इस द्वीप पर आए थे पर इस द्वीप के निर्माण, यहां की खेती बाड़ी और यहां की संस्कृति को भारतीय संस्कृति के तौर पर स्थापित करने में उनकी बड़ी भूमिका है। 1857 की क्रांति में विद्रोह का बिगुल बजाने वाले 200 सिपाहियों को लेकर एस एस सिमेरामी नामक जहाज 10  मार्च 1858 को अंडमान पहुंचा था।

1883 में जब चाथम शॉ मिल की शुरुआत हुई तो इनमें से कई कैदियों को इसमे काम पर लगाया गया। इसलिए शॉ मिल के परिसर में उनकी याद में स्मारक बनाया गया है। वैसे अंडमान के बारे  में तथ्य है कि चीन के लोगों को इस द्वीप के बारमें एक हजार साल पहले से मालूम था। वे इसे येंग टी ओमाग के नाम से जानते थे। रोमन भूगोलवेत्ता टॉळमी ने दूसरी शताब्दी में इसे अंगदमान आईलैंड ( अच्छे भविष्य का द्वीप) नाम दिया था। बौद्ध तीर्थ यात्री इत्सिंग ने 672 ई में यहां जहाज से यात्रा की थी। उसने इसे लो जेन कूओ ( नग्न लोगों का देश) नाम दिया था।  पंद्रहवीं सदी में मार्कोपोलो ने इसे अंगमानियन नाम दिया था। इटली के घुमक्कड़ निकोलो कौंट्री से ने इसे आईलैंड ऑफ गॉड कहा था ।
 आर्चिबिल्ड ब्लेयर

जब अंग्रेजों  का राज़ आया तो  इस क्षेत्र से गुजरने वालों जहाजों की रक्षा के लिए यहां पर स्थायी बस्ती के निर्माण की  जरूरत महसूस हुई। और विकल्प में यहाँ खूंखार कैदियों को शुरुआत में भेजा जाने लगा । चारों तरफ समुद्र होने के कारण वे भाग नहीं सकते थे अगर वे भागते भी थी तो समुद्र में ही डूब कर मर जाते । वहीं अंग्रेजों को मुफ्त में श्रमिक मिल गए जो उन 

द्वीपों को इंसानों के रहने लायक बनाने के लिए अपना श्रम देते थे | 14 अप्रैल 1788 को ब्रिटिश अधिकारी ले. आर्चिबिल्ड ब्लेयर को यहां  आबादी बसाने के लिए लगाया गया। 25 अक्तूबर 1789 को पहले कैदियों का एक दल यहां आया। इन आठ सौ बीस कैदियों को वाइपर द्वीप पर खुला छोड़ दिया गया। चारों ओर गहरा समुद्र के कारण भागने का कोई खतरा नहीं था। आर्चिबिल्ड ब्लेयर के नाम पर ही अंडमान  के इस प्रमुख शहर का नाम पोर्ट ब्लेयर पड़ा। बंदरगाह होने के कारण ब्लेयर के नाम में पोर्ट शब्द जुड़ गया। 22 जनवरी 1858 को यहां पर ब्रिटिश झंडा यूनियन जैक लहराया गया। 1858 में पैनल सेटेलमेंट के तहत आए क्रांतिकारियों में पंजाब के गदर आंदोलन के लोग, वहाबी विद्रोही, मणिपुर के विद्रोही और अन्य राज्यों के क्रांतिकारी थे। 1858 में लाए गए क्रांतिकारियों में अधिकतर यहीं की धरती में समा गए। बहुत कम लोग ही लौटकर अपने घर  वापस जा सके।
बंगाल की खाड़ी का पानी 
हमने लखनऊ से पोर्ट ब्लेयर की उड़ान भरी हमारा जहाज दिल्ली ,कोलकाता होते हुए गर्मी की एक उमस भरी दोपहरी में पोर्टब्लेयर के वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतरा |जहाज जब पोर्टब्लेयर के करीब था तो समुद्र में छोटे बड़ी कई स्थलीय भू आकृतियां दिख रही थीं और इन सबके बीच बंगाल की खाड़ी का विशाल सागर हिलोरे ले रहा था जिसका रंग कालिमा लिया लिए हुए था |शायद इसी लिए पुराने जमाने में यहाँ आने वाले कैदियों को काले पानी की सजा का नाम दिया गया था |यहाँ समुद्र का पानी काला दिखता है |
अंडमान में आपका स्वागत है अगले छ दिन हम बंगाल की खाड़ी में बसे इस द्वीप के मेहमान थे |

जारी ...................................













पसंद आया हो तो