Sunday, January 31, 2021

सिक्किम यात्रा :पहला भाग

गंगटोक कुछ ऐसा दिखता है 
मेरे लिए यात्रा का मतलब घूमना कभी नहीं रहा अमूमन मेरा पालन पोषण जिस परिवेश में हुआ है वहां महज घूमने के लिए यात्रा करना पैसे की बर्बादी है हाँ अगर आप किसी काम से कहीं जा रहे हैं और उसके साथ यात्रा हो जाए तो बढ़िया,

मैंने अपने जीवन में कई परम्पराओं को तोडा है  जिसके गवाह मेरे अपने रहे हैं जब तक माता पिता के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर रहा उनके हिसाब से जीवन जीया पर जैसे ही आर्थिक रूप से स्वावलंबी हुआ सारी बेड़ियाँ एक एक करके तोड़ता गया और उन्हीं बेड़ियों में से एक है जब मौका मिले कहीं घूमने निकल जाओ |सच बताऊँ मैं बहुत आराम तलब आदमी हूँ और यात्रा मुझे कष्ट देती है पर यह कष्ट मुझे मजा देता है हर यात्रा के बाद मैं एक नए तरह का नजरिया लेकर वापस लौटता हूँ |मैं कौन हूँ इस दुनिया में क्या कर रहा हूँ ऐसे प्रश्नों के जवाब तो नहीं मिलते पर जवाब  के थोडा और करीब हो जाता हूँ और शायद इसीलिये जब भी मुझे मौका मिलता है मैं इस कष्ट का मज़ा लेने निकल पड़ता हूँ |

वो कहते हैं न “मेरे मन कुछ और कर्ता के मन कुछ और” तो जिस यात्रा के लिए मैं इस बार निकल रहा था तब मेरे दिमाग में सिर्फ कुछ दिन आराम करना और भारत को थोडा और करीब से देखना था इससे ज्यादा कुछ नहीं था पर जब मैं इस यात्रा से लौटा तो जीवन के प्रति एक नया नजरिया पुष्ट होता गया और वो था “कर्ता बनने की कोशिश न करो” जीवन एक नदी है बस जिस तरफ नदी ले जा रही है चुपचाप बहते चलो,हम कुछ नहीं कर रहे हैं हमसे सब करवाया जा रहा है क्योंकि हमारा जीवन एकांगी नहीं यह बहुत से लोगों के जीवन से बंधा हुआ इसलिए यह संभव ही नहीं है कि आप कुछ कर रहे हैं |मैं अपनी बात और स्पष्ट करता हूँ और लौटता हूँ उस यात्रा वृतांत की ओर जिसकी उम्मीद में आप मेरा ब्लॉग पढ़ रहे हैं |इस बार मैंने पूर्वोत्तर भारत देखने का निश्चय किया पर कहाँ जाऊं कुछ समझ नहीं आ रहा था |गूगल किया और उससे भ्रम काफी बढ़ गया पूर्वोत्तर में कई राज्य हैं सबकी अपनी विशिष्टता हैं |मेरे पास किसी तरह एक हफ्ते का समय था तो मैंने सिक्किम जाने का निश्चय किया और जिसमें तीन दिन गैंगटोक एक दिन पीलिंग और दो दिन दार्जिलिंग शामिल थे| मैंने पहले ही लिखा मैं बहुत आरामतलब इंसान हूँ और उसी कारण पहले से ही सब व्यवस्था कर ली थी दिल्ली से बागडोगरा हवाई जहाज से,लखनऊ से दिल्ली ट्रेन से ,सब निश्चित था|

मतलब कहीं कोई तनाव न हो और मैं यात्रा का लुत्फ़ उठा सकूँ पर यहीं से होनी का खेल शुरू हुआ मेरी फ्लाईट के जाने और ट्रेन के  पहुँचने के बीच लगभग सात घंटे का फासला था पर हमारी ट्रेन रास्ते में ही रह गयी और फ्लाईट हमें छोड़ के बागडोगरा के लिए उड़ गयी |यात्रा अभी शुरू हुई थी कि मेरे अनुभवों का खजाना भरने लग गया एक नए तरह का अनुभव जिसकी आजतक कोई ट्रेन न छूटी हो उसे हवाई जहाज के छूटने का सदमा सहना था खैर थोड़ी देर तनाव रहा फिर गीता सार याद आया क्या ले के आये थे बस सारा तनाव छूमंतर |अब शांत दिमाग से आगे की योजना पर ध्यान देना था नए टिकट बुक करने थे और समय पर बागडोगरा पहुंचना था जिससे आगे की बुकिंग न प्रभावित न हो खैर एयरपोर्ट पहुँचने से पहले मैं टिकट बुक कर चुका था अब अगली फ्लाईट का इन्तजार था जो दिन के तीन बजे उड़ने वाली थी मैं सोच रहा था अगर मेरी फ्लाईट न छूटी होती तो इस वक्त मैं बागडोगरा में होता खैर जीवन यूँ होता तो क्या होता जैसी सोच में बीत ही जाता है |खैर हम नियत समय पर बागडोगरा पहुँच गये |बागडोगरा एयरपोर्ट सिलीगुड़ी शहर में सेना द्वारा बनाया एयरपोर्ट है हरे भरे खेतों के बीच एक बहुत छोटा सा हवाई अड्डा जहाँ आप परेशान हो जायेंगे पिछले एक दशक में पूर्वोत्तर भारत आने वाले पर्यटकों की संख्या में खासी वृद्धि हुई है पर एअरपोर्ट की हालत बुरी है खैर दिनभर की भगादौडी के बाद अभी हम अपनी मंजिल पर नहीं पहुंचे थे |यहाँ से सिक्किम की राजधानी गंगटोक हमारा ठिकाना थी लगभग एक सौ बीस किलोमीटर की सड़क यात्रा अभी और करनी थी वह भी पहाडी रास्तों में ,हमारी टैक्सी पहले से ही बुक थी |
तिस्ता दिन के समय 

ड्राइवर  सुकुल राय मिले ,पहली नज़र में मुझे वो एक घाघ टैक्सी ड्राइवर लगे मैंने सोचा पूरे रास्ते मैं चुप रहूँगा और दिन भर की थकान को सो कर पूरा करूँगा और हो भी क्यों न मैं सुबह तीन बजे से जग रहा था और मेरी ट्रेन के दिल्ली पहुँचने का सही समय साढ़े चार बजे था खैर हम बागडोगरा एयरपोर्ट से बाहर आये कहने को हम पश्चिम बंगाल में थे पर हर जगह बिहार के लोग मिल रहे थे उनके बोलने के अंदाज़ से साफ़ अंदाजा लगाया जा सकता था कि इनकी जड़ें बिहार में हैं |मैंने सुकुल जी से पूछा गंगटोंक पहुँचने में कितना वक्त लगेगा उसने कहा हम बड़ी आसानी से तीन साढ़े तीन घंटे में गंगटोंक पहुँच जायेंगे |मैंने शुक्र मनाया कि रात के नौ बजे तक हम होटल के अपने कमरे में होंगे पर वो दिन सचमुच एक खराब दिन था और आगे नियति हमारे सब्र की और परीक्षा लेने वाली थी हम सिलीगुड़ी से गंगटोंक के लिए बढे जमीन धीरे -धीरे ऊँची होने लगी मतलब हम पहाड़ पर जा रहे थे |सच बताऊँ किताबो के अलावा मुझे पूर्वोत्तर भारत का कोई ख़ास अंदाज़ा नहीं था पर यह यात्रा मेरी भारत के बारे में धारणा को हमेशा के लिए बदलने वाली थी |

हम उत्तर भारतीय लोग सिर्फ टीवी चैनल से अंदाजा लगाते हैं कि भारत क्या है और उसकी समस्याएं कैसी हैं |मेरे अंदाज़े के विपरीत सुकुल (ड्राइवर ) एक भले और ईमानदार इंसान निकले अगर उनको मैं पूर्वोत्तर के वाहन चालकों का प्रतिनिधि मानूं तो जो मेरी धारणा उत्तर भारत के ड्राइवरों को देख कर बनी थी पूर्वोत्तर के ड्राइवर ज्यादा स्वाभिमानी और मेहनतकश होते हैं |उन्होंने बताया हम लगभग दो घंटे पश्चिम बंगाल में चलेंगे और पैतालीस मिनट सिक्किम में ,शाम हो चुकी थी सूरज डूब रहा था और पहाड़ पहले हरे फिर धीरे -धीरे काले होने लग गये हवा में ठंडक थी पर इतनी भी नहीं कि आपको ठंडक लगे गाड़ी के शीशे खोल दिए गये और मैं जल्दी से सिक्किम पहुँच जाना चाहता था |

डूबता सूरज और ऊपर चढ़ते हम 
पहाडी संकरे रास्ते को सुकुल जी नेशनल हाई वे बता रहे थे इतने संकरे रास्ते को हम उत्तर भारतीय गली ही कह सकते हैं गाड़ी धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी मेरी निगाह थकान के बावजूद रास्ते पर जमी हुई थी |मेरा एक अवलोकन रहा है वो चाहे लद्दाख हो या उत्तरांचल या फिर उडीसा और अब पूर्वोत्तर की देहरी पर सडक किनारे एक खाने की चीज जरुर मिलती और वो है भुट्टा (मक्का ) तो यहाँ भी सडक के किनारे भुट्टे बिक रहे थे बीच -बीच में में कुछ लोग मुज्ज़फर पुर की लीची भी बेच रहे थे हालांकि उससे सस्ती  लीची मैं लखनऊ में खाकर गया था |हमारे साथ -साथ तिस्ता नदी भी अपनी रास्ता तय कर रही थी |वही तिस्ता जिस पर येशु दास का मशहूर गाना "तिस्ता नदी सी तू चंचला सुनकर मैं बड़ा हुआ था |अँधेरा पूरी तरह घिर चुका था पर सडक पर लगने वाला जाम खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था हमारी गाड़ी सरक -सरक कर आगे बढ़ रही थी |सुकुल जी जो मूलतः सिक्किम के रहने वाले नेपाली गोरखा थे अपनी स्थानीय भाषा में आते हुए अपने साथी ड्राइवरों से बात कर रहे थे उनसे मिली सूचना के हिसाब से   हमारे पहुँचने का समय अब बढ़कर रात के ग्यारह बजे हो चुका था उन्होंने जो जाम लगने की  जो कहानी बताई वो काफी रोचक थी दो दोस्त एक इनोवा गाड़ी पर जा रहे थे दोनों में किसी बात पर झगडा हुआ और रक दोस्त ने इनोवा की चाभी निकाल कर उसे नीचे खाई में फेंक दिया और उनकी गाड़ी रोड पर खडी हो गयी बाद में सेना की मदद से उनकी गाड़ी सड़क के किनारे किसी तरह की गयी हमने जाते समय रोड पर उस खडी इनोवा और उन दोस्तों को भी देखा जिनको पुलिस वाले कुछ समझा रहे थे |धीरे –धीरे रात गहराने लग गयी और रास्ते सूने होने लग गए दुकाने बंद थी मैंने पूछा इतनी जल्दी अभी तो आठ ही बजे हैं सुकुल जी ने बताया यहाँ शाम के सात बजे दुकानें बंद हो जाती हैं और सुबह चार पांच बजे खुल जाती हैं |

मैं भारत में ही था पर रास्ते में कोई गाड़ी हॉर्न नहीं बजा रही थी सब शान्ति से एक दूसरे को पास देते हुए आगे बढ़ रहे थे चढ़ती गाड़ी को रास्ता देने के लिए अगर गाड़ी थोड़ी पीछे भी करनी पड़े तो कोई हर्ज़ नहीं सब कुछ शान्ति से हो रहा था मोड़ पर जब दोनों तरफ की गाडिया एकदम अगल बगल होती ड्राईवर हँसते मुस्कुराते हुए एक दूसरे का हाल चाल लेते तिस्ता नदी की आवाज डराने वाली थी सिर्फ हर्र हर्र आवाज रास्ते में कई बाँध भी मिले जिनसे बिजली की जरूरतों को पूरा किया जा रहा है पर रात होने के कारण हम गाड़ी से नहीं निकले |फोटो खींचने का कोई सवाल ही नहीं था |रात के दस बज चुके थे अभी हम गैंगटोक से एक घंटे दूर थे पर भूख जोर मार रही थी सोचा चलो किसी पहाडी ढाबे के भोजन का आनंद लिया जाए वो भी धीरे –धीरे बंद हो रहे थे |गाड़ी किनारे लगी |हमने चाउमीन और चाय का ऑर्डर दिया |सुकुल जी ने हाथ मुंह धोने के लिए एक जगह दिखाई मैंने हाथ  मुंह धोने के बाद जैसे ही सर उठाया नीचे विशाल तिस्ता नदी अपने पूरे वेग से उस चांदनी रात में  बहती दिखी उस दुधिया रौशनी में तिस्ता का पानी चांदी जैसा चमक रहा था और मैं विस्मित खड़ा सोच रहा था आखिर कौन थे वे लोग जो सबसे पहले मानव सभ्यता के केन्द्रों से दूर यहाँ आकर बसे होंगे जहाँ जीवन कठिन लेकिन खुबसूरत है ,वो कौन से कारण रहे होंगे जो लोगों को मैदान छोड़कर पहाड़ में बसने के लिए प्रेरित करते होंगे वो भी तब जब सभ्यता को विकास का रोग नहीं लगा था और यहाँ बसना बहुत दुष्कर रहा होगा |बात ड्राइवरों की हो रही थी जब हम नाश्ता कर रहे थे मैंने सुकुल जी से कहा आप भी नाश्ता कर लो उन्होंने विन्रमता पूर्वक कहा वो सिर्फ चाय पीयेंगे |हम चाय पी ही रहे थे मैंने उनको अपने लिए एक शीतल पेय खरीदते देखा ,चूँकि उत्तर भारत में हमने ड्राइवरों का एक दूसरा रूप देखा भले ही ट्रेवल एजेंसी कहती है कि उनके खाने पीने से सवारी को कोई मतलब नहीं रहेगा पर वे इस जुगाड़ में रहते हैं कि पैसेंजर उनके खाने पीने का खर्चा उठाये पर यहाँ का ड्राइवर इस सारे मामले से ऊपर है और अपने खाने पीने का बोझ किसी भी जुगत से अपनी सवारी पर नहीं डाल रहा था मैंने तुरंत उन्हें पैसा देने से रोका और कहा इसका पैसा भी मैं ही दूंगा |हमारे इस वार्तालाप में ढाबा मालिक भी शामिल हो गया उसने पूछा मैं कहाँ से आया हूँ ,मैंने गर्व से बताया लखनऊ बस फिर क्या था वो बताने लगा वो भी लखनऊ से और विकास नगर में घर है मैंने कहा यहाँ काहे चले आये जंगल में उसने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और मुस्कुरा के बात को बदल गया उसकी बोलने की शैली से लग रहा था उसकी जड़ें बिहार में हैं हो सकता है लखनऊ में कोई रिश्तेदार रहता हो या उसका आना जाना लगा रहता हूँ एक उत्तर भारतीय के ढाबे में सारे कामगार मजदूर स्थानीय लोग थे यही है चमत्कार वो अपनी जमीन पर मजदूर थे और बाहर से आया एक आदमी मालिक बना बैठा था |अभी हमारा सफर जारी था सुकुल जी की हिन्दी को समझने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी इसलिए ज्यादा बातचीत न हो पा रही थी पर एक चीज  हम दोनों में कॉमन थी वो पुराने हिन्दी गानों के प्रति प्रेम खासकर नब्बे के दशक के जब हम जवान हो रहे थे |शांत चांदनी रात में हम नदीम श्रवण ,कुमार शानू ,अलका याग्निक और समीर की शानदार जुगलबंदी में गंगटोंक की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे रास्ते धीरे –धीरे चौड़े होते जा रहे थे पर उंचाई बढ़ती जा रही थे सिक्किम में  प्रवेश का एक विशाल द्वार हमारा स्वागत कर रहा था और गूगल मैप बता रहा था होटल देवाचीन रिट्रीट  दस मिनट की दूरी पर है  हम गैंगटोक में थे ..........


जारी 
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Friday, January 29, 2021

परदे पर खेल

 


खेल हमेशा किसी न किसी वजह से चर्चा में रहते हैं फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में भारत की धमाकेदार जीत चर्चा में है . वैसे जिंदगी भी तो एक खेल ही है जैसे जिंदगी चलती रहती है वैसे जिंदगी का खेल भी जिंदगी में अगर खेल महतवपूर्ण हैं तो हमारी फ़िल्में भी इनसे कहाँ अछूती हैं बहुत सी फिल्मों की कहानी खेलों के इर्द गिर्द ही घूमती है .१९७७ में बनी  शतरंज के खिलाड़ी’ हालाँकि प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी पर शतरंज के बहाने इस फिल्म ने भारत में अंग्रेजों के आने का समय  और नवाबों के रवैये का अच्छा चित्रण किया था १९८४ में बनी हिप्प हिप्प हुर्रेने पहली बार फ़ुटबाल के खेल को बड़े परदे पर उतारा .हार और जीत तो हर खेल के साथ जुडी रहती है पर हार के डर से खेल नहीं छोड़ा जाता है महत्वपूर्ण  है खेल को खेलना अगर ये दर्शन  हम अपने जीवन  में उतार लें तो जिंदगी का खेल टेंशन फ्री हो जाएगा .अस्सी के दशक में खेलों पर आधारित अन्य फिल्मों में बोक्सर(१९८४),आल राउंडर(१९८४),कभी अजनबी थे (१९८५)और मालामाल (१९८८)प्रमुख थी .जिसमें बोक्सर को छोडकर सभी की विषय वस्तु क्रिकेट ही थी आपको याद दिलाता चलूँ यही वह दौर था जब भारत ने १९८३ का क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता था और धीरे धीरे क्रिकेट का जादू लोगों के सर चढ़कर बोलने लगा था .

असल में खेलों की दुनिया कभी हार न मानने की मानवीय प्रवृत्ति को दिखाती  है और यहीं से खेल हमारी जिंदगी से जुड जाते हैं .नब्बे का दशक खेलों के लिहाज़ से ज्यादा बेहतरीन नहीं माना जा सकता सिर्फ दो फ़िल्में ऐसी थी जिनका कथानक खेलों से प्रेरित था अव्वल नंबर’ (१९९२) क्रिकेट और जो जीता वही वही सिकंदर’ (१९९२) सायक्लिंग रेस पर आधारित थी .

फिर आया २००० का दशक दुनिया और खेल में बहुत कुछ बदल चुका था खेल रात में फ्लड लाईट में खेले जाने लग गए खेलों को रोचक बनाने के लिए उनके नियम में बदलाव हुआ और यही वक्त था जब हमारी जिंदगी के नियमों को  मोबाईल और मल्टीप्लेक्स बदल रहे थे बदलाव के इस दौर में  फिल्मों को भी बदलना था हमजोली फिल्म के जीतेन्द्र और लीना चंदावर्कर   के बेडमिंटन मैच के बाद से अब तक काफी कुछ बदल चुका था .इस दशक में क्रिकेट को ध्यान में रखकर एक के बाद एक फ़िल्में आयें जिनमे सबसे पहले लगान(२००३) का जिक्र करना जरूरी है ये वो पहली फिल्म थी जिसने पारम्परिक  भारतीय सिनेमा की ताकत का एहसास दुनिया को कराया .लगान के अलावा स्टम्प्ड (२००३),इकबाल (२००५) हैटट्रिक (२००७) से सलाम इंडिया (२००७)दिल बोले हडिप्पा (२००७ ) ऐसी और फ़िल्में थी.

 

 क्रिकेट पर ज्यादा फ़िल्में बनने का कारण लोगों में इस खेल के प्रति जुनून की हद तक लगाव है ऐसे में चक दे इंडिया’ एक नया नजरिया ले कर आयी सिनेमा के रूपहले परदे पर जिसका विषय एकदम नया और अनोखा था महिला हॉकी  फिल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किया और लोगों में होकी के प्रति एक नया जोश भरा .ऐसा नहीं है कि फ़िल्में पोपुलर स्पोर्ट्स को ध्यान में रखकरबनाई जाती हैं तीन पत्ती :ताश तारा रम  पम :रेसिंग स्ट्राइकर: कैरम लाहौर:किक बॉक्सिंगमेरी कोम: बॉक्सिंग,और भाग मिल्खा भाग:दौड़   पर आधारित फिल्में  हैजैसी  विविधता खेलों  में है वो हमारी फिल्मों में भी दिखती  है पर जैसे खेल को खेल भावना से खेला जाता है उसी तरह से जिंदगी के खेल को भी खेलिए आज अगर आप हारें तो कल जीत भी सकते हैं और अगर आज जीते हैं तो कल हार भी सकते हैं .


प्रभात खबर में 29/01/2021 को प्रकाशित 


Thursday, January 28, 2021

शेयार बाजार में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स

 


इंटरनेट की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण बात है इसकी गतिशीलता नया बहुत जल्दी पुराना हो जाता है और नई संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं .सोशल मीडिया प्लेटफोर्म नित नए रूप बदल रहे हैं उसमें नए नए फीचर्स जोड़े जा रहे हैं .इस सारी कवायद का मतलब ऑडिएंस को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक अपने प्लेटफोर्म से जोड़े रखना .इसका बड़ा कारण इंटरनेट द्वारा पैदा हो रही आय भी है .अब सोशल मीडिया इतना तेज़ और जन-सामान्य का संचार माध्यम बन गया कि इसने हर उस व्यक्ति को जिसके पास स्मार्ट फोन है और सोशल मीडिया पर उसकी एक बड़ी फैन फोलोविंग  वह एक चलता फिरता मीडिया हाउस बन गया  है और इसी से उभरी है सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की एक नयी पौध| कोरोना लॉक डाउन के समय जब सभी घर में बैठकर पारिवारिक समय बीता रहे थे तभी बहुत से नए चेहरे शेयर मार्केट के बारे में जानकारी देने के क्षेत्र में उतरे |

मूलत: अर्थ और वित्त के क्षेत्र में अपनी जटिलता के कारण ऑडिएंस के तौर पर  नए लोग इनसे जुड़े कंटेंट से दूरी बना कर रखते हैं और वे संगीत समाचार और कॉमेडी जैसी शैलियों में ही संतुष्ट रहते हैं पर देश के बढ़ते माध्यम वर्ग और इंटरनेट के विस्तार ने इस क्षेत्र में कंटेंट की जरुरत पर इंटरनेट कंटेंट क्रियेटर का ध्यान खींचा |

 आम तौर पर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ब्रांड और सेवाओं के अलावा संगीत और कॉमेडी जैसे क्षेत्र में ही अपनी पहुँच का इस्तेमाल करते थे, पर कोविड काल ने बहुत कुछ बदला है और उसी का परिणाम है इन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर का अर्थ और वित्त जैसे मुश्किल विषय में उतरना और तेजी से लोकप्रिय हो जाना भी शामिल है | ऑनलाईन वीडियो इन साईट कम्पनी विडूली के अनुसार यूटब के वित्त के क्षेत्र में देश के तीन सबसे बड़े चैनल में प्रो कैपिटल  डॉट मोहम्मद फैज चैनल (298 मिलीयन व्यूज) फिन्नोवेशन जेड डॉट कॉम (99 मिलीयन व्यूज के साथ 1.3 मिलीयन सब्सक्राईबर) और असेटयोगी (78मिलीयन व्यूज के साथ 1.8 मिलीयन सब्सक्राइबर )शामिल हैं| किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के  आंकलन का एक पैमाना देश की कुल जनसख्या का शेयरों में निवेश का प्रतिशत भी होता है,इस संदर्भ में भारत में भारत की स्थिति रोचक है यहाँ लोग शेयर मार्केट में कम निवेश करते हैं एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में सिर्फ 18 मिलीयन निवेशक हैं|ऐसी ही स्थिति म्युच्युल फंड की है जिसमें सिर्फ दो करोड़ निवेशक हैं | शेयर बाजार के बारे में आम भारतीय को कम जानकारी है और चौबीस घंटे चलने वाले वित्त और व्यवसाय के चैनल भी लोगों की जागरूकता बढ़ा पाने में नाकामयाब रहे|ऐसे में इंटरनेट पर एक बड़ा सेगमेंट इस क्षेत्र में खाली रहा| जिसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की नयी पौध भरने की कोशिश कर रही है|ये सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर उन नए निवेशकों के लिए बड़े लाभकारी है जिन्हें शेयर बाजार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं और उन्हें शून्य से शुरुआत करनी है |स्टॉक मार्केट की विशेषीकृत शब्दावली आप निवेशकों को परेशान करती है पर इंटरनेट पर अब लाखों ऐसे चैनल हैं जो लोगों को शेयर बाजार की बारीकियों को आसान शब्दों में समझा रहे हैं |सस्ते डाटा ने हर शैली के मीडिया कंटेंट को बढ़ावा दिया है जिसमें शेयर बाजार और अर्थशास्त्र से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं |मार्च में कोविड लॉक डाउन के बाद शेयर बाजार ने बड़ा गोता लगाया था पर अब शेयर बाजार की बढ़त ने ये उम्मीद जगाई है कि कोविड महामारी से क्षतिग्रस्त अर्थव्यवस्था उम्मीद से जल्दी पटरी पर लौट आयेगी |वित्त के क्षेत्र में शामिल सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर न केवल अपने चैनल से पैसे बना रहे हैं बल्कि इस क्षेत्र में अग्रणी कम्पनियों से करार कर उन्हें भी प्रोमोट कर रहे हैं |एक तरफ ऐसे चैनल जहाँ लोगों को अर्थ और वित्त के क्षेत्र में जागरूक कर रहे हैं जो नए लोगों को शेयर मार्केट में जोड़ने और उनका भरोसा जीतने का बड़ा जरिया हो सकता है,लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलु भी है जिस तरह देश में इंटरनेट का विस्तार हो रहा है उसी रफ़्तार से साईबर अपराध भी बढ़ रहे हैं दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक लॉक डाउन के दौरान सिर्फ दिल्ली में ही साइबर अपराधों में नब्बे प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जिसमें वित्तीय अपराधों का आंकडा कुल अपराध का पचास प्रतिशत था |एक कंटेंट शैली के रूप में वित्त और अर्थ जैसे विषयों का इंटरनेट पर उभरना देश के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा संकेत है लेकिन शेयर बाजार का इतिहास स्कैम और धोखाधड़ी से भरा हुआ रहा है| जिससे नए निवेशक एक निवेश के रूप में उसे एक बेहतर विकल्प के रूप में नहीं देखते वहीं इंटरनेट पर होने वाले वित्तीय लेन देन भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं माने जाते हैं |वहीं रूपये पैसे के मामले में भारतीय एक सुरक्षित निवेश की तलाश में रहते हैं और शेयर मार्केट अनिश्चिताओं से भरा हुआ है |एक अनाम कंटेंट क्रियेटर की राय वित्त और क्षेत्र की बारीकियों को समझने में दर्शकों की मदद भले ही कर सकती हो पर उसकी राय से किया गया शेयर बाजार में किया गया निवेश हमेशा अच्छा भुगतान देगा ऐसा जरुरी नहीं |तो भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि अर्थ-वित्त और इंटरनेट की यह जुगलबंदी क्या आम निवेशकों को ज्यादा से ज्यादा शेयर बाजार से जुड़ने के लिए प्रेरित कर पायेगी या यह दौर थोड़े समय बाद थम जाएगा |किसी भी परिस्थिति में यह तो तय है कि इंटरनेट के कंटेंट क्रियेटर संगीत कॉमेडी और समाचार जैसे प्रचलित विषयों से इतर सोच रहे हैं और एक दर्शक के रूप में इंटरनेट पर ऐसे नए विषय दर्शकों को इंटरनेट पर देखने के ज्यादा विकल्प सुझाते रहेंगे |

 नवभारत टाईम्स में 28/01/2021 को प्रकाशित 

 

Sunday, October 18, 2020

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :आठवां भाग

अगले दिन सुबह बारिश ले कर आई |जिसने हमारा एलीफेंटा द्वीप का कार्यक्रम चौपट कर दिया |बारिश की वजह से एलीफेंटा द्वीप पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया |
विदा हेवेलॉक
हमें दोपहर बाद नील द्वीप के लिए निकलना था |समय काफी था मैंने आस –पास की जगह चक्कर मारने का निश्चय किया |


हमारे रिसोर्ट के पीछे नारियल के बड़े बाग़ थे और उसके पीछे एक छोटी पहाडी |तरह –तरह के नारियल गिरे हुए थे |छोटे बड़े मोटे पतले कुछ हरे रंग के तो कुछ पीले |मुझे बताया गया कि पीले वाले नारियल ज्यादा मीठे होते हैं |
बीस के नोट पर अंडमान 
यहाँ बांस ,केला और नारियल के पेड़ मुझे बहुतायत में दिखे |वैसे यहाँ सुपाड़ी भी होती है पर उसके पेड़ मैं न पहचान पाया |बाहर बारिश में कई तरह के जीव नालियों में जमीन पर दिखे ,जिनमें मैं स्नेल को पहचानता था |बचपन में हम इनके कवच शंख से खूब खेला करते थे पर उत्तर भारत में मौरंग या तालाब के किनारे मिलने वाले स्नेल से यहाँ पाए जाने वाले स्नेल का आकार बहुत बड़ा था |इसका कारण यहाँ इंसानों की आबादी का कम होना या यह प्रजाति यहीं मिलती इसके बारे में कुछ न पता लगा |
केवड़े का फल 
वैसे भी ज्यादातर लोग यहाँ छुट्टियाँ बिताने आते हैं न कि ज्ञान लेने और देने तो मुझे कोई ख़ास जानकारी आस- पास न मिल पा रही थी |यहाँ के निवासी भी ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे ज्यादातर दसवीं ,बारहवीं पास कर नौकरी करने लग जाते हैं |वैसे एक बात जो बड़ी रोचक है |हमारे बीस के नोट पर जो बीच का खुबसूरत चित्र छपा रहता है वो अंडमान का ही है |कुछ देर ताश खेला गया ,कुछ देर चहलकदमी के बाद अब नील द्वीप जाने का समय हो गया था |दो बजे हमें हेवेलॉक की जेटी पहुँच जाना था |वहां से ग्रीन ओशन का क्रूज हमें नील द्वीप ले जाने वाला था |बारिश रुक –रुक के हो रही थी |हम लोग एक बजे हेवेलॉक की जेटी पहुँच गए |मैंने सोचा एक बार फिर सिक्योरिटी चेक का ताम-झाम होगा पर ऐसा कुछ भी नहीं था  | खुले आसमान के नीचे हम लोग भीग रहे थे |
जीता जागता स्नेल 
जहाज के आने में अभी समय था और जेटी का वह कमरा जो प्रतीक्षा कक्ष था लोगों से भरा हुआ था |हम उस रिम झिम बारिश के बीच खुले समुद्र की तरफ चल पड़े ,जहाँ कई तरह की स्पीड बोट खड़ी हुई थीं जिनमें कुछ लोग यूँ ही पसरे थे |शायद बारिश के कारण धंधा मंदा था |हमने एक नारियल पानी पीया और प्रकृति की खूबसूरती का आनंद उठाने लगे | तभी ग्रीन ओशन के दुकाननुमा कार्यालय का शटर खुला और हमें बताया गया ग्रीन ओशन आ गया है लेकिन जहाज में चढ़ने से पहले उस कार्यालय में जाकर हमें अपने टिकट पर चेक इन का ठप्पा लगवाना था |वहां लोगों की भीड़ पहले ही इकट्ठा हो चुकी थी पर इस काम में ज्यादा समय नहीं लगा |अब भीगते भागते हम ग्रीन ओशन में घुसने के लिए तैयार थे पर जिस तरह की हडबडाहट ग्रीन ओशन के क्रू मेंबर दिखा रहे थे इसका कारण मुझे समझ न आ रहा था क्योंकि क्रूज के चलने का आधिकारिक समय अभी हुआ नहीं था |
नील की जेटी
ग्रीन ओशन ,मैक्क्रुज के मुकाबले कम विलासिता वाला क्रूज था |बारिश में लोगों के चढ़ने के कारण अंदर एक अजीब सी गंध थी जैसे कहीं मछली मरी हुई हो |हमारे जहाँ बैठने की व्यवस्था थी उस जगह की सारी फर्श गीली हो चुकी थी |अभी हम लोग बैठ कर व्यवस्थित भी नहीं हुए थे कि ग्रीन ओशन चल पड़ा,जबकि अभी उसका चलने का आधिकारिक समय नहीं हुआ था |शायद इसी कारण जहाज के क्रू मेंबर जल्दीबाजी दिखा रहे थे वैसे भी क्रूज में चलने के लिए आपको पहले से आरक्षण करवाना पड़ता है |अगर सारे लोग आ गए हों तो वह चल पड़ा हो |यही सब सोचते हम खिड़की से नील द्वीप को खोजने लग गए क्योंकि हमारे साथ –साथ एक विशाल थल आकृति भी चल रही थी |धीरे –धीरे वो भी  पीछे छूट गयी |अब हमारे सामने सिर्फ विशाल शांत समुद्र था | 
कुछ लिखना जरुरी है क्या ?
हेवेलॉक से नील तक की समुद्री दूरी एक घंटे में तय की जानी थी |जल्दी ही नील का किनारा दिखने लगा | जनश्रुतियों के अनुसार नील द्वीप का नाम भगवान राम के योद्धा नील के नाम पर पड़ा | जिन्होंने रामेश्वरम से श्रीलंका तक पुल बनाने में भगवान राम की मदद की थी |लेकिन इतिहास बताता है कि अंडमान निकोबार में बाहरी लोग तो अंग्रेजों के आने के बाद बसे और जो आदिवासी हैं वो हिन्दू धर्म नहीं मानते तो ये जनश्रुति कैसे बनीं कहना मुश्किल है |
नील की जेटी भी हेवेलॉक जैसी थी ,भीड़ सिर्फ जेटी पर ही थी |शहर एकदम खाली ,भीड़ थी पानी से भीगे पेड़ों की |चारों तरफ पेड़ –पौधों से भरे खेत पर ये पेड़ इतने सघन थे कि सडक से खेतों में झांकना मुश्किल था  |बीच में एक छोटी सी सड़क जिसमें एक वक्त में एक ही गाडी आ या जा सकती थी |हमारा ड्राइवर रॉकी नाम का एक जवान लड़का था |मैंने पूछा क्रिश्चियन हो उसने कहा हाँ |
नील का नेचुरल ब्रिज 
नील में  क्रिश्चियनों के चार परिवार रहते हैं |बाकी सारी आबादी हिन्दुओं की है जबकि पोर्ट ब्लेयर में मुसलमानों की भी ठीक –ठाक आबादी है |जेटी से उतरते ही हमें नेचुरल ब्रिज देखने जाना था |जो जेटी से करीब पांच किलोमीटर दूर था | नेचुरल ब्रिज हालांकि एक भौगौलिक आकृति है पर पर्यटकों को बेवक़ूफ़ बनाने के लिए इसके साथ भी एक कथा जोड़ दी गयी है कि यह एक पुल है |जिसे किसने बनाया किसी को पता नहीं ,पहले तो गाईड ले लेने की मनुहार जो काफी सभी तरीके से की गयी |मैंने भी सभी तरीके से मना कर दिया ,फिर हिन्दुस्तानी जुगाड़ लगाया |हम एक ऐसे दल के पीछे हो लिए जिसने गाईड कर रखा था |मैं यह जानना चाहता था कि ये लोग क्या नया अनूठा बताते हैं |कुछ सीढियां ऊपर चढ़ने के बाद नीचे उतरने के बाद हम समुद्र के सामने थे |
नील कुछ ऐसा दिखा मुझे अपने क्रूज से 
एक ऐसा किनारा जहाँ बहुत से नुकीले पत्थर थे |सामने मैन्ग्रोव के जंगल और हमारे पीछे केवड़े के बड़े –बड़े पेड़ जिसमें ,खरबूजे जैसे पीले फल लगे हुए थे | गाईड लोगों को बता रहा था कि ये फल पहले आदिवासियों का भोजन था |वो आदिवासी अब कहाँ गए ये बताने वाला कोई नहीं था |वैसे भी अंडमान और निकोबार के आदिवासी भारत के सबसे खूंखार आदिवासी माने जाते हैं |बहुत सारे नुकीले पत्थरों  और चट्टानों को पार करने के बाद हम एक ऐसी आकृति के सामने थे |जो एक चट्टान थी और समुद्र के पानी से कटने के बाद एक छेदनुमा आकृति बना रही थी |इसी के किनारे बैठकर मैंने सूर्यास्त का आनंद लिया |
पीले नारियल 
जैसे –जिसे सूरज डूब रहा था मैं सोच रहा था एक दिन हमको भी इस दुनिया से चले जाना है चुपचाप |मैं आज जहाँ बैठा हूँ कल कोई बैठा था और कल कोई आकर बैठेगा |दुनिया में एक चीज सत्य है और वह है परिवर्तन |मेरे अगल –बगल लोगों का झुण्ड जिन्दगी का लुत्फ़ उठाने में मशगूल था |एक जोड़ा जिसकी नई –नई शादी हुई थी |हाउ लवली हाउ क्यूट जैसे शब्दों से संवादों का आदान –प्रदान कर रहे थे |एक ऐसा भी परिवार था जो अपनी दिव्यांग बच्ची को नेचुरल ब्रिज  दिखाने लाये थे जो पैर से ठीक से नहीं चल पा रही थी |एक वृद्ध जोड़ा शायद जिन्दगी की शाम में जिन्दगी को जीने निकल पड़ा था |मैं जिन्दगी के इस सर्कस को जोकर की तरह आँखें फाड़े देख रहा था |शाम घिर रही थी |आस -पास के जंगल पंछियों की चहचाहट से गूंज उठे |अब हमें भी वापस अपने रिजोर्ट लौटना था |
जारी ...................................

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :नवां भाग

लक्ष्मणपुर के सामने हमारा रिजोर्ट
नील द्वीप में जिस रिजोर्ट में हमारे रुकने की व्यवस्था थी उसके ठीक सामने लक्ष्मनपुर बीच था | रिजोर्ट में सामान पटकते सभी द्वीप की ओर लपके ,आसमान में काले बादल छा चुके थे और हवा ठंडी हो रही थी |ऐसा लग रहा था बड़े जोर की बारिश होगी पर मौसम बहुत देर तक ऐसा ही रहा |मेरी हमेशा से आदत रही है जो सब करें वो न करो तो मैं थोड़ी देर रिजोर्ट के कमरे में अकेले पड़ा रहा |धीरे –धीरे शाम घिर आई और जब बीच एकदम खाली हो गया मैंने बीच का एक चक्कर लगाने का निर्णय किया |चूँकि आसमान में बादल छाये हुए थे इसलिए अँधेरा जल्दी हो गया था |बीच पर पत्थर ज्यादा थे इसलिए वहां नहाया तो बिलकुल नहीं जा सकता था |समुद्र में पैर  जरुर  भिगोये जा सकते थे |बीच एकदम सुनसान पड़ा था |उसके किनारे तरह –तरह के खोमचे जरुर लगे थे पर वहां एक भी आदमी न दिखा |शायद बारिश के डर से सब अपनी दुकान जल्दी बढ़ा गये थे |वहां सिर्फ पन्नियों में ढंकी आकृतियाँ ही दिख रही थीं पर उन खोमचों में क्या बेचा जाता था |यह बता पाना मुश्किल था |मैं समुद्र के किनारे की नरम बालू में धीरे –धीरे बढ़ता जा रहा था |
लक्ष्मणपुर बीच और भीगा -भीगा मौसम 
कुछ आगे जाने पर एक दो आकृतियाँ मुझे समुद्र के किनारें दिखीं पर उनकी ओर मैंने ध्यान न देकर समुद्र में किनारे –किनारे चलने का निश्चय किया |मुझे लगा कोई आवाज दे रहा था पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पुलिस की वर्दी में एक महिला और पुरुष खड़े थे जो मुझे अपने पास बुला रहे थे |अँधेरा होने के कारण उनका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था लेकिन मैं समझ चुका था कि वे मुझे समुद्र से दूर रखना चाह रहे थे |मैं थोड़ी देर में उनके पास था |परिचय हाल चाल के बाद मैंने पुलिस वर्दी में खड़े पुरुष से पूछा कि आप कहाँ से  हैं तो उसने बताया वह आजमगढ़ का रहने वाला है और लम्बे समय से यहाँ अंडमान में तैनात हैं |उनकी पढ़ाई लिखाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हुई थी |वो तो मुलुक के निकल आये फिर तो न जाने किन –किन मुद्दों पर हमने बातें की |ये बात तब तक चलीं जब तक इतना गहरा अँधेरा न छा गया कि हम एक दूसरे को भी देख न पा रहे थे |हमारी बात चीत में एक दुकान वाला भी शामिल हो गया |अंडमान मने अपराध न के बराबर था |उत्तर प्रदेश का मूल निवासी होने के बावजूद वो पुलिस इन्स्पेक्टर रिटायर होने के बाद वहां नहीं लौटने वाले थे |क्यों ? वहां कोई कानून नहीं है |
भीगता समुद्र 
उनकी बेटी बैंगलोर में पढ़ रही थी ,जब घर की याद आती है तो साल में एक बार चक्कर लग जाता है बस उनके हिस्से का उत्तर प्रदेश इतना ही बचा है उनके व्यक्तित्व में |बच्चे गाँव नहीं जाते उनकी तबियत खराब हो जाती है |नील द्वीप के जनसँख्या अब ढाई लाख है पर उस दुकानदार ने बताया कि ये बहुत ज्यादा है |पहले तो लोग दिखते ही नहीं थे |अब रात पूरी तरह से हो चुकी थी |उन पुलिस वाले साहब ने हमसे कहा आप समुद्र के किनारे –किनारे न जाकर रोड से रिजोर्ट जाइए |हमने उनकी बात मान ली वे तो अपनी बाईक पर उस  महिला कांस्टेबल के साथ  बैठकर फटाक से वहां से निकल गए लेकिन हमें पैदल जाना था |ऊँचे –ऊँचे पेड़ों के बीच हम उस रोड पर बढ़ चले जो हमारे रिजोर्ट तक जाती थी |वे ऊँचे पेड़ अब काले और  डरावने लग रहे थे |
रह –रह के बिजली चमक रही थी |
ऐसे ही भीगते मौसम में गेस्ट अपीरियेंस देता यह नाचीज 
कोई स्ट्रीट लाईट नहीं हम अंदाजे से बढे चले जा रहे थे पर रास्ता ख़त्म होने का नाम ही ले रहा था |अब मुझे इस बात का डर था कि कहीं भटक तो नहीं गए हैं क्योंकि समुद्र के रास्ते से हमें इतनी देर नहीं लगी थी |मैं इस बात से निश्चिन्त था कि यहाँ हमारे साथ कोई अपराध नहीं होगा पर रास्ता अगर भटक गए तो क्या होगा क्योंकि सड़क के दोनों और दूर –दूर तक कोई आबादी नहीं दिख रही थी |कुछ देर बाद हमें बिजली की रौशनी दिखी और जान में जान आई |उस रौशनी का पीछा करते हुए हम आगे बढ़ते रहे जो संयोग से हमारे रिजोर्ट की ही थी |हमारे रिजोर्ट पहुँचते ही बड़े जोर की बारिश शुरू हो गयी |अब हम निश्चिन्त थे क्योंकि हम अपने रिजोर्ट बगैर भीगे पहुँच चुके थे |रात लगातार बारिश होती रही और हमारे सामने का समुद्र गरजता रहा |सुबह आँख खुलते हमारा स्वागत बारिश ने किया |इस बात की पूरी संभावना थी कि आज का हमारा लक्ष्मणपुर बीच देखने का कार्यक्रम गड़बड़ा न जाए |हमारे रिजोर्ट के सामने भरतपुर बीच था |नाश्ते के बाद हमारे पास बारिश के रुकने का इन्तजा💕र करने के अलावा कोई चारा नहीं था |उस वक्त जब कि पूरा उत्तर भारत गर्म थपेड़ों से जूझ रहा था |



हम भारत के अंतिम कोने पर स्थित अंडमान में मानसून का स्वागत कर रहे थे |हालांकि इस स्वागत में मजबूरी नुमा खीज भी शामिल थी क्योंकि ये बारिश हमारे कार्यक्रम में बाधा डाल रही थी |थोड़ी देर इधर उधर घूमने के बाद मैंने समुद्र के किनारे जाकर बैठने का निश्चय किया |
वो कॉटेज जहाँ से ख्याल जन्म ले रहे थे 
उस भीगे दिन जब आसमान में बादल छाए थे मैं समुद्र के किनारे एक झोपडी नुमा कॉटेज में बैठकर समुद्र को भीगते देख रहा था |लहरें किनारे की जमीन को चूम कर वापस लौट जा रही थीं |जहाँ से वो आईं थीं |लौटना तो हम सबको है उस अनन्त दुनिया में जहाँ से कोई नहीं लौटता फिर हम कहाँ भागे जा रहे हैं |ऐसे न जाने कितने ख्याल दिमाग में आ जा रहे थे |कभी –कभी कोई जहाज दूर समुद्र में अपनी मंजिल की ओर बढ़ता दिख जाता था |कभी कैमरा निकाल कर कुछ तस्वीरें खींच लेता कभी आस –पास की हरियाली में थोडा भीगकर वापस अपनी जगह लौट आता |आस पास न जाने कितने छोटे बड़े घोंघे उठाता थोड़ी देर उनकी हरकतों को देखता और फिर उनको उनकी जगह छोड़ देता |दिन के करीब साढ़े बारह बारिश बंद हो गयी थी पर अब समय का टोंटा था |ढाई बजे मैक्क्रुज वापस हमें पोर्ट ब्लेयर ले जाने वाला था और अभी लक्ष्मणपुर बीच भी जाना था |भागते दौड़ते लक्ष्मणपुर बीच पहुंचे जो सौभाग्य से नील की जेटी से लगा हुआ था और हम यहाँ से मैक्क्रुज को आते हुए देख सकते थे | लक्ष्मणपुर बीच अंडमान के अन्य द्वीपों की तरह साफ़ सुथरा और भीड़ भाड़ रहित था |यहाँ खूब सारे वाटर स्पोर्ट्स की सुविधा थी पर उस भीगे  दिन बारिश के कारण सभी स्पोर्ट्स बंद थे और हमारा जेट स्की चलाने का सपना ,सपना ही रह गया |
भरतपुर बीच 
समुद्र में अभी पैर भिगोये ही थे कि पता पड़ा | मैक्क्रुज आ चुका है अब जेटी की तरफ भागना था |गिरते पड़ते हम जेटी की तरफ पहुंचे और मैक्क्रुज में अपनी सीट पर धंस गए |नील द्वीप को विदा करने का समय आ चुका था |

समय से पहले मैक्क्रुज चल पड़ा |क्रू के सदस्यों ने हमें बताया मौसम खराब होने के कारण अगले तीन दिन कोई शिप पोर्ट ब्लेयर नहीं जाएगा | मैक्क्रुज सिर्फ हम जैसे पर्यटकों को निकालने ही आया था |इस सूचना  का अभी शुक्र मना भी नहीं पाए थे कि एक नया अहसास हमें डराने के लिए तैयार था |अभी तक की मेरी समुद्री यात्राओं  में एक बार जहाज के अन्दर बैठने के बाद थोड़े बहुत हिचकोले के बाद वो शान्ति से चलता था पर इस बार ऐसा नहीं होने वाला था |जहाज जैसे गहरे समुद्र में पहुंचा हमें लगा किसी ऊंट की सवारी कर रहे थे |पूरे जहाज में चीखने चिल्लाने की आवाजें आने लगीं |
भरतपुर बीच  जहाँ  नांव इन्तजार करती हैं 
जहाज कभी ऊपर जाता कभी नीचे | क्रू के सदस्य सब यात्रियों के पास मुस्तैद खड़े हो गए |हालांकि जहाज का माहौल ऐसा था कि वे भी सीधे नहीं खड़े हो पा रहे थे |उन्होंने बताया यह सामान्य घटना है |आप सभी सुरक्षित हैं |आज “रफ सी” है मौसम खराब है |आप सभी धैर्य बनाये रखें |ऐसे माहौल में चारों तरफ से या तो लोगों के चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं या उल्टियाँ करने की |हमने धैर्य बनाये रखा क्योंकि जो होना है सो होना है का दर्शन शायद  ऐसे ही वक्त के लिए दिया गया था |पर मैं कल्पना कर रहा था कि अगर जहाज डूब गया तो बस ये सोच कर सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास से शब्द उधार लूँ तो “मेरे तिरपन काँप गए” |थोड़ी देर के बाद इन हिचकोलों की आवृत्ति कम और कम होती गयी |पोर्ट ब्लेयर पहुँचते –पहुँचते ज्यादातर पर्यटक निढाल हो चुके थे पर मैं ठीक ठाक था और अगले दिन जारवा जनजाति को देखने उनकी दुनिया में जाने के बारे में सोच रहा था |

जारी ...............................................


अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :सातवाँ भाग

स्कूबा डाइविंग की तैयारी 
दो चार बार की कोशिश के बाद मुझे लगा शायद मैं स्कूबा डाइविंग का लुत्फ़ उठा ही नहीं पाऊंगा |मेरे इंस्ट्रक्टर ने पता नहीं क्या सोच कर मुझे समुद्र के एक ऐसे किनारे ले गया |जहाँ कोई नहीं था एक बार फिर मुझे हौसला दिया और कहा आप कर सकते हैं फिर उसने मुझे समुद्र पर सर ऊपर रख कर लेटने को कहा ,चूँकि मैं स्कूबा सूट पहने हुए था,इसलिए मुझे कोई समस्या नहीं हुई फिर वो मुझसे इधर उधर की बात करते हुए मुझे आगे बढ़ाने लगा |मुझे लगा हम छिछले समुद्र में ही पर वो मुझसे बात करते करते कबका गहरे समुद्र में ले जा चुका था |उसने मुझसे बताये बगैर कहा एक बार फिर से कोशिश करेंगे और धीरे –धीरे मैं समुद्र की गहराई में उतर चला |मैं बार –बार अपने आप से कह रहा था |पैनिक नहीं करना है और मुंह से सांस लेनी है |धीरे –धीरे मुझे सब ठीक लगने लगा |जब उनका आधिकारिक कैमरा पर्सन समुद्र की उस गहराई में मेरी फोटो खींचने आया तो मैंने खूब पोज दिए |मैं प्रकृति की विशालता से परिचित हो रहा था |तरह –तरह की मछलियाँ ,कोरल और न जाने क्या –क्या |मैं तो विस्मय से बस सब देखे जा रहा था |वो बार बार इशारे से पूछता सब ठीक और मैं कहता सब ठीक |करीब बीस मिनट के बाद मुंह से सांस लेने के कारण मेरा गला सूख चुका था और लग रहा था जैसे खूब सारा नमक किसी ने भर दिया हो |अब मेरे लिए वहां रहना मुश्किल हो रहा था |मैंने इशारा किया ऊपर चलो |उसने भरसक कोशिश की कि मैं अपनी समस्या पर काबू पाऊं |मैं जान चुका था अब अगर रुके तो काण्ड हो जाएगा |पांच मिनट के बाद हम सतह के ऊपर आ गए |मैंने चारो ओर नजर घुमाई सिर्फ पानी और दूर कोई द्वीप दिख रहा था |

मैंने कहा अरे इतनी दूर निकल आये अब वापस कैसे जायेंगे |मेरे इंस्ट्रक्टर ने कहा आप चिंता न करें आते वक्त जैसे आये थे वैसे लेट जाएँ अपना सर पानी के ऊपर रखें |
खूबसूरत राधानगर बीच 
हम आराम से वापस लौट जायेंगे |मुंह पर धूप बहुत तेज लग रही थी इसलिए अपने सर पर मुझे अपने हाथों की ओट लेनी पड़ी|अब हम वापस लौट रहे थे समुद्र में लेटने का यह बड़ा विचित्र अनुभव था |मुझे बड़े प्यार से घसीटा जा रहा था |समय काटने के लिए मैंने उनसे बात करनी शुरू कर दी |स्कूबा डाइविंग जाते वक्त एक हिदायत जरुर दी जाती है |पानी के अंदर किसी भी चीज को छूना नहीं है |सच बताऊँ इतनी सुन्दर –सुन्दर मछलियाँ जब मेरे  अगल –बगल से गुजर रही थीं तो उन्हें छूने का बहुत मन कर रहा था लेकिन मुझे ध्यान आया हम उनके घर में चले आयें और उनकी अनुमति के बगैर कुछ भी छूना ठीक न होगा |मैंने अपने इंस्ट्रक्टर से पूछा कि पर्यटक तो तरह –तरह के आते होंगे |कुछ लोग इस हिदायत को न मानते होंगे उनके साथ क्या होता है ?

उन्होंने बताया वहां तो उन्हें इशारे से ऐसा न करने के लिए मना किया जाता है लेकिन बाहर निकल कर उन्हें कस के डांट लगाईं जाती है |वैसे ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं |बातें करते -करते हम उस जगह पहुँच चुके थे जहाँ से हमने इस रोमांचक अभियान की शुरुआत की थी |सिलेंडर उतारे गए ,फिन निकाले गए और हम लोग अपनी वैन में बैठकर वापस आये जहाँ एक बार फिर से डिटौल के पानी में खुद भी नहाये और उस ड्रेस को भी धोकर टांग दिया |अपने कपडे पहनकर हमने उस खुबसूरत जगह से विदा ली |
अंखियों के झरोखे से राधानगर बीच 

इस क्रिया कलाप में दोपहर हो चुकी थी लेकिन अभी समुद्र से मन नहीं भरा था अब हम चल पड़े |दुनिया के सबसे खूबसूरत बीच में से एक राधा नगर बीच देखने |दिन के दो बजे  हम राधा नगर बीच के किनारे खड़े थे |समुद्र में घुसने  से पहले मैंने बीच का एक चक्कर लगाया |बीच के किनारे पर्याप्त हरियाली थी पर मैन्ग्रोव के पेड़  यहाँ नहीं थे |मैन्ग्रोव के पेड़ समुद्र और धरती के बीच में उगते हैं |ये ज्यादा ऊँचे नहीं होते पर समुद्र के किनारे एक तरह की प्राकृतिक बाड़ बना देते हैं इसलिए ऐसी जगहों पर नहाया नहीं जा सकता पर यहाँ कुछ ऐसा नहीं था |जहाँ लोगों का हुजूम था मैंने उससे करीब एक किलोमीटर दूर का चक्कर लगाया न कोई शोर न कोई भीड़ और खूब  सारे पेड़|वापस आकर समुद्र में घुस गए |लहरे बहुत तेज थीं |लाईफ गार्ड लोगों को सीटियाँ बजा –बजा कर जरा सा भी आगे जाने पर चेतावानी  देने लगते थे |इस मायने में यहाँ खतरा तो था ही क्योंकि कब लौटती लहरें आपको बहा ले जाएँ इसका अंदाजा किसी को नहीं रहता |मैंने दो घंटे जल क्रीडा का आनंद लिया |चूँकि उस दिन की भाग दौड़ में मुझे खाने का मौका न मिल पाया था इसलिए मैंने बीच के कारेब लगी बाजार में नारियल पानी पीने का निश्चय किया इसका दो कारण था |यहाँ तरह –तरह के नारियल मौजूद थे |मैं हमेशा मलाई वाला नारियल लेता पहले उसके पानी से प्यास बुझाता फिर उसकी मलाई मतलब नारियल की गीली गरी को खा कर भूख मिटा लेता |

वहीं एक महिला फ्रूट सलाद इस दावे के साथ बेच रही थी कि ये एकदम ऑर्गेनिक हैं और अंडमान में उगाये गए हैं |मैंने उससे कुछ अंडमानी केले लिए जो आकार में हमारे केलो के मुकाबले आधे थे और उनके ऊपर कोई काली धारियां नहीं थी और वे गाढे पीले रंग के थे |
स्कूबा डाइविंग ड्रेस 
उस केले के स्वाद वाकई अलग था |मैंने उनसे पूछा कि आप कहाँ की हैं ?वैसे भी अंडमान में कोई भी आपको ऐसा नहीं मिलेगा जिसकी पिछली चार पुश्तें वहीं की हों तो अंडमान में मैं वार्तालाप शुरू करने से पहले पूछ लेता था कि आपके पिता जी कहाँ के हैं ?यहाँ मुझे बहुत से ऐसे लोग मिले जिन्होंने बड़े गर्व से बताया कि वे बांग्लादेशी हैं |असल में साठ के दशक में बहुत से बंगलादेशी शरणार्थियों को यहाँ बसाया गया था और उन्हें सरकार ने पन्द्रह बीघा जमीन भी दी गयी थी |जिसकी कीमत में करोड़ों में है वे यहाँ इनपर खेती करते हैं |बहुत से लोगों ने अपनी जमीने बेच भी दीं हैं जिन पर लोग  रिसॉर्ट बना रहे हैं |वो महिला झारखंड से थीं मतलब उनके पिता जी झारखंड से एक मजदूर के रूप में लाये गए थे फिर वे यहाँ से जा न पाए |उनके पति बीमार रहते थे और घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें यह व्यवसाय करना पड़ा |हालांकि अंडमान और निकोबार शायद देश एकमात्र ऐसा इलाका होगा जहाँ स्वास्थ्य और शिक्षा पूरी तरह मुफ्त है इसलिए लोगों का जीवन कम आय में भी अच्छे तरीके से हो जाता है | उनके बारे में सोचता हुआ बीच पर वापस आया |शाम ढलने को थी सूरज धीरे –धीरे डूब रहा था और वो जगह जो थोड़ी देर पहले लोगों से गुलज़ार थी |धीरे –धीरे खाली हो रही थी | हेवेलॉक में हमारी दूसरी शाम धीरे –धीरे रात हो रही थी |
जारी ............................

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