Monday, May 31, 2021

डिजीटल सेवाओं के लिए सुविधा शुल्क

 


दुनिया को जोड़ने वाला, इंटरनेट। एक क्लिक पर हमारे हर सवाल के तमाम जवाब देने वाला, इंटरनेट। घर बैठे शॉपिंग और फिर घर बैठे ही डिलीवरी करने वाला, इंटरनेट। आम हो या ख़ास सबकी एक जरुरी जरुरत सा बन चुका है इंटरनेट इतनी खूबियों वाले इंटरनेट का फायदा उठाने के लिए एक अदद कम्प्यूटर या मोबाईल के साथ जिस चीज की जरुरत होती है वो है एक सर्च इंजन| सारी दुनिया में आज खोज का पर्याय बन चुकी कम्पनी का नाम है गूगल | गूगल इंटरनेट का प्रवेश द्वार है और खोज-विज्ञापन के बाजार में यह विशालकाय है।शुरुआत में इंटरनेट पर उपलब्ध लगभग हर सेवा मुफ्त में ही मिलती थी फिर धीरे –धीरे इंटरनेट पर उपलब्ध कई सेवाओं की खिड़कियाँ मुफ्त के लिए बंद होने लगीं पर ज्यादातर ये मुफ्त सेवाएँ विशेसीकृत सेवाओं की थी जैसे नौकरी ढूँढना या फिर अपने लिए जीवन साथी की तलाश आदि पर गूगल की सेवाएँ सब मुफ्त ही रहीं |इस बीच गूगल लगातार हमारे जीवन में घुसपैठ बढाता रहा सर्च इंजन से शुरू हुआ सफर ई मेल फोटो वीडियो और न जाने कितनी सेवाओं को जोड़कर हमारे जीवन को आसान करता रहा | यदि उपभोक्ताओं को डिस्काउंट और बहुत कुछ फ्री मिल रहा है तो उन्हें चिंता क्यों करनी चाहिए? इसको समझने के लिए जरूरी है कि 2016 में भारत में एक फोन कम्पनी  ने फॉर जी सेवा शुरू की जिसमें उपभोक्ताओं को करीब एक वर्ष तक इंटरनेट और कॉलिंग की मुफ्त सेवाएं दी गई। परिणाम यह हुआ कि एक समय 15 से ज्यादा टेलीकॉम कंपनियां भारत में सेवाएं दे रही थी, अब महज तीन बची हैं। अब तीनों कंपनियां अपनी दरें बढ़ा रही हैं। बाजार से प्रतिस्पर्धा काफी हद तक खत्म हो गई है।

इंटरनेट के व्यवसाय का ढांचा भी बदल रहा है जो अब सिर्फ विज्ञापन आधारित न होकर सेवाओं के सब्सक्रिप्शन शुल्क के रूप में अपना विस्तार कर रहा है इसी कड़ी में गूगल ने आगामी एक जून से अपनी गूगल फोटो  मुफ्त क्लाउड स्टोरेज सर्विस बंद करने का फैसला किया है । अब गूगल  की ओर से गूगल  फोटो के क्लाउट स्टोरेज के लिए शुल्क वसूला जाएगा। इसका यह मतलब हुआ कि अगर आप गूगल  ड्राइव या फिर किसी अन्य जगह अपनी फोटो और डेटा को पंद्रह जी बी से ज्यादा  स्टोर करते हैं, तो इसके लिए आपको चार्ज देना होगा।  जो उन्हें प्रतिमाह के हिसाब से 1.99 डॉलर (146 रुपये) पड़ेगा । गूगल  की तरफ से इसे गूगल वन  नाम दिया गया है। जिसका वार्षिक सब्सक्रिप्शन शुल्क  19.99 डॉलर (करीब 1464 रुपये) है। इस तरह का शुल्क जी मेल में पहले से ही लागू है जिसमें कोई भी जी मेल उपभोक्ता सिर्फ पंद्रह जी बी तक का मेल स्टोरेज मुफ्त हासिल कर सकता है इससे ज्यादा के लिए उसे शुल्क देना होगा |
यानि भारत में इंटरनेट समय का एक चक्र पूरा कर चुका है और इस इंटरनेट पर कुछ कम्पनियों का एकाधिकार है बीच में चीन की कुछ कम्पनियों ने भारत में पहले से स्थापित गूगल जैसी कम्पनियों को चुनौती देने की शुरुआत जरुर की पर राजनैतिक वजहों से उन कम्पनियों को देश से बाहर जाना पड़ा |दुनिया में दूसरे स्थान पर इंटरनेट उपभोक्ताओं वाला देश ऐसी कोई स्वदेशी कम्पनी विकसित नहीं कर पाया नतीजा गूगल जैसी कम्पनियों का एकाधिकार जो अब हमारे जीवन का अंग बन गयीं हैं | कंपनी मुनाफा बढ़ाने के लिए ऑनलाइन सर्च कारोबार में अपने प्रभुत्व दुरुपयोग कर रही है। गूगल की मूल कंपनी एल्फाबेट इंक है और इसका बाजार मूल्य 1,000 अरब डॉलर से अधिक है। आज गूगल से टक्कर लेना इसलिए भी आसान नहीं है, क्योंकि उसने सर्च के मामले में अपना एकाधिकार बना रखा  है. गूगल ब्यानबे प्रतिशत सर्च को नियंत्रित  करता है, जो कि उसके सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी माइक्रोसॉफ्ट बिंग ढाई प्रतिशत  से बहुत ज्यादा है|फिलहाल गूगल की आय का सबसे बड़ा स्रोत विज्ञापनों से होने वाली आय से आता है जो कि गूगल केवल उपभोक्ताओं को अपने  सर्च इंजन पर  ही नहीं बल्कि यूट्यूब ,जी मेल , क्रोम , एंड्राइड, मैप  और अन्य सभी सेवाओं पर भी ट्रैक करते हैं।गूगल ट्रैकर्स वास्तव में पचहतर प्रतिशत  शीर्ष मिलियन वेबसाइटों पर लगे होते हैं "गूगल एनालिटिक्स"अधिकांश साइटों पर इंस्टॉल किया गया है, जिससे वेबसाइट मालिकों और गूगल को पता चलता है कि उपभोक्ता  कौन सी साइट पर कब और कितने देर के लिए जाता है |जो विज्ञापन आपका हर जगह आपका पीछा करते हैं, उनमें से अधिकांश वास्तव में इन गूगल विज्ञापन नेटवर्क के माध्यम से चलाए जाते हैं। ये विज्ञापन न केवल कष्टप्रद हैं - वे आपको और अधिक चीजें खरीदने के लिए लक्षित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
अपनी सेवाओं के लिए शुल्क लेना या लेना किसी भी कम्पनी का विशेषाधिकार है पर यहाँ स्थिति थोड़ी अलग है उपभोक्ताओं के पास ऐसा कोई सशक्त विकल्प है ही नहीं कि वो इंटरनेट की कुछ सेवाओं के लिए किसी अन्य कम्पनी के बारे में विचार करे |ऐसे में जहाँ हम अपने ही आंकड़ों से कमाए गए मुनाफे से गूगल जैसी कम्पनियों को विशाल बनाने में मदद करते हैं जबकि उस मुनाफे का कोई भी हिस्सा उस उपभोक्ता तक नहीं पहुंचता जिसके कारण मुनाफा कमाया जा रहा है वहीं मुनाफे को अधिकतम करने के लिए अब उन्हीं उपभोक्ताओं से शुल्क भी वसूला जा रहा है |मुनाफा कमाने की ये होड़ कहाँ जाकर रुकेगी इसका फैसला अभी होना बाकी है पर यह सच है कि इंटरनेट का यह दावा कि यह  हमारा समय बचा के हमारे जीवन को आसान बनाता है कहीं से सच नहीं लगता बल्कि यह उस बचे हुए समय को उसी इंटरनेट की अंधी सुरंगों  में बिताने के लिए प्रेरित करता है |
दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 31/05/2021 को प्रकाशित 

Friday, May 21, 2021

जिन्दगी का सुहाना सफ़र

 


कोरोना काल में जब जीवन थमा हुआ है एक वेबसाइट के एक लेख पर नज़र पडी . 
लेख था.नोबेल पुरूस्कार विजेता फ़्रांसीसी लेखक जॉन मेरी गुस्ताव लाक्लेज़ियो के ऊपर.लाक्लेज़ियो यात्रा  लेखक हैं. लेख आगे चलकर दूसरी दिशा में मुड़ जाता है लेकिन मेरा मन मुड़ गया दूसरी ओर मेरे जेहन में अपने बचपन में सुनी गयी वो सारी कहानिया घूमने लगी जो मैंने रजाई में अपने पिताजी के आगोश में दुबक कर या कभी- कभी अलाव के गिर्द बैठकर सूनी थी.कभी सिंदबाद दा सेलर, तो कभी गुलिवर ट्रेवल्स  का कोई घटनाक्रम, कभी हातिमताई कुछ न समझ आये तो ऐसे राजकुमार की कहानी जो रानी की तलाश में जंगल- जंगल घूम रहा है .
गर्मियां की शुरुआत हो चुकी है ठीक दिन होते तो सब यात्राओं में या तो निकल गए होते या निकलने की योजना बना रहे होते. यात्रा हो या सफर हमारे जीवन का कितना अहम् हिस्सा है.भले ही बचपने की ज्यादातर कहानियां सफ़र से जुडी हुई रहती थीं. आज के बच्चे कहानी सुनने की बजाय कार्टून देख कर सोते हों पर ज्यादातर कार्टून उन्हें यात्रा पर ले जाते हैं. यात्राओं के बारे में सोचते हुए राहुल राहुल सांकृत्यायन याद न आयें ऐसा हो सकता है क्या ? ट्रैवेलॉग पढ़ते वक्त हमेशा ऐसा लगता है था कि घुमक्कड़ी के बाद इतना शानदार कैसे लिख लेते हैं लोग .लेकिन अब समझ में आने लगा है कि जब हम यात्राओं  को जीना शुरू कर देते हैं तो यात्रा वृतांत अपने आप जी उठते हैं .कहते है किसी पल को जी भर कर जी लेने के बाद ही डूब कर लिखा जा सकता है मैंने भी आज सफ़र को जीने की कोशिश की .

यात्राएँ हमारे चिंतन को विस्तार देती हैं आप ने वो गाना जरूर सुना होगा " जिन्दगी एक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना" यूँ तो देखा जाए तो जिन्दगी का सफ़र है तो सुहाना लेकिन इसके साथ जुडी हुई है अनिश्चितता  और ऐसा ही होता है जब हम किसी सफ़र पर निकलते हैं .ट्रेन कब लेट हो जाए. बस कब ख़राब हो जाए वगैरह वगैरह मुश्किलें तों हैं. पर क्या मुश्किलों की वजह से हम सफ़र पर निकलना छोड़ देते हैं भाई काम तो करना ही पड़ेगा हर सफ़र हमें नया अनुभव देता है जिस तरह हमारे जीवन का कोई दिन एक जैसा नहीं होता वैसे ही दुनिया का कोई इंसान ये दावा नहीं कर सकता कि उसका रोज का सफ़र एक जैसा होता है. अब सफ़र पर निकले हैं तो किसी न किसी साथी की जरुरत पड़ेगी. जरुरी नहीं आप साथी के साथ ही सफ़र करें साथी सफ़र में भी बन जाते हैं. लेकिन साथी के चयन   मे सावधान रहें. गलत साथी आपके सफ़र को पीडादायक  बना सकते हैं और वैसा ही जिन्दगी के  सफ़र में गलत साथी  आपके लिए समस्याएं  ला सकते हैं .

आगे से जब भी किसी सफ़र पर निकालिएगा तो ये मत भूलियेगा कि ये जिन्दगी का सफ़र है और हर सफ़र की शुरुवात अकेले ही होती है, लेकिन अंत अकेले नहीं होता साथ में कारवां होता है अपनों का अपने अपनों का. यात्राएँ चाहे जीवन की हों या किसी दूर देश की या फिर घर से दफ्तर के बीच की ही क्यों न हो .ऐसी ही यात्राओं से कोई लाक्लेज़ियो नोबेल पुरूस्कार ले जाते हैं ओर कोई अपनी मंजिल पर पहुंचकर मुस्कुरा उठता है.

प्रभात खबर में 21/05/2021 को प्रकाशित 

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Saturday, May 15, 2021

साइबर हमले के बढ़ते खतरे के बीच


अमेरिका में सरकार ने देश की सबसे बड़ी ईंधन पाइपलाइन पर पिछले सप्ताह के अंत में हुए एक साइबर हमले के बाद देश में आपातकाल का एलान कर दिया गया |कोलोनियल पाइपलाइन पर हुए इस हमले से अमेरिका के ईस्ट कोस्ट के राज्यों में डीज़ल, गैस और जेट ईंधन पर संकट पैदा हो गया क्योंकि इस पाईप लाइन से प्रतिदिन 25 लाख बैरल तेल जाता है जो कि इन जगहों की पैंतालीस प्रतिशत तेल आपूर्ति करता है | इस बात की पुष्टि हो गई है कि ये रैन्समवेयर हमला डार्कसाइड नाम के एक साइबर अपराधी गिरोह ने किया था | डार्कसाइट साइबर अपराध की दुनिया में बहुत चर्चित नाम नहीं है मगर इस घटना से पता चलता है कि रैन्समवेयर जैसे हमले केवल किसी पेशे या दफ़्तर को ही नहीं, किसी देश के महतवपूर्ण औद्योगिक ढाँचे के लिए भी ख़तरा बन सकते हैं| लंदन की साइबर सिक्योरिटी कंपनी डिजिटल शैडोज़ के अनुसार डार्कसाइड एक व्यसायिक कंपनी की तरह काम करता है. जो चोरी और हैकिंग के लिए सॉफ़्टवेयर बनाता है| उसके बाद इस अपराध में शामिल होनेवाले सहयोगियों को प्रशिक्षण देता है, और सिखाता है कि हमला कैसे किया जाए|भले ही यह हमला अमेरिका पर हुआ पर इस तेजी से डिजीटल होती दुनिया में भारत भी इस खतरे से अछूता नहीं है क्योंकि देश में जितनी डिजीटली करण का काम हो रहा है उतनी तेजी से साइबर सुरक्षा पर ध्यान न दिया जा रहा है |बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब चीन के हैकर्स (इंटरनेट को भेदने वाले ) ने भारत में वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) और भारत बायोटेक पर साइबर अटैक करने की कोशिश की थी| अक्तूबर 2020 में मुंबई एक बड़े हिस्से की पावर ग्रिड फेल हो गई थी और मुम्बई में अंधेरा छा गया। अमेरिका की मैसाचुसेट्स स्थित साइबर सिक्योरिटी कंपनी रिकॉर्डेड फ्यूचर ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चाइनीज सरकार समर्थित हैकर्स के एक ग्रुप ने मैलवेयर के जरिए मुंबई में पावर ग्रिड को निशाना बनाया था। ।हालंकि केन्द्रीय सरकार ने इस तरह के साइबर हमले को नहीं माना था | 
 अमेरिकी कंपनी आईबीएम (IBM) की साइबर हमलों की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2020 में भारत एक तरफ कोरोना महामारी से लड़ रहा था, तो उसे दूसरी तरफ साइबर हमलों से पूरे एशिया-प्रशांत इलाके में भारत को जापान के बाद सबसे ज्यादा साइबर हमले झेलने पड़े| महतवपूर्ण है कि सबसे ज्यादा साइबर हमले बैंकिंग और बीमा क्षेत्र से जुडी हुई कंपनियों पर हुए| 2020 में एशिया में हुए कुल साइबर हमलों में से सात प्रतिशत भारतीय कंपनियों पर हुए | साइबर हमले कई तरह से हो सकते है जैसे वेबसाइट डिफेंसिंग इसमें किसी सरकारी वेबसाइट को हैक कर उसकी द्रश्य दिखावट को बदल दिया जाता है।जिससे यह पता चलता है कि अमुक वेबसाईट साइबर हमले का शिकार हुई है |दूसरा तरीका है फिशिंग या स्पीयर फिशिंग अटैक जिसमे हैकर ईमेल या मैसेज के जरिए लिंक भेजता है , जिस पर क्लिक करते ही कंप्यूटर या वेबसाईट का सारा डाटा लीक हो जाता है।इसके अलावा बैकडोर अटैक भी एक तरीका है जिसमें कम्प्यूटर में एक मालवेयर भेजा जाता है, जिससे उपभोक्ता की सारी सूचनाएं मिल सके। देश को साइबर हमलों से बचाने के लिए भारत में दो सस्थाएं हैं। एक है सी ई आर टी जिसे कंप्यूटर इमरजेंसी रेस्पॉन्स टीम के नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना साल 2004 में हुई थी। दूसरी संस्था का नाम नेशनल क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर है | जो रक्षा ,दूरसंचार,परिवहन ,बैंकिंग आदि क्षेत्रों की साइबर सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है | 
ये 2014 से भारत में काम कर रही है। भारत में अभी तक साइबर हमलों के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। साइबर हमलों के मामले में फिलहाल आईटी एक्ट के तहत ही कार्रवाई होती है जिसमें वेबसाइट ब्लॉक तक करने तक के प्रावधान हैं लेकिन न तो प्रावधान प्रभावी हैं और न ही पर्याप्त । केंद्रीय शिक्षा, संचार तथा इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार देश में जनवरी से मार्च, 2020 के बीच देश में 1,13,334, अप्रैल से जून के बीच 2,30,223 और जुलाई से अगस्त से बीच 3,53,381 साइबर हमले हुए हैं।वहीं साल 2017-18 में साइबर अटैक से निपटने के लिए 86.48 करोड़ दिए गए जिनमें से 78.62 करोड़ रुपये खर्च किए गए। साल 2018-19 में 141.33 करोड़ रुपये जारी किये गए हुए, जबकि खर्च 137.38 करोड़ रुपये ही हुए। साल 2019-20 में साइबर फंड के नाम पर 135.75 करोड़ रुपये दिए गए हैं जिनमें से मात्र 122.04 करोड़ रुपये ही खर्च हुए हैं।कंप्यूटर की दुनिया ऐसी है जिसमें अनेक प्रॉक्सी सर्वर होते हैं और दुनिया भर में फैले इंटरनेट के जाल पर दुनिया की कोई सरकार हमेशा नजर नहीं रख सकती ऐसे में जागरूकता के साथ बचाव की रणनीति ही देश को इन साइबर हमलों से बचा सकती है |
अमर उजाला में 15/05/2021 को प्रकाशित 

Saturday, April 17, 2021

समयानुकूल बने कम्प्यूटर शिक्षा

 

नब्बे के दशक में स्कूली शिक्षा में पुस्तक कला जैसे विषयों को हटाकर कंप्यूटर शिक्षा को स्कूली शिक्षा का अंग बनाया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि दो हजार के शुरुआती दशक में ही भारतीय परचम इस क्षेत्र में लहराने लगा जिससे कई सारी मध्यम वर्गीय सफलता की कहानी बनी जैसे की इन्फ़ोसिस और अन्य स्वदेशी  कम्पनियां जिन्होंने लाखों युवाओं को इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया पर यह सफलता की कहानियां लम्बे समय तक जारी नहीं रह सकीं  |भारत की एप इकोनोमी बहुत तेजी से बढ़ रही है जबकि चीन राजस्व और उपभोग के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ  हैवहीं अमेरिकन कम्पनियां एप निर्माण के मामले में  शायद सबसे ज्यादा इनोवेटिव (नवोन्मेषी ) हैं |भारत सबसे ज्यादा प्रति माह  एप इंस्टाल करने और उसका प्रयोग करने के मामले  में अव्वल है |भारतीय एप परिद्रश्य का नेतृत्व टेलीकॉम दिग्गज एयरटेल और जिओ  करते हैं यद्यपि स्ट्रीमिंग कम्पनियाँ जैसे नोवी डिजिटल और जिओ सावन और पेटी एम् ,फोन पे और फ्लिप्कार्ट जैसी  ई कोमर्स साईट्स ने अपने आप को वैश्विक परिद्रश्य पर भी स्थापित किया है |फोर्टी टू मैटर्स डॉट कॉम साईट्स के मुताबिक़ गूगल प्ले स्टोर पर  कुल 882,939 एप पब्लिशर्स में से 24359 भारतीय एप पब्लिशर्स हैं |कुछ बड़े भारतीय एप पब्लिशर्स में गेमेशन टेक्नोलॉजी,वर्ड्स मोबाईल,मूटोन,मिलीयन गेम्स ,एआई फैक्ट्री जैसे नाम शामिल हैं | गूगल प्ले स्टोर्स में उपलब्ध सभी एप पब्लिशर्स  में से मात्र तीन प्रतिशत एप पब्लिशर्स ही भारतीय हैं |वहीं गूगल प्ले स्टोर पर कुल एप्स की संख्या 2,942,574है जिसमें भारतीय एप की संख्या 121,834 है  जो प्ले स्टोर पर कुल उपलब्ध एप्स का मात्र चार प्रतिशत है |आंकड़ों के  नजरिये से देश में  उपभोक्ताओं की उपलब्धता के हिसाब से भारतीय एप की संख्या बहुत ही कम है |वैश्विक परिद्रश्य में आंकड़ों के विश्लेषण से कई रोचक तथ्य सामने आते हैं जैसे प्ले स्टोर्स पर उपलब्ध कुल भारतीय एप पब्लिशर्स की औसत रेटिंग पांच में से  3.65 है जो प्ले स्टोर पर सभी पब्लिशर्स की औसत रेटिंग 3.22 से बेहतर है |उसी तरह प्ले स्टोर पर भारतीय एप की औसत रेटिंग 1874 है जबकि प्ले स्टोर पर उपलब्ध सभी एप की औसत रेटिंग 1,112 से ज्यादा है|आंकड़ों की दुनिया से दूर कुछ धरातल की बात क्यों भारतीय एप वैश्विक स्तर पर सफल नहीं है |

भारत में  सूचना प्रौद्योगिकी  का बाजार एक सौ पचास बिलियन डॉलर का है जो भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 9.5 प्रतिशत है और पूरी दुनिया में 3.7 मिलीयन लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा  है |अर्थव्यवस्था को इतना महतवपूर्ण योगदान देने वाला क्षेत्र आज उत्पादकता के लिहाज से इसलिए पिछड़ रहा है क्योंकि भारत की कंप्यूटर शिक्षा में नवोन्मेष की भारी कमी है और यह बाजार की मांग के हिसाब से खासी पिछड़ी हुई है तकनीक पर बढ़ती इस   निर्भरता को अनवरत और लाभ उठाने वाला तभी बनाया जा सकता है जबकि सूचना प्रौद्योगिकी  शिक्षा का अभ्यास कॉलेज और स्कूली स्तर पर ज्यादा अद्यतन तरीके से कराया जाए स्कूल स्तर  पर कंप्यूटर शिक्षा पर दो तरह की समस्याओं का शिकार हैपहला स्कूलों में अभी भी फोकस एम् एस वर्ड,एक्सेल,पावर प्वाईंट आदि पर है |दूसरा कंप्यूटर की प्राथमिक भाषाओँ को सिखाने में सारा जोर बेसिक” और लोगो” जैसी भाषाओं पर ही है |एक समय की अग्रणी कंप्यूटर भाषाएँ जैसे सीलोगो ,पास्कल ,कोबोल बेसिक ,जावा जो की अब चलन से बाहर हो चुकी हैं अभी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं जबकि कंप्यूटर प्रौद्योगिकी में अग्रणी देश ओपेन सोर्स सोफ्टवेयर और ओपन सोर्स लेंग्वेज को अपना चुके हैं जैसे कि  आर , पायथॉन,   रूबी  ऑन  रेललिस्प , टाइप स्क्रिप्ट , कोटलिन , स्विफ्ट और रस्ट इत्यादि |यह भाषाएँ  सीलोगो ,पास्कल ,कोबोल बेसिक ,जावा के मुकाबले ज्यादा संक्षिप्त,सहज और समझने में आसान हैं |इन भाषाओँ के प्रयोग से किसी भी काम को कल्पना से व्यवहार में बड़ी आसानी से लाया जा सकता है |उल्लेखनीय है की यह भाषाएँ ही हैं जिनसे एक कोड का निर्माण कर किसी भी काम को करने के लिए सोफ्टवेयर का निर्माण किया जाता है |महत्वपूर्ण है कि ये भाषाएँ उन क्षेत्रों में भी ज्यादा काम की हैं जो आजकल बहुत मांग में है जैसे कि आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस”, रोबोटिक्स आदि|

भविष्य की दुनिया तकनीक और ऑटोमेशन की है जहाँ सभी प्रकार के उद्योग धंधे और व्यवसाय सॉफ्टवेयर आधारित होंगे आज हर उद्योग  किसी न किसी रूप में सूचना प्रौद्योगिकी की सहायता से चल रहा है  वो चाहे निर्माण,परिचालन ,भर्ती हो या लेखा सभी कम्प्युटरीकृत होते जा रहे हैं  और उपभोक्ता भी पहले के मुकाबले आज निर्णय और खरीदने की प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है |अब कंप्यूटर कौशल और उसकी भाषाएँ आधारभूत जरूरतें हैं कंप्यूटर की उच्च शिक्षा का और भी बुरा हाल है |शिक्षण संस्थान प्रायोगिक कार्य और वास्तविक कोड निर्माण नहीं करवा पा रहे हैं इसलिए जब कोई कम्प्यूटर स्नातक किसी नौकरी में आता है तो वह अपनी कम्पनी में  इन कार्यों को  सीखता है जिससे कम्पनी पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और बहुत समय नष्ट होता है |

 साल 2011 में आयी नासकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के  मात्र 25 प्रतिशत आई टी इंजीनियर  स्नातक ही रोजगार के लायक थे पर छ साल बाद स्थिति और खराब हुई है अस्पाएरिंग माईंड स्टडी की एक रिपोर्ट स्थिति की गंभीरता की ओर इशारा करती है ,रिपोर्ट के अनुसार भारत के पांच  प्रतिशत कंप्यूटर इंजीनियर ही  उच्च स्तर की प्रोग्रामिंग के लिए उपयुक्त  हैं |यह रिपोर्ट उस समय आयी है जब ग्राहकों की मांग लगातार बढ़ रही है |तेजी से डिजीटल होते भारत में जब रोजगार के नए क्षेत्र तेजी से ऑनलाईन दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं जिनमें कपडे प्रेस करने से लेकर टूटे नल को ठीक करने वाले प्लंबर जैसे काम भी  शामिल हैं  ये बताते हैं कि इस क्षेत्र में काम के अवसर और तेजी से बढ़ते रहेंगे |नई-नई  तकनीक और तकनीकी नवोन्मेष को भारतीय कौशल की विचार शक्ति में लाने के लिए ज्यादा मुक्त और उन्नत कंप्यूटर शिक्षा की तरफ बढना ही एकमात्र समाधान है अन्यथा एक वक्त में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अगुआ बनकर उभरे भारत के लिए प्रतिस्पर्धा के बाजार में टिकना सम्भव नहीं होगा |

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 17/04/2021 को प्रकाशित 

Friday, April 2, 2021

सिक्किम यात्रा :अंतिम भाग

पीलिंग की अगली सुबह कंचनजंघा पर्वतमाला में सूर्योदय के साथ शुरू हुई |सिर्फ चिड़ियों की चहचाहट और कोई मशीनी शोर नहीं ऐसी सुबह का आनन्द दशकों बाद उठाया था |गर्म पानी से नहाने के बाद एक बार फिर स्थानीय पर्यटन शुरू जो होना था |गाडी में कुछ दूर चलते ही पता लगा सडक पर जाम लगा पीछे गाड़ियों का काफिला बढ़ता ही गया पता चला आगे सडक पर बनाने का काम चल रहा है पर मजाल है किसी गाडी में हॉर्न की आवाज सुनाई पडी हो लगभग आधे घंटे के बाद सडक थोड़ी देर के लिए खोली गयी और हमारी गाडी उस जाम में से निकल गयी |
अगला पड़ाव था रिम्बी फाल या रिम्बी जलप्रपात वैसे सच बताऊँ तो सिक्किम झरनों का प्रदेश है आप सडक से कहीं की भी थोड़ी दूरी की यात्रा कीजिये आपको किसी न किसी पहाड़ से कोई झरना गिरता जरुर दिखेगा हाँ ये जरुर हो सकता है कि आकार में जो झरने के मानक हैं वो उस पर खरा न उतरे पर पानी पहाड़ों से गिरता आपको यत्र –तत्र दिख ही जाएगा तो रिम्बी झरना बस आकार में थोडा बड़ा है इसलिए वह एक पर्यटक स्थल बन गया है पर यहाँ के पर्यटक स्थल पर आपको स्थानीय लोग नहीं दिखेंगे और न ही भीड़ भाड़ रहती है गंदगी का नामों निशाँ नहीं है हाँ और जो गंदगी दिखेगी वो बाहर से आये पर्यटकों का छोड़ा हुआ सामान होगा |मतलब आम सिक्किम का निवासी पर्यवरण के प्रति खासा जागरूक है |रिम्बी फाल्स में ऐसा कुछ नहीं था जो अनोखा हो एक झरना जो काफी उंचाई से गिर रहा था पूरा का पूरा वातावरण प्रक्रतिक था और कोई भी मानवीय ढाँचे का निर्माण वहां नहीं किया गया था |यहीं रास्ते में दरप गाँव पड़ता है जहाँ बड़ी ईलायची की खेती होती है और कई सारे होम स्टे हैं जहाँ आप घर के वातावरण में रहकर पीलिंग की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं और ये होटल के मुकाबले सस्ते पड़ते हैं पर होटल की लक्जरी आपको नहीं मिलेगी जो कुछ मिलेगा वो सब प्राकृतिक होगा | अब बारी थी सिक्किम का एक बाग़ देखने की थी यूँ तो बाग़ में देखने कुछ होता नहीं पर यह सिक्किम का एक संतरे का बाग़ था |घुमावदार सीढीयों में तरह -तरह के पेड़ पौधे और उनके पीछे एक पहाडी नदी कल कल बह रही थी |संतरे का मौसम न होने के कारण हमें संतरे के छोटे -छोटे कच्चे फलों को देखकर दिल को खुश करना पड़ा जो भी हो पार्क था बहुत लुभावना |
सिक्किम का संतरे का बाग़ 
इसके और आगे एक प्रमुख झील का भी दर्शन करना था जो पहाड़ों की तलहटी में स्थित है जिसका नाम खेतोपलारी झील था |इस झील के पहुँचने का रास्ता बहुत संकरा और वीरान है अगर गाड़ियों की आवा जाही न हो तो यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि यहाँ बौद्ध धर्म से संबंधित इतना महतवपूर्ण केंद्र होगा जो हिन्दुओं  द्वारा भी पूजनीय है ऐसा माना जाता है कि यहाँ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं |यह झील करीब पैंतीस सौ साल पुरानी है जहाँ कुछ बौद्ध मठ हैं जहाँ पूजा हो रही थी |
खेतोपलारी झील
प्राकृतिक तौर पर यह इलाका पर्याप्त जैव विविधता लिए हुए था रास्तों और पहाड़ों पर जमी हुई काई बता रही थी कि यहाँ बारिश का पानी सूखने नहीं पाता कारण चारों तरफ ऊँचे ऊँचे पेड़ों का होना जो सूर्य की किरणों को धरती पर आने से रोक लेते हैं इसीलिये झील से मुख्य मार्ग का रास्ता जो करीब एक किलोमीटर का था ठंडा और फिसलन भरा था जबकि बाहर सूर्य अपनी तेजी के साथ विराजमान था |दोपहर के बारह चुके थे अब हमें पीलिंग वापस लौटना था और वहां से दार्जिलिंग के लिए प्रस्थान करना था |
करीब एक घंटे के बाद हम दार्जिलिंग के रास्ते में थे पीलिंग से दार्जिलिंग तक की दूरी करीब चार घंटे में पूरी होनी थी इस यात्रा के शुरू होने से पूर्व ही दार्जिलिंग में तनाव शुरू हो गया था

और हम निश्चिन्त नहीं थे कि हम दार्जिलिंग पहुँच पायेंगे भी या नहीं खैर उस दिन हमें बताया गया कि दार्जिलिंग में सब ठीक थे और आप दार्जिलिंग जा सकते हैं |वैसे एक बात बताऊँ जिन्दगी में घूमने का सिलसिला बड़ी देर से शुरू हुआ पर जब से मैंने होश सम्हाला अगर कहीं जाने का मन होता था तो वह दार्जीलिंग ही था शायद इसके लिए वे हिन्दी फ़िल्में जिम्मेदार थी जो उन दिनों दूरदर्शन पर दिखाई जाती थीं तो मन बल्लियों उछल रहा था कि आखिरकार मेरे जीवन की यह अधूरी इच्छा भी पूरी होने वाली है |सिक्किम पश्चिम बंगाल द्वारा प्रशासित स्वायत्तशासी क्षेत्र है जो सिक्किम से एक दम सटा हुआ है और इस क्षेत्र के अधिकतर निवासी नेपाली मूल के हैं जोअपने लिए अलग राज्य गोरखा लैंड की मांग लम्बे समय से कर रहे हैं |सिक्किम राज्य तक को सडक बहुत अच्छी है पर जहाँ से सिक्किम खत्म होता है और पश्चिम बंगाल की सीमा शुरू होती है रास्ता वहीं से खराब होना शुरू हुआ और जिसका चरम था दार्जिलिंग से पहले के पंद्रह किलोमीटर का रास्ता उस पहाडी रास्ते में आपको सडक खोजनी पड़ेगी |
दार्जिलिंग पीस पगोड़ा
थोड़ी देर समतल इलाके में चलने के बाद एक बार फिर हमारी गाडी पहाडी पर चढ़ने लगी |आस-पास के चाय बागान बता रहे थे हम दार्जिलिंग आ चुके थे पर शहर अभी थोड़ी दूरी पर था |
यार्ड में खड़ी टॉय ट्रेन 
शहर में घुसने पर दार्जिलिंग को लेकर जो मेरे सपने थे वो धीरे धीरे ध्वस्त होने शुरू हुए |काफी गन्दा शहर लोगों और गाड़ियों से भरा हुआ जैसे गर्मियों में शिमला और मंसूरी का हाल होता है लेकिन शहर में तनाव साफ़ महसूस किया जा सकता था जगह –जगह सेना और पुलिस की मौजूदगी यह बता रही थी कि सब ठीक नहीं है |हमारा ड्राइवर जिसका नाम मैं भूल चुका हूँ दार्जिलिंग की समस्या के बारे में बता रहा था और अभी जो आग भड़की है उसके पीछे ममता बनर्जी सरकार का बंगाली भाषा को अनिवार्य बनाने का तुगलकी फैसला था पर इसी के साथ अलग राज्य की मांग भी जोर पकड़ गयी जिससे हिंसा होने लग गयी |सच बताऊँ तो दार्जिलिंग को देखकर यह अहसास हुआ कि मैं यहाँ दोबारा नहीं आना चाहूँगा |अतिक्रमण और अनाधिकृत निर्माण ने पहाड़ों को बर्बाद कर दिया है हर जगह पर्यटकों की भीड़ और गंदगी |शाम हो चुकी थी इसलिए अब आराम का वक्त था वैसे भी सुबह साढ़े तीन बजे उठकर टाइगर हिल पर सूर्योदय देखने जाने का कार्यक्रम था हालंकि मेरी इसमें कोई रूचि नहीं थी पर एक बार फिर जनमत के फैसले के आगे झुकना पड़ा |
टाइगर हिल से सूर्योदय 
सुबह साढ़े तीन बजे दार्जिलिंग में ठीक ठाक ठण्ड थी हम टाइगर हिल जाने के लिए निकल पड़े |गाड़ियों और लोगों का हुजूम धीरे –धीरे बढ़ता गया उस जगह जहाँ से सूर्योदय का नजारा किया जाना था सुबह के चार बजे एक छोटा मोटा बाजार लगा था जहाँ ऊनी कपडे बिक रहे थे और हैरत की बात है लोग खरीद भी रहे थे |कुछ युवतियां थर्मस में कॉफ़ी बेच रही थी मैंने एक कोट डाल रखा था पर ठण्ड से बचने के लिए कॉफ़ी एक अच्छा विकल्प था बीस रुपये में एक छोटे से कागज के कप में कॉफ़ी मिली जो मीठी ज्यादा थी |आसमान का माहौल देखकर मैंने अंदाजा लगा लिया आज सूरज नहीं दिखेगा क्योंकि आसमान में बादल थे तो कंचनजंघा की चोटियों में से आज सूरज के दर्शन न हो पायेंगे इसलिए मैं वहां से पहले ही खिसक लिया और मेरा यह निर्णय सही साबित हुआ क्योंकि उस दिन सूरज नहीं निकला  और हम सूर्योदय के बाद गाड़ियों की होने वाली भागम भाग और जाम से बचकर पहले निकल गए |लौटते वक्त बतासिया लूप मेमोरियल पार्क का भ्रमण किया गया |
बतासिया वार मेमोरियल :फोटो साभार गूगल 
बतासिया लूप दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का एक स्टेशन है जहाँ एक वार मेमोरियल भी बनाया गया है जहाँ गोरखा रेजीमेंट के  उन सारे जवानों के नाम अंकित  है जो 1987 के बाद वीरगति को प्राप्त हुए |बतासिया लूप एक ऐसा स्टेशन है जहाँ रेलवे की पटरियां अंगरेजी का आठ बनाती हैं |अब कुछ बातें दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के बारे में दार्जिलिंग को विकसित करने का श्रेय अंग्रेजों  को जाता है यहाँ 1881 से नेरो गेज की ट्रेन अभी भी चलती है जिसे यूनेस्को की तरफ से वर्ल्ड हेरीटेज का दर्जा मिला है यह दो तरह के रास्ते पर चलती है पहला दार्जिलिंग से घूम स्टेशन जिसका आनंद जयादातर पर्यटक उठाते हैं इसे टॉय ट्रेन के नाम से जाना जाता है पर इसका किराया बहुत मंहगा है और दूसरा दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी जिसमें यह ट्रेन सत्तर किलोमीटर का रास्ता यह ट्रेन करीब आठ घंटे में पूरा करती है |

सडक से सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग का रास्ता बहुत अच्छा होने के कारण यह दूरी अब तीन घंटे में सिमट गयी है इसलिए लोग अब ट्रेन को प्राथमिकता नहीं देते ऐसे पर्यटक जिनके पास समय है और प्रकृति से प्यार वही अब इस ट्रेन से दार्जिलिंग तक का सफ़र तय करते हैं वैसे लम्बे समय तक यह टॉय ट्रेन मुम्बईया फिल्मों का हिस्सा रही है |आराधना फिल्म का वह मशहूर गाना “मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू” कौन भूल सकता है जो इसी ट्रेन पर शूट हुआ है |हम इस ट्रेन को चलता हुआ न देख पाए क्योंकि दार्जिलिंग में तनाव के कारण यह ट्रेन बंद थी हां यार्ड में जाकर जरुर इस ट्रेन को निहारा जो पिछले सौ सालों से भी ज्यादा दार्जिलिंग के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बनी हुई है |
पटरियों पर सजा बाजार 
ट्रेन के मुख्य ट्रैक पर यहाँ मेक शिफ्ट अरेंजमेंट वाली कई दुकानें भी हैं जो ट्रेन के आने पर बंद हो जाती हैं और जाने के बाद फिर खुल जाती हैं |बतासिया लूप पर सस्ते उनी कपडे आप खरीद सकते हैं |
होटल लौट कर थोडा सुस्ताने के बाद हम जापान सरकार द्वारा निर्मित पीस पेगोडा देखने गये तब तक बादल पूरे दार्जिलिंग को अपने जद में ले चुके थे और ऐसे मौसम में किसी पेगोडा को देखना उसकी सार्थकता सिद्ध कर रहा था शान्ति निस्तब्धता और प्रकृति का साथ |हम उसकी खूबसूरती में खोये ही थे तभी मेरी तन्द्रा को एक बुरी खबर ने तोडा शहर में हड़ताल हो गयी हम लोगों को तुरंत होटल लौटना होगा |लौटते वक्त वो दार्जिलिंग जो भीड़ और गाड़ियों से भरा था एकदम खाली हो गया हम जल्दी से होटल पहुंचे |बंद इतना जबरदस्त था कि हमारे होटल भी ताला पड़ा हुआ था हम लोगों के पहुँचने पर गेट खुला और फिर ताला बंद हो गया |अब दार्जिलिंग घूमने का सारा कार्यक्रम मुल्तवी होकर इस पर केन्द्रित था कि सुरक्षित वापस बागडोगरा कैसे पहुंचा जाए जहाँ से हमारी उड़ान अगले दिन थी पूरी दोपहर टैक्सी के जुगाड़ में बीत गयी करते –करते शाम को पांच बजे हम लोग दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी के लिए निकले और रात आठ बजे सिलीगुड़ी पहुँच गये |एक यात्रा अपने अंत की तरफ थी पर जिन्दगी की यात्रा और भटकन अभी भी जारी है किसी नए पड़ाव के इन्तजार में |
सिक्किम पर प्रख्यात निर्देशक सत्यजीत रे द्वारा बनाया गया वृत्तचित्र देखना चाहें तो यहाँ क्लिक करें |

 समाप्त 
भारतीय रेल के अप्रैल 2021 के अंक में प्रकाशित 


Thursday, April 1, 2021

सिक्किम यात्रा :पांचवां भाग

विदा गंगटोंक
अब गंगटोक से स्थायी रूप से विदा लेने की बारी थी सामान समेट कर गाड़ियों में भरा गया अब अगला ठिकाना पीलिंग था जहाँ हमें एक रात बितानी थी और पीलिंग घूमते हुए अगली शाम को ग्रेजिंग होते हुए दार्जिलिंग के लिए निकल जाना था |पीलिंग गंगटोंक से ज्यादा उंचाई पर है |पीलिंग की उंचाई 2,150 मीटर है और गंगटोंक से लगभग एक सौ तेरह किलोमीटर दूर है जहाँ पहुँचने में लगभग पांच घंटे लगने की उम्मीद थी |पीलिंग अपनी आबोहवा और सुन्दर दृश्यों के लिए मशहूर है |सुबह सात बजे के करीब हमने अपना होटल छोड़ दिया |

धीरे –धीरे गंगटोंक पीछे छूट गया और अब हम थे और हरे भरे पहाड़ आधा रास्ता वही था जिन रास्तों में हम पिछले दो दिन से आ जा रहे थे पर उसके बाद सब कुछ बदल जाने वाला था |रास्ता लम्बा था इसलिए मेरी नजर पर सडक पर चल रही गतिविधियों पर थी |हम लगभग जंगल में चल रहे थे पर बीच-बीच  में अपनी एक मोटरसाइकिल के साथ पुलिस कभी कभार दिख जाती थी इसमें ख़ास बात यह थी कि इनमें ज्यादातर महिलाएं थी जो उस वीराने में बगैर किसी भय के अपनी ड्यूटी बजा रही थी न बैठने के लिए कुर्सी न आस –पास कोई आबादी पर वो मुस्तैद थीं |मैंने कहीं पढ़ा था हमें वैसी पुलिस मिलती है जैसा हमारा समाज होता है सच है सिक्किम का समाज डरा हुआ नहीं था और नियम को मानने वाला भी |उत्तर भारत में दिन के समय भी कोई जगह लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है पर यहाँ कोई समस्या नहीं है |
बुद्ध की एक सौ तीस फीट ऊँची मूर्ति 

स्कूल जल्दी ही बंद होने वाले थे यहाँ गर्मियों की छुट्टियाँ बारिश में शुरू होती हैं इस वक्त परीक्षा का मौसम चल रहा था रास्ते में दो तीन के झुण्ड में लड़के लड़कियां अपना प्रश्न पत्र और क्लिप बोर्ड लिए आते जाते दिख रहे थे |इस वीराने में जहाँ गाड़ियाँ भी ज्यादा नहीं चल रही थी वो आराम से हँसते खेलते हुए अपनी मंजिल की तरफ बढे जा रहे थे |रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में आबादी ज्यादा नहीं थी पर एक चीज जो मुझे बार –बार मोहित कर रही थी यहाँ की लड़कियों के चेहरे पर छाई मुस्कान, इतनी अलहड़ और उन्मुक्त मुस्कान जिस पर मोहित हुए बगैर  नहीं रहा जा सकता |उनके पहनावे से यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ लड़कियों के पहनावे से उनके चरित्र की पहचान नहीं होती है हम नेशनल हाइवे से गुजर रहे थे और रास्ते में पड़ने वाली दुकानों में ज्यादातर लड़कियां ही थीं जो शॉर्ट्स और टी शर्ट में बड़े आराम से अपनी दुकान के सामने  बैठी थी या ग्राहकों को सामान बेच रही थी बगैर किसी हिचक के पूरे आत्मविश्वास के |
सूना पेट्रोल पम्प और पीछे कंचनजंघा की चोटियाँ 
यह मामला बता रहा है सिक्किम का समाज लैंगिक समानता के मामले में उत्तर भारत के अन्य राज्यों से कहीं आगे है |हम सिंगतम पार कर रहे थे यहाँ के पहाडी रास्तों की एक ख़ास बात मुझे समझ आयी कि क्यों यहाँ छोटी गाड़ियाँ भी बहुतायत से चलती हैं वो यह था कि आम तौर पर पहाड़ों पर एक तरफ पहाड़ होता है और दूसरी तरफ गहरी खाई जिसमें दुर्घटना होने पर गाडी कई फीट नीचे खाई में गिरती है अगर गाडी छोटी होती है तो जान जाने या चोटिल होने की आशंका रहती है पर सिक्किम के पहाड़ और यहाँ के रास्ते इस मायने में उत्तर भारत के पहाड़ों से अलग हैं यहाँ जिस तरफ खाई है उस तरफ भी बहुत पेड़ पौधे हैं जिससे गाड़ियों के नीचे गिरने का खतरा कम रहता है और अगर गिरी भी तो वो ज्यादा नीचे नहीं जा पाएंगी क्योंकि पहाड़ पर दूसरी तरफ भी बहुत से पेड़ हैं जिनमें साल और बांस की बहुतायत है |

पहाड़ पूरी  तरह से यहाँ संजोये गए हैं और विकास का वह रोग अभी यहाँ नहीं पहुंचा है |सिक्किम में सीढ़ीदार खेतों में खेती होती है जिनमें बड़ी इलायची और संतरा प्रमुख हैं |खेतों में यूरिया का इस्तेमाल नहीं होता और सरकार भी ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देती है इसलिए यहाँ आपको खाने के लिए जो कुछ मिलेगा वह शुद्ध ही मिलेगा |प्रदुषण न होने से शुद्धता का स्तर कई गुना बढ़ जाता है |रास्ते में हमारे ड्राइवर ने बताया कि  रवानगला कस्बे में एक बुद्ध पार्क पड़ता है|बस  उसको देखने की इच्छा बलवती हो उठी गाडी घुमवाई गयी |एक सौ तीस फुट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा दूर से ही दिखती है |
पीलिंग की वो सुहानी शाम 
बादलों की आवा जाही के बीच जब हम उस पार्क में पहुंचे तो बुद्ध प्रतिमा बादलों की छाँव में थी और हल्की बूंदा बांदी हो रही थी पर धीरे धीरे बादल चले गए और सूरज चमकने लग गया यह भी जल्दी बना पार्क है जिसका उदघाटन 2013 में बौद्ध गुरु दलाई लामा ने किया |मूर्ति के अन्दर पुजाग्रह है और इसके अंदर चलते चलते मूर्ति के सर तक पहुँच सकते हैं |जहाँ महात्मा बुद्ध के जीवन के कहानी को विशाल चित्रों में उकेरा गया है |शान्ति और शानदार मौसम यहाँ आप तन और मन से उस परालौकिक शक्ति से एकाकार हो सकते हैं |कई लोग वहां ध्यान कर रहे थे कुछ सो भी रहे थे ऐसा मुझे लगा हो सकता है वो ध्यान ही कर रहे हों पर हमारे पास इतना समय नहीं था इसलिए जल्दी ही हमने उस पार्क से विदा ली |करीब दिन के दो बजे हम पीलिंग के अपने होटल में पहुँच गए |पहली नजर में पीलिंग ने मुझे कुछ ख़ास आकर्षित नहीं किया हो सकता हो ये सफर की थकान हो या कुछ और उस वक्त धूप भी थी हमने फटाफट अपने कमरे में कब्ज़ा जमाया और एक चाय पी| यहाँ चाय के पाउच और बिजली की केतली हर होटल के कमरे में मिलेगी तो आपको बस पानी गर्म करना है और चाय कॉफ़ी जो पीना चाहें पीयें |कुछ देर सुस्ताने के बाद मैंने आस पास नजर डालने के लिए कमरे की खिड़की खोली थी तो देशी भाषा में अलबला गये इतने सुंदर द्रश्य की कल्पना नहीं की थी 

मेरे कमरे से बाहर का नजारा 
मेरे  पीछे हिमालय और आगे कंचनजंगा की चोटियाँ थी |मैंने सोचा जरा नहा कर सफर की थकान उतारी जाए पर पानी इतना ठंडा था कि हिम्मत जवाब सी देती दिखी लेकिन मैंने हथियार नहीं डाले और नहाया वो बात अलग है कि उस ठन्डे पानी से नहीं बल्कि गीजर के गर्म पानी से अब शाम गहरा रही थी और मैं पीलिंग की सड़कों पर था |मौसम का आलम यह था कि मुझे कोट डालना पड़ा सड़कें लोगों से भरी थी कुछ विदेशी भी थे पर शोर नाम की कोई चीज नहीं सब कुछ शांत मोटे तौर पर अगर लोगों को बदल दिया जाए तो मुझे एकबारगी लगा मैं यूरोप की किसी गली में घूम रहा था |

एक स्थानीय निवासी से बात करने पर पता चला यहाँ कुछ भी नहीं है बस मौसम के कारण सैलानी आते हैं तो आपको सिर्फ होटल ही मिलेंगे पर पीलिंग की वो शाम आज भी मेरे जेहन में जीवंत है पहाड़ जब धीरे धीरे हरे से काले होते जा रहे थे सड़कों पर गाड़ियों की हेडलाईट चमक रही थीं और मैं जून के महीने में कोट डाले हुए देश के एक ऐसे हिस्से में जहाँ मैं अजनबी था यूँ ही भटक रहा था |भटक ही तो रहा हूँ और शायद तभी भटकते हुए पीलिंग आ पहुंचा |मै सडक की रौशनी से दूर जाकर उन काले पहाड़ों को देख रहा था जो न जाने क्या क्या अपने अंदर समेटे हुए हैं |उस रात मैंने आईपोड को स्पीकर मोड में डाला और अपने कान के पास रखकर सोया शायद  सत्तर के दशक के उन मधुर गानों की स्वर लहरी में हिमालय और कंचनजंघा 
के वो पहाड़ भी सोये होंगे जो सदियों से जग रहे हैं
भारतीय रेल के अप्रैल 2021 के अंक में प्रकशित 

Friday, March 5, 2021

सिक्किम यात्रा ;चौथा भाग

बादल पर पाँव है 
हम लोगों को नामची जाना था यह तो पता था पर वहां है क्या इसकी जानकारी किसी को भी ठीक ठाक नहीं थी |छान्गू झील के कार्यक्रम में परिवर्तन होने के कारण यह वैकल्पिक व्यवस्था थी खैर मुझे इससे मतलब नहीं था कि वहां क्या होगा मैं तो देश के पूर्वोत्तर भाग के इस हिस्से की हरियाली को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था ये बात अलग है कि सावन का महीना दूर था |तिस्ता एक बार फिर हमारा साथ दे रही थी |बीच बीच में बारिश हो रही थी सूरज का नामोनिशान नहीं था |रास्ते बादलों से भरे हुए थे |हमारी गाडी जब उनके बीच से गुजरती थी तो एक ठंडा सा अहसास होता है |प्रार्थना झंडियों से भरे रास्ते हमें याद दिला रहे थे यहाँ प्रकृति से बड़ा कोई नहीं है |
सड़क किनारे लगी प्रार्थना झंडियाँ 
रंग बिरंगी प्रार्थना झंडियाँ जहाँ पूजा की प्रतीक थीं वहीं सफ़ेद झंडियाँ शोक और म्रत्यु का |सच है पहाड़ लोगों को धीरज धरना सिखा देते हैं तभी शायद देश के इस हिस्से में सब कुछ शांत थमा है सब अपनी बारी का इन्तजार करना जानते हैं किसी को किसी से आगे जाने की कोई जल्दी नहीं है वो चाहे गाड़ियाँ हों या इंसान, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की तरह बात –बात में प्रतिक्रिया नहीं देते शायद उनको मालूम है जन्नत की हकीकत |

मैं शान्ति से सडक पर गाड़ियों का अनुशासन देख रहा था सामने वाली गाडी को पास देना ,उस पहाडी मोड़ पर जब दो गाड़ियाँ अगल –बगल होती हैं दोनों ड्राइवरों का हँसते मुस्कुराते हुए हाल चाल लेना बता रहा था ये देश का वह हिस्सा नहीं है जहाँ मैं रहता हूँ हाँ यह देश का वह हिस्सा जरुर है जहाँ कोई भी शांति से जीना चाहेगा बगैर किसी को हराए हुए जीतना चाहेगा |पहाड़ आपको जीना सिखा देते हैं मैं सोच रहा था वैसे भी जब आपके हाथ में कुछ न हो तो आप अपने आप धीरज धरना सीख जाते हैं यहाँ के निवासियों को यह भ्रम नहीं है कि वे शक्तिशाली है यहाँ कोई शक्तिशाली है तो वह सिर्फ और सिर्फ प्रकृति है |रास्ता कहीं अच्छा और कहीं बहुत खराब है जगह –जगह सडक बनाने का काम चल रहा था |तीन घंटे की यात्रा के बाद हम नामची पहुंचे |
सर्वेश्वर धाम परिसर 
नामची इलाका गंगटोक की तरह विकसित और साफ़ सुथरा था उसके तीन किलोमीटर के बाद हमारी मंजिल थी जिसके बारे में हमें सिर्फ इतना पता था कि कोई पूजा स्थल है पर वह किस धर्म का है हमें नहीं पता था |

गाडी पार्किंग में लगी हमें ड्राइवर ने कहा आप लोग सामने चले जाइए कुछ सीढियां चढ़ कर हम एक विशाल परिसर में पहुंचे पर अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा  था |सुरक्षा जांच के बाद आगे बढे एक आदमकद भगवान शिव की प्रतिमा दिखी मन में एक निराशा सी आयी मतलब एक मंदिर जिसका कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है ये दिखाने इतनी दूर लाये |

मंदिर तो हमारे इलाके में बहुत से हैं इसी उधेड़बुन में उस सुरक्षा जांच के क्षेत्र से बाहर निकले जहाँ भगवान शिव की वह मूर्ति लगी हुई थी, पर अब जो हमारे साथ होने वाला था वो न भूतो न भविष्यति वाला मामला था हम जैसे ही बाहर निकले तो लगा जैसे हमारे सारे भ्रम दूर किये जा रहे हैं कोई पर्दा खुल रहा हो दूर एक विशाल शिव जी की मूर्ति दिखी |इतनी विशाल हिन्दू देवता की मूर्ति मैंने अभी तक नहीं देखी थी हाँ बुद्ध जी की विशाल प्रतिमाएं मैंने खूब देखी थी |मैं एकटक उसको देखते हुए आगे बढ़ रहा हूँ मूर्ति  के चारों ओर मंदिर ही मंदिर रामेश्वर का भी मंदिर भी वहां दिख रहा था पर मैं तो सिक्किम में हूँ यहाँ कैसे यह मंदिर ?
एक सौ आठ फीट ऊँची मूर्ति सर्वेश्वर धाम 
सवाल ही सवाल जैसे जैसे मैं आगे बढ़ रहा था धरती का कैनवास बड़ा होता जा रहा था |सबसे पहले मैं अपने सारे सवालों का जवाब चाहता था पर मेरी पत्नी दर्शन करना चाहती थी पर उसी वक्त उस परिसर के समस्त मंदिरों के आधे घंटे के लिए बंद होने का समय हो चुका था इसलिए मेरे पास अपने सारे सवालों का जवाब पाने का मौका था |मैंने एक गार्ड को भरोसे में लिया और उससे कुछ पता किया शोफोलोक पहाडी पर बने इस विशाल मंदिर की आधारशिला साल 2005 में रखी गयी और साल 2013 में इसे लोगों के लिए खोल दिया गया जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने किया |शिव जी की मूर्ति की उंचाई एक सौ आठ फीट है और यहाँ देश के बारह ज्योतिर्लिंग और चार धाम के सभी मंदिरों की प्रतिकृति बनाई गयी है मकसद इतना है जो लोग अपने जीवन में इन मंदिरों में न जा पायें वे यहाँ आकर उनके दर्शनों का लाभ उठा सकें |हमें लग ही नहीं रहा था कि हम किसी  मंदिर परिसर  में है चारों ओर शांति पहाड़ बादल भीड़ के नाम पर लोगों के कुछ झुण्ड और कुछ भी नहीं ,किसी तरह के पंडों का कोई आतंक नहीं हमने शान्ति से उस पूरे परिसर का जायजा लिया |
सर्वेश्वर धाम की यह फोटो गूगल के सौजन्य से 
मैंने न तो चार धाम देखें हैं न ही बारह ज्योतिर्लिंग इसलिए मेरे लिए एक विजुअल ट्रीट जैसा मामला हो गया |प्रतिक्रतियां  इतनी शानदार है कि आप धोखा खा सकते हैं कि  ये असल है या नकल वैसे भी सिक्किम में बौद्ध धर्म ज्यादा प्रचलित है इसलिए मोनेस्ट्री के प्रदेश में इतना शानदार मंदिर मन को लुभा रहा था जहाँ  धर्म के नाम पर कोई लूट नहीं थी जहाँ प्रसाद के दुकानों की भरमार नहीं थी जो आपसे कुछ खरीदने के लिए कह रही हों |इस परिसर में बैठकर प्रकृति से एकाकार हो सकते हैं कहने को यह धार्मिक स्थल था पर माहौल किसी पर्यटक स्थल जैसा था जगह –जगह लोग सेल्फी लेने में व्यस्त थे पर एक सीमा  रेखा  जरुर थी पर्यटक स्थल वाली उच्चश्रृंखलता नहीं थी |मंदिर में घूमते –घूमते दो घंटे बीत चुके थे इसलिए अब बारी पेट पूजा की थी |

मंदिर परिसर में एक विशाल कैंटीन है जहाँ खाने पीने का सारा सामान बाजार भाव से महंगा उपलब्ध है आप यहाँ बाहर से खाने पीने का कोई सामान नहीं ला सकते हैं जो लेना है यहीं से खरीदीये |
साईं मन्दिर 
आज का दिन धर्म के नाम रहने वाला था इसके बाद मुझे बताया गया हम एक और मंदिर जायेंगे जो साईं बाबा का मंदिर है |

मेरे मन में जिज्ञासा थी देश के इस हिस्से में भी साईं बाबा की पूजा कैसे होती होगी और यह जिज्ञासा मुझे इस मंदिर की ओर ले गयी ,यहाँ के साईं बाबा मंदिर की ख़ास बात यह थी कि यह मंदिर दो मंजिल का था नीचे के परिसर में शिर्डी के साई बाबा की मूर्ति थी तो ऊपर वाले परिसर में सत्य साईं बाबा की मूर्ति लगी थी और उसी मंदिर परिसर में भगवान शिव की भी पूजा हो रही थी |सिक्किम में मेरा एक और दिन समाप्त हो रहा था |
जारी..................................

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भारतीय रेल के मार्च 2021 के अंक में प्रकाशित 

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