Thursday, September 17, 2026

वर्षा से मन मयूर नहीं नाचता ,डर सताता है

 

मौसम पहले मन के मिज़ाज से आते थे, अब वे मौसम विभाग की चेतावनियों और प्रदूषण सूचकांक के डरावने आंकड़ों के साथ दाखिल होते हैं। हमारे देखते-देखते जाड़ा, गर्मी और बरसात—तीनों ऋतुएं हमारे तथाकथित 'विकास' की वेदी पर कुर्बान हो चुकी हैं। अब मौसम बदलते नहीं, बल्कि जीवन की लय को झकझोर कर रख देते हैं। कुदरत का जो चक्र कभी जीवन को सहजता और ठहराव देता था, वह अब कंक्रीट के जंगलों और इंसानी आपाधापी में उलझकर दम तोड़ रहा है।
याद कीजिए, कभी गर्मियों की दोपहर का अपना एक अलग सुकून होता था। छत पर शाम को पानी का छिड़काव, खस की भीनी खुशबू, नानी के हाथ का बना आम का पना और आंगन में बिछे बिस्तरों पर तारों को गिनते हुए सो जाना। आज गर्मी का मतलब है पचास डिग्री की झुलसाती लू, तपती डामर की सड़कें और कंक्रीट के कमरों को ठंडा करने के लिए दीवारों पर चौबीसों घंटे हांफते हुए एयर कंडीशनर। हमने हरियाली काटकर जो कंक्रीट के टावर खड़े किए हैं, वे अब आग की भट्ठी की तरह दहकते हैं।
जाड़ा कभी धूप की गुनगुनाहट, तिल-गुड़ की मिठास और मां के हाथ से बुने रंग-बिरंगे स्वेटरों का नाम था। सुहानी धूप में बैठकर मूंगफली के छिलके बिखेरना और देर तक बतियाना जाड़े की रूह हुआ करता था। आज जाड़ा आते ही सूर्य देवता विकास के काले धुएं के पीछे गुम हो जाते हैं। आसमान में कोहरा नहीं, जहरीला स्मॉग तैरता है। बच्चे धूप में खेलने के बजाय एयर प्यूरीफायर वाले कमरों में कैद हो जाते हैं और सांसों की हिफाजत के लिए स्कूलों में ताले लटक जाते हैं। सर्दी अब ठिठुरन का मौसम नहीं, फेफड़ों का संकट बन चुकी है।
रही बात बरसात की, तो वह कभी मिट्टी की पहली सौंधी महक और बेपरवाह बचपन की कागज़ी कश्तियों का त्योहार थी। अब नदियों के पेट और तालाबों को पाटकर बनी पॉश कॉलोनियों में बारिश केवल जलभराव, गाड़ियों के जाम और सीवर के उफनने का खौफ लाती है। बादल बरसते हैं तो मन में कोई मयूर नहीं नाचता, बल्कि यह डर सताता है कि कल दफ्तर कैसे पहुंचेंगे।
इस सारी तबाही की जड़ में है हमारी अंधी रफ्तार। सबको बहुत जल्दी है—जल्दी आगे निकलने की, जल्दी मकान की किस्तें चुकाने की, जल्दी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने की। इस दौड़ में हमने जीने का ठहराव खो दिया और अपनी छोटी-छोटी मासूम खुशियों को मोबाइल की छह इंच की चमकती स्क्रीन में गिरवी रख दिया।
आज इंसान आसमान से गिरती बारिश की बूंदों को छूने से कतराता है कि कहीं कपड़े न मैले हो जाएं, तबीयत न बिगड़ जाए। मगर वही इंसान बालकनी में खड़े होकर पानी की चंद बूंदों के साथ पंद्रह सेकंड की रील जरूर शूट करता है। मिट्टी से जुड़ने, बारिश में बेधड़क भीगने और ठंड की धूप को बदन पर महसूस करने का जो सच्चा मानवीय सुख था, वह अब सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और 'व्यूज' के बाज़ार में बिक गया है। असली बारिश में भीगने की जगह अब भीगने की रील देखना ज़्यादा तसल्ली देता है।
हमने प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया, उसका हर्जाना अब हमारी आत्मा चुका रही है। मौसमों से उनका मूल सौंदर्य छीनकर हमने खुद को डिजिटल पिंजरों में बंद कर लिया है। जब तक हम रुककर सांस नहीं लेंगे और कुदरत के साथ फिर से रिश्ता नहीं जोड़ेंगे, तब तक मौसम सिर्फ कैलेंडर की तारीखें बनकर रह जाएंगे—बिना किसी एहसास और बिना किसी खुशबू के।
प्रभात खबर में 17/09/2026 को प्रकाशित लेख 

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