डिजिटल भारत की कहानी जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उसके साथ एक दूसरी कहानी भी लगभग उसी गति से फैल रही है। यह कहानी साइबर ठगी की है। कभी जेब काटने के लिए अपराधी को आपके पास आना पड़ता था, अब उसे आपकी जेब तक पहुंचने की भी जरूरत नहीं। एक फोन कॉल, एक संदेश, एक फर्जी लिंक, एक नकली वेबसाइट या वीडियो कॉल के जरिए वह आपके बैंक खाते तक पहुंचने की कोशिश कर सकता है। अपराध का स्थान बदल गया है, तरीका बदल गया है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अपराधी और पीड़ित के बीच की भौतिक दूरी लगभग अप्रासंगिक हो गई है।भारत में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार आर्थिक अवसरों और सुविधा का बड़ा माध्यम बना है। लेकिन इसी डिजिटल विस्तार ने अपराधियों के लिए भी संभावनाओं का नया संसार खोल दिया है। समस्या केवल यह नहीं कि साइबर ठगी के मामले बढ़ रहे हैं। असली चिंता यह है कि ठग अब तकनीक के साथ मनोविज्ञान का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे केवल पासवर्ड या ओटीपी नहीं मांगते, वे डर पैदा करते हैं, लालच देते हैं, भरोसा पैदा करते हैं और कई बार पीड़ित को इतना मानसिक दबाव में डाल देते हैं कि वह स्वयं अपने खाते से रकम अपराधी के खाते में पहुंचा देता है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024 में राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) पर वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की 36,37,288 घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में नागरिकों द्वारा रिपोर्ट की गई कुल वित्तीय क्षति ₹22,845.73 करोड़ थी। वर्ष 2023 में यह नुकसान ₹7,465.18 करोड़ था। यानी एक वर्ष में लगभग 206 प्रतिशत की वृद्धि।
यहां एक अंतर समझना जरूरी है। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर वर्ष 2024 में सभी प्रकार के साइबर अपराधों से संबंधित 22,68,346 घटनाएं रिपोर्ट हुईं, जबकि 36.37 लाख का आंकड़ा विशेष रूप से वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की घटनाओं से संबंधित है। इसलिए दोनों आंकड़ों को एक-दूसरे का पर्याय मानना उचित नहीं होगा।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इसी चिंता की पुष्टि करते हैं। क्राइम इन इंडिया 2024 के अनुसार, देश में साइबर अपराध की श्रेणी में 1,01,928 मामले दर्ज हुए, जबकि 2023 में इनकी संख्या 86,420 थी। यानी 17.9 प्रतिशत की वृद्धि। इन मामलों में 73,987 यानी 72.6 प्रतिशत मामलों में अपराध का उद्देश्य धोखाधड़ी था। अर्थात साइबर अपराध अब कोई हाशिये की समस्या नहीं है। यह सीधे नागरिक की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा अपराध बन चुका है।साइबर ठगी का पुराना तरीका अपेक्षाकृत सरल था—फोन आया, बैंक कर्मचारी बनकर ओटीपी पूछा और खाता खाली कर दिया। अब अपराधी समझ चुके हैं कि हर व्यक्ति ओटीपी नहीं बताएगा। इसलिए उन्होंने रणनीति बदली है। अब वे तकनीकी कमजोरी से ज्यादा मानवीय कमजोरी को निशाना बनाते हैं।
इसी का सबसे चर्चित उदाहरण है ‘डिजिटल अरेस्ट’।
इसमें अपराधी स्वयं को पुलिस, सीबीआई, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय या रिजर्व बैंक का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल करते हैं। पीड़ित को बताया जाता है कि उसके नाम से कोई पार्सल मिला है, किसी अपराध में उसका बैंक खाता इस्तेमाल हुआ है या उसके खिलाफ कोई गंभीर मामला दर्ज है। इसके बाद उसे तथाकथित जांच में सहयोग के नाम पर वीडियो कॉल पर बने रहने और किसी से संपर्क न करने के लिए कहा जाता है। फिर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगे जाते हैं। गृह मंत्रालय ने स्वयं ऐसे मामलों में विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों के नाम का दुरुपयोग किए जाने को लेकर चेतावनी जारी की है। 2024 में डिजिटल अरेस्ट और उससे संबंधित साइबर अपराधों की 1,23,672 घटनाएं NCRP पर रिपोर्ट हुईं और इनमें ₹1,935.51 करोड़ की धोखाधड़ी की सूचना दी गई। यह आंकड़ा केवल एक तकनीक की भयावहता नहीं बताता, बल्कि यह दिखाता है कि अपराधी किस तरह भय और सरकारी संस्थाओं के प्रति आम नागरिक के भरोसे का इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
डर के साथ-साथ लालच भी साइबर ठगों का बड़ा हथियार है। पिछले कुछ समय में फर्जी निवेश और ट्रेडिंग के मामले तेजी से सामने आए हैं। सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर निवेश विशेषज्ञ या नामी वित्तीय संस्थान के प्रतिनिधि बनकर लोगों से संपर्क किया जाता है। उन्हें एक ऐसे ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म या ऐप से जोड़ा जाता है, जिस पर उनके निवेश के बढ़ने का नकली आंकड़ा दिखाई देता है।
शुरुआत में छोटी रकम लगवाई जाती है। स्क्रीन पर मुनाफा दिखाई देता है और भरोसा बढ़ने पर निवेश की राशि बढ़ाने के लिए कहा जाता है। जब पीड़ित रकम निकालने की कोशिश करता है तो टैक्स, प्रोसेसिंग फीस या निकासी शुल्क के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगी जाती है। इस तरह ठगी एक बार में नहीं, कई चरणों में होती है।यहां अपराधी की सफलता तकनीक में कम और पीड़ित के मन में पैदा किए गए विश्वास में ज्यादा होती है।साइबर ठगी के पीछे केवल कॉल करने वाला व्यक्ति नहीं होता। रकम को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से स्थानांतरित करने के लिए म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल किया जाता है। ये ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका उपयोग ठगी की रकम को प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए किया जाता है।
कई मामलों में खाते के वास्तविक धारक को यह जानकारी नहीं होती कि उसके खाते का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है। दूसरी ओर, कुछ मामलों में खाते उपलब्ध कराने के लिए कमीशन का लालच भी दिया जाता है। इससे साइबर अपराध की रकम को उसके मूल स्रोत तक पहुंचाना पुलिस के लिए कठिन हो जाता है।
साइबर ठगी में समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। पैसा एक खाते से दूसरे खाते में और फिर कई खातों में पहुंच सकता है। इसलिए शिकायत में देरी का अर्थ कई बार रकम की वापसी की संभावना कम होना है।
इसी उद्देश्य से सरकार ने 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन और नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS) की व्यवस्था की है। सरकार के अनुसार, 30 जून 2026 तक 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में ₹11,158 करोड़ से अधिक की राशि को ठगों तक पहुंचने से बचाया गया।
साइबर अपराध की एक और चुनौती इसकी सीमा-विहीन प्रकृति है। अपराधी एक देश में, सर्वर दूसरे देश में और बैंक खाते किसी तीसरे स्थान पर इस्तेमाल कर सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में मौजूद अंतरराष्ट्रीय scam compounds से जुड़े मामलों में भारतीय नागरिकों को निशाना बनाए जाने और भारतीयों की तस्करी कर ऐसे नेटवर्क में काम कराने के मामले भी सामने आए हैं।
इस स्थिति में स्थानीय पुलिस के सामने केवल अपराधी की पहचान का सवाल नहीं होता। उसके बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डिजिटल साक्ष्य, बैंकिंग लेन-देन और अलग-अलग देशों की कानूनी प्रक्रियाओं का सवाल खड़ा होता है। यही कारण है कि साइबर अपराध की जांच पारंपरिक पुलिसिंग से अलग तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग करती है।
सरकार ने साइबर अपराध से निपटने के लिए कई व्यवस्थाएं विकसित की हैं। I4C के साथ नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS ), राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और Suspect Registry जैसी व्यवस्थाएं सक्रिय हैं। दूरसंचार विभाग का संचार साथी और उसका चक्षु मंच संदिग्ध संचार और मोबाइल कनेक्शनों से जुड़े मामलों की पहचान और रिपोर्टिंग में मदद करते हैं।
लेकिन तकनीकी व्यवस्था बनाना और उसका प्रभावी इस्तेमाल दो अलग बातें हैं। जिला स्तर पर जांच अधिकारियों को डिजिटल फोरेंसिक, क्रिप्टोकरेंसी ट्रांजैक्शन, ऑनलाइन पहचान, बैंकिंग ट्रेल और अंतरराष्ट्रीय डिजिटल साक्ष्य की जांच में लगातार प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
सरकार के अनुसार 30 जून 2026 तक साइबर अपराध से निपटने के लिए साइबर फोरेंसिक और प्रशिक्षण प्रयोगशालाएं 33 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में स्थापित की जा चुकी थीं और 24,600 से अधिक कानून प्रवर्तन अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों तथा अभियोजकों को साइबर अपराध, जांच और फोरेंसिक से संबंधित प्रशिक्षण दिया जा चुका था।
तकनीक कितनी भी सुरक्षित क्यों न हो, यदि नागरिक भय या लालच में गलत निर्णय लेता है तो सुरक्षा की कई परतें कमजोर पड़ सकती हैं।
इसलिए साइबर सुरक्षा को केवल कंप्यूटर विशेषज्ञों का विषय मानना भूल होगी। नागरिकों को कुछ बुनियादी सावधानियां अपनी रोजमर्रा की आदत बनानी होंगी—अनजान लिंक पर क्लिक न करना, किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी या बैंक संबंधी जानकारी न देना, निवेश के असामान्य प्रस्तावों पर भरोसा न करना और सरकारी अधिकारी के नाम पर धमकी मिलने पर घबराने के बजाय संबंधित विभाग से स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना।
भारत ने डिजिटल अर्थव्यवस्था का बड़ा विस्तार किया है। अब चुनौती केवल डिजिटल सेवाओं को अधिक तेज, सस्ता और सुविधाजनक बनाने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि इस डिजिटल ढांचे में नागरिक का भरोसा बना रहे।सबसे अहम बात यह है कि साइबर ठगी को केवल ‘ऑनलाइन फ्रॉड’ कहकर छोटा नहीं किया जा सकता। जब एक व्यक्ति की वर्षों की बचत कुछ मिनट में चली जाती है, तो यह केवल तकनीकी अपराध नहीं रहता; यह उसके आर्थिक जीवन और सामाजिक विश्वास पर सीधा आघात होता है।
डिजिटल भारत की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने लोग ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं या कितनी सेवाएं मोबाइल पर उपलब्ध हैं। उसकी असली परीक्षा यह होगी कि आम नागरिक इस डिजिटल दुनिया में कितना सुरक्षित और आश्वस्त महसूस करता है।
दैनिक जागरण, में 05 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित लेख

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