लेकिन नब्बे के उस मासूम दशक से 2026 की इस हाई-टेक दहलीज तक आते-आते हमारे त्योहारों का भूगोल और मनोविज्ञान दोनों बदल गए हैं। आज हमारे पास सब कुछ है—ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स पर साल के तीन सौ पैंसठ दिन सेल चलती है, जब मन चाहे मिठाई और नए कपड़े मिनटों में दरवाजे पर हाजिर हो जाते हैं। अभाव खत्म हो गया है, लेकिन उसके साथ ही वह 'प्रतीक्षा का रोमांच' भी मर गया है जो त्योहार को खास बनाता था।
आज की दीवाली घर के आँगन में कम, स्मार्टफोन की छह इंच की स्क्रीन पर ज्यादा मनाई जा रही है। त्योहार अब आत्मीय उल्लास का विषय नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर ‘कंटेंट क्रिएशन’ और ‘प्रदर्शन’ का एक दबाव बन गए हैं। दीये जलाने से पहले यह सोचा जाता है कि किस एंगल से रील अच्छी बनेगी। रंगोली के रंगों में अपनों के साथ बैठने की खुशी से ज्यादा इस बात की चिंता होती है कि व्हाट्सऐप स्टेटस और इंस्टाग्राम स्टोरी पर उसकी तस्वीर कितनी चमकदार दिखेगी। हम त्योहार को जी नहीं रहे हैं, बल्कि दुनिया को दिखाने के लिए उसे 'क्यूरेट' कर रहे हैं।
याद कीजिए वह दौर, जब दीवाली की शाम को थालियों में मिठाई और दीये सजाकर पड़ोसियों के घर जाने की परंपरा थी। दरवाजे पर दस्तक होती थी, बड़ों के पैर छुए जाते थे और ड्राइंग रूम में बैठकर ठहाके लगते थे। आज वह आत्मीय दस्तक एक बेजान ‘फॉरवर्डेड मैसेज’ या कस्टमाइज्ड एआई ग्रीटिंग में सिमट गई है। एक ही सोसाइटी में रहने वाले लोग एक-दूसरे के दरवाजे पर जाने के बजाय ग्रुप में ‘हैप्पी दीवाली’ का स्टिकर भेजकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं।
उस ‘बिना मोबाइल वाली दीवाली’ का सबसे बड़ा सुख यह था कि मनुष्य अपने वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित रहता था। जब फुलझड़ी जलती थी, तो आँखें उसकी चिंगारियों में होती थीं, कैमरे के लेंस में नहीं। आज पूरा परिवार एक ही कमरे में नए कपड़े पहनकर बैठा तो होता है, लेकिन हर कोई अपनी-अपनी स्क्रीन पर यह गिनने में व्यस्त रहता है कि उसकी पोस्ट को कितने लाइक्स और व्यूज मिले।
त्योहारों का मूल उद्देश्य मनुष्य को उसकी रोजमर्रा की यांत्रिकता से निकालकर सामूहिकता और संवेदना से जोड़ना था। लेकिन डिजिटल दिखावे ने उत्सव को भी एक थका देने वाली प्रतिस्पर्धा बना दिया है—किसकी सजावट ज्यादा महंगी है, किसका तोहफा ज्यादा ब्रांडेड है और किसकी सेल्फी ज्यादा फिल्टर युक्त है।
इस बार जब दीवाली की शाम घर की मुंडेर पर मिट्टी का दीया जलाएं, तो कोशिश कीजिएगा कि कुछ घंटों के लिए अपने फोन को किसी दराज में बंद कर दें। बिना किसी सेल्फी, बिना किसी स्टेटस अपलोड और बिना किसी डिजिटल शोर के अपने परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर देखिए। शायद अभाव के उस दौर को तो हम वापस नहीं ला सकते, लेकिन स्क्रीन के इस कृत्रिम उजाले से बाहर निकलकर रिश्तों की उस पुरानी, सच्ची गर्माहट को तो फिर से महसूस कर ही सकते हैं।

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