Tuesday, July 3, 2018

तेरा चेहरा कितना सुहाना

हमारी जवानी के दिनों में एक गाना बहुत हिट हुआ था.  फिल्म सलामी का “चेहरा क्या देखते हो दिल में उतर कर देखो न” , बात एकदम खरी है. दिल और चेहरे का एकदम सीधा सम्बन्ध है. “लाख छुपाओ छुप न सकेगा राज हो कितना गहरा दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा”. ये भी एक फिल्म का ही गाना है पर इसमें कितना बड़ा फलसफा छुपा हुआ है  . बात चेहरे की चल रही है तो मेरी एक अजीब आदत है भीड़भाड़ में, सेमिनार में, ट्रेन की यात्राओं में मैं चेहरे मिलाया करता हूँ  .अगर किसी अपरिचित का चेहरा अपने किसी परिचित से मिलता-जुलता हुआ तो मैं गिनने लगता हूँ कि दोनों की क्या-क्या अदाएं मिलती-जुलती हैं. ऐसे न जाने कितने अपरिचितों से कभी बात करने की हिम्मत तो नहीं हुई, लेकिन मुझे एक बात तो समझ में जरुर आ गयी  कि हर चेहरा कुछ कहता है .रोज़ हम न जाने कितने चेहरे देखते हैं लेकिन कभी गौर नहीं करते असल में चेहरा हमारे व्यक्तित्व   का आइना होता है और हर चेहरा बहुत कुछ कहता है लेकिन अगर  हम समझना चाहें तो .
            चेहरे से ही हमारी सोच और देहभाषा  का पता चलता है मतलब कि परदे के पीछे क्या चल रहा है .डर से चेहरा काला पड़ जाता है गुस्से में चेहरा लाल हो जाता है ,शर्म से चेहरा गुलाबी हो जाता है और बीमारी में चेहरा पीला पड़ जाता है. ये तो चेहरे के रंग हैं जो जिन्दगी की हलचल को बताते हैं. पर ये रंग जो चेहरे पर दिखते हैं वह वास्तविकता में हमारे दिल की भावनाएं होती हैं जो चेहरे पर दिखती हैं . हम अगर अन्दर से अच्छा महसूस कर रहे हैं तो चेहरे पर वो खुशी दिखेगी अगर दुखी हैं तो चेहरा भावहीन  दिखेगा. चेहरे को अच्छा रखना है तो दिमाग को अच्छा रखना बहुत जरूरी है . दिमाग को अच्छा रखने का एक मात्र तरीका है कि अपना दिमाग हमेशा खुला रखा जाए और नए विचारों का स्वागत किया जाए .चेहरे की खूबसूरती का राज़ किसी फेयर नेस क्रीम में नहीं है बल्कि विचारों के खुलेपन  मे है . क्योंकि विचार ही तो हमारी आपकी सोच बनाते हैं और सोच ही आम इंसान को खास बनाती है और अगर आप ऐसा कर पाए तो लोग यही कहेंगे न तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती .
                     इस छोटे से दिमाग को अगर हम अपनी सकारात्मक सोच से  खुला रखेंगे तो किसी का भी  चेहरा निखरेगा ही  .जिन्दगी में लाख दुःख हैं. पीड़ा और चिंताएँ हैं फ़िर भी जिन्दगी खूबसूरत तो है ही न, हर एक के पास जिन्दगी को जीने के अपने कारण हैं .सोचिये की आपका कौन सा काम किसी के चेहरे पर मुस्कान सजा सकता है .किसी को खुश कर सकता है .उस काम की तलाश कीजिये और जिन्दगी को खूबसूरत बनाइये.तो आज से ही उस काम की तलाश में लग जाइये और फ़िर देखिये आपका चेहरा भी कैसे दमकेगा .चेहरे की खूबसूरती का राज हमारे पास ही है ख़ुद खुश रहिये और दूसरों को खुश रखिये .जब आप ऐसा करेंगे तो लोग अनायास आपको देख के कह उठेंगे “तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है”.
प्रभात खबर में 03/07/2018 को प्रकाशित 

Monday, July 2, 2018

लन्दन की तरह हमें भी इतिहास को सहेजने की जरुरत

थेम्स नदी न तो किसी की माँ है न ये किसी को बुलाती है और न ही लोग इसकी पूजा करते हैं ।मैं तीन घण्टे मैं इस नदी के किनारे चक्कर लगाता रहा न कोई प्लास्टिक न कोई कूड़ा सिर्फ मिला तो उल्लासित जीवन हंसते मुस्कुराते लोग ।ये देश हमसे इतना आगे क्यों है ?इनका एक रुपया पढ़ें पाउण्ड हमारे 93 रुपये के बराबर है और ये हमसे वाकई सौ गुना आगे हैं | इतवार के दिन  लंदन के सारे चर्च खाली थे सदियों पहले चर्च राजकाज से बाहर हो गए थे या कर दिए गए थे ।यहां के चर्च सूने पड़े हैं आने वालों में सैलानी ज्यादा हैं भक्त कम । कुछ भी हो पर भीड़ थी यहां के म्यूजियम में तैंतीस एकड़ में फैले चिड़िया घर और खूब सारे पार्क में जहां स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता है वहीं विज्ञान का साथ भी ।धर्म अब निजी नहीं नितांत व्यक्तिगत मामला हो गया है ।खैर दुनिया भर के लोगों के बीच घूमते हुए एक आज एक और इच्छा पूरी हो गई अपने जासूसी नायक शरलॉक होम्स के घर को देखने की 221B Beker Street  ।अब हम निकले कैम्ब्रिज शहर की ओर दुनिया के किसी कोने में अगर आप किसी भी पढ़े लिखे इंसान से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बारे में पूछेंगे तो वो इस जगह की महानता से परिचित होगा बस शिक्षा की दुनिया के ऐसे तीर्थ पर हम भी सज़दा करने आ गए ।ऐसी जगह पर मेरे मेजबान एक ऐसे दोस्त थे जिसने करीब दस साल पहले भारत की नागरिकता छोड़ कर ब्रिटेन की नागरिकता ले ली थी एक ऐसा परिवार जहां के बच्चे हिंदी ब्रिटिश एक्सेंट में बात करते हैं और माता पिता खालिस देशी ,केम्ब्रिज विश्वविद्यालय देखकर इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है वो देश जिसने शिक्षा में निवेश नहीं किया वो.......? लंदन दो हजार साल पुराना शहर है ।इस शहर में न जाने कैसे कैसे संग्रहालय और स्मारक हैं नर्सिंग संग्रहालय ,उद्यान संग्रहालय ,युद्ध संग्रहालय दुनिया भर की दुर्लभ पेंटिंग्स का संग्रह और तो और विश्वयुद्ध में मारे गए जानवरों के लिए भी स्मारक ।यह शहर अपने इतिहास पर गर्व तो जरूर करता है पर इतिहास में हुई गलतियों से सीखता भी है और ये संग्रहालय स्मारक आदि उसी का नमूना हैं जो इसे याद दिलाते हैं कि यह कहाँ से चला और अब इसे कहाँ जाना है ।हम भारतीय अपने इतिहास पर सिर्फ गर्व करते है पर न तो उसस कुछ सीखते हैं और न ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजते हैं जिससे आने वाला कल बेहतर हो शायद इसीलिए एक पाउण्ड 94 रुपये का है |लंदन में  मुझे बर्मा ,अफगानिस्तान ,पाकिस्तान ,केन्या और एयरपोर्ट पर हिंदुस्तानी भी मिले जिन्होंने वर्षों पहले अपने देश को छोड़ दिया था जहां अंग्रेज कभी राज करते थे ।सबको फिलहाल न तो अंग्रेजों से कोई परेशानी है और न ही इस देश से आधे तो ठीक से अंग्रेजी भी न बोल पाते हैं पर ज़्यादातर सस्ती दुकाने प्रवासी ही सम्हाले हुए हैं ।सबका मानना है ये देश जब उन्हें अपना लेता है तो इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उनकी चमड़ी का रंग क्या है या वो किस जबान में बात करते हैं वो बस इस देश के नागरिक हैं और यह देश अपने नागरिकों के साथ हमेशा खड़ा है ।चलते चलते यहां मुझे सड़कों पर अंग्रेजी कम सुनाई पड़ी और दुनिया भर की न जाने कितनी बोलियां जिनमें से ज्यादातर को मैं नहीं जानता था ज्यादा सुनाई पड़ी।मुझे भारत याद आ रहा था ।विदा लंदन मैं फिर लौटूंगा।
अमर उजाला लखनऊ में 02/07/2018को प्रकाशित 









Friday, June 29, 2018

डिजीटल प्लेटफोर्म की बढ़ती धमक

यह दिलचस्प बदलाओं का दौर है  और कलात्मक   अर्थों में बदलाव के कई नए संदर्भ भी उभर रहे हैं |जिनमें कलाएं भी शामिल हैं और इन  परिवर्तन के लिए जो चीज सबसे बड़े उत्प्रेरक के रूप में काम कर रही है वह है इंटरनेट, जिसने पहले हमारे खरीदने ,पहनने से असर डालना शुरू किया फिर ये सिलसिला खाने पीने से लेकर मुद्रा से होते हुए  शादी विवाह  तक पहुँच गया  है |इंटरनेट ने लोक व लोकाचार के तरीकों को काफी हद तक बदल दिया है। बहुत-सी परंपराएं और बहत सारे रिवाज अब अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह प्रक्रिया इतनी तेज है कि नया बहुत जल्दी पुराना हो जा रहा है।हर जगह डिजीटल की धूम है |इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो ली, अब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है।यानि ये है हमारे समाज पर पड़ने वाला  डिजीटल इफेक्ट जो अब कलाओं के माध्यमों  तक आ पहुंचा है| वह कला ही है जिसमें मानव मन में संवेदनाएँ उभारने, प्रवृत्तियों को ढालने तथा चिंतन को मोड़ने, अभिरुचि को दिशा देने की अद्भुत क्षमता होती  है। सिनेमा एक कला है या नहीं इस पर बहस हो सकती है पर एक विद्या के रूप में सिनेमा नाटक के गर्भ  से ही पैदा हुआ है| नाटक हो या सिनेमा इसको देखने की सही जगह थियेटर या सिनेमा हाल ही मानी जाती रही है |सिनेमा में कांस फिल्म महोत्सव का अपना अलग महत्व है जहाँ फ़्रांस के कांस शहर में दुनिया भर के फिल्म निर्माण से जुड़े हुए लोग शामिल होते हैं और फिल्मों का प्रदर्शन भी होता ,श्रेष्ठ फिल्मों को पुरूस्कार भी दिए जाते हैं पर इस बार कांस फिल्म महोत्सव एक नए तरह के विवाद के केंद्र में आ गया |इस साल नेटफ्लिक्स की फिल्मों को कान्स के समारोह में शामिल नहीं किया गया है| नेटफ्लिक्स पिछले कुछ सालों में ऑनलाईन फिल्म  स्ट्रीमिंग के क्षेत्र में एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभरा है जिसकी फिल्मों के दर्शक सारी दुनिया में हैं | नेटफ्लिक्स की  फ़िल्में किसी सिनेमा थियेटर में रिलीज होने की बजाय सीधे इंटरनेट पर रिलीज होती हैं और दुनिया के किसी कोने में बैठे हुए कोई भी व्यक्ति नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन लेकर उसकी फिल्मों का दर्शक हो सकता है वैसे नेटफ्लिक्स अपनी कुछ फिल्मों को अमेरिका के चुनिन्दा सिनेमाघरों में भी रिलीज करता है लेकिन उनकी संख्या सीमित हैं  | कांस फिल्म समारोह का हिस्सा बनने के लिए किसी भी फिल्म का थियेटर में प्रदर्शित होना जरुरी है |ऐसा ही नियम ऑस्कर पुरूस्कार के लिए भी लागू होता है पर कांस में सिनेमा थियेटर में रिलीज होने के  तीन साल बाद ही कोई भी निर्माता उसे इंटरनेट के विभिन्न प्लेटफोर्म में जारी कर सकता है | नेटफ्लिक्स इसी शर्त को पूरा नहीं कर पा रहा था इसलिए उसने अपनी फ़िल्में कांस से वापस ले लीं | नेटफ्लिक्स के इस फैसले ने सिनेमा के भविष्य पर एक नयी बहस छेड़ दी वहीं एक जन माध्यम के रूप में इंटरनेट पहली बार किसी जन माध्यम से सीधे तौर पर टकरा रहा है |अन्यथा या तो जन माध्यमों ने इंटरनेट के लिए जगह छोड़ दी या समय की मांग के हिसाब से  अपने आप को ढाल लिया  | नेटफ्लिक्स ने कई बड़े फिल्म निर्माताओं के साथ बड़े बजट की फिल्मों पर निवेश किया है| कई दूसरी कंपनियां नेटफ्लिक्स की तरह ही फिल्में सीधा डिजीटल प्लेटफार्म पर रिलीज कर रही हैं| जिनमें अमेजन का नाम उल्लेखनीय है |सवाल यह है कि माध्यम ज्यादा महत्वपूर्ण है या उसकी पहुँच,फिल्मों को बनाने के पीछे पैसे बनाने के अलावा सबसे बाद उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुँच है और किसी भी निर्माता को कलात्मक संतुष्टि तभी मिलती है जब वह ज्यादा से ज्यादा दर्शक जोड़े |हर फिल्म एक विचार पर आधारित होती है फिर वह चाहे थिएटर पर दिखाई जाए या किसी डिजिटल प्लेटफार्म पर महज सिनेमा थियेटर में रिलीज कर देने से कोई घटिया फिल्म अच्छी नहीं हो सकती और वहीं डिजीटल प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज हुई फिल्म में किसी तरह की कोई कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं ऐसा विचार समाज में कलाओं के विस्तार में बाधा ही बनेगा |उपभोक्ता नेटफ्लिक्स के बढ़िया कंटेंट की वजह से ही सब्सक्रिप्शन शुल्क  देने को भी तैयार हैं और  नेटफ्लिक्स का बढ़ता विस्तार यह बताता है कि लोग उसकी फ़िल्में ,धारावाहिक पसंद कर रहे हैं |फ्रांस कलाओं के विस्तार का एक बड़ा केंद्र रहा है पर कांस फिल्म  महोत्सव का यह रवैया बताता है कि सिनेमा से जुड़े लोग डिजीटल प्लेटफ़ॉर्म पर सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं जबकि चोरी चुपके डिजीटल तकनीक सिनेमा निर्माण के हर हिस्से में घुस चुकी है वो चाहे सम्पादन का क्षेत्र हो या सिनेमा में  मल्टीकैम सेटअप का प्रयोग |वहीं परम्परागत  सिनेमा के समर्थको का मानना है कि थियेटर  में सिनेमा को देखना एक नए अनुभव से दर्शक का साक्षत्कार कराता है जब वह मानसिक   रूप से उस कला को  समझने और डूबने आता है यह अचानक नहीं होता वह सोच समझकर अपनी दिनचर्या में सिनेमा के लिए जगह बनाता है  |यह डिजीटल प्लेटफोर्म के उस सिनेमा के अनुभव से एकदम अलग होता है जब दर्शक ट्रेन में यात्रा करते ,किसी का इन्तजार करते,किश्तों में सिनेमा की कला को  अपने परिवेश की सीमाओं के साथ किसी फिल्म को देखता है |इस अनुभव में सिनेमा देखना बस किसी काम निपटाने जैसा ज्यादा होता बनस्बत सिनेमा के उस जादुई एहसास के जो हम सिनेमा हाल में महसूस करते हैं |इसमें से कौन सा माध्यम भविष्य में जीतेगा इसका फैसला अभी होना है पर यह तो तय है कि इंटरनेट एक माध्यम के तौर पर सिनेमा को सीधे तौर पर चुनौती देना शुरू कर चुका है |     
आई नेक्स्ट /दैनिक जागरण में 29/06/ 2018 को प्रकाशित      

Tuesday, May 29, 2018

डिजीटल ट्रांजेक्शन पर बढ़ता जोर

इंटरनेट  के जमाने में देश में  बदलाव की प्रक्रिया की धुरी बन रहे हैं स्मार्ट फोन.भारत में ऑनलाइन शॉपिंग को बढ़ावा देने में इंटरनेट आधारित स्मार्टफोन की बड़ी भूमिका है,खरीद प्रक्रिया का यह बदलाव सबसे ज्यादा स्मार्टफोन की खरीद को प्रभावित कर रहा है.इंटरनेट एक विचार के तौर पर सूचनाओं को साझा करने के सिलसिले के साथ शुरू हुआ था चैटिंग और ई मेल से यह हमारे जीवन में जगह बनाता गया फिर ऑनलाईन शॉपिंग ने खेल के सारे मानक बदल दिए पर  भारत में इस सूचना क्रांति के अगुवा बने स्मार्टफोन जिन्होंने मोबाईल एप  और ई वालेट के जरिये पर्स में पैसे रखने के चलन को खत्म करना शुरू कर दिया  . आईटी क्षेत्र की एक अग्रणी कंपनी सिस्को ने अनुमान लागाया है कि सन २०१९ तक भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या लगभग ६५ करोड़ हो जाएगी जो जाहिर तौर पर इस ई लेन देन  की प्रक्रिया को और गति देगी .इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोशिएशन ऑफ इंडिया व केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का ई-कॉमर्स का बाजार 12.6 बिलियन डॉलर का है और 2020 तक यह देश की जीडीपी में चार प्रतिशत का योगदान देगा.
नक़द से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है,सरकार के लिए नोट छापना एक खर्चीला काम है . मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार साल 2011से 2105 तक ई भुगतान ने देश की अर्थव्यवस्था में 6.08 बिलियन डॉलर  का इजाफा किया है.मैकिन्सी ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि डिजीटल  लेन देन के बढ़ने से साल 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था में 11.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी .आंकड़े आने वाले कल की सुनहरी उम्मीद भले ही जगाते हैं पर ये मामला मानवीय व्यवहार से भी जुड़ा है जिसके बदलने में वक्त लगेगा . भारतीय परिस्थितियों में मौद्रिक लेन देन विश्वास से जुड़ा मामला भी है जब हम जिसे पैसा दे रहे हैं वो हमारे सामने होता है जिससे एक तरह का भरोसा जगता है . डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कारोबारियों को कैशबैक देने पर विचार कर रही है. इसके साथ ही सरकार ग्राहकों को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर छूट भी दे सकती है. केंद्र सरकार का राजस्व विभाग एक ऐसे प्रस्ताव पर काम कर रहा है, जिसमें डिजिटल माध्यम से पेमेंट करने वालों को अधिकतम खुदरा मूल्य   पर छूट देने की बात भी हो सकती है. डिजिटल माध्यम से किसी उत्पाद या सेवा के लिए भुगतान सरकार के भीम एप या निजी कंपनियों के मोबाइल वॉलेट (पेटीएम, फोन पे, मोबिक्विक आदि ) की मदद ली जा रही  है. निजी मोबाइल वॉलेट कंपनियां पहले ही डिजिटल ट्रांजेक्शन करने वाले ग्राहकों को कैशबैक की सुविधा  दे रही हैं. 
लेकिन सिर्फ  स्मार्ट फोन प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने से लोग डिजीटल लेन-देन की तरफ ज्यादा बढ़ेंगे ऐसा अभी  सम्भव नहीं दिखता है.  डिजीटल लेन-देन की अपनी समस्याएँ हैं और समस्याएं हैं  . इंटरनेट एंड मोबाईल एसोशिएसन की  रिपोर्ट के अनुसार  दिसंबर 2016 से दिसंबर2017 तक के साल में शहरी भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं  की संख्या 9.66 प्रतिशत बढ़कर अनुमानित 29.5 करोड़ हो गई. वहीं ग्रामीण भारत में इसी दौरान यह संख्या 14.11 प्रतिशत  से बढ़कर अनुमानित 18.6 करोड़ हो गई.ऑनलाइन उपभोक्ता अधिकार जैसे मुद्दों पर न तो कोई जागरूकता है न ही कोई ठोस सार्थक  कानून . ई वालेट प्रयोग  और ऑन लाइन खरीददारी उपयोगिता के तौर पर बहुत लाभदायक है पर किन्ही कारणों से आपको खरीदा सामान वापस करना पड़ा या खराब उत्पाद मिल गया और उपभोक्ता अपना पैसा वापस चाहता है तो  अनुभव यह बताता है कि उसे पाने में तीन से दस  दिन तक का समय लगता है और इस अवधि में उस धन पर डिजीटल प्रयोगकर्ता को कोई ब्याज नहीं मिलता और  यह एक लम्बी थकाऊ प्रक्रिया है जिसमें अपने पैसे की वापसी के लिए बैंक और ओनलाईन शॉपिंग कम्पनी के कस्टमर केयर पर बार –बार फोन करना पड़ता है .कई बार कम्पनियां पैसा नगद न वापस कर अपनी खरीद बढ़ाने के लिए गिफ्ट कूपन जैसी योजनायें जबरदस्ती उपभोक्ताओं के माथे मढ देती हैं और ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न हुई समस्या के समयबद्ध निपटारे की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है .जेब में पैसा होना एक तरह का आत्मविश्वास देता है . क्या वह आत्म विश्वास   जेब में पड़ा मोबाईल ई वालेट या डेबिट /क्रेडिट कार्ड दे पायेगा? आज भी देश के हर शहरों तक के कुछ मोहल्लों और गलियों में इंटरनेट और मोबाइल फोन की निर्बाध  सेवा नहीं है। इसलिए जरूरी यह भी है कि डिजिटल गेटवे की व्यवस्था को भी समानांतर तरीके से सुलभ और मजबूत किया जाए। जब तक इंटरनेट की अबाध सेवा नहीं होगी, डिजिटल गेटवे की सहज सहूलियतें नहीं दी जाएंगी, डिजिटल भुगतान को कामयाबी के साथ लागू नहीं किया जा सकेगा.  आर्थिक समाचार  एजेंसी ब्लूमबर्ग के एक सर्वे के अनुसार जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में बड़े भुगतान तक के लिए नोट का चलन ज्यादा है. अमेरिका में अभी भी छियालीस  प्रतिशत भुगतान नकद में होता है. अमेरिका और यूरोप के जिन देशों में ब्लूमबर्ग ने सर्वे किया, उन देशों में ई-वालेट, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और बिटकाइन जैसी सहूलियतें भी पहले से मौजूद हैं। इसके बावजूद नार्वे को छोड़कर, बाकी जगहों पर नोट का ही ज्यादा इस्तेमाल चलन में है। डिजिटल भुगतान को लेकर लोगों की ललक तभी बढ़ पाएगी, जब भुगतान के लिए उन्हें शुल्क  न देना पड़े इसलिए मुफ्त भुगतान सेवा वाले डिजिटल गेटवे अनिवार्य रूप से उपलब्ध  कराने होंगे. दूसरी समस्या जैसे –जैसे ई लेन-देन बढ़ रहा है उसी अनुपात में साइबर अपराध की संख्या में इजाफा हो रहा है .  जागरूकता में कमी के कारण आमतौर पर जब उपभोक्ता ऑनलाईन धोखाधड़ी का शिकार होता है तो उसे समझ ही नहीं आता वो क्या करे. ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जितनी जल्दी मिलेगा लोग उतनी तेजी से इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन की तरफ बढ़ेंगे .देश की बड़ी आबादी अशिक्षित और निर्धन है वो आने वाले वक्त में कितनी बड़ी मात्रा में  डिजीटल लेन देन करेगी यह उस व्यवस्था पर निर्भर करेगा जहाँ लोग पैसा खर्च करते उसी निश्चिंतता और भरोसे को पा सकें जो उन्हें कागजी मुद्रा के लेन देन करते वक्त प्राप्त होती है  .

आई नेक्स्ट दैनिक जागरण में 29/05/18 को प्रकाशित 

Thursday, May 24, 2018

रुमाल महज़ रुमाल नहीं है

गर्मियों की छुट्टियाँ हो गयी हैं.कुछ लोग घूमने का कार्यक्रम  बना रहे होंगे तो कुछ के घर में शादी या ऐसा ही कोई और आयोजन होगा. जब इतने सारे कार्यक्रम  होंगे तो हम  सुन्दर दिखने के लिए कुछ कपडे वगैरह भी जरुर खरीदेंगे. कपड़ों का ही एक जरुरी हिस्सा है रुमाल ,पर क्या कोई रुमाल की खरीददारी अलग से करता है जैसे पैंट,शर्ट,साड़ी या सूट की करते हैं .वैसे एक दिन बगैर रुमाल के घर से निकल जाइए या रुमाल घर पर भूल जाइए .बहुत कुछ याद आ जाएगा.वैसे भी चीजों की कमी उनके न रहने पर ही खलती है. रुमाल फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ मुंह पर मलने वाली चीज है.हाथ से लेकर मुंह साफ़ करने के अलावा रुमाल का कई इस्तेमाल हैं.अब ये आपके ऊपर है कि आप इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं.
       हिंदी फिल्मों के कई गानों में प्यार की शुरुवात नायिका के रुमाल खोने या मिलने से शुरू होती है. रुमाल भले ही एक छोटा सा कपडे का टुकड़ा भले ही हो पर वो हमारी जिंदगी में बहुत असर डालता है.जब आप मंदिर ,मस्जिद या गुरुद्वारा जाते हैं तो सर पर रुमाल डाल लेते हैं,यानि रुमाल का एक सुपर नेचुरल कनेक्शन भी है जो सीधे ऊपर वाले से हमें जोड़ता है वैसे कपडे तो तरह –तरह के होते हैं पर ऊपर वाले से जीवित रहते हुए जोड़ने का काम रुमाल ही करता है .वैसे हमारे  रुमाल कब बदल जाते हैं इसका पता ही नहीं चलता .हम कभी कपड़ों की तरह रुमाल को बदलने की प्लानिंग नहीं करते हैं,नए रुमाल आते हैं पुराने कहाँ चले जातें हैं न कभी हम जानने की कोशिश करते हैं न कोई हमें बताता है . 
      वैसे ही जिन्दगी में बहुत से लोग हमें ऐसे मिलते हैं जो हमारे काम आते हैं,हमारा जीवन आसान बनाते हैं और फिर चुपचाप हमें शुक्रिया कहने का मौका दिए बगैर जीवन से विदा हो जाते हैं. वैसे भी हमारे घर  में गैस से लेकर अखबार वाले शख्स का चेहरा हमें कहाँ याद रहता है ? ऐसे न जाने कितने लोग हैं जो हमारे जीवन में रुमाल की भूमिका निभा  रहे होते हैं. अपने महत्व का अंदाजा कराये बगैर. 
        रुमाल यूँ तो हमारे पहनावे का एक छोटा सा हिस्सा भर है पर ये हमारी जिन्दगी से जुड़ा हुआ है जैसे हम अपने दैनिक जीवन  में रुमाल खरीदने की प्लानिंग नहीं करते वैसे ही जिन्दगी को प्लान नहीं किया जा सकता.जो जैसे मिले उसे स्वीकार करना चाहिए.रुमाल का रंग अगर हमारे कपडे से नहीं मिलता तो चलेगा पर किसी भी रुमाल का न होना बिलकुल नहीं चलेगा. उसी तरह  ही जिन्दगी में रिश्तों का होना महत्वपूर्ण है उनका अच्छा या बुरा होना नहीं क्यूंकि जिन्दगी रहेगी तो रिश्तों को बेहतर किया जा सकता है पर जिन्दगी ही न रही तो लाख रिश्ते हों उनका कोई फायदा नहीं , इसीलिये तो कहा जाता है जिन्दगी न मिलेगी दुबारा तो जी लो जी भर के तो अगली बार  अगर आपका रुमाल खो जाए तो उसे ढूंढने की कोशिश जरुर कीजियेगा क्योंकि ये रुमाल महज रुमाल नहीं हम सबकी जिंदगी का आईना भी है.
प्रभात खबर में  24/05/18 को प्रकाशित                                      

Wednesday, May 9, 2018

जांचो और परखो का एक नया प्रयोग

ऑनलाईन रिव्यू आज किसी भी उत्पाद या सामग्री की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को जांचने का एक अच्छा विकल्प बनकर उभरे हैं वो चाहे होटलों का चुनाव हो या फिर ऑनलाईन शॉपिंग करते वक्त सैकड़ों विकल्पों के बीच अपने  मनपसंद उत्पाद का चुनाव वैसे भी भारत में ऑनलाईन शॉपिंग का कारोबार तेजी से फ़ैल रहा है | पर देश में ऑनलाईन खरीद का कोई इतिहास न होने से नए लोग इंटरनेट के माध्यम से चीजें खरीदने में थोडा हिचकते है  |ऐसे में लोगों के  लिए पूर्व में उस सेवा या उत्पाद का उपयोग कर चुके लोगों द्वारा लिखी गयी समीक्षाएं एवं टिप्पणियां भावी उपभोक्ताओं  के लिए मददगार साबित होती हैं| इ-कॉमर्स वेबसाइट के माध्यम से खरीददारी करने का सबसे बड़ा फायदा लोगों को उत्पादों पर मिलने वाली छूट के अलावा अन्य उपभोक्ताओं द्वारा  खरीदे गए उन्हीं सामानों के बारे में अपनी राय भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |ये टिप्पणियां एवं समीक्षाएं नए उपभोक्ताओं को सेवा या उत्पाद की खरीद  में मदद करती हैं| समस्त ऑनलाईन सामान बेचने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं को अपनी बात कहने का मौका देती हैं| उपभोक्ता भी धीरे-धीरे इस मौके का इस्तेमाल अवसर की तरह करने लगे हैं आमतौर पर ऑनलाईन ई कॉमर्स साईट पर लिखी जाने वाली समीक्षाएं लिखित रूप में ही होती रहीं हैं पर पिछले तीन सालों में इंटरनेट के परिद्रश्य में काफी बदलाव आया है |इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है | अमेजन जैसी ऑनलाईन शॉपिंग कम्पनी ने उपभोक्ताओं के रुख को भांपते हुए ऑनलाईन रिव्यू की दुनिया में एक नए तरह के प्रयोग की शुरुआत करने जा रहा है ऑनलाइन सम्बंधित शोध करने वाली एक संस्था एल 2 के अनुसार आने वाले समय में अमेज़न अपने उपभोक्ताओं को वीडियो के माध्यम से भी समीक्षाएं देने की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ रहा है | अमेज़न ने लगभग अपने बीस  लाख व्यापार सहयोगियों को इस परीक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है|इस  योजना का पहला चरण दिसंबर के अंत तक शुरू  होने की उम्मीद है| जिसमें उपभोक्ता  टिप्पणियां एवं समीक्षाएं वीडियो के माध्यम से भी अमेज़न पर भेज सकेंगेइस फीचर को जोड़ने के पीछे अमेज़न का सीधा उद्देश्य खरीददारों को अपनी वेबसाइट पर रखना और उन्हें यू ट्यूब  जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों की ओर पलायन करने से रोकना है|इसी साल अक्टूबर में अमेज़न को "सामग्री-आधारित कीमत कटौती एवं प्रोत्साहन" के लिए एक पेटेंट भी मिला है| पेटेंट के अनुसार किसी इलेक्ट्रॉनिक वातावरण में उपभोक्ताओं को ऑडियो, वीडियो या इंटरैक्टिव सामग्री को ग्रहण करने का विकल्प दिया जा सकता है ताकि उन्हें छूट या अन्य लाभ दिए जा सकें। उदाहरण  के लिए यदि कोई उपभोक्ता अमेज़न के विवरण वाले पेज पर जाकर किसी उत्पाद की समीक्षा करने वाले वीडियो को देखता है तो जैसे जैसे वह वीडियो आगे बढ़ता जायेगा उत्पाद के दाम काम होते जाएंगे|यानि  अधिक समय तक विज्ञापन देखने वाले उपभोक्ता को अधिक छूट मिलेगी| अमेज़न का पेटेंट यह भी सुनिश्चित कर देगा की कि  कोई भी अन्य ऑनलाइन रिटेलर इस तरह की सुविधा अपने ग्राहकों को नहीं दे पायेगा | इस पेटेंट के साथ ही अमेज़न ने यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, जैसी कंपनियों के विज्ञापन व्यपार में भी सेंध लगाने की कोशिश की है| अब उपभोक्ताओं को अपने समय की कीमत का वास्तविक अर्थों में सही मूल्य मिलेगा और कीमत  को उपभोक्ताओं के व्यवहार से जोड़ने से कंपनी के प्रति वफादार उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि होगी |जिससे ऑनलाइन रिटेलर ज्यादा समय तक  उपभोक्ताओं को अपनी वेबसाइट पर रोक पाएंगे|चीजों को देखकर और लोगों से राय लेकर खरीदने की सहज मानवीय भारतीय प्रवृत्ति है|भारत जैसे देश में जहाँ ग्रामीण क्षेत्र में लोग कम पढ़े लिखे हैं पर इंटरनेट डाटा की कम कीमतों के कारण मोबाईल इंटरनेट उनकी पहुँच में है |वे ऑनलाईन शॉपिंग या तो करते नहीं या करते वक्त भ्रम की स्थिति में रहते हैं कि किस उत्पाद को खरीदा जाए |उनके लिए यह सुविधा  जहाँ उन्हें ऑनलाईन शॉपिंग प्लेटफोर्म से जोड़ने का एक माध्यम बन सकती है वहीं  ई शॉपिंग कारोबार को और ज्यादा प्रमाणिक एवं सुहाना बना सकती है |तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि प्रायोजित समीक्षाओं के दौर में प्रायोजित वीडियो समीक्षाओं के आने का भी खतरा है जो लोगों के भ्रम को बढ़ा सकता है |  हालाँकि अभी यह कहना कठिन है कि अमेज़न द्वारा उठाये गए इस कदम का इ-कॉमर्स के क्षेत्र में वास्तविक प्रभाव क्या पड़ेगा पर इतना तो तय है कि इससे इस क्षेत्र में हलचल मचना तय है और यह हलचल  उपभोक्ताओं के लिए  कम दामों की सौगात लेकर आएगी|
निवाड़ टाईम्स में 09/05/2018 को प्रकाशित लेख 

बाजार ,दावे और हकीकत

भारत में खाद्य और भोज्य पदार्थ उपभोक्ताओं तक उच्च गुणवत्ता के साथ पहुंचे और उनके अधिकारों का हनन न हो, इसके लिए साल 2006 में फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स एेक्ट पास किया गया, जो खाद्य पदार्थों से जुड़ा हुआ था।इस एेक्ट में यूरोपीय संघ के विनियमन के साथ कई तरह की समानताएं हैं, जो खाद्य पदार्थों के पोषण और स्वास्थ्य दावों से जुड़ी हुई हैं। इस कानून का सीधा उद्देश्य उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों के बारे में प्रामाणिक जानकारी देना है, जिससे वे खाद्य पसंदों के बारे में पर्याप्त रूप से सूचित रहें। जिसका तात्पर्य यह है कि जिन खाद्य पदार्थों का वे सेवन कर रहे हैं। उनके गुण-दोषों से वे भली-भांति परिचित हों। 

भारत खान-पान के मामले में काफी विविधता वाला देश है, पर भोजन में ऐसी बहुत-सी चीजें इस्तेमाल होती हैं, जिनमें काफी चिकित्सकीय गुण होते हैं पर ये चिकित्सकीय गुण काफी भ्रांतियों के भी शिकार होते हैं और इनकी प्रामाणिकता स्थापित नहीं हैं। ऐसा माना जाता है कि केसर अस्थमा, अपच, बदन दर्द, बुखार, शुष्क त्वचा रोग और गर्भावस्था में लाभकारी होता है, वहीं घी याद्दाश्त बढ़ाने से लेकर अपच दूर करने में सहायक होता है। नींबू का अचार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। 

ऐसे सारे दावों के पीछे कोई स्थापित या प्रामाणिक तथ्य नहीं है, बल्कि खानों के बारे में वह गहरी प्रतिबद्धता है, जो यह मानती है कि इन खाद्य पदार्थों में ऐसे औषधीय गुण होते हैं, जो समस्त भौगोलिक क्षेत्रों में सभी आयु, लिंग के व्यक्तियों में समान रूप से फायदा पहुंचाते हैं। भोज्य पदार्थों के औषधीय गुणों के बारे में यह पूर्ववृति इस तरह के खाद्य पदार्थों के व्यवसाय के लिए ऐसे विज्ञापन विकल्प देते हैं, जिनमें अकल्पनीय दावे किए जाते हैं और उपभोक्ता उनको अपना कर जहां एक और ठगी का शिकार होता है, वहीं अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी कर बैठता है।यद्यपि भारत में ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रोत्साहन पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर मिलता है, पर इन सामग्रियों में उपस्थित पोषण और स्वास्थ्य गुण स्वास्थ्य नियामकों के लिए एक चुनौती बन जाते हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एेक्ट उन्हीं खाद्य सामग्रियों को अपने दायरे में लेता है, जिनके स्वास्थ्य और पोषण के बारे में दावे का वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध हो। भारत और दुनिया के अन्य देशों में बहुत से उपभोक्ता स्वास्थ्य और पोषण के लिए अपने पारंपरिक विश्वासों के आधार पर आयुर्वेद द्वारा निर्धारित खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं। इसी कड़ी में पारंपरिक औषधियों को बढ़ावा देने और वैकल्पिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए साल 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना की गई, क्योंकि देश में आयुर्वेद की बहुत गहरी जड़ें हैं, पर इसी का हवाला देकर बहुत-सी कंपनियां दैनिक उपभोग की बहुत-सी वस्तुएं आयुर्वेद के नाम पर बेच रही हैं।
 
आयुर्वेद का बढ़ता व्यावसायिक इस्तेमाल ऐसे भ्रामक विज्ञापनों के जन्म का कारक बन रहा है, जो बगैर किसी वैज्ञानिक आधार के मधुमेह, कैंसर जैसी बीमारियों के दूर करने से लेकर बाल उगाने जैसा दावा करते हुए कई सारे ऐसे दैनिक उपभोग के उत्पाद बेच रहे हैं, जो अगर आयुर्वेद की श्रेणी में न आते, तो वे फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड अथॉरिटी के अंतर्गत आते और यह उनके द्वारा किए जा रहे दावों की जांच पड़ताल कर सकती थी। उपभोक्ता को ठगने से बचाने के लिए सरकार को इस दिशा में सोचने की तुरंत जरूरत है। 
अमर उजाला में 09/05/18 को प्रकाशित 

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