Tuesday, August 14, 2018

भारत से दूर लेकिन जड़ों के पास

हिन्दी में पढने लिखने के कारण मेरा नोबेल पुरस्कार विजेता सर  वी एस नायपॉल से परिचय जरा देर में हुआ |नायपाल की लेखनी से मेरा पहला वास्ता तब पड़ा जब मैं उनकी भारत यात्रा का आधार बना कर लिखी गयी पुस्तक “एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस” का हिन्दी अनुवाद कर रहा था ,तब मैंने उनको पहली बार पढ़ा |जैसे –जैसे किताब का काम आगे बढ़ता गया | मैं उनकी लेखन प्रतिभा का कायल होता गया | फिर मैंने खोज –खोज कर उनकी किताबें पढनी शुरू की |वो चाहे वुंडेड सिवाइलेजेसन जो उनकी भारत को आधार बना कर लिखी गयी एक और किताब थी या हाउस ऑफ़ मिस्टर बिस्वास हो जिसने उन्हें ख्याति दिलाई | यह किताब उनके पिता सीपरसाद नायपाल के जीवन पर आधारित है जो ‘‘त्रिनिदाद गार्जियन’’ में रिपोर्टर के तौर पर भी  काम करते थे। हालांकि यह सभी किताबें हिन्दी अनुवाद थीं पर एक पाठक के तौर पर मुझे जो कुछ अपने लेखक से चाहिए था वो सब उनकी किताबों में मिल रहा था |इंटरनेट के आने से मेरे जैसे हिन्दी के पाठकों को दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य को जानने समझने का मौका मिला |क्योंकि अब हिन्दी में अनुवाद का बाजार विस्तार ले रहा है |मूलत:त्रिनिदाद एंड टोबैगो में जन्मे विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल के पूर्वज गोरखपुर से गिरमिटिया मज़दूर के रुप में त्रिनिदाद पहुंचे थे|भारतीय परिस्थितियों से अलग जहाँ लेखकों को जीविकोपार्जन के लिए कोई अलग व्यवसाय या काम करना पड़ता है |सर  वी एस नायपॉल ने जीवन भर लेखन ही किया है और इसे ही अपनी जीविका का साधन बनाया | एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस” का हिन्दी अनुवाद इसके प्रकाशन से ठीक पचास हुआ पर जब वो भारत 1964 में आये थे तब से लेकर अब  तक उनकी लिखी बातें  आज भी हमें सोचने पर मजबूर कर देती थी कि किसी लेखक को महान उसकी द्र्ष्टि ही बनाती है |उनका भारत को देखने का नजरिया एक आम भारतीय जैसा नहीं था वो भले ही भारतीय मूल के थे पर भारत को देखने के लिए जिस तटस्थता की उम्मीद की जानी चाहिए उन्होंने वो तटस्थता काफी निर्मम तरीके से दिखाई |जैसे वो लिखते हैं “भारतीय हर जगह मल त्याग करते हैं। ज़्यादातर वे रेलवे  की पटरियों को इस कार्य के लिए इस्तेमाल करते हैं। हालांकि वे समुद्र-तटों, पहाड़ों, नदी के किनारों और सड़क को भी इस कार्य के लिए इस्तेमाल करते हैं और कभी  भी आड़ न होने की परवाह नहीं करते हैं|जो नायपाल साहब कई बरस पहले लिख चुके हैं उस वाकये से हम सब आज भी रोज दो चार होते हैं लेकिन यह हमारे लिए कोई समस्या की बात नहीं है क्योंकि हमारा समाजीकरण  इस तरह के द्रश्यों को देखते हुए ही होता है और इसमें हमें कुछ गलत नहीं दिखता |तभी तो सोचिये आजादी के सत्तर साल बाद भी सरकार को  स्वच्छ भारत अभियान चलाना पड़ रहा है | शायद इसी कारण जहाँ नायपॉल के उपन्यासों में भारत को काफी महत्व मिला  लेकिन भारत को लेकर उनका नज़रिया काफी विवादित भी माना जाता रहा | वी एस नायपॉल  अपनी इस किताब के सिलसिले में करीब एक साल तक भारत में रहे और लगभग पूरा भारत जिसमें कश्मीर से लेकर दक्षिण भारत के कई राज्य शामिल थे वहां का हाल उन्होंने अपनी इस किताब में लिखा |मुंबई में उतरते ही जब उनकी विदेशी शराब कस्टम द्वारा जब्त कर ली गयी और उसको दुबारा वापस पाने के लिए उन्हें किस तरह बाबुओं के चक्कर लगाने पड़े |उनकी काम को टालने की आदत जैसी कई घटनाओं को उन्होंने अपनी किताब में समेटा |उन दिनों के कश्मीर के हालात का भी चित्रण बखूबी किया है |

            "बिटवीन फादर एंड सन" वी एस नायपॉल और उनके पिता जी के बीच हुए पत्राचार का संकलन है |जिसमें हमें एक चिंतित पिता की झलक मिलती है जो खुद भी एक अच्छा लेखक था पर परिस्थितियों के कारण अपने लेखन कार्य को जारी न रख पाया |सर  वी एस नायपॉल के पिता जी का इंतकाल उनकी सफलता को देखने से पहले ही  हो गया था | अपने पिता के साथ उनके सम्बन्ध अपने परिवार में सबसे मधुर थे | उनके पिता सीपरसाद नायपाल उन्हें लगातार घर की चिंताओं से मुक्त होकर अपनी पढ़ाई और लेखन कार्य में लगे रहने की सलाह दिया करते थे |इस किताब में सहेजे गए सारे पत्र अपने वक्त के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी हैं पर एक पारिवारिक इंसान होने के नाते मै नायपॉल के अपने पिता के अंतिम संस्कार में न पहुँचने के निर्णय से सहमत नहीं हो पाता हूँ |वे अपनी पढ़ाई के सिलसिले में एक बार जो लन्दन गए फिर वे घर न लौटे |बियोंड बिलीफ भी उनकी एक और प्रसिद्ध किताब रही है जिसमें उन्होंने धर्मान्तरित मुसलमानों के हालात का जायजा लिया और इसके लिए उन्होंने  दुनिया  के कई इस्लामिक देशों का दौरा किया |एक भारतीय के रूप में सर वी एस नायपॉल ने हमें अपने ऊपर गर्व करने का मौका दिया पर उनकी भारत पर लिखी गयी किताबों में एक गुस्सा भी दिखता है कि ये देश ऐसा क्यों है ? अपनी जड़ों की तलाश में वे अपनी पहली भारत यात्रा में पूर्वी उत्तरप्रदेश में स्थित अपने पूर्वजों के गाँव जिसे  वे दुबे का गाँव कहकर संबोधित करते हैं भी गए |जिसका बड़ा रोमांचक वर्णन उन्होंने अपनी किताब “एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस” में किया है |1964 से भारत प्रेम  का यह सिलसिला उनकी मृत्यु तक जारी रहा |आलोचक भले ही उन्हें दक्षिणपंथी साहित्यकार मानते हों पर यह उनकी स्पष्टवादिता ही थी |जो उन्हें अपने समकालीन लेखकों से अलग करती है |वी एस नायपॉल भले ही आज हमारे बीच में न रहे हों पर उनके द्वारा छोडी गयी साहित्य की थाती पाठकों  के ह्रदय  में उन्हें  हमेशा ज़िंदा रखेगी |
दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 14/08/18 को प्रकाशित 

Friday, August 10, 2018

आज भी कायम है टीवी का दबदबा

आधुनिक जनमाध्यमों में इंटरनेट ने बड़े कम समय में अपनी धाक जमाई है और दूसरे जनमाध्यमों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश की है |इसमें टेलीविजन भी शामिल है |ऐसा माना जाने लग गया था कि अब टेलीविजन को हमेशा के लिए इंटरनेट पछाड़ देगा पर आंकड़ों की नजर में फिलहाल ऐसा होता दिख नहीं रहा है |ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल  (BARC)  ने जुलाई 2018 में  जो आंकड़े जारी किये वह यह  बताते है कि 2016 से अबतक भारत में टेलीविज़न के दर्शकों की तादाद में बारह प्रतिशत की बढ़त हुई है |सस्ते होते स्मार्ट फोन इंटरनेट की कम दरें ,अमेजन प्राईम ,नेटफ्लिक्स,हॉटस्टार जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म इंटरनेट टीवी की बढ़त को आसान बना रहे थे लेकिन भारत को महान इसके विरोधाभास बनाते हैं  | वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म शहरों में बड़ी तेजी से लोकप्रिय भी होने लगे हैं क्योंकि वहां एक बड़ा दर्शक तबका था जो पारम्परिक टेलीविजन कार्यक्रमों से उब चुका था |कुछ नए की तलाश में इंटरनेट वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म की शरण में आने लगा |जहाँ उदारीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते चलन ने शहरों में एकल परिवारों की संख्या में इजाफा किया वहीं बढ़ती आय ने टेलीविजन देखने की क्रिया को सामूहिक से एकल बना दिया |शहरों में फ़्लैट संस्कृति ने घरों को डब्बा बना दिया जहाँ ज्यादा टेलीविजन सेट नहीं रखे जा सकते हैं |वहां स्मार्ट फोन पर अपने मनपसन्द कार्यक्रम देखने एक आसान विकल्प के रूप में उभरा |वह वक्त जल्दी ही अतीत की बात हो गया जहाँ पूरा परिवार एक साथ टेलीविजन देखता पर बढ़ते टीवी चैनल और एकल परिवार के बढ़ते चलन ने इस टीवी देखने के सामूहिक कृत्य को एक निजी अनुभव में तब्दील कर दिया और यहीं से इंटरनेट टीवी शहरों में तेजी से आगे बढ़ा पर भारतीयों का टेलीविजन प्रेम अभी भी बरक़रार है |
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल (BARC) के इस शोध अध्ययन  के नतीजे बताते है कि साल 2018  में पिछले दो साल के मुकाबले टेलीविजन सेट की संख्या  में साढ़े सात प्रतिशत की वृद्धि हुई है |इस वक्त भारत में कुल 298 मिलीयन घर हैं जिनमें 197 मिलीयन घरों में टेलीविजन सेट हैं यानि सौ मिलियन घरों में अभी भी टेलीविजन सेट खरीदे जाने की गुंजाईश है |2016 में 183 मिलीयन घरो में टेलीविजन सेट थे |सर्वे यह भी बताता है कि इस दौरान देश में टेलीविजन देखने वाले दर्शकों की संख्या में 7.2 प्रतिशत की भी बढोत्तरी हुई है| साल 2016 में टेलीविजन दर्शकों की संख्या 780 मिलीयन थी जो साल 2108 में बढ़कर 836 मिलीयन हो गयी |
जबकि  इसकी तुलना में भारत का अग्रणी  वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म हॉटस्टार  के पास केवल साठ मिलियन उपभोक्ता हैं| भारत का टीवी दर्शक वर्ग पारिवारिक है  यही कारण है इस की वृद्धि का|ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल  (BARC) का सर्वे यह बताता है कि भारत के  लगभग 66 प्रतिशत भारतीय घरों में टीवी सेट हैं | शहरी भारत में टीवी सेट खरीदे जाने की वृद्धि दर चार प्रतिशत वहीं उल्लेखनीय रूप से गाँवों में यह दर दस प्रतिशत है |टीवी देखने में बिताये  जाने वाले  समय में शहरों में दस प्रतिशत की वृद्धि हुई है वहीं गाँव में यह दर तेरह प्रतिशत है |ट्राई (TRAI) की रिपोर्ट के अनुसार चीन के बाद भारत में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है |जिन्‍हें केबल टीवी सेवा, डीटीएच, आईपीटीवी सहित दूरदर्शन टीवी नेटवर्क सेवायें प्रदान करते हैं।2014-15 में भारत का टेलीविजन उद्योग 4,75,003 करोड़ रूपये का था, जो 2015-16 में बढ़कर 5,42,003 करोड़ रूपये हो गया और इसमें 14.10 प्रतिशत की वृद्धि हुई |विकसित देशों के मुकाबले जहाँ ग्राहकों की संख्या  में औसत रूप से वार्षिक गिरावट देखी जा रही है, लेकिन भारत में टेलीविजन का बाजार में दबदबा बना हुआ है ।इसका एक बड़ा कारण गाँवों में टेलीविजन का बढ़ता विस्तार है ,आजादी के बाद पहली बार गाँव में टीवी सेट के प्रति बढ़ता लगाव इस धारणा को तोड़ रहा है कि टीवी एक शहरी माध्यम है और इसीलिये वहां गाँव और उससे जुडी बातें नहीं दिखती |गाँव में टीवी का बढ़ता चलन निश्चित रूप से टीवी कार्यक्रम निर्माताओं को इस ओर मजबूर करेगा कि वे अपने कंटेंट में गाँवों को प्राथमिकता दें |टीवी पर पशु आहार से सम्बन्धित विज्ञापनॉन का बढना इस ओर जरुर इशारा कर रहा है कि अब टीवी के दर्शक वर्ग में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की जरूरतों को मान्यता मिल रही है |
यह एक बड़ा बदलाव है वैसी भी शहरी टीवी बाजार में धीरे –धीरे स्थिरता आ रही है पर गाँव के बाजार में पर्याप्त गुंजाईश है |वैसे भी भारत का प्राथमिक  टीवी दर्शक वर्ग पारिवारिक है  जो इसकी वृद्धि के लिए उत्तरदायी है |गाँवों में अभी भी शहरों के मुकाबले आपा –धापी कम है और लोग निजता की बजाय सामूहिकता पर जोर देते हैं |शहरी क्षेत्र में टीवी का इंटरनेट से पिछड़ने का कारण इस तर्क से दिया जाता है कि टीवी के  पास कार्यक्रमों की विविधता नहीं है पर यह इलीट शहरी वर्ग की समस्या है ,एक माध्यम के रूप में अभी भी पारिवारिक कहानियां देश के मध्यम वर्ग और ग्रामीण भारत की पहली पसंद बने हुए हैं इसलिए वार्षिक रूप से समस्त जनमाध्यमों से होने वाली विज्ञापनों की आय में पैंतालीस प्रतिशत हिस्सा टीवी विज्ञापनों का ही है |एक सस्ता स्मार्ट फोन अभी भी तीन से चार हजार रुपये से कम नहीं आता और जिसका जीवन काल दो से तीन साल का ही होता है |आर्थिक रूप से एक आम भारतीय का अपने लिए इतना पैसा मनोरंजन पर खर्च करना संभव नहीं है  |वहीं सस्ते एल ई डी टीवी दसहजार से कम रुपये में उपलब्ध हैं जो पूरे परिवार का मनोरंजन कर सकते हैं | इसमें कोई शक नहीं है कि टेलीविजन के लिए इंटरनेट एक बड़ा खतरा बन कर उभर रहा है पर  आज भी एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में एक माध्यम के रूप में टेलीविजन दर्शकों ,विज्ञापन दाताओं की पहली पसंद बना हुआ है |
नवभारत टाईम्स में 10/08/2018 को प्रकाशित लेख 

Wednesday, August 1, 2018

डाटा सुरक्षा की दिशा में बढ़ते सार्थक कदम

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अध्यक्ष आर. एस. शर्मा ने आधार की सुरक्षा का पुख्ता दावा करते हुए अपना आधार नंबर ट्विटर पर  जारी करते हुए कहा था कि अगर इससे सुरक्षा से जुड़ा कोई खतरा है, तो कोई मेरे आंकड़े लीक करके दिखाएं और उनकी इस चुनौती के कुछ घंटे बाद ही उनके आंकड़े ट्विटर पर जारी होने लग गए .बात यहीं नहीं रुकी ट्विटर पर कुछ लोगों ने  उनके  आधार नंबर लिंक्ड पेमेंट सर्विस ऐप्स जैसे भीम और पेटीम के जरिए शर्मा को एक रुपये भेजे जाने के स्क्रीनशॉट भी पोस्ट कर दिए । इस घटना ने भारत में निजी आंकड़ों या डाटा की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर फिर से बहस छिड़ गयी  है क्योंकि जब पूरी दुनिया डिजीटल हो रही  है, ऐसे में डिजीटल आंकड़ों की संप्रभुता को लेकर तमाम तरह की  आशंकाएं भारत में अभी भी  हैं.उल्लेखनीय  कि पूरी दुनिया में प्रोसेस हो रहे आउटसोर्स डाटा का सबसे बड़ा होस्ट भारत है .
 असल में आज का दौर आंकड़ों का दौर है .वो आंकड़े ही हैं  जो सूचनाओं से ज्यादा पुष्ट हैं और इसीलिये जीवन के हर क्षेत्र में इनका महत्त्व बढ़ता जा रहा है .सरकारी योजनाओं में आधार कार्ड की अनिवार्यता ने इस तथ्य को पुष्ट किया है कि सर्कार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति को मिले . मय बदला और तकनीक भी .भारत इस वक्त चीन के बाद दूसरे नम्बर का स्मार्ट फोन धारक देश है और इंटरनेट का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है जिसने सरकारी प्रशासन में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया और  आंकड़ों की उपलब्धता की दिशा में सरकारों ने भी काफी काम किया जिसमें आधार कार्ड भी एक ऐसी ही योजना थी जिसमें देश के सभी नागरिकों एक विशेष नम्बर प्रदान उनके बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने के बाद जिसमें नागरिक का बायोमीट्रिक डाटा भी शामिल है ,दे दिया जाता है और एक नम्बर के दो नागरिक नहीं हो सकते हैं . इस तरह देश के सभी नागरिकों का आंकड़ा संग्रहण कर लिया गया .उधर इंटरनेट के फैलाव  के साथ आंकड़े बहुत महत्वपूर्ण हो उठें .लोगों के बारे में सम्पूर्ण जानकारियां को एकत्र करके बेचा जाना एक व्यवसाय बन चुका है और  इनकी कोई भी कीमत चुकाने के लिए लोग तैयार बैठे हैं .देश में आंकड़ों की सुरक्षा के लिए अभी तक कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है . जैसे ही आप इंटरनेट पर आते हैं आपकी कोई भी जानकारी निजी नहीं रह जाती और इसलिए इंटरनेट पर सेवाएँ देने वाली कम्पनिया अपने ग्राहकों को यह भरोसा जरुर दिलाती हैं कि आपका डाटा गोपनीय रहेगा पर फिर भी आंकड़े लीक होने की सूचनाएं लगातार सुर्खियाँ बनी रहती हैं .
किसी भी ऑनलाइन कम्पनी का विज्ञापन कारोबार तभी तेजी से बढेगा जब उसके पास ग्राहकों की गोपनीय जानकारी हो जिससे वह उनके शौक रूचि आदतों के हिसाब से विज्ञापन दिखा सकेगी वहीं साईबर अपराधियों की निगाह भी ऐसे आंकड़ों पर रहती है,पर ऐसी घटनाएँ न हों और अगर हों तो दोषियों पर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही हो ऐसा कोई भी प्रावधान अभी तक भारतीय संविधान मे नहीं किया गया है .अभी तक ऐसे किसी मामले को निजता के अधिकार के  हनन के तहत देखा जाता है .नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है. किसी नागरिक की आधार सूचना हो या कोई अन्य किस्म की डिजीटल सूचना- उन पर सेंध लगाने की कोशिश  अंततः नागरिक गरिमा ही नहीं, राष्ट्रीय संप्रभुता को भी ठेस पहुंचाएगी. समूचे यूरोप में पच्चीस मई से 'द जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगूलेशन' (जीडीपीआर) नाम का नया क़ानून लागू हो गया है.
 इस कानून का उद्देश्य  आम लोगों को यह जानकारी देना है कि आपका डाटा कौन ले रहा है और उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है.क़ानून के तहत लोगों का निजी डेटा केवल पहले से बताए गए उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा. कंपनियों को यह बताना होगा कि वो डेटा की जानकारी कैसे और क्यों ले रहे हैं. कंपनियों को यूज़र्स का डेटा सुरक्षित करने की ज़रूरत है और अगर उनका डेटा लीक होता है तो उन्हें बताना होगा कि यह उनके लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है.भारत ने इस दिशा में काफी देर से ही एक सार्थक कदम उठाया है .
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी एन श्री कृष्णा की अध्यक्षता में गठित समिति ने पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल का ड्राफ्ट बिल सरकार को सौंप दिया है .इस बिल में “निजी” शब्द को परिभाषित किया गया है.इसके अतिरिक्त इसमें सम्वेदनशील निजी डाटा को बारह  भागों में विभाजित किया गया है.जिसमें पासवर्ड,वित्तीय डाटा,स्वास्थ्य डाटा,अधिकारिक नियोक्ता,सेक्स जीवन,जाति/जनजाति,धार्मिक ,राजनैतिक संबद्धता जैसे क्षेत्र जोड़े गए हैं.इस बिल को अगर संसद बगैर किसी संशोधन के पास कर देती है तो देश के प्रत्येक नागरिक को अपने डाटा पर चार तरह के अधिकार मिल जायेंगे .जिनमें पुष्टिकरण और पहुँच का अधिकार, डाटा को सही करने का अधिकार, डाटा पोर्टेबिलिटी और डाटा को बिसरा देने जैसे अधिकार शामिल हैं .इस समिति की  रिपोर्ट के अनुसार यदि इस बिल का कहीं उल्लंघन होता है तो सभी कम्पनियों और सरकार को स्पष्ट रूप से उन व्यक्तियों को सूचित करना होगा जिनके डाटा की चोरी या लीक हुई है कि चोरी या लीक हुए डाटा की प्रकृति क्या है ,उससे कितने लोग प्रभावित होंगे ,उस चोरी या लीक के क्या परिणाम हो सकते हैं और प्रभावित लोग जिनके डाटा चोरी या लीक हुए हैं वे क्या करें .ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति का डाटा चोरी या लीक हुआ है वह उस कम्पनी से क्षतिपूर्ति की मांग भी कर सकता है .फिलहाल यह बिल संसद की मंजूरी के इन्तजार में है,लेकिन सिर्फ़ कानून के बन जाने से सबकुछ ठीक हो जाए, ऐसा संभव नहीं है. इसके लिए लोगों को भी जागरूक होना होगा.
आई नेक्स्ट /दैनिक जागरण में 01/08/2017  को प्रकाशित 

Saturday, July 14, 2018

जितना चाहो ,देखो और दिखाओ

इंटरनेट की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण बात है इसकी गतिशीलता नया बहुत जल्दी पुराना हो जाता है और नई संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं |सोशल मीडिया प्लेटफोर्म नित नए रूप बदल रहे हैं उसमें नए –नए फीचर्स जोड़े जा रहे हैं |इस सारी कवायद का मतलब ऑडिएंस को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक अपने प्लेटफोर्म से जोड़े रखना |इसका बड़ा कारण इंटरनेट द्वारा पैदा हो रही आय भी है |
जाहिर है इसमें वीडियो एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं |जिसका बड़ा हिस्सा गूगल की एक कम्पनी यूट्यूब जैसी साईट्स से आ रहा है |वहीं फेसबुक की कम्पनी इन्स्टाग्राम धीरे –धीरे एक नयी क्रांति कर रही है और तेजी से युवाओं में लोकप्रिय हो रही है |इंटरनेट की बादशाहत को लेकर जारी यह जंग अब और भी दिलचस्प होने जा रही है |जिसके केंद्र में हैं फेसबुक और गूगल |गूगल जहाँ यूट्यूब के जरिये वीडियो बाजार के एक बड़े हिस्से पर काबिज है |वहीं उसको टक्कर देने के लिए फेसबुक ,इन्स्टाग्राम में नए परिवर्तन कर वीडियो बाजार के इस हिस्से में यूट्यूब इस  की इस बादशाहत को खत्म करना चाह रहा है |
इन्स्टाग्राम यह एक फोटो और विडियो शेयरिंग एप्प है जिसे फेसबुक ने साल 2012 में मात्र एक बिलीयन डॉलर में खरीदा था |आज इसकी कीमत सौ बिलियन डॉलर हो गयी है|ब्लूमबर्ग इंटेलीजेंस रिपोर्ट के अनुसार इन्स्टाग्राम के आज एक बिलियन एक्टिव यूजर हैं जो जल्दी ही दो बिलियन हो जायेंगे और अगले पांच साल में इसके उपभोक्ता फेसबुक के बराबर हो जायेंगे |अन्य सोशल मीडिया साईट्स की तरह इन्स्टाग्राम भी अपना इंटरफेस लगातार बदल रहा है | जैसे कि  फोटोग्राफिक फिल्टर्स, स्टोरीज, छोटे विडियो, ईमोजी, हैशटैग इत्यादि |भविष्य की रणनीति को ध्यान में रखते हुए इन्स्टाग्राम ने एक नई शुरुआत की है |वह है आई जी टीवी इसके  ज़रिये कोई भी यूजर एक घंटे तक का लंबा विडियो अपलोड कर सकता है | लंबे विडियो का मतलब है कि यूजर ज्यादा समय तक इन्स्टाग्राम   पर रहेगा| जाहिर है यह लक्ष्य  आर्थिक एवं व्यवसायिक दृष्टिकोण से हर एप्प बनाने वाली कंपनी हासिल करना चाहती है | इसका सीधा फायदा फेसबुक को भी मिलेगा |अभी तक लोग यूटयूब के अपने वीडियो फेसबुक के प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करते हुए उसे लोकप्रिय बनाते थे और उन वीडियो को देखने के लिए उपभोक्ता फेसबुक को छोड़कर यूटयूब के प्लेटफोर्म पर चले जाते थे ,जिससे फेसबुक को ज्यादा लाभ नहीं होता था | तस्वीर का एक रुख यह भी है कि इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर, स्नैपचैट और यूट्यूब इत्यादि जैसे आनलाइन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बढ़ने के साथ व्यवसायिक कंपनियों का रुख सीधे विज्ञापन की बजाय   इंफ्लुएंशर मार्केटिंग की ओर बदला है. जेम्फो इंडिया इंफ्लूएंस रिपोर्ट 2018 इंफ्लूएंसर इन्साइट्स एडिशन (आईआईई) अनुसार,भारत में युवाओं पर करीब अस्सी प्रतिशत  तक प्रभाव इंस्टाग्राम से डाला जाता है या फिर इसकी संभवाना है. यह आंकड़े फेसबुक और ट्विटर द्वारा डाले जाने वाले प्रभाव से बहुत ज्यादा हैं|. इस सर्वे के अनुसार, सबसे तेजी से बढ़ते सोशल मीडिया चैनल में इंस्टाग्राम (अस्सी प्रतिशत ), ट्विटर (छप्पन प्रतिशत), फेसबुक (बावन प्रतिशत), यूट्यूब (छियालीस प्रतिशत)और व्हाट्सएप (बत्तीस प्रतिशत) है|इन्स्टा की यह लोकप्रियता उसके नए वीडियो प्लेटफ़ॉर्म को लोकप्रिय बनाने में काम आ सकती है| 
लेकिन आईजीटीवी यूटयूब को टक्कर दे सकता हैं क्योंकि इन कुछ सालों में इन्स्टाग्राम  की लोकप्रियता में तेज़ी से उछाल आया है और लोग इन्स्टाग्राम  के वीडियो फेसबुक पर शेयर करेंगे तो ऑडिएंस फेसबुक की अपनी कम्पनी के प्लेटफ़ॉर्म पर ही रहेगी न कि प्रतिद्वंदी कम्पनी गूगल के प्लेटफ़ॉर्म यूट्यूब पर |
एक और ख़ास बात इन्स्टाग्राम के आईजी टीवी के विडियो लम्बवत (वर्टीकल) ही रहेंगे इससे उपभोक्ता को अपना  मोबाइल घुमाने की ज़रूरत नहीं होगी जैसा कि यूटयूब के वीडियो देखते वक्त करना पड़ता है | लेकिन गूगल द्वारा चलायी जाने वाली वीडियो  सर्विस यूटयूब के सक्रिय  दर्शक  की संख्या हर माह  1.9 बिलियन है | उपभोक्ताओं के हिसाब से आज की तारीख़ में यूटयूब का विस्तार इन्स्टाग्राम  से दो गुना है लेकिन फेसबुक  द्वारा संचालित यह सेवा  लंबे वीडियो  के क्षेत्र  में यूटयूब के विज्ञापन बाजार  को कड़ी टक्कर दे सकता है| हालाँकि इन्स्टाग्राम  के लंबे विडियो वाले प्लेटफार्म को  अभी बहुत सारी चुनौतियों  का सामना करना पड़ेगा जैसे कि कंटेंट बनाने वालों के साथ रेवेन्यू मॉडल का ढांचा तय करना, बीडियो के निर्माता और दर्शकों  दोनों को बांधे रखना |नए दर्शकों को एक दूसरे  से जोड़ना जैसी आवश्यक चीजें शामिल हैं| यूटयूब कंटेंट बनाने वालो के साथ रेवेन्यू  सीधे साझा करता है जिससे सफल वीडियो क्रिएटर की कमाई लगभग १०००० डॉलर हर महीने की हो जाती है और कुछ प्रसिद्ध क्रिएटर १००००० डॉलर तक भी अपने वीडियो से कमा रहे हैं | इन्स्टाग्राम  की नीति अभी  इस संदर्भ  में स्पष्ट नहीं  है | इन्स्टाग्राम में ज्यादा फालोवर रखने वाले लोग इंफ्लुएंशर मार्केटिंग से पैसा कमा रहे हैं जिसमें कम्पनियां सीधे ऐसे लोगों को अपना उत्पाद या धन देती हैं |जिनके पास ज्यादा फालोवर हैं उन्हें इन्स्टाग्राम सीधे कोई धन नहीं देता है  |दूसरी सबसे अहम् चुनौती है आईजीटीवी प्लेटफ़ॉर्म को कैसे साफ़ सुथरा रखा जाए | अश्लील और आहत करने वाले विडियो पर लगाम कैसे लगायी जाए |यूट्यूब की इस मामले में स्थिति बड़ी स्पष्ट है |वे कॉपी राईट उल्लघन करने वाले वीडियो को तुरंत हटाते हैं इसके अलावा हिंसा और अश्लीलता फैलाने वाले वीडियो पर भी उनका रुख कड़ा रहता है |उनकी पूरी टीम इस मामले में काफी संवेदनशील है |वहीं दूसरी तरफ बहुत सारे यूटयूबर्स ने इन्स्टाग्राम में अपने अकाउंट बना लिया है लेकिन  उन लोगों ने यूटयूब का साथ अभी नहीं छोड़ा है |फेसबुक और गूगल में छिड़ी वर्चस्व की इस जंग में फायदा उपभोक्ताओं को मिलेगा  जिन्हें अपनी क्रिएटिविटी दिखाने और लोगों से जुड़ने के मौके नए फीचर्स के साथ मिलेंगे |
नवभारत टाईम्स में 14/07/18 को प्रकाशित 

Tuesday, July 3, 2018

तेरा चेहरा कितना सुहाना

हमारी जवानी के दिनों में एक गाना बहुत हिट हुआ था.  फिल्म सलामी का “चेहरा क्या देखते हो दिल में उतर कर देखो न” , बात एकदम खरी है. दिल और चेहरे का एकदम सीधा सम्बन्ध है. “लाख छुपाओ छुप न सकेगा राज हो कितना गहरा दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा”. ये भी एक फिल्म का ही गाना है पर इसमें कितना बड़ा फलसफा छुपा हुआ है  . बात चेहरे की चल रही है तो मेरी एक अजीब आदत है भीड़भाड़ में, सेमिनार में, ट्रेन की यात्राओं में मैं चेहरे मिलाया करता हूँ  .अगर किसी अपरिचित का चेहरा अपने किसी परिचित से मिलता-जुलता हुआ तो मैं गिनने लगता हूँ कि दोनों की क्या-क्या अदाएं मिलती-जुलती हैं. ऐसे न जाने कितने अपरिचितों से कभी बात करने की हिम्मत तो नहीं हुई, लेकिन मुझे एक बात तो समझ में जरुर आ गयी  कि हर चेहरा कुछ कहता है .रोज़ हम न जाने कितने चेहरे देखते हैं लेकिन कभी गौर नहीं करते असल में चेहरा हमारे व्यक्तित्व   का आइना होता है और हर चेहरा बहुत कुछ कहता है लेकिन अगर  हम समझना चाहें तो .
            चेहरे से ही हमारी सोच और देहभाषा  का पता चलता है मतलब कि परदे के पीछे क्या चल रहा है .डर से चेहरा काला पड़ जाता है गुस्से में चेहरा लाल हो जाता है ,शर्म से चेहरा गुलाबी हो जाता है और बीमारी में चेहरा पीला पड़ जाता है. ये तो चेहरे के रंग हैं जो जिन्दगी की हलचल को बताते हैं. पर ये रंग जो चेहरे पर दिखते हैं वह वास्तविकता में हमारे दिल की भावनाएं होती हैं जो चेहरे पर दिखती हैं . हम अगर अन्दर से अच्छा महसूस कर रहे हैं तो चेहरे पर वो खुशी दिखेगी अगर दुखी हैं तो चेहरा भावहीन  दिखेगा. चेहरे को अच्छा रखना है तो दिमाग को अच्छा रखना बहुत जरूरी है . दिमाग को अच्छा रखने का एक मात्र तरीका है कि अपना दिमाग हमेशा खुला रखा जाए और नए विचारों का स्वागत किया जाए .चेहरे की खूबसूरती का राज़ किसी फेयर नेस क्रीम में नहीं है बल्कि विचारों के खुलेपन  मे है . क्योंकि विचार ही तो हमारी आपकी सोच बनाते हैं और सोच ही आम इंसान को खास बनाती है और अगर आप ऐसा कर पाए तो लोग यही कहेंगे न तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती .
                     इस छोटे से दिमाग को अगर हम अपनी सकारात्मक सोच से  खुला रखेंगे तो किसी का भी  चेहरा निखरेगा ही  .जिन्दगी में लाख दुःख हैं. पीड़ा और चिंताएँ हैं फ़िर भी जिन्दगी खूबसूरत तो है ही न, हर एक के पास जिन्दगी को जीने के अपने कारण हैं .सोचिये की आपका कौन सा काम किसी के चेहरे पर मुस्कान सजा सकता है .किसी को खुश कर सकता है .उस काम की तलाश कीजिये और जिन्दगी को खूबसूरत बनाइये.तो आज से ही उस काम की तलाश में लग जाइये और फ़िर देखिये आपका चेहरा भी कैसे दमकेगा .चेहरे की खूबसूरती का राज हमारे पास ही है ख़ुद खुश रहिये और दूसरों को खुश रखिये .जब आप ऐसा करेंगे तो लोग अनायास आपको देख के कह उठेंगे “तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है”.
प्रभात खबर में 03/07/2018 को प्रकाशित 

Monday, July 2, 2018

लन्दन की तरह हमें भी इतिहास को सहेजने की जरुरत

थेम्स नदी न तो किसी की माँ है न ये किसी को बुलाती है और न ही लोग इसकी पूजा करते हैं ।मैं तीन घण्टे मैं इस नदी के किनारे चक्कर लगाता रहा न कोई प्लास्टिक न कोई कूड़ा सिर्फ मिला तो उल्लासित जीवन हंसते मुस्कुराते लोग ।ये देश हमसे इतना आगे क्यों है ?इनका एक रुपया पढ़ें पाउण्ड हमारे 93 रुपये के बराबर है और ये हमसे वाकई सौ गुना आगे हैं | इतवार के दिन  लंदन के सारे चर्च खाली थे सदियों पहले चर्च राजकाज से बाहर हो गए थे या कर दिए गए थे ।यहां के चर्च सूने पड़े हैं आने वालों में सैलानी ज्यादा हैं भक्त कम । कुछ भी हो पर भीड़ थी यहां के म्यूजियम में तैंतीस एकड़ में फैले चिड़िया घर और खूब सारे पार्क में जहां स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता है वहीं विज्ञान का साथ भी ।धर्म अब निजी नहीं नितांत व्यक्तिगत मामला हो गया है ।खैर दुनिया भर के लोगों के बीच घूमते हुए एक आज एक और इच्छा पूरी हो गई अपने जासूसी नायक शरलॉक होम्स के घर को देखने की 221B Beker Street  ।अब हम निकले कैम्ब्रिज शहर की ओर दुनिया के किसी कोने में अगर आप किसी भी पढ़े लिखे इंसान से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बारे में पूछेंगे तो वो इस जगह की महानता से परिचित होगा बस शिक्षा की दुनिया के ऐसे तीर्थ पर हम भी सज़दा करने आ गए ।ऐसी जगह पर मेरे मेजबान एक ऐसे दोस्त थे जिसने करीब दस साल पहले भारत की नागरिकता छोड़ कर ब्रिटेन की नागरिकता ले ली थी एक ऐसा परिवार जहां के बच्चे हिंदी ब्रिटिश एक्सेंट में बात करते हैं और माता पिता खालिस देशी ,केम्ब्रिज विश्वविद्यालय देखकर इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है वो देश जिसने शिक्षा में निवेश नहीं किया वो.......? लंदन दो हजार साल पुराना शहर है ।इस शहर में न जाने कैसे कैसे संग्रहालय और स्मारक हैं नर्सिंग संग्रहालय ,उद्यान संग्रहालय ,युद्ध संग्रहालय दुनिया भर की दुर्लभ पेंटिंग्स का संग्रह और तो और विश्वयुद्ध में मारे गए जानवरों के लिए भी स्मारक ।यह शहर अपने इतिहास पर गर्व तो जरूर करता है पर इतिहास में हुई गलतियों से सीखता भी है और ये संग्रहालय स्मारक आदि उसी का नमूना हैं जो इसे याद दिलाते हैं कि यह कहाँ से चला और अब इसे कहाँ जाना है ।हम भारतीय अपने इतिहास पर सिर्फ गर्व करते है पर न तो उसस कुछ सीखते हैं और न ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजते हैं जिससे आने वाला कल बेहतर हो शायद इसीलिए एक पाउण्ड 94 रुपये का है |लंदन में  मुझे बर्मा ,अफगानिस्तान ,पाकिस्तान ,केन्या और एयरपोर्ट पर हिंदुस्तानी भी मिले जिन्होंने वर्षों पहले अपने देश को छोड़ दिया था जहां अंग्रेज कभी राज करते थे ।सबको फिलहाल न तो अंग्रेजों से कोई परेशानी है और न ही इस देश से आधे तो ठीक से अंग्रेजी भी न बोल पाते हैं पर ज़्यादातर सस्ती दुकाने प्रवासी ही सम्हाले हुए हैं ।सबका मानना है ये देश जब उन्हें अपना लेता है तो इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उनकी चमड़ी का रंग क्या है या वो किस जबान में बात करते हैं वो बस इस देश के नागरिक हैं और यह देश अपने नागरिकों के साथ हमेशा खड़ा है ।चलते चलते यहां मुझे सड़कों पर अंग्रेजी कम सुनाई पड़ी और दुनिया भर की न जाने कितनी बोलियां जिनमें से ज्यादातर को मैं नहीं जानता था ज्यादा सुनाई पड़ी।मुझे भारत याद आ रहा था ।विदा लंदन मैं फिर लौटूंगा।
अमर उजाला लखनऊ में 02/07/2018को प्रकाशित 









Friday, June 29, 2018

डिजीटल प्लेटफोर्म की बढ़ती धमक

यह दिलचस्प बदलाओं का दौर है  और कलात्मक   अर्थों में बदलाव के कई नए संदर्भ भी उभर रहे हैं |जिनमें कलाएं भी शामिल हैं और इन  परिवर्तन के लिए जो चीज सबसे बड़े उत्प्रेरक के रूप में काम कर रही है वह है इंटरनेट, जिसने पहले हमारे खरीदने ,पहनने से असर डालना शुरू किया फिर ये सिलसिला खाने पीने से लेकर मुद्रा से होते हुए  शादी विवाह  तक पहुँच गया  है |इंटरनेट ने लोक व लोकाचार के तरीकों को काफी हद तक बदल दिया है। बहुत-सी परंपराएं और बहत सारे रिवाज अब अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह प्रक्रिया इतनी तेज है कि नया बहुत जल्दी पुराना हो जा रहा है।हर जगह डिजीटल की धूम है |इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो ली, अब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है।यानि ये है हमारे समाज पर पड़ने वाला  डिजीटल इफेक्ट जो अब कलाओं के माध्यमों  तक आ पहुंचा है| वह कला ही है जिसमें मानव मन में संवेदनाएँ उभारने, प्रवृत्तियों को ढालने तथा चिंतन को मोड़ने, अभिरुचि को दिशा देने की अद्भुत क्षमता होती  है। सिनेमा एक कला है या नहीं इस पर बहस हो सकती है पर एक विद्या के रूप में सिनेमा नाटक के गर्भ  से ही पैदा हुआ है| नाटक हो या सिनेमा इसको देखने की सही जगह थियेटर या सिनेमा हाल ही मानी जाती रही है |सिनेमा में कांस फिल्म महोत्सव का अपना अलग महत्व है जहाँ फ़्रांस के कांस शहर में दुनिया भर के फिल्म निर्माण से जुड़े हुए लोग शामिल होते हैं और फिल्मों का प्रदर्शन भी होता ,श्रेष्ठ फिल्मों को पुरूस्कार भी दिए जाते हैं पर इस बार कांस फिल्म महोत्सव एक नए तरह के विवाद के केंद्र में आ गया |इस साल नेटफ्लिक्स की फिल्मों को कान्स के समारोह में शामिल नहीं किया गया है| नेटफ्लिक्स पिछले कुछ सालों में ऑनलाईन फिल्म  स्ट्रीमिंग के क्षेत्र में एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभरा है जिसकी फिल्मों के दर्शक सारी दुनिया में हैं | नेटफ्लिक्स की  फ़िल्में किसी सिनेमा थियेटर में रिलीज होने की बजाय सीधे इंटरनेट पर रिलीज होती हैं और दुनिया के किसी कोने में बैठे हुए कोई भी व्यक्ति नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन लेकर उसकी फिल्मों का दर्शक हो सकता है वैसे नेटफ्लिक्स अपनी कुछ फिल्मों को अमेरिका के चुनिन्दा सिनेमाघरों में भी रिलीज करता है लेकिन उनकी संख्या सीमित हैं  | कांस फिल्म समारोह का हिस्सा बनने के लिए किसी भी फिल्म का थियेटर में प्रदर्शित होना जरुरी है |ऐसा ही नियम ऑस्कर पुरूस्कार के लिए भी लागू होता है पर कांस में सिनेमा थियेटर में रिलीज होने के  तीन साल बाद ही कोई भी निर्माता उसे इंटरनेट के विभिन्न प्लेटफोर्म में जारी कर सकता है | नेटफ्लिक्स इसी शर्त को पूरा नहीं कर पा रहा था इसलिए उसने अपनी फ़िल्में कांस से वापस ले लीं | नेटफ्लिक्स के इस फैसले ने सिनेमा के भविष्य पर एक नयी बहस छेड़ दी वहीं एक जन माध्यम के रूप में इंटरनेट पहली बार किसी जन माध्यम से सीधे तौर पर टकरा रहा है |अन्यथा या तो जन माध्यमों ने इंटरनेट के लिए जगह छोड़ दी या समय की मांग के हिसाब से  अपने आप को ढाल लिया  | नेटफ्लिक्स ने कई बड़े फिल्म निर्माताओं के साथ बड़े बजट की फिल्मों पर निवेश किया है| कई दूसरी कंपनियां नेटफ्लिक्स की तरह ही फिल्में सीधा डिजीटल प्लेटफार्म पर रिलीज कर रही हैं| जिनमें अमेजन का नाम उल्लेखनीय है |सवाल यह है कि माध्यम ज्यादा महत्वपूर्ण है या उसकी पहुँच,फिल्मों को बनाने के पीछे पैसे बनाने के अलावा सबसे बाद उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुँच है और किसी भी निर्माता को कलात्मक संतुष्टि तभी मिलती है जब वह ज्यादा से ज्यादा दर्शक जोड़े |हर फिल्म एक विचार पर आधारित होती है फिर वह चाहे थिएटर पर दिखाई जाए या किसी डिजिटल प्लेटफार्म पर महज सिनेमा थियेटर में रिलीज कर देने से कोई घटिया फिल्म अच्छी नहीं हो सकती और वहीं डिजीटल प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज हुई फिल्म में किसी तरह की कोई कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं ऐसा विचार समाज में कलाओं के विस्तार में बाधा ही बनेगा |उपभोक्ता नेटफ्लिक्स के बढ़िया कंटेंट की वजह से ही सब्सक्रिप्शन शुल्क  देने को भी तैयार हैं और  नेटफ्लिक्स का बढ़ता विस्तार यह बताता है कि लोग उसकी फ़िल्में ,धारावाहिक पसंद कर रहे हैं |फ्रांस कलाओं के विस्तार का एक बड़ा केंद्र रहा है पर कांस फिल्म  महोत्सव का यह रवैया बताता है कि सिनेमा से जुड़े लोग डिजीटल प्लेटफ़ॉर्म पर सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं जबकि चोरी चुपके डिजीटल तकनीक सिनेमा निर्माण के हर हिस्से में घुस चुकी है वो चाहे सम्पादन का क्षेत्र हो या सिनेमा में  मल्टीकैम सेटअप का प्रयोग |वहीं परम्परागत  सिनेमा के समर्थको का मानना है कि थियेटर  में सिनेमा को देखना एक नए अनुभव से दर्शक का साक्षत्कार कराता है जब वह मानसिक   रूप से उस कला को  समझने और डूबने आता है यह अचानक नहीं होता वह सोच समझकर अपनी दिनचर्या में सिनेमा के लिए जगह बनाता है  |यह डिजीटल प्लेटफोर्म के उस सिनेमा के अनुभव से एकदम अलग होता है जब दर्शक ट्रेन में यात्रा करते ,किसी का इन्तजार करते,किश्तों में सिनेमा की कला को  अपने परिवेश की सीमाओं के साथ किसी फिल्म को देखता है |इस अनुभव में सिनेमा देखना बस किसी काम निपटाने जैसा ज्यादा होता बनस्बत सिनेमा के उस जादुई एहसास के जो हम सिनेमा हाल में महसूस करते हैं |इसमें से कौन सा माध्यम भविष्य में जीतेगा इसका फैसला अभी होना है पर यह तो तय है कि इंटरनेट एक माध्यम के तौर पर सिनेमा को सीधे तौर पर चुनौती देना शुरू कर चुका है |     
आई नेक्स्ट /दैनिक जागरण में 29/06/ 2018 को प्रकाशित      

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