Wednesday, February 26, 2014

खबर पाने के तरीके को बदलता इंटरनेट

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में कहा है कि ऑनलाइन स्कोर और क्रिकेट से संबंधित सूचनाएं इंटरनेट पर टीवी लाइव प्रसारण के 15 मिनट बाद ही अपडेट की जाएंगी। यह फैसला इंटरनेट के मौजूदा दौर में टीवी कंपनियों में पैदा हुई असुरक्षा की बानगी भर है।मैच के प्रसारण का अधिकार खरीदने वाली इन टीवी कंपनियों ने इंटरनेट पर लाइव अपडेट के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। खेल ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समाचारों के कंटेंट और विविधता की दौड़ में भी पिछड़ता जा रहा है।इंटरनेट के आने से सूचना संप्रेषण की गति कई गुना बढ़ गई है। पिछले एक दशक में लाइव समाचार ब्लॉग, समाचार वेबसाइट, व्यक्तिगत ब्लॉग वगैरह की संख्या, और साख जिस तेजी से बढ़ी है, उसका सीधा असर 24 घंटे के समाचार चैनलों पर पड़ रहा है। भारत में 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान इन समाचार चैनलों की जो शुरुआत हुई थी, अगले दो दशकों तक इनकी उपयोगिता को कोई सीधी चुनौती नहीं मिली। पर इंटरनेट के विकास और बढ़ती पहुंच ने इन लाइव समाचार चैनलों की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया है।
         तहरीर चौक पर हुई विशाल क्रांति की तस्वीरें, लाइव समाचार और निजी ब्लॉग जिस तेजी से दुनिया भर के लोगों तक पहुंचे, वह सभी के लिए अभूतपूर्व अनुभव था। वर्ष 2012 में लगभग 80 लाख लोगों ने फेलिक्स बोमगर्टनेर की अंतरिक्ष से छलांग को यू-ट्यूब पर लाइव देखा। पिछले कुछ वर्षों में मीडिया परिदृश्य में ऐसे अनगिनत बदलाव आए हैं।पारंपरिक खबरिया चैनलों के सामने अनगिनत चुनौतियां हैं। पहली है पूंजी की समस्या, जहां एक औसत खबरिया चैनल को चलाने के लिए करोड़ों रुपये और ढेर सारे कर्मचारियों की आवश्यकता होती है, वहीं लाइव न्यूज ब्लॉग को कोई व्यक्ति अकेले सिर्फ अपने लैपटॉप या यहां तक कि मोबाइल फोन की मदद से बहुत कम खर्च में चला सकता है। माइक्रो-ब्लॉगिंग वेबसाइटें जैसे ट्विटर और किसी घटना विशेष की पल-पल की खबर देने वाले लाइव ब्लॉग जिस गति से खबरें और उन पर टिप्पणियां लोगों तक पहुंचा रहे हैं, 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल तो उसके आस-पास भी नहीं ठहरते हैं।दूसरी चुनौती यह है कि लगातार प्रसारण इन चैनलों की मजबूरी होती है और अगर ताजा खबर न हो या किसी खबर का इंतजार हो रहा हो, तो उन्हें दर्शक को बांधे रखने के लिए बेवजह समय बिताना पडम्ता। खबरिया चैनलों की बहुत सारी बातचीत अक्सर बेमतलब और उबाऊ हो जाती है। खासकर दिन के समय दफ्तरों में काम कर रहे लोगों के पास खबर पाने का तरीका टीवी न होकर उनका कंप्यूटर या मोबाइल फोन ही होता है। इस सबके बावजूद समाचार चैनल खत्म हो रहे हैं, ऐसा अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन लोगों को उनका विकल्प मिल रहा है, और लोग आगे बढ़कर उसे अपना भी रहे हैं।
हिंदुस्तान में 26/02/14 को प्रकाशित 

Friday, February 7, 2014

गर्मी के नाम जाड़े की प्रेम भरी पाती

प्यारी गर्मी
फिजाओं में प्यार है शायद ये तुम्हारे आने का असर है कि बर्फ पिघल रही है और रिश्तों के साथ साथ मौसम में भी गर्मी आ रही है तुम भी सोच रही होगी कि आज अचानक इतने दिन के बाद मैं तुम्हें चिठी क्यूँ लिख रहा हूँ.तुम ये तो जानती हो कि मैं ज्यादा बोल नहीं पाता इसलिए लोग मुझे जाड़ा कहते हैं मेरा नेचर ठंडा है पर मैं लोगों को गर्मी की अहमियत समझाता हूँ कि तुम मेरे लिए खास हो  बस तो मैंने सोचा अपने दिल  की भावनाओं को लिख कर तुम्हें बताऊँ जिससे जब तुम आओ तो लोग तुमको वो इज्ज़त दें जिसकी तुम हकदार हो. वैसे भी तुमको गुस्सा जल्दी आता है आये भी क्यूँ न तुम तो गर्मी हो पर तुम खास हो मेरे लिए अब देखो न जब सारी दुनिया वेलेन्टाईन डे यानि प्यार का दिन मनाती है तब न पूरी तुम होती हो न पर लोग कितना एन्जॉय करते हैं तो तुम ये तो मानोगी कि हमारी तुम्हारी जोड़ी भले ही थोड़े समय के लिए बने पर होती गज़ब की है.मुश्किल तो यही है तुम मेरी बात मानती कहाँ हो.तुम्हारे आने की आहट मिलते ही लोग जश्न मनाने की तैयारी करने लग गए पर मेरी प्यारी गर्मी इस जश्न को देख कर ये मत समझ लेना कि लोग तुम्हें ज्यादा पसंद करते हैं क्यूंकि तुम जैसे जैसे बढ़ोगी लोग तुम्हारे जाने का इन्तजार करने लग जायेंगे यही तो जीवन का खेल है जो आया है वो जाएगा पर मेरा तुम्हारा रिश्ता अनोखा है.हम बार बार जायेंगे लेकिन आने के लिए तो जब तुम आओगी मैं जा चुका हूँगा पर मैं फिर आऊंगा ये वादा रहा.अब मैं तो रहूँगा नहीं तुम्हें सम्हालने के लिए तो इस बात का ख्याल रखना कि रिश्ते ऐसे बनाना जिसमें गए हुए लोगों के आने की गुंजाईश रहे और तुम अगर ऐसा नहीं कर पायी तो समझ लेना तुमने जिंदगी से कुछ नहीं सिखा और रिश्ते मतलब से बनाये.कोई तुमको मतलबी कहेगा तो मुझे बहुत बुरा लगेगा. तुम गुस्सा हो कर अक्सर कहा करती थी कि किसी के आने जाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैं जी लूंगी अपनी जिंदगी पर मेरी प्यारी गर्मी तुम मानो या न मानो पर लोगों के आने जाने से फर्क जरुर पड़ता है.मैं जा तो रहा हूँ पर बड़े भारी मन से.काश ये काश मेरे जीवन का सच है.अब देखो न मैं और तुम कभी नहीं मिल पाते हैं जब तक मैं अपने जाड़े होने पर इतराता रहता हूँ और तुम अपनी गर्मी को अपनी ताकत मानती रहती हो पर जब ये मैं हम बन जाता है तो वेदर कितना खूबसूरत हो जाता है. थोडा मेरा और थोडा तुम्हारा तो बन गया न हमारा.मेरी सुबह सुहानी होती है तो तुम्हारी शाम पर जब बसंत आता है तो पूरा दिन वंडरफुल हो जाता है.मुझे पता है कि तुम्हें मेरी लंबी चिठ्ठी बोर करती है कितना लड़ते थे तुम मेरे लंबे खर्रे से.अच्छा सुनो न... कितना कुछ हमारे तुम्हारे बीच में हमेशा अनकहा रह जाता है.हमें एक दूसरे के साथ कभी फेस टू फेस बात करने का मौका ही नहीं मिलता तो कम्युनिकेशन गैप से कहीं तुम किसी गलतफहमी का शिकार न हो जाओ इसलिए मुझे चिठ्ठी लिखनी पडी जिससे मैं तुम्हें अपनी फीलिंग बता सकूँ, तुम गर्मी हो ये तुम्हारा नेचर है और मैं जाड़ा मेरे मौसम में लोग तुम्हें मिस करते हैं और तुम्हारे मौसम में मुझे हमारी यही डेस्टनी है हम एक दूसरे को हमेशा मिस ही करते रहेंगे. तुम्हारे जीवन में बहुत से लोग आयेंगे पर जाड़े की वो शाम नहीं आयेगी.मेरे जीवन में बहुत सी सुबह आयेंगी पर वैसी सुबह नहीं आयेगी और हम दोनों बस याद ही करेंगे.हम भले ही अलग अलग हों और कभी भी मिल न पायें पर क्या कभी तुमने सोचा कि कितना कुछ कॉमन है हमारे बीच में ज्यादा ठण्ड में लोग अपनी पूरी बॉडी को कवर करते हैं खासकर सिर और जब ज्यादा गर्मी पड़ती तो भी लोग सबसे पहले सिर ही ढकते हैं.आईसक्रीम स्वाद में ठंडी होती है पर उसकी तासीर गर्म होती है इसलिए जाड़ा हो या गर्मी लोग दोनों मौसम में इसे एन्जॉय करते हैं.जाड़ा और गर्मी तभी बढ़ती है जब हवाएं चलती हैं गर्मी में वही हवा लू बन जाती है तो जाड़े में शीत लहर.मौसम कैसा भी हो जिंदगी तो चलती रहती है हम भले ही कभी नहीं मिल पाते पर हमारे कारण ही लोगों को जीवन के मायने मिलते हैं.फिलहाल चलता हूँ पर इतना विश्वास दिलाता हूँ मैं कहीं भी रहूँ तुम्हें हमेशा याद करता रहूँगा.
विदा
सिर्फ तुम्हारा जाड़ा
आई नेक्स्ट में 7/02/14 को प्रकाशित 


Wednesday, January 29, 2014

रवैया बदले, तो चले ई-गवर्नेंस की गाड़ी

मोबाइल एप्लीकेशंस यानी ऐप्स की दुनिया में भारत सरकार काफी देर से आई है, लेकिन वह कितने दुरुस्त ढंग से आई है, यह समझने के लिए शायद अभी थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है। पिछले कुछ समय में ढेर सारे सरकारी विभागों, संस्थाओं और कंपनियों के मोबाइल एप्स लांच हुए हैं। केंद्र सरकार ही नहीं, कई राज्यों की सरकारें भी इस दिशा में बढ़ रही हैं। इस मामले में रेलवे और डाक विभाग के ऐप्स महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। केंद्र सरकार ने सौ से ज्यादा विभागों में मोबाइल गवर्नेंस पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। जहां तक ऐप्स का मामला है, तो इनके डाउनलोड और उपयोग वगैरह के आधिकारिक आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह चलन इतना तो बताता ही है कि इस मामले में गंभीरता आई है |भारत के लिए यह रास्ता महत्वपूर्ण इसलिए हो सकता है  कि मोबाइल हैंडसेट अकेला ऐसा माध्यम है, जिससे देश की आबादी के एक बड़े हिस्से तक पहुंचा जा सकता है। यह अकेला ऐसा माध्यम है, जो शहरों और कस्बों की सीमा लांघता हुआ तेजी से दूरदराज के गांवों तक पहुंच गया है। इसके साथ ही देश में कंप्यूटर के मुकाबले मोबाइल पर इंटरनेट सुविधा हासिल करने वालों की संख्या भी बढ़ चुकी है। लोगों के लिए तो यह कई तरह की सुविधाएं हासिल करने का महत्वपूर्ण माध्यम है ही, साथ ही सरकार के लिए भी यह महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इससे बहुत सी योजनाओं के वास्तविक कार्यान्वन पर नजर रखी जा सकती है। कई मामलों में नौकरशाही की बाधाओं को भी कम किया जा सकता है।इसे लेकर पिछले कुछ समय में देश में कई तरह के प्रयोग हुए हैं, जो काफी उम्मीद बंधाते हैं। खासकर रेलवे आरक्षण को लेकर जो प्रयोग हुए हैं। देश में ई-कॉमर्स को विस्तार देने और इसमें लोगों का भरोसा कायम करने का श्रेय भारतीय रेलवे को जाता है। इससे कुछ हद तक व्यवस्था में पारदर्शिता भी आई है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण काम हुआ है एसएमएस टिकटिंग का। रेलवे ने एसएमएस को रेल टिकट की मान्यता देकर कागज के अनावश्यक इस्तेमाल से मुक्ति का रास्ता तैयार किया। यह जरूर है कि दूसरे विभागों ने इस सिलसिले को इतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ाया।सरकारी विभागों के ऐप्स की निर्भरता बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वह आम जनता के लिए कितने उपयोगी साबित होते हैं। हम यह उम्मीद तो करते हैं कि लोगों को इन सब तरीकों से नौकरशाही की बाधाओं से मुक्ति दिलाई जा सकेगी, लेकिन सच यही है कि इन्हें लागू करने का जिम्मा अब भी उसी नौकरशाही के हवाले है। इसी नौकरशाही के कारण ई-गवर्नेंस की सोच एक हद तक पहुंचकर रुक गई। सरकारी विभाग अपनी वेबसाइट बनाकर अपने पुराने रवैये पर लौट आए। अगर हम चाहते हैं कि नया रुझान पूरी तरह कामयाब हो, तो इस रवैये को बदलना सबसे जरूरी है।
हिंदुस्तान में 29/01/14 को प्रकाशित 

Tuesday, January 28, 2014

खूबसूरत यादों का एल्बम

बहुत ठण्ड है.मुझे पता है कि ऐसे मौसम को आप भी एन्जॉय कर रहे होंगे.सारी दुनिया में ठण्ड की चर्चा है,कोहरा,धुंध और ढेर सारी ठण्ड,यूँ तो ऐसे भी जाड़े का मौसम बहुत खास होता है खाने पीने से लेकर पहनने और घूमने का असली लुत्फ़ तो जाड़े में ही आता है. दिन छोटे और रातें बड़ी हों तो कहने ही क्या यानि मौजा ही मौजा.ऐसे ही एक शाम मैं  अपनी रजाई में दुबके हुए जाड़े की अपनी पुरानी  यादों में खोया था और फिर मुझे कुछ मिल गया आपको ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं.
 मुझे अपने लेख का टॉपिक मिल गया.हाँ भाई जाड़े का हमारे जीवन से और गहरा  रिश्ता है.जी हाँ वो रिश्ता है यादों का,यूँ तो यादों का कोई मौसम नहीं होता पर जाड़े के मौसम में जब माहौल सर्दी का हो तो यादें जी उठती हैं. आप मेरी बात पर आँख मूँद कर भरोसा मत कीजिये बल्कि साउथ हैम्पटन विश्वविद्यालय द्वारा कराई गई रिसर्च पर ध्यान दीजिए जो कहती है कि दिल को गर्माहट देने वाली यादें हमें ठंड सहने की क्षमता देती हैं और हम शारीरिक रूप से गर्म महसूस करते हैं.अब समझे आप कि जाड़ा दूसरे मौसम से क्यूँ अलग है.वैसे भी आजकल की फास्ट लाईफ में किसी के पास इतनी फुर्सत कहाँ है कि थोडा थम कर सुस्ताया जाए और जिंदगी का लुत्फ़ लिया जाए बोले तो रीयल हैंगआउट, हम वर्च्युल होते जा रहे हैं
पर जाड़े का ये मौसम हमें  रुक कर  सोचने के लिए  मजबूर कर ही देता है.वैसे भी यादों के बगैर जीवन का कोई मतलब ही नहीं होगा.इंसान एक सोशल एनीमल है जो बगैर रिश्ते बनाये रह ही नहीं सकता और जब रिश्ते बनेंगे तो यादें भी होंगी.बगैर नींव के मकान नहीं बन सकता उसी तरह से सिर्फ रिश्ते नाम के लिए नहीं बनाये जाते बल्कि एहसास  के लिए बनाये जाते हैं वो एहसास ही तो है जो किसी आम से रिश्ते को ख़ास बना देता है. क्या आप किसी ऐसे शख्स को जानते हैं जिसके पास यादों का कोई खज़ाना न हो आप भी सोचिये जरा कि जाड़े की सुबह,दोपहर और शाम से हम सबकी कितनी सुहानी यादें जुडी हैं. वो कोहरे में डूबी अलसाई सुबह हो जब बिस्तर छोड़ने का मन नहीं करता या गुनगुनी धूप में नहाई दोपहर जिसकी याद अभी तक आपके दिल में ताज़ा है या फिर वो सुहानी शाम जब आप पहली बार किसी से मिले थे.मौसम में भले ही ठंडक थी पर दिल किसी के साथ के एहसास से दहक रहे थे.आपकी यादें भले ही मेरी यादों से अलग हों पर उनका एहसास सबको एक सा ही होता है क्यूंकि जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है.बीता वक्त तो अब लौट कर नहीं आ पायेगा पर बीती यादों को वो एहसास हमें अपने आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करेगा.कोई कितना भी अकेला क्यूँ हो न पर उसके साथ हमेशा कुछ बीती यादें जरुर होती हैं तो अगली बार फीलिंग लोनली का स्टेटस अपडेट करने से पहले जरा एक बार सोचियेगा क्या वाकई आप अकेले हैं?अरे आपके साथ कितनी यादें हैं उनमें से कुछ मीठी यादों को अपने आप से ही चुरा लीजिए और आँखें बंद कर खो जाइए अपनी दुनिया में विश्वास जानिये ये पल जिंदगी को बेहतर बनाने का हौसला देंगे और इन सब के लिए जाड़े के मौसम से भला और कुछ क्या हो सकता है.लोग घरों में बंद हों सड़कें वीरान सब तरफ सन्नाटा आप हों और आप की तन्हाई.वैसे भी बहुत दिन हुए जब आपने किसी याद को जी भर के नहीं जीया तो इस जाड़े को जीने के लिए किसी पुरानी याद को फिर से जीया जाए क्यूंकि ये जाड़ा भी हर जाड़े की तरह चला जाएगा आपको हर बार की तरह एक नयी याद देकर पर जाड़े की इन यादों से अपने तन मन को गरम रखियेगा क्यूंकि गर्मियां आते ही आपको जाड़े की याद आनी शुरू हो जायेगी, तो इससे पहले ये सर्दियाँ आपकी यादों के एल्बम का हिस्सा बन जाएँ इनको जी लीजिए जिससे कल जब आप इन यादों को दुबारा जीयें तो अनायास ही आपके होंठों पर एक ऐसी  मीठी मुस्कान आ जाए जो किसी और की यादों का हिस्सा बन जाए अब देखिये न अगर मुझे पिछले जाड़े की याद न आयी होती तो भला क्या ये लेख आपकी यादों का हिस्सा बन पाता तो इस बार भी जाड़े में कुछ नयी यादें सहेजिये पर पुरानी यादों को धुंधला मत होने दीजिए.अपनी यादों पर पड़े कोहरे को हटाइए और जाड़े की उस सुहानी शाम का जश्न मनाइए जब आप सबसे ज्यादा खुश थे.
आई नेक्स्ट में 28/01/14को प्रकाशित 

Tuesday, January 21, 2014

चिकित्सा पर्यटन का नया केंद्र

चिकित्सा पर्यटन, अर्थात सस्ती एवं बेहतर चिकित्सीय सुविधाओं एवं सेवाओं के लिए देश के ही भीतर अथवा दूसरे देशों में की जाने वाली यात्रा, पिछले  कुछ सालों में भारत में चिकित्सा पर्यटन एक प्रमुख पर्यटन उत्पाद के रूप में उभरा है।जिसके मूल में यहाँ की भौगौलिक विविधता और समर्द्ध ऐतिहासिक विरासत और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएँ यानि कोई विदेशी इलाज करने भारत आता है और आस पास के इलाकों को घूमकर स्वास्थ्य लाभ भी करता है|
हालांकि भारत को सिंगापूर ,मलेशिया थाईलेंड जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है पर यहाँ  इसके विस्तार एवं विकास की संभावनाएँ तुलनात्मक रूप से अधिक हैं। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की वर्ष 2012 – 13 में प्रकाशित वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार नवोन्नत चिकित्सा सुविधाएं, सुप्रसिद्ध हैल्थ केयर प्रॉफेश्नलस, उत्कृष्ट नर्सिंग सेवाएँ, अपेक्षाकृत कम प्रतीक्षा समय एवं भारत की आयुर्वेद व योग जैसी पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियां जो एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के साथ मिलकर समग्र निरोगिता प्राप्त करने में सहायक होती हैं, कुछ ऐसे कारण हैं जो भारत को एक पसंदीदा चिकित्सा पर्यटन गंतव्य बनाते हैं।
गिरते रुपये ने भले ही भारतीय अर्थशास्त्रियों को परेशान कर रखा है परंतु चिकित्सा पर्यटन के लिए यह शुभ संकेत बनकर उभरा है क्योंकि रूपये की गिरती कीमत  ने देश  में पहले से ही सस्ती चिकित्सा सुविधाओं को विदेशियों के लिए और भी सस्ता बना दिया है। अभी देश में चिकित्सा पर्यटन उद्योग लगभग 7,500 करोड़ रूपये का है जिसकी  वर्ष 2015 तक बढ़कर 12,000 करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है । भारत में चिकित्सीय सेवाओं के सस्ते होने का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल की बाइपास सर्जरी जिसके लिए अमेरिका में लगभग 1,50,000 डॉलर खर्च करने पड़ते हैं जबकि भारत में सिर्फ 5,000 से 6,000 डॉलर में यह काम हो जाता है। इसी तरह कूल्हे बदलने के लिए अमेरिका में 50,000 डॉलर खर्चने पड़ते हैं जबकि भारत में सिर्फ 7,000डॉलर। इसी तरह दांतों के रोपण, एंजियोप्लास्टी, लेसिक, जैसी  चिकित्सीय सुविधाएं अन्य देशों के मुक़ाबले यहाँ  सस्ती हैं। चिकित्सा पर्यटन के माध्यम से भारत सरकार बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जन कर अपने व्यापार घाटे को नियंत्रित कर सकती है और  रोजगार के नए अवसर पैदा करने में भी सहायक हो सकता है। सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने चिकत्सीय सेवाओं के लिए भारत आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष “चिकित्सा वीज़ा” की व्यवस्था की है। इससे चिकित्सा पर्यटकों को वीज़ा के लिए इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारतीय पर्यटन मंत्रालय के तेरह  विदेशी दफ्तर चिकित्सीय कारणों से भारत आने की इच्छा रखने वाले पर्यटकों द्वारा पटे रहते हैं। यहाँ  आने वाले चिकित्सा पर्यटकों में विकसित देशों जैसे ब्रिटेन, अमेरिका,आदि से लेकर पड़ोसी मुल्कों जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, आदि देशों के भी पर्यटक शामिल हैं।
भारत में चिकित्सा पर्यटकों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है परंतु सब कुछ उतना अच्छा भी नहीं है । सिंगापुर और थायलैंड जैसे देश इस मामले में हमसे कहीं आगे हैं। आधारभूत  सुविधाओं के अभाव में भारत में चिकित्सा पर्यटन का विकास उतनी  तेज़ी से नहीं हो पा रहा है जितना की होना चाहिए। नीतिगत प्रश्न भी इसके विकास में बाधा डाल रहे हैं। देश  में एक बड़ी जनसंख्या के पास आज भी मूलभूत चिकित्सा सुविधाएं नहीं पहुँच पा रही हैं ऐसे में धनी विदेशियों के लिए चिकत्सकीय सुविधाओं का प्रबंध करने के औचित्य को सही सिद्ध करना कठिन है। चिकित्सा को उद्योग बना देने से इस पेशे में आंतरिक रूप से निहित सेवा भाव के ख़तम हो जाने  होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
मानव अंगों की तस्करी इस उद्योग का एक और स्याह पक्ष है विकसित देशों में मानव अंग आसानी से उपलब्ध नहीं हैं और भारत जैसे गरीब देश में पैसों के लालच अथवा ताकत के प्रभाव का प्रयोग कर गरीबों के उत्पीड़न की संभावना बराबर बनी रहती है। चिकित्सा पर्यटकों की बेहतर क्रय क्षमता सरकारी अस्पतालों से बेहतर डॉक्टरों को दूर कर देगी और आम भारतीय पैसे के अभाव में उच्च स्तरीय चिकित्सीय सुविधाओं से वंचित रह जाएँगे और देश अपने डॉक्टरों की पढ़ाई पर जो पैसा  खर्च करता है उसका लाभ देशवाशियों को न मिलकर दूसरों को मिलेगा। चिकित्सा पर्यटन जहाँ  निजी  अस्पतालों को बढ़ावा दे रहा है  जो कि आने वाले समय में चिकित्सा के क्षेत्र में पहले से ही मौजूद विसंगतियों को और बढ़ाएगा |अत: चिकित्सा पर्यटन के लिए एक दीर्घकालीन  नीति बनाने की आवश्यकता है जिससे इस उद्योग से हुए फायदे का लाभ एक आम भारतीय बेहतर स्वास्थ्य सुविध्याएं प्राप्त करने में उठा  सके|
अमर उजाला में 21/01/14 को प्रकाशित 

Tuesday, January 14, 2014

तू भी ऑनलाइन है ........

नए साल में आप सब जरुर खुशियों के साथ टैग हो गए होंगे,खुशियों के साथ हैंग आउट जारी होगा और चिली वेदर में चिलेक्स कर रहे होंगें अब चूँकि नया साल है तो मैंने सोचा क्यूँ न आपके साथ एक नयी लैंग्वेज में कम्युनिकेट किया जाए मैंने कहीं पढ़ा था इस नए साल में कुछ नया कीजिये जो किया है उसके सिवा कुछ कीजिये तो मैंने भी सोचा कि कुछ ऐसा करूँ जो पहले न किया हो पर ऐसा क्या ? बड़ा वाला क्वेशन मार्क था तभी मेरे व्हाट्स एप पर एक मेसेजनुमा जोक आया “कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है... अगर तुम  १०:३० बजे ही सो जाती है तो तुम्हारे  व्हाट्सएप्प पर "लास्ट सीन २:३० ए एम" क्यों दिखाता है? हा हा और मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी असल में नए नए मोबाईल एप हमारी जिन्दगी में किस तरह असर डाल रहे हैं इसका अंदाजा हमें खुद नहीं है.एसएमएस में तो आप झूठ बोल कर निकल सकते थे कि मेसेज नहीं मिला पर ये नए नए चैटिंग एप और लास्ट सीन वाला स्टेट्स आपकी सारी हकीकत आपके दोस्तों और परिचितों के सामने बयां कर देते हैं.अब सोचने की बारी आपकी है यूँकि ये बात आपको क्यूँ बताई जा रही है और इससे आपको क्यूँ फर्क पड़े,गुड क्वेश्चन तो भाई मामला ये है कि फैमली प्लानिंग वाला स्लोगन तो  आपने सुना ही होगा कि बच्चे दो ही अच्छे हाँ भाई ज्यादा बच्चे आफ़त ही होते हैं उसी तरह से यारी दोस्ती करना अच्छी बात है पर यारी दोस्ती जब ज्यादा लोगों से हो जायेगी तो आपको समस्या आयेगी ही क्यूंकि एक ओर मोबाईलनेट  रेव्ल्युशन ने हमें ग्लोबली कनेक्टेड तो कर दिया ही है वहीं कहीं हम बैकवर्ड न घोषित कर दिए जाएँ इस दौड़ में जितने चैटिंग एप इंटरनेट पर उपलब्ध हैं वो सबके सब हमारे मोबाईल पर होने चाहिए इस ललक ने कब हमें इतना एक्सप्रेशन लेस कर दिया कि हमें अपने रीयल एक्सप्रेशन को भूल टेक्नीकल एक्सप्रेशन यानि इमोजीस के गुलाम बन गये.हंसी आये या ना आये हा हा लिख कर कोई स्माईली बना दो सामने वाला यही समझेगा कि आप बहुत खुश हैं पर क्या आप वाकई खुश हैं? क्यूँ अब मैं थोडा सा हंस लूँ, अक्सर हम चैट पर यही कर रहे होतें वर्च्युल चैटिंग में हम जीवन की रीयल प्रोब्लम का सल्यूशन ढूंढने लग गए हैं .हमारी फोनबुक में बहुत से लोगों के नंबर सेव रहते हैं और हम जितने ज्यादा चैटिंग एप डाउनलोड करेंगे हम उतने ही ज्यादा खतरे में रहेंगे क्यूंकि कोई न कोई चैटिंग एप हर कूल डूड के मोबाईल में रहता है और इससे कोई भी ,कभी भी आपको संदेसा भेज सकता है. यह जाने बगैर कि आप बात करने के मूड में हैं कि नहीं दूसरी चीज है आपकी प्राइवेसी,चैटिंग एप और कुछ न बताएं तो भी ये तो सबको बता ही देते हैं कि आप किसी ख़ास एप पर कितने एक्टिव हैं अगर इससे बचना है तो कुछ और एप डाउनलोड कीजिये. ये तो आप भी मानेंगे कि बगैर काम की चैटिंग खाली लोगों का काम है या आप इमोशनली वीक है और रीयल लाईफ में आपके पास कोई नहीं हैं जिससे आपकी उँगलियाँ मोबाईल के की पैड पर भटकती रहती हैं कि कहीं कोई मिल जाए?
मेरे यंगिस्तानी डूड लोगों मामले और भी हैं ज्यादा चैटिंग ये बताती है कि आप फोकस्ड नहीं हैं चैटिंग करने के लिए उम्र पडी है ये टाईम कुछ पाने का ,कुछ कर दिखाने का है.बात जिन्दगी की हो या रिश्तों की हम जितने सिलेक्टिव रहेंगे उतना ही सफल रहेंगे और यही बात एप और चैटिंग पर भी लागू होती है,जो आपके अपने है उन्हें वर्च्युल एक्सप्रेशन नहीं रीयल एक्सप्रेशन की जरुरत है.ईमोजीस आँखों को अच्छी लगती हैं पर जरुरी नहीं कि दिल को भी अच्छी लगे. जो रिश्ते दिल के होते हैं उन्हें दिल से जोडिये नहीं तो एक वक्त ऐसा आएगा जब आप होंगे और आपकी तन्हाई मोबाईल की फोनबुक भरी होगी पर दिल की गलियां सूनी होंगीं तो अपने अपनों से मिलने जुलने का सिलसिला बनाये रखिये बी सिलेक्टिव, बी फोकस्ड और हाँ दोस्ती  और चैटिंग कम ही अच्छी  

आई नेक्स्ट में 14/01/14 को प्रकाशित 

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