Thursday, April 12, 2018

तकनीकी दुनिया में भी निशाने पर स्त्री

एक देश के तौर पर भारत महिलाओं के लिए कभी एक सुरक्षित स्थल के रूप में नहीं माना गया है | 2017 के ग्लोबल वूमन,पीस एंड सिक्योरिटी इंडेक्स के अनुसार एक सौ तिरपन देशों में भारत का नम्बर इस इंडेक्स में 131 वां रहा है|यह इंडेक्स किसी देश में महिलाओं के न्याय,सुरक्षा और समावेशन जैसे मानकों पर किसी देश की स्थिति के आधार पर उन्हें आंकता है| बढ़ती सूचना तकनीक और महिलाओं के अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता से यह माना जाने लगा था कि तकनीक से देश में महिलाओं का जीवन बेहतर होगा पर पुरुष सत्तामक सोच तकनीक के इस रूप को भी प्रभावित कर रही है और  भारत में होती मोबाईल क्रांति महिलाओं का जीवन और दुश्वार कर रही है |आम तौर पर माना जाता है कि तकनीक निरपेक्ष होती है और यह लिंग भेद नहीं करती है पर देश में आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं | भारत दुनिया के सबसे ज्यादा स्पैम काल करने वाले देशों में पहले स्थान पर है पर इस दर्द को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा महिलाओं को ही झेलना पड़ रहा है |देश की महिलायें औसत रूप से पुरुषों के मुकाबले अठारह प्रतिशत आवंछित मेसेज और स्पैम कॉल प्राप्त कर रही हैं |
अपनी तरह के दुनिया में पहली बार इस तरह के शोध का दावा करने वाली स्वीडन की कम्पनी ट्रू कॉलर एप जो मुख्यतः लोगों को फोन नम्बर पहचानने में मदद करती है ने यह इसी साल जनवरी से फरवरी महीने में देश के पंद्रह शहरों में यह सर्वे किया है | ट्रू कॉलर एप के देश में लगभग पंद्रह करोड़ उपभोक्ता हैं |चुने गए शहरों में पंद्रह  से पैंतीस साल की महिलाओं को इस शोध सर्वे में शामिल किया गया |जिन महिलाओं पर यह सर्वे किया उनमें हर तीन में से एक महिला को अश्लील और अभद्र भाषा के फोन काल या संदेश मिलते हैं और इनकी आवृत्ति बहुत ऊँची है |अठहत्तर प्रतिशत महिलाओं को हर हफ्ते ऐसी फोन काल की गयी जिनकी भाषा अभद्र और अश्लील थी जबकि बयासी प्रतिशत महिलाओं ने माना उन्हें ऐसे वीडियो और फोटो हर हफ्ते मिलते हैं |
फोन और वीडियो भेजने वाले इन लोगों में पचास प्रतिशत एकदम अनजाने लोग होते हैं जबकि ग्यारह प्रतिशत पीछा करने वाले होते हैं जो किसी तरह उन महिलाओं और लड़कियों के नंबर तक अपनी पहुँच बना लेते हैं |ऐसी कई ख़बरों से देश पहले से ही दो चार हो चुका है जहाँ लड़कियों ने फोन नंबर बेचे जाने की घटनाएँ प्रकाश में आईं हैं |उत्तर प्रदेश में इस तरह की घटनाएँ रोकने के लिए 1090 वूमेन पावर लाइन जैसी हेल्पलाईन जरुर शुरू की है पर तथ्य यह भी है कि अश्लील और अभद्र भाषा के कॉल और संदेशों वाली स्थिति से देश की ज्यादातर लड़कियों को झेलना ही पड़ता है और पुलिस में इनकी रिपोर्ट पानी सर के ऊपर से जाने पर ही होती है |इस शोध में यह तथ्य भी सामने आया है कि इस तरह की घटनाए होने पर सबसे पहला काम कोई महिला या लडकी उस नंबर या सोशल मीडिया एकाउंट को ब्लॉक करने का करती हैं या इस तरह के किसी एप का इस्तेमाल करती हैं जिनसे इस तरह के  कॉलर से मुक्ति मिले |मात्र दस प्रतिशत महिलायें इस तरह की घटनाओं  की रिपोर्ट पुलिस को करती हैं |ऐसी  स्थिति अश्लील और अभद्र फोन करने वालों की हिम्मत को बढाती हैं |उन्हें पता होता है कि अमूमन उनके ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होंगी और कार्यवाही के पहले स्तर में मात्र चेतावनी ही दी जाती है |सोशल मीडिया पर भी भारत की महिलाओं की उपस्थिति  भी बहुत अच्छी नहीं है यूके कंसल्टेंसी फार्म वी आर सोशल की एक रिपोर्ट के अनुसार सारी दुनिया में सोशल मीडिया में महिलाओं की  उपस्थिति पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है पर फेसबुक जिसके भारत में सबसे ज्यादा प्रयोगकर्ता हैं मात्र चौबीस प्रतिशत महिलायें वहीं छियत्तर प्रतिशत पुरुष हैं |इस मामले में भारत की स्थिति अपने  पड़ोसियों पाकिस्तान और बांग्लादेश  से ही बेहतर है और यह असंतुलन हर उम्र वर्ग में है जो तेरह से लेकर पैंसठ वर्ष की आयु तक है | सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर भी महिलायें सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं जहाँ पुरुषों के मुकाबले  महिलायें ज्यादा ट्रोल की जाती हैं पिछले साल क्रिकेटर मिताली राज ,अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ,सोनम कपूर और तापसी पुन्नू को ट्रोल किया गया |ये वो महिलायें हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के बूते सारी दुनिया में अपनी पहचान बनाई है फिर भी इनके कपड़ों और व्यकतिगत जीवन को लेकर इन्हें ट्रोल किया गया |जब समाज की इन नामचीन महिलाओं की ऐसी स्थिति है तो देश की आम  महिलाओं की सोशल मीडिया में क्या स्थिति होगी |तथ्य यह भी है कि आम पुरुषों के  मुकाबले महिलायें सोशल मीडिया पर उतनी स्वछन्द स्थिति का लुत्फ़ नहीं उठा सकतीं और अक्सर इस की कीमत अश्लीन संदेशों और फोटो के रूप में चुकानी पड़ती है |
उधर लड़कियां और महिलायें समाज के पितृ सत्तामक ढाँचे के कारण इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि इस तरह की घटनाओं का दोष उनके ही सर मढ दिया जाएगा |कार्यवाही करने के केंद्र हमारे पुलिस थाने बिलकुल भी लिंग संवेदनशील नहीं है |जहाँ कोई भी महिला या लडकी अपने साथ हो रहे इस तरह के बर्ताव के लिए खुले मन से मदद मांग सके |इस तरह की स्थितियां कुल मिलाकर एक ऐसे दुष्चक्र का निर्माण करते हैं जिसमें पिसना इस देश की महिलाओं और लड़कियों की नियति बन जाता है |2018 के अंत तक साठ प्रतिशत भारतीयों के पास स्मार्ट फोन आ जायेगा यानि आने वाले वक्त में यह समस्या और बढ़ेगी अगर  तब तक कोई कारगर कदम नहीं उठाया जाएगा तो देश की लड़कियों और महिलाओं के लिए अभी स्मार्ट फोन का इस्तेमाल उतना सुहाना नहीं रहने वाला है जितना कि एक पुरुष के लिए  है |
नवभारत टाईम्स में 12/04/18 को प्रकाशित 

Friday, March 30, 2018

रिश्ते का इतिहास बन जाना

मेरे एक खुशमिजाज मित्र थे.’थे’ इसलिए लिख रहा हूँ कि अब उनसे बात नहीं होती है पर एक वक्त ऐसा भी गुजरा है कि जब  हम बेमतलब की ढेर सारी बातें किया करते थे. फिर हम दोनों के रिश्तों में समस्या आयी क्योंकि उनकी प्राथमिकता बदलने लग गयी थी लेकिन  उस दौर में जब बात करने के सिलसिले काफी कम हो गए  थे .जब कभी उनसे बात होती  थी तो वो  मुझसे कहते थे कि काश सब पहले जैसा हो जाए और मैं अक्सर ये सोचा करता था कि क्या सब पहले जैसा हो सकता है ?इस प्रश्न का जवाब  कभी मिला  नहीं क्योंकि  ज़िन्दगी की कहानी बदल चुकी थी और हमारी दोस्ती इतिहास हो गयी .
वैसे  आपने भी  ज़िन्दगी के किसी न किसी मोड़ पर कोई कहानी जरुर पढी या सुनी होगी. ज़िन्दगी के साथ साथ हमारे साथ चलने वाली कहानियों के नायक नायिका बदलते जाते हैं पर हर कहानी में एक चीज समान  रहती है.वह  यह कि हर कहानी में ‘था’ या ‘थी’ शब्द की भरमार होती है यानि कहानी में जो कुछ भी होता है वो बीत चुका होता है पर उन कहानियों के माध्यम से हम इंसानी रिश्तों, संघर्षों,तकलीफों को समझ कर आने वाले कल को बेहतर करने की कोशिश कर सकते  हैं.
 जब सवाल  कहानियों का हो तो इतिहास का जिक्र आना स्वाभाविक है .बात कहानी से शुरू हुई तो बगैर रिश्ते के कोई कहानी नहीं बनती और हर इतिहास की अपनी एक  कहानी होती है,मतलब कहानी ,रिश्ते और इतिहास तीनों एक दूसरे से जुड़े  हैं. इतिहास आम लोगों की नजर में से दुनिया का सबसे बोरिंग विषय हो सकता  है  पर असल में ऐसा है नहीं  ? इतिहास को समझे बगैर हम जिन्दगी और रिश्तों की कहानी नहीं समझ सकते .क्या समझे ? समय अच्छा हो या बुरा बीतने को  तो बीत जाता है पर अपने बीतने के निशान जरुर छोड़ जाता है हम कभी सोचते ही नहीं  जो कुछ ‘था’ या ‘थे’ हो जाता है वो सब इतिहास की कहानी बन जाता है. बगैर इतिहास की नींव के हम भविष्य की ईमारत तो नहीं खडी कर सकते .
बात इतिहास की हो रही हैतो   देखिये न हर रिश्ते का एक इतिहास होता है पर जबतक रिश्ते सामान्य रहते हैं हम इस इतिहास पर ध्यान ही  नहीं देते कि ये रिश्ता कैसे बना,कैसे कोई पति ,दोस्त रिश्तेदार बन जाता है  पर जब रिश्ते बिगड़ते हैं तब हम सोचते हैं ऐसा क्यूँ हुआ.जो अपनी गलती से सबक सीख लेते हैं वो इतिहास बना देते हैं  और जो नहीं सीखते हैं वो दूसरों के इतिहास को रटते हैं.कभी बचपने में पढ़ा था की इतिहास अपने आप को दोहराता है पर उसका दुहराव हर बार अलग तरीके से होता है.कहानियां हम सब पढ़ते ,सुनते हैं कुछ सच्ची होती हैं कुछ काल्पनिक पर उनसे सीख क्या लेते हैं ये ज्यादा महत्वपूर्ण है,रिश्ते बनाना इंसानी फितरत है पर रिश्ते निभाना सबको नहीं आता है . इसको सीखना पड़ता है.रिश्ते प्यार की नींव,अपनेपन के एहसास और समर्पण की ऊर्जा से चलते हैं. अगर इनमें कमी आती है तो रिश्तों का इतिहास बनते देर नहीं लगती .
प्रभात खबर में 30/03/18 को प्रकाशित 

Monday, March 26, 2018

मोबाईल स्क्रीन अब एक हकीकत है

लम्बे समय तक  स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का महत्वपूर्ण  हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों तक सब कुछ मौजूद है | यह मोबाईल स्क्रीन अभिभावकों के लिए एक अंतहीन गुस्से का कारण बन रही है| एक तरफ बच्चे मोबाईल चाहते हैं दूसरी तरफ अभिभावक भले ही मोबाईल के लती बन चुके हैं और यह जानते हुए भी कि मोबाईल इंटरनेट में बहुत सी अच्छी चीजें बच्चों के लिए हैं, वे उन्हें देना भी चाहते हैं और नहीं भी ,यह सब मिलकर भारतीय घरों में  मानसिक द्वन्द का एक ऐसा वातावरण रच रहे हैं जिससे हर परिवार पीड़ित  है | हालंकि माध्यमों के चुनाव को लेकर भारतीय घरों में यह द्वन्द नया नहीं है पहले रेडियो सुनने फिर टीवी जब घर –घर पहुंचा तो ऐसा ही कुछ टेलीविजन के साथ हुआ कि टेलीविजन बच्चों को बिगाड़ देगा उन्हें ज्यादा टीवी नहीं देखना चाहिए ऐसी बहसें हर घर की कहानी हुआ करती थी पर मोबाईल स्क्रीन  की कहानी इन सब माध्यमों से अलग है |यह एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है जिसके साथ फोन और कैमरा लगा हुआ है जो हमारी जेब में आ जाता है या यूँ कहें यह हमें व्यस्त रहने के लिए उकसाता है और फिर हमारे व्याकुलता के स्तर को बढ़ाता है और अंत में हमें अपना लती (व्यसनी )बना देता है |

बच्चों के मामले में यह स्थिति और गंभीर होती है क्योंकि मोबाईल एक माध्यम के रूप में  ज्यादा व्यक्तिगत और मांग पर उपलब्ध कंटेंट प्रदान करता है जो अंतर वैयक्तिक सम्बन्धों की गतिशीलता  को प्रभावित करता है अतः इससे दूर हो पाना किसी के लिए भी मुश्किल होता है | टेलीफोन कम्पनी टेलीनॉर द्वारा समर्थित वेब वाईस द्वारा  किये गए एक शोध में यह तथ्य निकल कर आया कि एक शहरी भारतीय बच्चा औसत रूप में कम से कम चार घंटे इंटरनेट पर बिता रहा है जिसमें सबसे ज्यादा संख्या मोबाईल इंटरनेट की है|| 2017 के अंत तक दस करोड़ चौंतीस लाख (134 मिलीयन )भारतीय बच्चे इंटरनेट से जुड़ चुके होंगे| कोलोरेडो विश्वविद्यालय,अमेरिका  के एक शोध में यह निष्कर्ष निकला है कि दुनिया के नब्बे प्रतिशत बच्चे (पांच साल से सत्रह साल की उम्र वाले )मोबाईल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं जिससे वे देर से सो रहे हैं और  उनकी नींद की गुणवत्ता  प्रभावित हो रही है नतीजा बच्चों की नींद और  एकाग्रता में कमी के रूप में सामने आता है|मोबाईल स्क्रीन से निकलने वाले  प्रकाश की  तरंग दैर्ध्य और गुणवत्ता,शरीर की आन्तरिक घड़ी और नींद लेने की प्रक्रिया पर असर डालती है जो शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को कम करता है यह हार्मोन ही हमारे शरीर को बताता है कि यह नींद लेने का समय है।स्क्रीन पहले की तुलना में लगातार छोटे होते जा रहे हैं इसलिए उनका इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर होता जा रहा है इसलिए बच्चों के लिए उनका इस्तेमाल ज्यादा आसान है जिस वक्त उन्हें सोना चाहिए वे मोबाईल पर वीडियो देख रहे होते हैं |मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बचपन और किशोरवस्था में अच्छी नींद का आना मोटापे के खतरे को कम करता है और बच्चों के संज्ञानात्मक व्यवहार को बेहतर करता है | इंटरनेट पर वीडियो देखे जाने की सुविधा का आगमन और अमेजन प्राईम वीडियो, नेट फ्लिक्स और यूट्यूब  जैसे वीडियो आधारित इंटरनेट चैनलों के आ जाने से स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय वीडियो कार्यक्रमों के लिए हमारी दिनचर्या का मोहताज नहीं रहा ,जब जिसको जैसे मौका मिले वो अपने मनपसन्द कार्यकर्मों का लुत्फ़ उठा सकता है,यह सुविधा अपने साथ कुछ समस्याएं भी ला रही है और इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं जो देर रात तक अपने मनपसन्द कार्यक्रम मोबाईल पर देख रहे हैं | यह अलग बात है कि हम मोबाईल स्क्रीन के मोह में ऐसे बंधे हैं कि इस बात पर गौर ही नहीं कर पा रहे हैं कि हमारे बच्चे भी मोबाईल स्क्रीन के चंगुल में फंसते  जा रहे हैं जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है | ब्लू व्हेल गेम को खेलने के दौरान हुई बच्चों की मौतों ने मोबाईल इंटरनेट का बच्चों द्वारा कैसा और कितना इस्तेमाल होना चाहिए इस बहस को चर्चा में ला दिया है |भारत में इस माध्यम के इस्तेमाल का बहुत ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है एक ही वक्त में माता –पिता और बच्चे साथ -साथ इसके प्रयोग से परिचित हो रहे हैं |इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है और उसमें बच्चे भी शामिल हैं |व्हाट अबाउट द चिल्ड्रेन (वॉच) संस्था का मानना  है कि बच्चों को कुर्सियों पर बैठाना और स्ट्रैप लगा देना या फिर स्मार्टफोन और टैबलेट देना खेलने के लिए, ये सब बच्चों के लिए घातक साबित हो रहे हैं|

Wednesday, March 21, 2018

उपभोक्तावाद की और बढ़ती अर्थव्यवस्था

आधुनिक अर्थव्यवस्था की सबसे क्रांतिकारी  अवधारणा ने मानवों को उपभोक्ता में तब्दील कर दिया.उपभोक्तावाद की जड़ें औद्योगिक क्रांति में निहित हैं उसके पूर्व इंसान परस्पर सहयोग से इस धरती पर अपने दिन काट रहा था.जिसमें सभी कृषक थे कोई छोटा तो कोई बड़ा.जिसमें सभी लोग अपनी सामर्थ्य से योगदान देते थे.जो भूमिहीन थे उनके पास भी पेट पालने का एक मात्र साधन कृषि से जुड़े ही कार्य होते थे पर औद्योगिक क्रांति ने इंसानों को उपभोक्ता में तब्दील कर दिया और इसके वाजिब कारण थे.अर्थव्यवस्था कृषि से उद्योगों की तरफ उन्मुख हो गयी और इस दुनिया में जीने के लिए कृषि से जुड़े कार्य करने की अनिवार्यता जाती रही और इसी के साथ एक ऐसे समाज का निर्माण प्रारम्भ हुआ. जहाँ जीवन को सुखमय और विलासी बनाने पर जोर दिया जाने लगा क्योंकि मशीनी क्रांति से चीजें कम समय में बहुतायत में बनने लग गयीं और उन को खपाने के लिए लोगों को खर्च करने के लिए प्रेरित किया जाने लग गया.जिससे विज्ञापन और उससे जुडी स्कीमों की शुरुआत पश्चिमी देशों में शुरू हुई .भारत भी इन बदलावों से अछूता नहीं रहा और बदलाव की इस बयार को तेजी तब मिली जब 1991 में देश की अर्थव्यवस्था को उदार बनाया गया जिससे हमारे बाजार दुनिया के सारे देशों के लिए खुल गए.इस परिवर्तन ने समाज पर बहुआयामी असर डाला.पहले जहाँ लोग “सहेजे और बचाओ” की नीति पर चलते थे क्योंकि चीजों की कमी थी और वे महंगी भी थीं अब “इस्तेमाल करो और फेंको” का ज़माना आ गया.हमारे जैसी पीढी के लोग एक रिफील और निब वाले पेन की कीमत जानते होंगे .नब्बे के दशक से पहले पेन इतनी तेजी से नहीं बदले जाते थे पर आज शायद ही कोई होगा जो पेन की रिफील बदलता होगा.पेन की रिफील खत्म तो पेन का भी काम खत्म,तुरंत नया ले लो.जब चीजें ज्यादा हो और पूंजीपतियों  का सारा जोर अपने मुनाफे को अधिकतम करने पर हो तो उपभोक्ता कहीं न कहीं शिकार होगा ही क्योंकि वो संगठित नहीं है उसके हितों की सुरक्षा के लिए पूरे विश्व में उपभोक्ता अधिकारों के प्रति मांग और जागरूकता दोनों बढ़ी है पर यह सब इतना आसान नहीं रहा. आज से करीब  पैंतीस साल पहले 1983 में उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाने की शुरूआत कंज्यूमर्स इंटरनेशनल नाम की संस्था ने की थी. इसके पीछे उद्देश्य था कि दुनिया भर के सभी उपभोक्ता यह जानें कि बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए उनके क्या अधिकार हैं. साथ ही सभी देशों की सरकारें उपभोक्ताओं के अधिकारों का ख्याल रखें और उनको यह एहसास कराएँ कि अपने अधिकारों की लड़ाई में वे अकेले नहीं हैं बल्कि उनको सरकार का पर्याप्त विधिक समर्थन हासिल है .उपभोक्ता अधिकारों के बारे में पहल इससे कहीं पहले ही हो चुकी थी जब उपभोक्ता आन्दोलन का प्रारंभ अमेरिका में रल्प नाडेर द्वारा शुरू किया गया था.नाडेर के आन्दोलन के कारण  अमेरिकी कांग्रेस में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी द्वारा उपभोक्ता संरक्षण पर पेश विधेयक को अनुमोदित किया था. अमेरिकी कांग्रेस में पारित विधेयक में चार विशेष प्रावधान थे.जिनमें शामिल थे  उपभोक्ता सुरक्षा का अधिकार, उपभोक्ता को सूचना प्राप्त करने का अधिकार. उपभोक्ता को चुनाव करने का अधिकार एवं  उपभोक्ता को सुनवाई का अधिकार
 भारत में सन् 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम विधेयक पारित हुआ और समय समय पर इसमें संशोधन होते रहे पर पिछले एक दशक में भारतीय उपभोक्ता बाजार मे बहुत परिवर्तन आया है हालाँकि सजे हुए परंपरागत बाजार अभी इतिहास की चीज नहीं हुए हैं, शायद होंगे भी नहीं, पर ऑनलाइन शॉपिंग ने उनको कड़ी टक्कर देनी शुरू कर दी है. परंपरागत दुकानों की तरह ही ऑनलाइन खुदरा व्यापारियों के पास हर सामान उपलब्ध हैं. किताबों से शुरू हुआ यह सिलसिला फर्नीचर, कपड़ों, बीज, किराने के सामान से लेकर फल, सौंदर्य प्रसाधन तक पहुंच गया है. यह लिस्ट हर दिन बढ़ती जा रही है. इस खरीदारी की दुनिया में घुसना इतना आसान है कि आप अपने बेडरूम से लेकर दफ्तर या गाड़ी से, कहीं से भी यह काम कर सकते हैं. इस साल के अंत तक 2018 में भारत का ई-कॉमर्स बाजार 2.4 लाख करोड़ से बढ़कर 3.2 लाख करोड़ हो जाएगा.जितना तेजी से यह बाजार बढ़ रहा है उतना ही तेजी से उपभोक्ता अधिकारों का हनन ऑर्डर कुछ किया जाता  है और आ जाता है कुछ और बेचारा उपभोक्ता इन ऑन लाइन कम्पनियों के काल सेंटर पर फोन और ई मेल करके परेशान होता है वैसे भी ऑनलाईन कम्पनियों के चेहरे नहीं होते हैं सिर्फ फोन नंबर और ई मेल आई डी होती है.
वैसे भी देश में उपभोक्ता अधिकारों की लड़ाई आसान नहीं होती और फैसला आने में सामान्य मुकदमों की तरह बहुत वक्त लगता है.इन स्थतियों को देखते हुए सरकार ने संसद के शीत सत्र में उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2018 लोकसभा में पेश किया है और यह नया विधेयक उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का स्थान लेगा. इस विधेयक में एक केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी गठित करने का प्रावधान है ताकि उपभोक्ता संरक्षण के लिए संवैधानिक निकाय की कमी को पूरा किया जा सके. यह अथॉरिटी उत्पादों को वापस लेने के लिए दबाव डालने, खरीदी गई वस्तुओं की कीमतों की वापसी और उत्पाद को लौटाने जैसे प्रावधानों लागू करेगा। यह बरगलाने वाले विज्ञापनों पर भी लगाम लगाएगा.
      अथॉरिटी को दस लाख रुपए तक का जुर्माना लगाने का अधिकार होगा और इसके बाद क़ानून का दूसरे बार उल्लंघन होने पर उसको हर ऐसे उल्लंघन के लिए पचास  लाख रुपए तक का जुर्माना लगाने  का अधिकार होगा.उपभोक्ता इन फोरम पर अपनी शिकायात ऑनलाइन कर सकतेहैंऔर सुनवाई वीडिओ कांफ्रेंसिंग के द्वारा भी हो सकेगी.ऑनलाईन उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के लिए सरकार का यह नया कानून उम्मीद जरुर जगाता है पर इसकी असली परीक्षा व्यवहार के धरातल पर अभी होनी बाकी है क्योंकि समस्या वादों के निपटारे में अत्यधिक समय लगने और वाजिब मुवाअजा न मिलने की है.
आई नेक्स्ट में 21/03/18 को प्रकाशित 

Tuesday, March 13, 2018

टेलीविजन को पछाड़ता इंटरनेट

अब एक आम भारतीय के दिन की शुरुआत सुबह चाय पीते हुए अखबार पढने की बजाय इंटरनेट पर वीडियो देखने से होती है |मोबाईल एडवरटाइजिंग फर्म इनमोबी के एक शोध के मुताबिक़ एक औसत भारतीय सबसे ज्यादा वीडियो सुबह साढ़े छ से साढ़े नौ के बीच सबसे ज्यादा इंटरनेट पर वीडियो देखते हैं और सप्ताहांत में यह उपभोग सबसे चरम पर होता है | एक जन माध्यम के रूप में टेलीविजन अब ज्यादा खतरे में है जबकि उसे समाचार पत्रों के मुकाबले ज्यादा मज़बूत माध्यम माना जाता रहा है , वह भी तब जब वीडियो की लोकप्रियता अपने चरम पर है |
पिछले कुछ वर्षों  में मोबाईल वीडियो उपभोग बहुत तेजी से बढ़ा है और यह आंकड़ा 2017 में 2016 के मुकाबले दुगुना हो गया है जिसका बड़ा कारण सस्ते स्मार्टफोन और किफायती  इंटरनेट डाटा प्लान है |इनमोबी,ई मार्केटियरकॉम स्कोर और एम् एम् ए रिसर्च का संयुक्त शोध यह बताता है कि एक भारतीय औसतन साढ़े चार घंटे अपने स्मार्टफोन पर इंटरनेट एक्सेस करने में बिताता है जो उसके कुल माध्यम उपभोग का सैंतीस प्रतिशत है जो उसके टीवी देखने के समय से ज्यादा है | इसी रिपोर्ट के अनुसार देश 2021 में कुल इंटरनेट डाटा उपभोग का दो तिहाई हिस्सा वीडियो पर खर्च किया जाएगा |भारतीय अपने स्मार्ट फोन का ज्यादा इस्तेमाल बात करने या सन्देश भेजने की बजाय इंटरनेट खंगालने में बिता रहे हैं जिसमें विभिन्न एप का इस्तेमाल शामिल है |एप इस्तेमाल में सबसे ज्यादा समय क्रमश: ई शॉपिंग ,यात्रा और तकनीक जैसी श्रेणियों में है |साल 2017 में विभिन्न एप डाउनलोड करने के मुकाबले में भारत का स्थान तीसरा रहा है जो कुल एप डाउनलोड का बारह प्रतिशत हिस्सा था |
उल्लेखनीय है कि साल 2017 में ही भारत इंटरनेट डाटा उपभोग के मामले में अमेरिका और चीन को पिछाड कर दुनिया में पहले नम्बर पर आ चुका है |  एरिक्सन मोबिलीटी रिपोर्ट के अनुसार देश में डाटा की खपत किस तेजी  से बढ़ रही है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की अभी  लोग हर माह औसतन 3.9 जी बी इंटरनेट डाटा की खपत कर रहे हैं, जो साल 2023 में 18 जीबी तक पहुँच जाएगा  जबकि  साल 2014 में  यह आंकड़ा  मात्र 70 एम् बी प्रति माह  था| यह बढ़ोत्तरी साल 2014 के मुकाबले 360 प्रतिशत ज्यादा होगी |
एक माध्यम के रूप में वीडियो की बढ़त देश में ज्यादा इंटरनेट डाटा उपभोग के लिए प्राथमिक रूप से उत्तरदायी है |भारत जैसे देश में जहाँ अभी भी निरक्षरों की एक बड़ी संख्या है वहां वीडियो उनको मोबाईल इंटरनेट से जोड़ने का सबसे सुलभ विकल्प है |वो चाहे मनोरंजन का मामला हो या सूचनाओं का इसी कड़ी में शिक्षा भी शामिल  है जहाँ वीडियो का जादू सर चढ़कर बोल रहा है |मनोरंजन और सूचना के लिए वीडियो के हजारों विकल्प मौजूद हैं और ये हर बीतते दिन के साथ बढ़ते ही जा रहे हैं पर शिक्षा के क्षेत्र में बाईजू एप की सफलता भी यह बताती है लोगों को सीखाने के लिए वीडियो माध्यम से बेहतर विकल्प अभी हमारे सामने नहीं है |मोबाईल वीडियो की सफलता और टेलीविजन के एक माध्यम के रूप में पिछड़ने का बड़ा कारण कार्यक्रमों की विविधता है |
मोबाईल वीडियो उपभोक्ता की रुचियों के हिसाब से पर्संलाईज्ड कंटेंट उपलब्ध कराता है जबकि टेलीविजन अपनी लीक को तोड़ने के लिए नहीं तैयार है वो चाहे सूचना के क्षेत्र हो  जहाँ अब  टेलीविजन ख़बरें -परिचर्चा  बासी और उबाऊ हो चली हैं क्योंकि वो गति के मुकाबले में  इंटरनेट से मुकाबला नहीं कर पा रही हैं और कंटेंट के स्तर पर हमारी जानकरियों में कुछ नया नहीं जोड़ पा रही हैं वैसा ही हाल मनोरंजन के क्षेत्र में टीवी धारावाहिकों का भी है पर इंटरनेट धारावाहिक नवोन्मेष और नवाचारों से भरे हुए हैं |
टीवी ने शिक्षा के क्षेत्र में तो पाँव ही नहीं पसारे जो कुछ हुआ भी वो सरकारी टेलीविजन चैनलों में जो खासे नीरस और अपना प्रभाव छोड़ने में असफल साबित हुए पर यू ट्यूब ऐसे किसी भी मुद्दे पर आपको लाखों वीडियो का विकल्प देता है जिस मुद्दे पर आप कुछ सीखना या समझना चाहते हैं |वीडियो की ये सफलता में कुछ सवाल हैं जिनके जवाब अभी ढूंढे जाने हैं |टीवी एक व्यवस्थित माध्यम है जबकि इंटरनेट वीडियो को अभी व्यवस्थित होना है |लाभ  के लिए अभी भी विज्ञापन एक बड़ा स्रोत है हालाँकि अमेजन प्राईम और नेटफ्लिक्स के सब्सक्रिप्शन प्लान की सफलता ने इस मिथक को तोडा है कि लोग माध्यमों पर पैसा नहीं खर्च करना चाहते हैं पर अभी यह काफी शुरुआती  अवस्था में है |
अमर उजाला में 13/03/18 को प्रकाशित 

Tuesday, February 13, 2018

सम्बन्धों की प्राथमिकता में हम

मौत एक सच है पर जब आप रिश्तों की डोर से किसी अपने को खोते हैं तो लगता है ऐसे जीवन का फायदा क्या ? खासकर वो लोग कभी जिनके होने से घर, परिवार बन जाया  करता था ।बचपन में मेरे लिए परिवार का मतलब मेरे माता –पिता भाई और तीन चाचा सबसे बराबर का हिलना, मिलना, घूमना फिरना,किस्से कहानियां और न जाने क्या –क्या जो काम माता –पिता न कर रहे हों, वो चाचा जरुर कर देंगे .मुझे याद है घर में फ्रिज और टीवी के लिए पैसे भले ही पिता जी ने दिए  हों, पर वो चाचा ही थे जिन्होंने हम लोगों की महीनों पुरानी मांग पर ध्यान दिया और पिता जी को राजी किया  .हॉस्टल से जब पहली बार घर लौट रहे थे तो चाचा ही थे, जो लेने आये थे और हम भी दौड़ कर उनसे लिपट गए थे कि चाचा आ गए अब घर जायेंगे  .
लगता ही नहीं था कभी इन रिश्तों के मायने भी बदलेंगे .फिर हम बड़े हुए हमारे अपने परिवार बने और वो लोग जो कभी हमारे परिवार का हिस्सा हुआ करते थे वो पीछे छूटते चले गए  क्योंकि उनका अपना परिवार बन रहा था बढ़ रहा था ।हम भी बचपन को छोड़ जीवन में नए रिश्ते बना रहे थे .सब कुछ व्यवस्थित किसी से न कोई गिला था न शिकवा पर  अचानक ऐसे लोग जब चले जाएं तो समझ नहीं आता कि ये सूनापन ये उदासी क्यों .हम लोग तो कबके अपने अपने परिवारों में रम चुके थे . ऐसे किसी रिश्ते के इस दुनिया के जाने वक्त जब आप श्मशान घाट पर खड़े -खड़े न जाने कितने बीते युगों को अपनी आंखों के सामने जी रहे होते हैं ,कि जब जिंदगी हसीन थी और वो रिश्ते जो अब इतिहास हो चलें हैं, कभी हमारे अपने थे | तो लोगों को अपनी उदासी का क्या सबब बताएं .वो लोग जो चले गए कभी हम भी उनके अपने अपनों में थे पर आज आप बेगाने से अपने दर्द के साथ अकेले भीड़ का हिस्सा बने  खड़े हैं .
वैसे भी आज की इस भागती दौडती जिन्दगी में जब लोग अपने माता –पिता के लिए फुर्सत नहीं वहां चाचा -बुआ के जाने का मातम मनाने की फुर्सत किसे है ? आप हैं भी और नहीं भी जिन लोगों के रिश्तों से आप जुड़े थे वो तो जा चुके हैं, फिर कभी न आने के लिए और उन लोगों ने जो नए रिश्ते बनाये जिनसे वो जुड़े थे वो ये कभी  जानेंगे ही  नहीं कि आपको कितना दर्द है ? क्योंकि आप अब करीबी रिश्तों से दूर हो चले हैं या यूँ कहें सम्बन्धों की सामाजिक प्राथमिकता में अब आप दूर के पायदान पर हैं . जब आप उन रिश्तों के साथ थे तब कोई और नहीं था .खैर इसे जिंदगी का विस्तार कहें या रिश्तों का सिमट जाना । शायद यही है चालीस पार का जीवन जहां जिंदगी तो विस्तार पा रही है पर वो रिश्ते  जो हमारे बचपन की सुहानी यादों का हिस्सा थे वे खुद ही कहानी बनते  जा रहे हैं । मैं सिमट रहा हूँ या विस्तार पा रहा हूँ . सोच जारी है .
प्रभात खबर में 13/02/18 को प्रकाशित 

Monday, January 22, 2018

आधार को सुरक्षित करने में जुटी सरकार


आधार एक बार फिर सुर्ख़ियों में है ,इस बार फिर निशाने पर आधार कार्ड का डाटा निशाने पर है .विवाद तब शुरू हुआ जब ऐसी ख़बरें सामने आयीं  कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यू आई डी ए आई ) में अपनी पहचान के ब्योरे को जमा करने वाले लोगों  की जानकारियां बहुत सस्ते में बेची जा रही हैं .सिर्फ पांच सौ रूपये  चुकाने पर आधार कार्ड धारकों के नाम ,पते फोटो फोन नंबर ई मेल जैसी निजी जानकारियां चैटिंग साईट व्हाट्स एप पर उपलब्ध करवा दी जा रही हैं . तीन सौ रूपये  में  वह सोफ्टवेयर भी उपलब्ध है जिसकी मदद से किसी भी व्यक्ति का आधार नम्बर डालकर उसके आधार कार्ड का प्रिंट निकाला जा सकता है .यह समस्या सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती लेकर आयी है क्योंकि सरकार पहले ही सब्सिडी के वितरण से लेकर आयकर भुगतान ,मोबाईल सिम कार्ड और मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आधार अनिवार्य करने के फैसले के लिए चौतरफा आलोचनाओं का शिकार हो रही है .आधार के डेटा में इस तरह से सेंध के खतरे के अलावा दूसरी बड़ी समस्या बायोमेट्रिक पहचान को लेकर भी है .जिसमें आँखों की पुतलियों और हाथ की उँगलियों के निशान  को किसी व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित  करने में इस्तेमाल होता है .समस्या तब खडी होती है जब किसी व्यक्ति के ये दोनों अंग इस स्थिति में न हो जिससे उनका डाटा मशीन में ले लिया जाए  तब ऐसे व्यक्तियों की पहचान कैसे निर्धारित की जाए .सरकार ने जहाँ एक तरफ आधार आंकड़ों की गोपनीयता को सुनिश्चित करने के लिए मज़बूत कदम उठाये .
  
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यू आई डी ए आई )  अब फेशियल रिकगनाइजेशन का टेस्ट कर रहा है. यह नया फीचर 1 जुलाई, 2018 को शुरू किया जाएगा. इससे नागरिकों की पहचान  के लिए एक और अतिरिक्त कड़ी  जोड़ी  जाएगी. इससे वृद्ध और ऐसे लोगों  को बड़ी राहत मिलेगी, जिन्हें अक्सर फिंगर प्रिंट और आँखों की पुतलियों को लेकर दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है ,जिसमें हाथों की लकीरें धुंधली पड़ जाती हैं या नेत्रहीन लोग . यह नया फीचर एक शर्त के साथ आएगा. इसका मतलब यह है कि आपके चेहरे के पहचान  की अनुमति एक या इससे अधिक ऑथेंटिकेशन जैसे फिंगर प्रिंट, पुतली या ओटीपी के साथ दी जाएगी. सिर्फ चेहरे की पहचान से  किसी व्यक्ति की पहचान प्रक्रिया पूरी होना नहीं माना जाएगा . इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि आपको चेहरा पहचानने के इस फीचर के लिए आपको एक बार और आधार सेंटर जाना होगा. यूआईडीएआई इस फीचर के लिए अपने पुराने डाटाबेस का इस्तेमाल करेगा .वहीं आधार  कार्ड के डाटा  की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम कर लिया गया है . इसके तहत यूआईडीएआई हर आधार कार्ड की एक वर्चुअल आईडी तैयार करने का मौका देगी. इससे आपको जब भी अपनी आधार डिटेल कहीं देने की जरूरत पड़ेगी, तो आपको बारह अंकों के आधार नंबर की बजाय सोलह नंबर की वर्चुअल आईडी देनी होगी और  वर्चुअल आईडी जनरेट करने की यह सुविधा 1 जून से अनिवार्य हो जाएगी. यह सीमित ग्राहक पहचान  होगी. 
जिसमें कम्पनी या सेवा प्रदाता सिर्फ आपकी पहचान की वैधानिकता को सत्यापित कर पायेगा |किसी भी व्यक्ति की आधार जानकरियां उसकी पहुँच में नहीं होंगी . और न ही उन्हें इन डाटा को एक्सेस करने की अनुमति होगी . ये सारी एजेंसियां भी सिर्फ वर्चुअल आईडी के आधार पर सब अपने काम निपटा सकेंगी. इस व्यवस्था के अंतर्गत  प्रयोगकर्ता  जितनी बार चाहे उतनी बार वर्चुअल आईडी बना  सकेगा और यह आईडी सिर्फ कुछ निश्चित समय के लिए ही वैध होगी .इसमें  यूआईडीएआई ये सुविधा भी देगा कि प्रयोगकर्ता  खुद अपना वर्चुअल आईडी बना सकें. इस तरह कोई भी अपनी मर्जी का एक नंबर चुनकर सामने वाली एजेंसी को सौंप सकता है . इससे न सिर्फ किसी भी व्यरियां सुरक्ष‍ित रहेगी, बल्क‍ि वह   अपने मोबाइल नंबर की तरह इस आईडी को भी आसानी से याद रख सकेंगे.वर्चुअल आईडी की व्यवस्था आने के बाद हर एजेंसी आधार वेरीफिकेशन के काम को आसानी से और बगैर कागज़ के इस्तेमाल किये हुए  कर पाएंगी. जिससे हर साल लाखों टन कागज बर्बाद होने से बचेगा वहीं कोई भी एजेंसी या कम्पनी किसी के आधार नम्बर  तक नहीं  पहुँच पायेगी लेकिन आधार से जुड़ा हर काम हो जाएगा. सबसे अच्छी बात यह होगी कि वह आपके आधार नंबर तक तो नहीं पहुंच पाएंगे, पर आधार से जुड़ा  हर काम बड़ी आसानी से  हो जाएगा . भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यू आई डी ए आई ) सभी एजेंसियों को दो भागों  में बांट देगी. जिसमें एक स्थानीय और दूसरी वैश्व‍िक श्रेणी की  होगी. इनमें से सिर्फ वैश्व‍िक एजेंसियों को ही आधार नंबर के साथ ई-केवाईसी की सुविधा उपलब्ध होगी. वहीं, दूसरी ओर स्थानीय एजेसियों को सीमित केवाईसी की सुविधा मिलेगी.भारत जैसे देश में तकनीक के स्तर पर यह एक क्रांतिकारी कदम होगा पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि  सिद्धांत और व्यवहार में काफी अंतर  होता है तकनीकी ज्ञान के मामले में भारत अभी भी बहुत पिछड़ा है,सूचना तकनीकी का इस्तेमाल शहरी  युवा ज्यादा कर रहे हैं पर भारत इनसे नहीं बनता है भारत बनता है गाँवों से  तो वहां की जनता वर्चुअल आई डी बनाने में आने वाली समस्याओं से कैसे निपटेगी.इंटरनेट सेवाओं का विस्तार शहरों और उनके इर्द गिर्द के कस्बों में ज्यादा हो रहा है|सामन्यत:एक ग्रामीण इलाके के निवासी की खरीद क्षमता शहरी निवासी से कम होती है इसीलिये बैंडविड्थ और कनेक्टीविटी की समस्या ग्रामीण इलाकों में ज्यादा है| तो डर इसी बात का है कि कहीं आधार कार्ड के आंकड़े की सुरक्षा  के लिए उठाया गया ये कदम भी नोट्बंदी और जीएसटी की तरह कहीं गलत क्रियान्वयन का शिकार न हो जाए और कीमत आम लोगों को भुगतनी  पड़े .
 आई नेक्स्ट (दैनिक जागरण ) में 22/01/17 को प्रकाशित 


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