Monday, July 13, 2020

भारतीय एप्स के लिए दिल्ली अभी दूर हैं

अंताक्षरी का समय बीत गया लेकिन पिछले कुछ वक्त तक “समय बिताने के लिए करना है कुछ काम”  की श्रेणी में हमारे पास चीनी ऐप टिक टॉक था लेकिन  राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए सरकार द्वारा टिक-टॉक समेत 59 चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया है |टिक-टॉक के गूगल प्ले स्टोर से  हटते ही भारतीय ऐप-चिंगारी  दस मिलीयन से ज्यादा बार डाउनलोड हो गया |इसी के साथ रोपोसो, मित्रों जैसे शुद्ध भारतीय ऐप्स लोगों की पसंद बनने लग गए |चिंगारी यूजर्स को वीडियो डाउनलोड करने और अपलोड करने, दोस्तों के साथ चैट करने, नए लोगों के साथ बातचीत करने, सामग्री साझा करने और फीड के माध्यम से ब्राउज करने की अनुमति देता है|यह ऐप्लिकेशन अंग्रेजी, हिंदी, बंगला, गुजराती, मराठी, कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तमिल और तेलुगु भाषा में उपलब्ध है | चिंगारी एप से कोई भी टिक-टॉक की तरह  शॉर्ट वीडियो बना सकता है और उसे अपने साथियों  के साथ शेयर कर सकता है | इसका मतलब यह है कि चीन के एप का विकल्प भारत में है और भारतीयों को अपने डाटा की सुरक्षा के बारे में अनावश्यक चिंता करने की जरुरत नहीं पर सवाल यह उठता है कि ऐसा पहले क्यों नहीं हुआ ?इसका एक बड़ा कारण इंसान का डाटा में परिवर्तन और जिसके पास ज्यादा डाटा वह कम्पनी व्यवसायिक रूप से ज्यादा शक्तिशाली होगी |
भारत की एप इकोनोमी बहुत तेजी से बढ़ रही है जबकि चीन राजस्व और उपभोग के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ  है| वहीं अमेरिकन कम्पनियां एप निर्माण के मामले में  शायद सबसे ज्यादा इनोवेटिव (नवोन्मेषी ) हैं |भारत सबसे ज्यादा प्रति माह  एप इंस्टाल करने और उसका प्रयोग करने के मामले  में अव्वल है |भारतीय एप परिद्रश्य का नेतृत्व टेलीकॉम दिग्गज एयरटेल और जिओ  करते हैं यद्यपि स्ट्रीमिंग कम्पनियाँ जैसे नोवी डिजिटल और जिओ सावन और पेटी एम् ,फोन पे और फ्लिप्कार्ट जैसी  ई कोमर्स साईट्स ने अपने आप को वैश्विक परिद्रश्य पर भी स्थापित किया है |फोर्टी टू मैटर्स डॉट कॉम साईट्स के मुताबिक़ गूगल प्ले स्टोर पर  कुल 882,939 एप पब्लिशर्स में से 24359 भारतीय एप पब्लिशर्स हैं |कुछ बड़े भारतीय एप पब्लिशर्स में गेमेशन टेक्नोलॉजी,वर्ड्स मोबाईल,मूटोन,मिलीयन गेम्स ,एआई फैक्ट्री जैसे नाम शामिल हैं | गूगल प्ले स्टोर्स में उपलब्ध सभी एप पब्लिशर्स  में से मात्र तीन प्रतिशत एप पब्लिशर्स ही भारतीय हैं |वहीं गूगल प्ले स्टोर पर कुल एप्स की संख्या 2,942,574, है जिसमें भारतीय एप की संख्या 121,834 है  जो प्ले स्टोर पर कुल उपलब्ध एप्स का मात्र चार प्रतिशत है |

आंकड़ों के  नजरिये से देश में  उपभोक्ताओं की उपलब्धता के हिसाब से भारतीय एप की संख्या बहुत ही कम है |वैश्विक परिद्रश्य में आंकड़ों के विश्लेषण से कई रोचक तथ्य सामने आते हैं जैसे प्ले स्टोर्स पर उपलब्ध कुल भारतीय एप पब्लिशर्स की औसत रेटिंग पांच में से  3.65 है जो प्ले स्टोर पर सभी पब्लिशर्स की औसत रेटिंग 3.22 से बेहतर है |उसी तरह प्ले स्टोर पर भारतीय एप की औसत रेटिंग 1874 है जबकि प्ले स्टोर पर उपलब्ध सभी एप की औसत रेटिंग 1,112 से ज्यादा है|आंकड़ों की दुनिया से दूर कुछ धरातल की बात क्यों भारतीय एप वैश्विक स्तर पर सफल नहीं है |ऐप बनाना बहुत महंगा काम नही है   परन्तु ऐप की मार्केटिंग एक अत्यंत ही महँगा और समय लेने वाला काम है।भारत मे फंडिंग इको सिस्टम का कम विकसित होना जिसके कारण ऐप निर्माताओं को फंडिंग नही हो पाती।ज्यादातर  फण्ड प्रदाता विदेशी है और उनमें से भी  मुख्य चीन के सॉफ्ट बैंक और अलीबाबा जैसी कम्पनियां शामिल है|  भारतीयों में क्रिएटिविटी की कमी नही है पर जो ऐप बनते हैं उनका उतना प्रचार नही हो पाता जिसके कारण भी भारतीय ऐप इतने प्रसिद्ध नही हो पाए | चायनीज ऐप की प्रसिद्धि के पीछे चायनीज मोबाइल्स का भी बड़ा हाँथ है। ये ज्यादातर ऐप प्रिइंस्टॉल्ड होने के कारण काफी ज्यादा रीच कम समय मे पा जाते हैं जबकि इंडिया के ऐप को ये सुविधा  नही मिलती|किसी भी भारतीय कम्पनी का मोबाईल इतनी ग्लोबल रीच नहीं रखता |भारत चीन के बाद दुनिया में सबस बड़ा मोबाईल बाजार है पर कोई भी भारतीय कम्पनी मोबाईल बाजार में अपना स्थान नहीं बना पाई |एप बाजार में भारत के पिछड़े होने के एक बड़ा कारण भारत और चीन की स्कूली शिक्षा में भी बहुत अंतर होना भी  है । भारत मे अभी भी बच्चे परम्परागत पढ़ाई ही पढ़ रहे और उन्हें एक्सपेरिमेंट करने की ज्यादा छूट नही है | स्कूल स्तर  पर कंप्यूटर शिक्षा पर दो तरह की समस्याओं का शिकार है| पहला स्कूलों में अभी भी फोकस एम् –एस वर्ड,एक्सेल,पावर प्वाईंट आदि पर है |दूसरा कंप्यूटर की प्राथमिक भाषाओँ को सिखाने में सारा जोर “बेसिक” और “लोगो” जैसी भाषाओं पर ही है |एक समय की अग्रणी कंप्यूटर भाषाएँ जैसे सी, लोगो ,पास्कल ,कोबोल बेसिक ,जावा जो की अब चलन से बाहर हो चुकी हैं अभी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं जबकि कंप्यूटर प्रौद्योगिकी में अग्रणी देश ओपेन सोर्स सोफ्टवेयर और ओपन सोर्स लेंग्वेज को अपना चुके हैं जैसे कि  आर , पायथॉन,   रूबी  ऑन  रेल, लिस्प , टाइप स्क्रिप्ट , कोटलिन , स्विफ्ट और रस्ट इत्यादि |लेकिन इंटरनेट और मोबाईल क्रांति होने के साथ अब आने वाले दशक में इसमे वृद्धि होने की संभावना है |आंकड़े बताते है की आने वाले वक्त में एप बाजार में बड़ा परिवर्तन तभी होगा जब हम कंप्यूटर शिक्षा में नवाचार को बढ़ावा दें और स्टार्ट अप कम्पनियों को वित्त के लिए इधर उधर भटकना न पड़े |जाहिर है भारतीय एप के डिजीटल प्लेटफार्म पर बढ़ती संख्या देश की बड़ी आबादी का जहाँ जीवन आसान करेगी वहीं साइबर अपराध  जैसे मुद्दे पर एक नेटीजन  के तौर पर एक आम भारतीय अपने डाटा को लेकर ज्यादा सुरक्षित महसूस करेगा |
नवभारत टाईम्स में 13/07/2020 को प्रकाशित 

Wednesday, July 1, 2020

जागरूक करती फ़िल्में

कोरोना काल में जब सामजिक मेल जोल बंद है.हमारे जैसे लोग फ़िल्में देखकर इस बुरे समय को बिता रहे हैं . फिल्मों के कथानक चाहे जितने ही काल्पनिक क्यों न हों वे समय और समाज से कटे हुए नहीं रह सकते सिनेमा ने हमेशा समाज को आइना दिखाया है, और बताया है सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं बल्कि एक संसार है जो जीवन के हर एक भाग को छूता ही नहीं बल्कि प्रभावित भी करता है .उनका प्रस्तुतीकरण भले ही काल्पनिक हो लेकिन समस्या  अपने समय  की ही होती हैं जैसे लोगों को फिल्में देखने का रोग होता है वैसे ही हिन्दी फिल्मों ने समय समय पर विभिन्न रोगों को कहानी का आधार बनाया है और दर्शकों को बताने की कोशिश की है की ये रोग क्या हैं ?भले ही ये बात आपको आश्चर्य जनक लगे लेकिन फिल्में समय से निरपेक्ष नहीं रह सकती जो भी समाज में है वो फिल्में जरूर दिखाती है.बात शुरू करते हैं १९५३ में बनी फ़िल्म आह से, उस वक़्त तपेदिक या टीबी एक लाइलाज रोग था नायक राजकपूर टीबी का शिकार होता है लेकिन नायिका नर्गिस तमाम सामाजिक प्रतिरोधों के बावजूद नायक का साथ देने का फ़ैसला करती है .खामोशी फ़िल्म मानसिक रोग की समस्या को दिखाती है .हिन्दी सिनेमा के इतिहास मे जिस रोग को सबसे ज्यादा बार दिखाया गया है वह है कैंसर आनंद ,सफर , मिली दर्द का रिश्ता ,वक्त रेस अगेंस्ट टाइम सभी फिल्मों के कथानक का आधार कैंसर ही था कमजोर ह्रदय की बीमारी पर मशहूर फ़िल्म कल हो न हो या यादाश्त जाने की बीमारी पर बनी फ़िल्म सदमा में श्रीदेवी और कमल हसन के भाव प्रवण अभिनय को कौन भूल सकता है जल्दी ही प्रर्दशित हुई फ़िल्म तारे जमीन पर डीस्क्लेसिया बीमारी की प्रॉब्लम से जूझ रहे पेरेंट्स के लिए उम्मीद की एक नयी किरण लेकर आयी है इसी कड़ी में स्जोफ्रिनिया रोग पर आधारित फ़िल्म यु मी और हम का नाम लिया जा सकता है . अंधेपॅन की समस्या रोग है या विकलांगता यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन हमारे फिल्मकारों ने इस समस्या को बड़े ही सार्थक तरीके से सिनेमा के परदे पर उतारा है.
अंधेपन की समस्या पर बनी फिल्मों में दोस्ती , मेरे जीवन साथी , जुर्माना, स्पर्श, ब्लैक , आँखें (नयी ), परवरिश आदि. प्रमुख हैं . ऐड्स रोग पर बनी फ़िल्म फ़िर मिलेंगे और ‘माय ब्रदर निखिल’ ने जिस तरह रोग के बारे में दर्शकों को जागरूक किया है वो सराहनीय है . अगर इन फिल्मों के टाइम पीरियड पर गौर करें तो साफ पता चलेगा की जिस टाइम पर समाज जिस रोग का जायदा शिकार हो रहा था फिल्मों की कहानियो में वैसे ही रोग शामिल हो रहे थे . फिल्मों में रोगी का चित्रण वास्तविक रोगियों में एक आशा का संचार करता है जो किसी भी गंभीर रोग से पीडित व्यक्ति के लिए बहुत जरुरी है उसे जीने की शक्ति और सकरात्मक उर्जा मिलती है. यानि लिव लाइफ किंग साइज़ हिन्दी फिल्मों का एक मशहूर डायलोग है इसे दवा की नहीं दुवा की जरुरत है ऐसी फिल्में वाकई रोगियों के लिए दुआ का काम करती है. ये फिल्मों का रोग है या रोग पर बनती फिल्में इसका आंकलन किया जाना बाकी है .मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही हम इस बुरे वक्त से निकल जायेंगे तो कोरोना पर भी कोई  शानदार फिल्म देखने को मिलेगी.
प्रभात खबर में 01/07/2020 को प्रकाशित लेख 

Thursday, June 18, 2020

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :छठा भाग



अगले दिन हमें दुनिया के सबसे खुबसूरत “समद्री बीच” में से एक  राधानगर बीच की यात्रा करनी थी पर उससे पहले हमें विकल्प दिया गया कि “क्या हम स्कूबा डाइविंग करना चाहते हैं”?जीवन में कोई एडवेंचर तो बचा नहीं था इसलिए सोचा गया क्यों न एक चांस लिया जाए |शुरुआत में तो  लगा यूँ हो जाएगा |हमारे हाँ कहते ही पहले हमें एक जिप्सी में लादा गया और एक बियावान से एरिये में ले जाया गया गया जो स्कूबा डाइविंग सेंटर था |
स्कूबा डाइविंग का अनुभव 
वहां दो जवान लड़कों ने हमारा स्वागत किया और हमें स्कूबा डाइविंग के बारे में बताया गया |उनके दो स्लॉट थे |प्रीमियम सुबह छ बजे से आठ बजे तक प्रीमियम और आठ बजे से एक बजे तक नार्मल |प्रीमियम का शुल्क चार हजार रुपये मात्र जिसमें आधे घंटे की स्कूबा डाइविंग फोटोग्राफ और वीडियो भी शामिल थे  जबकि  नार्मल में सबकुछ वही था पर समय बदल गया था |मैंने पूछा समय बदलने से पैसा कम क्यों हो रहा है ?तब मुझे बताया गया कि सुबह छ से आठ समुद्र के भीतर द्र्श्यता अच्छी रहती है उसके बाद लोगों के आने जाने से द्र्श्यता प्रभावित होती है इसलिए समुद्री जीवन उतना स्पष्ट नहीं दिखता |हमारे पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि तब तक सुबह के दस बज चुके थे |हमारे सामने दो फॉर्म रख दिए गए जिसमें अपने स्वास्थ्य और बीमारियों का ब्यौरा देना था ,साथ ही यह भी घोषणा करनी थी कि इस दौरान अगर कोई दुर्घटना हो जाती है तो कम्पनी की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी |वो फॉर्म इतना बड़ा था कि मुझे डर लगना शुरू हो गया |मैंने अपने इंस्ट्रक्टर से पूछा क्या यह वाकई में सुरक्षित होने वाला है ?उसने आत्मविश्वास से कहा आप बिलकुल चिंता न करें एक आदमी जब तक आप पानी के नीचे रहेंगे |आपके साथ रहेगा ,आपको बस अपने आपको उसके हवाले करके समुद्र के अन्दर की खूबसूरती को निहारना है |अब फंस चुके थे |अगर कहते डर लग रहा है तो और परेशानी क्योंकि अगुआ हमीं थे |मैंने अपने डर को कम करने के लिए अपने इंस्ट्रक्टर से बात चीत शुरू कर दी,कागजी कार्यवाही के बाद हमें विशेष डिजाइन वाले स्कूबा सूट पहनने थे जिसमें समय लग रहा था |
बीस फीट पानी के अंदर से सूरज ऐसा दिखता है 
मेरा इंस्ट्रक्टर जिसका नाम अब मैं भूल चुका हूँ |चेन्नई का एक ऑटोमोबाईल इंजीनियर था जो एक बार
हेवेलॉक घूमने आया फिर नौकरी छोड़ कर यहीं रह गया |स्कूबा डाइविंग का उसने कोर्स वगैरह शायद पुदुचेरी से किया फिर यही काम करने लग गया |उसने बताया पैसे बहुत कमाए पर अब वो जीवन का लुत्फ़ उठाना चाहता था |मैंने उसे बधाई दी और कहा दोस्त इस देश में बहुत कम ऐसे खुशनसीब लोग हैं जो वो कर पा रहे हैं |जो वो अपने जीवन में वाकई करना चाहते हैं |आज भी उस मृदुभाषी श्यामवर्णी इंसान का चेहरा मेरी आँखों के आगे घूम जाता है जो अपनी शर्तों पर जीवन जी रहा है |हमने अपने डर को काबू करने के लिए कहा यहाँ सिर्फ अंडमान राज्य की गाडिया दिखती हैं उसने दार्शनिक अंदाज में कहा “यहाँ आने के रास्ते तो बहुत हैं पर जाने का एक ही” इसीलिये गाड़ियों की चोरी नहीं होती ,कोई चुरा के ले के कहाँ जाएगा |मन में आया उससे कहूँ क्या यहाँ कबाड़ी नहीं है जो गाड़ियाँ काट डालते हैं और आपको कभी पता ही नहीं चलता आपकी गाड़ी गयी कहाँ ?बातों –बातों में हम तैयार हो गए |काले नीले रंग का स्किन टाईट सूट ,नाक को ढंकते हुए आँखों पर लगने वाला चश्मा ,बड़े –बड़े पैर की साईज के फिन लेकर हम उसकी मारुती वैन में बैठा दिया गया |गाडी में हमारे साथ बड़े और भारी ऑक्सीजन सिलेंडर ,कमर पर बांधे जाने वाला पत्थरों का एक पट्टा सब लाद दिया गया |
समुद्री जीवन 
अब हमें उस जगह जाना था जहाँ से हम सबको स्कूबा डाइविंग के लिए समुद्र के भीतर ले जाया जाने वाला था |तब तक मैं बहुत प्रसन्न और स्कूबा के लिए बड़ा उत्सुक था |स्कूबा डाइविंग की जगह हेवेलॉक की जेटी(वो स्थान जहाँ से जहाज आते और जाते हैं ) के करीब थी |करीब दस मिनट की यात्रा के बाद हमारी वैन उस जगह रुक गयी |कई छोटे बच्चे हँसते –मुस्कुराते स्कूबा डाइविंग का अपना सेशन करके लौट रहे थे |उनको हँसते मुस्कुराते मेरा डर कुछ कम हुआ |मेंग्रोव के जंगलो के किनारे उस जगह लोगों का काफी हुजूम था |बच्चे बूढ़े और जवान समुद्र के अन्दर की अनोखी दुनिया को देखना चाह रहे थे |हम भी उन लोगों के हुजूम में शामिल हो गए |एक रजिस्टर में सबके नाम दर्ज किये गए जो समुद्र के अंदर जा रहे थे साथ ही उनके इंस्ट्रक्टर के भी नाम |अब हम उथले समुद्र में थे |पीठ पर ऑक्सीजन के सिलेंडर लाद दिए गए पैरो में फिन ,अब हमारा ट्रेनिंग सेशन शुरू हुआ |बीस फीट पानी के नीचे आप कुछ बोल नहीं सकते क्योंकि मुंह में ऑक्सीजन के सिलेंडर की पाईप लगी हुई होती |इसलिए नीचे इशारों से काम चलाया जाता है वो सारे इशारे सीखाये गए |मुंह में पानी चला जाए तो क्या करना है ,चश्मा गन्दा हो जाए तो बगैर हाथ के उसे कैसे साफ़ करना आदि ,आदि |

हेवेलॉक की हरियाली 
अब बारी थी पानी के अन्दर जाने की उससे पहले ट्रायल ,उससे पहले अपने चश्मे के देखे जाने वाले भाग पर थूकने को कहा गया |फिर उस थूक को उंगली से उस प्लास्टिक के चश्मे को रगड़ने को कहा गया ,हमारे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था |ये थूकने का काण्ड क्यों करवाया गया इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला |शायद थूक में खारा पन नहीं होता इसलिए चश्मा ठीक से साफ़ हो जाता है जो भी हो |अभी मेरी और मौज ली जाने वाली थी |मुझसे ट्रायल के तौर में समुद्र के पानी में डुबकी लगाने को कहा गया मैंने डुबकी के बाद कहा “यहाँ का पानी ज्यादा खारा क्यों है” उसका जवाब भी तुर्की बा तुर्की था उसने कहा यहाँ ज्यादा टूरिस्ट हैं ये उनके पेशाब के कारण है |तो पेशाब और थूक के बीच हम स्कूबा के लिए तैयार हो रहे थे |स्कूबा के लिए जरुरी है कि आप भूल जाएँ कि आपके पास नाक जैसी भी कोई चीज है आपको मुंह से ही सांस लेनी है और छोडनी और ये लय जहाँ टूटी वहां आप संकट में पड़ जायेंगे |नाक को चश्मे का कवर ढांक कर बंद देता है फिर भी थोड़ी बहुत सांस आप उससे ले सकते हैं |लेकिन समुद्र के अंदर अगर ऐसा हुआ तो समुद्र का पानी भी नांक के अंदर जाएगा और जो समस्या पैदा कर देगा |हमें एक बात बार –बार समझाई गयी |आपको समुद्र के अंदर अपनी समस्या से खुद निपटना है |घबराना नहीं है और शांत दिमाग से समस्या का हल ढूँढना है |जैसे –जैसे आप नीचे जायेंगे पानी का दबाव बढेगा और कान बंद होंगे इसके लिए हमें अपनी पहले से ही बंद नाक को हाथ से और बंद करके जोर से नाक से सांस छोडनी होगी जिससे कान का भारीपन हट जाए |मैं दो मिनट भी पानी में नहीं टिक पा रहा है और घबरा के ऊपर आ जा रहा था |अभी तो हम गहरे पानी में गए भी नहीं तब मेरा यह हाल था |मैं अपने इंस्ट्रक्टर की सारी हिदायतें मान रहा था पर फिर भी घबरा जा रहा था |यही अंतर होता है थ्योरी और प्रैक्टिकल में |
जारी ..............................


Wednesday, June 17, 2020

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :पांचवां भाग

अंडमान के द्वीपों की ख़ास बात है इनका हरियाली से भरा –पूरा होना ,चूँकि केंद्र सरकार के अधीन होने के कारण और सामरिक द्रष्टि से महतवपूर्ण होने के कारण यहाँ नियम क़ानून का पालन कड़ाई से होता है |यहाँ स्थाई निर्माण करने के लिए पर्यावरण संबंधी क्लीयेरेंस लेना पड़ता है इसलिए यहाँ की हरियाली अभी बची हुई है |
 हेवेलॉक में स्वागत है 
यह बात भी सही है कि अब यहाँ पर्यटकों का दबाव बढ़ रहा है और लौटते वक्त मैंने यहाँ के स्थानीय  अखबार में खबर पढी कि किसी गाँव के जिला पंचायत अध्यक्ष ने अपना पक्का मकान बना लिया वो भी बगैर अनुमति लिए |यहाँ के पहाड़ और जंगल कब तक बचेंगे कह पाना मुश्किल है क्योंकि जनसंख्या का दबाव यहाँ बढ़ रहा है |उत्तरप्रदेश चेन्नई ,पश्चिम बंगाल और बिहार के लोग यहाँ आ कर बस रहे हैं और बाद में वे अपने रिश्तेदारों को  बुलाकर भी बसवा रहे हैं |यहाँ पर्यटन के अतिरिक्त कुछ ख़ास नहीं है इसलिए ज्यादा से  ज्यादा होटल और रिसोर्ट खोलने की होड़ मची है | हेवेलॉक के जिस रिसोर्ट में रुके थे उसके ठीक सामने ऐसे ही एक होटल का निर्माण जारी था |शायद अगली बार वो जगह इतनी शान्ति  मुझे न मिले | हेवेलॉक पर उतरते ही हमारा स्वागत  हरे भरे समुद्र ने किया |क्रूज से सामान उतारा गया हम अपने  रिजोर्ट की तरफ बढ़ चले | हेवेलॉक एक छोटे कसबे जैसा है |जेटी से आगे बढ़ने पर एक छोटा सा बाजार पड़ता है जहाँ काम आने वाली सारी चीजें उसी कीमत पर उपलब्ध हैं|जैसी मुख्य भूमि पर शाम होने को आ रही थी |सड़कों पर आवाजाही कम हो रही थी |वैसे भी जनसँख्या ज्यादा न होने के कारण मुख्य बाजार छोड़ कर कहीं कोई भीड़ नहीं थी |यहाँ के द्वीपों की ख़ास बात यह है कि यहाँ किसी तरह का कोई अपराध नहीं है |वैसे भी कोई अपराधी करके भाग कहाँ जायेगा |चारों तरफ सिर्फ समुद्र ही है |नारियल के पेड़ और बांस के झुरमुटों से गुजरते हुए हम रिजोर्ट से सीधे काला पत्थर बीच की और चल पड़े |यहाँ के बीच गोवा के बीच की तरह हैपीनिंग नहीं हैं |उसका बड़ा कारण शराब का बहुतायत में न उपलब्ध होना और दूसरा अंडमान पर हर कोई नहीं पहुँच सकता इसलिए सब कुछ बड़ा अनुशासित और शांत हैं | रिसॉर्ट पहुँचते ही फैसला यह किया गया कि काला पत्थर बीच का चक्कर लगा लिया जाये और समुद्र को करीब से महसूस कर लिया जाए |अंडमान आये हुए हमें चौबीस घंटे से ज्यादा वक्त बीत चुका था लेकिन समुद्र के पानी को छूने का मौका नहीं मिला था तो हमारे रिसॉर्ट से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर था काला पत्थर बीच |

काला पत्थर बीच का अभी व्यवसायीकरण नहीं हुआ है |एकदम शांत माहौल |कुछ दुकाने जिसमें नारियल पानी और मैगी उपलब्ध है |कुछ दुकाने नहाने के लिए कपडे भी बेंच रही थीं |बीच पर भी कोई ज्यादा भीड़ नहीं थी |हमने मौका गंवाए बिना समुद्र में एक डुबकी लगा ली पर गोवा और पुरी के समुद्र के मुकाबले यहाँ के समुद्र का पानी बहुत ज्यादा खारा लगा हो सकता है यह मेरा भ्रम हो पर समुद्र के साथ अठखेलियाँ करते हुए ज्यादा वक्त नहीं बीता था कि एक जोरदार सीटी की आवाज सुनाई पड़ी |जो इशारा था समुद्र से बाहर आने का वक्त हो चुका है |समुद्र में तैनात गार्ड सबको पानी से बाहर आने का ईशारा कर रहे थे |इसका दो कारण थे ,पहला अँधेरा होने का था ऐसे में अगर समुद्र में कोई रह गया तो उसका कोई पता नहीं चलेगा क्योंकि आस –पास, दूर –दूर तक कोई आबादी नहीं थी दूसरा शाम के वक्त समुद्र में ज्वार आता है जिससे समुद्र में गए लोगों को खतरा हो सकता है |

हम बेमन से समुद्र से बाहर निकले पर बीच धीरे –धीरे एकदम खाली हो गया |हमारे देखते –देखते सूरज भी डूब गया |उस गोधूलि में हम उस उमस भरे दिन नमकीन बदन के साथ ,प्रकृति के कई रंग एक साथ देख रहे थे |हम वाकई खुशनसीब थे जो देश की इस अंतिम सीमा में अनछुए प्राकृतिक दृश्यों को निहार पा रहे थे |हमारे सामने एक छोटी सी नाव पर चार व्यक्तियों को एक समूह पतवार खेते हुए समुद्र में मेरी नजरों से ओझल हो गया |इस विशाल समुद्र में वो भी एक छोटी सी नांव पर कहाँ जा रहे थे

वे लोग इसका पता न चल सका |थोड़ी देर मैंने उस खाली हो चुके समुद्री किनारे पर नंगे पैर चहलकदमी की |जब हम वापसी के लिए निकले रात की कालिमा माहौल को घेर चुकी थी |नारियल पानी चूँकि हर जगह बहुतायत से उपलब्ध है मैंने नारियल पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई और अपने रिसोर्ट वापस आ गए |

जारी.......................................................


Monday, June 15, 2020

घर बैठे दुनिया में मशहूर बनाने वाला ऐप

भारत में चाइनीज ऐप टिकटॉक के बूम के पीछे छोटे शहर, कस्बे और अनगिनत गांवों के बेशुमार लोग हैं। इस विडियो ऐप में आपको एक-से-एक नायाब, हुनरमंद और हंसोड़ मिल जाएंगे। इन जगहों और लोगों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर बहुत सही प्लैटफॉर्म नहीं थे।

वजह यह थी कि ‘हम तो भई जैसे हैं, वैसे रहेंगे’ की उनकी टेक टिकटॉक पर ही कायम रह सकती थी, कहीं और नहीं। वे अपनी तमाम नादानियों और दिक्कतों के साथ यहां बेलौस मौजूद हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि उनके इस तरह होने को कोई ‘जज’ नहीं कर रहा। यहां उनके विडियो वायरल हो रहे हैं और रातोंरात वे सेलिब्रिटी बन रहे हैं।

टिकटॉक भारत में बिल्कुल सही वक्त पर पहुंचा। साल 2016 का वह मंजर याद कीजिए। रिलायंस जियो लॉन्च ही हुआ था। लोगों को सस्ता डेटा मिलना शुरू हुआ। टिकटॉक ने मौका ताड़कर अपनी जगह बनानी शुरू की। मार्केट इंटेलिजेंस फर्म कलागतो (KalaGato) के आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2019 तक इस ऐप को एक तिहाई भारतीय स्मार्टफोन यूजर्स ने डाउनलोड कर लिया था।

भारतीय इस ऐप पर दुनिया के किसी भी दूसरे मुल्क के नागरिकों की तुलना में ज्यादा समय बिताते हैं। अपने पसंदीदा सेग्मेंट में एक औसत भारतीय टिकटॉक पर 34.1 मिनट समय बिता रहा है। इसकी तुलना में इंस्टाग्राम पर भारतीयों का 23.8 मिनट ही बीत रहा है।

टिकटॉक से कई ब्रैंड एंफ्लुएंसर ठीक-ठाक कमाई भी करने लगे हैं। इस ऐप ने पेप्सी, स्नैपडील, मिंट्रा, शादी डॉटकॉम से करार किया है। स्टेटिस्टा के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में फेसबुक के 30 करोड़ यूजर्स हैं। टिकटॉक के 20 करोड़। देश में साल 2020 तक इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 67% यूजर्स 35 साल से कम उम्र के हैं। युवाओं और टीनएजर्स के बीच टिकटॉक की बढ़ती लोकप्रियता का अध्ययन करने वाले मानते हैं कि 2020 इस चाइनीज ऐप के लिए दुनिया में तहलका मचाने वाला साल साबित हो सकता है।

मार्केट इंटेलिजेंस फर्म सेंसर ‘टावर’ के आंकड़ों के मुताबिक, 2019 की पहली तिमाही में टिकटॉक ने फेसबुक से सबसे ज्यादा डाउनलोड किए जाने वाले ऐप का ग्लोबल खिताब तक छीन लिया। टिकटॉक को 18.8 करोड़ डाउनलोड मिले, जिसमें 47% यूजर्स भारतीय थे। फेसबुक को 17.6 करोड़ डाउनलोड हासिल हुए, जिसमें भारतीय 21% थे।

आम लोग बन रहे हैं सेलिब्रिटी
बढ़ती फेक न्यूज की आमद और चारित्रिक हनन की कोशिशों के बीच लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साइट्स ट्विटर और फेसबुक पर यूजर्स का अनुभव उतना सुहाना नहीं रह गया है, जितना आज से कुछ साल पहले रहा करता था। ऐसे में वे यूजर्स जो समाचार और राजनीति से इतर कारणों से सोशल मीडिया पर थे, एक विकल्प की तलाश में थे। टिकटॉक ने उन्हें वह विकल्प मुहैया कराया।

इंटरनेट की अगली लहर जब भारत में आएगी, उसमें 40 करोड़ नए यूजर्स जुड़ जाएंगे। उनके लिए सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अपने अनुभव बांटने के लिए मौजूदा विकल्पों में टिकटॉक सबसे लुभावना हो सकता है। इसकी एक खास वजह है।

फेसबुक, स्नैपचैट और ट्विटर के इंटरफेस पश्चिम के यूजर्स की रुचियों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, जबकि टिकटॉक के मामले में ऐसा नहीं है। यहां 15 सेकेंड्स की स्क्रीन प्रेजेंस और ऑडिएंस हर उस शख्स को मिल सकती है, जो अन्यथा बहुत अनजाना रहता आया है। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि अगर आप हुनरमंद हैं, तो दुनिया आपको जानेगी। दाद देगी। मिसाल के लिए विष्णु प्रिया नायर, जिन्होंने ‘तेरे लिए...’ और ‘आशियाना...’ गानों पर लगाई गई अपनी टिकटॉक पोस्ट में लिपसिंग की है। इनके करीब 30 लाख फॉलोअर्स हैं।

गौरव अरोड़ा को तो टिकटॉक का विराट कोहली कहा जाता है। इनके करीब 3.5 करोड़ फॉलोअर्स हैं। अरोड़ा अपनी टिकटॉक फैन फॉलोइंग की बदौलत सोनम कपूर की फिल्म ‘द जोया फैक्टर’ के प्रमोशन में भी शामिल किए गए। भावेन भानुशाली को टिकटॉक की बदौलत ही अजय देवगन की फिल्म ‘दे-दे प्यार दे’ में ऐक्टिंग का मौका मिला। यह टिकटॉक की लोकप्रियता का ही कमाल है कि फिल्मी दुनिया के बड़े सितारे इससे धड़ल्ले से जुड़ रहे हैं।

फेसबुक और ट्विटर जैसे ऐप के साथ एक तरह का अभिजात्य भी था। टिकटॉक के साथ ऐसा नहीं है। इसके लाखों यूजर्स ऐसे भी हैं, जो अंग्रेजी नहीं बोलते। लेकिन इसे लेकर उनके मन में कोई हीन भावना नहीं। दरअसल अंग्रेजीदां इंसान काफी पहले से नेटसेवी था। इसलिए जब सोशल मीडिया के क्षेत्र में नए प्लेयर्स आए, तो उन्होंने भांप लिया कि उनके टारगेट कंस्टमर्स इंटरनेट के नए यूजर्स होंगे।

ये यूजर्स-जैसा कि पहले बताया गया- छोटे शहरों, गांवों और गैर-अंग्रेजी क्षेत्रों में ताल्लुक रखते हैं। अपनी बोली-बानी में सहज हैं। टिकटॉक ने इन्हें ही ध्यान में रखकर अपने ऐप को 10 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया। टिकटॉक की कामयाबी का एक कारण इसका सादा और सरल होना भी है।

इसकी एक विडियो पोस्ट के लिए आपको स्टूडियो या वॉयस रेकॉर्डिंग उपकरण तक पहुंचने की दरकार नहीं है। ऐप में ही सारे फीचर्स इन-बिल्ट हैं। अलग-अलग फिल्टर्स और बैकग्राउंड चेंज जैसे टूल से मजा दूना हो जाता है। हैश टैग का इस्तेमाल यूजर्स को कंटेंट को पहचानने में मदद करता है। इससे चुटकुले से लेकर दूसरे फॉर्मेट में बनाए गए तमाम विडियोज लोग रीयल टाइम में देख पाते हैं। हालांकि इस तरह के विडियोज से कुछ दिक्कतें भी पैदा हुईं।

बैन के बाद ऐप ने किए कई उपाय
18 फरवरी 2020 को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने एक पोस्ट साझा किया। उसमें एक शख्स दोस्तों के साथ टिकटॉक विडियो शूट करते दिख रहा था। उसी दौरान वह ट्रेन से गिरा और उसकी मौत हो गई। इससे यह बात सामने आई कि कैसे यूजर्स टिकटॉक पर एक विडियो वायरल करने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।

जुलाई 2019 में भी कुछ ऐसा ही हुआ। तब बिहार के एक टिकटॉक यूजर ने विडियो बनाते हुए बाढ़ के पानी में डाइविंग स्टंट की कोशिश की और जान गंवा बैठा। फरवरी 2020 में कुछ लोगों ने एक युवक को नंगा करके घुमाया क्योंकि वह उनके परिवार की लड़की का टिकटॉक विडियो बना रहा था। बढ़ते हुए हादसों के बाद टिकटॉक कानून के दायरे में आया। उस पर सख्ती हुई।

अप्रैल 2019 में गूगल प्ले स्टोर और एपल ऐप स्टोर से इस ऐप को हटा लिया गया था, क्योंकि अदालत ने फैसला दिया कि यह अश्लीलता को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि दो सप्ताह बाद ही इस फैसले को पलट दिया गया। ऐप के प्रभावों की जांच करने के लिए नियुक्त किए गए वकील ने कहा कि बैन लगाना समाधान नहीं है। इसके जायज यूजर्स के अधिकारों की सुरक्षा करने की दरकार है।

इसके बाद कंपनी ने कई कदम उठाए । अपने यूजर्स के कंटेंट की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई चेक पॉइंट्स बनाए। भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने की योजना इसी दिशा में उठाया गया एक और कदम है। इसके अलावा टिकटॉक ने अपने प्लैटफॉर्म से उन अभियानों को भी जमकर प्रोमोट करना शुरू किया, जो सामाजिक जागरूकता को बढ़ाते हैं। हालांकि भारत जैसे देश में जहां अब भी लोग इंटरनेट मैनर्स सीख रहे हैं, इन अभियानों की कामयाबी वक्त के एक छोटे वक्फे में नहीं आंकी जा सकती।
नवभारत गोल्ड में प्रकाशित लेख 

Thursday, June 11, 2020

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :चौथा भाग

मैक्रूज : हमें हेवेलॉक ले जाने वाला 
बड़े -बड़े टायर जो जहाज को रगड़ से बचाते हैं 
हेवेलॉकद्वीप का रास्ता समुद्री मार्ग से पोर्ट ब्लेयर का करीब ढाई घंटे का था |जिसके लिए हमें जहाज फिनिक्स बे बंदरगाह से मिलना था |मैक्क्रुज कम्पनी का यह क्रूज हमें ढाई बजे पोर्ट ब्लेयर से निकलने वाला था |किसी बंदरगाह से कहीं जाने के लिए पानी के जहाज की यहाँ हमारी पहली यात्रा होने वाली थी |यहाँ भी हवाई जहाज की तरह नियम थे |क्रूज के चलने के समय से एक घंटा पहले बंदरगाह पर रिपोर्ट करना होता है |बंदरगाह में घुसने से पहले सबका पहचान पत्र जांचा गया फिर सिक्योरिटी चेक ,सामान स्कैनर में जांचा गया और शरीर की भी जांच हुई |अब हम पोर्ट ब्लेयर फिनिक्स बे के अन्दर पहुँच चुके थे ,वहां इस वक्त कोई जहाज आया हुआ था लोग उससे उतर रहे थे थोड़ी देर में वो जहाज अपने सफर पर निकल गया |हमने दरियाफ्त की हमारा क्रूज कब आएगा ,हमें इन्तजार करने को कहा गया और बताया गया कि जब जहाज आएगा इसकी उद्घोषणा होगी |

इन्तजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था पर क्रूज की सवारी को लेकर मन बड़ा रोमांचित था कारण सीधा था मेरा हिन्दी फिल्मों का ज्यादा देखना जिसमें तरह –तरह के क्रूज देखे थे |हालांकि इससे पहले गोवा में क्रूज पर चढ़ा जरुर था पर कहीं जाने के लिए नहीं बस समुद्र में एक चक्कर लगा कर वो वापस हमें छोड़ गया |इस बार पूरी यात्रा क्रूज पर  होनी थी वो भी सारे सामान के मने हम लोग लदे फंदे अपने क्रूज का इन्तजार कर रहे थे |बंदरगाह पर किसी बस स्टेशन जैसा नजारा था क्योंकि उस वक्त मैक्क्रुज का समय था इसलिए सारे यात्री उसी जहाज के थे |एक छोटी सी कैंटीन भी जहाँ लोगों की भीड़ लगी थी | यहां पर मेनलैंड (मुख्य भूमि) यानी चेन्नई, कोलकाता के लिए जाने वाले जहाजों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। अंडमान जाने के लिए हवाई सेवाएं रोज हैं पर पानी के जहाज रोज नहीं चलते। किस दिन जहाज आएगा और उसकी किस दिन रवानगी होगी इसकी जानकारी एक महीने पहले जारी की जाती है। यह फिनिक्स बे में लगे सूचना पट्ट या अंडमान सरकार की वेबसाइट पर देखा जा सकता है।  कुल तीन जहाज हैं जो पोर्ट ब्लेयर से तीन शहरों चेन्नई,  विशाखापत्तनम और कोलकाता के बीच चक्कर  लगाते हैं। इनके नाम हैं एमवी स्वराज दीप, एमवी हर्षवर्धन और एमवी कैंपबेल बे ।

अंडमान में रोड के अलावा ज्यादातर परिवहन पानी के माध्यम से ही होता है जिसमें तीन तरह के साधनों का प्रयोग होता है |पहला है फेरी जो होता है बड़े पानी के जहाज जैसा पर इसमें विलासिता की चीजें ज्यादा नहीं होती इसमें इंसानों के साथ गाड़ियाँ बस भी चढ़ा ली जाती हैं |दूसरा मोटर बोट जो आकार में काफी छोटी होती हैं और ज्यादातर यहाँ के निवासियों और पर्यटकों द्वारा प्रयोग में लाई जाती हैं |तीसरा क्रूज जो दुनिया भर की तमाम विलासिताओं के साथ बड़े पानी के जहाज जैसी होती हैं |


हम क्रूज से हेवेलॉककी यात्रा करने वाले थे |थोड़ी देर में घोषणा हुई कि हमारा क्रूज आ चुका है| 

लोग लाइन में लगकर धीरे –धीरे सरकने लगे |मेरी समझ में नहीं आ रहा था हमारा सामान कैसे जाएगा |हवाई जहाज में सामान तो पहले ही चला जाता है पर हमारा सामान अभी तक हमारे साथ था |अपने सामान को ढकेलते हम अपने जहाज के सामने थे |अब कहाँ से जहाज में घुसना था इसके बारे में सोच ही रहे थे कि देखा कुछ लोगों को सामान सहित पीछे भेजा जा रहा था |मतलब सामान पीछे जमा होगा |हमने भी जमा कर दिया |न कोई रसीद मिली न टिकट देखा गया बस हमने सामान पकड़ा दिया और आगे के रास्ते से क्रूज में घुस गए |अन्दर हवाई जहाज जैसा नजारा पर जगह उससे कहीं ज्यादा थी|क्रू ने हमारे टिकट देखकर हमारी सीटें बता दीं |हम अपनी सीटों पर अच्छे बच्चे की तरह जम गए |थोड़ी देर में दरवाजे बंद हो गए और हमें हवाई जहाज की तरह आपातकाल में क्या करें की हिदायतें दी जाने लगीं |ये अलग बात है ये हिदायतें एक वीडियो के माध्यम से दी जा रही थीं |थोड़ी देर में हमें
 समझ में आ गया हमारा जहाज आधे से ज्यादा खाली है और हम कहीं भी उछल कूद मचाने के लिए स्वतंत्र हैं |हवाई जहाज की तरह यहाँ इतना तगड़ा अनुशासन नहीं था |जहाज करीब चालीस किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से चल रहा था |शुरुआती हिचकोलों के बाद जहाज शांत समुद्र में आ गया और स्थिर होकर अपने गंतव्य की तरफ बढ़ चला |जैसे ही जहाज बंदरगाह से चला मैंने एक अनोखी बात देखी बंदरगाह की दीवार पर बड़े –बड़े टायर लगे थे और ऐसा ही नजारा हेवेलॉकमें देखने को मिला जब हमारा क्रूज वहां रुक रहा था |मैंने जब इसका कारण पता करने की कोशिश की तो पता लगा यह टायर जहाज के बाहरी आवरण को बंदरगाह की दीवारों से रगड़ से बचाने के लिए लगाये जाते हैं |इससे जहाज की खूबसूरती भी नहीं खराब होती वहीं उसमें रगड़ से होने वाली टूट फूट भी नहीं होती |वैसे ढाई घंटे का हेवेलॉक  का सफर एक बंद जेल जैसा था |आप जहाज से निकल कर सुरक्षा कारणों से डेक पर नहीं जा सकते थे |बस जहाज की खिडकियों से बाहर के समुद्र का नजारा ले सकते थे |चूँकि क्रूज में गाने और अंडमान के ऊपर वृत्तचित्र दिखाए जा रहे थे तो समय काटना थोड़ा आसान हो गया |शाम के करीब चार बजे एक साइरन जहाज में सुनाई पड़ा मतलब हम हेवेलॉक पहुँच चुके थे |

जारी ..........................................

पसंद आया हो तो