काफी वर्षों बाद जब रेलगाड़ी के पहियों ने प्लेटफ़ॉर्म पर ठहरते हुए लंबी सीटी भरी, तो मन में यात्रा की वही पुरानी, जानी-पहचानी गंध तैर गई—कोयले, डीजल के धुएँ और मिट्टी के कुल्हड़ वाली रेलवे की खास खुशबू। डिब्बे से उतरकर जैसे ही चहलकदमी करते हुए प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ा, अचानक नज़र एक स्टाल पर जाकर ठिठक गई। लाल-सफेद अक्षरों में अब भी वही ऐतिहासिक नाम चमक रहा था—‘ए. एच. व्हीलर’
एक पल को दिल के किसी पुराने कोने ने पुरानी स्मृतियों को खंगालना चाहा, लेकिन आँखों के सामने जो कुछ था, उसने एक अनकहे सन्नाटे से भर दिया। वह स्टाल वहाँ था, पर वह नब्बे के दशक वाला व्हीलर कतई नहीं था। उस नाम के नीचे का पूरा संसार पूरी तरह बदल चुका था।नब्बे के दशक में किसी भी रेलवे स्टेशन का वह स्टाल महज़ किताबों या पत्रिकाओं की दुकान नहीं था, बल्कि वह भारतीय रेल यात्रा की आत्मा हुआ करता था। ट्रेन के छूटने से आधा घंटा पहले व्हीलर के स्टाल के आगे लगी वह उत्सुक भीड़ याद कीजिए। स्टील के तारों पर कपड़ों की चिमटियों (क्लिप) से लटकी हुई रंग-बिरंगी पत्रिकाओं की कतारें दूर से ही अपनी ओर खींचती थीं।
'नंदन', 'पराग', 'चंपक' और 'लोटपोट' के लिए जिद करते बच्चे; 'मनोहर कहानियाँ' और 'सत्यकथा' के पन्नों में रहस्य खोजते मध्यमवर्गीय अधेड़; और 'इंडिया टुडे' व 'कादम्बिनी' को बहुत सलीके से पलटते गंभीर बाबू। वहीं कहीं साइड में लटकी होती थीं वेदप्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के सनसनीखेज उपन्यासों की चमकीली जिल्दें, जिनका कवर पेज ही सफर के रोमांच को दोगुना कर देता था।
उस दौर में ट्रेन की यात्रा सिर्फ एक शहर से दूसरे शहर तक पहुँचने का भौतिक जरिया नहीं थी; वह पढ़ने, ठहरने और खुद से मिलने का एक लंबा, सुंदर पड़ाव हुआ करती थी। प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ी के इंजन की सीटी और कुली की पुकार के बीच व्हीलर के स्टाल से ताज़ा छपे अखबार की महक और नई किताब की खुरदुरी जिल्द छूना, यात्रा की पहली औपचारिक रस्म हुआ करती थी।
बर्थ पर बैठकर खड़की से आती हवा के झोंकों के साथ पन्ने पलटना, उँगलियों से पन्नों के कोने मोड़ना और सामने वाली सीट पर बैठे किसी सहयात्री का यह पूछ बैठना कि “भाई साहब, पढ़ने के बाद ज़रा यह पत्रिका इधर भी बढ़ाइएगा”—यह उस युग का सबसे सहज मानवीय संवाद था।
लेकिन आज, काफी अरसे बाद जब प्लेटफ़ॉर्म के उसी स्टाल के सामने खड़ा हुआ, तो दृश्य एकदम अजनबी था। स्टाल की शेल्फ़ों पर अब किताबों की जगह पैकेटबंद चिप्स, नमकीन के पाउच, ऊर्जा पेय (एनर्जी ड्रिंक्स), ब्रांडेड पानी की बोतलें और मोबाइल चार्जिंग केबल लटके हुए थे। किताबों के नाम पर कोने में अंग्रेज़ी की दो-चार ‘बेस्टसेलर’ सेल्फ-हेल्प पुस्तकें और कुछ करंट अफेयर्स की गाइडें धूल फाँक रही थीं। चिमटियों से लटकती वे हिंदी की बाल और साहित्यिक पत्रिकाएँ कहाँ विलीन हो गईं, इसका कोई सुराग नहीं था।
यह बदलाव केवल एक स्टाल का कायाकल्प नहीं है; यह हमारे समय, हमारी यात्राओं और हमारे सामूहिक मानवीय मनोविज्ञान के पूरी तरह बदल जाने का मूक गवाह है।
अब किसी को ट्रेन में खिड़की के बाहर भागते दरख्तों को देखते हुए उपन्यास के पन्ने उलटने की फुर्सत नहीं है। डिब्बे में कदम रखते ही हर यात्री अपनी हथेलियों में सिमटे छह-इंच के स्मार्टफोन का बंधक बन जाता है। ट्रेन चलती रहती है और भीतर बैठे लोग अपनी उँगलियों से स्क्रीन पर 15-30 सेकंड की रील्स और शॉर्ट्स स्क्रॉल करते रहते हैं। कान में ईयरफोन ठूँसकर हर कोई अपने-अपने डिजिटल एकांत का कैदी बना हुआ है। सहयात्री अब अजनबी ही रहते हैं, क्योंकि किसी की नज़रें अब किताब के बहाने एक-दूसरे से नहीं टकरातीं।
दुनिया कितनी बदल गई है। हम जिस तकनीक को समय बचाने और दुनिया से जुड़ने का साधन समझ रहे थे, उसने हमसे यात्रा का वह ठहराव, वह संवेदी स्पर्श और वह संवाद छीन लिया जो सफर को 'स्मृति' बनाता था।
स्टाल के काउंटर पर खड़े होकर मैंने उस पुराने व्हीलर को ढूँढने की कोशिश की, जहाँ कभी शब्द सफर के हमसफ़र हुआ करते थे। अब वहाँ सिर्फ क्यूआर कोड का स्टीकर चिपका था और डिब्बे में बंद प्रसंस्कृत खाने-पीने का सामान। प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेन ने छूटने की अंतिम सीटी बजाई, और मैं भारी मन से अपने डिब्बे की ओर बढ़ गया—यह सोचते हुए कि गति तो बहुत बढ़ गई है, लेकिन सफर की रूह कहीं पीछे छूट गई है।
प्रभात खबर में 23/10/2026 को प्रकाशित

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