Thursday, February 25, 2010

चिकन कला पर एक रेडियो फीचर

बहुत पहले लखनऊ की चिकन कला पर एक रेडियो फीचर बनाया था सोचा आप के साथ बाँट लिया जाए सुनें


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Wednesday, January 20, 2010

मोहे रंग दे बसंती


लीजिये फिर आ गया बसंत झूमता ,गुनगुनाता अब आप कहेंगे की कहाँ बसंत आया हमारा जीवन तो वैसे का वैसा ही है यूँ तो बसंत हर साल आता है लेकिन मैं आज आपको बसंत के एक नए पहलू से परिचित करना चाहता हूँ देखिये कोई भी फेस्टिवल तभी एन्जॉय किया जा सकता है जब हम उसे दिल से फील करें और अगर बसंत को महसूस करना हो तो संगीत से बेहतर कोई और चीज़ हो सकती है भला तो मैं आज ऊपर वाले से यही विश करूँगा कि "मोहे रंग दे तू बसंती मोहे रंग दे तू बसंती"(रंग दे बसंती ) . यूँ तो बसंत का मतलब प्यार ,रोमांस , कुछ मीठा सा एहसास .....वैसे हमारा वेलेंटाइन डे तो आज ही होता है आइये थोडा पीछे चलते हैं जिन्दगी की मिठास को महसूस करने के लिए कभी कभी उसे रिवर्स भी करना पड़ता है जरा सोचिये अगर गाड़ियों में रिवर्स गीअर न हो तो क्या हम आगे जा पायेंगे तो चलते हैं अतीत में आप बिलकुल परेशान न हों मई आपको पिछले जनम में नहीं ले जा रहा हूँ जिससे आप अपने इस जनम की परेशानियों से निजात पा सकें मैं तो आपको इसी जनम को दुबारा जीने को कह रहा हूँ जिससे आपकी आगे की जिन्दगी में परेशानियाँ कम हों बस इतना सा करना है कि अपने बचपन के बसंत को याद करना है भाई मेरे लिए बसंत पंचमी का त्यौहार इसलिए ख़ास है कि इस दिन हमारे स्कूल में एक बड़ा फंक्शन होता था हम सब झूमते गाते थे.
क्यों कुछ बसंत की यादें ताज़ा हुई न अब अगर यादें ताज़ा हो रही हैं तो इससे बेहतर गाना क्या हो सकता है "आया झूम के बसंत नाचो मेरे संग " वैसे ये त्यौहार बसंती रंग से जुड़ा हुआ है मतलब खेतों में नयी फसल फूलों के खिलने का मौसम ,ये बसंती रंग है बड़ा प्यारा इसमें प्यार की मादकता भी है "पिया बसंती रे " तो क्रांति की आग भी "मेरा रंग दे बसंती चोला ओ माई रंग दे बसंती चोला " इसमें दुःख की वेदना भी है "ओ बसंती पवन पागल न जा रे न जा ओ बसंती पवन पागल " तो मिलन की सुहानी खुशी भी जितनी डाइवर्सिटी आपको इस रंग के नेचर में मिलेगी उतनी और किसी भी रंग में नहीं ये डाइवर्सिटी इस फेस्टिवल में भी है बच्चे , बूढ़े और जवान सभी के पास इस फेस्टिवल को एन्जॉय करने के अपने अपने रिसन हैं ठण्ड जाने को है और गर्मियां अभी आयी नहीं इस से बेहतर सीसन और क्या हो सकता है तो क्यों न गाया जाए ये गाना " संग बसंती , रंग बसंती , छ गाया मस्ताना मौसम आ गाया "(रजा और रंक ), मुझे लगता है कि ये सीसन हमें सोचने का मौका देता है कि जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है शायद इसीलिए बसंती रंग मस्ती का रंग भी माना जाता है और ये मस्ती पीक पर होती है बसंत पंचमी के दिन चलिए आप बच्चे नहीं रहे जो स्कूल से आपको छुट्टी मिल जायेगी और आप इसकी मस्ती को एन्जॉय कर पायेंगे , जिन्दगी की भगा दौड़ी में पता ही नहीं चलता कि बसंत कब आया और कब चला गाया .अजी छोडिये मैं आपसे एन्जॉय करने को कह रहा हूँ और आप खुश न हो पाने का रिसन दिए जा रहे हैं .त्यौहार दिल से मनाया जाता है चलिए आपके पास टाइम नहीं है तो हम बता देते हैं कि बसंत पंचमी को सेलेब्रेट करने का इंस्टैंट तरीका . थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें बंद कीजिये और याद कीजिये दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे जिसमे सरसों के फूल से लदे हुए पेड़ों के बीच शारुख खान और काजोल का मिलन हो रहा है थोडा और फ्लश बैक्क में चल सकते है बस आपको सिलसिला फिल्म का वो गाना याद कर सकते हैं " देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए दूर तक निगाह में गुल खिले हुए" चारों और फूल ही फूल
वैसे भी साथियों बसंत पंचमी का मतलब सिर्फ त्यौहार मानना नहीं इसे जीना है इस फेस्टिवल की सारी एनेर्जी अपने अन्दर ले लीजिये और फिर देखिये आपकी जिन्दगी भी कितनी बसंती हो जायेगी और आप गुनगुना उठेंगे पिया बसंती रे

आपको बसंत पंचमी की शुभकामनायें
आई नेक्स्ट में २० जनवरी को प्रकाशित

Saturday, January 9, 2010

A Journey Inside



यात्रा मंजिल पर पहुँचने का जरिया है मंजिल को पाने के लिए यात्रा तो करनी पड़ेगी ,यात्रा करना और यात्रा को जीना दो अलग अलग बातें हैं आपने यात्रायें तो बहुत की होगी लेकिन आपको क्या याद पड़ता है कि किस यात्रा को आपने जीया था चलिए आज किसी यात्रा को जीया जाए यात्रा हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है और जीवन भी एक यात्रा तो ही है हर दिन कुछ नया कुछ अनोखा हाँ ऐसा होता है लेकिन हम अपनी जिन्दगी की दुश्वारियों में उस अनोखे पन को देख ही नहीं पाते किसी भी जर्नी में नया क्या होता है जरा सोचिये वही इंसान और वही नेचर हाँ नया होता है इंसानों का पहनावा , उनका कल्चर नेचर का नया रूप कहीं पहाड़ , नदी समुद्र वगैरह आप परेशान मत होइए हम चल पड़े हैं अमेरिका की यात्रा को जीने मत भूलियेगा इस यात्रा में हमारी साथी है जिन्दगी हमारी यात्रा दिल्ली से शुरू हुई दिल्ली से अबुधाबी , अबुधाबी से न्यू योर्क और न्यू योर्क से लोस एंजलिस ये सारे शहर हमारी यात्रा के पड़ाव थे इनसे गुज़रे बगैर मंजिल तक नहीं पहुंचा जा सकता है जिन्दगी के भी कई पड़ाव होते हैं बचपने से लेकर बुढ़ापे तक और हर पड़ाव हमारे एक्सपीरिएंस में इजाफा करता है .
आइये आगे चलते हैं उम्मीद करता हूँ आप मेरे साथ इस यात्रा का लुत्फ़ उठा रहे होंगे न्यू योर्क शहर में जब हम उतरे तो हमारा स्वागत बर्फ बारी ने किया क्रिसमस के मौसम में इससे अच्छा स्वागत क्या हो सकता है उसके बाद जोरदार बारिश मुझे लगा ये प्रकर्ति के स्वागत का अनोखा तरीका है. कहते हैं रोग कितना भी गंभीर क्यों न हो अगर डॉक्टर हंस कर बात कर ले तो आधी बीमारी अपने आप ठीक हो जाती है इमीग्रैसन ऑफिसर ने हंसकर हमारा अमेरिका में स्वागत किया तो मेरी थकान वहीं ख़तम हो गयी , खैर यात्रा जारी रही वहां से लोस एंजलिस की उड़ान थोड़ी देर में हम होटल के रास्ते में थे चौड़ी चौड़ी सड़कें जिनपर सरपट दौड़ते चौपहिया वाहन रौशनी से जगमगाता शहर वैसे जब हमारा विमान लोस एंजलिस एअरपोर्ट पर लैंड कर रहा था तो नीचे मैंने रौशनी में जगमगाता शहर देखा क्या खूबसूरती से समकोणपर काटती सड़कें पूरा शहर एक खूबसूरत लैंड एस्केप लग रहा था .
इस वक्त पूरा अमेरिका उत्सव के रंग में रंगा है चारों तरफ क्रिसमस की धूम है शाम को रौशनी में धुले शहर को देखने का अज़ब मज़ा है चारों तरफ रौशनी घर के अन्दर क्रिसमस ट्री और घर के बाहर बिजली की सजावट और क्रिसमस की झांकी मैं भी सोच रहा था इंसान कहीं भी रहे दुनिया के किसी कोने में खुशियाँ मनाने के तरीके एक जैसे ही होते हैं खुशियों की जबान कोई भी समझ सकता है इसके लिए किसी भाषा को जानना जरुरी नहीं होता मुझे ऐसा लग रहा था कि हम दीपावली का त्यौहार मनाने की तैयारी कर रहे हों . हलकी बारिश और सर्द हवा मौसम को खुशगवार बना रही थी और मैं अपने आप को इस खूबसूरत मौसम में खोज रहा था सही है दोस्तों यात्रा में मन दार्शनिक हो जाता है हम अपनी तलाश में निकल पड़ते हैं जिसका मौका जीवन की भाग दौड़ में कम ही मिलता है . जिस शहर में मैं था उसके आस पास का एनवोइरमेंट कई मामलों में अनोखा है यहाँ पर्वत है समुद्र है रेगिस्तान और ज्वालामुखी भी और जिन्दगी भी ऐसी ही है सुख है दुख है और कभी कभी नीरसता भी लेकिन जिन्दगी तो जिन्दगी है मैं जोशुवा ट्री नेशनल पार्क कैलिफोर्निया देखने गया असल में ये एक रेगिस्तान है जो सैकडों किलो मीटर में फैला है हाँ यहाँ के रेगिस्तान हमारे रेगिस्तान से एक दम अलग हैं यहाँ रेत की जगह चट्टानें हैं और जोशुवा पेड़ जो दुनिया में सिर्फ यही पाया जाता है जिसको दूर से देखने पर लगता है कोई इंसान बाहें पसारे आसमान की तरफ देख रहा है सन्नाटा ऐसा कि कभी कभी अपने न होने का एहसास होता है प्रकर्ति के इस अद्भुत रूप को देखने के बाद बारी थी कुछ इंसानी दुनिया की रंगीनी को देखने की हम चले होलीवूड .रौशनी से नहाया हुआ चारों ओर रौशनी और साल की पहली बारिश से भीगता शहर मै भी भीग रहा था . अब हमें लौटना था लेकिन मेरा मन तो भीग चुका था यात्रा की सुहानी यादों से
शायद यात्रा को जीना इससे को कहते है आप क्या कहते हैं
आई नेक्स्ट में ९ जनवरी को प्रकाशित

सवाल

 


तुम्हारे लिए काफी पीना महज एक क्रिया है

पर मेरे लिए ये विशेषण

जब तुमने बनाई हो

खैर तुम नहीं समझोगी

तुम्हारे लिए सब काम हैं जीवन के

जैसे मैं एक काम हूँ

 दोस्त जैसा कुछ

या फिर काफी सारी अच्छी होती हैं ?

क्योंकि क्रिया, क्रिया होती

जिसमें कारण नहीं ढूंढा जाता

मेरी जिन्दगी के व्याकरण में

वर्तनी की बहुत गलतियाँ है

तो बचा क्या

क्योंकि सारे सवालों का जवाब  

तुम्हारे पास : क्या ....

मैं क्यों हूँ

तुम्हारे जीवन में

 जब सब कॉफ़ी एक जैसी होती है

फिर क्यों रुक जाती हैं कभी -कभी

तुम्हारी उँगलियाँ

मोबाईल से स्क्रोल करते हुए

उस कॉफ़ी को बनाने लिए

एक बात बताओगी

क्या ढूंढती रहती हैं तुम्हारी उँगलियाँ ?

उस मोबाईल में

जहाँ मैं भी झांकना चाहता हूँ

क्योंकि तुम्हारे दिल में

झाँकने के सारे  दरवाजे बंद हैं   

चलो कुछ और बाते करते हैं

जिसमें न कॉफ़ी हो न तुम्हारी बातें

कुछ ज्ञान की

कुछ विज्ञान की

क्योंकि

तुम्हारे लिए काफी पीना महज एक क्रिया है

पर मेरे लिए ये विशेषण

जब तुमने बनाई हो


Saturday, December 12, 2009

आ रहा हूँ मैं

प्रिय पाठकों आप जल्दी ही मेरी अमेरिका यात्रा के संस्मरण से रूबरू होंगे इंतज़ार कीजिये

Saturday, November 21, 2009

Travelling an experience


पिछले दिनों एक वेबसाइट के एक लेख पर नज़र पडी .लेख की शुरुवात कुछ इस तरह थी कि पिछले साल बुकर पुरूस्कार की दौड़ में दो भारतीय अरविन्द अडिग और अमिताव घोष शामिल थे , जिनमें मैदान अरविन्द अडिग के हाथ रहा लेकिन २००८ के लिए साहित्य का सबसे बड़ा पुरूस्कार यानि नोबेल पुरूस्कार फ़्रांसीसी लेखक जॉन मेरी गुस्ताव लाक्लेज़ियो की झोली में गया है.
लाक्लेज़ियो ट्रैवेल लेखक हैं .लेख आगे चलकर दूसरी दिशा में मुड़ जाता है लेकिन मेरा मन मुड़ गया दूसरी ओर मेरे जेहन में अपने बचपन में सुनी गयी वो सारी कहानिया घूमने लगी जो मैंने रजाई में अपने पिताजी के आगोश में दुबक कर या कभी कभी अलाव के गिर्द बैठकर सूनी थी. कभी सिंदबाद दा सेलर, तो कभी गुलिवर तरिवाल्स का कोई घटनाकर्म कभी हातिमताई कुछ न समझ आये तो ऐसे राजकुमार की कहानी जो रानी की तलाश में जंगल जंगल घूम रहा है .
सर्दियां शुरू हो गयीं हर मौसम से सबकी कुछ न कुछ यादें जुडी होती है ऐसा ही कुछ मेरे साथ है सर्दियां मुझे मेरे बचपन की याद बड़ी शिद्दत से कराती हैं आप भी सोच रहे होंगे कि मै आप लोगों पर इतना इमोशनल अत्याचार क्यों कर रहा हूँ मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है मै तो सिर्फ इतना याद दिलाना चाहता हूँ कि जिस टोपिक पर मै आज बात कर रहा हूँ वो हमारी जिन्दगी का कितना अहम् हिस्सा है जिसकी शुरुवात हमारे बचपने से हो जाती है मै बात कर रहा हूँ यात्रा की , सफ़र की, याद कीजिये भले ही बचपने की ज्यादातर कहानियां सफ़र से जुडी हुई रहती थीं आज के बच्चे कहानी सुनने की बजाय कार्टून देख कर सोते हों पर ज्यादातर कार्टून उन्हें यात्रा पर ले जाते हैं यात्राओं के बारे में सोचते हुए राहुल संस्क्रतायानन याद न आयें ऐसा हो सकता है क्या ? ट्रावोल्ग पढ़ते वक्त हमेशा ऐसा लगता है था कि घुमक्कड़ी के बाद इतना शानदार कैसे लिख लेते हैं लोग .लेकिन अब समझ में आने लगा है कि जब हम यातारों को जीना शुरू कर देते हैं तो यात्रा वृतांत अपने आप जी उठते हैं कहते है किसी पल को जीभर कर जी लेने के बाद ही डूब कर लिखा जा सकता है मैंने भी आज सफ़र को जीने की कोशिश की .
यात्राएँ हमारे चिंतन को विस्तार देती हैं आप ने वो गाना जरूर सुना होगा " जिन्दगी एक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना" यूँ तो देखा जाए तो जिन्दगी का सफ़र है तो सुहाना लेकिन इसके साथ जुडी हुई है अन्सर्तेंतिटी और ऐसा ही होता है जब हम किसी सफ़र पर निकलते हैं ट्रेन कब लेट हो जाए बस कब ख़राब हो जाए वगैरह वगैरह मुश्किलें तों हैं पर क्या मुश्किलों की वजह से हम सफ़र पर निकलना छोड़ देते हैं भाई काम तो करना ही पड़ेगा न सर्दियों में कोहरा कितना भी पड़े डेली पैसेंजर तो वही ट्रेन पकड़ते हैं जिससे वो साल भर जाते हैं कभी छोटी छोटी बातें जिन्दगी का कितना बड़ा सबक दे जाती हैं और हमें पता ही नहीं पड़ता है हर सफ़र हमें नया अनुभव देता है जिस तरह हमारे जीवन का कोई दिन एक जैसा नहीं होता वैसे ही दुनिया का कोई इंसान ये दावा नहीं कर सकता कि उसका रोज का सफ़र एक जैसा होता है कुछ चेहरे जाने पहचाने हो सकते हैं लेकिन सारे नहीं, जिन्दगी भी ऐसी ही है .अब देखिये न सर्दी तो सबको लगती है मेरे पिताजी कहा करते हैं बेटा सर्दी बिस्तर पर ही लगती है बाहर निकलो काम पर चलो सर्दी गायब हो जायेगी मंजिल तभी तक दूर लगती है जब तक हम सफ़र की शुरुवात नहीं करते लेकिन एक बार चल पड़े और चलते रहे तो मंजिल जरूर मिलेगी . अब सफ़र पर निकले हैं तो किसी न किसी साथी की जरुरत पड़ेगी जरुरी नहीं आप साथी के साथ ही सफ़र करें साथी सफ़र में भी बन जाते हैं लेकिन साथी के सेलेक्टिओं मे सावधान रहें गलत साथी आपके सफ़र को पेनफुल बना सकते हैं और वैसा ही जिन्दगी का सफ़र में गलत कोम्पैनिओन आपके लिए प्रॉब्लम ला सकते हैं .आप ध्यान दे रहें न कहते हैं जो सफ़र प्यार से कट जाए वो प्यारा है सफ़र नहीं तो मुश्किलों के बोझ का मारा है सफ़र वाकई सफ़र तो वाकई वही जो हँसते मुस्कराते कटे और तभी सफ़र का मज़ा भी है मेरा तो जिन्दगी का सफ़र जारी है जिन्दगी के इस मोड़ पर आप सबसे मुलाकात अच्छी लगी क्या आप भी जिन्दगी के इस सफ़र में मेरे साथी बनेंगे और आगे से जब भी किसी सफ़र पर निकालिएगा तो ये मत भूलियेगा कि ये जिन्दगी का सफ़र है और हर सफ़र की शुरुवात अकेले ही होती है लेकिन अंत अकेले नहीं होता साथ में कारवां होता है अपनों का अपने अपनों का यात्राएँ चाहे जीवन की हों या किसी दूर देश की या फिर घर से दफ्तर के बीच की ही क्यों न हो .ऐसी ही यात्राओं से कोई लाक्लेज़ियो नोबेल पुरूस्कार ले जाते हैं ओर कोई अपनी मंजिल पर पहुंचकर मुस्कुरा उठता है .सबकी यात्राओं का अपना अलग अलग सुख है .फिलहाल यह लेख लिहने की अपनी यह यात्रा में यहीं ख़तम करता हूँ ओर निकलता हूँ अपनी दूसरी यात्राएँ की ओर
२१ नवम्बर को आई नेक्स्ट में प्रकाशित

Friday, October 23, 2009

लेट'स विश अ लॉट


कभी कभी कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं कि हमारे दिमाग में अब तक फीड हुई परिभाषाएं एकदम नए रूप में सामने आ खडी होती हैं .अक्सर अपने बच्चे से मैं उसकी चॉकलेट की जिद या किसी और चीज़ के लिए जिद करते समय  उसे यही समझाता हूँ कि लालच बुरी बात है .एक  चॉकलेट  ही मिलेगी ज्यादा नहीं . मेरा बेटा शायद मेरे कहे को ज्यादा बड़े अर्थों में गुण रहा था .एक दिन उसने कहा पापा ,आप मुझसे ये क्यों कहते हैं कि लालच बुरी बात है .मुझे ज्यादा नंबर लाने का लालच है , तो क्या यह बुरा है ? मुझे स्पोर्ट्स में ट्राफी जीतने का लालच है, तो क्या यह गलत है ? मुझे लालच है कि मैं आपके साथ ज्यादा वक्त बिताऊं क्या यह गलत है ? बेटा अपनी बात कह चुका था और मैं उलझन में पड़ गया था .अब कहानी में यही थोडा सा ट्विस्ट है हमें बचपन से बताया जाता है कि लालच करना बुरी बात है जितनी चादर है उतना ही पैर पसारना चाहिए ये कहावतें आपने भी सुनी होगीं लेकिन जब हम हैं नए तो अंदाज़ क्यों हो पुराना तो आइये इस लालच के फलसफे को समझने की कोशिश की जाए.
बात थोड़ी पुरानी है एक जंगल में एक आदमी रहता था न पास में कपडा न ही रहने को मकान लेकिन उसके पास एक दिमाग था जो सोचता था समझता था उसने सोचा क्यों न उसके पास रहने को एक ऐसी जगह हो जहाँ उसे बारिश में भीगना न पड़े ठण्ड में ठिठुरना न पड़े और गर्मी भी कम लगे अब आप सोच रहे होंगे कि ये बात उसके दिमाग में आयी कहाँ से अब जंगल में रह रहा था तो जरुर उसने पक्षियों के घोंसले को देखा होगा खैर यहीं से मानव सभ्यता  का इतिहास बदल जाता है. इंसान ने अपने लिए पहले घर बनाया और फिर अपनी जरुरत के हिसाब से चीज़ों का आविष्कार होता गया .बैलगाडी से शुरू हुआ सफ़र हवाई जहाज़ तक पहुँच गया . कबूतर से चिठियों को पहुंचाने की शुरुवात हुई और आज ई मेल का जमाना है .बगल की बंटी की दुकान आज शॉपिंग मॉल्स  में तब्दील हो गयी ,घर के धोबी की जगह कब वाशिंग मशीन आ गयी हमें पता ही नहीं चला .लेकिन इन सब परिवर्तन में एक बात कॉमन है वो है लालच , लालच जीवन को बेहतर बनाने का, लालच जिन्दगी को खूबसूरत बनाने का ,लालच खुशियाँ मनाने का ,लालच आने वाले कल को बेहतर बनाने का. आप भी सोच रहे होंगे कि ये कौन सी उल्टी गंगा बहाई जा रही है लालच अच्छा भी होता है. लालच अगर अच्छा न होता तो हम ज्यादा का इरादा कैसे कर पाते, कैसे और ज्यादा विश करते . जब इरादा है और विश भी तो आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है . सचमुच आज सारी प्रोग्रेस सारी ग्रोथ लालच यानि और ज्यादा पाने की तम्मना से जुडी है थोडा और विश करो का फंडा ही तो हमें आगे ले जता है.लालच अगर अच्छा न होता तो हम ज्यादा का इरादा कैसे कर पाते कैसे और ज्यादा विश करते .अब तो मुझे लगने लगा है कि सारी दुनिया की तरक्की विज्ञानं के नए आविष्कार सब लालच का ही नतीजा हैं. सैचुरेशन पॉइंट से उठाकर आगे ले जाने का काम करता है हमारा लालच . एजुकेशन पीरीयड हो या जॉब टाइम हमारा लालच ही हमें आगे ले जाने को प्रेरित करता है .
अब जबकि लालच के इस पक्ष से सामना हुआ है तो मेरे मन में भी न जाने कैसे कैसे लालच पनपने लगे हैं .लालच इस दुनिया को हिंसा से मुक्त करने का शांति की बात को किताबों और भाषणों से निकाल कर सारी दुनिया में गूंजा देने का .आम आदमी को खास आदमी बना देने का लालच .एजूकेशन , हेल्थ रोजगार जैसी बेसिक चीज़ों को हर किसी के लिए उपलब्ध कराने का लालच वह भी बिना किसी ज्यादा मशक्कत के , करप्शन से मुक्ति का लालच .
अरे अरे मेरे लालच की लिस्ट तो बढ़ती ही जा रही है .यहीं रोकता हूँ इस लिस्ट को .लेकिन इतना जरूर है कि अब मैं अपने बेटे से यह नहीं कहूँगा कि लालच मत करो.बेटा खूब लालच करो और हर लालच के लिए जिद करो .उसे पूरा करो .बस यह लालच आशावादी सोच के साथ हो. तो अब आपका क्या ख्याल है लालच के बारे में .
आई नेक्स्ट में २३ अक्टूबर को प्रकशित

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