Sunday, April 14, 2013

गाँवों में सबको चढा आई पी एल का जोश


गर्मियों का मौसम छुट्टियों का मौसम खेलो का मौसम शहर में तो मैदान गुलजार रहते हैं क्रिकेट से पर अब गाँव भी उदारीकरण की बयार और टीवी के प्रसार से इससे अछूते नहीं रहे आई पी एल भले ही क्रिकेट में मनोरंजन का तडका हो पर अब ये गाँवों में भी इसका जादू सर चढ़कर बोल रहा है |बाजार में बदलती इस दुनिया के हिसाब से बुरा कुछ नहीं है दर्शक खुश है विज्ञापनदाता पैसे बना रहे हैं टीवी को दर्शक और विज्ञापन मिल रहे हैं पर यह सब किसकी कीमत पर हो रहा है ये सवाल महत्वपूर्ण है|गाँव से शहर आये दादी दादा माता पिता वहां से अपने खेल भी लाये थे चाहे  वो आईस पाईस (लुका छुपी ),गिल्ली डंडा,खो खो या कबड्डी|धीरे धीरे ये खेल शहरीकरण की आंधी में अपना वजूद सम्हाल नहीं पाए और कबड्डी कब फिस्सड्डी बन गया हमें पता ही नहीं चला दादा दादी की पीढ़ी यादों का हिस्सा बन गयी और उनके बाद की पीढ़ी शहरी हो गयी जिसके पास देने के लिए एक ही खेल बचा क्रिकेट बाकी खेल की जगह रीयल मैदान की जगह वर्चुअल कम्प्युटर की स्क्रीन ने ले ली |एक उम्मीद जरुर थी कि गाँव में इनका वजूद है और रहेगा पर गाँव जब शहर जैसे बनने लगे और वैश्वीकरण की हवा वहां से गुजरी तो सारे खेल क्रिकेट जैसे हो गए |ऐसे में गाँव के पारंपरिक खेल लट्टू घुमाना, रस्सा खींच, रस्सी कूद,सिकडी  बस यादों में ही बचे हैं| आज से कुछ वर्ष पूर्व तक जहाँ ग्रामीण अंचल में पारंपरिक खेलों की धूम मचा करती थी अब उनके स्थान पर आधुनिक खेलों ने कब्जा जमा लिया है गर्मियों की दोपहर गांव के बच्चों की धमा चौकड़ी से गुलजार रहा करती थी इस तरह के खेल बच्चों की  शारीरिक क्षमता बढ़ाने में बहुत उपयोगी रहते थे  लेकिन जब से गांवों में क्रिकेट व टेलीविजन का प्रचलन बढ़ा है ये खेल बस यदा कदा खेलते हुए देखे जा सकते हैं | कभी शाम होते ही गाँव में कबड्डी-कबड्डी की आवाजें लोगों में  जोश और उत्साह से भरी दिया करती थी फिर क्या बच्चा,बूढा और जवान सब इस खेल का लुत्फ़ लेने में डूब जाया करते थे । बिना किसी प्रकार के ताम झाम वाले इस खेल में लोगों  को अपनी शारीरिक व मानसिक फुर्ती  का प्रदर्शन करना पड़ता है।पर  ग्रामीणों का यह प्रमुख खेल गावों की सामान्य  दिनचर्या का हिस्सा नहीं रहा|क्रिकेट के आगे  हारते इन ग्रामीण खेलों को जीतने के लिए कई मोर्चों पर जीतना होगा चुनौती मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं पर समस्या कहाँ से शुरू हुई इसको समझने की जरुरत है इसका बड़ा कारण वैश्वीकरण है जहाँ सब कुछ एक जैसा है जहाँ वैविध्य की कोई जरुरत नहीं बस वो बिकना चाहिए और हमारे खालिश खेल इससे बच नहीं पाए खेल जबसे बाजार का हिस्सा हुए है तब से इससे कोई मतलब नहीं रह गया कि मानव सभ्यता के इतिहास में इनका अस्तित्व क्यों रहा है इनमें इतना वैविध्य क्यूँ है सब कुछ नफे नुकसान के चश्मे से देखा जाने लग गया है| तेज़ गति और भरपूर रोमांच से भरा  फ़ॉर्मूला वन खेल हो या चौके छक्के पर ठुमका लगाती चीयर लीडर पिछले कुछ सालों  में ग्लैमर और पैसे वाले खेल भारत के शहरों में जगह बना रहे हैं पर अब गाँव भी पिछड़ने के डर से हर उस चीज को अपना लेना चाहते हैं जो शहरों में हो रहा है| कोई भी बड़ा बदलाव अवसर लाता है और चुनौती भी गाँव में भी क्रिकेट लोकप्रिय हो रहा है इसका कारण विश्वस्तर पर क्रिकेट में भारत का लगातार अच्छा प्रदर्शन रहा है जिससे उसे मीडिया और कॉर्पोरेट घरानों का साथ मिला पर गाँव के अन्य खेल इस चुनौती में टिक नहीं पाए अगर इन पारंपरिक खेलों को बचाना  है तो सरकारी और कॉरपोरेट मदद के साथ-साथ पुराने खेलों में मार्केटिंग के आधुनिक तरीके अपनाने होंगे| इसका प्रमुख कारण यह है कि ग्रामीण खेलों के प्रति बच्चों की रुचि जगाने वाली कोई संस्था नहीं है। लोगों के बीच इन खेलों की लोकप्रियता बढ़ाई नहीं गई। इन ग्रामीण खेलों को सिखाने के लिये क्रिकेट की तरह का कोई कोच भी नहीं है।ये मार्केटिंग का दबाव ही था कि पंजाब में जब कबड्डी का विश्वकप आयोजित हुआ था तो लोगों को कबड्डी के इस विश्व कप के बारे में बताने के लिए शाहरुख खान को बुलाना पड़ा जिससे यह आयोजन मीडिया का ध्यान केंद्रित कर पाया बहरहाल हमारे खेल अभी क्रिकेट से बुरी तरह हार रहे हैं और हम एक दर्शक के तौर पर इन खेलों की हार पर महज दर्शक ही बने हैं और यह परम्परागत खेल हमारी ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं कि हमारा आधुनिक खेलों से कोई झगड़ा नहीं बस हमें तो हमारे हिस्से का मुट्ठी भर आकाश चाहिए |
गाँव कनेक्शन के 13 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित  

तुम्हारे जाने के बाद


तुम्हारे जाने के बाद
कुछ भी तो नहीं बदला
बस बदला है तो जीवन
अब रोज दाढी बनाने का झंझट नहीं
और सजना सवाँरना समय की बर्बादी
रेडियो मुंह चिढाता
अब वो छोटे मोबाईल संदेशे
नहीं आते
जिन्हें पढकर बस
यूँ ही मुस्कुरा दिया
करता था मैं
वो  शीशा जो खुरच गया था
उस दिन
अब टूट चुका है
जीवन तो चल रहा है
पर वो जोश कहाँ है
जो कभी तुमने दिया था
हाँ यही तो कहा था तुमने
आओ थोड़े दिन जी के देखा जाए
मैं भी बस बह गया था उस हौसले में
पर उधार के हौसलों से जीवन नहीं चलता
तुमने कहा था मेरे पास सब कुछ है
हाँ है तो फिर तुम्हारी जरुरत क्यों थी
कभी सोचा तुमने
पर मैं तो अब भी सोच रहा हूँ
सवाल बदले या जवाब
इस बदलती दुनिया में सब कुछ
इतना जल्दी क्यों बदल जाता है
जाड़े की वो  उस सुहानी शाम
जहाँ तुम छोड़ गए थे मुझे
वहीं रुका हूँ थमा हूँ
तुम्हारे जाने के बाद
कुछ भी तो नहीं बदला

(पुरानी डायरी के पन्नों से )


Tuesday, April 9, 2013

मुझे तो तेरी लत लग गयी

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है पर कुछ बोलता हूँ एक लड़की थी दीवानी सी जहाँ जाती खुशियाँ बिखेरती नाम था परी दिन भर पढ़ाई करती चिल करती और जरुरत के वक्त इंटरनेट खोलती फिर एक दिन उसे जी नहीं उसे प्यार बिलकुल भी  नहीं हुआ बल्कि उसके एक करीबी दोस्त ने एक नेट इनेबल्ड एंड्रायड फोन भेंट किया फिर क्या उसकी कल्पनाओं को पंख लग गए नए नए एप्स डाउनलोड करना अपने दोस्तों से खूब चैट करना वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया जो इंटरनेट उसकी तरक्की के रास्ते खोल रहा था वो उसके जी का जंजाल बन गया एक दोस्त से बात करो तो दूसरा नाराज चैट पर दिन भर ऑन दिखने से उसके दोस्तों में गलतफहमियां पनपने लग गयीं कि वो दिन भर किसी से चैट करती है फिर क्या उसका आधा दिन उन गल्फह्मियों को दूर करने में और आधा दिन उन  दोस्तों से चैट करने में बीत जाता जो उसके चैट न कर पाने से दुखी थे .उसे पता ही नहीं पड़ा कि कैसे उसका ये शौक कब लत बन गया.हर दो मिनट में अपना मोबाईल चेक करती कि कहीं कोई मेसेज तो नहीं आया नतीजा उसके करीबी दोस्त उससे दूर हो गए वो बस जितने एप्स हो सकते हैं उन्हें अपने मोबाईल में भर लेना चाहती थी जिससे वो सबसे जुडी रहे  नतीजा एक पढ़ने लिखने वाली लड़की जो अपनी छोटी सी दुनिया में अपने चुनिन्दा दोस्तों के साथ खुश रहा करती थी इंटरनेट के एडिक्शन से कई तरह के दबाव से टूट कर रूखे स्वभाव की हो गयी बात बात में नाराज होने लगी पढ़ना लिखना छूट गया वो कई तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याओं की शिकार रहने लग गयी. रात में अजीब अजीब सपने देखती नींद आँखों से दूर हो गयी जिससे दिन में भी वो उनींदी सी रहती .उसके कई  करीबी दोस्त उससे दूर हो गए.ये महज कहानी नहीं बल्कि आज के यूथ के लाईफ की कडुवी रीयल्टी है.नेट के एडिक्शन के चक्कर में रीयल वर्ल्ड से नाता तोड़कर वर्चुअल वर्ल्ड में जीने वाले आज परी जैसे  लोग हमारे आस पास न जाने कितने मिल जायेंगे.टेक्नोलॉजी वक्त की जरुरत है पर इस जरुरत को हमें अपनी नीड के हिसाब से देखना होगा.हर उम्र और वक्त के हिसाब से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.पढ़ने लिखने की उम्र में हर वक्त ऐसा कोई संदेसा हर वक्त नहीं आएगा जिसको अगर आप मिस कर गए तो आसमान फट पड़ेगा.फोन पर इंटरनेट के आ जाने से समस्या ज्यादा गंभीर हो गयी है आप लोगों से कनेक्टेड रहें पर हर इंटरनेट के इस्तेमाल में एक डिसीप्लीन रहना बहुत जरूरी है नहीं तो ये शौक कब आपको धीरे धीरे खत्म करने लग जाएगा पता भी नहीं पड़ेगा इसलिए अपने काम के हिसाब से नेट के इस्तेमाल का वक्त तय कीजिये दोस्तों के साथ फन करने का एक निश्चित समय रखिये उसके बाद यदि कोई मेसेज आता है जिसमे हेलो,नमस्ते, क्या हो रहा है जैसे शब्द हों तो  इस बात की परवाह किये बगैर कि सामने वाला क्या सोचेगा जवाब मत दीजिए.आप एक बार इसको अपनी आदत बनायेंगे तो धीरे धीरे ऐसे लोग जो दिन भर ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो उनके खालीवाक्त के साथी बनें आपको संदेसा भेजना कम कर देंगे. बीच बीच में अपने मोबाईल को ऑफ करना सीखिए अपनी सोशल नेटवर्किंग साईट्स को आराम दीजिए जरूरी नहीं कि रोज कुछ न कुछ अपडेट करें थोडा वक्त अपने लिए निकालिए और देखिये दुनिया कितनी खूबसूरत है आपके कितने ऐसे दोस्त हैं जो आपके वर्चयुल साथ के लिए नहीं बल्कि रीयल साथ के लिए तरसते हैं कुछ एस्माय्ली भेज देने से भावनाओं का इजहार नहीं हो जाता इसके लिए किसी रिश्ते को जीना पड़ता है.टेक्नोलोजी को अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए अपनी जरुरत और तकनीक में संतुलन बनाइये तभी आप जिंदगी का सच्चा लुत्फ़ उठा पायेंगे.मैं तो आज अपना स्मार्ट  फोन ऑफ कर अपनी दोस्त से मिलने जा रहा हूँ जो नेट के एडिक्शन से उबरने की कोशिश कर रही है .आप क्या करेंगे जरुर बताइयेगा|
आई नेक्स्ट में 09/04/13 को प्रकाशित   

Wednesday, March 20, 2013

यादों में तुम



यादों में तुम 
हाँ तुम 
हिस्सा हो उन पलों का 
जो अब नहीं आयेंगे 
और बीतने को तो दिन बीत जायेंगे 
कभी बैठूँगा 
उस तन्हाई में 
जहाँ मिले थे तुम कभी 
पर मिलन  के वो दौर 
अब सुहाने नहीं आयेंगे 
कभी सोचा था 
मिल कर चलेंगे साथ 
पर साथ चलने के वो  बहाने नहीं आयेंगे 
ये मान लूँगा कि मिलना तुमसे 
बस तकदीर का खेल था 
पर इस खेल को समझने के 
मौके अब नहीं आयेंगे 
बैठा हूँ उदास ये जानकर 
कि जा चुके हो तुम 
और हैरान हूँ मैं कि 
इस बेमकसद जीवन में 
मेरे होंटों पर  तुम्हारे नाम के 
वो खूबसूरत तराने अब 
कभी नहीं गाये जायेंगे 
कभी नहीं गाये जायेंगे 

Monday, March 18, 2013

साईबर हमलों से निपटने को कितने तैयार हैं हम


प्रसिद्ध होलीवुड फिल्म डाई हार्ड फॉर के कथानक में एक ऐसी काल्पनिक समस्या का जिक्र किया गया है जब अमेरिका के इंटरनेट पर एक अपराधी समूह का कब्ज़ा होता है और पूरे देश में अराजकता की स्थिति उत्पान हो जाती है पर इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता और साइबर हमलों से निपटने में हमारी तैयारी कभी भी इस फ़िल्मी कल्पना को हकीकत का जामा पहना सकती है|इंटरनेट ने दुनिया को एक स्क्रीन  में समेट दिया है, समय स्थान अब कोई सीमा नहीं है बस इंटरनेट होना चाहिए, हमारे कार्य व्यवहार से लेकर भाषा तक हर क्षेत्र में इसका असर पड़ा है और भारत भी इस का अपवाद नहीं है|वैश्विक  परामर्श संस्था मैकिन्सी कम्पनी का एक नया अध्ययन बताता है कि इंटरनेट  साल 2015 तक  भारत की जी डी पी (सकल घरेलू उत्पाद )में १०० बिलियन डॉलर का योगदान देगा जो कि वर्ष 2011 के 30 बिलियन डॉलर के योगदान से तीन गुने से भी ज्यादा होगा अध्ययन यह भी बताता है कि अगले तीन साल में भारत दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा इंटरनेट उपभोक्ताओं को जोड़ेगा और देश की कुल जनसंख्या का 28 प्रतिशत इंटरनेट से जुड़ा होगा जो चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा जनसँख्या समूह होगा पर गाँवों के मामले में यह सिर्फ नौ प्रतिशत की जनसँख्या ही इसका लाभ उठा रही होगी जिससे 22 मिलियन  रोजगार का सृजन होगा यह आंकड़ा अभी 6० लाख के करीब है|इंटरनेट के इस  विस्तार में स्मार्टफोन एक बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं|हर क्षेत्र में इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता ने कुछ सवाल भी खड़े किये हैं| इंटरनेट के बढते विस्तार ने  सायबर हमले की सम्भावना को बढ़ाया है. अभी तक देश को सायबर हमले से बचाने की जिम्मेदारी साल 2004 में बनी इन्डियन कंप्यूटर इमरजेंसी रेस्पोंस टीम (सी ई आर टी -इन )के जिम्मे थी |साल 2004 से 2011 तक आधिकारिक तौर पर सायबर हमलों की संख्या 23 से बढ़कर 13,301तक पहुँच गयी और वास्तविक संख्या इन आंकड़ों से कई गुना ज्यादा हो सकती है| पिछले वर्ष सरकार ने सी ई आर टी को दो भागों में बाँट दिया अब ज्यादा  महत्वपूर्ण मामलों के लिए नेशनल क्रिटीकल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर की एक नयी इकाई बना दी गयी है  जो रक्षा ,दूरसंचार,परिवहन ,बैंकिंग आदि क्षेत्रों की साइबर सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है |साईबर सुरक्षा के लिए 2012-13 के लिए  मात्र 42.2 करोड रुपैये ही आवंटित किये गए जो कि काफी कम है | साईबर हमलों के लिए चीन भारत के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है |एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले महीने में दुनिया में हुए बड़े सायबर हमलों के लिए चीन सरकार समर्थित पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जिम्मेदार है जिसके हमलों में प्रमुख सोशल नेटवकिंग साइट्स फेसबक और ट्वीटर भी थीं|पिछले कई वर्षों से चीन को साइबर  सेंधमारी के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है जिसके निशाने पर ज्यादातर अमेरिकी सरकार और कंपनियां रहा करती हैं पर इंटरनेट के बढते विस्तार से भारत में साइबर हमले का खतरा बढ़ा है पर हमारी तैयारी उस अनुपात में नहीं है आवयश्कता समय की मांग के अनुरूप कार्यवाही करने की है|
हिन्दुस्तान में 18/03/13 को प्रकाशित 

Tuesday, March 12, 2013

एन्जॉय करें,जरा संभल कर


तो मार्च आ गया हाँ मुझे पता है इसने कुछ नया नहीं पर क्या आपको पता है कि मार्च साल का सबसे इम्पोर्टेंट मंथ  होता है क्यों अरे भाई पैसा बोलता यह किसी भी फाइनेंसियल इअर का आख़िरी मंथ  होता है.अगले महीने से नए सिरे से पैसे का बंटवारा होगा कि सरकार हमारे ऊपर कैसे और कितना खर्च करेगी.बजट से याद आया आपको इसमें ज्यादा इन्ट्रेस्ट नहीं है आप तो बस ये जानना चाहते हैं कि क्या सस्ता हुआ और क्या महंगा,क्यों मैं सही कह रहा हूँ तो पहले तो मैं आपको अपनी इस्टाईल में बताता हूँ कि अगले महीने से कैसा होगा हमारा जीवन.
अगर किसी ख़ास दोस्त के साथ बाहर लंच का प्रोग्राम बनाना है तो बेशक जाइये, कुछ ऐसे ही लम्हें होते हैं जिनकी लज्ज़त ताउम्र जीभ पर रहती है पर अगर किसी एयर कंडीशंड रेस्तरां में अब तक जाते रहे हैं तो जरा सा चौकन्ने हो जाइये, क्योंकि अब खाने की मेज पर आपका ध्यान व्यंजनों के साथ साथ जेब पर भी रहने की उम्मीद है. कोई बड़ी कामयाबी हाथ लगी है या गर्लफ्रेंड से फिर से ब्रेकअप हो गया है और आप अपनी फिक्र को इस वैधानिक चेतावनी के साथ धुंएँ में उड़ाना चाहते हैं कि सिगरेट से कैंसर हो सकता है तो सिगरेट और सिगार की १८ फीसद बढ़ी हुई एक्साईज ड्यूटी धुंए के छल्लों की संख्या कम कर सकती है. यूथ है तो बाईक से लगाव तो होगा ही ८०० सीसी  से अधिक क्षमता वाली विदेशी मोटर सायकिलों से खतरनाक स्टंट्स को अंजाम देने की आपकी सनक को इस बार का आर्थिक बजट कम कर सकता है. सब जानते हैं और जो नहीं जानते है वो जान रहे हैं कि मोबाईल फ़ोन अब आपका फैमिली मेंबर बन चुका है. उससे कुछ ज्यादा इंच भर की दूरी आपको बेचैन कर देती है. इसके नए नए एप्स और टेक्नोलॉजी के आप दीवाने हैं. लेकिन मंहगाई इस पर भी हावी हो चुकी है. पर बहुत कुछ है जो सस्ता हुआ है.म्यूजिक लवर्स के लिए अच्छी खबर ये है कि सरकार 294 नए एफ एम् स्टेशन शुरू करेगी और अगर आपके शहर में अब तक एफ एम् की आवाज नहीं पहुँची है तो जल्दी ही आप भी इसका लुत्फ़ उठा पायेंगे.सवाल अभी भी आपके दिमाग में कौंध रहा होगा कि सरकार क्यों चीजें महंगी और सस्ती करती है जवाब हमारे आस पास ही है कभी आपने सोचा कि बचपने में आप टोफ़ी चौकलेट से बहल जाते थे पर अब बढ़िया मोबाईल और ब्रांडेड कपडे आपको लुभाते हैं मतलब आपकी लाईफ आगे बढ़ चली है और उसी के साथ आपकी प्रायरिटीस भी पर जिस हिसाब से चीजों की कीमत बढ़ती है उसके मुकाबले सैलरी नहीं तो कहीं न कहीं हमें समझौता करना पड़ता है और वही काम सरकार करती है. हम आप भी तो पॉकेट  देखकर ही चीजों पर खर्च करते हैं जो अपनी इनकम से ज्यादा खर्च कर देते हैं और तब उन्हें दूसरों से उधार लेना पड़ता है और उनका बजट में घाटा होता है.खैर ये रही बजट की बात पर ज़रा याद कीजिए कि कैसे जब पॉकेट मनी ख़त्म हो जाती है तो आप सब कुछ मैनेज कर लेते हैं. या फिर किसी यार दोस्तों से उधार ले देकर सब ठीक कर लेते हैं. हो सकता है आप में से बहुतों ने कोई ख़ास तोहफा अपनी संडे पार्टी को फिर कभी पर टाल कर खरीदा हो. कहने की बात सिर्फ इतनी सी है कि हम सब अपनी जरूरतों को बैलेंस करना जानते हैं. बजट तो बस एक बहाना भर है. अगर यही बजट भावना  हम अपनी रोज़मर्रा कि जिंदगी पर लागू करके देखें तो लाईफ के आधे से ज्यादा मसले यूं ही आसान हो जायेंगे. वक़्त का टाइम टेबल फिर से बनाने बैठिये, भावनाओं का इज़हार चाहे वो ख़ुशी हो या गम उनमें बैलेंस  बनाने  की कोशिश कीजिये , लगे हाथ दोस्तों की लिस्ट को भी  वरीयता के क्रम में री राईट कर ही डालिए, कहाँ संतुलन बनाकर चलना है और किस बात पर बस अपने मन की चलानी है इसका ख्याल रखिये और इसे कुछ दिन फॉलो  करिये फिर देखिएगा  ज़िन्दगी वाकई खुबसूरत लगने लगेगी.
आईनेक्स्ट में 12/03/13 को प्रकाशित 

Monday, March 4, 2013

सिंवई को भूलकर नूडल्स को दिल दे बैठे हम

 गाँव की चिंता सबको है आखिर भारत गाँवों का देश है पर क्या सचमुच गाँव तो  जिन्दा हैं पर गाँव की संस्कृति मर रही है गाँव शहर  जा रहा है और शहर का बाजार गाँव में आ रहा है पर उस बाजार में गाँव की बनी हुई कोई चीज नहीं है.सिरका,बुकनू(नमक और विशेष मसालों का मिश्रण)पापड जैसी चीजों से सुपर मार्केट भरे हैं पर उनमें न तो गाँवों की खुशबू है न वो भदेसपन जिसके लिए ये चीजें हमारे आपके जेहन में आजतक जिन्दा हैं .सच ये है कि भारत के गाँव आज एक दोराहे पर खड़े हैं एक तरफ शहरों की चकाचौंध दूसरी तरफ अपनी मौलिकता को बचाए रखने की जदोजहद.विकास और प्रगति के इस खेल में आंकड़े महत्वपूर्ण हैं भावनाएं संवेदनाओं की कोई कीमत नहीं .वैश्वीकरण का कीड़ा और उदारीकरण की आंधी में बहुत कुछ बदला है और गाँव भी बदलाव की इस बयार में बदले हैं .गाँव की पहचान उसके खेत और खलिहानों और स्वच्छ पर्यावरण से है पर खेत अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं भारत के विकास मोडल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह गाँवों को आत्मनिर्भर बनाये रखते हुए उनकी विशिष्टता को बचा पाने मे असमर्थ रहा है यहाँ विकास का मतलब गाँवों को आत्मनिर्भर न बना कर उनका शहरीकरण कर देना भर रहा है.विकास की इस आपाधापी में सबसे बड़ा नुक्सान खेती को हुआ है .भारत के गाँव हरितक्रांति और वैश्वीकरण से मिले अवसरों के बावजूद खेती को एक सम्मानजनक व्यवसाय के रूप में स्थापित नहीं कर पाए.इस धारणा का परिणाम यह हुआ कि छोटी जोतों में उधमशीलता और नवाचारी प्रयोगों के लिए कोई जगह नहीं बची और खेती एक बोरिंग प्रोफेशन का हिस्सा बन भर रह गयी.गाँव खाली होते गए और शहर भरते गए.इस तथ्य को समझने के लिए किसी शोध को उद्घृत करने की जरुरत नहीं है गाँव में वही युवा बचे हैं जो पढ़ने शहर नहीं जा पाए या जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं है, दूसरा ये मान लिया गया कि खेती एक लो प्रोफाईल प्रोफेशन है जिसमे कोई ग्लैमर नहीं है फिर क्या गाँव धीरे धीरे हमारी यादों का हिस्सा भर हो गए जो एक दो दिन पिकनिक मनाने के लिए ठीक है पर गाँव में रहना बहुत बोरिंग है फिर क्या था गाँव पहले फिल्मों से गायब हुआ फिर गानों से धीरे धीरे साहित्य से भी दूर हो गया.समाचार मीडिया में वैसे भी गाँव सिर्फ अपराध की ख़बरों तक सीमित और इस स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है.पंजाब हरित क्रांति से फायदा उठाने वाले राज्यों में सबसे आगे है वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से मजदूर अपने खेतों को छोड़कर पंजाब में दूसरे के खेतों में मजदूरी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपनी खेती से वो सम्मान नहीं मिलता जो परदेश में नौकरी करने के झूठे  दंभ में मिलता है समस्या की जड़ यही है.वैश्वीकरण का रोना छोड़कर हमें उससे मिले अवसरों का फायदा उठाना था जिसमे हम असफल रहे हमारे खेत और गाँव के उत्पाद अपनी ब्रांडिंग करने में असफल रहे.खेती में नवचारिता वही किसान कर पाए जिनकी जोतें बड़ी थीं और आय के अन्य स्रोत थे ऐसे लोग आज भी सफल हैं और अक्सर मीडिया की प्रेरक कहानियों का हिस्सा बनते हैं किन्तु  ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है.सहकारी आंदोलन की मिसाल लिज्जत पापड और अमूल दूध जैसे कुछ गिने चुने प्रयोगों को छोड़कर ऐसी सफलता कहानियां दुहराई नहीं जा सकीं.जिसका परिणाम ये हुआ कि गाँवों को शहर लुभाने लग गए और गाँव शहर बनने चल पड़े गाँव शहरों की संस्कृति को अपना नहीं पाए पर अपनी मौलिकता को भी नहीं बचा पाए जिसका परिणाम ये हुआ कि अपनी चिप्स और सिरका दोयम दर्जे के लगने लग गए पर यही ब्रांडेड चीजें अच्छी पैकिंग में हमें लुभाने लग गयीं हम अपनी सिवईं को भूल कर नूडल्स को दिल दे बैठे आखिर इनके विज्ञापन टीवी से लेकर रेडियो तक हर जगह हैं पर अपना चियुड़ा,गट्टा किसी और देश का लगता है .सारी दुनिया की निगाह आज भारत पर इसलिए है क्योंकि हमारे पास दुनिया का एक बड़ा बाजार है पर उस बाजार में हमारी अपनी बनाई चीजों के लिए कोई जगह नहीं है.गाँव के ऐसे उत्पाद और कुटीर उद्योग गाँव के आर्थिक स्वावलंबन का सहारा बन सकते थे जिनसे हमारी शहरों और शहरी चीजों पर निर्भरता कम होती पर ऐसा हुआ नहीं.सरकार के ग्रामीण विकास के मॉडल इस समस्या को समझने में असमर्थ रहे कि चुनौती कितनी बड़ी .ब्रांडिंग के इस युग में भारत के गाँव और उनके उत्पादों को जब तक ब्रांडिंग का सहारा नहीं मिलेगा हम अपनी विरासत को यूँ ही नष्ट होते देखते रहेंगे .   
गाँव कनेक्शन साप्ताहिक के 2 मार्च अंक में प्रकशित

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