Friday, June 20, 2008

इटली यात्रा :अंतिम भाग

बोलोना के विशाल चर्च 
अब मेरे लौटने का दिन करीब आ चुका था |पूरे इटली में बहुत से चर्च हैं और बोलोना कोई अपवाद नहीं हैं |कुछ चर्च तो एक हजार साल पुराने हैं |मेरा कई चर्चों में जाना हुआ और हर जगह एक रूहानी शांति का अनुभव हुआ कारण सीधा था भगवान् और भक्त के बीच कोई बिचौलिया अर्थात पुजारी नहीं था |मैंने अपनी इच्छा से कुछ चर्च में मोमबत्तियां जलाईं और उनके वास्तु का गहनता से अध्ययन किया |सब कुछ शांत और मोहक था |
आख़िरी दिन बहुत व्यस्तता भरा था |पहले मुझे बोलोना विश्वविद्यालय के नए कैम्पस जाना था जहाँ मुझे एक व्याख्यान देना था|
बोलोना विश्वविद्यालय का नया परिसर 

बोलोना विश्वविद्यालय का नया परिसर 
उसके बाद बोलोना से पचास किलोमीटर दूर एक गाँव में एक विदाई भोज रखा गया था |गाँव में भोज का कारण मुझे बाद में बताया गया कि मैं इटली के ग्रामीण जीवन की एक झलक ले सकूँ |पहले मैं चल पड़ा बोलोना विश्वविदयालय के नए कैम्पस यह पुराने कैम्पस के मुकाबले ज्यादा खुला और विशाल था |जहाँ सब कुछ वैश्वीकरण के रंग में रंगा था |व्यख्यान से पहले मुझे पूरा विश्वविद्यालय घुमाया गया |मुझे बार –बार अचंभित करने वाली बात यही लग रही थी की किसी यूनिवर्सिटी में बार कैसे हो सकता है ?पुराने कैम्पस की तरह यहाँ भी बार था |जब मैंने अपना कौतुहल वहां के शिक्षकों के साथ बांटा तो सभी मुझे ऐसे देखने लगे जैसे मैंने कोई अजीब सी बात कह दी हो |विश्वविद्यालय की विशालता के आगे वहां छात्र संख्या बहुत कम थी इसके पीछे कारण यह बताया गया कि  यहाँ लोग उच्च शिक्षा कम ही लोग प्राप्त करने आते हैं ज्यादातर पहले ही उन्हें रोजगार मिल जाता है तो उच्च शिक्षा में लोग सिर्फ शोध करने के मकसद से ही आते हैं जिससे परिसर में भीड़ कम रहती है |एक बार  फिर भारत  और यहाँ के विश्वविद्यालय याद  आ गए |सिल्विया साए की तरह मेरे साथ थी जहाँ भाषा की समस्या आती वो हाजिर हो जाती |
दोपहर होने को आयी थी अब हम चल पड़े इटली के ग्रामीण जीवन की झलक देखने चारो तरफ खेत और उनके बीच में बना कॉटेजनुमा आवास जहाँ हमारे लिए भोजन की व्यवस्था की गयी थी |पुडिंग पेस्ट्री से लेकर अनेक शाकाहारी –मांसाहारी व्यंजन बारबेक्यू सजा हुआ था ,सच कहूँ तो ऐसा द्रश्य इससे पहले सिर्फ होलीवुड की फिल्मों में ही देखा था और एक दिन मैं ऐसी किसी पार्टी का हिस्सा बनूँगा ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था ,बाग़ में कुछ फल जाने पहचाने थे पर कुछ फलों के बारे में बिलकुल भी नहीं जानता था |सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर सिस्टम था जिससे खेत में बारिश में जैसे पानी बरसता है उसी विधी से सिंचाई की व्यवस्था थी |कुछ जंगली खरगोश भी फुदकते दिखे |
महिला बस चालक 
पर मैं वहां के लोगों से ज्यादा घुल मिल नहीं पाया क्योंकि उनमें से ज्यादातर अंग्रजी नहीं जानते थे और उनलोगों से बात करने के लिए बार –बार मुझे सिल्विया की मदद लेनी पड़ती |
मेरी अगले दिन सुबह की फ्लाईट थी जो पेरिस होते हुए मुझे भारत लाने वाली थी आने से पहले मुझे कुछ स्मारक चिन्ह खरीदने थे जिसके लिए बाजार जाना था और रात का खाना सिल्विया के उस घर में खाना था जहाँ वह अपने पुरुष मित्र के साथ रहती थी तो भाग दौड़ ज्यादा थी |हमने गाँव से विदा ली और बाजार लौट आये जहाँ एक और आश्चर्य मेरा इन्तजार कर रहा था जब बाजार में मैंने एक महिला बस चालाक को देखा जो बगैर किसी परेशानी के अपने काम को अंजाम दे रही थी मैंने पलक झपकाए बिना उसकी कई तस्वीरें खींच डालीं |सिल्विया ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं किसी दूसरे ग्रह से आया प्राणी हूँ जब मैंने अपने अचम्भे की वजह बताई तो वह हँसे बगैर न रह सकी |बाजार में भारत के अपने मित्रों के लिए कुछ उपहार खरीदे और उस वक्त यूरो खर्च करते वक्त मेरा दिल जल रहा था क्योंकि भारतीय रुपयों  में उनकी कीमत बहुत ज्यादा थी और चीजें उस मुकाबले कुछ भी नहीं पर मैं पहली बार भारत से बाहर निकला था तो सबकी कुछ न कुछ फरमाईशें थी |सिल्विया को पहले दिन से पता था कि मुझे इटैलियन खाना रास नहीं आ रहा है इसलिए जब हम उसके घर पहुंचे उसने पहला काम किया मेरे लिए कुछ चाइनीज खाना ऑर्डर कर दिया |उसका पुरुष –मित्र किसी काम से देश से बाहर गया था इसलिए उसने खाना बाजार से मंगवाना बेहतर समझा |उस दिन देर शाम तक (इटली में रात 9.30 बजे होती है ) बातें करते रहे |वह जानना चाहती थी कि मुझे इटली कैसा लगा और मैं उसकी भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछ रहा था |बातों –बातों में हमें समय का पता ही नहीं चला पर अब वक्त विदा लेने का था सिल्विया से और इटली से भी |
मैं अपनी जिन्दगी में कुछ नए अनुभवों का इजाफा किये हुए वापस लौट रहा था जहाँ मेरे अपने बेताबी से मेरे लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे |

विदा बोलोना विदा इटली .......................

इटली यात्रा :पांचवां भाग


गुजराती युवक जो इत्तेफाक से मिला 
मैं किसी भारत वासी की तलाश में था और मेरी खोज इस साप्ताहिक बाजार में आकर तब पूरी हुई जब मैंने इटैलियन के साथ –साथ अंगरेजी में लिखा देखा मेड इन इंडिया ,जहाँ राजस्थानी जूते और गुजराती कपडे बिक रहे थे और एक भारतीय लड़का बेपरवाह सा खड़ा  सिगरेट फूंके जा रहा था |मेरा मन प्रसन्नता से भर गया चलो कोई तो मिला मैंने हिन्दी में उससे पूछा “कहाँ से” उसने थोडा झिझकते हुए बताया कि वह गुजरात से इटली अवैध तरीके से काम धंधे की तलाश में आया है और न उसके पास वीजा है न पासपोर्ट |मैं उसकी पूरी  कहानी सुनना चाहता था |पर धंधे के टाईम उसकी मुझसे बात करने में रूचि नहीं थी |शायद उसे डर था कि कहीं मैं उसे पकडवा न दूँ |बाद में मुझे पता चला कि इटली में अप्रवासियों की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे वहां के लोगों में काफी चिंता है |वो लड़का कई दिनों तक मेरे जेहन में घूमता रहा कि कैसे उसने भारत से इटली तक का सफर बगैर वैध कागजात के सहारे तय किया होगा ?क्या उसे अपने घर की याद नहीं आती होगी वगैरह वगैरह पर कहते हैं न जिन्दगी से बड़ी कोई क्रूर चीज नहीं होती मैं धीरे –धीरे उसको भूलने लग गया पर जब इस वृत्तांत को लिखते वक्त उसकी तस्वीर देखी तो वह घट्नाक्रम फिर आँखों के आगे घूम गया |
उस साप्ताहिक बाजार में मैंने काफी वक्त बिताया पर ले न सका कुछ भी मामला वही था मैं हर चीज की कीमत को भारतीय रुपयों में बदल कर सोच रहा था और उस लिहाज से वो सब खासी महंगी थी |विदेश यात्रा(खासकर विकसित देशों में )का आप तभी लुत्फ़ उठा सकते हैं जब आप स्थानीय मुद्रा को भारतीय रुपयों में बदल कर न देखें ,इटली में एक यूरो में पानी की बोतल बिकती है तो एक यूरो में आप हैन्किन बीयर का केन भी खरीद सकते हैं |
दीवारों पर उकेरी आकृतियाँ 
इटली के लोग खासे पढ़े लिखे और साहित्य कला के प्रेमी होते हैं और यह कला वहां की दीवारों पर देखी जा सकती है यहाँ तक की विरोध करने के तरीकों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है दीवारों पर आड़ी तिरछी रंग बिरंगी रेखाएं खींच कर कुछ लिख देना होता है |मुझे विरोध का ये तरीका बहुत भाया इससे शहर की खूबसूरती बढ़ जाती है |मैंने ऐसी ग्राफिटी शहर की दीवारों पर कई जगह देखी |मैं पहले ही लिख चुका हूँ |यह मेरी अनमनी यात्रा थी जिसमें मैंने कोई भी नोट्स नहीं लिए इसलिए जगहों चौराहों के नाम मुझे याद नहीं रहे हाँ पर कुछ चीजें और जगहें आज भी स्मृति में जीवित हैं जब मैंने पहली बार गैरीबाल्डी की एक भीमकाय मूर्ति देखी |
गैरीबाल्डी की मूर्ति 
मैंने गैरीबाल्डी को भी सिर्फ इतिहास की किताबों में पढ़ा था जिसे इटली के नायकों में से एक माना जाता है जिन्होंने इटली का एकीकरण किया था ,जब मैंने उसकी मूर्ति देखी तो मैं कुछ देर तक रुक कर उसे निहारता ही रहा |न जाने कितने भाव मेरे मन में आ जा रहे थे |
बोलोना का पुराना शहर एक गुलाबी शहर है जहाँ सारी इमारतें एक ही रंग की है हाँ नए शहर में बहु- रंगी बहु- मंजिली इमारतें हैं शहर की ऊँची मीनार से देखने पर शहर बहुत खुबसूरत दिखाई पड़ता है |
कुछ ऐसा दिखता है बोलोना 
किसी शहर के चरित्र को अगर समझना हो तो वहां की किताबों को देखना चाहिए और वही मैंने भी किया |भारत में जहाँ अंग्रेज़ी की किताबें ज्यादा दिखती हैं मुझे बोलों में इटैलियन भाषा में दुनिया भर का साहित्य मिला यहाँ तक की हमारी महाभारत और गीता भी इटैलियन भाषा में थी |महात्मा गांधी के ऊपर भी कुछ किताबें दिखी पर अंग्रेजी में कम ही किताबें दिखी |काश अपनी भाषा के प्रति ये लगाव हमारे देश में भी होता जहाँ चारो और अंग्रेजी का बोलबाला है |मैंने उस दूकान में कई घंटे किताबों को निहारते हुए बिताये और किताबों के बारे में सिल्विया मुझे बताती जा रही थी और मैं सबकुछ समझ लेना चाहता था|घूमते -घूमते भूख लग चुकी थी दिन में मैं बाहर ही इटली का कुछ भी खाना खाता पर शाम को मैं अपने होटल के नजदीक ताजमहल रेस्टोरेंट में बिरयानी उड़ना नहीं भूलता था |

सच कहूँ तो मुझे इटैलियन खाने में कहीं से कोई रूचि नहीं उत्पन्न हुई |हाँ दो दिन मैंने पिज्जा चाव से खाया |वहां पिज्जा की इतनी किस्में उपलब्ध थीं कि मैंने किस किस्म का पिज्जा खाया मुझे याद नहीं पर जो भी था स्वादिष्ट था |इटली में ही आकर मुझे पता पड़ा यहाँ सबसे महंगा गाय का गोश्त है और सबसे सस्ता मुर्गे का मांस है जिसे ज्यादातर निम्न आयवर्ग के लोग खाते थे |वाह री माया भारत में इसका उल्टा है अमूमन यहाँ गाय का गोश्त कई राज्यों में प्रतिबंधित है और भैंस का मांस ज्यादा खाया जाता है जो मुर्गे और बकरे के मुकाबले काफी सस्ता है |


Thursday, June 19, 2008

इटली यात्रा :तीसरा भाग

वीक एंड की तैयारी 
                               
पार्टी का आयोजन स्थल 
परिचर्चा ख़त्म होने के बाद मैं होटल के कमरे में थोड़ी देर आराम करने आया पर मैं इटली में होने को लेकर इतना  उत्साहित था कि मुझसे आराम नहीं हुआ ,मैं अकेले बोलोना शहर घुमने निकल पड़ा ,बाद में मुझे बताया गया ऐसा करना ठीक नहीं था क्योंकि एक तो मैं विदेशी दुसरे मुझे इटैलियन भाषा भी नहीं आती ऐसे में पूरी संभावना मेरे भटक जाने की थी |पूरा शहर किसी बड़ी पार्टी में तब्दील जान पड़ता था,कुछ भिखारियों को देखा वो इतने साफ़ सुथरे थे और सलीके से भीख मांग रहे थे कि मेरे दिमाग में जो भिखारियों की छवि बनी थी वो तार –तार हो रही थी |
सड़क पर भिखारी 
इस दिन पहली बार मैंने जाना कि वीक एंड क्या होता है पूरा शहर में जैसे उत्सव मनाया जा रहा हो लोग चारों ओर बिखरे हुए थे जो सम्पन्न थे वो अपनी गाड़ियों को लेकर आस पास की जगहों पर घुमने निकल पड़े थे और जो कम साधन सम्पन्न थे वो सड़कों पर मौज मस्ती कर रहे थे |
बड़ी मजेदार बात यह है कि मैं जिस होटल में ठहरा था उसका नाम तक मुझे नहीं याद था इसलिए मैं ज्यादा दूर नहीं गया और दो घंटे में होटल वापस लौट आया |शाम को मेरे सम्मान में एक भोज का आयोजन मेरी मेजबान सिल्विया के माता –पिता के घर किया गया था ,जहाँ तरह –तरह के मांसाहारी पकवान जिसमें ज्यादातर सूअर के गोश्त के थे और इटैलियन वाइन की व्यवस्था थी |वहां कई शहर के भद्र जन आमंत्रित थे |
मैं और सिल्विया 
बात चीत का सिलसिला जल्दी ही आतंकवाद के मुद्दे पर आ गया |मैंने उन सबको बताया कि कैसे पेरिस एयरपोर्ट में दाढी रखने के कारण  मेरी दो –दो बार तलाशी हुई |वहां पहली बार मैंने जाना कि यूरोप में भी अमेरिका के प्रति कोई अच्छी भावनाएं नहीं हैं खासकर आतंकवाद के मुद्दे पर |इटली आने से पहले मुझे सारे गोरे लोग एक जैसे लगते थे पर इटली में मेरे काफी भ्रम टूट रहे थे |
अब बारी खाने की थी |इतने सारे पकवानों के बावजूद मुझसे कुछ भी नहीं खाया नहीं जा रहा था सब कुछ सादा कोई मसाला नहीं ,मैंने किसी तरह गोश्त के कुछ टुकड़े ठूंसे |मुझे घर और घर के खाने की बड़ी याद आ रही थी |मेरा मन कर रहा था कि किसी तरह मैं वापस लखनऊ पहुँच जाऊं |पार्टी ख़त्म होते होते रात के ग्यारह बज गये |ख़ास यह बात थी कि इस पार्टी में किसी तरह का शोर शराबा नहीं था और न ही किसी तरह के संगीत की कोई व्यवस्था |इटली में पहली बार जाना विदेश में पले –बढे बच्चों में इतना स्वाव्लमबन और उद्यमशीलता कैसे आ जाती है |इटली में हर बच्चा चाहे लड़का हो या लडकी हाई स्कूल करते ही अपना घर स्वेच्छा से छोड़ देता है और खुद कमाई करते हुए अगर पढना चाहता है तो आगे की पढ़ाई करता है पर माता –पिता पर अपनी पढ़ाई का बोझ नहीं डालता |हाँ सप्ताहांत में जरुर अपने माता –पिता से मिलने आता है |
शहर का बाजार 
सिल्विया एक ऐसी ही लडकी थी जिसका पी एच डी वाइवा  लेने मैं आया था वह अपने पुरुष मित्र के साथ उसके फ़्लैट में रहती थी जिसे दोनों ने मिलकर खरीदा था और दोनों जल्दी ही शादी करने की सोच रहे थे |सिल्विया बोलोना विश्वविद्यालय में एक प्रोजेक्ट में कार्यरत थी |

देर रात मैं होटल पहुंचा|इतनी दूर मैं घर से पहली बार आया था मुझे लगा कि मुझे घर फोन करना चाहिए समय यही रात के बारह बजे थे इस उतावलेपन में मैं यह भूल गया कि इटली का समय भारत के समय से तीन घंटे पीछे था यानि इस समय यहाँ लखनऊ में रात के साढ़े तीन बज रहे होंगे और इस वक्त घर पर सभी गहरी नींद में सोये होंगे और हुआ भी वही फोन नहीं उठा |मैंने किसी तरह सोने की कोशिश की पर न जाने क्यों अब मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं इटली आया ही  क्यों ? शायद इसका एक बड़ा कारण भाषा और खाना था |बहरहाल अगली सुबह का इन्तजार था जब इटली घूमने जाना था |
                             
बांग्लादेशी कामगारों के साथ 
इटली यात्रा में आज मेरा तीसरा दिन था और मुझे रात में नींद अच्छी आयी सुबह मैंने इटली भाषा का पहला शब्द सीखा “बुनजुवार्नो” मतलब गुडमोर्निंग |ये शब्द भी बस महज इत्तेफाक से सीख पाया हुआ यूँ कि जब मैं होटल में सुबह के नाश्ते के लिए नीचे जा रहा था तो रास्ते में मुझे जो लोग भी भी मिलते वो
 “बुनजुवार्नो” कहते पहले तो मैं इसका मतलब समझ नहीं पाया |बाद में मुझे इस शब्द का सही मतलब पता लगा |मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि भले ही लोग आपसे परिचित हों या न हों मैं अपने सात दिनों के प्रवास में कुछ शब्द ही सीख पाया जैसे धन्यवाद को "ग्रात्शिया" कहते हैं |खैर खाने की एक बड़ी समस्या थी जिसका समाधान मेरी मेजबान ने निकाल लिया |मेरे होटल के बगल में ही एक भारतीय रेस्टोरेंट था जिसका नाम "ताजमहल" मुझे यह सोचकर अच्छा लगा चलो इसी बहाने अपने "मुलुक" के लोगों से बात होती पर मेरी यह धारणा जल्दी ही टूट गयी |जब मैं उस होटल में पहुंचा वो एक पाकिस्तानी का रेस्टोरेंट था चूँकि पाकिस्तान के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसकी ग्लोबल अपील हो पर भारत के पास ताजमहल था फिर क्या एक पाकिस्तानी ने भारतीय नाम से रेस्टोरेंट खोल लिया |मैंने उससे थोड़ी बहुत बात करने की कोशिश की पर उसका जवाब ठंडा था इससे अच्छा अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक रेस्टोरेंट में कुछ बांग्लादेशियों से मिला उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया |

Monday, June 16, 2008

इटली यात्रा -दूसरा भाग






दूसरे दिन मैं जल्दी ही सो कर उठ गया या ये कहें कि मुझे नींद ही नहीं पडी नए लोग नया परिवेश नयी भाषा सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था इसी दिन मुझे बोलोना विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट परिचर्चा में हिस्सा लेना था । एक खास बात जो मुझे बोलोना में दिख रही थी वो यह कि अपना काम सभी ख़ुद करते थे शायद इसका कारण श्रम का बहुत महंगा होना था । नहा धो कर मुझे होटल के नाश्ते के कक्ष में उपस्थित होना था अर्थात सेल्फ सर्विस नाश्ते की टेबल पर मुझे एक ही वस्तु समझ में आयी वह था फलों का रस बाकी सारी चीजें या तो मैं उनके बारे में जानता नहीं था या उनकी पैकिंग और इटालियन भाषा के कारण मुझे ये समझ नहीं आया कि वे क्या हैं । खैर अब वक्त था काम का , मुझे बोलोना विश्वविद्यलाया पहुचना था आम तौर पर एक विश्वविद्यालय की छवि जो किसी के भी मन में होगी वैसे ही मैंने भी कुछ सोच रखा था एक बड़ा सा मैदान होगा कुछ बोर्ड लगे होंगे वगैरह वगैरह , लेकिन वो सारी छवियाँ वहाँ पहुँच कर ध्वस्त हो गयी । बोलोना शहर लगभग एक हज़ार साल पुराना शहर है और बोलोना विश्वविद्यलाया दुनिया के सभी आधुनिक विश्वविद्यलाया में सबसे अधिक पुराना है । इस प्राचीन शहर की आधी से ज्यादा इमारतें वैसे ही हैं जैसे की वे आज से ६०० या ७०० साल पहले थीं .खास बात ये है की इस शहर में आधुनिकता और प्राचीनता का अद्भुत समागम देखने को मिलता है बाहर से इमारतें पुरानी हैं लेकिन भीतर से आधुनिकता का सारा साजो समान समेटे हैं और शायद ये संतुलन हमारे भारतीय शहर नहीं बना पाए आप किसी भी भारतीय शहर को देखें नए और पुराने का भेद स्पस्ट दिखेगा लेकिन यहाँ ऐसा .है . मैं बात कर रहा था बोलोना विश्वविद्यालय की टुकडों में फैला हुआ अलग भवन अलग काम के लेकिन वास्तुकला के हिसाब से इसकी खूबसूरती का कोई जवाब नहीं यहाँ गुजरने पर ऐस लागता है की आप आतीटी की गलियों से गुजर रहें हों . यहाँ इतिहास जीवंत हो उठता है शायद यही खासियत है इस जगह की . बाहर से यह किसी प्राचीन इमारत की तरह लगता है जहाँ कोई बोर्ड नहीं है लेकिन अंदर नवीन सभ्यता की एक से एक उन्नत चीज़ आपको नज़र आयगी विश्वविद्यालय में बार हिन्दुस्तान में कोई सोच नहीं सकता लेकिन यहाँ है बगैर किसी हो हल्ले के . जगह जगह मशीनें लगी हुई हैं जिनमें पैसा डाल कर आप अपने मतलब का पेय ले सकते हैं . खाश बात ये की इनको कोई तोड़ता नहीं और न ही किसी तरह का जुगाड़ लगाकर मुफ्त में चीजें हथियाने की कोशिश की जाती है .

विश्वविद्यालय के जिस हिस्से में परिचर्चा होनी थी वो इलेक्ट्रोनिक सुरक्षा के यंत्रों से युक्त था (वैसे बोलोना में के सभी रिहायशी इलाकों मैं इलेक्ट्रोनिक सुरक्षा यंत्रों का प्रयोग  होता है और हर चौराहे पर क्लोस सर्किट कैमरा लगे हैं ज्सिसे कोई भी यातायात के नियमों का उल्लंघन नही करता )
विश्वविद्यालय का माहौल किसी ओपन एयर थियटर जैसा लग रहा था .सब अपने आप में मगन पढने वाले पढ़ रहे थे और घूमने वाले घूम रहे थे . लड़के और लड़कियों में १:३ का अनुपात था . वैसे पूरे बोलोग्ना शहर में भी लड़कियां ही ज्यादा  दिखायी पड़ती हैं खास बात ये की यहाँ सिगरेट का बहुत प्रचलन है और लड़कियां भी खूब सिगरेट पीती हैं













इटली यात्रा :चौथा भाग

तीन दिन बीत चुके थे अब मेरे पास चार दिन का समय था,बोलोना घूमने के लिये पर सच बताऊँ मैं इस पूरी यात्रा में अनमना ही रहा शायद इसका कारण यह मेरी पहली विदेश यात्रा रही हो या इटली में अंग्रेजी भाषा का बहुत कम बोला जाना |इस अनमनेपन के कारण न तो मैं ज्यादा नोट्स ले पाया और न ज्यादा तस्वीरें ही खींच पाया |हर जगह वो अनमनापन मेरे दिमाग में छाया रहा इसलिए मैं ज्यादा रूचि नहीं ले रहा था |इसी यात्रा में मैंने एक और चीज सीखी कभी किसी यात्रा पर वीडियो कैमरे का इस्तेमाल न किया जाए और अगर किया जाए तो कम से कम ,मैंने वीडियो कैमरे का इस्तेमाल ज्यादा किया पर उन वीडियो फुटेज का इस्तेमाल भारत लौट कर कुछ कर नहीं पाया ,कुछ समय बाद वो वीडियो टेप कहाँ गए इसका भी पता नहीं |खैर जब मैं अमेरिका गया तो जो गलतियाँ इटली यात्रा में की थीं वो नहीं दुहरायीं |
कूड़ा उठाती सफाई कर्मी 

कूड़ा उठाती सफाई कर्मी 
खैर अब कुछ बातें इटली के दैनिक जीवन की सबसे पहली चीज कूड़ा प्रबंधन और ड्रेनेज सिस्टम ,मैं सात दिनों तक बोलोना में रहा ,गर्मियों के दिन थे फिर भी लगभग रोज बारिश होती थी पर पानी कहीं भी रोड पर या किसी जगह नहीं दिखता था |शहर के नीचे नालों का जाल था जिसका परिष्कृत रूप बोलोना के पास के शहर वेनिस में देखा जा सकता है |सड़कों पर गड्ढे नहीं थे और गलियां पक्की थी |कूड़ा रोड पर कहीं नहीं दिखता जगह –जगह बड़े डस्टबिन काली पौलीथीन के साथ रखे हुए हैं जिनको रोज सुबह कूड़ा उठाने वाली गाडी उठा लेती है |एक सुबह मैंने ऐसा ही नजारा अपने होटल की खिड़की से देखा जब एक चमचमाता ट्रक एक डस्टबिन के सामने रुका और उसमें दो सुन्दर लड़कियां सफ़ेद –काले कपड़ों में उतरी और और ट्रक में लगी मशीन ने उस डस्टबिन में रखे कूड़े को ट्रक में डाल दिया |भारत में ऐसे द्रश्य की कल्पना करना अभी भी न मुमकिन है |कूड़ा उठाने वाला ट्रक खटारे जैसा होगा और जितना कूड़ा वो उठाएगा उससे ज्यादा सड़क पर गिराते हुए जाएगा और बदबू इतनी ज्यादा होगी कि उसके पीछे आप अपनी मोटर साइकिल नहीं चला सकते| इटली में यही काम बड़े सौम्य तरीके से महिलाओं द्वारा किया जाता है और खुद भी वह सब इतनी साफ़ सुथरी होती हैं कि काम के बाद अगर वे किसी पार्टी में जाना चाहें तो आराम से जा सकती हैं |
साफ़ सुथरी सड़कें 
इटली में मेरे दिन बड़े सुहाने बीत रहे थे |मौसम भले ही गर्मी का था पर मुझे हमेशा कोट पहनना पड़ता था |धूल और प्रदूषण का नामों निशाँ नहीं था,मैं सात दिन के हिसाब से सात सेट कपडे ले गया था पर तीन सेट में ही काम चल गया वो भी इसलिए कि रोज –रोज एक ही कपडा पहनना ठीक नहीं लगता पर मेरा कोई भी कपडा गन्दा या काला नहीं हुआ|मेरे काले जूते को सात दिनों में एक बार भी पौलिश करने की जरुरत नहीं पडी |लोगों को कुत्ते पालने का बहुत शौक है पर ये जानवर सड़कों पर अगर गंदगी करते भी थे तो तुरंत उनका मालिक उस गंदगी को उठाकर डस्टबिन में दाल देता है |ये सिविक सेन्स अभी हम भारतीयों को सीखना है |तो दिन भर मैं घूमता और शाम को ज्यादातर हिन्दुस्तानी नाम वाले पाकिस्तान रेस्टोरेंट में भारतीय खाना खा लेता |मजेदार यह है कि इस्लाम में सूअर का मांस हराम है पर उस रेस्टोरेंट में सूअर आसानी से खाया जा सकता था |सच है जब पेट पर बनती है तो इंसान सब कुछ भूल जाता है |

साप्ताहिक बाजार गाड़ियों पर 
साप्ताहिक बाजार का द्रश्य 
मैं वहां किसी भारतीय को तलाश रहा था जिससे दो बोल हिन्दी में बतिया सकूँ और मेरी तलाश मुझे एक साप्ताहिक बाजार में ले गयी |यहाँ एक और आश्चर्य मेरा इन्तजार कर रहा था जिस खुली सडक से मैं दसियों बार गुजर चुका था |आज वहां लोगों का हुजूम था,पूरी जगह बहुत सारी खुली गाड़ियों से भरी हुई थी जिनके पीछे के हिस्से को खोलकर दुकान का रूप दे दिया था |यानि हफ्ते के एक दिन यह जगह बाजार बन जाती और बाकी दिन खुली चौड़ी रोड एक बार फिर भारत याद आया ,जहाँ इस तरह के बाजारों के लिए न कोई नियम है न कोई कानून |मैं अगले दिन भी उस सडक से गुजरा पर वहां कोई गंदगी का चिन्ह नहीं था लगता था जैसे कल यहाँ कोई बाजार लगा ही नहीं था |गंदगी के नाम पर अगर कोई चीज पूरे बोलोना शहर में दिखा था तो सिगरेट के टोटे मैं पहले भी लिख चुका हूँ लड़कों से ज्यादा लड़कियां सिगरेट पीती हैं और सिगरेट बहुतायत पी जाती है |वाइन इटली में जरुरी राशन की तरह खरीदी जाती है और इटली की वाइन पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है |चलिए चूँकि अभी मैं आपको वहां के साप्ताहिक बाजार से परिचित करा रहा था तो एक बार फिर वहीं लौट चलते हैं |लोगों की भीड़ बहुत थी पर कोई शोर नहीं था सब कुछ शांत| भारत में ऐसे बाजारों में इतना शोर होता है कि घबराहट होने लगती है पर वहां मुझे कोई परेशानी नहीं हो रही थी लड़कों से ज्यादा लड़कियां थी पर कोई छेड़-छाड़ नहीं थी |जिज्ञासावश मैंने सिल्विया से “ईव-टीजिंग” के बारे में पूछा हालंकि वह अच्छी अंग्रेज़ी जानती थी पर वह इस शब्द का मतलब समझाने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पडी क्योंकि उसने “ईव-टीजिंग” जैसे शब्द को कभी सुना ही नहीं था |वो मुझसे इस शब्द को सुनने के बाद काफी देर तक चुहल करती रही |पहली बार मुझे लगा ये मेरे सपनों का देश है जहाँ कोई आपको बिला वजह घूरता नहीं आप जो चाहे कपडे पहने जैसे कपडे पहने कोई फर्क नहीं पड़ता आप उन्मुक्त हो कर विचरण कर सकते हैं |
जारी .............................................

Sunday, June 15, 2008

इटली यात्रा प्रथम भाग




एक थका देने वाला दिन वीजा कि भाग दौड़ के साथ शुरू हुआ यात्रा का सिलसिला यूं तो दिल्ली का मौसम मेरी यात्रा के वक्त काफी सुहाना हो गया था और सोने पर सुहागा किया मेरे पुराने मित्र सौगत और अविनाश के साथ ने .रात ग्यारह बजे अविनाश ने मुझे दिल्ली के इंदिरा गाँधी अन्तर राष्ट्रीय पर छोडा और मैं मन में कई शंकाएँ और उमंगों के साथ एयर पोर्ट के अंदर प्रवेश किया .ये कहना कि सब बड़ा आसान था और मैं काफी रोमांचित था झूठ लिखने जैसा होगा यात्रा के पहले की कागजी औपचारिकताओं ने मुझे परेशान कर दिया था । उसके बाद दुनिया के एक ऐसे देश की यात्रा जिसका जिक्र या तो बचपन में इतिहास की किताबों में गैरीबाल्डी  , मैजिनी या कैवूर के किस्सों में ही पढ़ा था या बड़े होने पर सोनिया गाँधी के देश के नाते इतना ही परिचय था मेरा इटली से लेकिन एक दिन अचानक अपने आप को उस देश में महसूस करना जहाँ मुझे एक ओर रोमांचित कर रहा था वहीं दूसरी ओर मैं अंदर से डरा हुआ भी था और जो स्वाभाविक भी है क्योंकि डर सबको लगता है और गला भी सबका सूखता है मन में एक सपने के सच होने की खुशी भी थी कि मैं दुनिया और जिन्दगी को करीब से देख सकता हूँ वही मन के किसी कोने में एक डर भी था डर मुझे पेरिस से था वो डर क्यों था उसका जिक्र में आगे करूँगा ।
रात के १२.४० पर एयर फ्रांस की उड़ान ने दिल्ली से पेरिस का सफर शुरू किया रात काफी हो चुकी थी लेकिन सफर में मुझे नींद कम ही आती है मैंने एक फ़िल्म देखनी शुरू की तभी एयर होस्टेस खाने की प्लेट लेकर मेरे सामने खडी थी रात के दो बजे आप क्या खा सकते हैं ? लेकिन एयर फ्रांस का नियम यह है की वे अपने स्थानीय समय के हिसाब से खाने और नाश्ते का पर्बंध करते हैं गो की फ्रांस में उस वक्त रात के ९.३० बज रहे थे मैंने कुछ जूस पी कर अपने टिकट के पैसे वसूलने की कोशिश की लेकिन प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाया. फ्रांस के स्थानीय समय सुबह के ६ बजे और भारत के स्थानीय समय दिन के ९.३० बजे हमारा विमान पाकिस्तान अफगानिस्तान , इरान जर्मनी होते हुए पेरिस के चार्ल्स दी गौल एअरपोर्ट पर उतरा मौसम खुशगवार था यूरोप की सरज़मीन पर मेरा स्वागत सर्द हवाओं ने किया , वो सुबह काफी सुहानी थी . अब मेरे डर का सच सामने आने वाला था मुझे बताया गया था की पेरिस में अंग्रेजी बोलने वालों को पसंद नहीं किया जाता है .पेरिस से मुझे बोलोना की दूसरी फ्लाईट पकड़नी थी और समय कम था पेरिस का चलेस दी गौल एअरपोर्ट दुनिया के कुछ बड़े एअरपोर्ट में से एक है. एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल में जाने के लिए काफी वक्त के जरुरत होती है ऐसे में मेरा डरना लाजिमी था आधे घंटे तक रस्ते में आने वाले हर शख्स से में टर्मिनल २ डी का रास्ता पूछता रहा और कोई भी मुझे सही रास्ता नहीं बता पा रहा था न तो मैं किसी के बात समझ पा रहा था और न ही कोई मेरी झुन्झुलाहत में मैं एअरपोर्ट से बाहर आ गया एक बस वाले से मैंने मदद मांगी उसने अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में मुझे टर्मिनल २ डी का रास्ता बताया मैं किसी तरह टर्मिनल २ डी तक पहुँचा. मेरे हुलिए के कारण (दाढी) सिक्यूरिटी चेक पर मेरी दो बार जांच की गयी. खैर ये भी जिन्दगी का हिस्सा है मेरी सारी जल्दबाजी बेकार गयी क्योंकि बोलोना जाने वाली फ्लाईट आधे घंटे लेट थी . भारतीय समय के अनुसार मैं शाम के ४.३० बजे बोलोना एअरपोर्ट पर उतरा जहाँ बोलोना विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि मेरा इंतज़ार कर रहे थे. एअरपोर्ट से मैं सीधे अपने होटल पहुँचा जो बोलोना विश्वविद्यालया से एक दम करीब था और शहर के एकदम बीचों बीच स्थित था. शाम के समय मुझे बोलोना के अंतर्राष्ट्रीय संगीत संग्रहालय ले जाया गया यह संग्रहालय लगभग ५०० वर्ष पुराना था. जहाँ संगीत से संबंधित सैकडो वर्ष पुरानी पांडूलिपियाँ और वाद्य यन्त्र सुरक्षित हैं .बोलोना आने वाले सैलानियों को हिदायत है की वे यहाँ के संग्रहालयों में सामान्य परिधान में ही प्रवेश ले सकते हैं. पहले दिन मैं सूरज ढलने का इंतज़ार करता रहा पर रौशनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी .मुझे बताया गया की यहाँ सामान्यता रात के १० बजे रात होती है. शायद यही कारण की हमारे फ़िल्म निर्माता यूरोप में शूटिंग करने को बेताब रहते हैं क्योंकि वे कम समय मैं ज्यादा  काम कर सकते हैं . बोलोना का मौसम काफी सुहाना था सुबह और शाम अच्छी ठंड पड़ती है हालांकि अभी वहाँ गर्मियों का मौसम चल रहा है फ़िर भी हवा में नमी रहती है मैं जितने दिन भी रहा एकाध दिन छोड़ कर सामान्यता रोज बारिश होती थी. पहले ही दिन मुझे इस बात का एहसास हो गया था की इटली के लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति पर बहुत गर्व है पूरे बोलोना शहर में मुझे एक या दो साईन बोर्ड ही अंग्रेजी में दिखे. एक समस्या अभी आनी बाकी थी वो थी खाने की चूँकि मैं दिल्ली से आधी रात को उड़ा था इसलिए खाना खा के ही चला था दिन में सफर की थकन और तनाव के कारण कुछ नहीं खाया गया. लेकिन शाम को जब सूअर के मांस के साथ तरह तरह के पकवानों के साथ मेरा सामना हुआ तो मेरी हालत विचित्र थी हालांकि मैं मांसाहारी हूँ और मेरा मानना है की मांस , मांस है चाहे वो किसी का भी हो अगर आप मांस खाते हैं तो मांस में भेद मत कीजिये किंतु बोलोना में समस्या यह थी की वो उबले हुए मांस के टुकडे थे जिन्हें चीज के साथ सभी बड़े चाव के साथ खा रहे थे बगैर मसाले के मैंने कभी भोजन की कल्पना ही नहीं की थी फ़िर भी कुछ टुकड़े मैंने खाने की कोशिश की आख़िर पापी पेट का सवाल था |
पहला दिन इस एहसास में खत्म हो गया कि मैं विदेश में हूँ वही धरती वही आसमान पर ये भारत नहीं था |यह एक साफ़ सुथरी दुनिया थी जो भारत से कई मामलों में अलग थी |मैं पुरे दिन हिन्दी बगैर बोले रहा और यह एहसास मेरे लिए एकदम नया था हालांकि मैं बोल रहा था पर अपनी मात् भाषा नहीं बल्कि अंग्रजी ,भाषा को लेकर इटली में भी समस्या थी यहाँ ज्यादातर लोग अंगरेजी नहीं बोलते हैं लेकिन किसी तरह मैंने काम चलाना सीख लिया मुझे अगले सात दिन इसी मुल्क में गुजारने थे |


Monday, June 9, 2008

इटली यात्रा विशेष

प्रिय पाठकों

जल्दी ही आप मेरी इटली यात्रा के संस्मरणों से रूबरू होंगे .इंतजार करें

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