Friday, January 11, 2019

अक्षय ऊर्जा से ही बचेगा जीवन

ग्लोबल वार्मिग की समस्या रोकने के लिए जितने कारगर कदम उठाए जाने चाहिए थे वे नहीं उठाए गए जिससे मानव जीवन और देशों के स्वास्थ्य तंत्र दोनों को खतरा है। हाल में आई लेंसेट काउंट डाउन रिपोर्ट 2018 के अनुसार इससे होने वाले खतरे की आशंका पहले के अनुमानों से कहीं अधिक है। इस रिपोर्ट में दुनिया के 500 शहरों में किए गए सर्वे के बाद निष्कर्ष निकाला गया कि उनका सार्वजनिक स्वास्थ्य आधारभूत ढांचा जलवायु परिवर्तन के कारण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है जो यह बताता है कि संबंधित रोगियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उस तेजी से रोगों से निपटने के लिए दुनिया के अस्पताल तैयार नहीं हैं। इसमें विकसित और विकासशील दोनों देश शामिल हैं। बीती गर्मियों में चली गर्म हवाओं ने सिर्फ इंग्लैंड में ही सैकड़ों लोगों को अकाल मौत का शिकार बना डाला। दरअसल इंग्लैंड के अस्पताल जलवायु में अचानक हुए इस परिवर्तन के कारण बीमार पड़े लोगों से निपटने के लिए तैयार नहीं थे। वर्ष 2017 में अत्यधिक गर्मी के कारण 153 बिलियन घंटों का नुकसान दुनिया के खेती में लगे लोगों को उठाना पड़ा। कुल नुकसान का आधा हिस्सा भारत ने उठाया जो यहां की कुल कार्यशील आबादी का सात प्रतिशत है जबकि चीन को 1.4 प्रतिशत का ही नुकसान हुआ। रिपोर्ट बताती है कि प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिग दो अलग मसले नहीं हैं, बल्कि आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
दावोस (स्विट्जरलैंड) में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक के पाश्र्व में ‘पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक 2018’ को जारी किया गया जिसमें 178 देशों पर पर्यावरण प्रदर्शन को लेकर एक अध्ययन किया गया जिसमें भारत 174वें स्थान पर रहा। पर्यावरण के मामले में भारत दुनिया के बेहद असुरक्षित देशों में है। अधिकांश उद्योग पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों, विनियमों और कानूनों के अनुरूप नहीं हैं। देश की आबोहवा लगातार खराब होती जा रही है। शोध अध्ययन से यह पता चला है कि कम गति पर चलने वाले यातायात में विशेष रूप से भीड़ के दौरान जला हुआ ईंधन चार से आठ गुना अधिक वायु प्रदूषण उत्पन्न करता है, क्योंकि डीजल और गैस से निकले धुएं में 40 से अधिक प्रकार के प्रदूषक होते हैं। यह तो रही शहर की बात जहां यातायात प्रदूषण एक ग्लोबल समस्या के रूप में लाइलाज बीमारी बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्र भी प्रदूषण विस्तार के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत में काफी अंतर है। उदाहरण के लिए 75 प्रतिशत ग्रामीण परिवार रसोई के ईंधन के लिए लकड़ी पर, करीब 10 प्रतिशत गोबर के उपलों पर और पांच प्रतिशत रसोई गैस पर निर्भर हैं। घर में प्रकाश के लिए करीब 50 प्रतिशत परिवार ही बिजली पर निर्भर हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी कार्य के लिए 89 प्रतिशत परिवार बिजली पर तथा अन्य 11 प्रतिशत परिवार केरोसिन पर निर्भर हैं। लेकिन इस धुंधली तस्वीर का दूसरा पहलू यह बता रहा है कि भारत सरकार गैर-परंपरागत ऊर्जा नीतियों को लेकर काफी गंभीर है। देश में सौर ऊर्जा की संभावनाएं भी काफी अच्छी हैं। हैंडबुक ऑन सोलर रेडिएशन ओवर इंडिया के अनुसार, भारत के अधिकांश भाग में एक वर्ष में 250 से 300 धूप निकलने वाले दिनों सहित प्रतिदिन प्रति वर्गमीटर चार से सात किलोवॉट घंटे का सौर विकिरण प्राप्त होता है। राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में यह स्थिति अन्य राज्यों की अपेक्षा ज्यादा है।
भारत का अक्षय ऊर्जा क्षेत्र बीते कुछ समय से सुर्खियों में बना हुआ है। हाल ही में ब्रिटेन की अकाउंटेंसी फर्म अर्नेस्ट एंड यंग द्वारा अक्षय ऊर्जा क्षेत्र के लिए आकर्षक देशों की सूची में भारत को दूसरा स्थान दिया। वहीं भारत सरकार की ऊर्जा नीति में सुधार की शुरुआत अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के फैसले के साथ हुई। जून 2015 में जवाहरलाल नेहरू नेशनल सोलर मिशन के लक्ष्य की समीक्षा करते हुए मोदी सरकार ने 2022 तक सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य 20,000 मेगावॉट के आंकड़े से पांच गुना बढ़ाकर एक लाख मेगावॉट कर दिया। इसमें 40,000 मेगावॉट बिजली रूफटॉप सोलर पैनलों और 60,000 मेगावॉट बिजली छोटे और बड़े सोलर पॉवर प्लांटों द्वारा पैदा की जाएगी। अगर भारत इस लक्ष्य को हासिल कर लेता है तो हरित ऊर्जा के मामले में वह दुनिया के विकसित देशों से आगे निकल जाएगा। यह प्रदूषण मुक्त सस्ती ऊर्जा के साथ-साथ ऊर्जा उपलब्धता और देश की आत्मनिर्भरता बढ़ाने में सहायक साबित होगा। वैश्विक पटल पर भारत इस समय विश्व में गैर-परंपरागत ऊर्जा के संसाधनों पर चिली के बाद भारत सबसे ज्यादा निवेश करता दिख रहा है। क्लाइमेट स्कोप 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत इस समय अक्षय ऊर्जा के संसाधनों को स्थापित करने के संदर्भ में दूसरे स्थान पर है। एनर्जी रिसर्च ब्लूमबर्ग ने 103 देशों की ऊर्जा नीतियों, पावर सेक्टर तंत्र, प्रदूषण उत्सर्जन और अक्षय ऊर्जा के संसाधनों के संदर्भ में हुए कार्यो का अध्ययन किया जिसमें पाया गया कि भारत 2.57 अंकों के साथ अक्षय ऊर्जा के संसाधनों पर खर्च के मामलों में विश्व में दूसरे स्थान पर है। वहीं चिली 2.63 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। लेकिन इसके साथ भी बहुत कुछ जरूरी है- जैसे पर्यावरण की सुरक्षा से ही प्रदूषण की समस्या को सुलझाया जा सकता है। यदि हम अपने पर्यावरण को ही असुरक्षित कर दें तो हमारी रक्षा कौन करेगा? पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम के प्रति भारत का रवैया पिछले कुछ सालों से काफी सकारात्मक दिख रहा है जिसमें गैर-परंपरागत ऊर्जा के संसाधनों के इस्तेमाल पर ज्यादा कार्य हो रहा है। इस समस्या पर यदि हम आज मंथन नहीं करेंगे तो प्रकृति संतुलन स्थापित करने के लिए स्वयं कोई भयंकर कदम उठाएगी। प्रदूषण से बचने के लिए हमें अत्यधिक पेड़ लगाने होंगे। प्रकृति में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करने से बचना होगा। प्लास्टिक से परहेज करना होगा। वर्षा जल का संचय करते हुए भूमिगत जल को संरक्षित करने का प्रयास करना होगा। पेट्रोल, डीजल के अलावा हमें ऊर्जा के अन्य विकल्प ढूंढने होंगे। सौर ऊर्जा व पवन ऊर्जा के प्रयोग पर बल देना होगा।
दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 11/01/2019 को प्रकाशित 

Tuesday, January 1, 2019

प्रिय मित्र,साल 2019

प्रिय मित्र साल 2019
आखिर तुम आ ही गए और मेरे जाने का वक्त आ गया, पर चलने से पहले कुछ बातें तुम से बाँट लूँ. वैसे तुम आते ही व्यस्त हो जाओगे खुशियाँ मनाने में. तो मैंने सोचा चलने से पहले एक चिट्ठी तुम्हारे लिए लिख दूँ. मित्र मैंने एक साल में जीवन के कई रंग देखे कुछ अच्छे थे कुछ बुरे. कई जगह मुझे इस बात का पछतावा हुआ कि मैं बेहतर कर सकता था पर चीजें देर से समझ में आयीं. जब भी हम कोई नया काम सम्हालते हैं तो लोगों से हमें बहुत उम्मीदें रहती हैं और हमें लगता है कि ये खुशियाँ ऐसी ही रहेंगी पर वास्तव में ऐसा होता नहीं जब मैं आया था तो लोगों ने खूब खुशियाँ मनाई और मैंने भी इनका खूब आनंद लिया लेकिन धीरे धीरे खुशियाँ कम हुईं और लोगों की अपेक्षाएं बढ़ने लगीं. मैं कुछ पूरी कर पाया और कुछ नहीं शिक्षा और बुनियादी ढाँचे पर काम हुआ लोग विकास के मुद्दे पर जागरूक हुए  .जो काम मैंने शुरू किया उसे तुम्हें आगे बढ़ाना है .
तुम जब आओगे तो खूब खुशियाँ मनाओगे ठीक भी है पर ये मत भूल जाना कि ये साल तुम्हारे लिए अवसर भी लाएगा और चुनौतियाँ  भी अगर चुनौतियाँ को अवसर में बदल लोगे तो तुम्हारी जय  होगी .आखिर ये चुनाव का साल है उस लिहाज से संवेदनशील भी .जब मैं छोटा था तो मुझे लगता था कि मैं सही हूँ और जो बड़े लोग कहते हैं वो सही नहीं है  या शायद वे  मुझे समझते नहीं. पर उम्र के इस मुकाम पर आकार मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं गलत था जो भी मुझसे बड़े मेरे लिए कहते थे वो सही थे पर मेरे पास अनुभवों को वो खजाना नहीं था कि मैं उनकी बातों को समझ सकूँ.
 हो सकता तुम्हें मेरी बातें समझ में न आ रही हों या बुरी लग रही  हों पर दोस्त जब जिंदगी सिखाती है तो अच्छा ही सिखाती है अब ये तुम्हारे ऊपर है तुम मेरी बात को ठोकर खा कर  समझो या पहले से ही जान लो कहाँ सम्हल कर चलना है ,मैंने अपनी जिंदगी में यही सीखा है लोगों को साथ ले कर चलो सुनो सबकी इस छोटे से जीवन में मुझे लगता है कमसे कम ये काम तो हम कर ही सकते हैं खुशियों को सर पर न चढ़ने दें आखिर एक दिन तुम्हें भी जाना है तो सकारात्मक सोच के साथ काम करोगे तो ठीक रहेगा .दुनिया तो बहुत तेजी से बदल रही है कल मैं नया था आज पुराना हो गया हूँ ऐसा तुम्हारे साथ भी होगा इस लिए ये अपने आने वाले कल को सोच कर अपना आज मत खराब मत कर लेना. अगर कुछ गलत हो भी जाए तो उसे इस सोच के साथ स्वीकार करना कि चलो कुछ तजुर्बा ही हुआ जिसे तुम आगे आने वाली पीढ़ी को बता सको .
हमारी सभ्यता इसी तरह विकसित हुई है और आगे भी होती रहेगी .तुम आ रहे हो और मैं जारहा हूँ मैं इस आने जाने की प्रक्रिया को याद रखना जो आया है वो जाएगा . तुम्हें ये पत्र लिखना तो सिर्फ एक बहाना था जिसे मैं तुमसे अपनी बात कह सकूँ क्योंकि बात से बात चलती है तो अंत में इस बात को हमेशा ध्यान रखना लोगों की बात सुनते रहना और अपनी बात रखते चलना ये प्रक्रिया  बन्द मत करना . इस उम्मीद के साथ मैं चलता हूँ कि आने वाले साल में तुम खुद भी खुश रहोगे और लोगों को खुश रखोगे
अलविदा
बहुत सारी शुभकामनाओं के साथ
तुम्हारा दोस्त
2018
प्रभात खबर 01/01/2019 में प्रकाशित 

Monday, December 24, 2018

निजता के अधिकार पर न हो विवाद

आप अपने मोबाइल और लैपटॉप में क्या रखते हैं ये जानने का अधिकार पहले केवल आपको था लेकिन अब ये केवल आपका अधिकार नहीं रह गया है.  विगत बीस  दिसंबर को गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर दिल्ली पुलिस कमिश्नरसीबीडीटीडीआरआईईडीरॉएनआई जैसी 10 एजेंसियों को देश में चलने वाले सभी कंप्यूटर की निगरानी करने का अधिकार दे दिया है. कई सवाल  आम लोगों के मन में सरकार के उस आदेश के बाद उठ रहे हैंजिसमें उसने देश की सुरक्षा और ख़ुफिया एजेंसियों को सभी के कंप्यूटर में मौजूद डेटा पर नज़र रखनेउसे सिंक्रोनाइज (प्राप्त) और उसकी जांच करने के अधिकार दिए हैं.सरकार के इस आदेश के बाद  काफी विवाद हो रहा है. इस मामले में विपक्षी दलों द्वारा विरोध दर्ज कराने पर राज्यसभा भी स्थगित कर दी गई. सोशल मीडिया पर भी सरकार के इस फ़ैसले का काफी  विरोध हो रहा है. लोगों का मानना है कि यह उनकी निजता के अधिकार में हस्तक्षेप है. तकनीक के जरिए आपराधिक गतिविधियों को अंजाम नहीं दिया जा सकेइसको ध्यान में रखते हुए आज से  करीब सौ साल पहले इंडियन टेलिग्राफ एक्ट बनाया गया था.जिसके मूल में अंग्रेजों की यह धारणा थी कि इस देश पर उनके शासन को किसी तरह की चुनौती न मिले .जिसके  तहत सुरक्षा एजेंसियां उस समय टेलिफोन पर की गई बातचीत को टैप करती थी.संदिग्ध लोगों की बातचीत में अक्सर  सुरक्षा एजेंसियों की  निगरानी होती थी.उसके बाद जब तकनीक ने प्रगति की कंप्यूटर और मोबाईल का चलन बढ़ा और इसके जरिए अपराधिक गतिविधियों  को अंजाम दिया जाने लगातो साल 2000 में भारतीय संसद ने आईटी कानून बनाया. देशहित राजनीतिक व आम चर्चाओं का मुद्दा हमेशा से रहा है. मौजूदा हालात में देशहित अब भावनात्मक मुद्दा भी बन गया है.  और फिलहाल ताज़ा मसला देशहित का  संविधान के मौलिक अधिकार से टकराव का है.  वहीं सरकार का कहना है कि ये अधिकार एजेंसियों को पहले से ही प्राप्त थे. उसने सिर्फ़ इसे दोबारा जारी किया है.इन  अधिकारों के तहत ये जाँच एजेंसियां देश भर में किसी भी व्यक्ति का भी डाटा खंगाल सकती हैं.  चाहे वो आपका लैपटॉप होया मोबाइल या फिर किसी भी प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक गैजेट. इससे पहले जाँच एजेंसियां केवल किसी के  फ़ोन कॉल्स और ई-मेल का ब्योरा ही जुटा सकती थीं वो भी गृह मंत्रालय के आदेश के बाद . और यदि कोई भी नागरिक जाँच एजेंसियों को ऐसा करने से रोकता है तो उसे जेल भेजा जा सकता है साथ ही उस पर जुर्माना  भी लगाया जा सकता है. इन दस जाँच एजेंसियों में मुख्य रूप से सीबीआई नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसीइंटेलिजेंस ब्यूरो  और दिल्ली पुलिस शामिल हैं . इस आदेश के बाद से ही देश भर में चर्चाओं का दौर जारी है. विपक्ष का कहना है कि ये पूरी तरह से संविधान में प्रत्येक नागरिक को दिए गए निजता के अधिकार का पूरी तरह से हनन है.  विप्लाश का आरोप है कि सरकार हाल ही में हुए चुनावों में मिली हार के बाद प्रत्येक नागरिक का ब्यौरा अपने फायदे के लिए जुटाना चाहती है. देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस इस आदेश के पुरज़ोर विरोध में है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि मोदी सरकार देश को सर्विलांस देश” बनाना चाहती है. उल्लेखनीय  ये है कि 2009 में तत्कालीन  यूपीए सरकार ने भी इसी  तरह का एक अध्यादेश जारी किया था जिसमें जाँच एजेंसियों के अधिकारों को बढ़ाने की बात की गयी थी. सरकार ने स्पष्ट किया है कि  कि जिन व्यक्तियों से  देश की सुरक्षासमग्रता को खतरा होगा केवल उन्हीं के डाटा को खंगाला जायेगा. निर्दोष नागरिकों को इससे कोई परेशानी नहीं होगी. अब यदि इस आदेश की  सामान्य रूप से सामान्य नागरिक के तौर पर विवेचना की जाये तो एक तरफ जहाँ ये आदेश संविधान में मिले निजता के अधिकार को चुनौती देता प्रतीत होता है वहीँ एक और सवाल यहाँ ये उठता है कि जिनसे देश हित को खतरा है उन्हें सरकार कैसे चिन्हित करेगी?  यदि आम नागरिक के तौर पर सोचा जाये तो सभी के डाटा खंगालने के बाद ही ये पता चल पायेगा कि कौन देशहित के खिलाफ़ कार्य कर रहा है. इस प्रकार सीधे-सीधे तौर पर हर आम नागरिक इसके दायरे में आ ही जाता है.जिससे निजता का अधिकार प्रभावित होता है .वैसेआईटी एक्ट के सेक्शन 69 के तहत अगर कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ग़लत इस्तेमाल करता है और वो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए चुनौती है तो अधिकार प्राप्त एजेंसियां कार्रवाई कर सकती है.तथ्य  यह भी है कि आईटी एक्ट के सेक्शन 69 के तहत कौन सी एजेंसियां जांच करेंगीइसके आदेश कब दिए जा सकते हैंये अधिकार केस के आधार पर दिए जाते हैं और इसका फैसला जांच एजेंसियां करती हैं . सरकार ऐसे  अधिकार सामान्य तौर पर नहीं दे सकती है. इस कानून के सेक्शन 69 में इस बात का जिक्र है कि अगर कोई राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती पेश कर रहा है और देश की अखंडता के ख़िलाफ़ काम कर रहा है तो सक्षम एजेंसियां उनके कंप्यूटर और डेटा की निगरानी कर सकती हैं.इस कानून के मुताबिक़  निगरानी के अधिकार किन एजेंसियों को दिए जाएंगेयह सरकार तय करेगी.
वहीं सब-सेक्शन दो में अगर कोई अधिकार प्राप्त एजेंसी किसी व्यक्ति  को सुरक्षा से जुड़े किसी मामले में बुलाया जाता  है तो उसे एजेंसियों के साथ  सहयोग करना होगा और सारी जानकारियां उपलब्ध करानी होंगी.इसी कानून में  यह भी स्पष्ट किया गया है कि अगर बुलाया गया व्यक्ति एजेंसियों की मदद नहीं करता है तो वो सजा का अधिकारी होगा. जिसमें सात साल तक की  जेल की सजा का  भी प्रावधान है.
फिलहाल देश में देशहित बनाम मौलिक अधिकारों पर बहस जारी है.  देशहित में कितने मौलिक अधिकार बचे रह जाते हैं या मौलिक अधिकारों में कितना देशहित बचा रह जाता है ये देखने वाली बात होगी. 
दैनिक जागरण /आई नेक्स्ट में 24/12/2018 को प्रकाशित 

Monday, December 10, 2018

इंटरनेट का बढ़ता दुष्प्रभाव

पिछले तकरीबन एक दशक से भारत को किसी और चीज ने उतना नहीं बदलाजितना मोबाइल फोन ने बदल दिया है। संचार ही नहींइससे दोस्ती और रिश्ते तक बदल गए हैं। इतना ही नहींदेश में अब मोबाइल बात करने का माध्यम भर नहीं हैबल्कि यह मनोरंजन और खबरोंसूचनाओं वगैरह के मामले में परंपरागत संचार माध्यमों को टक्कर दे रहा है।डिजिटल इंडिया के बढ़ते कदमों के साथ यह चर्चा भी देश भर में आम है कि स्मार्टफोन व इंटरनेट लोगों को व्यसनी बना रहा है। इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो लीअब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है। कई देशों के न्यूरो वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिकलोगों पर इंटरनेट और डिजिटल डिवाइस से लंबे समय तक पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। मुख्य रूप से इन शोधों का केंद्र युवा पीढ़ी पर नई तकनीक के संभावित प्रभाव की ओर झुका हुआ हैक्योंकि वे ही इस तकनीक के पहले और सबसे बड़े उपभोक्ता बन रहे हैं। कहा जाता है कि मानव सभ्यता शायद पहली बार एक ऐसे नशे से सामना कर रही हैजो न खाया जा सकता हैन पिया जा सकता हैऔर न ही सूंघा जा सकता है। चीन के शंघाई मेंटल हेल्थ सेंटर के एक अध्ययन के मुताबिकइंटरनेट की लत शराब और कोकीन की लत से होने वाले स्नायविक बदलाव पैदा कर सकती है। वी आर सोशल की डिजिटल सोशल ऐंड मोबाइल 2015 रिपोर्ट के मुताबिकभारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं के आंकड़े काफी कुछ कहते हैं। इसके अनुसारएक भारतीय औसतन पांच घंटे चार मिनट कंप्यूटर या टैबलेट पर इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। इंटरनेट पर एक घंटा 58मिनटसोशल मीडिया पर दो घंटे 31 मिनट के अलावा इनके मोबाइल इंटरनेट के इस्तेमाल की औसत दैनिक अवधि है दो घंटे 24मिनट। इसी का नतीजा हैं तरह-तरह की नई मानसिक समस्याएं- जैसे फोमोयानी फियर ऑफ मिसिंग आउटसोशल मीडिया पर अकेले हो जाने का डर। इसी तरह फैडयानी फेसबुक एडिक्शन डिसऑर्डर। इसमें एक शख्स लगातार अपनी तस्वीरें पोस्ट करता है और दोस्तों की पोस्ट का इंतजार करता रहता है। एक अन्य रोग में रोगी पांच घंटे से ज्यादा वक्त सेल्फी लेने में ही नष्ट कर देता हैदेश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या इस साल जून तक 50 करोड़ पार कर गयी है इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया तथा केंटार आईएमआरबी द्वारा संयुक्त रूप से तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेट उपभोक्ताओं   की संख्या वार्षिक  आधार पर 11.34 प्रतिशतसे  बढ़कर दिसंबर 2017 में अनुमानित 48.1 करोड़ हो गईभारत में इंटरनेट-2017 शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार  देश में कुल इंटरनेट घनत्व दिसंबर 2017 के अंत में जनसंख्या का पैंतीस  प्रतिशत रहां |
लोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है। शहर फैल रहे हैं और इंसान पाने में सिमट रहा है।नतीजतनहमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैजहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता है। भारत जैसे देश में समस्या यह है कि यहां तकनीक पहले आ रही हैऔर उनके प्रयोग के मानक बाद में गढ़े जा रहे हैं। कैस्परस्की लैब द्वारा इस वर्ष किए गए एक शोध में पाया गया है कि करीब 73 फीसदी युवा डिजिटल लत के शिकार हैंजो किसी न किसी इंटरनेट प्लेटफॉर्म से अपने आप को जोड़े रहते हैं। वर्चुअल दुनिया में खोए रहने वाले के लिए सब कुछ लाइक्स व कमेंट से तय होता है। वास्तविक जिंदगी की असली समस्याओं से वे भागना चाहते हैं और इस चक्कर में वे इंटरनेट पर ज्यादा समय बिताने लगते हैंजिसमें चैटिंग और ऑनलाइन गेम खेलना शामिल हैं। और जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलतातो उन्हें बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है। साल 2011 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया द्वारा किए गए रिसर्च में यह निष्कर्ष निकाला गया था की युवा पीढ़ी किसी भी सूचना को याद करने का तरीका बदल रही हैक्योंकि वह आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है। वे कुछ ही तथ्यों को याद रखते हैंबाकी के लिए इंटरनेट का सहारा लेते हैं। इसे गूगल इफेक्ट या गूगल-प्रभाव कहा जाता है।
इसी दिशा में कैस्परस्की लैब ने साल 2015 में डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट से सभी पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के ऊपर शोध किया है। कैस्परस्की लैब ने ऐसे छह हजार लोगों की गणना कीजिनकी उम्र 16-55 साल तक थी। यह शोध कई देशों में जिसमें ब्रिटेनफ्रांसजर्मनीइटलीस्पेन आदि देशों के 1,000 लोगों पर फरवरी 2015 में ऑनलाइन किया गया। शोध में यह पता चला की गूगल-प्रभाव केवल ऑनलाइन तथ्यों तक सीमित न रहकर उससे कई गुना आगे हमारी महत्वपूर्ण व्यक्तिगत सूचनाओं को याद रखने के तरीके तक पहुंच गया है। शोध बताता है कि इंटरनेट हमें भुलक्कड़ बना रहा हैज्यादातर युवा उपभोक्ताओं के लिएजो कि कनेक्टेड डिवाइसों का प्रयोग करते हैंइंटरनेट न केवल ज्ञान का प्राथमिक स्रोत है,बल्कि उनकी व्यक्तिगत जानकारियों को सुरक्षित करने का भी मुख्य स्रोत बन चुका है। इसे कैस्परस्की लैब ने डिजिटल एम्नेशिया का नाम दिया है। यानी अपनी जरूरत की सभी जानकारियों को भूलने की क्षमता के कारण किसी का डिजिटल डिवाइसों पर ज्यादा भरोसा करना कि वह आपके लिए सभी जानकारियों को एकत्रित कर सुरक्षित कर लेगा। 16 से 34 की उम्र वाले व्यक्तियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने माना कि अपनी सारी जरूरत की जानकारी को याद रखने के लिए वे अपने स्मार्टफोन का उपयोग करते है। इस शोध के निष्कर्ष से यह भी पता चला कि अधिकांश डिजिटल उपभोक्ता अपने महत्वपूर्ण कांटेक्ट नंबर याद नहीं रख पाते हैं।
एक यह तथ्य भी सामने आया कि डिजिटल एम्नेशिया लगभग सभी उम्र के लोगों में फैला है और ये महिलाओं और पुरुषों में समान रूप से पाया जाता है। ज्यादा प्रयोग के कारण डिजिटल डिवाइस से हमारा एक मानवीय रिश्ता सा बन गया हैपर तकनीक पर अधिक निर्भरता हमें मानसिक रूप से पंगु भी बना सकती है। यही इंटरनेट एडिक्शन बहुत से लोगों की मौत का कारण भी बना जब ब्लू व्हेल जैसे खतरनाक ओनलाईन खेल खेलते हुए लोगों ने अपनी जाने दीं |
 इसलिए इंटरनेट का इस्तेमाल जरूरत के वक्त ही किया जाए।इससे निपटने का एक तरीका यह है कि चीन से सबक लेते हुए भारत में डिजिटल डीटॉक्स यानी नशामुक्ति केंद्र खोले जाएं और इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलाई जाए।
दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 10/12/18 को प्रकाशित 

Thursday, December 6, 2018

ग्लोबल वार्मिंग :अनुमान से बड़ा खतरा

ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापमान बढ़ने का मतलब है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही हैवैज्ञनिकों  का कहना है कि आने वाले दिनों में सूखा बढ़ेगाबाढ़ की घटनाएँ बढ़ेंगी और मौसम का मिज़ाज बुरी तरह बिगड़ा हुआ दिखेगा.इसका असर दिखने भी लगा हैग्लेशियर भी पिघल रहे हैं और रेगिस्तान पसरते जा रहे हैंकहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं असमय ओले पड़ रहे हैं.हाल ही में आई लेंसेट काउंट डाउन रिपोर्ट 2018 के अनुसार खतरा जितना अनुमान लगाया गया था उससे ज्यादा बड़ा है ,ग्लोबल वार्मिंग रोकने में जितने कारगर कदम उठाये जाने चाहिए थे वे नहीं उठाये गए जिससे मानवीय जीवन  और देशों के स्वास्थ्य तंत्र दोनों को खतरा है .इस रिपोर्ट में दुनिया के पांच सौ शहरों में किये गए सर्वे के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि उनका सार्वजनिक स्वास्थ्य आधारभूत ढांचा जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है जो यह बताता है कि रोगियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उस तेजी से रोगों से निपटने के लिए  दुनिया के अस्पताल  तैयार नहीं है .इसमें विकसित और विकासशील दोनों देश शामिल हैं .बीती गर्मियों में चली गर्म हवाओं ने सिर्फ इंग्लैंड में ही सैकड़ों लोगों को अकाल मौत का शिकार बना डाला .कारण सीधा है इंग्लैंड के अस्पताल अचानक जलवायु में हुए इस परिवर्तन के कारण बीमार पड़े लोगों से निपटने के लिए तैयार नहीं थे .इस रिपोर्ट के अनुसार साल 2017 में अत्यधिक गर्मी के कारण एक सौ तिरपन बिलियन घंटों का नुक्सान सारी दुनिया के खेती में लगे लोगों को उठाना पड़ा .सारी दुनिया में हुए कुल नुक्सान का आधा हिस्सा अकेले भारत ने उठाया जो कि भारत की कुल कार्यशील जनसँख्या का सात प्रतिशत है जबकि चीन को 1.4 प्रतिशत का ही नुक्सान हुआ.कुल मिलाकर इन सबका परिणाम राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं और लोगों के घरेलु बजट पर पड़ा .उसी तरह तापमान और वर्षा में हल्का सा परिवर्तन पानी और मच्छरों द्वारा फैलने वाले रोगों की वृद्धि के रूप में सामने आया .दुनिया भर में हो रहे इस जलवायु परिवर्तन का कारण वैज्ञानिक के अनुसार  ग्रीन हाउस गैसों के कारण हैजिन्हें सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं.इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड हैमीथेन हैनाइट्रस ऑक्साइड है और वाष्प है.वैज्ञानिकों का कहना है कि ये गैसें वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इससे ओज़ोन परत की छेद का दायरा बढ़ता ही जा रहा है.ओज़ोन की परत ही सूरज और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह है.ग्लोबल वार्मिंग मनुष्यों की गतिविधियों के परिणाम के रुप में समय की एक अपेक्षाकृत कम अवधि में पृथ्वी की जलवायु के तापमान में एक उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. विशिष्ट शब्दों में सौ या दौ सौ साल में1 सेल्सियस या अधिक की व्रद्धि को ग्लोबल वार्मिंग की श्रेणी में रखा जाता हैऔर पिछ्ले सौ साल में  यह 0.4 सेल्सियस बढ चुका है जो की बहुत महत्वपूर्ण  है.ग्लोबल वार्मिंग को समझने के लिए मौसम और जलवायु के अंतर को समझना बहुत जरूरी है .मौसम स्थानीय और अल्पकालिक होता हैमान लीजिये की आप हिमाचल में है और वहां बर्फ़ गिर रही है तो उस मौसम और बर्फ़ का असर सिर्फ़ हिमाचल  और उसके आसपास के इलाकों में ही रहेगा सिर्फ़ उन इलाको में ही ठंड बढेगी जो हिमाचल के आस पास होंगे । जलवायु की अवधि लम्बी होती है और ये एक छोटे से स्थान से संबंधित नही है। एक क्षेत्र की जलवायु समय की एक लंबी अवधि में एक क्षेत्र के औसत मौसम की स्थिति है।अब धरती के लिए चिंता करने की बात यह है कि धरती की जलवायु में परिवर्तन आ रहा है . जानना ज़रुरी है की जब हम लम्बी अवधि की जलवायु की बात करते है तो उसका मतलब होता है बहुत लम्बी अवधियहां तक की कई सौ साल भी बहुत कम अवधि है जलवायु में आने के लिये। वास्तव मेंजलवायु में परिवर्तन होते-होते कभी-कभी दसियों से हज़ारों वर्ष लग जाते है। इसका मतलब है की अगर एक सर्दी में बर्फ़ नही गिरी और ठंड नही पडीं---और एक साथ दो-तीन सर्दियों में ऐसा हो जाये----तो इससे जलवायु में परिवर्तन नहीं होता है.
ग्लोबल वार्मिंग ग्रीनहाउस प्रभाव में वृद्धि के कारण होता है। वैसे ग्रीनहाउस प्रभाव कोई बुरी चीज़ नही है अपने-आप में---ये पृथ्वी को जीवन के लायक बनाये रखने के लिये गर्म रखता है. मान लीजिये पृथ्वी आपकी कार की तरह है जो दोपहर के वक्त धूप  में पार्किंग में खडी है। आपने गौर किया होगा की जब आप कार में बैठते है तो कार का तापमान बाहर के तापमान से ज़्यादा गर्म होता है थोडे वक्त तक। जब सूर्य  की किरणें आपकी कार की खिडकियों से अन्दर प्रवेश करती है तो सूर्य  की कुछ गर्मी कार की सीट्सकारपेटसडेशबोर्ड और फ़्लोर मेटस सोख लेते हैजब ये सब चीज़े उस सोखी हुई गर्मी को वापस बाहर फ़ेंकते है तो सारी गर्मी खिडकियों से बाहर नही जाती कुछ वापस आ जाती है। सीटों से निकली गर्मी का तरंगदैधर्य (Wavelength) उन सूर्य की किरणों के तरंगदैधर्य (Wavelength) से अलग होता है जो पहली बार कार की खिडकी से अन्दर आयीं थीतो अन्दर ज़्यादा ऊर्जा आ रही है और ऊर्जा बाहर कम जा रही है। इसके परिणाम में आपकी कार के तापमान में एक क्रमिक वृद्धि हुई। आपकी गर्म कार के मुकाबले ग्रीनहाउस प्रभाव थोडा जटिल हैजब सूर्य की किरणें पृथ्वी के वातावरण और सतह से टकराती है तो सत्तर  प्रतिशत ऊर्जा पृथ्वी पर ही रह जाती है जिसको धरतीसमुद्र पेड तथा अन्य चीज़े सोख लेती है। बाकी का तीस प्रतिशत अंतरिक्ष में बादलोंबर्फ़ के मैदानोंतथा अन्य रिफ़लेक्टिव चीज़ो की वजह से रिफ़लेक्ट हो जाता है .परन्तु जो सत्तर प्रतिशत ऊर्जा पृथ्वी पर रह जाती वो हमेशा नही रहती (वर्ना अब तक पृथ्वी आग का गोला बन चुकी होती)। पृथ्वी के महासागर और धरती अकसर उस गर्मी को बाहर फ़ेंकते रहते है जिसमें से कुछ गर्मी अंतरिक्ष में चली जाती है बाकी यहीं वातावरण में दूसरी चीज़ों द्वारा सोखने के बाद समाप्त हो जाती है जैसे कार्बन डाई-आक्साइडमेथेन गैसऔर पानी की भाप। इन सब चीज़ों के ऊर्जा को सोखने के बाद बाकी ऊर्ज़ा गर्मी के रूप में हमारी पृथ्वी पर मौजुद रहती है. बाहर के वातावरण के मुकाबले जितनी ऊर्जा वातावरण में प्रवेश कर रही है उतनी बाहर नही जा रही है जिसके परिणाम में पृथ्वी गर्म रह्ती है।ग्लोबल वार्मिंग में कमी के लिए मुख्य रुप से सीएफसी गैसों का ऊत्सर्जन कम रोकना होगा और इसके लिए फ्रिज़एयर कंडीशनर और दूसरे कूलिंग मशीनों का इस्तेमाल कम करना होगा या ऐसी मशीनों का उपयोग करना होगा जिनसे सीएफसी गैसें कम निकलती हैं.औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकले वाला धुँआ हानिकारक हैं और इनसे निकलने वाला कार्बन डाई ऑक्साइड गर्मी बढ़ाता हैइन इकाइयों में प्रदूषण रोकने के उपाय करने होंगे.वाहनों में से निकलने वाले धुँए का प्रभाव कम करने के लिए पर्यावरण मानकों का सख़्ती से पालन करना होगा.उद्योगों और ख़ासकर रासायनिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे को फिर से उपयोग में लाने लायक बनाने की कोशिश करनी होगी.और प्राथमिकता के आधार पर पेड़ों की कटाई रोकनी होगी और जंगलों के संरक्षण पर बल देना होगा.अक्षय ऊर्जा के उपायों पर ध्यान देना होगा यानी अगर कोयले से बनने वाली बिजली के बदले पवन ऊर्जासौर ऊर्जा और पनबिजली पर ध्यान दिया जाए तो आबोहवा को गर्म करने वाली गैसों पर नियंत्रण पाया जा सकता है.याद रहे कि जो कुछ हो रहा है या हो चुका है वैज्ञानिकों के अनुसार उसके लिए मानवीय गतिविधियाँ ही दोषी हैं.
दैनिक जागरण /आई नेक्स्ट में 06/12/2018 को प्रकाशित लेख 

टेंशन बहुत है यार !

टेंशन बहुत है यार आपने भी ये जुमला सुना होगा और तनाव  को महसूस भी किया होगा.तनाव  यूँ तो स्वास्थ्य के लिए अच्छी बात नहीं है, पर अगर जिंदगी में आगे बढ़ना हो तो थोडा  तनाव  तो लेना ही पड़ेगा.टेंशन हम सब की जिन्दगी का हिस्सा है कुछ कम या ज्यादा.हम अपने जीवन से तनाव  को हमेशा के लिए खत्म  तो नहीं कर सकते हैं, पर इसको कम जरुर कर सकते हैं. तनाव  का मतलब चिंता,अब जिंदगी है तो चिंताएं भी होंगी. यूँ कहें की ‘थोडा है थोड़े की जरुरत है’.इस प्रतिस्पर्धा वाले युग में अब मस्त होकर जीवन तो गुजारा नहीं जा सकता हैं .मैं आपको समझाता हूँ. अब अगर पढ़ाई का तनाव  नहीं लेंगे तो परीक्षा वाले दिन और ज्यादा तनाव  होगा कि काश रोज थोड़ी पढ़ाई करते तो परीक्षा वाली रात कयामत की रात न होती यानि रोज पढ़ कर हम परीक्षा के तनाव  को खत्म तो नहीं कर सकते पर कम जरुर कर सकते हैं.अब देखिये आजकल कंप्यूटर का ज़माना है पर इसकी हार्ड डिस्क कब क्रैश  हो जाए क्या पता ? अगर हम अपने सारे डाटा का बैकअप रखेंगे तो हार्ड डिस्क क्रैश भी होगी तो तनाव  कम होगा.
वैसे हमारी प्रगति में इस तनाव की बड़ी भूमिका है.आपने गौर किया होगा कि जब काम हमारे हिसाब से नहीं होता तब हमें तनाव  होता है और तब हम चीजें बेहतर करने की कोशिश करते हैं. जो लोग तनाव  से हार मानकर हथियार डाल देते हैं. वो जीवन में कुछ ख़ास नहीं कर पाते और जो तनाव  से लड़ते हैं. वो बड़े लीडर या आविष्कारक बन जाते हैं.जिन्हें दुनिया पहचानती है.न्यूटन ने जब सेब को जमीन पर गिरते देखा तो ये सोचा कि ये जमीन पर क्यों गिरा ये ऊपर आसमान में क्यूँ नहीं गया और इस तनाव में उन्होंने धरती का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत खोज निकाला.
तो हम अगर आज आगे बढ़ रहे हैं तो मेहनत के अलावा तनाव भी इसके लिए जिम्मेदार है जो आपको बगैर काम खत्म हुए चैन से बैठने नहीं देता.क्या समझे ये तनाव  का पॉजिटिव इफेक्ट है पर अगर आप सिर्फ तनाव  ले रहे हैं और काम नहीं कर रहे हैं तो समझ लीजिये आप मुश्किल में  हैं.काम का ज़िक्र करना और ज़िक्र का फ़िक्र करना अपने आप में एक समस्या है और ऐसे ही लोग अक्सर ये बोलते सुने जाते हैं बड़ी टेंशन है यार,तनाव  सभी को है पर उसका जिक्र सबसे करके क्या फायदा तो तनाव  के टशन का दूसरा सबक है अगर तनाव आपको बहुत ज्यादा है तो उसका जिक्र उन लोगों से कीजिये जो आपके अपने हैं और ऐसे ही लोग आपको तनाव  से निकाल पायेंगे पर ध्यान रहे आपको उन पर भरोसा करना पड़ेगा.
तनाव  एक स्टेट आफ माईंड है पर जिसे आप मैनेज कर सकते हैं,जब आप किसी मसले पर ज्यादा देर तक चिंता के साथ सोचते हैं तो वो तनाव  हो जाता है. इसे जरुरत से ज्यादा मत बढ़ने दीजिये और समय रहते इसका मैनेजमेंट कीजिये.तनाव  को मैनेज करने का हर इंसान का अपना एक अलग तरीका होता है.कोई गाने सुनता है तो कोई लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाता है. तो आपको जब लगे कि तनाव ज्यादा ज्यादा बढ़ रहा है तो वो काम करें जो आपको पसंद हो फिर देखिये कि कैसे आपका सारा तनाव  छू मंतर हो जाएगा.जैसे खाने में स्वाद बढाने के लिए मसलों का इस्तेमाल होता है वैसे ही जिन्दगी का असली मजा तो तभी है जब उसमें थोडा बहुत मसाला हो. 
प्रभात खबर में 06/12/2018 को प्रकाशित 

Tuesday, November 27, 2018

शिक्षा के स्वरुप में हों वांछित बदलाव

शिक्षा एक ऐसा पैमाना है जिससे कहीं हुए विकास को समझा जा सकता है ,शिक्षा जहाँ जागरूकता लाती है वहीं मानव संसाधन को भी विकसित करती है |निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व के सभी शीर्ष नेताओं ने इसे सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों का एक हिस्सा बनाया  गया है |दुनिया भर में शिक्षा से जुड़े एक ताजा सर्वे में भारत के बच्चों् को लेकर एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। इस सर्वे में बताया गया है कि भारत के बच्चे दुनिया में सबसे ज्यादा ट्यूशन पढ़ते हैं। विशेषकर गणित के लिए। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार  देश में चौहत्तर प्रतिशत   बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं। किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चों के हाथ में होता है और बच्चों का भविष्य उनके शिक्षकों के हाथ में। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है की देश का भविष्य शिक्षकों के हाथ में होता है। पर देश के भविष्य के ये कर्णधार आजकल कक्षाओं से अदृश्य होते जा रहे हैं। हाल ही में बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश के एक विद्यालय की एक अध्यापिका पिछले तेईस वर्षों से अनुपस्थित चल रही हैं। हालांकि यह  एकाकी घटना हो सकती है जिसे हर शिक्षक के संदर्भ में सही नहीं ठहराया जा सकता है। पर यह भी एक कटु सत्य है कि कक्षाओं से शिक्षकों की अनुपस्थिति भारत में एक चिरकालिक समस्या है। शिक्षकों की कक्षाओं से अनुपस्थिति शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के सबसे निंदनीय स्वरूपों में से एक है। वैसे तो कक्षाओं से शिक्षकों की अनुपस्थिति के कई कारण हैं जिनमें से कुछ वास्तविक भी हैं परंतु इसका सबसे बड़ा कारण है शिक्षकों का सरकारी वेतन  लेते हुए भी दूसरे कार्यों जैसे निजी कोचिंग चलाने में व्यस्त रहना। शिक्षकों की अनुपस्थिति का एक और प्रमुख कारण है उनको अन्य सरकारी कार्यों जैसे चुनावों में लगा देना। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों का प्रतिशत 11 से 30 के बीच में है।कार्तिक मुरलीधरन कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय सेन डीयोगे, के शोध के मुताबिक  शिक्षकों की अनुपस्थिति से भारत को प्रतिवर्ष लगभग 1.5 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है। इसी शोध में एक तथ्य और भी सामने आया है कि देश में स्कूॉल जाने वाले बहत्तर प्रतिशत  बच्चेक एक्ट्रारत   करिकुलर एक्टिविटीज में भाग लेना पसंद करते हैं। 
निजी ट्यूशन के मामले में अमीरों व गरीबों के बीच कोई खास अंतर नहीं है. हर तबके के लोग अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक अपने बच्चों को निजी ट्यूशन के लिए भेजते हैं. स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं है. वहां छात्रों के मुकाबले शिक्षकों की तादद कम होने की वजह से उनके लिए हर छात्र पर समुचित ध्यान देना संभव नहीं होता. ऐसे में बेहतर नतीजों और आगे बेहतर संस्थानों में दाखिले के लिए निजी ट्यूशन छात्र जीवन का एक अहम हिस्सा बन गए हैं.एक तथ्य यह भी है कि वास्तव में यह  एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या है. आजकल हर माता पिता  अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहता है. बहुत से सरकारी सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में सौ से ज्यादा छात्र होते हैं. ऐसे में किसी शिक्षक के पास सभी छात्रों पर पर्याप्त ध्यान देने का मौका ही नहीं मिल पाता. निजी स्कूलों में स्थिति जरुर कुछ बेहतर जरूर है. लेकिन वहां भी किसी शिक्षक के लिए हर छात्र पर पूरी तरह ध्यान देना संभव नहीं है क्योंकि भारत में शिक्षा एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है जहाँ कभी मंदी नहीं आती है |इधर छात्रों की तादाद लगातार बढ़ रही है और उस अनुपात में बेहतर स्कूल कॉलेजों  में सीटों की संख्या नहीं बढ़ रही. इस प्रतिद्वंद्विता ने भी निजी ट्यूशन को बढ़ावा दिया है. भारत में शिक्षा की स्थिति पर एनएसएसओ ने एक सर्वे वर्ष 2014 में छाहठ  हजार घरों में किया गया था इस सर्वे के अनुसार निजी ट्यूशन या कोचिंग का सहारा लेने वालों में 4.1 करोड़ छात्र हैं और तीन करोड़ छात्राएं। रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार की कुल आय का 11 से 12 प्रतिशत  निजी ट्यूशन पर खर्च होता है। कुछ मामलों में यह आंकड़ा परिवार की पच्चीस प्रतिशत आमदनी तक होता है |दुनिया भर में प्राइवेट ट्यूशन उद्योग बहुत तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है. एक अनुमान के मुताबिक 2022 तक यह 227 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा.भारत में लोगों की बढ़ती आमदनी ने  ऑनलाइन ट्यूशन को  आगे बढ़ाया है. कंपनियां इंटरनेट के जरिये छात्रों को अध्यापकों से जोड़ रही हैं.उदारीकरण  ने बहुत तेजी से देश में एक नए मध्य वर्ग का निर्माण किया है |जहाँ पति पत्नी दोनों कमाते हैं और दोनों के पास बच्चों को पढ़ाने का समय नहीं है |संयुक्त परिवार वैसे भी शहरों में इतिहास हो रहे हैं जहाँ घर के बुजुर्ग बच्चों की पढ़ाने लिखाने में मदद कर दिया करते थे |नई पीढी के बच्चों को इंटरनेट ने समाज से काट दिया है और वे हर मर्ज का इलाज इंटरनेट में ढूंढते हैं |ऐसे में ऑनलाईन ट्यूशन देने वाली कम्पनियों की बाढ़ भी आ गयी है |इस गला कार्ट प्रतिस्पर्धा वाले युग में हर माता –पिता अपने बच्चों की शिक्षा से किसी भी हालत में समझौता कर पाने की स्थिति में नहीं है |अच्छे स्कूल कॉलेज कम हैं ,जो हैं भी वहां बहुत भीड़ है |रोजगार का भारी संकट है |सभी माता –पिता अपने बच्चे को डॉक्टर इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं|सब मिलाकर ये सारी स्थिति  ट्यूशन  के बाजार के लिए एक आदर्श माहौल देती है | इसलिए पहले अभिभावकों  की सोच में बदलाव जरूरी है. उनको तय करना होगा कि आखिर बच्चों को शिक्षा देने  का मकसद क्या है और वे जीवन में आगे चल कर क्या हासिल करना चाहते हैं.
दैनिक जागरण /आई नेक्स्ट में 27/11/2018को प्रकाशित 

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