Tuesday, April 7, 2020

लॉकडाउन में बढ़े फेक विडियो, देखिए यह है हकीकत



बरसों पुराने विडियो हो रहे वायरल


गूगल के सर्टिफाइड फैक्ट चेकर के साथ एनबीटी ने किया फैक्ट चेक• एनबीटी संवाददाता, लखनऊ : कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए पूरा देश एकजुट है, लेकिन इस बीच कुछ अराजकतत्व फेक विडियो के जरिए माहौल बिगाड़ने में लगे हैं। लॉकडाउन के बीच तबलीगी जमात की घटना के बाद मुस्लिम समाज से जुड़े कई विडियो वायरल हो रहे हैं। किसी विडियो में पुलिस वैन के भीतर सिपाही पर थूकते हुए युवक को कोरोना संक्रमित बताया जा रहा है तो किसी में सूफी पद्धति से हो रही उपासना को संक्रमण फैलाने की साजिश करार दिया जा रहा है। एनबीटी ने गूगल के सर्टिफाइड फैक्ट चेकर प्रो. मुकुल श्रीवास्तव के साथ ऐसे कई विडियो की पड़ताल कर उनका सच जाना...


(जैसा कि गूगल सर्टिफाइड फैक्ट चेकर प्रो़ मुकुल श्रीवास्तव ने बताया।)
थोड़ी सी एहतियात से समझ सकते हैं फेक विडियो का खेल

हकीकत• 90% विडियो सही होते हैं, लेकिन उन्हें गलत संदर्भ के साथ वायरल किया जाता है। किसी विडियो की जांच करने के लिए ध्यान से देखना चाहिए। • क्रोम ब्राउजर में इनविड (InVID) एक्सटेंशन जोड़कर विडियो की पड़ताल आसानी से की जा सकती है। इनविड विडियो को फ्रेम दर फ्रेम देखने में मदद करता है। इसमें किसी दृश्य को बड़ा करके भी देखा जा सकता है। • किसी विडियो को समझने के लिए उसमें मौजूद पोस्टर-बैनर, गाड़ियों की नंबर प्लेट और फोन नंबर की तलाश करनी चाहिए या कोई लैंडमार्क ताकि उसके भौगोलिक जुड़ाव की पहचान हो सके। • विडियो में दिख रहे लोगों के कपड़े, भाषा या बोली पर भी ध्यान देना चाहिए। • इंटरनेट पर ऐसे कई सॉफ्टवेयर हैं, जो विडियो और फोटो की सत्यता पता लगाने में मदद कर सकते हैं।

07/04/2020 को नवभारत टाईम्स लखनऊ में प्रकाशित समाचार 

Saturday, April 4, 2020

घर के लिए अच्छा हो ये बुरा वक्त

वैश्विक महामारी कोरोना ने दुनिया के सभी देशों की दिनचर्या बदल को बदल कर रख दिया है  | घर और ऑफिस के बीच का अंतर खत्म हो गया है लोग घरों में बंद हैं |भारत भी इससे अछूता नहीं परंतु सभी का ध्यान इस महामारी से बचाव और लॉक-डाउन से दिखने वाले  प्रभाव पर है |  संस्थान घर से काम  करने को प्राथमिकता दे रहे हैं |इस नए तरीके की कार्य पद्धति में भी महिलायें दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं | कोरोनोवायरस लॉकडाउन के इस साइड इफेक्ट में कामकाजी महिलाओं के लिए  विडंबना यह है कि उनका बोझ दोगुना हो गया है | प्रोफेशनल प्रतिबद्धता की मांग  है कि घर से काम करोऔर परिवार चाहता है कि घर के लिए काम करो | 
            भारत में सामाजिक मानदंडों के कारण घर के काम  और बच्चों की परवरिश को महिलाओं  का कार्य माना जाता है | पुरुषों का घरेलू काम  करना सामजिक रूप में  हेय दृष्टि से देखा जाता है | कुछ प्रगतिशील पुरुष गर्व से कहते हैं कि वे महिलाओं के काम में हाथ बंटाते हैंपरंतु यह समझ से परे है कि ऐसा कौन सा कार्य है जो महिलाओं का है घर का नहीं ?
पिछले कई दिनों से,घरों में कामकाजी  महिलाओं के  लिए मदद देने वाली मेड ,कपडा धोने वाली और झाड़ू पोंछा का आना बंद हो चुका है ऐसे में घर से काम करना साथ ही साथ नौकरानी के बिनाएक बच्चे  की देखभाल करनापरिवार के लिए खाना पकाना और स्वच्छता बनाए रखना लगभग असंभव है | जिससे वे बारह घंटे की शिफ्ट के दौरानभारत की महिलायें अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक बोझ झेल रही  है |कारण सीधा है  भारतीय परिवारों में यह सहज नियम है कि पुरुष सदस्य से घर के काम करने की उम्मीद नहीं की जाती है | ज्यादातर भारतीय घरों में घरेलू काम काज का बंटवारा नहीं  होता है। भले ही पति और पत्नी दोनों घर से काम कर रहे होंलेकिन भार महिलाओं द्वारा पूरी तरह से वहन किया जाएगा | पर इससे  यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए  है कि पूरी तरह से  घरेलू काम काज करने वाली महिलायें  बेहतर स्थिति में हैं | उनके पास ससुराली  रिश्तों की मांगों को पूरा करना एक बड़ी जिम्मेदारी है जैसे पति के  माता -पिताया ननददेवर  आदि  का अतिरिक्त काम होता है | ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इकोनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवेलपमेंट 2015 के एक सर्वे के अनुसार एक भारतीय महिला अन्य देशों के  मुकाबले   हर दिन औसतन छह-घंटे  बगैर भुगतान का घरेलू श्रम करती है  |सर्वे में भारत के बाद मेक्सिको की महिलायें इस लिस्ट में हैं जो औसतन छ घंटे तेईस मिनट का बगैर भुगतान घरेलू श्रम करती हैं जबकि जापानफ्रांस और कनाडा की महिलायें क्रमशः तीन घंटे  चौआलीस मिनट ,तीन घंटे तैंतालीस मिनट बगैर भुगतान का घरेलू श्रम करती हैं |दूसरी ओरभारतीय पुरुष इस मोर्चे पर सबसे खराब हैंवे प्रत्येक दिन एक घंटे से भी कम बावन मिनट का  घरेलू काम करते है | घरेलू मामले में ज्यादातर फैसले महिलाओं  को लेने होते है | जैसे खाना क्या बनेगा खाना पकानासब्जियाँ खरीदना और फिर बच्चों को खाना खिलाना  ऐसी परिस्थिति में घरेलू काम वाली मेड ही वह कड़ी थी जो थोडा बहुत शक्ति संतुलन साधती थी पर अब वह कड़ी भी टूटी हुई है |
इन  बदली  परिस्थितियों में घर में महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ आन पड़ा है | घरेलू कार्यबच्चों की जवाबदेही और घर में रहने के कारण बच्चों और पुरुषों की विभिन्न फरमाइशों के बीच कामवाली बाई की अनुपस्थिति समस्या को और गंभीर बना रहें हैं | घर से दूर बाहर रह कर पढ़ाई करने वाले बच्चे भी लम्बे समय बाद घर में हैं | लेकिन मां की ममता और ख्वाहिशों के बीच सब्जियों की किल्लत रसोई के विकल्पों को सीमित करने के लिए पर्याप्त हैं |
घरेलु माहौल को खुशनुमा बनाये रखने की चुनौती
ज्यादा काम का बोझ और घर के सभी सदस्यों की आशाओं पर खरा उतरने की कोशिश महिलाओं  को चिड़चिड़ा बना देती  है | लॉक डाउन से पैदा हुई  समस्याएं और उससे उपजी दैनिक गतिविधियों में  एकरूपता के कारण इसकी संभावना और बढ़ जाती है | जिससे  घरेलू माहौल भी प्रभावित होता है लॉक डाउन से  उपजा तनावकल क्या होगा जैसी अनिश्चित स्थिति में घर में सामंजस्य बनाये रखने की अलिखित जिम्मेदारी भी महिलाओं की है क्योंकि ये वे ही हैं जिनके इर्द गिर्द पूरा घर घूमता है |
खाना बनानाकपड़े साफ करना या घर का अन्य कार्य महिलाओं का नहीं घर का काम और जीवन का कौशल है |भारतीय पुरुषों को  अब यह समझने का वक्त आ चुका  है |जेंडर स्टीरियो टाइपिंग की कैद से जितनी जल्दी हम बाहर निकलेंगे उतना ही परिवार के लिए बेहतर होगा और बच्चे भी अपने पिता से सीखेंगे कि घर का काम करने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं  की नहीं होती है बल्कि पुरुष भी इसमें बराबर के भागीदार हैं इस  लॉक डाउन का प्रयोग एक अवसर के रूप में किया जाना चाहिए  |बच्चे भी  इन जीवन कौशल से जब परिचित होंगे तो आने वाले कल में जब ऐसी परिस्थतियाँ पैदा हों तो वे बेहतर अभिभावक साबित होंगे और  ऐसी परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से करपायेंगे  | पिता जब बाहर होते हैं तब बच्चों के अपेक्षाएं भिन्न होती हैं. लेकिन घर पर रहते हुए भी पिता बच्चों पर ध्यान ना दें तो बच्चे उपेक्षित महसूस करते हैं. अतः कार्यालय की जिम्मेदारी रूटीन पूर्वक घर से पूर्ण करें लेकिन दिन में भी बच्चों के लिए भी कुछ समय अवश्य निर्धारित अवश्य करें. कोरोना से सुरक्षा के साथ-साथ पारिवारिक एकजुटतामाधुर्यताभविष्य की योजनाओं पर भी ध्यान दें.महिलाएं जब घर का कार्य निबटा कर आराम करती हैं तो ऐसा न हो कि बाकि लोग पहले आराम कर लें और उनके आराम के वक्त फरमाइश करने लगें. हम अपनी दिनचर्या को घर की  महिलाओं के सुविधानुसार ढाल कर इस बुरे वक्त को अच्छे वक्त में तब्दील किया जा सकता है |
नवभारत टाईम्स में 04/04/2020 को प्रकाशित 

Wednesday, March 11, 2020

जबर्दस्ती हॉर्न न बजाएं

अच्छा अगर आपको फेसबुक पर बार बार पोक करे या मेसेज बॉक्स में जा जा कर आपको अपने स्टेटस अपडेट को लाईक या कमेन्ट करने को कहे तो आपको कैसा लगेगा ? ज़ाहिर है बुरा .पर वर्चुअल वर्ल्ड से अलग रीयल वर्ल्ड में ऐसा रोज  हो तब कैसा होगा आपका रिएक्शन ?घर से बाहर जब बच्चा पहली बार स्कूल जाने के लिए निकलता है तो पढ़ाई से पहले उसे यही  बात सिखाई जाती है कि शोर मत करो पर ये बड़ी बात हम अपने छोटे से जीवन में नहीं सीख पाते हैं.रोड पर होर्न प्लीज का मतलब ये नहीं है कि होर्न आपके मनोरंजन का साधन है. जब जी चाहे बजाते रहो जब तक की सामने वाला रास्ते से ना हट  जाए पर वो तो तभी हटेगा जब उसे आगे जाने का रास्ता मिलेगा पर इतना धीरज  कहाँ है.भाई मंजिल तक तो सभी को पहुंचना है इसीलिये तो सफर में निकले हैं, पर आपको ऐसा नहीं लगता है कि बचपने में शोर ना मचाने की सीख का पालन हम कभी नहीं करते यानि जो जितना शोर मचायेगा वो उतना बड़ा माना जाएगा. फिल्म आशिकी टू का गाना बड़ा हिट हुआ “सुन रहा है तू रो रहा हूँ मैं” एक जमाना था जब लोग अकेले में रोते थे. वो गजल याद है ना आपको “चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है” जिससे दूसरे लोग परेशान ना हों और शोर भी ना हो ,पर रोड हो या पब जब तक आवाज शोर ना बन जाए तब तक बजाओ,पर कभी कभी शेर को सवा शेर भी मिल जाता है तो ऐसे लोगों के कान के नीचे भी बजा दिया जाता है. नहीं समझे अरे स्कूल में ज्यादा शोर करने पर टीचर क्या करते थे हम सब के साथ.सवाल ये है कि ऐसी नौबत ही क्यूँ आये हम एक सिविलाईज्ड सोसायटी में रहते हैं .हमारे देश में होर्न बजाना एक सनक है.समस्या ये है कि हम में से बहुत कम लोग टू या फॉर व्हीलर चलाने के मैनर्स जानते हैं या जानने की कोशिश करते हैं.ड्राइविंग स्कूल इसका सल्यूशन हो सकते हैं पर मुद्दा ये है कि जब हम बचपने की पहली सीख शोर मत करो अपने जीवन में नहीं उतार पाते हैं तो ड्राइविंग स्कूल हमें क्या सुधार पायेंगे. रात की तन्हाई और सुबह का सन्नाटा हमें इसीलिये पसंद आता  है क्यूंकि उस वक्त कोई शोर नहीं होता.सिंपल तो गाड़ी चलाते वक्त इतना ध्यान रखना बिलावजह होर्न बजाना शोर पैदा करता है और शोर किसी को पसंद नहीं होता है. आपको पता ही होगा ज्यादातर रोड एक्सीडेंट जल्दबाजी में ही होते हैं.आपने ट्रक के पीछे वो वाक्य तो पढ़ा ही होगा “जिन्हें जल्दी थी वो चले गए”, पर आपको तो जाना नहीं है बल्कि मंजिल पर सुरक्षित स्वस्थ पहुंचना है.मैंने अपनी कई विदेश यात्राओं में इस बात को महसूस किया है कि वहां गाड़ियों की संख्या ज्यादा होने के बावजूद होर्न का शोर कम होता है या न के बराबर होता है पर हमारे देश में उतनी गाडियां नहीं हैं पर फिर भी होर्न का शोर ज्यादा है. साउंड पाल्यूशन कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं  पैदा भी करता है जिसके लिए  कुछ हद  तक हमारी जबरदस्ती होर्न बजाने की आदत जिम्मेदार होती है.अब आप जाने के इन्तजार में है भाई कुछ काम भी तो करना है .जाइए बिलकुल जाइए पर ध्यान रहे आज से जबरदस्ती होर्न नहीं बजायेंगे और ये बात आपके कान में लगातार बजती रहनी चाहिए.
प्रभात खबर में 11/03/2020 को प्रकाशित 

Saturday, March 7, 2020

स्त्री का दम आजमा रहा है सिनेमा

फिल्म ‘थप्पड़’ ने घरेलू हिंसा को संवेदनशील बहस के दायरे में ला दिया है। इसमें कोई दो मत नहीं कि पिछले कुछ समय से जेंडर इश्यूज को न सिर्फ समाज में अहम जगह मिली है, बल्कि बॉलिवुड में भी इन्हें प्रमुखता मिल रही है। कुछ समर्थ निर्देशकों ने समाज में चल रहे विमर्श को सिनेमा में जगह देकर स्त्री के संघर्ष को आगे बढ़ाने की प्रगतिशील भूमिका निभाई है। जाहिर है, ये डायरेक्टर एक्टिविस्ट के रोल में भी हैं। फिल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम का उन्होंने एक बड़े सामाजिक बदलाव के लिए सार्थक इस्तेमाल किया है। भारतीय सिनेमा में इस तरह के लोग पहले भी रहे हैं और उन्होंने सामाजिक तब्दीली में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन मुख्यधारा में ऐसे लोगों की बहुतायत रही है जो समाज में प्रचलित पुरुष वर्चस्व वाले जीवन मूल्य ही अपनी फिल्मों में परोसते रहे हैं। उन्हें पसंद किए जाने का कारण यह है कि दर्शकों का एक बड़ा तबका उन्हीं की तरह सोचता है।
चाहे प्यार का मामला हो या तकरार का, फिल्मी नायकों के संवादों और व्यवहार में पुरुषवादी रवैया साफ दिखता रहा है। फिल्म ‘धड़कन’ का यह संवाद देखिए- ‘मैं तुम्हें भूल जाऊं यह हो नहीं सकता और तुम मुझे भूल जाओ, यह मैं होने नहीं दूंगा।’ यह एक भावुकतापूर्ण संवाद लगता है जिसमें प्रेम की चरम की अभिव्यक्ति है, पर असल में यह एक धमकी है जो प्रेमी अपनी प्रेमिका को दे रहा है। प्रेमी एक टिपिकल पुरुष है जो स्त्री पर अपना स्वाभाविक अधिकार समझता है। एक लड़की की क्या मजाल जो वह किसी पुरुष का प्रेम ठुकरा दे! लड़कियों की ‘ना’ में ही उनकी ‘हां’ छिपी रहती है, यह दिव्य ज्ञान भारत के युवाओं को ऐसी ही फिल्मों से मिला है, जिनके मूल में पुरुषवादी सोच हावी रहती है, जो महिलाओं को दोयम दर्जे का जीव मानती है। इस सोच की ही परिणिति यथार्थ जीवन में किशोरों/युवाओं द्वारा लड़कियों का पीछा करने की घटनाओं में होती है जिससे उनका जीना दूभर हो जाता है।
ऐसे ही कुछ और संवादों पर नजर डालें- ‘प्यार से गले लग जा तो रानी बना दूंगा, नहीं तो पानी पानी कर दूंगा’ (बेताज बादशाह)। ‘घोड़ी और जवान लड़की की लगाम जरा कसके रखनी चाहिए’ (दर्दे दिल)। ‘लड़की का मॉडल हो या गाड़ी का, वक्त के साथ दोनों पुरानी हो जाती हैं (खून भरी मांग)। ‘व्हेन यू कांट चेंज द गर्ल, चेंज द गर्ल’- लड़की का रवैया नहीं बदल सकते तो लड़की ही बदल दो (चश्मे बद्दूर)। ‘प्यार से दे रहे हैं रख लो वरना थप्पड़ मार के भी दे सकते हैं’(दबंग)। पिछले साल आई बहुचर्चित फिल्म ‘कबीर सिंह’ में प्रेम का ऐसा ही पुरुषवादी रूप दिखता है। इसमें नायक अपने प्रेम को क्रूरता की हद तक न्यायसंगत दिखाने का प्रयास करता है और लोग उसका परिणाम जाने बगैर तालियां बजाकर उसे सहानुभूति का पात्र बना देते हैं।
उसी फिल्म का एक संवाद है: ‘तेरे लिए कुछ भी कर सकता हूं प्रीति। अगर तुझमें मेरे लिए वैसा पागलपन है, देन यू कॉल मी। अदरवाइज, यू नो मी।’ बड़े शालीन तरीके से नायिका को धमकाते हुए नायक बता रहा है कि जो मैं चाहता हूं वही करो। ऐसी फिल्में पुरुषवाद को बढ़ावा देती हैं, पर राहत की बात है कि पुरुषवाद के साये से निकल रही महिलाओं का पक्ष भी बॉलिवुड में अब प्रमुखता से आ रहा है। समाज का एक वर्ग महिला सशक्तीकरण के पक्ष में है, लिहाजा स्त्री की आवाज को फिल्मों में समर्थन मिल रहा है और ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर भी सफल हो रही हैं। बॉलिवुड के भीतर महिला कलाकारों ने अपने प्रति भेदभाव का खुलकर विरोध भी किया है। शोषण के खिलाफ, चाहे वह शारीरिक हो या आर्थिक, उन्होंने आवाज उठाई है। भारत में #मीटू आंदोलन को सबसे ज्यादा ताकत बॉलिवुड से ही मिली।
बॉलिवुड में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ रही है इसलिए अब ऐसी फिल्में भी बनने लगी हैं, जिनमें स्त्री का स्वतंत्र और ताकतवर चरित्र उभरकर आता है। पिछले पांच वर्षों में ऐसी कई फिल्में आई हैं, जैसे कहानी, गुलाब गैंग, क्वीन, मर्दानी, मैरी कॉम, दम लगा के हईशा, एन एच-10, पीकू, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स, एंग्री इंडियन गॉडेस, पिंक, नीरजा आदि। ‘दंगल’ जैसी बहुचर्चित फिल्म भी इसी श्रेणी में रखी जाएगी। ‘पिंक’ में स्त्री अस्मिता और उसकी निजता के दायरे से जुड़े अहम सवाल उठाए गए हैं। यह फिल्म हमारी मानसिकता में गहरी पैठ बना चुके लैंगिक भेदभाव पर करारी चोट करती है और नैतिकता-अनैतिकता के बंधे-बंधाए खांचों पर कुछ जरूरी सवाल उठाती है।
अमिताभ बच्चन द्वारा इस फिल्म में बोला गया यह संवाद बहुत जरूरी संदेश देता है- ‘‘नो’ अपने आप में एक वाक्य है। किसी व्याख्या, किसी स्पष्टीकरण की इसको कोई जरूरत नहीं है।’ फिल्म ‘नीरजा’ भी इस मायने में महत्वपूर्ण है। 1986 में हाईजैक हुए एक विमान के यात्रियों की सुरक्षा के लिए अपनी जान दांव पर लगाने वाली एयरहोस्टेस नीरजा भनोट की ज़िंदगी पर बनी इस फिल्म ने दिखाया कि मुश्किल परिस्थिति में भी एक लड़की कैसे अपना आपा नहीं खोती, जबकि पुरुष भयभीत हो जाते हैं। चर्चा प्राय: विमान परिचारिकाओं की खूबसूरती की ही होती है, मगर फिल्म बताती है कि एक सुंदर प्रफेशनल चेहरे के उस पार सूझबूझ और अपार साहस भी हो सकता है।
एक महिला मुक्केबाज की मुश्किलों को दर्शाती ‘साला खड़ूस’, एक मेहनतकश स्त्री के लिए शिक्षा की जरूरत को रेखांकित करती ‘निल बटे सन्नाटा’, अपनी धुनें तलाशती एक महिला संगीतकार की कहानी ‘जुगनी’ या फिर एक महिला पुलिस अधिकारी की कथा ‘जय गंगाजल’ भी महत्वपूर्ण हैं। पिछले दिनों आई ‘छपाक’ ने एक सनकी की क्रूरता झेलकर भी हिम्मत न हारने वाली एक लड़की का किस्सा बयान किया। ज्यों-ज्यों समाज में औरत की ताकत बढ़ेगी, उसके पक्ष में न सिर्फ ज्यादा फिल्में बनेंगी, बल्कि समूचे फिल्म जगत का रवैया उसके प्रति संवेदनशील होता जाएगा।
नवभारत टाईम्स में 07/03/2020 को प्रकाशित 

Monday, March 2, 2020

जलवायु परिवर्तन से विस्थापन


संयुक्त राष्ट्र महा सभा की 70वीं वर्ष गाँठ पर अमेरिका में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने पर्यावरण का जिक्र करते हुए कहा था  कि अगर हम जलवायु परिवर्तन की चिन्ता करते हैं तो यह हमारे नीजि सुख को सुरक्षित करने की बू आती हैलेकिन यदि हम क्लाइमेट जस्टिस की बात करते हैंतो गरीबों को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने का एक संवेदनशील संकल्प उभरकर आता है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव सबसे ज्यादा इन्हीं निर्धन व वंचित लोगों पर होता है। जब प्राकृतिक आपदा आती हैतो ये बेघर हो जाते हैंजब भूकम्प आता हैतो इनके घर तबाह हो जाते है।सच यही है कि बरसों पहले जलवायु परिवर्तन पर की गई मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी अब सही साबित होती महसूस होने लगी है|आज वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक  आपदाओं से विस्थापित लोगों का औसत युद्ध और हिंसा द्वारा हुई विस्थापनों से कहीं अधिक है|इस तथ्य की पुष्टि  संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट  में दिए गए आंकड़ों से होती है | रिपोर्ट में 148 देशों पर किये सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष दिया गया है कि इन देशों में कुल  2.8 करोड़ विस्थापित  हुए हैं | जिन में 61प्रतिशत (1.75 करोड़) जलवायु परिवर्तन द्वारा जबकि 39प्रतिशत (1.08 करोड़) युद्ध और हिंसक संघर्षों की वजह से हुए हैं|जलवायु परिवर्तन पर इंटर गर्वमेंतल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज  (IPCC) ने भी अपनी एक रिपोर्ट में यही चेतावनी दी है कि जैसे जैसे प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और तीव्रता बढ़ेगी अनेक लोगों को अपना घर और देश छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा|इसी सन्दर्भ में वर्ल्ड बैंक ने 2018 में दिए हुए अपने अनुमान में कहा है कि अगर तुरंत कोई कार्यवाही नही की तो 2050 तक पृथ्वी के तीन बड़े हिस्सों (उप-सहारा अफ्रीकादक्षिण एशियालैटिन अमेरिका) में 14.3 करोड़ से ज़्यादा लोगों को जलवायु परिवर्तन की वजह से अपना घर छोड़ कर विस्थापित होना पड़ेगा|आमतौर पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले विस्थापन को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जबकि अब वक्त आ गया है कि लोगों को जलवायु परिवर्तन के कारण शरणार्थी बनाने वाली वजहों को मानव तस्करी के बराबर माना जाना चाहिए क्योंकि दोनों ही कारण लोगों को विस्थापित होने पर मजबूर करते हैं|एक अन्य संस्थान , अंतर्राष्ट्रीय आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र (IDMC) के अनुसार 2018 के अंत तक 16 लाख से अधिक लोग जलवायु परिवर्तन की वजह से अपने घरों को छोड़ कर राहत शिविरों में पड़े हुए हैं|वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट के अनुसार ये परिद्रश्य भारतीय उपमहाद्वीप के देशों के लिए अधिक चिंतनीय हैइंटर गर्वमेंतल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने अपनी रिपोर्ट में ये भी कहा है कि भारत अपने विशाल तटीय भूगोल की वजह से इस परिदृश्य में सबसे कमज़ोर देशों में से एक है|जहाँ पिछले 2 वर्षों में हर महीने कम से कम एक प्राकृतिक आपदा अवश्य हुई हैभारत के पूर्व में सुंदरवन जैसी जगहों पर समुद्र के स्तर में वृद्धि का खतरा हैतो उत्तर भारत में  पहाडी  बाढ़बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ी है। बंगाल की खाड़ी में 2009 का आयला चक्रवात या उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ बाढ़ इस तथ्य के प्रमाण हैं।दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साईंस इन्वायरमेंट  (CSE) भी 9 फरवरी 2020 को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि  करती है|2019 में एशिया में हुई 93 प्राकृतिक आपदाओं में नौ अकेले भारत में हुई जो कुल मौतों का अडतालीस प्रतिशत हिस्सा थी|इस रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है 2018 की तुलना में 2019 में प्राकृतिक आपदाएं तो कम हुईं पर 45 प्रतिशत  अधिक लोगों ने 2019 में अपनी जान गंवाई |देश के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार इस समय भारत के 37 प्रदेश एवं केन्द्रशासित राज्यों में से 27 आपदा ग्रस्त हैं|भारत और पूरे विश्व के लिए जलवायु परिवर्तन एक गंभीर मुद्दा हैगरीब से लेकर अमीर देश सब इस की चपेट में हैंअब यही  समय है जब दुनिया माने की विस्थापन समस्या एक राजनीतिक गर्म मुद्दा नहीं बल्कि एक गंभीर समस्या है जिसमें जलवायु परिवर्तन की एक बड़ी भूमिका है |इस समस्या के मानवीय पक्ष को देखते हुए अब हम सब को तय करना होगा इन विस्थापित लोगों को फिर से स्थापित करने के लिए हमें क्या करना चाहिए|इनमें से  ज्यादातर ऐसे गरीब लोग हैं जिन के पास अपना घरखेत छोड़ने के अलावा कोई विकल्प ही  नहीं था |इनमें से ज्यादातर के पास रोजगार का कोई नियमित साधन नहीं है और वे सभी उस भूमि पर आश्रित थे जिन्हें जलवायु परिवर्तन के कारण उन्हें छोड़ना पड़ा |विचारणीय प्रश्न यह भी है कि इन ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को फिर से स्थापित करने के लिए सरकार क्या कर सकती है |
अमर उजाला में 02/03/2020 को प्रकाशित 

Sunday, February 23, 2020

प्रकृति की गोद में अनछुआ सौन्दर्य

यात्राएं मुझे हमेशा सुकून देती हैं एक ऐसी ही  यात्रा पिछले दिनों हुई जम्मू कश्मीर के बारे में सबने सुना होगा खासकर  अपने नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण और  लंबे समय  तक आतंकवाद से पीड़ित राज्य के रूप में |जब जम्मू कश्मीर घूमने की बात  होती है तो दो चार जगह ही ध्यान में आती है,पर राजौरी जैसी बहुत सी जगहें हैं जिनके बारे में लोगों को कम पता है |राजौरी के लिए ट्रेन जम्मू तक ही जाती है वहां से लगभग 165 किमी दूर सडक से ही पहुंचा जा सकता है हालंकि राजौरी में एअरपोर्ट है पर वहां से से नियमित उड़ान का कोई सिलिसला नहीं है वो एअरपोर्ट ज्यादातर भारतीय सेना या मंत्रियों के हेलीकॉप्टर के काम ही आता है |
राजौरी जगह कैसी है बस ख़बरों में ही सुना था शायद इसीलिये मैं ज्यादा उनी कपडे नहीं ले जा रहा था सोचा जम्मू जैसा ही होगा जब जम्मू में ज्यादा ठण्ड नहीं पड़ती तो राजौरी भी ऐसा ही होगा पर हुआ इसका उल्टा राजौरी में अच्छी ठण्ड थी | ट्रेन समय से निकल पडी पन्द्रह घंटे के सफर के बाद हम जम्मू पहुँच जाने वाले थे | दिन के दो बज तक हम  अखनूर पार कर चुके थे और उसके बाद राजौरी जिला शुरू हुआ सुंदरबनी के पी डबल्यू डी गेस्ट हाउस में दोपहर के भोजन की व्यवस्था थी खूबसूरत कमरा था जहाँ मैंने स्नान किया और भोजन पर टूट पड़े | अब रास्ते में सन्नाटा बढ़ रहा था जंगल घने हो रहे थे और एक पहाड़ी नदी लगातार हमारे साथ चल रही थी|
 हम नौशेरा से गुजर रहे थे आर्मी के ट्रकों का आना जाना लगा था उसके बाद तीथवाल पड़ा 1947-48 मे यहाँ पाकिस्तानी कबाइलों ने यहाँ घुसपैठ कर ली थी मैंने इतिहास में पढ़ा था और आज देख रहा था इतिहास को जीना अच्छा लग रहा था |रास्ता लंबा था तो मैंने परवेज से  मिलिटेंसी के दौर की बात शुरू कर दी उस दर्द को शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है और जब जब मैंने जिस किसी से आतंकवाद के उस दौर की बात की तो लगा जैसे वे तटस्थ हो चुके हैं इतना कुछ झेलने के बाद  सुख दुख राग द्वेष सबसे उपर |रास्ते में  आतंकवाद का  एक पहलू एक चायवाले ने बताया कि हमारे जंगल अंधाधुंध काटने से बच गए नहीं तो इतनी हरियाली ना दिखती मेरे कैसे पूछने पर बड़ा मजेदार उत्तर मिला होता यूँ था कि पाकिस्तान से आये आतंकवादी जंगलों में पनाह लेतेथे दिन में अगर कोई लकड़ी काटने वाला जंगल में जाता तो उसे मार पीटकर जंगल से भगा देते थे जिससे सेना या पुलिस को उनकी छुपने की जगह का पता नहीं चलता था |इस तरह उन लोगों ने इतना दहशत का माहौल बना दिया कि लोग जंगलों में जाते ही नहीं थे जिससे अवैध कटाई पर पूरी तरह रोक लग गयी|जंगल बचे इंसानी लाशों की कीमत पर , ये भी विकास का एक पहलू था | राजौरी से लगभग तीस किलोमीटर पहले एक चिंगस नाम की जगह ,चिंगस के बारे में बताने से पहले आपको बता दूँ राजौरी का यह इलाका उस रास्ते का हिस्सा है जिस रास्ते से मुग़ल शासक गर्मियों में कश्मीर घाटी जाते थे |मुगलों के द्वारा बनवाई गयी सरायों के अवशेष आज भी मिलते हैं|थोड़ी दूर चलने पर चिंगस नाम की वो सराय आ गयी जिसे मुग़ल बादशाह अकबर ने बनवाया था.आज ये मुख्य सड़क से सटा एक वीरान इलाका है जहाँ मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शरीर का कुछ हिस्सा दफ़न है|
चिंगस को फारसी भाषा में आंत कहते हैं किस्सा कुछ यूँ है कि मुग़ल बादशाह जहाँगीर अपनी बेगम नूरजहाँ के साथ अपने वार्षिक प्रवास के बाद कश्मीर से अपनी सल्तनत की ओर लौट रहे थे |
 चिंगस में उनकी तबियत खराब हुई और उनकी मौत हो गयी|उत्तराधिकार के संघर्ष को टालने के लिए नूरजहाँ इस बात का पता आगरा  पहुँचने से पहले सार्वजनिक नहीं करना चाहती थी|शरीर के वो हिस्से जो मौत के बाद सबसे जल्दी सड़ते हैं उन अंगों को इसी जगह काटकर निकल दिया गया और उनको यहीं दफना दिया गया जिसमें जहाँगीर की आंत भी शामिल थी|आंत और पेट के अंदरूनी हिस्से को निकाल कर उसके शरीर को सिल कर इस तरह रखा गया कि आगरा पहुँचने से पहले किसी को भी इस बात का आभास् नहीं हुआ कि जहाँगीर मर चुके हैं| इस तरह उसकी आँतों को जहाँ दफनाया गया वो चिंगस के नाम से प्रसिद्ध हो गया|यहाँ जहाँगीर की आँतों की कब्र आज भी सुरक्षित है लेकिन यहाँ एकदम सन्नाटा पसरा था लगता है यहाँ ज्यादा लोगों का आना जाना नहीं है हालांकि पुरातत्व विभाग के लगे बोर्ड इस बात की गवाही दे रहे थे कि सरकार के लिए यह स्थल महत्वपूर्ण है|मैंने अपने कैमरे का यहाँ बखूबी इस्तेमाल किया| शाम के पांच बजे हमने राजौरी में प्रवेश किया शांत कस्बाई रंगत वाला शहर जहाँ अभी विकास का कीड़ा नहीं लगा था और ना लोग प्रगति के पीछे पागल थे|जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी वो एक सरकारी गेस्ट हाउस था पर उसके कमरे को देखकर लग रहा था जैसे कोई शानदार होटल हो | राजौरी अंधरे में डूब रहा था पहाड़ों पर रौशनियाँ जगमगाने लगी थीं|

अगले दिन हम राजौरी को एक्सप्लोर करने निकल पड़े| पहला पड़ाव था राजौरी से तीस किलोमीटर दूर बाबा गुलाम शाह की दरगाह इन्हीं संत के नाम पर राजौरी में एक विश्वविद्यालय भी है|इसे शाहदरा शरीफ भी कहा जात है  | पहाड़ों के चक्कर लगते हुए हम कई गाँवों से गुजर रहे थे पहाड़ों से निकालने वाले चश्मे आस पास के दृश्यों  की सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे|चश्मे प्राकृतिक पानी के ऐसे स्रोत हैं जो पहाड़ों से निकलते हैं | दो घंटे के सफर के बाद हम दरगाह पहुँच चुके थे|ऊँचाई पर बनी दरगाह लगभग २५० साल पुरानी है जहाँ चौबीस घंटे लंगर चलता है|जिसमें चावल दाल और मक्के की रोटी प्रसाद में मिलती है| हमने पहले दरगाह में सजदा किया और चादर चढ़ाई सबकुछ व्यवस्थित और शांत दरगाह का प्रबंधन सरकार द्वारा स्थापित ट्रस्ट करता है| जो भी चढावा आता है उसकी बाकायदा नाम पते के साथ रसीद दी जाती है| एक खास बात ये थी कि इस दरगाह पर सभी मजहब के लोग आते हैं जिनकी मन्नत पूरी हो जाती हैं |उनमें कुछ मुर्गे और पशु भी चढाते हैं पर उन पशुओं का वध दरगाह परिसर में नहीं किया जाता है उन्हें जरूरतमंदों को दे दिया जाता है|दरगाह के लंगर में सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है यहीं नमकीन कश्मीरी चाय भी पीने को मिली | दरगाह में दो घंटे बिताने के बाद हम चल पड़े पर्यटक स्थल देहरा की गली (डी के जी)देखने |दरगाह से एक घंटे की यात्रा के बाद हम यहाँ पहुंचे क्या नज़ारे थे| इस जगह पर हमारे सिवा कोई नहीं था| सिर्फ बर्फ से ढंके पहाड जो पाक अधिकृत कश्मीर में थे| अक्तूबर के महीने में  हालाँकि धूप तेज थी पर ठण्ड थी|एक पहाड़ी पर कुछ लकड़ी की झोपडियां बनाई गयी हैं जिनको गरम रखने के लिए सोलर एनर्जी का इस्तेमाल किया जाता है| जिससे पर्यावरण को नुक्सान ना पहुंचे इसी पहाड़ी के समीप एक व्यू पॉइंट बनाया गया है| जहाँ से पूरे राजौरी का नजारा लिया जा सकता है|हमारे पीछे पूँछ शहर दिख रहा था और उसके पार पाक अधिकृत कश्मीर सब कुछ एक था पर बीच में नियंत्रण रेखा भारत और पाकिस्तान को अलग अलग कर रही थी|दिन के भोजन की व्यवस्था यहीं की गयी थी|भुना चिकन खाने के बाद एक लड्डू जैसा मांस का व्यंजन परोसा गया जो भेंड के मांस  से बना था जिसे रिस्ता कहते हैं | जिसमें भेंड के मांस को लकड़ी के बर्तन में गुंथा जाता है फिर दही के साथ पकाया जाता है| राजौरी में बहुत सारी ऐसी जगहें जो एकदम अनछुई हैं| ऐसे में मेरे जैसे इंसान के लिए जो भीड़ भाड़ कम पसंद करता है उसके लिए ऐसी जगहें जन्नत से कम नहीं हैं|खाना खा कर हम वहीं घूमें फोटोग्राफी की शांति इतनी कि हम अपनी साँसों की आवाज़ को सुन सकते थे|शाम हो रही थी अब लौटने का वक्त रास्ते में दिखते चीड के पेड़ों पर जब सूर्य की किरणें पड़ती तो वो हरे पेड भी सुनहली आभा देते और बगल में बहने वाले पानी के चश्मे चांदी जैसे चमकते बहुत सी किताबों में इस तरह के द्रश्यों के बारे में पढ़ा था पर अपनी आँखों से प्रकृति के सोना चांदी को पहली बार देखा रहा था|लौटते वक्त परवेज ने बताया कि इन गावों में रहने वाले काफी लोग मध्यपूर्व के देशों में बेहतर जीवन की तलाश में चले गए हैं उनके भेजे हुए पैसों से गाँव के घरों में छत टिन की बनने लग गयी है मिट्टी या सीमेंट की छत बर्फबारी में घर की रक्षा नहीं कर पाती और ये टिन की छतों वाले घर सूर्य की किरणों से ऐसे चमक रहे थे जैसे पहाड पर अनगिनत शीशे रख दिए गए हों |जहाँ हम रुके थे वहां से दो  किलोमीटर की ऊंचाई पर  वह किला पुराना था पर जिसे धरनी धार किले  के नाम से जाना जाता है पर अब वहां  सेना का ठिकाना  है और किले में खरगोशों की पूरी कॉलोनी बसी हुई थी कुछ छोटे, कुछ बड़े और कुछ एकदम बच्चे, रात घिर रही थी राजौरी बिजली में जगमग कर रहा था हवा ठंडी थी सूरज डूब रहा था |मेरा मन भारी हो रहा था कल मुझे अपनी दुनिया में लौटना है आज की रात राजौरी की आखरी रात थी । यह सब कुछ तो सपने जैसा लग रहा है अब वापस लौटने का वक़्त था |
दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 23/02/2020 को प्रकाशित 

Friday, February 14, 2020

दिल के रिश्तों में जल्दबाजी ठीक नहीं

दुनिया वाकई बहुत तेजी से बदल रही है और प्यार करने और उसे जताने के तरीके भी अब देखिये न हमारे ज़माने में गाना बजता था "कितना प्यार तुम्हें करते हैं आज हमें मालूम हुआजीते नहीं तुम पर मरते हैं, "जब प्यार का इज़हार करना थोडा मुश्किल था और वेलेन्टाईन डे को लेकर एक हिचक हुआ करती थी |
      हमारे कैम्पस भी तब ऐसे ही हुआ करते थे थोड़े से सहमे से प्यार के किस्से तब भी थे पर इश्क तब सिर्फ इश्क था न कि “इश्क वाला लव”।इसे आप वैश्वीकरण की बयार का असर कहें या इंटरनेट क्रांति का जोर जिसने आज की पीढी को ज्यादा मुखर बना दिया है|फेसबुक ट्विटर से लेकर व्हाट्सएप जैसे चैटिंग एप आपको मौका दे रहे हैं कि कुछ भी मन में न रखो जो है बोल दो|वो वक्त चला गया जब फिल्म की नायिका ये गाना गाते हुए जीवन बिता देती थी "मेरी बात रही मेरे मन में कुछ कह न सकी उलझन में" अब प्यार के इज़हार में कोई लैंगिक विभेद नहीं है।'रोज डेसे प्यार का आगाज होता है और  होलिका दहन से प्रेम का अंत |
लड़के लड़कियां सभी कोई रिग्रेट लेकर नहीं जीना चाहते हैं क्रश होना सामान्य है और इसके इज़हार में अब कोई समस्या नहीं दिखती|भले ही लव इज भेस्ट ऑफ़ टाईम हो पर चलो कर के देख ही लिया जाए ये आज की पीढी का मन्त्र है।
पर थोड़ी सी बात जो मुझे परेशान करती है वो है रिश्ते जितनी तेजी से बन रहे हैं उतनी तेजी से टूट भी रहे हैंदिखावे पर जोर ज्यादा है,रोज डे से शुरू हुआ प्यार का सिलसिला होली आते आते होलिका की आग में दहन हो जाता है |हर युवा जल्दी में है ये जल्दबाजी दिल के रिश्तों में अच्छी नहीं है।वक्त ने किया क्या हंसी सितम का दौर कब का जा चुका है अब तो ब्रेकअप की पार्टी दी जा रही है। जोर दिखावे पर है तू अभी तक सिंगल हैतेरा कोई बॉय फ्रैंड नहीं या तेरी कोई गर्ल फ्रैंड नहीं है ऐसे प्रश्न ये बताते हैं कि अगर आप किसी ऐसे रिश्ते में नहीं हैं तो कुछ खोट है आपमेंअब कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है।
फेसबुक या व्हाट्सएप स्टेटस की तरह रिलेशनशिप स्टेट्स बदले जा रहे हैं ,रिश्ते वक्त मांगते हैं उनको फलने फूलने में समय लगता है पर इतना टाईम किसके पास है |असुरक्षा की भावना इतनी ज्यादा है कि फेसबुक की टाईम लाइन से लेकर वहाट्सएप पर ऑनलाईन रहने के सिलसिले तक सभी जगह निगाह रक्खी जा रही है ये टू बी ऑर नॉट टू बी जैसा दौर है जिसे हम गिरने और सम्हलने से समझ सकते हैं |आज की पीढी ज्ञान नहीं चाहती और अनुभव के स्तर पर सब चीज महसूस करना चाहती है |इसमें किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए पर रिश्तों को बनाने और सम्हालने की जिम्मेदारी के एहसास का गायब हो जाना थोडा परेशान करता है।वैसे भी जब प्यार है फिज़ाओं में तो जमाने को ये तो कह ही सकते हैं "होश वालों को क्या ख़बर ज़िन्दगी क्या चीज़ है इश्क कीजिए ख़ुद समझिये ज़िन्दगी क्या चीज़ है|"मेरे लिए तो ज़िन्दगी एक प्यार का नगमा है |जिससे हमारी आपकी सब की कहानी जुड़ी हुई है | प्यार किया नहीं जाता हो जाता है हो सकता है आप न माने|प्यार के इस मौसम में आप सभी को वेलेन्टाइन्स डे की दिल से की शुभकामनाएं|
प्रभात खबर में 14/02/2020 को प्रकाशित 

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