Saturday, November 11, 2017

डिजीटल लेन- देन भरोसे का संकट

इंटरनेट एक विचार के तौर पर सूचनाओं को साझा करने के सिलसिले के साथ शुरू हुआ था चैटिंग और ई मेल से यह हमारे जीवन में जगह बनाता गया फिर ऑनलाईन शॉपिंग ने खेल के सारे मानक बदल दिए पर  भारत में इस सूचना क्रांति के अगुवा बने स्मार्टफोन जिन्होंने मोबाईल एप  और ई वालेट के जरिये पर्स में पैसे रखने के चलन को हतोसाहित करना शुरू किया | आईटी क्षेत्र की एक अग्रणी कंपनी सिस्को ने अनुमान लागाया है कि सन २०१९ तक भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या लगभग ६५ करोड़ हो जाएगी जो जाहिर तौर पर इस ई लेन देन  की प्रक्रिया को और गति देगी | फॉरेस्टर की एक रिपोर्ट के मुताबिकलगभग  3.5 करोड़ लोग ऑनलाइन खरीदारी करते हैंजिनकी संख्या  2018 तक 12.80 करोड़ हो जाने की उम्मीद है। इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं के मामले में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर हैपर यहां ई-कॉमर्स का भविष्य मोबाइल के हाथों में है। मार्केट रिसर्च संस्था आईडीसी के मुताबिकभारत में स्मार्टफोन का बाजार 40 प्रतिशत की गति से बढ़ रहा है। मोबाइल सिर्फ बातें करनेतस्वीरों व संदेशों का माध्यम भर नहीं रह गए हैं। अब स्मार्टफोन में चैटिंग ऐप के अलावाई-शॉपिंग के अनेक ऐप लोगों की जरूरत का हिस्सा बन चुके हैं। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोशिएशन ऑफ इंडिया व केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिकभारत का ई-कॉमर्स का बाजार 12.6 बिलियन डॉलर का है और 2020 तक यह देश की जीडीपी में चार प्रतिशत का योगदान देगा। अभी ओनलाईन खरीददारी के लिए अंग्रेजी भाषा पर निर्भरता ज्यादा है कुछ साईटों को छोड़कर अभी सभी बड़े ऑनलाइन स्टोर्स अंग्रेजी पर निर्भर हैं  पर जैसे जैसे क्षेत्रीय भाषाओँ में खरीददारी का दायरा बढेगा ये कारोबार और गति पकड़ेगा | ।
आज सरकार भी यह चाहती है कि लोग इलेक्ट्रौनिक लेन देन ज्यादा से ज्यादा करें जिससे पारदर्शिता को बढ़ावा मिले और  काले धन के पैदा होने की संभावना को समाप्त किया जा सके |सरकार के लिए नोट छापना एक खर्चीला काम है |टफ्ट्स विश्वविद्यालय के  प्रकाशन कॉस्ट ऑफ़ कैश इन इण्डिया” के आंकड़ों के अनुसार भारत नोट छापने और उनके प्रबन्धन के लिए सालाना इक्कीस हजार करोड़ रुपये खर्च  करता है एक हजार और पांच सौ रुपये के पुराने एक नोट छापने में रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया को क्रमशःदो रुपये पचास पैसे और तीन रुपये सत्रह पैसे खर्च करने पड़ते थे  |मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार साल 2011से 2105 तक ई भुगतान ने देश की अर्थव्यवस्था में 6.08 बिलियन डॉलर  का इजाफा किया है|मैकिन्सी ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि इलेक्ट्रौनिक लेन देन के बढ़ने से साल 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था में 11.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी |आंकड़े आने वाले कल की सुनहरी उम्मीद जगाते हैं पर ये मामला मानवीय व्यवहार से भी जुड़ा है जिसके बदलने में वक्त लगेगा भारतीय परिस्थितियों में मौद्रिक लेन देन विश्वास से जुड़ा मामला भी है जब हम जिसे पैसा दे रहे हैं वो हमारे सामने होता है जिससे एक तरह का भरोसा जगता है |स्मार्टफोन के आने और ई शॉपिंग के बढ़ने से लोगों ने ई लेन देन करना शुरू कर दिया है |
पर महज स्मार्ट फोन प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने से लोग डिजीटल लेन-देन की तरफ ज्यादा बढ़ेंगे ऐसा वर्तमान परिस्थतियों में सम्भव नहीं दिखता और डिजीटल लेन-देन की अपनी समस्याएँ हैं मार्च 2016 तक भारत में 342.46 मिलीयन इंटरनेट प्रयोगकर्ता है जो कुल आबादी का मात्र का छब्बीस प्रतिशत हैं |ऑनलाइन उपभोक्ता अधिकार जैसे मुद्दों पर न तो कोई जागरूकता है न ही कोई ठोस सार्थक  कानून | ई वालेट प्रयोग  और ऑन लाइन खरीददारी उपयोगिता के तौर पर बहुत लाभदायक है पर किन्ही कारणों से आपको खरीदा सामान वापस करना पड़ा या खराब उत्पाद मिल गया और उपभोक्ता अपना पैसा वापस चाहता है तो  अनुभव यह बताता है कि उसे पाने में तीन से दस  दिन तक का समय लगता है और इस अवधि में उस धन पर डिजीटल प्रयोगकर्ता को कोई ब्याज नहीं मिलता और  यह एक लम्बी थकाऊ प्रक्रिया है जिसमें अपने पैसे की वापसी के लिए बैंक और ओनलाईन शॉपिंग कम्पनी के कस्टमर केयर पर बार बार फोन करना पड़ता है |कई बार कम्पनियां पैसा नगद न वापस कर अपनी खरीद बढ़ाने के लिए गिफ्ट कूपन जैसी योजनायें जबरदस्ती उपभोक्ताओं के माथे मढ देती हैं और ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न हुई समस्या के समयबद्ध निपटारे की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है |जेब में पैसा होना एक तरह का आत्मविश्वास देता है | क्या वह आत्म विश्वास   जेब में पड़ा मोबाईल ई वालेट या डेबिट /क्रेडिट कार्ड दे पायेगा जहाँ  देश  में डिजीटल लेन-देन अभी विकसित देशों के मुकाबले उतनी ज्यादा मात्रा में नहीं हो रहा है फिर भी सर्वर बैठने की समस्या से उपभोक्ताओं को अक्सर दो चार होना  पड़ता है|मोबाईल का नेटवर्क हवा के झोंके के साथ आता जाता रहता है |बैंक से पैसा निकल जाता है और सम्बन्धित कम्पनी तक नहीं पहुँचता फिर उसके वापस आने का इन्तजार जैसे –जैसे ई लेन-देन बढ़ रहा है उसी अनुपात में साइबर अपराध की संख्या में इजाफा हो रहा है |राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2011 से 2015 के बीच भारत में साइबर अपराध की संख्या में तीन सौ पचास प्रतिशत की वृद्धि हुई है जिनमे बड़ी संख्या में आर्थिक  साइबर अपराध  भी शामिल हैं जागरूकता में कमी के कारण आमतौर पर जब उपभोक्ता ऑनलाईन धोखाधड़ी का शिकार होता है तो उसे समझ ही नहीं आता वो क्या करेये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जितनी जल्दी मिलेगा लोग उतनी तेजी से इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन की तरफ बढ़ेंगे |देश की बड़ी आबादी अशिक्षित और निर्धन है वो आने वाले वक्त में कितनी बड़ी मात्रा में  डिजीटल लेन देन करेगी यह उस व्यवस्था पर निर्भर करेगा जहाँ लोग पैसा खर्च करते उसी निश्चिंतता और भरोसे को पा सकें जो उन्हें कागजी मुद्रा के लेन देन करते वक्त प्राप्त होती है  |
आई नेक्स्ट में 11/12/2017 को प्रकाशित 

Wednesday, November 8, 2017

प्राइवेसी का पिटारा

वर्तमान समय  में फेसबुक ने और कुछ किया हो न किया हो पर हमारी जिंदगी को एक मेगा इवेंट में जरूर बदल दिया है .मिलना ,बिछुड़नाचलना ,रूठना ,मनाना ,रोना ,खोना और पाना न जाने क्या क्या बस सब कुछ लोगों को पता चलना चाहिए .जैसे जैसे सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ता जा रहा है उतना ही  तेजी से निजता के अधिकार की सुरक्षा भी माँगी जा रही है .विचित्र दौर है जब हम खुद चाहते हैं कि लोग हमारे बारे में जाने, हम क्या खाते हैं कौन हमारे ख़ास दोस्त हैं .हम कहाँ जा रहे हैं .ये आत्म मुग्धता  का महान दौर है जब एक ही वक्त में दो परिस्थितियां आमने सामने हैं .किसी का जन्मदिन है तो फेसबुक आपको याद दिला दे रहा है और हम भी जन्मदिन की शुभकामनायें लिख कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहे हैं .किसी घर में किसी की मौत हुई उसने मृतक की  तस्वीर लगाई और शुरू हो गया रेस्ट इन पीस का सिलसिला ,मानों किसी अपने को ढाँढस बंधाने के लिए इतना काफी हो चंद शब्द और मानवता का हक अदा हो गया .सब कुछ इतना तकनीकी और व्यवस्थित होता जा रहा है कि मानो होड़ लगी हो जिन्दगी का जो सरप्राइज एलीमेंट है उसे ख़त्म करके ही दम लिया जायेगा . इसे गलत और सही के नज़रिए से न देखा जाए बस ये समझा जाये हम सूचना तकनीक के इस युग में कितने प्रत्याशित होते जा रहे हैं .सब कुछ कितना मशीनी होता जा रहा है.सोशल मीडिया सूचनाओं के आदान प्रदान और वैचारिक विमर्श के लिए एक क्रांतिकारी तकनीक है पर जिन्दगी के कठिन मसले आपसी लड़ाई झगडे के लिए तो यह जगह बिलकुल भी ठीक नहीं क्योंकि अपनी निजता को बचा कर रखने में हमारी भी कोई जिम्मेदारी बनती है .मेरे एक मित्र ने शादी से पहले स्टेट्स अपडेट किया इन रिलेशनशिप विद पर बात शादी तक नहीं पहुँची अब समाज के तरह तरह के सवालों से बचने के लिए अपने पुराने स्टेटस हटाने पड़े और लडकी की क्या स्थिति हुई होगी इसका सिर्फ अंदाज़ा लगाया जा सकता है .डिजीटल दोस्ती और दुश्मनी हमको एक व्यक्ति के तौर पर हल्का बना रहे हैं वहीं वर्च्युल सम्बन्ध पारस्परिक मेल मिलाप के अभाव में औपचारिकताओं के मोहताज़ बन कर रह जा रहे हैं.जिन्दगी जीने का असली मजा तो तभी है जब आपके पास दो चार ऐसे लोग हों जिनसे आप बगैर फोन किये कभी भी मिल सकते हों या अगर आप फेसबुक पर अपने मित्र को शुभकामना न भी दें तो सम्बन्धों पर कोई असर न पड़ें क्योंकि रिश्ते सोशल मीडिया के मोहताज नहीं होते हैं फिर वो सम्बन्ध ही क्या जिसका आपको ढिंढोरा पीटना पड़े और यही प्राइवेसी है जो मेरे हैं वो मेरे रहेंगे |
प्रभात खबर में 08/11/17 को प्रकाशित 

Monday, November 6, 2017

विचार मंथन से आशंका और उम्मीदों का जन्म

विमर्श के कई आयाम होते हैं और हर विमर्श नए विचार  का स्वागत बाँहें फैला करे यह जरुरी तो नहीं है ,पर यह यह संवादी की खूबसूरती ही है कि अभिव्यक्ति के इस आयोजन में  मौका तो था विधाओं के छूटते सिरे पर विमर्श का पर इस विमर्श से जो नए विचार निकले उनमें जहाँ ज्ञान की गंगोत्री थी तो कुछ आशंकाएं भी कुछ चिंता थी तो आने वाला वक्त आज से बेहतर होगा ऐसी एक उम्मीद भी |इस रिपोर्ट को लिखते वक्त मेरे बगल एक युवा बैठा था जो लगातार मंच पर बैठे वक्ताओं के बारे में पूछ ताछ कर रहा था |मुझे ख़ासा गुस्सा आ रहा था क्योंकि उसके सवालों के बीच मैं मंच पर हो रहे वार्तालाप के सिरे को खो दे रहा था |शायद उसका साहित्य से कोई लेना देना न हो पर मैंने उसे डानटा नहीं वो डेढ़ घंटे के इस सत्र में पूरी तल्लीनता से मंच पर मुद्दे को समझने की कोशिश करता रहा |आज भले ही उसे कुछ ख़ास समझ न आया हो पर उसकी जिज्ञासा ने मुझे यह उम्मीद जरुर दी कि संवादी जैसे कार्यक्रम आज के युवाओं में साहित्य के संस्कार के बीज जरुर बो जायेंगे |अगली बार शायद जब मैं उससे मिलूं तो वह सब कुछ न सही थोडा बहुत साहित्य के बारे में जरुर जान गया होगा |बहरहाल विधाओं के छूटते सिरे के बहाने साहित्य की उन विधाओं के बारे में चर्चा हो रही थी जो आजकल लुप्त सी होती जा रही हैं कारण कुछ भी हो सकता है तकनीक का बढ़ता प्रयोग ,उदारीकरण या इंसान का इस मशीनी दुनिया में लगातार अकेले होते जाना |इस चर्चा में भाग ले रहे थे अपनी अपनी साहित्यिक विधाओं के माहिर डॉ विनय कुमार ,डॉ सच्चिदानन्द जोशी, डॉ अजय सोडानी और मनीषा कुलश्रेष्ठ जबकि इस महत्वपूर्ण विषय के संचालन का शानदार दायित्व निभाया लीलाधर मंडलोई  ने |
बात शरू हुई हिन्दी  साहित्य  की विभिन्न विधाओं में आजकल क्या चल रहा है और बात का सिरा पकड़ा डॉ विनय कुमार ने दिनकर को याद करते हुए कि भावनाओं की मरोड़ से छंद पैदा होते हैं और इसी मरोड़ से साहित्य की अन्य विधाएं भी पैदा होती हैं स्रष्टि की शुरुआत में भावनाएं थी विचार नहीं इसलिए कविताएँ फिर समय बढ़ा विचार आये जिससे कहानियां निकलीं फिर उपन्यास और अन्य  विद्याएं |मशीनों ने जीवन की रफ़्तार बढ़ाई तो हमारी इच्छाएं भी तेजी से बढीं पर जब किसी भी चीज की रफ़्तार बढ़ती है तो परिदृश्य छूटने लगते हैं और ऐसा ही साहित्य की छूटती विधाओं के साथ हुआ ,पत्र लेखन की जगह अब ई मेल और व्हाट्स एप ने ले लिया है पर पत्र लिखने के अंत में जो हस्ताक्षर का कमिटमेंट हुआ करता था |अब वह गायब है |डॉ सचिदानंद ने कहा तकनीक केन्द्रित जीवन ने हमारे जीवन की गोलाइयों को खत्म कर दिया है |प्रकृति का संगीत सुनने की बजाय हम तकनीक का संगीत सुन रहे हैं |साहित्य का फ़ॉर्मेट बदल गया है |अखबारों की इस प्रव्रत्ति पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा भाव शब्द नाप के व्यक्त नहीं किये जा सकते |
डॉ अजय सोडानी ने कहा समाज का साहित्य पर असर पड़ता है पर साहित्य का समाज पर नहीं बल्कि व्यक्ति पर प्रभाव होता है |इस वक्त का समाज दो मनोविकार से ग्रस्त है पहला विकास का कि जो कुछ पुराना या उपलब्ध है उसे हटाकर नया बनाना है हम मानव सृजित प्रकृति में रहना चाहते हैं दूसरा समयाभाव हम हर चीज की जल्दीबाजी में और अगर ऐसा होगा तो कहानियां तीन सौ शब्दों में लिखी जायेंगी और कविताओं में से लय गायब हो जायेगी |
मनीषा कुलश्रेष्ठ ने माना उनके देखते देखते रेखाचित्र ,ललित निबंध ,पत्र लेखन धूमिल पड़ते गए और ब्लॉग पोर्टल की नई दुनिया ने जन्म ले लिया |विधाएं पग डंडियाँ हैं जो समय के साथ कुछ फॉर लेन  हो गयीं कुछ पर खर पतवार जम गयीं पर विधा एक ऐसी दादी है जो चाहती है कि सब अपने अपने घर बसा लें पर त्योहारों पर घर जरुर लौटें अगर ऐसा होता रहेगा तो विद्याएं आगे बढ़ती रहेंगी |
दैनिक जागरण में 06/11/2017 को प्रकाशित 

Saturday, November 4, 2017

महिलाओं के आने से राजनीति गंदा शब्द नहीं रह गया है

मौका था संवादी का और उत्सव अभिव्यक्ति का और मुद्दा आधी आबादी का “राजनीति ,महिला और सेक्स यह मुद्दे के प्रति सम्वेदनशीलता थी या जागरूकता पर महिलाओं से सम्बन्धित इस मुद्दे को सुनने वाले लोगों में पुरुष ज्यादा थे और माहौल में इतना सन्नाटा कि मानो कोई फिल्म चल रही हो |मंच पर थी प्रियंका चतुर्वेदी,प्रवक्ता कांग्रेस पार्टी  और पंखुरी पाठक,समाजवादी पार्टी  और संचालन का जिम्मा सम्हाल रखा था पत्रकार राखी बक्शी ने |बात शुरू हुई विषय के शीर्षक को लेकर कि राजनीति ,महिला और सेक्स क्यों हम पुरुषों के लेकर इस तरह की चर्चा क्यों नहीं करते? प्रियंका चतुर्वेदी का मानना था की अगर हम वाकई में समाज में बदलाव लाना चाहते हैं तो हमें राजनीति में आना ही पड़ेगा और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि नीतियां राजनीतिज्ञ ही बनाते हैं और जब उन्होंने राजनीति में आने की सोची तो उन्हें बिलकुल अंदाजा नहीं था कि वे किस क्षेत्र में जा रही हैं |जिसमें चारित्रिक हत्या से लेकर ट्रोलिंग जैसी समस्याओं से जूझना पड़ा |शुरुवात में वह डिप्रेशन में चली जाती थीं पर उन्हें लगा कि वे चुप नहीं बैठेंगी |बात राजनीति की हो या कोई और क्षेत्र भारत में महिलाओं को दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है और राजनीति में समस्या तब गंभीर हो जाती है जब आप किसी राजनैतिक परिवार से न आते हों |वैसे भी समाज में लोग लड़कियों के स्वतंत्र विचार और गुस्से को लोग स्वीकार नहीं करते और फिर वे आपके चरित्र के बारे में बातें करनी शुरू कर देते हैं |
पंखुरी पाठक का अनुभव भी कुछ ज्यादा अलग नहीं था वे अपनी पार्टी के मुखिया को यह श्रेय देती हैं कि अखिलेश यादव के समर्थन के बिना आज वहां नहीं होतीं जहाँ वह हैं |उनके पिता से शुरुआत में जब पूछा जाता कि उनकी बेटी क्या करती है तो उनके पास बताने के लिए कुछ नहीं होता था पर फिर भी उनके पिता ने उनका हौसला बनाये रखा |राजनीति में जितनी ज्यादा लड़कियां आयेंगी यह क्षेत्र अपने आप महिलाओं के लिए बेहतर होता जाएगा |किसी भी देश की राजनीति उसके समाज का आईना होती है और भारत भी इसमें अपवाद नहीं है पर महिलाओं को अपने हिस्से के हक के लिए लड़ना ही होगा और वो लड़ रही हैं इस पुरुषवादी समाज को एक बराबरी का समाज बनाने के लिए |यह देश की सारी महिलाओं की लड़ाई है |उन्हें भी सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ता है पर अब वे उसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लेतीं |
महिलायें में कम क्यों आती हैं इसका बड़ा सधा हुआ जवाब प्रियंका चतुर्वेदी का था समाज की समस्याएं अपनी जगह हैं पर राजनीति में न तो को जॉब सिक्योरटी है और न ही कोई निश्चित वेतन इनके अभाव में लड़कियां सुरक्षित विकल्प का रास्ता चुन लेती हैं इसलिए राजनीति के मुकाबले उन क्षेत्रों में जहाँ ये दोनों सुविधाएं मिलती हैं वहां लड़कियां बढ़ रही हैं |
पंखुरी का मानना था महिलाओं को हर कदम पर समाज को  इम्तिहान देना  पड़ता है और राजनीति अपवाद नहीं है खुबसूरत है तो क्यों खुबसूरत है और बदसूरत है तो उसकी अपनी अलग समस्याएं हैं मतलब आप बच नहीं सकतीं |
पर उम्मीद की किरण दोनों को दिखती है प्रियंका कहती हैं राजनीति में महिलाओं के आने से जहाँ अब राजनीति गन्दा शब्द नहीं रह गया है अब लोगों की राय बदल रही है |पंखुरी की राय भी कुछ ऐसी ही थी अब यदि सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल किया जाता है तो अब पुरुष भी उनके समर्थन में आगे आते हैं जो बता रहा है धीरे ही सही पर बदलाव की बयार बहनी शुरू हो गयी है |
दैनिक जागरण में 04/11/17 को प्रकाशित 

Wednesday, October 25, 2017

बराबरी का हक़ देने की व्यर्थ होती कोशिशें

लैंगिक समानता के हिसाब से आज की दुनिया में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर का अधिकार मिल चुका है पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है| जेंडर इनेक्वेलिटी इंडेक्स 2016 की  रिपोर्ट के अनुसार लैंगिक समानता सूचकांक में भारत का 159 देशों में 125 वाँ स्थान है|यह एक बानगी भर है जो महिला सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों के बारे में हमें चेताती है|देश में महिलाओं की भूमिकाउनकी,शिक्षास्वतंत्रताएवं देश के विकास में उनकी भागीदारी जैसे  मुद्दे मुखरता से केंद्र में रहते हैं पर इन सबके बीच एक गौर करने वाला आंकड़ा कहीं पीछे छूट जाता है वह आंकड़ा है कार्य क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी यानि रोजगार देने वाली वह जगहें वहां महिलाओं की भागीदारी कितनी है और उन आंकड़ों की नजर में भारत के कुल कामगारों में महिलाओं की भागीदारी निरंतर कम होती जा रही है।2011 की  जनगणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकले हैं| ब्रिक्स देशों जिसमें ब्राज़ीलरूस , चीन एवं दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं वहां  भी कुल कामकाजी महिलाओं की संख्या में भारत सबसे पीछे है। यहाँ तक की सोमालिया जैसा देश भी इस मामले में हमसे कहीं आगे है। वर्ष 2011 में श्रमिक बल में महिलाओं की कुल भागीदारी कुल 25 प्रतिशत के आसपास थी। ग्रामीण क्षेत्रों यह प्रतिशत 30 के लगभग एवं शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत केवल 16 के लगभग था। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के ज्यादा होने का कारण उनका कृषि से सम्बन्धित कार्यों में जुड़े होना जो ज्यादातर कम आय के होते हैं और ग्रामीण ढांचे में महिलाओं से उनको करने की उम्मीद की जाती है | महिलाओं के कार्यक्षेत्र में कम भागीदारी के बड़ी वजहें हमारे समाजशास्त्रीय ढांचे में है जहाँ महिलाओं के ऊपर परिवार का ज्यादा दबाव रहता है जिसमें शामिल है  महिलाओं की आगे की पढ़ाई,शादीबच्चों का पालन-पोषण एवं पारिवारिक दबाव। अर्थशास्त्रीय नजरिये से ग्रामीण भारत में  जो महिलाएं काम करती भी हैं उनमें से अधिकतर वही होती हैं जो आर्थिक रूप से निर्बल होती है और उनके पास और कोई चारा नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग अस्सी  प्रतिशत कामगार महिलाएं कृषि से संबंधित कार्यों में संलग्न हैं जबकि केवल 7.5 प्रतिशत के आसपास महिला कामगार औद्योगिक उत्पादन से जुड़ी हुई हैं। शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक महिला कामगार घरेलू सेवाओं से जुड़ी हुई हैं। भारत में अधिकतर महिला श्रमिक असंगठित क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं। यह वह क्षेत्र है जहां पुरुष कामगारों का भी हद से अधिक शोषण होता है तो महिला कामगारों की तो बात ही छोड़ दी जानी चाहिए । शहरी क्षेत्रों में भी सेवा क्षेत्र  जैसे विकल्प जहां महिलाओं के हिसाब से  काफी काम होता है वहां भी उनकी संख्या नगण्य है। यदि यान्त्रिकी अथवा वाहन उद्योग की भी बात की जाये तो वहाँ कोई महिला कामगार शायद ही मिले। शहरी क्षेत्रों में काम करने वाली अधिकतर महिलाएं अप्रशिक्षित हैं। साथ ही लगभग एक तिहाई शहरी महिला कामगार अशिक्षित हैं जबकि उसी सापेक्ष  पुरुषों की बात की जाए तो ऐसे पुरुषों की संख्या  महज ग्यारह प्रतिशत है। श्रमिक बल में महिलाओं की घटती संख्या का एक प्रमुख कारण है तकनीकी एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में उनकी बेहद ही कम संख्या का होना भी है । आंकड़े बताते हैं कि इस तरह के पाठ्यक्रमों में शामिल महिलाओं का प्रतिशत मात्र सात  है। जो महिलाएं इन पाठ्यक्रमों में आती भी हैं वे महिलाओं के लिए पारंपरिक रूप से मान्य पाठ्यक्रमों जैसे सिलाई-कढ़ाई एवं नर्सिंग आदि में ही दाखिला लेती हैं। शहरी क्षेत्रों में केवल 2.9 प्रतिशत महिलाओं को ही तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त है। जो कि पुरुष कामगारों की तुलना में आधे से भी कम है। अखिल भारतीय उच्चतर शिक्षा सर्वेक्षण की वेबसाईट पर दिए गए   आंकड़ों के अनुसार स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में महिलाओं की लगभग तिहत्तर  प्रतिशत संख्या  है जबकि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में यह प्रतिशत घटकर मात्र  सत्ताईस ही रह जाता है। ऐसी  स्थिति में महिला कामगारों के संगठित क्षेत्रों में काम करने की संभावनाएँ काफी कम हो जाती हैं। इंडियास्पेण्ड्स वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार कई राज्यों में उच्च शिक्षा को बीच में ही छोड़ने वाली महिलाओं की संख्या में इजाफा हो रहा है। अपेक्षाकृत अमीर राज्य जैसे केरल एवं गुजरात भी इस चलन से अछूते नहीं हैं यानि आर्थिक रूप से अगड़े राज्य भी लैंगिक असमानता के शिकार हैं । भारत सरकार के नीति आयोग के अंतर्गत कार्य करने वाले इंस्टीट्यूट फॉर अप्लाइड मैनपावर एंड रिसर्च के द्वारा कराये गए शोध के अनुसार तकनीकी पाठ्यक्रमों में कम भागीदारी एवं उच्च-शिक्षा को बीच में ही छोड़ देने की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण ही महिलाओं के तकनीकी श्रमिक बल में योगदान में भी कमी आ रही है।मातृत्व की भूमिकाचूल्हे-चौके की ज़िम्मेदारीसामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रतिबंध एवं पितृसत्तात्मक मान्यताओं और परम्पराओं  की वजह से भी श्रमिक बल में महिलाओं की संख्या घटती जा रही है। शिक्षा जारी रखने एवं विवाहोपरांत प्रवसन भी कुछ हद तक कामगारों में महिलाओं की घटती संख्या के लिए जिम्मेदार हैं। महिलाओं का रोजगार उनके आर्थिक एवं सामाजिक उत्थान का एक महत्वपूर्ण कारक है। श्रमिक बल में महिलाओं की घटती संख्या नीति निर्धारकों के लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि यदि यही स्थिति रही तो महिला सशक्तिकरणलिंगभेद उन्मूलन एवं महिलाओं को समाज में बराबरी का हक देने की सारी सरकारी और गैर सरकारी कोशिशें व्यर्थ हो जाएंगी ऐसे में जिस भारत का निर्माण होगा वैसे भारत की कल्पना  तो किसी ने भी न की होगी । अतः यह आवश्यक है की न सिर्फ असंगठित बल्कि संगठित क्षेत्रों के कामगारों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाएँ जाएँ।    
आई नेक्स्ट में 25/10/17 को प्रकाशित 

Wednesday, October 18, 2017

डिजीटल भारत में कंप्यूटर शिक्षा

नब्बे के दशक में स्कूली शिक्षा में पुस्तक कला जैसे विषयों को हटाकर कंप्यूटर शिक्षा को स्कूली शिक्षा का अंग बनाया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि दो हजार के शुरुआती दशक में ही भारतीय परचम इस क्षेत्र में लहराने लगा जिससे कई सारी मध्यम वर्गीय सफलता की कहानी बनी जैसे की इन्फ़ोसिस और अन्य स्वदेशी  कम्पनियां जिन्होंने लाखों युवाओं को इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया पर यह सफलता की कहानियां लम्बे समय तक जारी नहीं रह सकीं  |भारत में  सूचना प्रौद्योगिकी  का बाजार एक सौ पचास बिलियन डॉलर का है जो भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 9.5 प्रतिशत है और पूरी दुनिया में 3.7 मिलीयन लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा  है |अर्थव्यवस्था को इतना महतवपूर्ण योगदान देने वाला क्षेत्र आज उत्पादकता के लिहाज से इसलिए पिछड़ रहा है क्योंकि भारत की कंप्यूटर शिक्षा में नवोन्मेष की भारी कमी है और यह बाजार की मांग के हिसाब से खासी पिछड़ी हुई है | तकनीक पर बढ़ती इस   निर्भरता को अनवरत और लाभ उठाने वाला तभी बनाया जा सकता है जबकि सूचना प्रौद्योगिकी  शिक्षा का अभ्यास कॉलेज और स्कूली स्तर पर ज्यादा अद्यतन तरीके से कराया जाए | स्कूल स्तर  पर कंप्यूटर शिक्षा पर दो तरह की समस्याओं का शिकार है| पहला स्कूलों में अभी भी फोकस एम् –एस वर्ड,एक्सेल,पावर प्वाईंट आदि पर है |दूसरा कंप्यूटर की प्राथमिक भाषाओँ को सिखाने में सारा जोर “बेसिक” और “लोगो” जैसी भाषाओं पर ही है |एक समय की अग्रणी कंप्यूटर भाषाएँ जैसे सी, लोगो ,पास्कल ,कोबोल बेसिक ,जावा जो की अब चलन से बाहर हो चुकी हैं अभी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं जबकि कंप्यूटर प्रौद्योगिकी में अग्रणी देश ओपेन सोर्स सोफ्टवेयर और ओपन सोर्स लेंग्वेज को अपना चुके हैं जैसे कि  आर , पायथॉन  रूबी  ऑन  रेललिस्प टाइप स्क्रिप्ट कोटलिन स्विफ्ट और रस्ट इत्यादि |यह भाषाएँ  सी, लोगो ,पास्कल ,कोबोल बेसिक ,जावा के मुकाबले ज्यादा संक्षिप्त,सहज और समझने में आसान हैं |इन भाषाओँ के प्रयोग से किसी भी काम को कल्पना से व्यवहार में बड़ी आसानी से लाया जा सकता है |उल्लेखनीय है की यह भाषाएँ ही हैं जिनसे एक कोड का निर्माण कर किसी भी काम को करने के लिए सोफ्टवेयर का निर्माण किया जाता है |महत्वपूर्ण है कि ये भाषाएँ उन क्षेत्रों में भी ज्यादा काम की हैं जो आजकल बहुत मांग में है जैसे कि “आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस”, रोबोटिक्स आदि|
भविष्य की दुनिया तकनीक और ऑटोमेशन की है जहाँ सभी प्रकार के उद्योग धंधे और व्यवसाय सॉफ्टवेयर आधारित होंगे | आज हर उद्योग  किसी न किसी रूप में सूचना प्रौद्योगिकी की सहायता से चल रहा है  वो चाहे निर्माण,परिचालन ,भर्ती हो या लेखा सभी कम्प्युटरीकृत होते जा रहे हैं  और उपभोक्ता भी पहले के मुकाबले आज निर्णय और खरीदने की प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है |अब कंप्यूटर कौशल और उसकी भाषाएँ आधारभूत जरूरतें हैं | कंप्यूटर की उच्च शिक्षा का और भी बुरा हाल है |शिक्षण संस्थान प्रायोगिक कार्य और वास्तविक कोड निर्माण नहीं करवा पा रहे हैं इसलिए जब कोई कम्प्यूटर स्नातक किसी नौकरी में आता है तो वह अपनी कम्पनी में  इन कार्यों को  सीखता है जिससे कम्पनी पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और बहुत समय नष्ट होता है |
 साल 2011 में आयी नासकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के  मात्र 25 प्रतिशत आई टी इंजीनियर  स्नातक ही रोजगार के लायक थे पर छ साल बाद स्थिति और खराब हुई है | अस्पाएरिंग माईंड स्टडी की एक रिपोर्ट स्थिति की गंभीरता की ओर इशारा करती है ,रिपोर्ट के अनुसार भारत के पांच  प्रतिशत कंप्यूटर इंजीनियर ही  उच्च स्तर की प्रोग्रामिंग के लिए उपयुक्त  हैं |यह रिपोर्ट उस समय आयी है जब ग्राहकों की मांग लगातार बढ़ रही है |तेजी से डिजीटल होते भारत में जब रोजगार के नए क्षेत्र तेजी से ऑनलाईन दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं जिनमें कपडे प्रेस करने से लेकर टूटे नल को ठीक करने वाले प्लंबर जैसे काम भी  शामिल हैं  ये बताते हैं कि इस क्षेत्र में काम के अवसर और तेजी से बढ़ते रहेंगे |नई-नई  तकनीक और तकनीकी नवोन्मेष को भारतीय कौशल की विचार शक्ति में लाने के लिए ज्यादा मुक्त और उन्नत कंप्यूटर शिक्षा की तरफ बढना ही एकमात्र समाधान है अन्यथा एक वक्त में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अगुआ बनकर उभरे भारत के लिए प्रतिस्पर्धा के बाजार में टिकना सम्भव नहीं होगा |

अमर उजाला में 18/10/17 को प्रकाशित 

Tuesday, October 17, 2017

साहित्य का संसार

इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार ब्रिटिश लेखक काजुओ इशिगुरो को देने का एलान किया गया है वैसे नोबेल किसी साहित्यकार के उत्कृष्ट होने का पैमाना नहीं है पर भारत में हिन्दी साहित्य कहाँ पिछड़ जाता है?ये सवाल उमड़ते घुमड़ते मुझे मेरे बचपन में ले गए,एक निम्नवर्गीय परिवार में पढने के संस्कार क्या होते हैं इसका पता मुझे कभी नहीं चला|यहाँ पढ़ाई का मतलब सिर्फ पाठ्यक्रम की किताबें थीं,या फिर कुछ पत्रिकाएं जो नियमित अंतराल पर लगातार तो नहीं ही मिलती थीं पर उसमें भी राशनिग थी|गृहशोभा ,मनोरमा जैसी पत्रिकाएं नहीं पढ़ सकता था|भले ही वो घर में इधर उधर छितरायीं पडी रहती हों |मैं उस दिन को याद करके आज भी दुःख से भर उठता हूँ कि मैं अपने जीवन की पहली कविता सम्हाल न सका,शायद तीसरी कक्षा में था गर्मियों की छुट्टी में स्कूल की बेकार डायरी में कार्बन लगा के अपनी माता जी के ऊपर एक कविता लिखी थी,वो कविता तो मुझे नहीं याद है पर वो थी बहुत अच्छी क्योंकि घर में सबसे सराहना मिली थी फिर बात आई गयी हो गयी|हमें यही सिखाया गया पढो तो कोर्स की किताबें,क्लास छ में मुझे उपन्यास पढने का चस्का लगा पर रानू और गुलशन नंदा के उपन्यास पढ़ते हुए जब मैं पकड़ा गया तो घर में काफी ज़लील होना पड़ा|अपने शैक्षिक जीवन की सीढीयाँ चढ़ते हुए,पाठ्यक्रम में प्रस्तावित साहित्य के अलावा हमारे जीवन में साहित्य कहीं था ही नहीं|साहित्यक किताबों पर खर्च पैसे की बर्बादी माना जाता था घर का ऐसा माहौल पता नहीं पैसे की कमी के कारण था या माता पिता के कम पढ़े लिखे होने के कारण,या बेटे को किसी तरह एक अदद सरकारी नौकरी के लायक बना देने के कारण पर आठवीं क्लास तक मेरे लिए  साहित्य का मतलब प्रेम चन्द,महादेवी वर्मा आदि ही था वो तो भला हो नवीं कक्षा में छात्रवृत्ति मिल गयी और मैं भारत के उन गिने चुने विदयालय में पहुँच गया जिसका पुस्तकालय आज भी मेरे सपने में आता है जिसने दुनिया भर के साहित्य से मेरा परिचय कराया पर पढने(साहित्य) का संस्कार न होने के कारण लम्बे समय तक इस समस्या जूझता रहा कि क्या पढूं और पाठ्यक्रम से इतर किताबे पढने से कहीं मैं अपना भविष्य तो नहीं चौपट कर रहा हूँ | यह शर्म लम्बे समय तक मुझे द्वन्द में फंसाए रखती थी जिससे उन दिनों मैं कभी पढने का लुत्फ़ नहीं उठा पाया पर पढने के संस्कार देर से ही सही मिलने लग गए और इस बात का अहसास भी कि अगर अच्छा लिखना है तो पहले पढना सीखना होगा अब ये तो नहीं पता कि मैं लिखना कितना सीख पाया हूँ पर पढ़ना जरुर सीख गया हूँ देर से ही सही पर मेरे जैसा भाग्य भारत के कितने लोगों को नसीब होता है जो कम से कम साहित्य पढने का सलीका ही सीख पायें |
प्रभात खबर में 17/10/17 को प्रकाशित 

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