Tuesday, April 11, 2017

यादें बहुत याद आती हैं

यादें भी कैसी कैसी याद आ जाती है। आजकल विकास की चर्चा खूब हो रही है बात ज्यादा पुरानी भी नहीं है ।हमारे घर में हैण्डपम्प लगा था और उसी से पूरे घर का काम चल जाता था फिर एक दिन पानी का कनेक्शन ले लिया गया लगा जिंदगी खूबसूरत हो गयी अब रोज हैण्डपम्प से पानी निकालने की ड्यूटी का झँझट खत्म हो गया।एक छोटे से टब में थोड़ा पानी जरूर इकट्ठा रखा जाता था वैसे भी नल में चौबीस घंटे पानी आता था फिर पानी आने का समय निर्धारित हो गया तो टंकी खरीदी गयी कुछ दिनों तक ड्रम से काम चला पर विकास के इस मॉडल में ड्रम बिलो स्टैंडर्ड था तो टीवी पर विज्ञापन देखकर सिंटैक्स की टंकी खरीदी गई और हमने अपना स्टैण्डर्ड मोहल्ले में ऊँचा किया |उधर नल में पानी लगातार कम होता जा रहा था तो फिर विकास की राह पर चलते हुए एक मोटरपम्प खरीदा गया जिससे जितनी देर भी पानी आता है उतनी देर में ज्यादा से ज्यादा पानी इकट्ठा कर लिया जाए ,(बढ़ते बिजली के बिल की कीमत पर )भले ही वह  लोग परेशान हों जो मोटरपम्प न खरीद सकते हों और आर्थिक द्रष्टि से ऊँचे पायदान पर न हों ।अब घर का खाना उतना मजेदार नहीं होता था जो मां प्यार से किचन में पीढ़े पर  बैठाकर खिलाती थी | कहीं किसी भी नल में चुल्लू लगाकर पानी पी लेना असभ्यता की निशानी माना जाने लग गया ।हम भी बड़े होकर कमाने लग गए और होटल में जब वेटर डब्बा बंद पानी  की बोतल रख जाता तो मारे शर्म के ये न कह पाते कि सामान्य पानी लाओ पता तो लगे हम जिस शहर में बैठे हैं उसके पानी का स्वाद कैसा है ?आखिर हम वेटर के सामने अपने आपको बिलो स्टैण्डर्ड नहीं दिखाना चाहते थे तो डब्बा बंद पानी अपनी आदत में शुमार करते चले गये और विकास की अंधी दौड़ में पानी भी ग्लोबलाइज्ड हो रहा था ।डब्बा बंद पानी भी ब्रांड देखकर पीने लगे थे क्योंकि फलाना ब्रांड का पानी ज्यादा मंहगा और उसका विज्ञापन भी ज्यादा आता है तो वही पानी अच्छा होगा |अब नल का  पानी ज्यादा देर नहीं आता और बोतलबंद पानी का बाजार दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा था ।हम भी विकसित होने की चाह में और पानी की गुणवत्ता खराब होने के कारण इस विकास की दौड़ में शामिल हो गए और नल के पानी में डिब्बा बंद पानी का स्वाद तलाशने लगे   ।नतीजा एक एक वाटर प्यूरीफायर हमारे रसोई घर  की शोभा बढ़ाने लग गया ।जमाना काफी तेज़ी से बदल रहा था ।पीलिया हैजा जैसी जल जनित बीमारी के बढ़ने की ख़बरें लगातार बढ़ने लग गईं | टीवी लगातार डरा रहा था कि सिर्फ वाटर प्यूरीफायर से काम न चलेगा तो अब आर ओ लगाइये जो मिनरल पानी में होने चाहिए वो तो हमने विकास की दौड़ में गंवा कर पानी को प्रदूषित कर दिया है तो मजबूरी में एक मंहगा  एक आर ओ लगवाना पड़ा ।आर ओ हमारे घर पर लगी टंकी का पानी साफ़ करके हमको देता है और जितनी देर आर ओ पानी साफ़ करता है उसकी पाईप से साफ़ पानी जैसा कुछ लगातार नाली में बहता रहता है |यह वह पानी है जो पीने के लिए लाभदायक नहीं है पर घर के अन्य काम जैसे गाडी धोना, पोंछा लगाना ,पौधों को पानी देने में इस्तेमाल हो सकता है |नाली में बह जाता है |आर ओ बनाने वाली कम्पनी इस गंदे पानी को सहेजने का कोई विकल्प नहीं देती |पर आर ओ की टंकी से निकला पानी बिलकुल किसी डिब्बेबन्द पानी जैसा लगता है और अमीर होने का फील आता है जैसे हम घर में बिसलरी पी रहे हों ।वाकई हम बहुत तेजी से विकसित हो रहे हैं ।क्या करें ये चालीस पार का जीवन भी अजीब है सचमुच यादें बहुत याद आती हैं ।
प्रभात खबर में 11/04/17  को प्रकाशित 

Saturday, April 8, 2017

स्मार्टफोन और हमारा सामाजिक अर्थशास्त्र

भारत सचमुच विचित्रताओं का देश है। जहां पूरी दुनिया में स्मार्टफोन की मांग लगातार बढ़ रही है, वहीं भारत में फीचर फोन अब भी लोगों की पहली पसंद हैं, जो 2-जी नेटवर्क पर काम करते हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नोकिया अपने सस्ते फीचर फोन 3310 के साथ भारत में पुन: वापसी कर रही है, ताकि वह उन भारतीय ग्राहकों को लुभा सके, जो महंगे स्मार्टफोन नहीं खरीद सकते। सिंगापुर, ताईवान व ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जहां 2-जी नेटवर्क को अलविदा कह दिया है, वहीं भारत में 2-जी नेटवर्क के सहारे साधारण फीचर फोन कम कीमत, ज्यादा बैटरी लाइफ, संगीत सुनने की सुविधा व बेसिक इंटरनेट सेवा के साथ भारत में लोगों को ऑनलाइन जोड़ रहा है।फीचर फोन से तात्पर्य उन मोबाइल फोन से है, जिनका प्रयोग वॉयस कॉलिंग और टेक्स्ट मैसेज के लिए किया जाता है। इसके अलावा इनमें बेसिक मल्टीमीडिया सुविधा होती है, जिससे ऑडियो-वीडियो सुविधाओं का आनंद उठाया जा सकता है। ये बहुत कम कीमत में उपलब्ध हैं। वहीं पर स्मार्टफोन इंटरनेट आधारित हैं, जो बात करने के अलावा इंटरनेट की दुनिया में एप सुविधाओं के साथ असीमित विकल्प देते हैं। ये फीचर फोन के मुकाबले महंगे होते हैं और इनकी परिचालन कीमत भी महंगी होती है। ये टच स्क्रीन सुविधा पर चलते हैं।
वैसे भी, शहरों में देखा गया है कि आजकल लोग दो फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं- साधारण फीचर फोन बात करने के लिए और इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए स्मार्टफोन। आंकड़ों की रोशनी में यह तथ्य ज्यादा स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। मोबाइल मार्केटिंग एसोशिएशन व मार्केट रिसर्च फर्म कन्टर आईएमआरबी के देश के आठ शहरों में किए गए शोध से यह निष्कर्ष निकला है कि फीचर फोन धारकों में से मात्र 15 प्रतिशत उपयोगकर्ता अपनी अगली फोन खरीद में अपने फोन को स्मार्टफोन में बदलना चाहते हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, इस वक्त 85 प्रतिशत शहरी भारतीय मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहा है, पर इनमें से 56 प्रतिशत फीचर फोन ही इस्तेमाल कर रहे हैं। फीचर फोन की बढ़ती लोकप्रियता का बड़ा कारण भारतीय परिस्थितियों में इनका एक औसत भारतीय के लिए सस्ता होना, दूसरा बिजली की कम उपलब्धता और स्मार्टफोन की बैटरी का जल्दी से खर्च होना है, जिससे उनको बार-बार चार्ज करना पड़ता है। वहीं फीचर फोन की बैटरी एक बार चार्ज करने के बाद लंबे समय तक चलती है।
फीचर फोन पुश बटन पर चलते हैं, जिसको चलाने के लिए किसी तरह की विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होती है। यहां फोन का मतलब बातें करना और मैसेज भेजना भर है। अशिक्षा की वजह से इंटरनेट की बेसिक सुविधाओं का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता। लोगों के फीचर फोन पर इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग न करने की एक बड़ी वजह इंटरनेट पर अब भी क्षेत्रीय भाषाओं में उतना कंटेंट नहीं है, जितना अंग्रेजी में है, और भारत का बड़ा तबका अब भी अशिक्षित है। इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में है, जबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से भी कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं में, जो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैं, इंटरनेट सामग्री क्रमश: 0.8 और 0.1 प्रतिशत उपलब्ध है। बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति व अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैं, वह उल्लेखनीय जरूर है, मगर भारत की भाषाओं में जैसी विविधता है, वह इंटरनेट में नहीं दिखती। आज 40 करोड़ भारतीय अंग्रेजी भाषा की बजाय हिंदी भाषा की ज्यादा समझ रखते हैं, लिहाजा भारत में इंटरनेट को तभी गति मिल सकती है, जब इसकी अधिकतर सामग्री हिंदी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में हो।स्मार्टफोन टच सक्रीन सुविधा से युक्त होते हैं। इनको चलाने के लिए थोडे़ अभ्यास की जरूरत पड़ती है। जाहिर है, तकनीक की सुलभता ही लोगों को उसके इस्तेमाल के लिए प्रेरित नहीं करती, बल्कि इसके पीछे प्रयोगकर्ता की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि भी काफी जिम्मेदार होती है। इसलिए फीचर फोन से स्मार्र्टफोन की तरफ एक आम भारतीय तब ज्यादा तेजी से बढ़ेगा, जब उसके आस-पास की परिस्थितियां बदलेंगी।
हिन्दुस्तान में 08/04/17 को प्रकाशित 

Tuesday, April 4, 2017

अपने हिस्से का पानी बचाएं

भारत विकास का जाप करते हुए एक ऐसी राष्ट्रीय आपदा के मुहाने पर आ चुका है जहाँ से पीछे लौटना मुश्किल दिख रहा है |हमारे आप के जीवन से जुड़ा अहम् मुद्दा जल का है पर दशकों के कुप्रबंधन और राजनैतिक इच्छा शक्ति का अभाव और नेताओं में दूरगामी सोच का अभाव यह सब मिलाकर भारत में जल संकट को और भयावह बना रहा है |इन गर्मियों में भारत अब तक के सबसे बड़े जलसंकट का सामना करेगा |राज्यों के बीच नदियों के जल को लेकर झगडे लगातार बढ़ रहे हैं |हालत यह है कि हर झगडे में देश के सर्वोच्च न्यायालय को दखल देना पड़ रहा है |देश में चार केन्द्रीय संस्थाएं हैं जो भूजल विनियमन में काम कर रही हैं लेकिन सम्पूर्ण भारत के जल संसाधन का कोई केंद्रीयकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है |साल 2016 में संसद की जल संसाधन स्टैंडिंग कमेटी ने एक राष्ट्रीय भूजल संसाधन डाटा बेस बनाने की संस्तुति की जिसे हर दो साल में अपडेट किया जाएगा ,पर व्यवहार में कुछ ठोस काम नहीं हुआ |देश के किसी भी शहर में पाईप द्वारा चौबीस घंटे स्वच्छ पानी देने की व्यवस्था नहीं है |इस समस्या की जड़ में हमारा लालच और सरकारों में दूरंदेसी की कमी साफ़ दिखती है जिसमें विकास समावेशी न होकर एकांगी हो गया है |भूजल निकासी के लिए कोई पर्याप्त कानून के न होने से जल के अवैध निकासी को बल मिला |बढ़ते शहरीकरण ने शहरों में वर्षा जल के पर्याप्त संरक्षण में कमी की जो शहरीकरण से पहले प्राकृतिक रूप से जमीन की मिट्टी में चला जाता था | नतीजा शहरों में गर्मी का लगातर  बढ़ना इण्डिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार भारत के शहर लगातार गर्म होते जा रहे हैं कोलकाता में पिछले बीस सालों में वनाच्छादन 23.4प्रतिशत से गिरकर 7.3 प्रतिशत हो गया है वहीं निर्माण क्षेत्र में 190 प्रतिशत की वृद्धि हुई है साल 2030 तक कोलकाता के कुल क्षेत्रफल का मात्र 3.37प्रतिशत हिस्सा ही वनस्पतियों के क्षेत्र के रूप में ही बचेगा |अहमदाबाद में पिछले बीस सालों में वनाच्छादन 46 प्रतिशत से गिरकर 24 प्रतिशत पर आ गया है जबकि निर्माण क्षेत्र में 132 प्रतिशत की  वृद्धि हुई है साल 2030 तक वनस्पतियों के लिए शहर में मात्र तीन प्रतिशत जगह बचेगी |भोपाल में पिछले बाईस वर्षों में वनाच्छादन छाछट प्रतिशत से गिराकर बाईस प्रतिशत हो गया है और 2018 तक यह वनाच्छादन ग्यारह प्रतिशत रह जाएगा |वनों में कमी का मतलब वर्षा में कमी जो अंत में जल की कमी के रूप में समाने आता है | सतह के ऊपर के जल की स्थिति बहुत खराब है वहीं जमीन के अंदर के जल की स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है |कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग ने जहाँ को प्रदूषित किया है वहीं उसके नीचे संचित  जल को भी नहीं छोड़ा है |शहरों में स्वच्छ जल की तलाश में वाटर प्यूरीफायर के व्यवसाय को पर लगा दिए हैं पर वाटर प्यूरीफायर पानी साफ़ करने के लिए कितना पानी बर्बाद कर रहे हैं इसकी बानगी मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी और क्म्प्रेहिंसिव इनीशिएटिव ऑन टेक्नोलॉजी इवाल्यूशन के संयुक्त शोध में मिलती है जो अहमदाबाद में हुए इस शोध के अनुसार छबीस लीटर पीने का पानी प्राप्त करने के लिए चौहत्तर लीटर नमकीन पानी को बहा दिया गया | कोई भी आर ओ उत्पादक इस बर्बाद हुए पानी को सहेजने का विकल्प उपभोक्ताओं को नहीं देता है जबकि इस पानी का इस्तेमाल नहाने पेड़ों को पानी देने और पीने के अलावा अन्य कार्यों में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है |विकास का एक पक्ष ये भी है जिसमें जल जैसे कीमती संसाधन को यूँ ही बर्बाद किया जा रहा है |भारत में शहरीकरण बढ़ रहा है इसके लिए कोई शोध करने की आवश्यकता नहीं और शहरीकरण की पहली शर्त पक्के निर्माण जिसमें भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है पर भारत का कोई कानून इस निर्माण में होने वाले भू जल (पढ़ें पेयजल ) के इस्तेमाल के तौर तरीकों के विनियमन पर स्पष्ट नहीं है | जिसका परिणाम पानी के लगातार और नीचे जाने में आ रहा है |धनी लोग जल के ऊपर सरकार के ऊपर निर्भर नहीं रहना चाहते इसलिए वे शहरों में अंधाधुंध बोरिंग (सबमर्सिबल पम्प ) लगा कर जल की अवैध निकासी कर रहे हैं जिनका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं हैं |नतीजा आय की द्रष्टि से दुर्बल लोग पानी के लिए सरकार द्वारा नल की सप्लाई वाले पानी पर निर्भर हैं जिसके समय में लगातार कमी आती जा रही है और वे कम और खराब गुणवत्ता वाले पानी के प्रयोग के लिए अभिशप्त हैं | जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 2001 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता के  आंकड़ों के सन्दर्भ में 2025 तक इसमें छतीस प्रतिशत की कमी आयेगी वहीं 2050 तक जब भारत की जनसँख्या 1.7 बिलियन होगी साठ प्रतिशत प्रति व्यक्ति कम जल की उपलब्धता  होगी |चेतावानी की घंटी बज चुकी है अब यह हमें तय करना है हम प्रकृति के साथ सबका विकास चाहते हैं या ऐसा विकास जो सिर्फ आर्थिक रूप से समर्द्ध लोगों के लिए हो |
अमर उजाला में 04/04/17 को प्रकाशित 

Tuesday, March 21, 2017

नेट न्युट्र्लटी के लिए खतरा बनकर आया ऐड ब्लॉकिंग

माध्यम कोई भी हो जब तक उसे विज्ञापन का साथ नहीं मिलता तब तक उसका विस्तार सम्भव नहीं है|माध्यमों की प्रगति का यह सफर टीवी अखबार से होते हुए आज इंटरनेट तक पहुँच गया है और अब हम इंटरनेट विज्ञापनों के साथ जीना सीख ही रहे हैं पर बाजार इंटरनेट के माध्यम से कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा लेना चाहता है|असल में कंटेंट की दृष्टि से  टीवी और अखबार के मुकाबले इंटरनेट अपने चरित्र में ज्यादा लचीला है  इसलिए इंटरनेट विज्ञापनों से भर उठा है अन्य माध्यमों की तरह इंटरनेट पर विज्ञापनों का नियमन करना लगभग असंभव है लेकिन भारत जहाँ इंटरनेट क्रांति का अगुआ बन कर उभर रहा है वहीं भारतीय उपभोक्ता इंटरनेट पर विज्ञापनों के इस्तेमाल में  जागरूक उपभोक्ता बन कर भी उभर रहे हैंपेजफेयर संस्था द्वारा एक अध्ययन में  पाया गया किमार्च  2016  तक भारत में 122  मिलियन भारतीय स्वतंत्र रूप से मोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग का इस्तेमाल कर रहे थेभारत जैसा विकासशील देशऐड ब्लॉकिंग उपयोग के सन्दर्भ मेंदुनिया में  दूसरे स्थान पर हैजबकि चीन पहले स्थान पर है | जहाँ  दिसम्बर 2015 में 275 मिलियन लोग सारी दुनिया में मोबाइल ऐड ब्लॉकर तकनीक का इस्तेमाल  कर रहे थेवहीँ दिसम्बर 2016 में यह आंकड़ा  बढ़कर  615 मिलियन हो गया जिनमें बासठ 62 प्रतिशत लोग अर्थात 380 मिलियन लोग यह तकनीक मोबाइल में इस्तेमाल कर रहे थे |यनि सारी दुनिया में यह बढ़त तीस प्रतिशत रही |
ऐड ब्लॉकिंग एक प्रकार का सॉफ्टवेर है जो मोबाइलडेस्कटॉप स्मार्ट फ़ोन तथा टेबलेट आदि डिजिटल उपकरणों पर वेबपेज और वेबसाइट आदि के द्धारा  आने वाले अनचाहे विज्ञापनोंपॉपअप और स्पैम को रोकता है |
वेब सर्फिंग करते वक्त हमारे स्मार्टफोन पर अचानक कई ऐसे अनचाहे विज्ञापन आ जाते हैं जिनका हमारी खोज रुचियों से कोई लेना देना नहीं होता है |यह अनुभव मानसिक रूप से कष्टदायी और आर्थिक रूप से डाटा और धन का नाश करने वाला होता है जिसमें हमारी अनुमति के बगैर हमें अनावश्यक विज्ञापन झेला दिए जाते हैं |
ऑनलाइनलाइन विज्ञापन के इस संसार में दो तरह विज्ञापन प्रदाता होते हैं पहले जिनके प्लेटफोर्म  का इस्तेमाल करते हुए ऑनलाइन विज्ञापन दिए जाते हैं जैसे फेसबुक,गूगल और यूट्यूब आदि जो खुद कोई कंटेंट नहीं बनाते और दूसरों के कंटेंट का इस्तेमाल करते हुए अपनी पाठक /दर्शक संख्या बढ़ाते हैं |दूसरे हमारी डिवाईस में किसी और उत्पाद के साथ आ जाते हैं इसमें कुछ मेल वायर और स्पाई वायर भी हो सकते हैं जो किसी डिवाईस और डाटा के लिए हानिकारक होते हैं |ऐसे विज्ञापन जो उपभोक्ता की परोक्ष स्वीकृति के बगैर आ जाते हैं ज्यादा कष्टप्रद होते हैं क्योंकि यह इंटरनेट पर हमारे काम में बाधा डालते हैं इनका स्थान और वक्त निश्चित नहीं होता और ये अस्वाभाविक लगते हैं क्योंकि इनके लिए उपभोक्ता मानसिक रूप से तैयार नहीं होता ऐड ब्लॉकिंग ब्राउज़र से पेज स्पीड मे काफी तेज़ी आ जाती है क्योंकि अनावश्यक कंटेंट पहले ही ब्लॉक कर दिया जाता है और इसी रणनीति के तहत मोबाईल फोन बनाने वाली कम्पनियों ने एड ब्लॉकर सॉफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनियों के साथ समझौता करना शुरू कर दिया है इससे वे उन्हीं कम्पनियों के विज्ञापन अपने फोन पर दिखाएंगी जिनसे उनका करार है पर तस्वीर का दूसरा रुख भी है |एड ब्लॉकर के ज्यादा इस्तेमाल से ऑनलाईन विज्ञापनों से होने वाली आय पर असर पड़ेगा जिसमें वीडियो गेम बनाने वाली कम्पनियां प्रमुखता से प्रभावित हो रही हैं|दूसरा खतरा  नेट न्युट्र्लटी को है जिसमें सूचना सम्बन्धी विज्ञापन आते हैं  जो भी समाग्री इन्टरनेट पर अपलोड होगीकोई ज़रूरी नहीं कि वह  उपभोक्ता के  सर्च करने पर देखी ही  जा सकेकारण मोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग,वह  केवल उन्हीं विज्ञापन साइट्स को प्रदर्शित करेगा जिन कम्पनियों  का टाईअप मोबाइल ब्राउज़र से हो चुका हैमोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग के चलते केवल टाईअप साइट्स ही प्रदर्शित होगी वहीँ  बाज़ार का एक बड़ा हिस्सा जो बिना किसी शुल्क के मुफ्त  में  इन्टरनेट और सोशल मीडिया के द्वारा  अपने प्रोडक्ट का प्रचार कर रहे था वो इससे महरूम रह जायेगेऔर यह तकनीकी बदलाव नेट नेट न्युट्र्लटी को खत्म कर सकती है इस मौक़े का फायद गूगल जैसी सर्च इंजन और सोशल मीडिया उठाने साइट्स के लिए तैयार है |
हिन्दुस्तान में 21/03/17 को प्रकाशित लेख 

Thursday, January 12, 2017

दादी के जमाने के दस बर्तन जो अब किचन में कम दिखते हैं

किचन घर का वो हिस्सा जिसके इर्द गिर्द हमारा पूरा घर घूमता है और जहाँ दिन भर में एकाध बार सभी का आना जाना होता है |मैं भी कुछ अलग नहीं हूँ मेरा भी अपने घर की किचन में आना जाना होता ही रहता है पर इस ठिठुरती ठंड में इन दिनों किचन के चक्कर ज्यादा लग रहे हैं क्योंकि गर्म पानी शरीर को ज्यादा राहत देता है ऐसे ही एक दिन जब पानी गर्म करने के लिए मैं गैस का लाईटर खोज रहा है और इस चक्कर में किचन को कुछ ज्यादा ही करीब देखने का मौका लगा तो मैं भी खो गया अपने बचपन की यादों में ,जब किचन डिजाइनर नहीं बल्कि घर का एक पूजनीय हिस्सा हुआ करता था ,जहाँ बिना नहाये जाने पर पाबंदी थी |बासी खाना लुत्फ़ लेकर नाश्ते में “पीढ़े” पर बैठकर खाया जाता था ,डाईनिंग टेबल का नाम भी किसी ने नहीं सुना था|डबलरोटी (ब्रेड ) विलासिता थी  जिससे सेहत खराब होती थी , खाते वक्त बोलना असभ्यता की निशानी थी और माँ खाना बनाते न तो कभी थकती थी और न ही कभी यह कहती थी आज खाना बाहर से मंगवा लिया जाए |कहने को हम लखनऊ जैसे शहर में रहते थे पर वो शहर आज के शहर जैसा नहीं था ,गैस के चूल्हे आने शुरू ही हुए थे पर अंगीठी और चूल्हे से जुडी हुई चीजें अभी भी इस्तेमाल में थीं जिनके इर्द गिर्द हमारा बचपन बीता फिर धीरे –धीरे वो सब चीजें हमारे जैसी पीढी की यादों का हिस्सा बनती चली गयीं जैसे किचन में एक दुछत्ती का होना अब किचन में वार्डरोब होता है  |वो ज्वाईंट फैमली का जमाना था जब खाना बनाने में पूरे घर की महिलाएं लगती थी और बच्चों के लिए यह दौर किसी उत्सव से कम न होता था |अब तो लोग शायद उन्हें पहचान भी न पायें तो मैंने भी अपने बचपन के यादों के पिटारे के बहाने हमारे किचन से गायब हुई उन चीजों की लिस्ट बनाने की कोशिश की है जिनके बहाने ही सही उस पुराने दौर को एक बार फिर जी लिया जाए जो अब हमारे जीवन में दुबारा नहीं आने वाला है :

·         बटलोई या बटुली
 

 बटलोई एक ऐसा बर्तन हुआ करता था जिसमें सबसे ज्यादा दाल पकाई जाती थी गोलाकार नीचे से चपटी दाल पकने से दस मिनट पहले चूल्हे से उतार ली जाती थी और बटलोई की गर्मी से दाल अपने आप अगले दस मिनट में पक जाती थी तब भगोने उतने ज्यादा आम नहीं थे आमतौर पर बटुली कसकुट धातु से बनती थी |कसकुट एक ऐसी धातु है जो ताम्बे और जस्ते (एल्युमिनियम )के मिश्रण से बनती थी |अपनी बनावट में यह गगरी से मिलती जुलती थी पर इसका मुंह ज्यादा बड़ा होता था और तला अंडाकार चपटा होता था |गैस चूल्हे के आने से इनकी उपयोगिता समाप्त हो गयी क्योंकि इनकी बनावट ऐसी थी जिसके कारण गैस पर इन्हें रखना मुश्किल होता था |दूसरा कारण स्टील का प्रयोग हमारे जीवन में बढना था जो सस्ता और ज्यादा टिकाऊ था |इस तरह बटुली हमारी यादों का हिस्सा बन गयी और अब रसोईघरों में नहीं दिखती |

·         संडसी

लोहे की बनी हुई बड़े मुंह वाली जो आकार में प्लास की बड़ी बहन लगती थी ,बटुली और बड़े आकार के गर्म बर्तनों को चूल्हे से उतारने के काम आती थी |अपनी बनवाट में यह बहुत पतली सी लोहे की वी आकार में होती थी पर मजबूत पकड़ के कारण बहुत काम की हुआ करती थी |अब ये रसोई घर में यह अमूमन स्टील की और छोटे आकार में मिलती है पर अब इसकी उतनी जरुरत नहीं पड़ती |
·         फुकनी
जब चूल्हे और अंगीठी का ज़माना था तब उनकी आग को बढाने के लिए आग को फूंकना पड़ता था जिसमें दफ्ती से लेकर कागज का इस्तेमाल होता था इसी काम को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए फूंकनी का यूज किया जाता था |ठोस लोहे की बनी फूंकनी आकार में बांसुरी की तरह होती थी जो दोनों और से खुली होती थी एक तरफ से फूंका जाता था दूसरी तरफ से फूंक आग में जाती थी |अब यह लुप्त प्राय श्रेणी में है शहरों में ||

·         मर्तबान

अचार रखने केलिए खासकर इनका प्रयोग होता था चीनी मिट्टी के बने ये मर्तबान किचन का अहम् हिस्सा थे जिनमें तरह तरह के अचार रखे जाते थे |नीचे से सफ़ेद और ऊपर ज्यादातर पीले या काले रंग के छोटे बड़े और मंझोले आकार के चीनी मिट्टी के ऐसे प्यालों में तीज त्योहार के समय दही बड़े और ऐसे पकवान रखे जाते थे जिनमें तरल ज्यादा होता था |बड़े सलीके से इन्हें किचन में बनें ताखे से उतारना पड़ता था |लाईफ जैसे जैसे फास्ट होती गयी इनकी यूटीलटी कम होती गयी इनकी जगह प्लास्टिक और स्टील से बने मर्तबानों ने ले ली जिनका मेंटीनेंस आसान और कीमत कम थी |भागती दौडती जिन्दगी ने कभी हमारी जिन्दगी का अहम हिस्सा रहे इन  मर्तबानों को हमारी जिन्दगी से अलग कर दिया |

·         सूप


गूगल पर अगर आप सूप खोजने की कोशिश करेंगे तो आपको तरह –तरह के सूप बनाने की विधी बता देगा अपर वो सूप कभी नहीं दिखाएगा जिस सूप की बात यहाँ की जा रही है |सरपत की पतली बालियों से बन कर बना यह देशी यंत्र एक वक्त में हमारी रसोई का इम्पोर्टेंट टूल था जिसका इस्तेमाल  तरह –तरह के अनाजों को साफ़ करने के लिए किया जाता है जिसे अवधी में पछोरना कहते हैं |सूप में अनाज को भर कर धीरे –धीरे एक विशेष प्रकार से उसे हवा में उछाला जाता था और सूप के नीचे आने पर हाथ से धीरे से थाप दी जाती थी |सूप का इस्तेमाल करना भी एक कला हुआ करती थी |हर कोई सूप का इस्तेमाल नहीं कर सकता है |अनाज सूप में रह जाता था और गंदगी बाहर आ जाती थी |अब शादी या किसी शुभ अवसर पर इसकी जरुरत पड़ती है क्योंकि यह हमारी परम्पराओं का हिस्सा रहा है पर इसे शहर की किचन में खोजना मुश्किल है |

·         खल मूसल

इसका एक और प्रचलित नाम इमाम दस्ता भी है जो तरह –तरह के खड़े मसालों को पीसने के काम में आता था अभी भी मांसाहार बनाते वक्त इनकी याद आती है जब खड़े मसालों का इस्तेमाल किया जाता है |मिक्सी और पिसे मसलों के बाजार में आ जाने से इनके प्रयोग की जरुरत नहीं पड़ती और किचन से यह धीरे से गायब हो गए यह लोहे और लकड़ी के हुआ करते थे |खल एक गोल जार जैसा होता था जिसमें मसाले डाल दिए जाते थे और मूसल एक डंडा नुमा आकृति थी जिससे मसालों पर लगातार  चोट की जाती थी और धीरे –धीरे मसाले पाउडर जैसे हो जाते थे |खल और मूसल में जब मसाले कूटे जा रहे होते तो एक विचित्र तरह की आवाज निकलती थी जो इस बात का सूचक थी आज कुछ चटपटा मसालेदार घर की किचन में बनने वाला है |

·         सिल बट्टा

जब बात चटनी की हो तो सिल बट्टा के बगैर हमारी यादों की ये कहानी पूरी नहीं हो सकती पत्थर की सिल पर बट्टे से मसाले और चटनी पीसी जाती थी |आप सब कुछ अपने सामने देख सकते थे कि किस तरह फल पत्ती और मसाले एक भोज्य पदार्थ का रूप ले रहे होते ,पर समय की कमी और मिक्सी की सुलभता से अब सब काम मिनटों में हो जाता है और किसी को कुछ पता भी नहीं पड़ता कि बिजली के जोर ने बंद डिब्बे के भीतर कैसे सबको मिला दिया |तब जिन्दगी का लुत्फ़ लिया जाता था आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए आज को खो नहीं दिया जाता था |धीरे –धीरे चटनी मसाले एक दुसरे में मिलते थे यूँ समझ लीजिये हौले हौले जिन्दगी का एक रंग दुसरे रंग से मिलता था और बनता था जिन्दगी का एक नया रंग जिसमें मेहनत की अहम् भूमिका हुआ करती थी |

·         कद्दूकस 

इसका नाम कद्दूकस क्यों पडा इस प्रश्न का जवाब मुझे आज तक नहीं मिला क्योंकि इस कद्दूकस में मैंने कभी कद्दू का इस्तेमाल होते नहीं देखा |इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल जाड़ों के दिनों में गाजर का हलुवा बनाने के लिए गाजर को कसते जरुर देखा |मुली दूसरी सब्जी रही जिसको खाने के लिए कद्दूकस का इस्तेमाल होता था |एक चारपाई आकार का मोडल जिसमें अगर कोई चीज घिसी जाए तो उसके रेशे नीचे गिरते थे सलाद बनाने में और गरी को घिसने में भी खूब इस्तेमाल हुआ पर अब किसी के पास समय कहाँ हैं जब चीजों को घटते हुए देखा जाए अब तो इंस्टेंट का दौर है जो भी हो बस जल्दी हो आउटकम पर ज्यादा जोर है प्रोसेस पर कम नतीजा किचन से एक और परम्परागत यंत्र का गायब हो जाना |

·         फूल की थाली

फूल एक धातु का नाम है जो ताम्बे और जस्ते के मिश्रण से बनती थी स्टील तब इतना लोकप्रिय नहीं हुआ था |समाज का माध्यम वर्ग ज्यादतर अपने घरों में फूल के बर्तन इस्तेमाल करता था जिसमें लोटा, गिलास, कटोरा, थारा, परात, बटुली-बटुला, गगरा, करछुल, कड़ाही जैसी चीजें शामिल हुआ करती थीं |निम्न वर्ग एल्युमिनियम के बर्तनों का इस्तेमाल ज्यादा करता था पर अब इन सब धातुओं की जगह स्टील ने ले ली है |
·         राख और पत्थर
कभी हमारे रसोई की कल्पना राख और पत्थर के बगैर हो ही नहीं सकती थी राख की जगह आजकल विम् बार ने ले ली है और पत्थर से अब बर्तन मांजे नहीं जाते कारण गैस का आ जाना और बर्तन अबी ज्यादतर स्टील के होतेहैं जिनकी सफाई में अब ज्यादा मेहनत नहीं लगती |
भारत के शहरी रसोई घरों में समय का एक पूरा पहिया घूम चुका है और इसमें कुछ भी बुरा नहीं जो आज नया है कल किसी और की यादों का हिस्सा होगा रसोई घर के बहाने ही सही मैंने अपनी यादें सहेज लीं |

Wednesday, January 11, 2017

ई -वॉलेट को मिल पायेगा वो भरोसा !

इंटरनेट एक विचार के तौर पर सूचनाओं को साझा करने के सिलसिले के साथ शुरू हुआ था चैटिंग और ई मेल से यह हमारे जीवन में जगह बनाता गया फिर ओनलाईन शॉपिंग ने खेल के सारे मानक बदल दिए पर  भारत में इस सूचना क्रांति के अगुवा बने स्मार्टफोन जिन्होंने मोबाईल एप  और ई वालेट के जरिये पर्स में पैसे रखने के चलन को हतोसाहित करना शुरू किया |आज सरकार भी यह चाहती है कि लोग पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन को बढ़ावा दे रही है जिससे काले धन पैदा होने की संभावना को समाप्त किया जा सके और नोट छापने के अनावश्यक खर्च से बचा जा सके |टफ्ट्स विश्वविद्यालय के  प्रकाशन कॉस्ट ऑफ़ कैश इन इण्डियाके आंकड़ों के अनुसार भारत नोट छापने और उनके प्रबन्धन के लिए सालाना इक्कीस हजार करोड़ रुपये खर्च  करता है एक हजार और पांच सौ रुपये के पुराने एक नोट छापने में रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया को क्रमशःदो रुपये पचास पैसे और तीन रुपये सत्रह पैसे खर्च करने पड़ते थे |मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार साल 2011से 2105 तक ई भुगतान ने देश की अर्थव्यवस्था में 6.08 बिलियन डॉलर  का इजाफा किया है|मैकिन्सी ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन के बढ़ने से साल 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था में 11.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी |आंकड़े आने वाले कल की सुनहरी उम्मीद जगाते हैं पर ये मामला मानवीय व्यवहार से जुड़ा है जिसके बदलने में वक्त लगेगा | भारतीय परिस्थितियों में मौद्रिक लेन देन विश्वास से जुड़ा मामला भी है जब हम जिसे पैसा दे रहे हैं वो हमारे सामने होता है जिससे एक तरह का भरोसा जगता है |
पर महज स्मार्ट फोन प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने से लोग डिजीटल लेन-देन की तरफ बढ़ेंगे ऐसा वर्तमान परिस्थतियों में सम्भव नहीं दिखता और डिजीटल लेन-देन की अपनी समस्याएँ हैं | मार्च 2016 तक भारत में 342.46 मिलीयन इंटरनेट प्रयोगकर्ता है जो कुल आबादी का मात्र का छब्बीस प्रतिशत हैं |ऑनलाइन उपभोक्ता अधिकार जैसे मुद्दों पर न तो कोई जागरूकता है न ही सार्थक कानून ई वालेट प्रयोग  और ऑन लाइन खरीददारी उपयोगिता के तौर पर बहुत लाभदायक है पर किन्ही कारणों से आपको खरीदा सामान वापस करना पड़ा या खराब उत्पाद मिल गया और उपभोक्ता अपना पैसा वापस चाहता है तो  अनुभव यह बताता है कि उसे पाने में तीन से दस  दिन तक का समय लगता है और इस अवधि में उस धन पर डिजीटल प्रयोगकर्ता को कोई ब्याज नहीं मिलता और  यह एक लम्बी थकाऊ प्रक्रिया है जिसमें अपने पैसे की वापसी के लिए बैंक और ओनलाईन शौपिंग कम्पनी के कस्टमर केयर पर बार बार फोन करना पड़ता है |कई बार कम्पनियां पैसा नगद न वापस कर अपनी खरीद बढ़ाने के लिए गिफ्ट कूपन जैसी योजनायें जबरदस्ती उपभोक्ताओं के माथे मढ देती हैं और ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न हुई समस्या के समयबद्ध निपटारे की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है |जेब में पैसा होना एक तरह का आत्मविश्वास देता है |क्या वह विश्वास   जेब में पड़ा मोबाईल ई वालेट या डेबिट /क्रेडिट कार्ड दे पायेगा जहाँ  देश  में डिजीटल लेन-देन अभी विकसित देशों के मुकाबले उतनी ज्यादा मात्रा में नहीं हो रहा है फिर भी सर्वर बैठने की समस्या से उपभोक्ताओं को अक्सर दो चार होना  पड़ता है |मोबाईल का नेटवर्क हवा के झोंके के साथ आता जाता रहता है |बैंक से पैसा निकल जाता है और सम्बन्धित कम्पनी तक नहीं पहुँचता फिर उसके वापस आने का इन्तजार | राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2011 से 2015 के बीच भारत में साइबर अपराध की संख्या में तीन सौ पचास प्रतिशत की वृद्धि हुई है जिनमे बड़ी संख्या में आर्थिक  साइबर अपराध  भी शामिल हैं जागरूकता में कमी के कारण आमतौर पर जब उपभोक्ता ऑनलाईन धोखाधड़ी का शिकार होता है तो उसे समझ ही नहीं आता वो क्या करे| ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जितनी जल्दी मिलेगा लोग उतनी तेजी से इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन की तरफ बढ़ेंगे |देश की बड़ी आबादी अशिक्षित और निर्धन है वो आने वाले वक्त में कितनी बड़ी मात्रा में  डिजीटल लेन देन करेगी यह उस व्यवस्था पर निर्भर करेगा जहाँ लोग पैसा खर्च करते उसी निश्चिंतता और भरोसे को पा सकें जो उन्हें कागजी मुद्रा के लेन देन करते वक्त प्राप्त होती है  |
नवोदय टाईम्स में 11/01/17 को प्रकाशित 

Saturday, January 7, 2017

इंटरनेट पर कमज़ोर क्यों है आवाज की ताकत

तस्वीरों की दौड़ में हमने आवाज को लगभग भुला ही दिया है। स्मार्टफोन ने देश में इंटरनेट प्रयोग के आयाम जरूर बदले हैं और इसके साथ सोशल नेटवर्किंग ने हमारे संवाद व मेल-मिलाप का तरीका भी बदल दिया है। इसमें यू-ट्यूब और फेसबुक लाइव जैसे फीचर बहुत लोकप्रिय हुए हैं। इन सबके साथ हमने इंटरनेट को वीडियो का ही माध्यम समझ लिया है और ऑडियो यानी ध्वनि को नजरंदाज कर दिया गया है। भारत में अगर आप अपने विचार अपनी आवाज के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं, तो आपको इंटरनेट पर खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। व्यवसाय के रूप में जहां यू-ट्यूब के वीडियो चैनल भारत में काफी लोकप्रिय हैं, वहीं ध्वनि का माध्यम अभी जड़ें जमा नहीं पाया है, जबकि बाकी दुनिया में ऑडियो का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है।
इंटरनेट पर ऑडियो फाइल को शेयर करना पॉडकास्ट के नाम से जाना जाता है। पॉडकास्ट दो शब्दों से मिलकर बना है, प्लेयेबल ऑन डिमांड (पॉड) और ब्रॉडकास्ट से। नीमन लैब के एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2016 में अमेरिका में पॉडकास्ट (इंटरनेट पर ध्वनि के माध्यम से विचार या सूचना देना) के उपयोगकर्ताओं यानी श्रोताओं की संख्या में काफी तेजी से इजाफा हुआ है। वहां इस माध्यम पर विज्ञापनों द्वारा होने वाली कमाई में पिछले वर्ष लगभग 48 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और वर्ष 2020 तक इसके लगातार 25 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने की उम्मीद है। इस वृद्धि दर से वर्ष 2020 तक पॉडकास्टिंग से होने वाली आमदनी पांच सौ मिलियन डॉलर के करीब पहुंच जाएगी। पॉडकास्टिंग की शुरुआत हालांकि एक छोटे माध्यम के रूप में हुई थी, पर अब यह एक संपूर्ण डिजिटल उद्योग का रूप धारण करता जा रहा है। अमेरिका की सबसे बड़ी पॉडकास्टिंग कंपनी एनपीआर की सालाना आमदनी लगभग दस मिलियन डॉलर के करीब है। भारत में पॉडकास्टिंग के जड़ें न जमा पाने के कारण हैं ध्वनि के रूप में सिर्फ फिल्मी गाने सुनने की परंपरा और श्रव्य की अन्य विधाओं से परिचित ही नहीं हो पाना। इसके अलावा भारत में ज्यादातर एफएम स्टेशन एक जैसी ही सामग्री श्रोताओं को परोसते हैं। उन्हें समाचार प्रसारण का अधिकार भी नहीं प्राप्त है, जबकि पॉडकास्टिंग को मीडिया के श्रव्य विकल्प के रूप में देखने की आवश्यकता है। भारत जैसे देशों में, जहां इंटरनेट की स्पीड काफी कम होती है, वीडियो के मुकाबले पॉडकास्टिंग ज्यादा कामयाब हो सकती है।
इस वक्त भारत में दो प्रमुख पॉडकास्ट सेवाएं नियमित रूप से प्रसारित की जा रही हैं, जिनमें इंडसवॉक्स और ऑडियोमैटिक काफी लोकप्रिय हैं, पर ये भारतीय भाषाओं में नहीं हैं। ऑडियोमैटिक ने अपनी शुरुआत के एक साल में एक लाख नियमित श्रोता जुटा लिए हैं। इंडसवॉक्स म्यूजिक स्ट्रीमिंग साइट सावन पर उपलब्ध है। स्मार्टफोन की उपलब्धता के अनुपात में इनके श्रोता अभी काफी कम हैं। शहरी भारत में औसत रूप से एक व्यक्ति 46 मिनट सफर करता है और यह समय लगातार बढ़ रहा है। इस समय उसके पास आमतौर पर कुछ सुन सकने का ही विकल्प होता है। संगीत (ज्यादातर फिल्मी) के अलावा अन्य सामग्री उपलब्ध नहीं होती है, इसलिए वह केवल संगीत सुनने को ही मजबूर होता है।
भारत के मामले में एक बात तय मानी जाती है कि पॉडकास्टिंग यहां विज्ञापन आधारित ही होगी। कुछ भी मनपसंद सुनने के लिए पैसे खर्च करने की परंपरा यहां नहीं है। एफएम चैनल चलाने वाली कंपनियां लंबे समय से कोशिश कर रही हैं कि सरकार से उन्हें समाचार व करेंट अफेयर्स के कार्यक्रम प्रसारित करने की इजाजत मिले। लेकिन सरकार उन्हें यह इजाजत नहीं दे रही। इन कंपनियों के लिए पॉडकास्टिंग एक ज्यादा अच्छा विकल्प हो सकती है। भारत जैसे देश में ऑडियो व्यवसाय के लिए संभावनाएं कितनी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि एक समय तक पड़ोसी नेपाल में निजी क्षेत्र को एफएच चैनल चलाने की इजाजत नहीं थी। वहां उन्हें न सिर्फ इसकी इजाजत मिली, बल्कि एफएम पर समाचार के प्रसारण का अधिकार भी मिल गया। आज नेपाल में सैकड़ों एफएम चैनल हैं और ज्यादातर सफल हैं। भारत इस मंजिल को पॉडकास्टिंग के जरिये भी पा सकता है।
हिन्दुस्तान में 07/01/2016 में प्रकाशित 

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