Sunday, June 17, 2018

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :दूसरा भाग

हमारे पोर्ट ब्लेयर पहुँचते वहां का मौसम बदल गया |उमस की जगह बारिश की रिम झिम ने ले लिया |वीर सावरकर एक छोटा सा एयरपोर्ट है जो किसी बस स्टैंड जैसा लगता है |अब पर्यटकों की आवक साल भर रहती हैं पर एयरपोर्ट बदहाल है |हमारा होटल एयरपोर्ट से दस मिनट की दूरी पर था थोड़ी देर मे हम अपने होटल के कमरे में पसरे पड़े थे और ऐसा लग रहा था बस अगले पांच दिन यहीं सोते –सोते गुजार दें ,पर नींद न आई |सोचा क्यों न बाहर का एक चक्कर लगा लिया जाए |हालांकि बारिश हो रही थी पर यहाँ मैं बारिश के एक नए अनुभव से रुबरु होने जा रहा था |
रात के समय लाईट साउंड शो के समय सेलुलर जेल 
जब आप बाहर से देखते हैं तो लगता है बहुत तेज बारिश है पर जब आप बाहर निकल जाएँ तो आप कम भीगते हैं |शायद इस का कारण तेज चलने हवाएं थी तो उस बारिश में मैंने होटल के आस –पास चक्कर लगाया |कुछ दुकानें थी और लोग अलसाए से पड़े थे |बारह से तीन लंच टाईम ,तीन घंटे लंच कौन करता है काम भी होते रहते हैं पर सिस्टम तो यही है शायद इसका कारण यहाँ सुबह का जल्दी होना भी हो सुबह चार बजे उजाला हो जाता है और पांच बजे सूरज देवता आ जाते हैं इसकी भरपाई शाम को होती है और सूरज साधे पांच बजे तक डूब जाता है |ज्यादा कुछ करने को नहीं था क्योंकि हमारा पहला कार्यक्रम प्रख्यात सेलूलर जेल में होने वाले लाईट और साउंड शो को देखने का था |जिसके लिए साढ़े छ बजे तक इन्तजार करना था तो सोचा क्यों न थोड़ी पेट पूजा कर ली जाए |होटल के कुछ वेटर चेन्नई या दक्षिण भारत के थे तो कुछ यहीं के स्थानीय निवासी पर किसी ने उत्तर भारत न देखा था |उनके लिए दिल्ली उतनी ही दूर थी जितना हमारे लिए अंडमान |कभी उधर जाने का मन नहीं करता ?मैंने बात बढाने के लिए सवाल उछाला |क्या करेगा उधर जाकर अगर वो जगह इतना अच्छा होता तो लोग यहाँ क्यों आता |बात में दम था |होटल का रिशेप्सनिस्ट बीस साल का एक बिहारी लड़का था जो गया से तीन महीने पहले यहाँ आया था |उसने होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर रखा था |यहाँ क्यों आये ?मेरे एक रिश्तेदार हैं उन्होंने बुलाया |
ऐसी दिखती थी पूरी सेलुलर जेल :फोटो साभार 
घर की याद आती है ?कभी –कभी तो लौट क्यों नहीं जाते ?क्या करेंगे वहां जाकर यहाँ पैसा तो मिल रहा है |होटल के रेस्टोरेंट से पूरा पोर्ट ब्लेयर दिखता है |समुद्र में आते –जाते जहाज ,हरे भरे छोटे –छोटे पहाड़ दूर लाईट हाउस जिसकी बत्तियां शाम के धुंधलके में चमकना शुरू कर रहीं थी और मैं सडक पर आते जाते लोगों को देख रहा था |ट्रैफिक एकदम व्यवस्थित कोई भी दुपहिया चालाक बगैर हेलमेट के गाडी नहीं चला रहा था |तभी खतरनाक गति से डीजे की आवाज और सड़क पर कई दुपहिये वाहन चालकों को हुल्लड़ करते निकलते देखा ,अचानक लगा मैं उत्तर प्रदेश के अपने घर में हूँ पर ये पोर्टब्लेयर था और मौका था एक लडकी की शादी की विदाई का |एक सजी धजी कार उसके आगे बाढ़ पंद्रह लोग अपनी दुपहिया में और पीछे एक छोटे हाथी जैसी गाडी में विशाल स्पीकर और मैंने सैयां जी से आज ब्रेकअप कर लिया बजता गाना |थोड़ी देर में ये शोर खत्म हुआ पर आधे घंटे में वही काफिला फिर सड़क पर था |थोड़ी देर बाद वे सब अपनी मंजिल पहुँच गए होंगे और शोर खत्म हुआ पर ये परम्परा मुझे ये सोचने पर मजबूर कर रही थी ,क्या हमारी सभ्यता शोर की सभ्यता है ?खुशी या गमी बगैर शोर मचाये पूरी हो ही नहीं सकती |मैंने सर को झटका दिया मैं यहाँ  घूमने आया हूँ सिर्फ घूमने पर इस मुए दिमाग का क्या करूँ जो हर वक्त सवाल करता रहता है |हमारे होटल से सेलुलर जेल का प्रांगण मुश्किल से पंद्रह मिनट की दूरी पर था |हम नियत समय पर पहुँच गए थे |अंदर एक शो खत्म होने को था और हमें बाहर लाइन लगा के खड़ा कर दिया गया |सडक पर पुलिस वाले ट्रैफिक और लोगों दोनों को ही व्यवस्थित कर रहे थे पर लोग कहाँ मानने वाले और उन्हें बार –बार सीटियाँ बजा कर भीड़ को किनारे करना पड़ रहा था |रात हो चुकी थी सेलुलर जेल की ईमारत खामोशी से आने वालों का स्वागत कर रही थीं |चूँकि अँधेरे में जेल का कुछ भाग ही दिख रहा था इसलिए मुझे लगा कि इसको कल दिन में आराम से देखूंगा |जेल का वह हिस्सा न जाने कितना इतिहास अपने सीने में दबाये पड़ा था |इस शो को अंडमान के सेलूलर जेल के अन्दर ला लाईट और साउंड शो आप इस लिंक पर जाकर देख और सुन सकते हैं |जब तब ये शो चल रहा था मैं बस इस जेल की दीवारों को ही देखे जा रहा था जो अलग अलग रौशनियों में अलग –अलग भाव दे रही थीं |कितनी हिंसक ,भयानक और वीभत्स दौर की साक्षी रही है ये जेल | अंडमान में ब्रिटिश सरकार ने कैदियों को भेजने का सिलसिला
1789 से ही शुरू कर दिया था।
रात में जगमगाती सेलुलर जेल :फोटो साभार 
एक बार जो यहां आ गया उसके वापस जाने की उम्मीद कम रहती थी
, इसलिए देश में अंडमान कालापानी के नाम से मशहूर हो गया। सेल्युलर जेल से पहले ज्यादातर कैदी वाईपर द्वीप पर खुली जेल में रखे जाते थे। पर यहां एक विशाल जेल बनाने का ख्याल बाद में आया।  
25 अक्तूबर 1789 को सबसे पहले 820 कैदियों को इस द्वीप पर लाया गया। सेल्युलर जेल जिसे इंडियन बैस्टिल भी कहा जाता है इसका निर्माण 1896 में आरंभ हुआ। 10 साल में 1906 में यह जेल बनकर तैयार हुई। यह जेल शहर के उत्तर पूर्व दिशा में अटलांटा प्वाइंट पर बनाई गई। आजकल इस जेल के बगल में मेडिकल कालेज और अस्पताल है। यह जेल ब्रिटिश काल की राजधानी रॉस द्वीप के बिल्कुल सामने है। स्थान का चयन काफी सोच समझ कर किया गया था। इसका नाम सेल्युलर जेल इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें हर कैदी के लिए अलग अलग सेल बनाए गए थे। इसका उद्देश्य था कि हर कैदी बिल्कुल एकांत में रहे और मनोवैज्ञानिक तौर पर बिल्कुल टूट जाए। हर सेल का आकार 13.5 फीट लंबा, 7 फीट चौड़ा और 10 फीट ऊंचा है। कोठरी में एक तरफ लोहे  के विशाल दरवाजे और दूसरी तरफ एक रोशनदान है जो तीन फीट चौड़ा और एक फीट ऊंचा है। जेल तीन मंजिला है।हम अगले दिन फुर्सत से इस जेल को देखने की उम्मीद लिए होटल लौट आये |
जारी .........................

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अनदेखी दुनिया :पहला भाग

पोर्ट ब्लेयर का खुबसूरत नजारा 
क और यात्रा सच कहूँ तो मुझे यात्राएँ मुझे सुकून की बजाय तनाव देती हैं पर इस तनाव से मुझे जीवन जीने की गति मिलती है |वैसे मैं बड़ा सुकून पसंद आदमी हूँ पर यात्राओं  में  मेरे मन में बंसा बंजारा जग जाता है फिर क्या मैं निकल पड़ता हूँ जीवन को देखने की एक नयी द्रष्टि की तलाश में इस बार मैं एक ऐसी जगह की यात्रा में निकल रहा हूँ जहाँ जाने का मौका भाग्यशाली लोगों को मिलता है |इस बार यात्रा थी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की |वहां पहुँचने से पहले मेरे मन में अंडमान और निकोबार यात्रा करने का एक मात्र मकसद भारत की जमीनी आख़िरी सीमा को देखने भर का था |आठवीं कक्षा में था जब भारत के राजनैतिक मानचित्र में बंगाल की खाड़ी में सुदूर बिखरे जमीन के कुछ हिस्से दिखा करते थे और मन में कौतुहल होता था ,कैसी होती होगी वहां की दुनिया ?अंडमान और निकोबार के राजनैतिक सामाजिक जीवन के बारे में हमें ज्यादा नहीं बताया गया |हो सकता है कि अब बताया जाता हो |अंडमान जाने से पहले मुझे बस इतना पता था कि वहां की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है और कुछ बढ़िया समुद्री बीच हैं |पर अंडमान इन सब से कहीं अलग है जिसके बारे में आज भी लोगों को काफी कम पता है | अंडमान मलयालम भाषा के हांदुमन शब्द से आया है जो  भगवान हनुमान के लिए प्रयोग किया जाने वाले शब्द  अंडमाणु का परिवर्तित रूप है। उन्होंने ही  श्रीलंका जाते समय इस द्वीप की पहचान की थी । रामायण से जुड़ा हुआ एक मिथक अंडमान का नील द्वीप है |माना जाता है राजा नील इस द्वीप पर आये थे और उन्हीं की याद में इसका नाम नील पड़ गया |
अंडमान और निकोबार नक़्शे में :चित्र गूगल इमेजेस 
 निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है- नग्न लोगों की भूमि। बंगाल की खाड़ी में स्थित ये दोनों द्वीप समूह रणनीतिक तौर पर जहाँ भारत के लिए अहम् हैं वहीं पर्यटन का प्रमुख केंद्र भी है |जब कोई अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की यात्रा पर निकट है तो अंडमान और निकोबार के बीच अंतर नहीं पता होता है | यहाँ पर कुल 572 द्वीप हैं। अंडमान द्वीप का छियासी  प्रतिशत क्षेत्रफल वन संपदा से ढका हुआ है। इन में से मात्र उनतालीस द्वीपों पर ही लोग निवास करते हैं शेष द्वीप जनसँख्या विहीन हैं |अंडमान को निकोबार से अलग करने वाली जलरेखा दस डिग्री चैनल है |निकोबार में पर्यटकों के जाने की मनाही है |आप निकोबार तभी जा सकते हैं जब आप वहां काम करते हों |अंडमान जहाँ पिछले पचास हजार साल जारवा जनजाति का घर है वहीं निकोबार में शोम्पेन और सेनटेलीस जनजातियों का आवास है |ये सभी जनजातियाँ तथा कथित सभ्य इंसानों से दूर रहना पसंद करती हैं और कुछ हद तक आज भी हिंसक हैं | 1858 से यहां भारत के मुख्य हिस्सों से लोगों के बसने का सिलसिला शुरू हो गया। 10 मार्च 1858 को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े 200 सेनानियों को समुद्री जहाज से अंदमान लाया गया। तब उन्हे सजा-ए-कालापानी के तौर पर यहां लाया गया था। चाथम में उन सबसे पहले आने वाले सेनानियों की याद में स्मारक का निर्माण कराया गया है। भले ही वे कैदी के तौर पर इस द्वीप पर आए थे पर इस द्वीप के निर्माण, यहां की खेती बाड़ी और यहां की संस्कृति को भारतीय संस्कृति के तौर पर स्थापित करने में उनकी बड़ी भूमिका है। 1857 की क्रांति में विद्रोह का बिगुल बजाने वाले 200 सिपाहियों को लेकर एस एस सिमेरामी नामक जहाज 10  मार्च 1858 को अंडमान पहुंचा था।

1883 में जब चाथम शॉ मिल की शुरुआत हुई तो इनमें से कई कैदियों को इसमे काम पर लगाया गया। इसलिए शॉ मिल के परिसर में उनकी यादगारी में स्मारक बनाया गया है। वैसे अंडमान के बारे  में तथ्य है कि चीन के लोगों को इस द्वीप के बारे में एक हजार साल पहले से मालूम था। वे इसे येंग टी ओमाग के नाम से जानते थे। रोमन भूगोलवेत्ता टॉळमी ने दूसरी शताब्दी में इसे अंगदमान आईलैंड ( अच्छे भविष्य का द्वीप) नाम दिया था। बौद्ध तीर्थ यात्री इत्सिंग ने 672 ई में यहां जहाज से यात्रा की थी। उसने इसे लो जेन कूओ ( नग्न लोगों का देश) नाम दिया था।  पंद्रहवीं सदी में मार्कोपोलो ने इसे अंगमानियन नाम दिया था। इटली के घुमक्कड़ निकोलो कौंट्री से ने इसे आईलैंड ऑफ गॉड कहा था ।
 आर्चिबिल्ड ब्लेयर

जब अंग्रेजों  का राज़ आया तो  इस क्षेत्र से गुजरने वालों जहाजों की रक्षा के लिए यहां पर स्थायी बस्ती के निर्माण की  जरूरत महसूस हुई। और विकल्प में यहाँ खूंखार कैदियों को शुरुआत में भेजा जाने लगा । चारों तरफ समुद्र होने के कारण वे भाग नहीं सकते थे अगर वे भागते भी थी तो समुद्र में ही डूब कर मर जाते । वहीं अंग्रेजों को मुफ्त में श्रमिक मिल गए जो उन द्वीपों को इंसानों के रहने लायक बनाने के लिए अपना श्रम देते थे | 14 अप्रैल 1788 को ब्रिटिश अधिकारी ले. आर्चिबिल्ड ब्लेयर को यहां  आबादी बसाने के लिए लगाया गया। 25 अक्तूबर 1789 को पहले कैदियों का एक दल यहां आया। इन आठ सौ बीस कैदियों को वाइपर द्वीप पर खुला छोड़ दिया गया। चारों ओर गहरा समुद्र के कारण भागने का कोई खतरा नहीं था। आर्चिबिल्ड ब्लेयर के नाम पर ही अंडमान  के इस प्रमुख शहर का नाम पोर्ट ब्लेयर पड़ा। बंदरगाह होने के कारण ब्लेयर के नाम में पोर्ट शब्द जुड़ गया। 22 जनवरी 1858 को यहां पर ब्रिटिश झंडा यूनियन जैक लहराया गया। 1858 में पैनल सेटेलमेंट के तहत आए क्रांतिकारियों में पंजाब के गदर आंदोलन के लोग, वहाबी विद्रोही, मणिपुर के विद्रोही और अन्य राज्यों के क्रांतिकारी थे। 1858 में लाए गए क्रांतिकारियों में अधिकतर यहीं की धरती में समा गए। बहुत कम लोग ही लौटकर अपने घर  वापस जा सके।
बंगाल की खाड़ी का पानी 
हमने लखनऊ से पोर्ट ब्लेयर की उड़ान भरी हमारा जहाज दिल्ली ,कोलकाता होते हुए गर्मी की एक उमस भरी दोपहरी में पोर्टब्लेयर के वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतरा |जहाज जब पोर्टब्लेयर के करीब था तो समुद्र में छोटे बड़ी कई स्थलीय भू आकृतियां दिख रही थीं और इन सबके बीच बंगाल की खाड़ी का विशाल सागर हिलोरे ले रहा था जिसका रंग कालिमा लिया लिए हुए था |शायद इसी लिए पुराने जमाने में यहाँ आने वाले कैदियों को काले पानी की सजा का नाम दिया गया था |यहाँ समुद्र का पानी काला दिखता है |
अंडमान में आपका स्वागत है अगले छ दिन हम बंगाल की खाड़ी में बसे इस द्वीप के मेहमान थे |

जारी ...................................







Tuesday, May 29, 2018

डिजीटल ट्रांजेक्शन पर बढ़ता जोर

इंटरनेट  के जमाने में देश में  बदलाव की प्रक्रिया की धुरी बन रहे हैं स्मार्ट फोन.भारत में ऑनलाइन शॉपिंग को बढ़ावा देने में इंटरनेट आधारित स्मार्टफोन की बड़ी भूमिका है,खरीद प्रक्रिया का यह बदलाव सबसे ज्यादा स्मार्टफोन की खरीद को प्रभावित कर रहा है.इंटरनेट एक विचार के तौर पर सूचनाओं को साझा करने के सिलसिले के साथ शुरू हुआ था चैटिंग और ई मेल से यह हमारे जीवन में जगह बनाता गया फिर ऑनलाईन शॉपिंग ने खेल के सारे मानक बदल दिए पर  भारत में इस सूचना क्रांति के अगुवा बने स्मार्टफोन जिन्होंने मोबाईल एप  और ई वालेट के जरिये पर्स में पैसे रखने के चलन को खत्म करना शुरू कर दिया  . आईटी क्षेत्र की एक अग्रणी कंपनी सिस्को ने अनुमान लागाया है कि सन २०१९ तक भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या लगभग ६५ करोड़ हो जाएगी जो जाहिर तौर पर इस ई लेन देन  की प्रक्रिया को और गति देगी .इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोशिएशन ऑफ इंडिया व केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिकभारत का ई-कॉमर्स का बाजार 12.6 बिलियन डॉलर का है और 2020 तक यह देश की जीडीपी में चार प्रतिशत का योगदान देगा.
नक़द से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है,सरकार के लिए नोट छापना एक खर्चीला काम है . मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार साल 2011से 2105 तक ई भुगतान ने देश की अर्थव्यवस्था में 6.08 बिलियन डॉलर  का इजाफा किया है.मैकिन्सी ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि डिजीटल  लेन देन के बढ़ने से साल 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था में 11.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी .आंकड़े आने वाले कल की सुनहरी उम्मीद भले ही जगाते हैं पर ये मामला मानवीय व्यवहार से भी जुड़ा है जिसके बदलने में वक्त लगेगा भारतीय परिस्थितियों में मौद्रिक लेन देन विश्वास से जुड़ा मामला भी है जब हम जिसे पैसा दे रहे हैं वो हमारे सामने होता है जिससे एक तरह का भरोसा जगता है . डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कारोबारियों को कैशबैक देने पर विचार कर रही है. इसके साथ ही सरकार ग्राहकों को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर छूट भी दे सकती है. केंद्र सरकार का राजस्व विभाग एक ऐसे प्रस्ताव पर काम कर रहा हैजिसमें डिजिटल माध्यम से पेमेंट करने वालों को अधिकतम खुदरा मूल्य   पर छूट देने की बात भी हो सकती है. डिजिटल माध्यम से किसी उत्पाद या सेवा के लिए भुगतान सरकार के भीम एप या निजी कंपनियों के मोबाइल वॉलेट (पेटीएमफोन पेमोबिक्विक आदि ) की मदद ली जा रही  है. निजी मोबाइल वॉलेट कंपनियां पहले ही डिजिटल ट्रांजेक्शन करने वाले ग्राहकों को कैशबैक की सुविधा  दे रही हैं. 
लेकिन सिर्फ  स्मार्ट फोन प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने से लोग डिजीटल लेन-देन की तरफ ज्यादा बढ़ेंगे ऐसा अभी  सम्भव नहीं दिखता है.  डिजीटल लेन-देन की अपनी समस्याएँ हैं और समस्याएं हैं  इंटरनेट एंड मोबाईल एसोशिएसन की  रिपोर्ट के अनुसार  दिसंबर 2016 से दिसंबर2017 तक के साल में शहरी भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं  की संख्या 9.66 प्रतिशत बढ़कर अनुमानित 29.5 करोड़ हो गई. वहीं ग्रामीण भारत में इसी दौरान यह संख्या 14.11 प्रतिशत  से बढ़कर अनुमानित 18.6 करोड़ हो गई.ऑनलाइन उपभोक्ता अधिकार जैसे मुद्दों पर न तो कोई जागरूकता है न ही कोई ठोस सार्थक  कानून ई वालेट प्रयोग  और ऑन लाइन खरीददारी उपयोगिता के तौर पर बहुत लाभदायक है पर किन्ही कारणों से आपको खरीदा सामान वापस करना पड़ा या खराब उत्पाद मिल गया और उपभोक्ता अपना पैसा वापस चाहता है तो  अनुभव यह बताता है कि उसे पाने में तीन से दस  दिन तक का समय लगता है और इस अवधि में उस धन पर डिजीटल प्रयोगकर्ता को कोई ब्याज नहीं मिलता और  यह एक लम्बी थकाऊ प्रक्रिया है जिसमें अपने पैसे की वापसी के लिए बैंक और ओनलाईन शॉपिंग कम्पनी के कस्टमर केयर पर बार बार फोन करना पड़ता है .कई बार कम्पनियां पैसा नगद न वापस कर अपनी खरीद बढ़ाने के लिए गिफ्ट कूपन जैसी योजनायें जबरदस्ती उपभोक्ताओं के माथे मढ देती हैं और ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न हुई समस्या के समयबद्ध निपटारे की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है .जेब में पैसा होना एक तरह का आत्मविश्वास देता है . क्या वह आत्म विश्वास   जेब में पड़ा मोबाईल ई वालेट या डेबिट /क्रेडिट कार्ड दे पायेगा? आज भी देश के हर शहरों तक के कुछ मोहल्लों और गलियों में इंटरनेट और मोबाइल फोन की निर्बाध  सेवा नहीं है। इसलिए जरूरी यह भी है कि डिजिटल गेटवे की व्यवस्था को भी समानांतर तरीके से सुलभ और मजबूत किया जाए। जब तक इंटरनेट की अबाध सेवा नहीं होगीडिजिटल गेटवे की सहज सहूलियतें नहीं दी जाएंगीडिजिटल भुगतान को कामयाबी के साथ लागू नहीं किया जा सकेगा आर्थिक समाचार  एजेंसी ब्लूमबर्ग के एक सर्वे के अनुसार जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में बड़े भुगतान तक के लिए नोट का चलन ज्यादा है. अमेरिका में अभी भी छियालीस  प्रतिशत भुगतान नकद में होता है. अमेरिका और यूरोप के जिन देशों में ब्लूमबर्ग ने सर्वे कियाउन देशों में ई-वालेटक्रेडिट कार्डडेबिट कार्ड और बिटकाइन जैसी सहूलियतें भी पहले से मौजूद हैं। इसके बावजूद नार्वे को छोड़करबाकी जगहों पर नोट का ही ज्यादा इस्तेमाल चलन में है। डिजिटल भुगतान को लेकर लोगों की ललक तभी बढ़ पाएगीजब भुगतान के लिए उन्हें शुल्क  न देना पड़े इसलिए मुफ्त भुगतान सेवा वाले डिजिटल गेटवे अनिवार्य रूप से उपलब्ध  कराने होंगे. दूसरी समस्या जैसे जैसे ई लेन-देन बढ़ रहा है उसी अनुपात में साइबर अपराध की संख्या में इजाफा हो रहा है .  जागरूकता में कमी के कारण आमतौर पर जब उपभोक्ता ऑनलाईन धोखाधड़ी का शिकार होता है तो उसे समझ ही नहीं आता वो क्या करेये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जितनी जल्दी मिलेगा लोग उतनी तेजी से इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन की तरफ बढ़ेंगे .देश की बड़ी आबादी अशिक्षित और निर्धन है वो आने वाले वक्त में कितनी बड़ी मात्रा में  डिजीटल लेन देन करेगी यह उस व्यवस्था पर निर्भर करेगा जहाँ लोग पैसा खर्च करते उसी निश्चिंतता और भरोसे को पा सकें जो उन्हें कागजी मुद्रा के लेन देन करते वक्त प्राप्त होती है  .

आई नेक्स्ट दैनिक जागरण में 29/05/18 को प्रकाशित 

Thursday, May 24, 2018

रुमाल महज़ रुमाल नहीं है

गर्मियों की छुट्टियाँ हो गयी हैं.कुछ लोग घूमने का कार्यक्रम  बना रहे होंगे तो कुछ के घर में शादी या ऐसा ही कोई और आयोजन होगा. जब इतने सारे कार्यक्रम  होंगे तो हम  सुन्दर दिखने के लिए कुछ कपडे वगैरह भी जरुर खरीदेंगे. कपड़ों का ही एक जरुरी हिस्सा है रुमाल ,पर क्या कोई रुमाल की खरीददारी अलग से करता है जैसे पैंट,शर्ट,साड़ी या सूट की करते हैं .वैसे एक दिन बगैर रुमाल के घर से निकल जाइए या रुमाल घर पर भूल जाइए .बहुत कुछ याद आ जाएगा.वैसे भी चीजों की कमी उनके न रहने पर ही खलती है. रुमाल फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ मुंह पर मलने वाली चीज है.हाथ से लेकर मुंह साफ़ करने के अलावा रुमाल का कई इस्तेमाल हैं.अब ये आपके ऊपर है कि आप इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं.
       हिंदी फिल्मों के कई गानों में प्यार की शुरुवात नायिका के रुमाल खोने या मिलने से शुरू होती है. रुमाल भले ही एक छोटा सा कपडे का टुकड़ा भले ही हो पर वो हमारी जिंदगी में बहुत असर डालता है.जब आप मंदिर ,मस्जिद या गुरुद्वारा जाते हैं तो सर पर रुमाल डाल लेते हैं,यानि रुमाल का एक सुपर नेचुरल कनेक्शन भी है जो सीधे ऊपर वाले से हमें जोड़ता है वैसे कपडे तो तरह –तरह के होते हैं पर ऊपर वाले से जीवित रहते हुए जोड़ने का काम रुमाल ही करता है .वैसे हमारे  रुमाल कब बदल जाते हैं इसका पता ही नहीं चलता .हम कभी कपड़ों की तरह रुमाल को बदलने की प्लानिंग नहीं करते हैं,नए रुमाल आते हैं पुराने कहाँ चले जातें हैं न कभी हम जानने की कोशिश करते हैं न कोई हमें बताता है . 
      वैसे ही जिन्दगी में बहुत से लोग हमें ऐसे मिलते हैं जो हमारे काम आते हैं,हमारा जीवन आसान बनाते हैं और फिर चुपचाप हमें शुक्रिया कहने का मौका दिए बगैर जीवन से विदा हो जाते हैं. वैसे भी हमारे घर  में गैस से लेकर अखबार वाले शख्स का चेहरा हमें कहाँ याद रहता है ? ऐसे न जाने कितने लोग हैं जो हमारे जीवन में रुमाल की भूमिका निभा  रहे होते हैं. अपने महत्व का अंदाजा कराये बगैर. 
        रुमाल यूँ तो हमारे पहनावे का एक छोटा सा हिस्सा भर है पर ये हमारी जिन्दगी से जुड़ा हुआ है जैसे हम अपने दैनिक जीवन  में रुमाल खरीदने की प्लानिंग नहीं करते वैसे ही जिन्दगी को प्लान नहीं किया जा सकता.जो जैसे मिले उसे स्वीकार करना चाहिए.रुमाल का रंग अगर हमारे कपडे से नहीं मिलता तो चलेगा पर किसी भी रुमाल का न होना बिलकुल नहीं चलेगा. उसी तरह  ही जिन्दगी में रिश्तों का होना महत्वपूर्ण है उनका अच्छा या बुरा होना नहीं क्यूंकि जिन्दगी रहेगी तो रिश्तों को बेहतर किया जा सकता है पर जिन्दगी ही न रही तो लाख रिश्ते हों उनका कोई फायदा नहीं इसीलिये तो कहा जाता है जिन्दगी न मिलेगी दुबारा तो जी लो जी भर के तो अगली बार  अगर आपका रुमाल खो जाए तो उसे ढूंढने की कोशिश जरुर कीजियेगा क्योंकि ये रुमाल महज रुमाल नहीं हम सबकी जिंदगी का आईना भी है.
प्रभात खबर में  24/05/18 को प्रकाशित                                      

Wednesday, May 9, 2018

जांचो और परखो का एक नया प्रयोग

ऑनलाईन रिव्यू आज किसी भी उत्पाद या सामग्री की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को जांचने का एक अच्छा विकल्प बनकर उभरे हैं वो चाहे होटलों का चुनाव हो या फिर ऑनलाईन शॉपिंग करते वक्त सैकड़ों विकल्पों के बीच अपने  मनपसंद उत्पाद का चुनाव वैसे भी भारत में ऑनलाईन शॉपिंग का कारोबार तेजी से फ़ैल रहा है | पर देश में ऑनलाईन खरीद का कोई इतिहास न होने से नए लोग इंटरनेट के माध्यम से चीजें खरीदने में थोडा हिचकते है  |ऐसे में लोगों के  लिए पूर्व में उस सेवा या उत्पाद का उपयोग कर चुके लोगों द्वारा लिखी गयी समीक्षाएं एवं टिप्पणियां भावी उपभोक्ताओं  के लिए मददगार साबित होती हैं| इ-कॉमर्स वेबसाइट के माध्यम से खरीददारी करने का सबसे बड़ा फायदा लोगों को उत्पादों पर मिलने वाली छूट के अलावा अन्य उपभोक्ताओं द्वारा  खरीदे गए उन्हीं सामानों के बारे में अपनी राय भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |ये टिप्पणियां एवं समीक्षाएं नए उपभोक्ताओं को सेवा या उत्पाद की खरीद  में मदद करती हैं| समस्त ऑनलाईन सामान बेचने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं को अपनी बात कहने का मौका देती हैं| उपभोक्ता भी धीरे-धीरे इस मौके का इस्तेमाल अवसर की तरह करने लगे हैं आमतौर पर ऑनलाईन ई कॉमर्स साईट पर लिखी जाने वाली समीक्षाएं लिखित रूप में ही होती रहीं हैं पर पिछले तीन सालों में इंटरनेट के परिद्रश्य में काफी बदलाव आया है |इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है | अमेजन जैसी ऑनलाईन शॉपिंग कम्पनी ने उपभोक्ताओं के रुख को भांपते हुए ऑनलाईन रिव्यू की दुनिया में एक नए तरह के प्रयोग की शुरुआत करने जा रहा है ऑनलाइन सम्बंधित शोध करने वाली एक संस्था एल 2 के अनुसार आने वाले समय में अमेज़न अपने उपभोक्ताओं को वीडियो के माध्यम से भी समीक्षाएं देने की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ रहा है | अमेज़न ने लगभग अपने बीस  लाख व्यापार सहयोगियों को इस परीक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है|इस  योजना का पहला चरण दिसंबर के अंत तक शुरू  होने की उम्मीद है| जिसमें उपभोक्ता  टिप्पणियां एवं समीक्षाएं वीडियो के माध्यम से भी अमेज़न पर भेज सकेंगेइस फीचर को जोड़ने के पीछे अमेज़न का सीधा उद्देश्य खरीददारों को अपनी वेबसाइट पर रखना और उन्हें यू ट्यूब  जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों की ओर पलायन करने से रोकना है|इसी साल अक्टूबर में अमेज़न को "सामग्री-आधारित कीमत कटौती एवं प्रोत्साहन" के लिए एक पेटेंट भी मिला है| पेटेंट के अनुसार किसी इलेक्ट्रॉनिक वातावरण में उपभोक्ताओं को ऑडियो, वीडियो या इंटरैक्टिव सामग्री को ग्रहण करने का विकल्प दिया जा सकता है ताकि उन्हें छूट या अन्य लाभ दिए जा सकें। उदाहरण  के लिए यदि कोई उपभोक्ता अमेज़न के विवरण वाले पेज पर जाकर किसी उत्पाद की समीक्षा करने वाले वीडियो को देखता है तो जैसे जैसे वह वीडियो आगे बढ़ता जायेगा उत्पाद के दाम काम होते जाएंगे|यानि  अधिक समय तक विज्ञापन देखने वाले उपभोक्ता को अधिक छूट मिलेगी| अमेज़न का पेटेंट यह भी सुनिश्चित कर देगा की कि  कोई भी अन्य ऑनलाइन रिटेलर इस तरह की सुविधा अपने ग्राहकों को नहीं दे पायेगा | इस पेटेंट के साथ ही अमेज़न ने यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, जैसी कंपनियों के विज्ञापन व्यपार में भी सेंध लगाने की कोशिश की है| अब उपभोक्ताओं को अपने समय की कीमत का वास्तविक अर्थों में सही मूल्य मिलेगा और कीमत  को उपभोक्ताओं के व्यवहार से जोड़ने से कंपनी के प्रति वफादार उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि होगी |जिससे ऑनलाइन रिटेलर ज्यादा समय तक  उपभोक्ताओं को अपनी वेबसाइट पर रोक पाएंगे|चीजों को देखकर और लोगों से राय लेकर खरीदने की सहज मानवीय भारतीय प्रवृत्ति है|भारत जैसे देश में जहाँ ग्रामीण क्षेत्र में लोग कम पढ़े लिखे हैं पर इंटरनेट डाटा की कम कीमतों के कारण मोबाईल इंटरनेट उनकी पहुँच में है |वे ऑनलाईन शॉपिंग या तो करते नहीं या करते वक्त भ्रम की स्थिति में रहते हैं कि किस उत्पाद को खरीदा जाए |उनके लिए यह सुविधा  जहाँ उन्हें ऑनलाईन शॉपिंग प्लेटफोर्म से जोड़ने का एक माध्यम बन सकती है वहीं  ई शॉपिंग कारोबार को और ज्यादा प्रमाणिक एवं सुहाना बना सकती है |तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि प्रायोजित समीक्षाओं के दौर में प्रायोजित वीडियो समीक्षाओं के आने का भी खतरा है जो लोगों के भ्रम को बढ़ा सकता है |  हालाँकि अभी यह कहना कठिन है कि अमेज़न द्वारा उठाये गए इस कदम का इ-कॉमर्स के क्षेत्र में वास्तविक प्रभाव क्या पड़ेगा पर इतना तो तय है कि इससे इस क्षेत्र में हलचल मचना तय है और यह हलचल  उपभोक्ताओं के लिए  कम दामों की सौगात लेकर आएगी|
निवाड़ टाईम्स में 09/05/2018 को प्रकाशित लेख 

बाजार ,दावे और हकीकत

भारत में खाद्य और भोज्य पदार्थ उपभोक्ताओं तक उच्च गुणवत्ता के साथ पहुंचे और उनके अधिकारों का हनन न हो, इसके लिए साल 2006 में फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स एेक्ट पास किया गया, जो खाद्य पदार्थों से जुड़ा हुआ था।इस एेक्ट में यूरोपीय संघ के विनियमन के साथ कई तरह की समानताएं हैं, जो खाद्य पदार्थों के पोषण और स्वास्थ्य दावों से जुड़ी हुई हैं। इस कानून का सीधा उद्देश्य उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों के बारे में प्रामाणिक जानकारी देना है, जिससे वे खाद्य पसंदों के बारे में पर्याप्त रूप से सूचित रहें। जिसका तात्पर्य यह है कि जिन खाद्य पदार्थों का वे सेवन कर रहे हैं। उनके गुण-दोषों से वे भली-भांति परिचित हों। 

भारत खान-पान के मामले में काफी विविधता वाला देश है, पर भोजन में ऐसी बहुत-सी चीजें इस्तेमाल होती हैं, जिनमें काफी चिकित्सकीय गुण होते हैं पर ये चिकित्सकीय गुण काफी भ्रांतियों के भी शिकार होते हैं और इनकी प्रामाणिकता स्थापित नहीं हैं। ऐसा माना जाता है कि केसर अस्थमा, अपच, बदन दर्द, बुखार, शुष्क त्वचा रोग और गर्भावस्था में लाभकारी होता है, वहीं घी याद्दाश्त बढ़ाने से लेकर अपच दूर करने में सहायक होता है। नींबू का अचार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। 

ऐसे सारे दावों के पीछे कोई स्थापित या प्रामाणिक तथ्य नहीं है, बल्कि खानों के बारे में वह गहरी प्रतिबद्धता है, जो यह मानती है कि इन खाद्य पदार्थों में ऐसे औषधीय गुण होते हैं, जो समस्त भौगोलिक क्षेत्रों में सभी आयु, लिंग के व्यक्तियों में समान रूप से फायदा पहुंचाते हैं। भोज्य पदार्थों के औषधीय गुणों के बारे में यह पूर्ववृति इस तरह के खाद्य पदार्थों के व्यवसाय के लिए ऐसे विज्ञापन विकल्प देते हैं, जिनमें अकल्पनीय दावे किए जाते हैं और उपभोक्ता उनको अपना कर जहां एक और ठगी का शिकार होता है, वहीं अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी कर बैठता है।यद्यपि भारत में ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रोत्साहन पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर मिलता है, पर इन सामग्रियों में उपस्थित पोषण और स्वास्थ्य गुण स्वास्थ्य नियामकों के लिए एक चुनौती बन जाते हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एेक्ट उन्हीं खाद्य सामग्रियों को अपने दायरे में लेता है, जिनके स्वास्थ्य और पोषण के बारे में दावे का वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध हो। भारत और दुनिया के अन्य देशों में बहुत से उपभोक्ता स्वास्थ्य और पोषण के लिए अपने पारंपरिक विश्वासों के आधार पर आयुर्वेद द्वारा निर्धारित खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं। इसी कड़ी में पारंपरिक औषधियों को बढ़ावा देने और वैकल्पिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए साल 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना की गई, क्योंकि देश में आयुर्वेद की बहुत गहरी जड़ें हैं, पर इसी का हवाला देकर बहुत-सी कंपनियां दैनिक उपभोग की बहुत-सी वस्तुएं आयुर्वेद के नाम पर बेच रही हैं।
 
आयुर्वेद का बढ़ता व्यावसायिक इस्तेमाल ऐसे भ्रामक विज्ञापनों के जन्म का कारक बन रहा है, जो बगैर किसी वैज्ञानिक आधार के मधुमेह, कैंसर जैसी बीमारियों के दूर करने से लेकर बाल उगाने जैसा दावा करते हुए कई सारे ऐसे दैनिक उपभोग के उत्पाद बेच रहे हैं, जो अगर आयुर्वेद की श्रेणी में न आते, तो वे फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड अथॉरिटी के अंतर्गत आते और यह उनके द्वारा किए जा रहे दावों की जांच पड़ताल कर सकती थी। उपभोक्ता को ठगने से बचाने के लिए सरकार को इस दिशा में सोचने की तुरंत जरूरत है। 
अमर उजाला में 09/05/18 को प्रकाशित 

Monday, May 7, 2018

आइये चलते हैं अंग्रेजों के देश :लन्दन यात्रा ग्यारहवां भाग



केमडन बाजार 
लन्दन में आख़िरी दिन सुबह जल्दी ही उठकर सबसे पहले बिखरे सामान को सहेजा ,कहीं कुछ छूट न जाए |हमारी फ्लाईट रात के दस बजे थी और पूरा दिन हमारे पास था |सबसे पहले सारा सामान पैक करके होटल के लॉकर रूम में रखवा दिया जिससे एक दिन का  किराया बचे और हम नाश्ता करने निकल पड़े |एक हफ्ते रहने के कारण हम वातावरण के अभ्यस्त हो चले थे |नाश्ता करने के बाद अब बारी थी किसी मार्केट में घूमने की |हालाँकि हम सुपर मार्केट और बहुत सारे माल्स में जरुर गए थे पर खालिस ब्रिटिश मार्केट में जाने का मौका न मिल पाया था |किससे पूछा जाए इतना बड़ा शहर और इतने सारे बाजार एक बार फिर गूगल बाबा की मदद ली गयी |हमारी लोकेशन के हिसाब से उन्होंने केमडन  मार्केट जाने का सुझाव दिया |वैसे भी केमेन्डन मार्केट की रेटिंग बहुत अच्छी थी अब जिन्होंने दर्द दिया था अब दवा भी उनको ही देनी थी मतलब गूगल बाबा   को रास्ता भी बताना था |पता चला हमारे होटल से चिड़ियाघर वाले रास्ते पर आधे घंटे की दूरी पर यह बाजार पड़ता है |बस स्टॉप सामने था थोड़ी देर में हम केमडनके रास्ते में थे |
मेरे सामने वाली सीट पर एक महिला अपने कुत्ते के साथ बैठी थी |थोड़ी देर में हम केमडन  मार्केट के सामने थे पर बाहर से ऐसा कुछ नहीं लग रहा था कि यह लन्दन के प्रमुख बाजार में से एक है |धीरे –धीरे संशय मिट रहे थे और हम एक नए तरीके के बाजार से रूबरू हो रहे थे |भीड़ और दुकानों की संख्या दोनों ही बहुत ज्यादा थी पर कोई शोर कोए अफरातफरी नहीं थी |हाँ खाने की दुकानों पर दुकानदार जरुर लोगों को अपनी दुकान में आने के लिए मना रहे थे |कम्बोडिया ,मैक्सिको ,वियतनाम ,बर्मा ,चाइनीज हर तरह के खाने की दुकान न केवल सजी थीं बल्कि वहां बहुत भीड़ भी थी |असल में केमडन कभी घोड़ो का अस्तबल हुआ करता  था अब इसे शानदार बाजार का रूप दे दिया गया है पर पुरानी चीजों से छेड़छाड़ नहीं की गयी है |असल में यह आधुनिकता और इतिहास का अद्भुत समागम है |हमने कुछ स्मृति चिन्ह खरीदे और फिर विंडो शॉपिंग शुरू कर दी |
केमडन बाजार 
सब कुछ तो मिल रहा था मसलों से लेकर जेवर तक कपड़ों से लेकर कंडोंम तक |एक दुकान द्वितीय विश्वयुद्ध की सामग्री बेच रही थी |यहीं पहली बार मैंने थ्री डी प्रिंटिंग होते देखी आप अपनी तस्वीर को तीन आयामी स्थिति में प्रिंट करवा सकते हैं |एक तस्वीर को बनवाने की कीमत हिन्दुस्तानी मुद्रा में लगभग दो हजार रुपये |जहाँ से भी आप नजर डालें आपको सिर्फ सर दिखेंगे पर कहीं कोई हल्ला गुल्ला नहीं लोग आ रहे थे और जा रहे थे | केमेन्डन बाजार की ख़ास बात यह लगी यहाँ मेरा जितने भी दुकानदार से पाला पड़ा वो सारे अप्रवासी थे ,बर्मा ,अफगानिस्तान ,जापान के इन दुकानदारों से मैंने कुछ –कुछ खरीदा |भीड़ होने के कारण मैं उनसे ज्यादा बात तो नहीं कर पाया पर सभी अपना देश छोड़कर प्रसन्न थे |खाने में मगरमच्छ के मांस  से लेकर सुअर,गाय सब था |हमें घूमते हुए दो बज गए थे |हम पांच बजे तक हीथ्रो पहुँच जाना चाहते थे क्योंकि वहां के ड्यूटी फ्री बाजार के बड़े चर्चे सुने थे |होटल  लौट कर सामान उठाया और आख़िरी बार ट्यूब की यात्रा शुरू की |पहले पैडिंगटन और वहां से हीथ्रो एक्सप्रेस हमारे ओएस्टर कार्ड में तीन –चार पाउंड ही बचे थे हम संशय में थे इसे दुबारा रिचार्ज करें या न करें |रास्ते में ही अगर पैसे खत्म हो गए   तो क्या हम अपनी यात्रा जारी रख पायेंगे फिर दिमाग लगाया गया कि अगर आप एक बार ट्यूब में घुस गए तो जब आप बाहर निकलेंगे तो तभी पैसा कटेगा तो जब हम हीथ्रो एयरपोर्ट पर उतरे तो पता चला हमारे कार्ड में माइनस ढाई पाउंड बचे हैं |इस तरह हम अंग्रेजों के ढाई पाउंड के कर्जदार हो गए |
कंडोम बेचने का अनूठा तरीका 
केमडन बाजार का एक रेस्टोरेंट 
अब चूँकि देश वापस लौटना था तो पैसे भरवाने का कोई तुक नहीं था |वो कार्ड मैंने अभी भी सम्हाल रखा है कभी दुबारा जाने का मौका मिला तो अंग्रेजों का कर्जा जरुर चुका आऊंगा |हीथ्रो दुनिया के बेहतरीन और व्यस्त एयरपोर्ट में से एक है |हमारी फ्लाईट एमीरेट्स की थी |उसके काउंटर पर पहुँचने से पहले वहां के स्टाफ को हिन्दुस्तानी में बात करते देखा तो मन प्रफुल्लित हो गया |उनमें से एक अधेड़ महिला हमारी मदद को आगे बढ़ी ,मैंने चूँकि उसे हिन्दुस्तानी में बात करते सुना था इसलिए मैंने उत्सुकतावश पूछ लिया आप हिन्दुस्तान से हो पर पहली बार जवाब में सन्नाटा मिला |हम समझ गए कुछ गड़बड़ है बाद में पता चला वो महिला पाकिस्तानी है और एमिरेट्स के काउंटर पर ज्यादातर पाकिस्तानी ही हैं ये एमिरेट्स की नीति का हिस्सा था या कुछ और इस पर कयास ही लगाये जा सकते हैं |लन्दन में भारतीयों से ज्यादा पाकिस्तानी हैं पर उनकी पहचान  पर भारत का साया हमेशा रहता है और वे लाख कोशिश करलें पर ये पहचान का संकट उनका पीछा नहीं छोड़ने वाला |सिक्योरिटी चेक में फिर ड्रामा लगता है मेरी शक्ल में ही कुछ दिक्कत है एक अंडाकार से कमरे में हाथ खड़े कर कई कोण बनाने पड़े ये क्रिया सारे लोगों से नहीं करवाई जा रही थी |हो सकता हो मेरे चेहरे से कोई दिक्कत हो |सामने शराब की दुकान का एक बड़ा काउंटर था जहाँ एक अधेड़ एक महिला से हिन्दी में बतिया रहे थे,जाहिर है वो उस एरिया के सेल्स प्रीजेंटेटीव थे और उनका एयरपोर्ट पर आने वाले मेहमानों को ज्यादा से ज्यादा सामान खरीदने के लिए प्रेरित करना था  |एक बार फिर मेरा भारतीय मन जाग उठा और मैं उनकी बातें सुनने की कोशिश करने लगा कि  ये अंग्रेज भारतीय हिन्दी में क्यों और काहे बतियाते हैं |वो मुझसे मुखातिब हुए बात शराब से शुरू हुई  कि कैसे यहाँ का ड्यूटी फ्री दिल्ली के ड्यूटी फ्री से अलग है क्योंकि दिल्ली की कीमतों से हीथ्रो की कीमतें कुछ ज्यादा अलग नहीं थी |बस यहाँ वेराईटी ज्यादा थी |पर कब हम घर परिवार पर पहुँच गए किसी को नहीं पता चला |उन्होंने बताया वे लोग कीनिया से लन्दन में बसे हैं उनके दादा गुजरात से कीनिया चले गए थे फिर उनके पिता जी कीनिया से लन्दन आ गए |जब हम बेतकुल्लफ हो गए तो मैंने पूछा एक बात बताइए ,यहाँ सब कुछ बहुत अच्छा है पर जब शाम होती है तो भारत याद आता है क्योंकि न यहाँ यार दोस्त हैं न रिश्तेदार तब आप क्या करते हैं ?उन्होंने कहा ये सब बातें दो चार दिन ही सालती हैं हम तो पहले से जड़ से कटे हुए लोग हैं |सबसे बड़ी चीजहै  आपका परिवार अगर वो आपके पास है ,सुखी प्रसन्न है तो और क्या चाहिए |मेरा बेटा जब सुबह काम पर निकलता है तो मुझे पता है वो शाम को सही सलामत लौट आएगा और अगर उसके साथ कोई गड़बड़ होगी तो यहाँ का पुलिस प्रशासन ,अस्पताल सब उसकी मदद करेंगे |भारत में क्या आप निश्चिन्त होकर निकलते हैं |मैंने कुतर्क किया होनी को कौन टाल सकता है |उन्होंने प्रतिवाद किया देखिये ये देश ऐसे ही नहीं महान बना है |यहाँ जो लोग बोलते हैं वही करते हैं पर भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है वो भारत के सिस्टम के कटु आलोचक जरुर थे पर उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से बड़ी उम्मीदें थीं |

केमडन बाजार

तर्क –वितर्क को पीछे छोड़ अब अंग्रेजों के देश को हमेशा के लिए विदा कहने का वक्त आ गया था ,चलते वक्त बारिश शुरू हो गयी थी |मैंने विमान की खिड़की से ऊपर आसमान पर नजर डाली |आसमान खुशी में भीगा था या दुःख में इसका फैसला मैं नहीं कर पा रहा था |मुझे ये पता था मैं अपने देश लौट रहा था जहाँ मेरा परिवार था ,जहाँ मेरे दोस्त थे |
  समाप्त 

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