Tuesday, March 21, 2017

नेट न्युट्र्लटी के लिए खतरा बनकर आया ऐड ब्लॉकिंग

माध्यम कोई भी हो जब तक उसे विज्ञापन का साथ नहीं मिलता तब तक उसका विस्तार सम्भव नहीं है|माध्यमों की प्रगति का यह सफर टीवी अखबार से होते हुए आज इंटरनेट तक पहुँच गया है और अब हम इंटरनेट विज्ञापनों के साथ जीना सीख ही रहे हैं पर बाजार इंटरनेट के माध्यम से कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा लेना चाहता है|असल में कंटेंट की दृष्टि से  टीवी और अखबार के मुकाबले इंटरनेट अपने चरित्र में ज्यादा लचीला है  इसलिए इंटरनेट विज्ञापनों से भर उठा है अन्य माध्यमों की तरह इंटरनेट पर विज्ञापनों का नियमन करना लगभग असंभव है लेकिन भारत जहाँ इंटरनेट क्रांति का अगुआ बन कर उभर रहा है वहीं भारतीय उपभोक्ता इंटरनेट पर विज्ञापनों के इस्तेमाल में  जागरूक उपभोक्ता बन कर भी उभर रहे हैंपेजफेयर संस्था द्वारा एक अध्ययन में  पाया गया किमार्च  2016  तक भारत में 122  मिलियन भारतीय स्वतंत्र रूप से मोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग का इस्तेमाल कर रहे थेभारत जैसा विकासशील देशऐड ब्लॉकिंग उपयोग के सन्दर्भ मेंदुनिया में  दूसरे स्थान पर हैजबकि चीन पहले स्थान पर है | जहाँ  दिसम्बर 2015 में 275 मिलियन लोग सारी दुनिया में मोबाइल ऐड ब्लॉकर तकनीक का इस्तेमाल  कर रहे थेवहीँ दिसम्बर 2016 में यह आंकड़ा  बढ़कर  615 मिलियन हो गया जिनमें बासठ 62 प्रतिशत लोग अर्थात 380 मिलियन लोग यह तकनीक मोबाइल में इस्तेमाल कर रहे थे |यनि सारी दुनिया में यह बढ़त तीस प्रतिशत रही |
ऐड ब्लॉकिंग एक प्रकार का सॉफ्टवेर है जो मोबाइलडेस्कटॉप स्मार्ट फ़ोन तथा टेबलेट आदि डिजिटल उपकरणों पर वेबपेज और वेबसाइट आदि के द्धारा  आने वाले अनचाहे विज्ञापनोंपॉपअप और स्पैम को रोकता है |
वेब सर्फिंग करते वक्त हमारे स्मार्टफोन पर अचानक कई ऐसे अनचाहे विज्ञापन आ जाते हैं जिनका हमारी खोज रुचियों से कोई लेना देना नहीं होता है |यह अनुभव मानसिक रूप से कष्टदायी और आर्थिक रूप से डाटा और धन का नाश करने वाला होता है जिसमें हमारी अनुमति के बगैर हमें अनावश्यक विज्ञापन झेला दिए जाते हैं |
ऑनलाइनलाइन विज्ञापन के इस संसार में दो तरह विज्ञापन प्रदाता होते हैं पहले जिनके प्लेटफोर्म  का इस्तेमाल करते हुए ऑनलाइन विज्ञापन दिए जाते हैं जैसे फेसबुक,गूगल और यूट्यूब आदि जो खुद कोई कंटेंट नहीं बनाते और दूसरों के कंटेंट का इस्तेमाल करते हुए अपनी पाठक /दर्शक संख्या बढ़ाते हैं |दूसरे हमारी डिवाईस में किसी और उत्पाद के साथ आ जाते हैं इसमें कुछ मेल वायर और स्पाई वायर भी हो सकते हैं जो किसी डिवाईस और डाटा के लिए हानिकारक होते हैं |ऐसे विज्ञापन जो उपभोक्ता की परोक्ष स्वीकृति के बगैर आ जाते हैं ज्यादा कष्टप्रद होते हैं क्योंकि यह इंटरनेट पर हमारे काम में बाधा डालते हैं इनका स्थान और वक्त निश्चित नहीं होता और ये अस्वाभाविक लगते हैं क्योंकि इनके लिए उपभोक्ता मानसिक रूप से तैयार नहीं होता ऐड ब्लॉकिंग ब्राउज़र से पेज स्पीड मे काफी तेज़ी आ जाती है क्योंकि अनावश्यक कंटेंट पहले ही ब्लॉक कर दिया जाता है और इसी रणनीति के तहत मोबाईल फोन बनाने वाली कम्पनियों ने एड ब्लॉकर सॉफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनियों के साथ समझौता करना शुरू कर दिया है इससे वे उन्हीं कम्पनियों के विज्ञापन अपने फोन पर दिखाएंगी जिनसे उनका करार है पर तस्वीर का दूसरा रुख भी है |एड ब्लॉकर के ज्यादा इस्तेमाल से ऑनलाईन विज्ञापनों से होने वाली आय पर असर पड़ेगा जिसमें वीडियो गेम बनाने वाली कम्पनियां प्रमुखता से प्रभावित हो रही हैं|दूसरा खतरा  नेट न्युट्र्लटी को है जिसमें सूचना सम्बन्धी विज्ञापन आते हैं  जो भी समाग्री इन्टरनेट पर अपलोड होगीकोई ज़रूरी नहीं कि वह  उपभोक्ता के  सर्च करने पर देखी ही  जा सकेकारण मोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग,वह  केवल उन्हीं विज्ञापन साइट्स को प्रदर्शित करेगा जिन कम्पनियों  का टाईअप मोबाइल ब्राउज़र से हो चुका हैमोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग के चलते केवल टाईअप साइट्स ही प्रदर्शित होगी वहीँ  बाज़ार का एक बड़ा हिस्सा जो बिना किसी शुल्क के मुफ्त  में  इन्टरनेट और सोशल मीडिया के द्वारा  अपने प्रोडक्ट का प्रचार कर रहे था वो इससे महरूम रह जायेगेऔर यह तकनीकी बदलाव नेट नेट न्युट्र्लटी को खत्म कर सकती है इस मौक़े का फायद गूगल जैसी सर्च इंजन और सोशल मीडिया उठाने साइट्स के लिए तैयार है |
हिन्दुस्तान में 21/03/17 को प्रकाशित लेख 

Thursday, January 12, 2017

दादी के जमाने के दस बर्तन जो अब किचन में कम दिखते हैं

किचन घर का वो हिस्सा जिसके इर्द गिर्द हमारा पूरा घर घूमता है और जहाँ दिन भर में एकाध बार सभी का आना जाना होता है |मैं भी कुछ अलग नहीं हूँ मेरा भी अपने घर की किचन में आना जाना होता ही रहता है पर इस ठिठुरती ठंड में इन दिनों किचन के चक्कर ज्यादा लग रहे हैं क्योंकि गर्म पानी शरीर को ज्यादा राहत देता है ऐसे ही एक दिन जब पानी गर्म करने के लिए मैं गैस का लाईटर खोज रहा है और इस चक्कर में किचन को कुछ ज्यादा ही करीब देखने का मौका लगा तो मैं भी खो गया अपने बचपन की यादों में ,जब किचन डिजाइनर नहीं बल्कि घर का एक पूजनीय हिस्सा हुआ करता था ,जहाँ बिना नहाये जाने पर पाबंदी थी |बासी खाना लुत्फ़ लेकर नाश्ते में “पीढ़े” पर बैठकर खाया जाता था ,डाईनिंग टेबल का नाम भी किसी ने नहीं सुना था|डबलरोटी (ब्रेड ) विलासिता थी  जिससे सेहत खराब होती थी , खाते वक्त बोलना असभ्यता की निशानी थी और माँ खाना बनाते न तो कभी थकती थी और न ही कभी यह कहती थी आज खाना बाहर से मंगवा लिया जाए |कहने को हम लखनऊ जैसे शहर में रहते थे पर वो शहर आज के शहर जैसा नहीं था ,गैस के चूल्हे आने शुरू ही हुए थे पर अंगीठी और चूल्हे से जुडी हुई चीजें अभी भी इस्तेमाल में थीं जिनके इर्द गिर्द हमारा बचपन बीता फिर धीरे –धीरे वो सब चीजें हमारे जैसी पीढी की यादों का हिस्सा बनती चली गयीं जैसे किचन में एक दुछत्ती का होना अब किचन में वार्डरोब होता है  |वो ज्वाईंट फैमली का जमाना था जब खाना बनाने में पूरे घर की महिलाएं लगती थी और बच्चों के लिए यह दौर किसी उत्सव से कम न होता था |अब तो लोग शायद उन्हें पहचान भी न पायें तो मैंने भी अपने बचपन के यादों के पिटारे के बहाने हमारे किचन से गायब हुई उन चीजों की लिस्ट बनाने की कोशिश की है जिनके बहाने ही सही उस पुराने दौर को एक बार फिर जी लिया जाए जो अब हमारे जीवन में दुबारा नहीं आने वाला है :

·         बटलोई या बटुली
 

 बटलोई एक ऐसा बर्तन हुआ करता था जिसमें सबसे ज्यादा दाल पकाई जाती थी गोलाकार नीचे से चपटी दाल पकने से दस मिनट पहले चूल्हे से उतार ली जाती थी और बटलोई की गर्मी से दाल अपने आप अगले दस मिनट में पक जाती थी तब भगोने उतने ज्यादा आम नहीं थे आमतौर पर बटुली कसकुट धातु से बनती थी |कसकुट एक ऐसी धातु है जो ताम्बे और जस्ते (एल्युमिनियम )के मिश्रण से बनती थी |अपनी बनावट में यह गगरी से मिलती जुलती थी पर इसका मुंह ज्यादा बड़ा होता था और तला अंडाकार चपटा होता था |गैस चूल्हे के आने से इनकी उपयोगिता समाप्त हो गयी क्योंकि इनकी बनावट ऐसी थी जिसके कारण गैस पर इन्हें रखना मुश्किल होता था |दूसरा कारण स्टील का प्रयोग हमारे जीवन में बढना था जो सस्ता और ज्यादा टिकाऊ था |इस तरह बटुली हमारी यादों का हिस्सा बन गयी और अब रसोईघरों में नहीं दिखती |

·         संडसी

लोहे की बनी हुई बड़े मुंह वाली जो आकार में प्लास की बड़ी बहन लगती थी ,बटुली और बड़े आकार के गर्म बर्तनों को चूल्हे से उतारने के काम आती थी |अपनी बनवाट में यह बहुत पतली सी लोहे की वी आकार में होती थी पर मजबूत पकड़ के कारण बहुत काम की हुआ करती थी |अब ये रसोई घर में यह अमूमन स्टील की और छोटे आकार में मिलती है पर अब इसकी उतनी जरुरत नहीं पड़ती |
·         फुकनी
जब चूल्हे और अंगीठी का ज़माना था तब उनकी आग को बढाने के लिए आग को फूंकना पड़ता था जिसमें दफ्ती से लेकर कागज का इस्तेमाल होता था इसी काम को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए फूंकनी का यूज किया जाता था |ठोस लोहे की बनी फूंकनी आकार में बांसुरी की तरह होती थी जो दोनों और से खुली होती थी एक तरफ से फूंका जाता था दूसरी तरफ से फूंक आग में जाती थी |अब यह लुप्त प्राय श्रेणी में है शहरों में ||

·         मर्तबान

अचार रखने केलिए खासकर इनका प्रयोग होता था चीनी मिट्टी के बने ये मर्तबान किचन का अहम् हिस्सा थे जिनमें तरह तरह के अचार रखे जाते थे |नीचे से सफ़ेद और ऊपर ज्यादातर पीले या काले रंग के छोटे बड़े और मंझोले आकार के चीनी मिट्टी के ऐसे प्यालों में तीज त्योहार के समय दही बड़े और ऐसे पकवान रखे जाते थे जिनमें तरल ज्यादा होता था |बड़े सलीके से इन्हें किचन में बनें ताखे से उतारना पड़ता था |लाईफ जैसे जैसे फास्ट होती गयी इनकी यूटीलटी कम होती गयी इनकी जगह प्लास्टिक और स्टील से बने मर्तबानों ने ले ली जिनका मेंटीनेंस आसान और कीमत कम थी |भागती दौडती जिन्दगी ने कभी हमारी जिन्दगी का अहम हिस्सा रहे इन  मर्तबानों को हमारी जिन्दगी से अलग कर दिया |

·         सूप


गूगल पर अगर आप सूप खोजने की कोशिश करेंगे तो आपको तरह –तरह के सूप बनाने की विधी बता देगा अपर वो सूप कभी नहीं दिखाएगा जिस सूप की बात यहाँ की जा रही है |सरपत की पतली बालियों से बन कर बना यह देशी यंत्र एक वक्त में हमारी रसोई का इम्पोर्टेंट टूल था जिसका इस्तेमाल  तरह –तरह के अनाजों को साफ़ करने के लिए किया जाता है जिसे अवधी में पछोरना कहते हैं |सूप में अनाज को भर कर धीरे –धीरे एक विशेष प्रकार से उसे हवा में उछाला जाता था और सूप के नीचे आने पर हाथ से धीरे से थाप दी जाती थी |सूप का इस्तेमाल करना भी एक कला हुआ करती थी |हर कोई सूप का इस्तेमाल नहीं कर सकता है |अनाज सूप में रह जाता था और गंदगी बाहर आ जाती थी |अब शादी या किसी शुभ अवसर पर इसकी जरुरत पड़ती है क्योंकि यह हमारी परम्पराओं का हिस्सा रहा है पर इसे शहर की किचन में खोजना मुश्किल है |

·         खल मूसल

इसका एक और प्रचलित नाम इमाम दस्ता भी है जो तरह –तरह के खड़े मसालों को पीसने के काम में आता था अभी भी मांसाहार बनाते वक्त इनकी याद आती है जब खड़े मसालों का इस्तेमाल किया जाता है |मिक्सी और पिसे मसलों के बाजार में आ जाने से इनके प्रयोग की जरुरत नहीं पड़ती और किचन से यह धीरे से गायब हो गए यह लोहे और लकड़ी के हुआ करते थे |खल एक गोल जार जैसा होता था जिसमें मसाले डाल दिए जाते थे और मूसल एक डंडा नुमा आकृति थी जिससे मसालों पर लगातार  चोट की जाती थी और धीरे –धीरे मसाले पाउडर जैसे हो जाते थे |खल और मूसल में जब मसाले कूटे जा रहे होते तो एक विचित्र तरह की आवाज निकलती थी जो इस बात का सूचक थी आज कुछ चटपटा मसालेदार घर की किचन में बनने वाला है |

·         सिल बट्टा

जब बात चटनी की हो तो सिल बट्टा के बगैर हमारी यादों की ये कहानी पूरी नहीं हो सकती पत्थर की सिल पर बट्टे से मसाले और चटनी पीसी जाती थी |आप सब कुछ अपने सामने देख सकते थे कि किस तरह फल पत्ती और मसाले एक भोज्य पदार्थ का रूप ले रहे होते ,पर समय की कमी और मिक्सी की सुलभता से अब सब काम मिनटों में हो जाता है और किसी को कुछ पता भी नहीं पड़ता कि बिजली के जोर ने बंद डिब्बे के भीतर कैसे सबको मिला दिया |तब जिन्दगी का लुत्फ़ लिया जाता था आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए आज को खो नहीं दिया जाता था |धीरे –धीरे चटनी मसाले एक दुसरे में मिलते थे यूँ समझ लीजिये हौले हौले जिन्दगी का एक रंग दुसरे रंग से मिलता था और बनता था जिन्दगी का एक नया रंग जिसमें मेहनत की अहम् भूमिका हुआ करती थी |

·         कद्दूकस 

इसका नाम कद्दूकस क्यों पडा इस प्रश्न का जवाब मुझे आज तक नहीं मिला क्योंकि इस कद्दूकस में मैंने कभी कद्दू का इस्तेमाल होते नहीं देखा |इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल जाड़ों के दिनों में गाजर का हलुवा बनाने के लिए गाजर को कसते जरुर देखा |मुली दूसरी सब्जी रही जिसको खाने के लिए कद्दूकस का इस्तेमाल होता था |एक चारपाई आकार का मोडल जिसमें अगर कोई चीज घिसी जाए तो उसके रेशे नीचे गिरते थे सलाद बनाने में और गरी को घिसने में भी खूब इस्तेमाल हुआ पर अब किसी के पास समय कहाँ हैं जब चीजों को घटते हुए देखा जाए अब तो इंस्टेंट का दौर है जो भी हो बस जल्दी हो आउटकम पर ज्यादा जोर है प्रोसेस पर कम नतीजा किचन से एक और परम्परागत यंत्र का गायब हो जाना |

·         फूल की थाली

फूल एक धातु का नाम है जो ताम्बे और जस्ते के मिश्रण से बनती थी स्टील तब इतना लोकप्रिय नहीं हुआ था |समाज का माध्यम वर्ग ज्यादतर अपने घरों में फूल के बर्तन इस्तेमाल करता था जिसमें लोटा, गिलास, कटोरा, थारा, परात, बटुली-बटुला, गगरा, करछुल, कड़ाही जैसी चीजें शामिल हुआ करती थीं |निम्न वर्ग एल्युमिनियम के बर्तनों का इस्तेमाल ज्यादा करता था पर अब इन सब धातुओं की जगह स्टील ने ले ली है |
·         राख और पत्थर
कभी हमारे रसोई की कल्पना राख और पत्थर के बगैर हो ही नहीं सकती थी राख की जगह आजकल विम् बार ने ले ली है और पत्थर से अब बर्तन मांजे नहीं जाते कारण गैस का आ जाना और बर्तन अबी ज्यादतर स्टील के होतेहैं जिनकी सफाई में अब ज्यादा मेहनत नहीं लगती |
भारत के शहरी रसोई घरों में समय का एक पूरा पहिया घूम चुका है और इसमें कुछ भी बुरा नहीं जो आज नया है कल किसी और की यादों का हिस्सा होगा रसोई घर के बहाने ही सही मैंने अपनी यादें सहेज लीं |

Wednesday, January 11, 2017

ई -वॉलेट को मिल पायेगा वो भरोसा !

इंटरनेट एक विचार के तौर पर सूचनाओं को साझा करने के सिलसिले के साथ शुरू हुआ था चैटिंग और ई मेल से यह हमारे जीवन में जगह बनाता गया फिर ओनलाईन शॉपिंग ने खेल के सारे मानक बदल दिए पर  भारत में इस सूचना क्रांति के अगुवा बने स्मार्टफोन जिन्होंने मोबाईल एप  और ई वालेट के जरिये पर्स में पैसे रखने के चलन को हतोसाहित करना शुरू किया |आज सरकार भी यह चाहती है कि लोग पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन को बढ़ावा दे रही है जिससे काले धन पैदा होने की संभावना को समाप्त किया जा सके और नोट छापने के अनावश्यक खर्च से बचा जा सके |टफ्ट्स विश्वविद्यालय के  प्रकाशन कॉस्ट ऑफ़ कैश इन इण्डियाके आंकड़ों के अनुसार भारत नोट छापने और उनके प्रबन्धन के लिए सालाना इक्कीस हजार करोड़ रुपये खर्च  करता है एक हजार और पांच सौ रुपये के पुराने एक नोट छापने में रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया को क्रमशःदो रुपये पचास पैसे और तीन रुपये सत्रह पैसे खर्च करने पड़ते थे |मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार साल 2011से 2105 तक ई भुगतान ने देश की अर्थव्यवस्था में 6.08 बिलियन डॉलर  का इजाफा किया है|मैकिन्सी ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन के बढ़ने से साल 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था में 11.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी |आंकड़े आने वाले कल की सुनहरी उम्मीद जगाते हैं पर ये मामला मानवीय व्यवहार से जुड़ा है जिसके बदलने में वक्त लगेगा | भारतीय परिस्थितियों में मौद्रिक लेन देन विश्वास से जुड़ा मामला भी है जब हम जिसे पैसा दे रहे हैं वो हमारे सामने होता है जिससे एक तरह का भरोसा जगता है |
पर महज स्मार्ट फोन प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने से लोग डिजीटल लेन-देन की तरफ बढ़ेंगे ऐसा वर्तमान परिस्थतियों में सम्भव नहीं दिखता और डिजीटल लेन-देन की अपनी समस्याएँ हैं | मार्च 2016 तक भारत में 342.46 मिलीयन इंटरनेट प्रयोगकर्ता है जो कुल आबादी का मात्र का छब्बीस प्रतिशत हैं |ऑनलाइन उपभोक्ता अधिकार जैसे मुद्दों पर न तो कोई जागरूकता है न ही सार्थक कानून ई वालेट प्रयोग  और ऑन लाइन खरीददारी उपयोगिता के तौर पर बहुत लाभदायक है पर किन्ही कारणों से आपको खरीदा सामान वापस करना पड़ा या खराब उत्पाद मिल गया और उपभोक्ता अपना पैसा वापस चाहता है तो  अनुभव यह बताता है कि उसे पाने में तीन से दस  दिन तक का समय लगता है और इस अवधि में उस धन पर डिजीटल प्रयोगकर्ता को कोई ब्याज नहीं मिलता और  यह एक लम्बी थकाऊ प्रक्रिया है जिसमें अपने पैसे की वापसी के लिए बैंक और ओनलाईन शौपिंग कम्पनी के कस्टमर केयर पर बार बार फोन करना पड़ता है |कई बार कम्पनियां पैसा नगद न वापस कर अपनी खरीद बढ़ाने के लिए गिफ्ट कूपन जैसी योजनायें जबरदस्ती उपभोक्ताओं के माथे मढ देती हैं और ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न हुई समस्या के समयबद्ध निपटारे की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है |जेब में पैसा होना एक तरह का आत्मविश्वास देता है |क्या वह विश्वास   जेब में पड़ा मोबाईल ई वालेट या डेबिट /क्रेडिट कार्ड दे पायेगा जहाँ  देश  में डिजीटल लेन-देन अभी विकसित देशों के मुकाबले उतनी ज्यादा मात्रा में नहीं हो रहा है फिर भी सर्वर बैठने की समस्या से उपभोक्ताओं को अक्सर दो चार होना  पड़ता है |मोबाईल का नेटवर्क हवा के झोंके के साथ आता जाता रहता है |बैंक से पैसा निकल जाता है और सम्बन्धित कम्पनी तक नहीं पहुँचता फिर उसके वापस आने का इन्तजार | राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2011 से 2015 के बीच भारत में साइबर अपराध की संख्या में तीन सौ पचास प्रतिशत की वृद्धि हुई है जिनमे बड़ी संख्या में आर्थिक  साइबर अपराध  भी शामिल हैं जागरूकता में कमी के कारण आमतौर पर जब उपभोक्ता ऑनलाईन धोखाधड़ी का शिकार होता है तो उसे समझ ही नहीं आता वो क्या करे| ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जितनी जल्दी मिलेगा लोग उतनी तेजी से इलेक्ट्रौनिक ट्रांसेक्शन की तरफ बढ़ेंगे |देश की बड़ी आबादी अशिक्षित और निर्धन है वो आने वाले वक्त में कितनी बड़ी मात्रा में  डिजीटल लेन देन करेगी यह उस व्यवस्था पर निर्भर करेगा जहाँ लोग पैसा खर्च करते उसी निश्चिंतता और भरोसे को पा सकें जो उन्हें कागजी मुद्रा के लेन देन करते वक्त प्राप्त होती है  |
नवोदय टाईम्स में 11/01/17 को प्रकाशित 

Saturday, January 7, 2017

इंटरनेट पर कमज़ोर क्यों है आवाज की ताकत

तस्वीरों की दौड़ में हमने आवाज को लगभग भुला ही दिया है। स्मार्टफोन ने देश में इंटरनेट प्रयोग के आयाम जरूर बदले हैं और इसके साथ सोशल नेटवर्किंग ने हमारे संवाद व मेल-मिलाप का तरीका भी बदल दिया है। इसमें यू-ट्यूब और फेसबुक लाइव जैसे फीचर बहुत लोकप्रिय हुए हैं। इन सबके साथ हमने इंटरनेट को वीडियो का ही माध्यम समझ लिया है और ऑडियो यानी ध्वनि को नजरंदाज कर दिया गया है। भारत में अगर आप अपने विचार अपनी आवाज के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं, तो आपको इंटरनेट पर खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। व्यवसाय के रूप में जहां यू-ट्यूब के वीडियो चैनल भारत में काफी लोकप्रिय हैं, वहीं ध्वनि का माध्यम अभी जड़ें जमा नहीं पाया है, जबकि बाकी दुनिया में ऑडियो का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है।
इंटरनेट पर ऑडियो फाइल को शेयर करना पॉडकास्ट के नाम से जाना जाता है। पॉडकास्ट दो शब्दों से मिलकर बना है, प्लेयेबल ऑन डिमांड (पॉड) और ब्रॉडकास्ट से। नीमन लैब के एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2016 में अमेरिका में पॉडकास्ट (इंटरनेट पर ध्वनि के माध्यम से विचार या सूचना देना) के उपयोगकर्ताओं यानी श्रोताओं की संख्या में काफी तेजी से इजाफा हुआ है। वहां इस माध्यम पर विज्ञापनों द्वारा होने वाली कमाई में पिछले वर्ष लगभग 48 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और वर्ष 2020 तक इसके लगातार 25 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने की उम्मीद है। इस वृद्धि दर से वर्ष 2020 तक पॉडकास्टिंग से होने वाली आमदनी पांच सौ मिलियन डॉलर के करीब पहुंच जाएगी। पॉडकास्टिंग की शुरुआत हालांकि एक छोटे माध्यम के रूप में हुई थी, पर अब यह एक संपूर्ण डिजिटल उद्योग का रूप धारण करता जा रहा है। अमेरिका की सबसे बड़ी पॉडकास्टिंग कंपनी एनपीआर की सालाना आमदनी लगभग दस मिलियन डॉलर के करीब है। भारत में पॉडकास्टिंग के जड़ें न जमा पाने के कारण हैं ध्वनि के रूप में सिर्फ फिल्मी गाने सुनने की परंपरा और श्रव्य की अन्य विधाओं से परिचित ही नहीं हो पाना। इसके अलावा भारत में ज्यादातर एफएम स्टेशन एक जैसी ही सामग्री श्रोताओं को परोसते हैं। उन्हें समाचार प्रसारण का अधिकार भी नहीं प्राप्त है, जबकि पॉडकास्टिंग को मीडिया के श्रव्य विकल्प के रूप में देखने की आवश्यकता है। भारत जैसे देशों में, जहां इंटरनेट की स्पीड काफी कम होती है, वीडियो के मुकाबले पॉडकास्टिंग ज्यादा कामयाब हो सकती है।
इस वक्त भारत में दो प्रमुख पॉडकास्ट सेवाएं नियमित रूप से प्रसारित की जा रही हैं, जिनमें इंडसवॉक्स और ऑडियोमैटिक काफी लोकप्रिय हैं, पर ये भारतीय भाषाओं में नहीं हैं। ऑडियोमैटिक ने अपनी शुरुआत के एक साल में एक लाख नियमित श्रोता जुटा लिए हैं। इंडसवॉक्स म्यूजिक स्ट्रीमिंग साइट सावन पर उपलब्ध है। स्मार्टफोन की उपलब्धता के अनुपात में इनके श्रोता अभी काफी कम हैं। शहरी भारत में औसत रूप से एक व्यक्ति 46 मिनट सफर करता है और यह समय लगातार बढ़ रहा है। इस समय उसके पास आमतौर पर कुछ सुन सकने का ही विकल्प होता है। संगीत (ज्यादातर फिल्मी) के अलावा अन्य सामग्री उपलब्ध नहीं होती है, इसलिए वह केवल संगीत सुनने को ही मजबूर होता है।
भारत के मामले में एक बात तय मानी जाती है कि पॉडकास्टिंग यहां विज्ञापन आधारित ही होगी। कुछ भी मनपसंद सुनने के लिए पैसे खर्च करने की परंपरा यहां नहीं है। एफएम चैनल चलाने वाली कंपनियां लंबे समय से कोशिश कर रही हैं कि सरकार से उन्हें समाचार व करेंट अफेयर्स के कार्यक्रम प्रसारित करने की इजाजत मिले। लेकिन सरकार उन्हें यह इजाजत नहीं दे रही। इन कंपनियों के लिए पॉडकास्टिंग एक ज्यादा अच्छा विकल्प हो सकती है। भारत जैसे देश में ऑडियो व्यवसाय के लिए संभावनाएं कितनी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि एक समय तक पड़ोसी नेपाल में निजी क्षेत्र को एफएच चैनल चलाने की इजाजत नहीं थी। वहां उन्हें न सिर्फ इसकी इजाजत मिली, बल्कि एफएम पर समाचार के प्रसारण का अधिकार भी मिल गया। आज नेपाल में सैकड़ों एफएम चैनल हैं और ज्यादातर सफल हैं। भारत इस मंजिल को पॉडकास्टिंग के जरिये भी पा सकता है।
हिन्दुस्तान में 07/01/2016 में प्रकाशित 

Thursday, December 8, 2016

यहाँ विकास का अर्थ कंकरीट है

विकास एक बहुआयामी धारणा है जिसके केंद्र में है मानव और उससे जुड़ा हुआ परिवेश जिसमें वह उपलब्ध संसाधनों की सहायता से अपना जीवनस्तर  बेहतर कर सके |संसाधनों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण  है प्राकृतिक संसाधन जो कि इंसानों के अस्तित्व के लिए सर्वाधिक आवश्यक है | किसी भी विकास का अंतिम लक्ष्य मानव मात्र का जीवन स्तर बेहतर करना ही होता है पर उसके मूल में प्रकृति का साथ भी होता है |दुर्भाग्य से भारत में विकास की जो अवधारणा लोगों के मन में है उसमें प्रकृति कहीं भी नहीं है,हालाँकि हमारी विकास की अवधारणा  पश्चिम की विकास सम्बन्धी अवधारणा की ही नकल है पर स्वच्छ पर्यावरण के प्रति जो उनकी जागरूकता है उसका अंश मात्र भी हमारी विकास के प्रति जो दीवानगी है उसमें नहीं दिखती है |भारत में आंकड़ा पत्रकारिता की नींव रखने वाली संस्था इण्डिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार भारत के शहर लगातार गर्म होते जा रहे हैं कोलकाता में पिछले बीस सालों में वनाच्छादन 23.4 प्रतिशत से गिरकर 7.3 प्रतिशत हो गया है वहीं निर्माण क्षेत्र में 190 प्रतिशत की वृद्धि हुई है साल 2030 तक कोलकाता के कुल क्षेत्रफल का मात्र 3.37प्रतिशत हिस्सा ही वनस्पतियों के क्षेत्र के रूप में ही बचेगा |अहमदाबाद में पिछले बीस सालों में वनाच्छादन 46 प्रतिशत से गिरकर 24 प्रतिशत पर आ गया है जबकि निर्माण क्षेत्र में 132 प्रतिशत की  वृद्धि हुई है साल 2030 तक वनस्पतियों के लिए शहर में मात्र तीन प्रतिशत जगह बचेगी |भोपाल में पिछले बाईस वर्षों में वनाच्छादन छाछट प्रतिशत से गिराकर बाईस प्रतिशत हो गया है और 2018 तक यह वनाच्छादन ग्यारह प्रतिशत रह जाएगा |भोपाल उन छोटे शहरों में है जो अभी मेट्रो शहर की श्रेणी में नहीं पर उस होड़ में शामिल हो चुके हैं जहाँ शहर को स्मार्ट होना है |इसका बड़ा कारण हमारी वह मानसिकता है जो विकास को कंक्रीट या पक्के निर्माण से जोडती है |गाँव में पक्के मकान का ज्यादा होना मतलब गाँव विकसित है |ऐसी सोच सरकारों को ज्यादा से ज्यादा पक्के निर्माण के लिए प्रेरित करती है चूँकि पर्यावरण भारत जैसे देश में उतनी प्राथमिकता अभी नहीं रखता जितना कि लोगों के जीवन स्तर में उठाव इसलिए विकास पर्यवरण की कीमत पर लगातार हो रहा है |विकसित देशों ने जहाँ एक संतुलन बनाये रखा वहीं भारत जैसे दुनिया के तमाम अल्पविकसित देश विकास के इस खेल में अपनी जमीनों को कंक्रीट और डामर के घोल पिलाते जा रहे हैं जिसका नतीजा तापमान में बढ़ोत्तरी गर्मियां ज्यादा गर्म और ठण्ड और ज्यादा ठंडी |पेड़ ,घास झाड़ियाँ और मिट्टी सूर्य ताप को अपने में समा लेती हैं जिससे जमीन ठंडी रहती है पर इस कंक्रीट केन्द्रित विकास में यह सारी चीजें हमारे शहरों से लगातार कम होती जा रही हैं |यह एक चक्र है कुछ शहर रोजगार और अन्य मूलभूत सुविधाओं के हिसाब से अन्य शहरों के मुकाबले ज्यादा बेहतर होते हैं लोग वहां रोजगार की तलाश में पहुँचने लगते हैं |गाँव खाली होते हैं चूँकि वहां ज्यादा लोग नहीं होते हैं इसलिए सरकार की प्राथमिकता में नहीं आते शहरों में भीड़ बढ़ती है|कोलतार या डामर से  नई सड़कें बनती हैं पुरानी चौड़ी होती हैं नए मकान और फ़्लैट बनते हैं |सार्वजनिक यातायात के लिए कंक्रीट के खम्भों पर कोलतार की सडक के ऊपर मेट्रो दौडती है शहरों में भीड़ बढ़ती है और कंक्रीट के नए जंगल वानस्पतिक जंगलों की जगह लेते जाते हैं और खेती योग्य जमीन की जगह ऊँची ऊँची अट्टालिकाएं लेती हैं आस पास के जंगल खत्म होते हैं |पानी के प्राकृतिक स्रोत सूख जाते हैं या सुखा दिए जाते हैं कंक्रीट केन्द्रित निर्माण के लिए  चूँकि जगह लगातार कम होती जाती है इसलिए मौसम की मार से बचने के लिए ऐसी जगह एयरकंडीशनर का बहुतायत से प्रयोग किया जाता है जो गर्म हवा छोड़ते हैं और वातावरण को और गर्म करते हैं एयरकंडीशनर और अन्य विद्युत जरूरतों को पूरा करने के लिए नदियों का प्रवाह रोका जाता है और विशाल कंक्रीट के बाँध बनाये जाते हैं लोगों के घर डूबता हैं पशु पक्षियों और वनस्पतियों को हुआ नुक्सान अकल्पनीय होता है |ऐसे पर्यावरण में रहने वाला इंसान तनाव और गुस्से के कारण बहुत सी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का शिकार होता है  और विकास की यह दौड़ जारी रहती है पर अब इस दौड़ का परिणाम वनस्पतियों के खत्म होने, जंगली जानवरों के लुप्त होने और मौसम के बड़े बदलाव में दिख रहा है |इस तेजी से स्मार्ट होते हुए भारत में जहाँ हर चीज तकनीक के नजरिये से देखी जा रही हो वहां प्रकृति के बगैर स्मार्ट शहरों की अगर कल्पना हो रही हो तो यह अंदाजा लगाना बिलकुल मुश्किल नहीं है कि वहां का जीवन आने वाली पीढीयों के लिए कैसा कल छोड़ जाएगा |
अमर उजाला में 08/12/16 को प्रकाशित 

Wednesday, December 7, 2016

भुलक्कड़ बना रहा है इंटरनेट

इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो लीपर अब वक्त है इसके और आयामों पर चर्चा करने का |आज हमारी  पहचान का एक मानक वर्च्युअल वर्ल्ड में हमारी उपस्थिति भी है और यहीं से शुरू होता है फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग से जुड़ने का सिलसिलाभारत में फेसबुक के सबसे ज्यादा प्रयोगकर्ता हैं पर यह तकनीक अब भारत में एक चुनौती बन कर उभर रही है चर्चा के साथ साथ आंकड़ों से मिले तथ्य साफ़ इस ओर इशारा कर रहे हैं  कि स्मार्टफोन व इंटरनेट लोगों को व्यसनी बना रहा है|  चीन के शंघाई मेंटल हेल्थ सेंटर के एक अध्ययन के मुताबिकइंटरनेट की लत शराब और कोकीन की लत से होने वाले स्नायविक बदलाव पैदा कर सकती हैलोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है। शहर फैल रहे हैं और इंसान पाने में सिमट रहा है|नतीजतनहमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैजहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता हैभारत जैसे देश में समस्या यह है कि यहां तकनीक पहले आ रही हैऔर उनके प्रयोग के मानक बाद में गढ़े जा रहे हैं|
मोबाइल ऐप (ऐप्लीकेशन) विश्लेषक कंपनी फ्लरी के मुताबिकहम मोबाइल ऐप लत की ओर बढ़ रहे हैं। स्मार्टफोन हमारे जीवन को आसान बनाते हैंमगर स्थिति तब खतरनाक हो जाती हैजब मोबाइल के विभिन्न ऐप का प्रयोग इस स्तर तक बढ़ जाए कि हम बार-बार अपने मोबाइल के विभिन्न ऐप्लीकेशन को खोलने लगें। कभी काम सेकभी यूं ही। फ्लरी के इस शोध के अनुसारसामान्य रूप से लोग किसी ऐप का प्रयोग करने के लिए उसे दिन में अधिकतम दस बार खोलते हैंलेकिन अगर यह संख्या साठ के ऊपर पहुंच जाएतो ऐसे लोग मोबाइल ऐप एडिक्टेड की श्रेणी में आ जाते हैं। पिछले वर्ष इससे करीब 7.करोड़ लोग ग्रसित थे। इस साल यह आंकड़ा बढ़कर17.करोड़ हो गया हैजिसमें ज्यादा संख्या महिलाओं की है।
 वी आर सोशल की डिजिटल सोशल ऐंड मोबाइल 2015 रिपोर्ट के मुताबिकभारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं के आंकड़े काफी कुछ कहते हैंइसके अनुसारएक भारतीय औसतन पांच घंटे चार मिनट कंप्यूटर या टैबलेट पर इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। इंटरनेट पर एक घंटा 58 मिनटसोशल मीडिया पर दो घंटे 31 मिनट के अलावा इनके मोबाइल इंटरनेट के इस्तेमाल की औसत दैनिक अवधि है दो घंटे 24 मिनटइसी का नतीजा हैं तरह-तरह की नई मानसिक समस्याएं- जैसे फोमोयानी फियर ऑफ मिसिंग आउटसोशल मीडिया पर अकेले हो जाने का डर। इसी तरह फैडयानी फेसबुक एडिक्शन डिसऑर्डरइसमें एक शख्स लगातार अपनी तस्वीरें पोस्ट करता है और दोस्तों की पोस्ट का इंतजार करता रहता है। एक अन्य रोग में रोगी पांच घंटे से ज्यादा वक्त सेल्फी लेने में ही नष्ट कर देता है। इस वक्त भारत में 97|8 करोड़ मोबाइल और14 करोड़ स्मार्टफोन कनेक्शन हैंजिनमें से 24|3 करोड़  इंटरनेट पर सक्रिय हैं और 11|8 करोड़ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं|
 कैस्परस्की लैब द्वारा इस वर्ष किए गए एक शोध में पाया गया है कि करीब 73 फीसदी युवा डिजिटल लत के शिकार हैंजो किसी न किसी इंटरनेट प्लेटफॉर्म से अपने आप को जोड़े रहते हैंसाल 2011 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया द्वारा किए गए रिसर्च में यह निष्कर्ष निकाला गया था की युवा पीढ़ी किसी भी सूचना को याद करने का तरीका बदल रही हैक्योंकि वह आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है। वे कुछ ही तथ्यों को याद रखते हैंबाकी के लिए इंटरनेट का सहारा लेते हैंइसे गूगल इफेक्ट या गूगल-प्रभाव कहा जाता है|
इसी दिशा में कैस्परस्की लैब ने साल 2015 में डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट से सभी पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के ऊपर शोध किया हैकैस्परस्की लैब ने ऐसे छह हजार लोगों की गणना कीजिनकी उम्र 16-55 साल तक थी। यह शोध कई देशों में जिसमें ब्रिटेनफ्रांसजर्मनीइटली, स्पेन आदि देशों के 1,000 लोगों पर फरवरी 2015 में ऑनलाइन किया गयाशोध में यह पता चला की गूगल-प्रभाव केवल ऑनलाइन तथ्यों तक सीमित न रहकर उससे कई गुना आगे हमारी महत्वपूर्ण व्यक्तिगत सूचनाओं को याद रखने के तरीके तक पहुंच गया हैशोध बताता है कि इंटरनेट हमें भुलक्कड़ बना रहा हैज्यादातर युवा उपभोक्ताओं के लिएजो कि कनेक्टेड डिवाइसों का प्रयोग करते हैंइंटरनेट न केवल ज्ञान का प्राथमिक स्रोत हैबल्कि उनकी व्यक्तिगत जानकारियों को सुरक्षित करने का भी मुख्य स्रोत बन चुका हैइसे कैस्परस्की लैब ने डिजिटल एम्नेशिया का नाम दिया हैयानी अपनी जरूरत की सभी जानकारियों को भूलने की क्षमता के कारण किसी का डिजिटल डिवाइसों पर ज्यादा भरोसा करना कि वह आपके लिए सभी जानकारियों को एकत्रित कर सुरक्षित कर लेगा। 16 से 34 की उम्र वाले व्यक्तियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने माना कि अपनी सारी जरूरत की जानकारी को याद रखने के लिए वे अपने स्मार्टफोन का उपयोग करते हैइस शोध के निष्कर्ष से यह भी पता चला कि अधिकांश डिजिटल उपभोक्ता अपने महत्वपूर्ण कांटेक्ट नंबर याद नहीं रख पाते हैं|एक यह तथ्य भी सामने आया कि डिजिटल एम्नेशिया लगभग सभी उम्र के लोगों में फैला है और ये महिलाओं और पुरुषों में समान रूप से पाया जाता है|
वर्चुअल दुनिया में खोए रहने वाले के लिए सब कुछ लाइक्स व कमेंट से तय होता है|वास्तविक जिंदगी की असली समस्याओं से वे भागना चाहते हैं और इस चक्कर में वे इंटरनेट पर ज्यादा समय बिताने लगते हैंजिसमें चैटिंग और ऑनलाइन गेम खेलना शामिल हैं। और जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलतातो उन्हें बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है और वे डिजीटल डिपेंडेंसी सिंड्रोम (डी डी सी ) की गिरफ्त में आ जाते हैं |इससे निपटने का एक तरीका यह है कि चीन से सबक लेते हुए भारत में डिजिटल डीटॉक्स यानी नशामुक्ति केंद्र खोले जाएं और इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलाई जाए
नवोदय टाईम्स में 07/12/16 को प्रकाशित 


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