Saturday, September 22, 2018

गलत सूचनाओं से जंग की तैयारी

यह भी कैसी विडंबना है कि तकनीक ने एक तरफ हमारे जीवन को काफी आसान बनाया है, दूसरी तरफ कई स्तरों पर अराजकता भी पैदा कर दी है। आज सूचनाओं के संजाल में यह तय करना मुश्किल है कि क्या सही है क्या गलत। इससे हमारे समाज के सामने एक नई चुनौती पैदा हो गई है। गलत सूचनाओं को पहचानना और उनसे निपटना आज के दौर के लिए एक बड़ा सबक है। फेक न्यूज आज के समय का सच है। पिछले दिनों देश में घटी मॉब लिंचिंग की कई घटनाओं के पीछे इसी फेक न्यूज का हाथ रहा है। केरल में आई बाढ़ के वक्त कई समाचार चैनलों ने पानी से भरे एक विदेशी एयरपोर्ट के विडियो को कोच्चि एयरपोर्ट बता कर चला दिया। फेक न्यूज के चक्र को समझने के लिए मिसइनफॉर्मेशन और डिसइनफॉर्मेशन में अंतर समझना जरूरी है।
मिसइनफॉर्मेशन का मतलब ऐसी सूचनाओं से है जो असत्य हैं पर जो इसे फैला रहा है वह यह मानता है कि यह सूचना सही है। वहीं डिसइनफॉर्मेशन का मतलब ऐसी सूचना से है जो असत्य है और इसे फैलाने वाला भी यह जानता है कि अमुक सूचना गलत है, फिर भी वह फैला रहा है। भारत डिसइनफॉर्मेशन और मिसइनफॉर्मेशन के बीच फंसा हुआ है। जियो क्रांति के बाद सस्ते फोन और इंटरनेट ने उन करोड़ों भारतीयों के हाथ में सूचना तकनीक पहुंचा दी है जो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। वे इंटरनेट पर मिली हर चीज को सच मान बैठते हैं और उस मिसइनफॉर्मेशन के अभियान का हिस्सा बन जाते हैं। दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की साइबर आर्मी और ट्रोलर्स कई सारी ऐसी डिसइनफॉर्मेशन को यह जानते हुए फैलाते है कि वे गलत हैं या संदर्भ से कटी हुई हैं। इन सबके पीछे कुछ खास मकसद होता है। जैसे हिट्स पाना, किसी का मजाक उड़ाना, किसी व्यक्ति या संस्था पर कीचड़ उछालना, साझेदारी, लाभ कमाना, राजनीतिक फायदा उठाना, या दुष्प्रचार।
फेक न्यूज ज्यादातर भ्रमित करने वाली सूचनाएं होती हैं। अक्सर झूठे संदर्भ या गलत संबंधों को आधार बनाकर ऐसी सूचनाएं फैलाई जाती हैं। जून 2016 में देश 20 करोड़ जीबी डाटा इस्तेमाल कर रहा था। यह आंकड़ा मार्च 2017 में बढ़कर 130 करोड़ जीबी हो गया जो लगातार बढ़ रहा है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल असोसिएशन ऑफ इंडिया और कंटार-आईएमआरबी की रिपोर्ट के अनुसार बीते जून तक देश में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या पांच करोड़ हो चुकी थी, जबकि दिसंबर 2017 में इनकी संख्या 4.8 करोड़ थी। इस तरह छह महीने में 11.34 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इंटरनेट उपभोक्ताओं में इतनी वृद्धि साफ इशारा करती है कि इंटरनेट के ये प्रथम उपभोक्ता सूचनाओं के लिए सोशल मीडिया, वॉट्सऐप और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर निर्भर हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है। भारत में लगभग बीस करोड़ लोग वॉट्सऐप का प्रयोग करते हैं जिसमें कई संदेश, फोटो और विडियो फेक होते हैं। पर जागरूकता के अभाव में देखते ही देखते ये वायरल हो जाते हैं। एंड टु एंड एनक्रिप्शन के कारण वॉट्सऐप पर कोई तस्वीर सबसे पहले किसने डाली, यह पता करना लगभग असंभव है।
अपनी इसी खूबी के कारण वॉट्सऐप सारी दुनिया में लोकप्रियता हासिल कर रहा है क्योंकि इस चैटिंग ऐप के इस्तेमाल में कभी कोई विज्ञापन नहीं आता। इसके मालिक भी अगर चाहें तो किसी और के संदेश नहीं पढ़ सकते। वॉट्सऐप से शुरू फेक न्यूज का सिलसिला ट्विटर और फेसबुक पर आते ही गति पकड़ लेता है। फेक न्यूज को पकड़ने के लिए गूगल ने बूम लाइव, इंटर न्यूज और डाटालीड्स जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर गूगल न्यूज इनिशटिव नामक कार्यक्रम शुरू किया है जो देश भर में अंग्रेजी समेत सात क्षेत्रीय भाषाओं के दो सौ पत्रकारों और पत्रकारिता के शिक्षकों को प्रशिक्षण दे रहा है। ये सभी लोग इस क्रम में अगले एक साल में देश के आठ हजार पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों को फेक न्यूज पकड़ने का प्रशिक्षण देंगे। फर्जी चित्रों को पहचानने में गूगल ने गूगल इमेज सेवा शुरू की है, जहां आप कोई भी फोटो अपलोड करके यह पता कर सकते हैं कि कोई फोटो इंटरनेट पर यदि है, तो वह सबसे पहले कब अपलोड की गई है। एमनेस्टी इंटरनैशनल ने विडियो में छेड़छाड़ और उसका अपलोड इतिहास पता करने के लिए यूट्यूब के साथ मिलकर यू ट्यूब डेटा व्यूअर सेवा शुरू की है ।
अनुभव बताता है कि नब्बे प्रतिशत विडियो सही होते हैं पर उन्हें गलत संदर्भ में पेश किया जाता है। किसी भी विडियो की जांच करने के लिए उसे ध्यान से बार-बार देखा जाना चाहिए। यह काम क्रोम ब्राउजर में इनविड (InVID) एक्सटेंशन जोड़ कर किया जा सकता है। इनविड जहां किसी भी विडियो को फ्रेम दर फ्रेम देखने में मदद करता है वहीं इसमें विडियो के किसी भी दृश्य को मैग्निफाई (बड़ा) करके भी देखा जा सकता है। यह विडियो को देखने की बजाय उसे पढ़ने में मदद करता है। मतलब, किसी भी विडियो को पढ़ने के लिए किन चीजों की तलाश करनी चाहिए, ताकि उसके सही होने की पुष्टि की जा सके। जैसे विडियो में पोस्टर-बैनर, गाड़ियों की नंबर प्लेट और फोन नंबर की तलाश की जानी चाहिए, ताकि गूगल द्वारा उन्हें खोज कर उनके क्षेत्र की पहचान की जा सके। कोई लैंडमार्क खोजने की कोशिश की जाए। विडियो में दिख रहे लोग कैसे कपड़े पहने हुए हैं, वे किस भाषा या बोली में बात कर रहे हैं, उसको देखा जाना चाहिए। इंटरनेट पर ऐसे कई सॉफ्टवेयर मौजूद हैं जो विडियो और फोटो की सत्यता पता लगाने में मदद कर सकते हैं। फेक न्यूज से बचने का एकमात्र तरीका है, अपनी सामान्य समझ का इस्तेमाल और थोड़ी सी जागरूकता।
नवभारत टाईम्स में 22/09/2018 को प्रकाशित 

Saturday, September 8, 2018

साक्षरता पर तय करना है लम्बा सफ़र

दुनिया  से निरक्षरता को खत्म  करने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक , वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने सत्रह नवंबर 1965 के दिन 8 सितम्बर को विश्व साक्षरता दिवस मनाने का निर्णय लिया था और तब से यह सिलसिला पूरी दुनिया में चल पडा जिसकी शुरुआत वर्ष 1966 में हुई |
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के लोगों, समुदाय और समाज में साक्षरता के महत्व को स्थापित करना है। अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस प्रत्येक वर्ष एक नए उद्देश्य के साथ मनाया जाता है।साक्षरता को सीखने और पढ़ने की क्षमता के रुप में परिभाषित किया जा सकता है। ये एक ऐसी  अवधारणा है जो न केवल छपी हुई सामग्री  को अच्छे से समझने की क्षमता पर बल्कि तमाम तरह की  तकनीकी जागरुकताओं पर भी जोर डालती है। ये एक बहुआयामी अवधारणा है जो वैश्विक दुनिया में विकास के सन्दर्भ में इसके नये मानकों को जोड़ने के लिए बहुत जरुरी है ।सामान्य शब्दों में साक्षरता से तात्पर्य पहचानने, समझने, टोकने, निर्माण करने, वार्तालाप करने और अलग-अलग संदर्भों के साथ जुड़े छपी   और लिखी सामग्री के प्रयोग से गणना करने की क्षमता है। जिसमें एक  व्यक्ति के रूप में अपने उद्देश्यों की प्राप्ति और विकास के लिये अपने ज्ञान का प्रयोग  अपने समुदाय और बाहरी समाज में भाग लेने के लिये सीखने की निरंतरता भी शामिल है|

 विषय कोई भी हो चाहे इतिहास, भूगोल गणित या फिर साहित्य बगैर साक्षरता  के इनका कोई अस्तित्व नहीं है |यानि दुनिया को समझने के लिए हमें साक्षरता  की जरुरत है|कॉपियों में लिखने का अभ्यास बगैर साक्षरता  के नहीं हो सकता  है |भारत के लिए यह दिन इस लिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि देश का अभी भी एक बड़ा तबका निरक्षर है |निरक्षरता महज एक समस्या भर नहीं है बल्कि यह कई समस्याओं की जननी है |कोई भी सभी समाज निर्देश से चलता है क्योंकि आधुनिक समाज का आधार सरकार है| सरकार समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए समय समय पर अपने नागरिको को निर्देश देती रहती है जिसे हम कानून के रूप में जानते हैं |अगर जनता समान रूप से कानून को समझ के उनका पालन करने लग जाए तो किसी भी देश में नियमों का  उल्लंघन कम होगा या बिलकुल न होगा |इससे सरकार को अनावश्यक रूप से कानून लागू करवाने वाली एजेंसियों पर ज्यादा निवेश नहीं करना होगा ,क्योंकि लोगों को वास्तविक रूप से कानून की जानकारी है|यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस देश में निरक्षरता ज्यादा होगी वहां की सरकार को शासन देने  में कितनी दिक्कत आयेगी |उसी तरह से लोगों में भी निरक्षरता के कारण जागरूकता की कमी होगी जिससे लोगों का हक़ मारा जाएगा और ऐसे समाज में फिर भ्रष्टाचार की अधिकता होगी |भारत इस मामले में अपवाद नहीं है जहाँ सिर्फ लोगों के निरक्षर होने के कारण कितनी तरह की ऐसी समस्याएं हैं |बड़ा  कारण लोगों का निरक्षर होना है | संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में पंद्रह साल से ऊपर सात सौ इक्यासी मिलीयन लोग साल 2015 में निरक्षर थे जिनमें चार सौ छियानबे मिलीयन  महिलायें हैं |सरकारी आंकड़ों के अनुसार  2011 की सामाजिक-आर्थिक और जातीय जनगणना के अनुसार देश के ग्रामीण इलाकों में निरक्षर लोगों की आबादी करीब 32 करोड़ है जो कुल ग्रामीण जनसंख्या का लगभग 35 प्रतिशत है। प्रतिशत के हिसाब से राजस्थान में ग्रामीण निरक्षर जनसंख्या सर्वाधिक है जिसका प्रतिशत 47.58 है और वहीं सबसे कम  लक्षद्वीप में 9.30 प्रतिशत है। देश के सर्वाधिक साक्षर राज्य केरल में ग्रामीण निरक्षर लोगों का प्रतिशत 11.38 प्रतिशत  है।  2011 की जनगणना के अनुसार देश के ग्रामीण इलाकों में सात साल और इससे अधिक के आयुवर्ग में निरक्षर लोगों की संख्या 22,96,32,152 रही जो 2001 की जनगणना की तुलना में थोड़ी कम है। 2001 की जनगणना में यह आंकड़ा 25,41,49,325 का था।आंकड़े अपने आप में देश में साक्षरता की स्थिति बयान कर रहे हैं |साक्षरता की कमी गरीबी ,भ्रष्टाचार ,कुपोषण अपराध और बढ़ती जनसँख्या जैसी समस्याओं को जन्म देती  हैं |देश तभी तरक्की कर सकता है जब उसका मानव संसाधन योग्य कुशल और उत्पादक हो |यह उत्पादकता अर्थव्यवस्था को गति देगी जिससे सरकार को गवर्नेन्स देने में आसानी होगी |सामाजिक रूप से देश में कई तरह की समस्याएं हैं जिनका इलाज कानून बनाकर नहीं किया जा सकता है |ऐसी बहुत सी समस्याओं का निदान जागरूकता से ही हो सकता है |सरकार सर्व शिक्षा अभियान में बहुत सारा धन खर्च कर रही है पर जागरूकता के अभाव में अगर लोग अपने बच्चों  को स्कूल न भेजें तो इस अभियान का उद्देश्य विफल हो जाएगा |पूरी दुनिया ऑन लाइन हो रही है भारत भी इसमें अपवाद नहीं है पर देश में निरक्षरों की बड़ी संख्या होने के कारण डिजीटल डिवाईड भी बढ़ा है और लोग पढ़े लिखे न होने के कारण बदलाव की इस बयार का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं |सरकार साक्षरता को बढाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है और शिक्षा का अधिकार इसी दिशा में उठाया गया एक सार्थक  कदम है पर यह प्रयास तभी सफल होगा जब इसमें जनभागीदारी जुड़ेगी और यह जिम्मेदारी उन पढ़े लिखे लोगों की ज्यादा है कि वे अपने आस पास के निरक्षर लोगों को साक्षर होने के लिए न केवल प्रेरित करें बल्कि अपना खुद का भी योगदान दें |कोई भी देश महान अपने लोगों से बनता है पर जनसंख्या का बड़ा तबका अगर शिक्षा की रौशनी से दूर है तो पहले से साक्षर लोगों को इस प्रयास में हाथ बंटाना ही होगा | साक्षरता का दिया जब तक भारत के हर घर में नहीं जलेगा तब तक हम विकास की दौड़ में भी पीछे रहेंगे और लोगों का जीवन स्तर भी बेहतर नहीं होगा |इस साक्षरता दिवस हम यह शपथ लेकर कि हम किसी एक व्यक्ति को साक्षर करेंगे राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं |
दैनिक जागरण /आईनेक्स्ट में 08/09/2018 को  प्रकाशित लेख 

Thursday, August 30, 2018

दोस्ती के यादों का एलबम

बारिश के मौसम में सिर्फ पानी नहीं बरसता भावनाएं भी बरसती हैं. एहसास से भीगे एक ऐसे ही मौसम में मैं थोडा फलसफाना हुआ जा रहा हूँ.ज़िन्दगी का असल मतलब तो रिश्ते बनाने और निभाने में ही है.ज़िन्दगी कैसी भी हो पर खुबसूरत तो है ही पर इसकी असल खूबसूरती तो रिश्तों से ही है.सोचिये तो जरा कि बारिश हो रही हो और आपके आस पास न लोग हों और न कोई यादें तब क्या आप ज़िन्दगी की बारिश का मजा ले पायेंगे.मैं भी सोच रहा हूँ कितने लोग मिले बिछड़े सब मुझे याद नहीं हैं पर कुछ दोस्त ऐसे भी हैं जो अब मेरे साथ नहीं हैं पर  उनकी यादें मेरे साथ हैं जिनके साथ का लुत्फ़ मैं बारिश के इस मौसम में उठा रहा हूँ. बारिश का मौसम हमेशा नहीं रहता वैसे रिश्ते कोई भी हों हमेशा एक जैसे नहीं रहते .अब दोस्ती को ही ले लीजिये न ये रिश्ता इसलिए ख़ास है क्योंकि  सामाजिक रूप से इसको निभाने का कोई मानक नहीं है फिर भी बाकी रिश्तों में ये रिश्ता सबसे ख़ास होता है क्योंकि दोस्ती हम किसी से पूछ के नहीं करते .ये तो बस हो जाती है बिंदास जिसमें कोई भी पर्देदारी नहीं होती है. जो तेरा है वो मेरा है जैसा हक़ और किसी रिश्ते में नहीं होता है .
दोस्तों में कोई तो हमारा ख़ास दोस्त जरुर  होता है.हमारा सबसे बड़ा राजदारजिसको हम प्राथमिकता देते हैं पर दोस्ती का इम्तिहान तो तब शुरू होता है .जब ज़िन्दगी में नए दोस्त बनते हैं.यहाँ कहानी में थोडा ट्विस्ट है. कई बार हम जिसे अपना सबसे अच्छा दोस्त  समझ रहे होते हैं .वो बहुतों का सबसे अच्छा  हो तो ? तब शुरू होती हैं समस्या  अब भाई उस दोस्त को सबसे दोस्ती निभानी है और हम हैं कि चाहते हैं वो हमें उतनी प्राथमिकता दे जितनी हम उसे देते हैं. तब शुरू होता है इस रिश्ते का असली इम्तिहान,तुम मुझे फोन नहीं करते तो मैं क्यूँ करूँ,तुम्हारे पास तो समय  ही नहीं जैसी बातों से शुरू हुआ ये सिलसिला शक और लड़ाई झगडे में तब्दील हो जाता है.जानते हैं ऐसा क्यूँ हो रहा होता क्योंकि  दोस्ती में वो विश्वास का तत्व गायब  होने लग जाता है.मेसेज लिख के बगैर भेजे डिलीट  कर देना ,फोन  करते करते रुक जाना .
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि  वो हक़ गायब हो जाता है जो उस दोस्ती” की जान हुआ करता था और इसके लिए किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.इसलिए दोस्ती जब दरकती है तो कष्ट बहुत ज्यादा होता है क्योंकि इस रिश्ते के चलने या न चलने के पीछे सिर्फ और सिर्फ हम ही जिम्मेदार होते हैं, और किसी भी रिश्ते में मांग नहीं की जाती है. रिश्ते तो वही चलते हैं जिनमें प्यार ,अपनापन और विश्वास अपने आप मिल जाता है माँगा नहीं जाता और अगर दोस्ती में हमें  इन सब चीजों की मांग करनी पड़ रही है तो समझ लीजिये कि आपने सही शख्स से दोस्ती नहीं की है.दोस्ती देने का नाम है आपने अपना काम किया पर बगैर किसी अपेक्षा के अपनी कद्र खुद कीजिये जो दोस्त आपकी कद्र न करे उसके जीवन से चुपचाप निकल जाइए जिससे कल किसी बारिश में आप जब पीछे मुड़ कर देखें तो ये पछतावा न हो कि आपके पास दोस्ती की यादों का एल्बम सूना है.
प्रभात खबर में 30/08/2018 को प्रकाशित 


Tuesday, August 14, 2018

भारत से दूर लेकिन जड़ों के पास

हिन्दी में पढने लिखने के कारण मेरा नोबेल पुरस्कार विजेता सर  वी एस नायपॉल से परिचय जरा देर में हुआ |नायपाल की लेखनी से मेरा पहला वास्ता तब पड़ा जब मैं उनकी भारत यात्रा का आधार बना कर लिखी गयी पुस्तक “एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस” का हिन्दी अनुवाद कर रहा था ,तब मैंने उनको पहली बार पढ़ा |जैसे –जैसे किताब का काम आगे बढ़ता गया | मैं उनकी लेखन प्रतिभा का कायल होता गया | फिर मैंने खोज –खोज कर उनकी किताबें पढनी शुरू की |वो चाहे वुंडेड सिवाइलेजेसन जो उनकी भारत को आधार बना कर लिखी गयी एक और किताब थी या हाउस ऑफ़ मिस्टर बिस्वास हो जिसने उन्हें ख्याति दिलाई | यह किताब उनके पिता सीपरसाद नायपाल के जीवन पर आधारित है जो ‘‘त्रिनिदाद गार्जियन’’ में रिपोर्टर के तौर पर भी  काम करते थे। हालांकि यह सभी किताबें हिन्दी अनुवाद थीं पर एक पाठक के तौर पर मुझे जो कुछ अपने लेखक से चाहिए था वो सब उनकी किताबों में मिल रहा था |इंटरनेट के आने से मेरे जैसे हिन्दी के पाठकों को दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य को जानने समझने का मौका मिला |क्योंकि अब हिन्दी में अनुवाद का बाजार विस्तार ले रहा है |मूलत:त्रिनिदाद एंड टोबैगो में जन्मे विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल के पूर्वज गोरखपुर से गिरमिटिया मज़दूर के रुप में त्रिनिदाद पहुंचे थे|भारतीय परिस्थितियों से अलग जहाँ लेखकों को जीविकोपार्जन के लिए कोई अलग व्यवसाय या काम करना पड़ता है |सर  वी एस नायपॉल ने जीवन भर लेखन ही किया है और इसे ही अपनी जीविका का साधन बनाया | एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस” का हिन्दी अनुवाद इसके प्रकाशन से ठीक पचास हुआ पर जब वो भारत 1964 में आये थे तब से लेकर अब  तक उनकी लिखी बातें  आज भी हमें सोचने पर मजबूर कर देती थी कि किसी लेखक को महान उसकी द्र्ष्टि ही बनाती है |उनका भारत को देखने का नजरिया एक आम भारतीय जैसा नहीं था वो भले ही भारतीय मूल के थे पर भारत को देखने के लिए जिस तटस्थता की उम्मीद की जानी चाहिए उन्होंने वो तटस्थता काफी निर्मम तरीके से दिखाई |जैसे वो लिखते हैं “भारतीय हर जगह मल त्याग करते हैं। ज़्यादातर वे रेलवे  की पटरियों को इस कार्य के लिए इस्तेमाल करते हैं। हालांकि वे समुद्र-तटों, पहाड़ों, नदी के किनारों और सड़क को भी इस कार्य के लिए इस्तेमाल करते हैं और कभी  भी आड़ न होने की परवाह नहीं करते हैं|जो नायपाल साहब कई बरस पहले लिख चुके हैं उस वाकये से हम सब आज भी रोज दो चार होते हैं लेकिन यह हमारे लिए कोई समस्या की बात नहीं है क्योंकि हमारा समाजीकरण  इस तरह के द्रश्यों को देखते हुए ही होता है और इसमें हमें कुछ गलत नहीं दिखता |तभी तो सोचिये आजादी के सत्तर साल बाद भी सरकार को  स्वच्छ भारत अभियान चलाना पड़ रहा है | शायद इसी कारण जहाँ नायपॉल के उपन्यासों में भारत को काफी महत्व मिला  लेकिन भारत को लेकर उनका नज़रिया काफी विवादित भी माना जाता रहा | वी एस नायपॉल  अपनी इस किताब के सिलसिले में करीब एक साल तक भारत में रहे और लगभग पूरा भारत जिसमें कश्मीर से लेकर दक्षिण भारत के कई राज्य शामिल थे वहां का हाल उन्होंने अपनी इस किताब में लिखा |मुंबई में उतरते ही जब उनकी विदेशी शराब कस्टम द्वारा जब्त कर ली गयी और उसको दुबारा वापस पाने के लिए उन्हें किस तरह बाबुओं के चक्कर लगाने पड़े |उनकी काम को टालने की आदत जैसी कई घटनाओं को उन्होंने अपनी किताब में समेटा |उन दिनों के कश्मीर के हालात का भी चित्रण बखूबी किया है |

            "बिटवीन फादर एंड सन" वी एस नायपॉल और उनके पिता जी के बीच हुए पत्राचार का संकलन है |जिसमें हमें एक चिंतित पिता की झलक मिलती है जो खुद भी एक अच्छा लेखक था पर परिस्थितियों के कारण अपने लेखन कार्य को जारी न रख पाया |सर  वी एस नायपॉल के पिता जी का इंतकाल उनकी सफलता को देखने से पहले ही  हो गया था | अपने पिता के साथ उनके सम्बन्ध अपने परिवार में सबसे मधुर थे | उनके पिता सीपरसाद नायपाल उन्हें लगातार घर की चिंताओं से मुक्त होकर अपनी पढ़ाई और लेखन कार्य में लगे रहने की सलाह दिया करते थे |इस किताब में सहेजे गए सारे पत्र अपने वक्त के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी हैं पर एक पारिवारिक इंसान होने के नाते मै नायपॉल के अपने पिता के अंतिम संस्कार में न पहुँचने के निर्णय से सहमत नहीं हो पाता हूँ |वे अपनी पढ़ाई के सिलसिले में एक बार जो लन्दन गए फिर वे घर न लौटे |बियोंड बिलीफ भी उनकी एक और प्रसिद्ध किताब रही है जिसमें उन्होंने धर्मान्तरित मुसलमानों के हालात का जायजा लिया और इसके लिए उन्होंने  दुनिया  के कई इस्लामिक देशों का दौरा किया |एक भारतीय के रूप में सर वी एस नायपॉल ने हमें अपने ऊपर गर्व करने का मौका दिया पर उनकी भारत पर लिखी गयी किताबों में एक गुस्सा भी दिखता है कि ये देश ऐसा क्यों है ? अपनी जड़ों की तलाश में वे अपनी पहली भारत यात्रा में पूर्वी उत्तरप्रदेश में स्थित अपने पूर्वजों के गाँव जिसे  वे दुबे का गाँव कहकर संबोधित करते हैं भी गए |जिसका बड़ा रोमांचक वर्णन उन्होंने अपनी किताब “एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस” में किया है |1964 से भारत प्रेम  का यह सिलसिला उनकी मृत्यु तक जारी रहा |आलोचक भले ही उन्हें दक्षिणपंथी साहित्यकार मानते हों पर यह उनकी स्पष्टवादिता ही थी |जो उन्हें अपने समकालीन लेखकों से अलग करती है |वी एस नायपॉल भले ही आज हमारे बीच में न रहे हों पर उनके द्वारा छोडी गयी साहित्य की थाती पाठकों  के ह्रदय  में उन्हें  हमेशा ज़िंदा रखेगी |
दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 14/08/18 को प्रकाशित 

Friday, August 10, 2018

आज भी कायम है टीवी का दबदबा

आधुनिक जनमाध्यमों में इंटरनेट ने बड़े कम समय में अपनी धाक जमाई है और दूसरे जनमाध्यमों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश की है |इसमें टेलीविजन भी शामिल है |ऐसा माना जाने लग गया था कि अब टेलीविजन को हमेशा के लिए इंटरनेट पछाड़ देगा पर आंकड़ों की नजर में फिलहाल ऐसा होता दिख नहीं रहा है |ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल  (BARC)  ने जुलाई 2018 में  जो आंकड़े जारी किये वह यह  बताते है कि 2016 से अबतक भारत में टेलीविज़न के दर्शकों की तादाद में बारह प्रतिशत की बढ़त हुई है |सस्ते होते स्मार्ट फोन इंटरनेट की कम दरें ,अमेजन प्राईम ,नेटफ्लिक्स,हॉटस्टार जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म इंटरनेट टीवी की बढ़त को आसान बना रहे थे लेकिन भारत को महान इसके विरोधाभास बनाते हैं  | वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म शहरों में बड़ी तेजी से लोकप्रिय भी होने लगे हैं क्योंकि वहां एक बड़ा दर्शक तबका था जो पारम्परिक टेलीविजन कार्यक्रमों से उब चुका था |कुछ नए की तलाश में इंटरनेट वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म की शरण में आने लगा |जहाँ उदारीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते चलन ने शहरों में एकल परिवारों की संख्या में इजाफा किया वहीं बढ़ती आय ने टेलीविजन देखने की क्रिया को सामूहिक से एकल बना दिया |शहरों में फ़्लैट संस्कृति ने घरों को डब्बा बना दिया जहाँ ज्यादा टेलीविजन सेट नहीं रखे जा सकते हैं |वहां स्मार्ट फोन पर अपने मनपसन्द कार्यक्रम देखने एक आसान विकल्प के रूप में उभरा |वह वक्त जल्दी ही अतीत की बात हो गया जहाँ पूरा परिवार एक साथ टेलीविजन देखता पर बढ़ते टीवी चैनल और एकल परिवार के बढ़ते चलन ने इस टीवी देखने के सामूहिक कृत्य को एक निजी अनुभव में तब्दील कर दिया और यहीं से इंटरनेट टीवी शहरों में तेजी से आगे बढ़ा पर भारतीयों का टेलीविजन प्रेम अभी भी बरक़रार है |
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल (BARC) के इस शोध अध्ययन  के नतीजे बताते है कि साल 2018  में पिछले दो साल के मुकाबले टेलीविजन सेट की संख्या  में साढ़े सात प्रतिशत की वृद्धि हुई है |इस वक्त भारत में कुल 298 मिलीयन घर हैं जिनमें 197 मिलीयन घरों में टेलीविजन सेट हैं यानि सौ मिलियन घरों में अभी भी टेलीविजन सेट खरीदे जाने की गुंजाईश है |2016 में 183 मिलीयन घरो में टेलीविजन सेट थे |सर्वे यह भी बताता है कि इस दौरान देश में टेलीविजन देखने वाले दर्शकों की संख्या में 7.2 प्रतिशत की भी बढोत्तरी हुई है| साल 2016 में टेलीविजन दर्शकों की संख्या 780 मिलीयन थी जो साल 2108 में बढ़कर 836 मिलीयन हो गयी |
जबकि  इसकी तुलना में भारत का अग्रणी  वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म हॉटस्टार  के पास केवल साठ मिलियन उपभोक्ता हैंभारत का टीवी दर्शक वर्ग पारिवारिक है  यही कारण है इस की वृद्धि का|ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल  (BARC) का सर्वे यह बताता है कि भारत के  लगभग 66 प्रतिशत भारतीय घरों में टीवी सेट हैं शहरी भारत में टीवी सेट खरीदे जाने की वृद्धि दर चार प्रतिशत वहीं उल्लेखनीय रूप से गाँवों में यह दर दस प्रतिशत है |टीवी देखने में बिताये  जाने वाले  समय में शहरों में दस प्रतिशत की वृद्धि हुई है वहीं गाँव में यह दर तेरह प्रतिशत है |ट्राई (TRAI) की रिपोर्ट के अनुसार चीन के बाद भारत में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है |जिन्‍हें केबल टीवी सेवाडीटीएचआईपीटीवी सहित दूरदर्शन टीवी नेटवर्क सेवायें प्रदान करते हैं।2014-15 में भारत का टेलीविजन उद्योग 4,75,003 करोड़ रूपये का थाजो 2015-16 में बढ़कर 5,42,003 करोड़ रूपये हो गया और इसमें 14.10 प्रतिशत की वृद्धि हुई |विकसित देशों के मुकाबले जहाँ ग्राहकों की संख्या  में औसत रूप से वार्षिक गिरावट देखी जा रही हैलेकिन भारत में टेलीविजन का बाजार में दबदबा बना हुआ है ।इसका एक बड़ा कारण गाँवों में टेलीविजन का बढ़ता विस्तार है ,आजादी के बाद पहली बार गाँव में टीवी सेट के प्रति बढ़ता लगाव इस धारणा को तोड़ रहा है कि टीवी एक शहरी माध्यम है और इसीलिये वहां गाँव और उससे जुडी बातें नहीं दिखती |गाँव में टीवी का बढ़ता चलन निश्चित रूप से टीवी कार्यक्रम निर्माताओं को इस ओर मजबूर करेगा कि वे अपने कंटेंट में गाँवों को प्राथमिकता दें |टीवी पर पशु आहार से सम्बन्धित विज्ञापनॉन का बढना इस ओर जरुर इशारा कर रहा है कि अब टीवी के दर्शक वर्ग में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की जरूरतों को मान्यता मिल रही है |
यह एक बड़ा बदलाव है वैसी भी शहरी टीवी बाजार में धीरे –धीरे स्थिरता आ रही है पर गाँव के बाजार में पर्याप्त गुंजाईश है |वैसे भी भारत का प्राथमिक  टीवी दर्शक वर्ग पारिवारिक है  जो इसकी वृद्धि के लिए उत्तरदायी है |गाँवों में अभी भी शहरों के मुकाबले आपा –धापी कम है और लोग निजता की बजाय सामूहिकता पर जोर देते हैं |शहरी क्षेत्र में टीवी का इंटरनेट से पिछड़ने का कारण इस तर्क से दिया जाता है कि टीवी के  पास कार्यक्रमों की विविधता नहीं है पर यह इलीट शहरी वर्ग की समस्या है ,एक माध्यम के रूप में अभी भी पारिवारिक कहानियां देश के मध्यम वर्ग और ग्रामीण भारत की पहली पसंद बने हुए हैं इसलिए वार्षिक रूप से समस्त जनमाध्यमों से होने वाली विज्ञापनों की आय में पैंतालीस प्रतिशत हिस्सा टीवी विज्ञापनों का ही है |एक सस्ता स्मार्ट फोन अभी भी तीन से चार हजार रुपये से कम नहीं आता और जिसका जीवन काल दो से तीन साल का ही होता है |आर्थिक रूप से एक आम भारतीय का अपने लिए इतना पैसा मनोरंजन पर खर्च करना संभव नहीं है  |वहीं सस्ते एल ई डी टीवी दसहजार से कम रुपये में उपलब्ध हैं जो पूरे परिवार का मनोरंजन कर सकते हैं | इसमें कोई शक नहीं है कि टेलीविजन के लिए इंटरनेट एक बड़ा खतरा बन कर उभर रहा है पर  आज भी एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में एक माध्यम के रूप में टेलीविजन दर्शकों ,विज्ञापन दाताओं की पहली पसंद बना हुआ है |
नवभारत टाईम्स में 10/08/2018 को प्रकाशित लेख 

Wednesday, August 1, 2018

डाटा सुरक्षा की दिशा में बढ़ते सार्थक कदम

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अध्यक्ष आर. एस. शर्मा ने आधार की सुरक्षा का पुख्ता दावा करते हुए अपना आधार नंबर ट्विटर पर  जारी करते हुए कहा था कि अगर इससे सुरक्षा से जुड़ा कोई खतरा हैतो कोई मेरे आंकड़े लीक करके दिखाएं और उनकी इस चुनौती के कुछ घंटे बाद ही उनके आंकड़े ट्विटर पर जारी होने लग गए .बात यहीं नहीं रुकी ट्विटर पर कुछ लोगों ने  उनके  आधार नंबर लिंक्ड पेमेंट सर्विस ऐप्स जैसे भीम और पेटीम के जरिए शर्मा को एक रुपये भेजे जाने के स्क्रीनशॉट भी पोस्ट कर दिए । इस घटना ने भारत में निजी आंकड़ों या डाटा की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर फिर से बहस छिड़ गयी  है क्योंकि जब पूरी दुनिया डिजीटल हो रही  हैऐसे में डिजीटल आंकड़ों की संप्रभुता को लेकर तमाम तरह की  आशंकाएं भारत में अभी भी  हैं.उल्लेखनीय  कि पूरी दुनिया में प्रोसेस हो रहे आउटसोर्स डाटा का सबसे बड़ा होस्ट भारत है .
 असल में आज का दौर आंकड़ों का दौर है .वो आंकड़े ही हैं  जो सूचनाओं से ज्यादा पुष्ट हैं और इसीलिये जीवन के हर क्षेत्र में इनका महत्त्व बढ़ता जा रहा है .सरकारी योजनाओं में आधार कार्ड की अनिवार्यता ने इस तथ्य को पुष्ट किया है कि सर्कार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति को मिले . मय बदला और तकनीक भी .भारत इस वक्त चीन के बाद दूसरे नम्बर का स्मार्ट फोन धारक देश है और इंटरनेट का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है जिसने सरकारी प्रशासन में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया और  आंकड़ों की उपलब्धता की दिशा में सरकारों ने भी काफी काम किया जिसमें आधार कार्ड भी एक ऐसी ही योजना थी जिसमें देश के सभी नागरिकों एक विशेष नम्बर प्रदान उनके बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने के बाद जिसमें नागरिक का बायोमीट्रिक डाटा भी शामिल है ,दे दिया जाता है और एक नम्बर के दो नागरिक नहीं हो सकते हैं इस तरह देश के सभी नागरिकों का आंकड़ा संग्रहण कर लिया गया .उधर इंटरनेट के फैलाव  के साथ आंकड़े बहुत महत्वपूर्ण हो उठें .लोगों के बारे में सम्पूर्ण जानकारियां को एकत्र करके बेचा जाना एक व्यवसाय बन चुका है और  इनकी कोई भी कीमत चुकाने के लिए लोग तैयार बैठे हैं .देश में आंकड़ों की सुरक्षा के लिए अभी तक कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है जैसे ही आप इंटरनेट पर आते हैं आपकी कोई भी जानकारी निजी नहीं रह जाती और इसलिए इंटरनेट पर सेवाएँ देने वाली कम्पनिया अपने ग्राहकों को यह भरोसा जरुर दिलाती हैं कि आपका डाटा गोपनीय रहेगा पर फिर भी आंकड़े लीक होने की सूचनाएं लगातार सुर्खियाँ बनी रहती हैं .
किसी भी ऑनलाइन कम्पनी का विज्ञापन कारोबार तभी तेजी से बढेगा जब उसके पास ग्राहकों की गोपनीय जानकारी हो जिससे वह उनके शौक रूचि आदतों के हिसाब से विज्ञापन दिखा सकेगी वहीं साईबर अपराधियों की निगाह भी ऐसे आंकड़ों पर रहती है,पर ऐसी घटनाएँ न हों और अगर हों तो दोषियों पर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही हो ऐसा कोई भी प्रावधान अभी तक भारतीय संविधान मे नहीं किया गया है .अभी तक ऐसे किसी मामले को निजता के अधिकार के  हनन के तहत देखा जाता है .नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है. किसी नागरिक की आधार सूचना हो या कोई अन्य किस्म की डिजीटल सूचना- उन पर सेंध लगाने की कोशिश  अंततः नागरिक गरिमा ही नहींराष्ट्रीय संप्रभुता को भी ठेस पहुंचाएगी. समूचे यूरोप में पच्चीस मई से 'द जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगूलेशन' (जीडीपीआर) नाम का नया क़ानून लागू हो गया है.
 इस कानून का उद्देश्य  आम लोगों को यह जानकारी देना है कि आपका डाटा कौन ले रहा है और उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है.क़ानून के तहत लोगों का निजी डेटा केवल पहले से बताए गए उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा. कंपनियों को यह बताना होगा कि वो डेटा की जानकारी कैसे और क्यों ले रहे हैं. कंपनियों को यूज़र्स का डेटा सुरक्षित करने की ज़रूरत है और अगर उनका डेटा लीक होता है तो उन्हें बताना होगा कि यह उनके लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है.भारत ने इस दिशा में काफी देर से ही एक सार्थक कदम उठाया है .
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी एन श्री कृष्णा की अध्यक्षता में गठित समिति ने पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल का ड्राफ्ट बिल सरकार को सौंप दिया है .इस बिल में “निजी” शब्द को परिभाषित किया गया है.इसके अतिरिक्त इसमें सम्वेदनशील निजी डाटा को बारह  भागों में विभाजित किया गया है.जिसमें पासवर्ड,वित्तीय डाटा,स्वास्थ्य डाटा,अधिकारिक नियोक्ता,सेक्स जीवन,जाति/जनजाति,धार्मिक ,राजनैतिक संबद्धता जैसे क्षेत्र जोड़े गए हैं.इस बिल को अगर संसद बगैर किसी संशोधन के पास कर देती है तो देश के प्रत्येक नागरिक को अपने डाटा पर चार तरह के अधिकार मिल जायेंगे .जिनमें पुष्टिकरण और पहुँच का अधिकार, डाटा को सही करने का अधिकार, डाटा पोर्टेबिलिटी और डाटा को बिसरा देने जैसे अधिकार शामिल हैं .इस समिति की  रिपोर्ट के अनुसार यदि इस बिल का कहीं उल्लंघन होता है तो सभी कम्पनियों और सरकार को स्पष्ट रूप से उन व्यक्तियों को सूचित करना होगा जिनके डाटा की चोरी या लीक हुई है कि चोरी या लीक हुए डाटा की प्रकृति क्या है ,उससे कितने लोग प्रभावित होंगे ,उस चोरी या लीक के क्या परिणाम हो सकते हैं और प्रभावित लोग जिनके डाटा चोरी या लीक हुए हैं वे क्या करें .ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति का डाटा चोरी या लीक हुआ है वह उस कम्पनी से क्षतिपूर्ति की मांग भी कर सकता है .फिलहाल यह बिल संसद की मंजूरी के इन्तजार में है,लेकिन सिर्फ़ कानून के बन जाने से सबकुछ ठीक हो जाएऐसा संभव नहीं है. इसके लिए लोगों को भी जागरूक होना होगा.
आई नेक्स्ट /दैनिक जागरण में 01/08/2017  को प्रकाशित 

Saturday, July 14, 2018

जितना चाहो ,देखो और दिखाओ

इंटरनेट की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण बात है इसकी गतिशीलता नया बहुत जल्दी पुराना हो जाता है और नई संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं |सोशल मीडिया प्लेटफोर्म नित नए रूप बदल रहे हैं उसमें नए नए फीचर्स जोड़े जा रहे हैं |इस सारी कवायद का मतलब ऑडिएंस को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक अपने प्लेटफोर्म से जोड़े रखना |इसका बड़ा कारण इंटरनेट द्वारा पैदा हो रही आय भी है |
जाहिर है इसमें वीडियो एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं |जिसका बड़ा हिस्सा गूगल की एक कम्पनी यूट्यूब जैसी साईट्स से आ रहा है |वहीं फेसबुक की कम्पनी इन्स्टाग्राम धीरे धीरे एक नयी क्रांति कर रही है और तेजी से युवाओं में लोकप्रिय हो रही है |इंटरनेट की बादशाहत को लेकर जारी यह जंग अब और भी दिलचस्प होने जा रही है |जिसके केंद्र में हैं फेसबुक और गूगल |गूगल जहाँ यूट्यूब के जरिये वीडियो बाजार के एक बड़े हिस्से पर काबिज है |वहीं उसको टक्कर देने के लिए फेसबुक ,इन्स्टाग्राम में नए परिवर्तन कर वीडियो बाजार के इस हिस्से में यूट्यूब इस  की इस बादशाहत को खत्म करना चाह रहा है |
इन्स्टाग्राम यह एक फोटो और विडियो शेयरिंग एप्प है जिसे फेसबुक ने साल 2012 में मात्र एक बिलीयन डॉलर में खरीदा था |आज इसकी कीमत सौ बिलियन डॉलर हो गयी है|ब्लूमबर्ग इंटेलीजेंस रिपोर्ट के अनुसार इन्स्टाग्राम के आज एक बिलियन एक्टिव यूजर हैं जो जल्दी ही दो बिलियन हो जायेंगे और अगले पांच साल में इसके उपभोक्ता फेसबुक के बराबर हो जायेंगे |अन्य सोशल मीडिया साईट्स की तरह इन्स्टाग्राम भी अपना इंटरफेस लगातार बदल रहा है जैसे कि  फोटोग्राफिक फिल्टर्सस्टोरीजछोटे विडियोईमोजीहैशटैग इत्यादि |भविष्य की रणनीति को ध्यान में रखते हुए इन्स्टाग्राम ने एक नई शुरुआत की है |वह है आई जी टीवी इसके  ज़रिये कोई भी यूजर एक घंटे तक का लंबा विडियो अपलोड कर सकता है लंबे विडियो का मतलब है कि यूजर ज्यादा समय तक इन्स्टाग्राम   पर रहेगा| जाहिर है यह लक्ष्य  आर्थिक एवं व्यवसायिक दृष्टिकोण से हर एप्प बनाने वाली कंपनी हासिल करना चाहती है इसका सीधा फायदा फेसबुक को भी मिलेगा |अभी तक लोग यूटयूब के अपने वीडियो फेसबुक के प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करते हुए उसे लोकप्रिय बनाते थे और उन वीडियो को देखने के लिए उपभोक्ता फेसबुक को छोड़कर यूटयूब के प्लेटफोर्म पर चले जाते थे ,जिससे फेसबुक को ज्यादा लाभ नहीं होता था तस्वीर का एक रुख यह भी है कि इंस्टाग्रामफेसबुकट्विटरस्नैपचैट और यूट्यूब इत्यादि जैसे आनलाइन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बढ़ने के साथ व्यवसायिक कंपनियों का रुख सीधे विज्ञापन की बजाय   इंफ्लुएंशर मार्केटिंग की ओर बदला है. जेम्फो इंडिया इंफ्लूएंस रिपोर्ट 2018 इंफ्लूएंसर इन्साइट्स एडिशन (आईआईई) अनुसार,भारत में युवाओं पर करीब अस्सी प्रतिशत  तक प्रभाव इंस्टाग्राम से डाला जाता है या फिर इसकी संभवाना है. यह आंकड़े फेसबुक और ट्विटर द्वारा डाले जाने वाले प्रभाव से बहुत ज्यादा हैं|. इस सर्वे के अनुसारसबसे तेजी से बढ़ते सोशल मीडिया चैनल में इंस्टाग्राम (अस्सी प्रतिशत )ट्विटर (छप्पन प्रतिशत)फेसबुक (बावन प्रतिशत)यूट्यूब (छियालीस प्रतिशत)और व्हाट्सएप (बत्तीस प्रतिशत) है|इन्स्टा की यह लोकप्रियता उसके नए वीडियो प्लेटफ़ॉर्म को लोकप्रिय बनाने में काम आ सकती है
लेकिन आईजीटीवी यूटयूब को टक्कर दे सकता हैं क्योंकि इन कुछ सालों में इन्स्टाग्राम  की लोकप्रियता में तेज़ी से उछाल आया है और लोग इन्स्टाग्राम  के वीडियो फेसबुक पर शेयर करेंगे तो ऑडिएंस फेसबुक की अपनी कम्पनी के प्लेटफ़ॉर्म पर ही रहेगी न कि प्रतिद्वंदी कम्पनी गूगल के प्लेटफ़ॉर्म यूट्यूब पर |
एक और ख़ास बात इन्स्टाग्राम के आईजी टीवी के विडियो लम्बवत (वर्टीकल) ही रहेंगे इससे उपभोक्ता को अपना  मोबाइल घुमाने की ज़रूरत नहीं होगी जैसा कि यूटयूब के वीडियो देखते वक्त करना पड़ता है लेकिन गूगल द्वारा चलायी जाने वाली वीडियो  सर्विस यूटयूब के सक्रिय  दर्शक  की संख्या हर माह  1.9 बिलियन है उपभोक्ताओं के हिसाब से आज की तारीख़ में यूटयूब का विस्तार इन्स्टाग्राम  से दो गुना है लेकिन फेसबुक  द्वारा संचालित यह सेवा  लंबे वीडियो  के क्षेत्र  में यूटयूब के विज्ञापन बाजार  को कड़ी टक्कर दे सकता हैहालाँकि इन्स्टाग्राम  के लंबे विडियो वाले प्लेटफार्म को  अभी बहुत सारी चुनौतियों  का सामना करना पड़ेगा जैसे कि कंटेंट बनाने वालों के साथ रेवेन्यू मॉडल का ढांचा तय करनाबीडियो के निर्माता और दर्शकों  दोनों को बांधे रखना |नए दर्शकों को एक दूसरे  से जोड़ना जैसी आवश्यक चीजें शामिल हैंयूटयूब कंटेंट बनाने वालो के साथ रेवेन्यू  सीधे साझा करता है जिससे सफल वीडियो क्रिएटर की कमाई लगभग १०००० डॉलर हर महीने की हो जाती है और कुछ प्रसिद्ध क्रिएटर १००००० डॉलर तक भी अपने वीडियो से कमा रहे हैं इन्स्टाग्राम  की नीति अभी  इस संदर्भ  में स्पष्ट नहीं  है इन्स्टाग्राम में ज्यादा फालोवर रखने वाले लोग इंफ्लुएंशर मार्केटिंग से पैसा कमा रहे हैं जिसमें कम्पनियां सीधे ऐसे लोगों को अपना उत्पाद या धन देती हैं |जिनके पास ज्यादा फालोवर हैं उन्हें इन्स्टाग्राम सीधे कोई धन नहीं देता है  |दूसरी सबसे अहम् चुनौती है आईजीटीवी प्लेटफ़ॉर्म को कैसे साफ़ सुथरा रखा जाए अश्लील और आहत करने वाले विडियो पर लगाम कैसे लगायी जाए |यूट्यूब की इस मामले में स्थिति बड़ी स्पष्ट है |वे कॉपी राईट उल्लघन करने वाले वीडियो को तुरंत हटाते हैं इसके अलावा हिंसा और अश्लीलता फैलाने वाले वीडियो पर भी उनका रुख कड़ा रहता है |उनकी पूरी टीम इस मामले में काफी संवेदनशील है |वहीं दूसरी तरफ बहुत सारे यूटयूबर्स ने इन्स्टाग्राम में अपने अकाउंट बना लिया है लेकिन  उन लोगों ने यूटयूब का साथ अभी नहीं छोड़ा है |फेसबुक और गूगल में छिड़ी वर्चस्व की इस जंग में फायदा उपभोक्ताओं को मिलेगा  जिन्हें अपनी क्रिएटिविटी दिखाने और लोगों से जुड़ने के मौके नए फीचर्स के साथ मिलेंगे |
नवभारत टाईम्स में 14/07/18 को प्रकाशित 

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