Tuesday, November 29, 2016

घरेलू बचतों में सरकारी सेंधमारी


भारत में लोकतंत्र है जिसका मतलब नीतियां कौन बनाएगा और इसका असर क्या होगा इसका फैसला करने का अधिकार देश के नागरिकों के पास है पर भारत या दुनिया के किसी अन्य पितृ सत्तामक देश में जब नीतियां बनती हैं तो उनको  लैंगिक समानता के नजरिये से भी देखा जाना चाहिए क्योंकि किसी भी देश का लगभग आधा तबका उस वर्ग से आता है जिसे हम “महिला” कहते हैं |पूरा देश हजार और पांच सौ के नोट बदलो अभियान में लगा हुआ है और बैक लोगों की भीड़ से भरे हुए हैं पर उस भीड़ में जो महिलायें खडी  हैं वो कौन हैं यह जानना बहुत जरुरी है  |इस पूरे प्रक्रम में वो महिलायें हैं जिनसे भारत बनता है जो घर का सारा काम काज सम्हालती हैं और सकुचाते हुए कहती हैं वो “कुछ नहीं करती ” देश की जी डी पी में उनके द्वारा किये गए घरेलू श्रम का कोई योगदान नहीं होता है |
तो ये महिलायें जो कुछ नहीं करतीं अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए परिवार के उन पुरुषों पर निर्भर रहती हैं जो उन्हें घर खर्च के लिए महीने की शुरुवात में एकमुश्त रकम दी जाती है और ये महिलायें जो कथित्त  रूप से कुछ नहीं करती उन रुपयों से पूरे घर का ख्याल रखती हैं और अपने शानदार आर्थिक नियोजन से बगैर कॉमर्स और एम् बी ए की पढ़ाई किये हुए कुछ धन बचा लेती हैं अपने परिवार के आने वाले कल के लिए जाहिर है बचत का ये हिस्सा बैंक में नहीं जमा होता है और बचत का यही भाग किसी भी भारतीय मध्य वर्ग और निम्न वर्ग का वो आधार तैयार करता है जिसकी नींव पर उन  महिलाओं को स्वालंबन का एहसास होता  है “जो कुछ नहीं करतीं” जिसके भरोसे वो जिन्दगी की लड़ाई आत्मविश्वास से लडती हैं |बचत का यही हिस्सा वह  आसरा होता है जिससे शहरी माध्यम वर्ग की “कुछ न करने वाली महिलायें” किटी पार्टी करती हैं और आपस में एक दूसरे को आर्थिक रूप से सहायता देती हैं |उल्लेखनीय है यही वो छोटी बचतें थी जिनके बूते  2008 में आयी वैश्विक आर्थिक मंदी में भारत मजबूती से खड़ा रहा |उनका जो भरोसा टूटा है अपने ही परिवार में जो उन्हें सवालों के जवाब देने पड़ रहे हैं और इन छोटी घरेलू बचतों से जो उनमें एक स्वाभिमान का भाव जग रहा था जैसे कुछ सवाल हैं जो इस तरह की नीतियां बनाते वक्त ध्यान में रखे जाने चाहिए |
घरेलू बचतें क्यों नहीं होतीं बैंक में जमा
यू एन डी पी रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 के अंत तक अस्सी प्रतिशत भारतीय महिलाओं के पास बैंक अकाउंट नहीं थे |अगर यह मान भी लिया जाए कि प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत महिलाओं ने अपने बचत खाते खोले होंगे तब भी यह आंकड़ा कुछ ज्यादा नहीं बदलेगा |इसके लिए भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक स्थितियां जिम्मेदार हैं |आम तौर पर इस पुरुष सत्तामक समाज में अधिकारिक तौर पर खर्च बचत के फैसले का सर्वाधिकार एक सामान्य भारतीय परिवार में पुरुषों के हाथ में होता है और महिलाओं आर्थिक रूप से उतनी आत्मनिर्भर नहीं हैं |इसलिए महीने के घर खर्च में से बचाए गए पैसे आधिकारिक रूप से बचत का हिस्सा नहीं होते यह उस महिला या गृहिणी के पैसे होते हैं “जो कुछ नहीं करती” अगर वो इन पैसों को घोषित करके बैंक में जमा भी कर दे तो तो उसकी अपनी बचत पर पूरे परिवार का दावा हो जाता है |दूसरा अगर वो अपने नाम से खाता खुलवा भी ले जिसकी संभावना ग्रामीण भारत में काफी कम है तो भी उसे खर्च करने का अधिकार उसके पास न होकर घर के किसी पुरुष के पास ही होगा |बस बचत बैंक खाते में ही उसका नाम होगा शेष सारे दायित्व उसके पास नहीं रहते |दूसरे भारत की महिलाओं का सामजिक एक्सपोजर कम रहता है और अशिक्षा का होना भी एक बड़ी बाधा है ऐसे में  एक समान्य भारतीय महिला से यह उम्मीद नहीं की जायेगी कि वो अकेले जाकर बैंक में अपना खाता खुलवा ले |ऐसे हालात में इन महिलाओं के लिए बैंक कभी भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर नहीं पाए |ऐसे परिवेश में वो छोटी बचतें कभी रसोई के किसी डिब्बे में ,किसी कथरी के सिरहाने सिल कर इस भरोसे के साथ रखी गयीं थी कि उन्होंने भी अपने परिवार के आने वाले कल के लिए कुछ जोड़ा है या अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिए हर वक्त कभी पति ,बेटे या किसी और के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ेगा |
परिवार का मनोविज्ञान और बचत का खर्च हो जाना
अब जब ऐसी छोटी छोटी बचतें परिवार के सामने आ रही हैं तो सबसे पहले घरों में पहली प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक है कि इतनी बचत हो गयी पर अब उस बचत पर सबका हिस्सा हो गया है जाहिर है ये ऐसे परिवार हैं जिनकी आमदनी कम या सीमित है और आय के ज्यादा स्रोत नहीं हैं अब यह बचत उसकी स्वामिनी के पास बदले नोटों में वापस जायेगी या परिवार के खर्च में शामिल हो जायेगी इस प्रश्न का उत्तर हम भारतीय परिवार के मनोविज्ञान से जानने की कोशिश करते हैं चूँकि स्त्री देवी है और त्याग करने का सर्वाधिकार उसके पास सुरक्षित है तो अमूमन होगा यही अमूमन वह अपनी बचत परिवार के नाम पर कुर्बान कर देगी परिवार में जश्न होगा क्योंकि ऐसे परिवारों में जश्न मनाने के मौके कम ही आते हैं और वह महिला जो इस महत्वपूर्ण बचत के लिए जिम्मेदार अपनी इच्छाओं की एक बार फिर कुर्बानी देगी और देवी के रूप में स्थापित हो जायेगी | पिछले लगभग तीन  दशकों के दौरान 'नीचकही जाने वाली जातियां और औरतें अपने बूते खड़ा होेनेपढ़ने-लिखने के हथियार के जरिए आगे बढ़ने की कोशिश में थीं और यह छोटी-छोटी घरेलू बचतों के जरिए भी हो रहा था लेकिन अब कथित ईमानदारी के नाम पर उनसे उनकी ईमानदारी की कमाई की बचत को भी लूट के राडार पर लाकर सबसे पहले उनके उस भरोसे तोड़ा गया है ताकि उनके दिमाग में यह डर हमेशा मौजूद  रहे कि किसी तरह  चार साल में बचाए गए उनके चालीस हजार रुपए पर सरकार नजर हो सकती है  और इसीलिए किसी तरह उसे खर्च कर दो ।
नवभारत टाईम्स में 29/11/16 को प्रकाशित लेख 

Wednesday, November 23, 2016

सोशल मीडिया से ताज़ा ख़बरों की दस्तक

ऐसे समय में, जब फेसबुक समेत सोशल मीडिया के लगभग सभी माध्यम झूठी और फर्जी खबरों की समस्या से जूझ रहे हैं, कुछ ऐसा भी हो रहा है, जो बहुत उम्मीद बंधाता है। इस साल अगस्त में जब फेसबुक ने लाइव फीचर शुरू किया था, तो किसी ने नहीं सोचा था कि कैसे फेसबुक में लाइव वीडियो फीचर का यह छोटा-सा ‘आइकन’ भारत को सिटिजन जर्नलिज्म की अगली पीढ़ी में ले जाने वाला है और टीवी पत्रकारिता के तौर-तरीके पर गहरा असर डालने वाला है। इस वक्त जब पूरा देश नोट बदलने के लिए एटीएम या बैंक के बाहर लाइन में लगा है, स्थिति की गंभीरता को दिखाने के लिए महज तस्वीरों से ही नहीं, बल्कि इस लाइव वीडियो का भी सबसे सटीक इस्तेमाल हो रहा है। अखबारों, टीवी चैनलों ने भी इस अवसर का फायदा उठाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। नए नोट पाने या पुराने नोट निपटाने के लिए लाइन में लगे लोगों को दिखाने और उनकी प्रतिक्रिया को समझने के लिए फेसबुक लाइव फीचर एक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी दौरान, नमक की कमी को लेकर फैली अफवाह को खत्म करने में भी लोगों ने इस फीचर का बखूबी इस्तेमाल किया, जिससे स्थिति खराब नहीं होने पाई।
फेसबुक का यह फीचर प्रयोगकर्ताओं को रियल टाइम में सीधे प्रसारण की सुविधा देता है। यह ठीक है कि पहले लोगों ने मजे के लिए लाइव होना शुरू किया, मगर धीरे-धीरे इसमें गंभीरता आनी शुरू हो गई है। इस फीचर के मानक गढ़ने और सीखने में फेसबुक के भारतीय उपयोगकर्ताओं ने ज्यादा वक्त नहीं लगाया। जो यह भी बताता है कि देश नए मीडिया के प्रयोग के तौर-तरीके बहुत जल्दी आत्मसात कर रहा है। जिसे हम डिजिटल इंडिया कहते हैं, वह भले ही एक सरकारी प्रयास और नारा है, लेकिन सच यह है कि देश की युवा पीढ़ी डिजिटल बदलावों और औजारों को लेकर काफी सहज हो चुकी है। अब नए बदलाव की राह इसी सहजता से निकलेगी।
भारत में इस समय 15 करोड़ से ज्यादा लोग फेसबुक का उपयोग कर रहे हैं। अब आगे इस संख्या को लगातर बढ़ाते रहना फेसबुक की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी ही चुनौती देश में सक्रिय सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफॉर्म की भी है। शोध बताते हैं कि लोगों का समाचार पाने का तरीका सोशल मीडिया के आने के बाद बदला है और वे समाचारों के लिए टीवी की बजाय सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ओर रुख कर रहे हैं। फेसबुक के पास टेक्स्ट, तस्वीरें और वीडियो शेयर करने की व्यवस्था पहले से ही थी, पर लाइव वीडियो फीचर ने इसमें एक नया आयाम जोड़ दिया है। सिटिजन जर्नलिज्म की अवधारणा में जिस गति की कमी सोशल मीडिया साइट्स में महसूस की जा रही थी, उसको लाइव वीडियो ने भर दिया है। उम्मीद की जा रही है कि इसका असर हमारे समाचार टीवी चैनलों पर भी जल्द दिखेगा।
यह भी मुमकिन है कि खबरों को पाने का उनका सबसे बड़ा माध्यम सोशल मीडिया ही बन जाए। ओबी वैन से सीधा प्रसारण बहुत जल्द ही इतिहास हो जाने वाला है। असल में, यही एक ऐसा तत्व है, जो एक आम इंटरनेट प्रयोगकर्ता के पास नहीं था, इसलिए उसकी निर्भरता समाचार और सूचना पाने के लिए टीवी पर थी। अभी तक की तकनीकी व्यवस्था में सीधे प्रसारण के कारण टीवी ज्यादा विश्वसनीय था, पर अब वह दूरी भी खत्म हो गई है। इस बीच भारत में लगातार स्मार्टफोन की संख्या बढ़ती जा रही है, जो इस बात का द्योतक है कि फेसबुक का यह फीचर अभी और ज्यादा लोकप्रिय होगा और लोगों को अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए टीवी चैनल जैसे महंगे माध्यम की जरूरत नहीं होगी। उनके पास खुद का अपना माध्यम होगा।
बेशक इसके रास्ते में कई बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बाधा इंटरनेट की गति है। 4जी तकनीक का विकास और विस्तार इसकी गति को कितना तेज कर सकता है? इससे भी बड़ी चुनौती नागरिक पत्रकारिता के नाम पर सामग्री की भरमार की है। सोशल मीडिया इस अराजकता से निकलकर सुगठित रूप में कैसे निखरेगा, यह कोई नहीं जानता। फिर इसे विश्वसनीयता कायम करने के लिए भी संघर्ष करना होगा।
हिन्दुस्तान में 23/11/16 को प्रकाशित 

Tuesday, November 22, 2016

'काला रंग' निराला रे

आजकल हर जगह काले धन की ही चर्चा है बात जब काले की होती है तो हम थोडा सचेत हो जाते हैं क्योंकि काला आते ही न जाने क्या क्या नकारात्मक हमारे जहन में आने लगता है जैसे काला धंधा ,काली किस्मत और न जाने क्या क्या |इतनी सारी काली चीजों के बारे में सोचते हुए मैंने भी न जाने अपनी कितनी रातें काली की हैं | मेरी रातें जरुर काली हो रही थीं पर मुझे इस काले रंग के कई सारे उजले पक्ष के बारे में जानने का मौका मिला | जहाँ सरकार काले धन से छुटकारा पाना चाहती है वहीं बाजार में काले से गोरा बनाने वाली क्रीम की भरमार है | काला बाज़ार से लेकर काले रंग तक हम किसी न किसी तरह से काले के प्रभाव में रहते हैं| 
क्या काला रंग वाकई इतना बुरा होता है जितना हम उसे मानते हैं या यह महज हमारे दिमाग के नजरिये का मामला है कि हमने काले रंग को गलत चीजों के साथ जोड़ दिया है  |कहानी में यहीं से थोडा बदलाव  आता है क्योंकि ये लेख लिखते हुए मेरे काले कम्पूटर की काली स्क्रीन में काले अक्षर ही उभर रहे हैं वैसे मेरी त्वचा का रंग भी काला है और मुझे इस पर फख्र है |यूँ तो काला रंग हमेशा से प्रभुत्व और वर्चस्व के प्रतीक रूप में इस्तेमाल होता आया है| सफ़ेद ने अगर शांति के प्रतीक के रूप में अपनी पहचान बनायीं  है तो काला रंग जाने अनजाने अपने अंदर एक अलग आकर्षण रखता है| फिर चाहे वह ब्लैक ब्यूटी हो या फिर कोई ब्लैक वेहिकल| अफ्रीका के काले लोगों की शारीरिक सौष्ठव की बात हो या फिर भारत में बंगाल के काले जादू की| सबकी अपनी एक पहचान है| अमावस की काली रात हो या काल भैरव की पूजा हर जगह काले का ही बोलबाला है आइये कुछ और आगे चलते हैं और देखते हैं कि हमारे जीवन में ये काला रंग क्या महत्व रखता है जिंदगी की डगर पर अगर आगे बढ़ना है तो पेन्सिल की काली रेखा की जरुरत होगी या फिर इस डिजीटल दुनिया  में ओ एम् आर शीट के काले गोले जो आपको सफलता के दरवाजे तक ले जायेंगे |

जीवन में सफल होने के लिए सिर्फ शिक्षा की ही जरुरत नहीं होती जरा  सोचिये जेम्स वाट ने किस तरह भाप की शक्ति को पहचान कर काले  कोयले को उर्जा के एक नए साधन के रूप में दुनिया से परिचित कराया और बाद में इन्ही भाप के इंजनों ने औधोगिकी करण की नीव रखी जिससे हम सबकी जिंदगी बेहतर हुई |बात जब जिंदगी की चल पडी है तो फिर हमारा आपका किस्सा तो होगा ही तो इस किस्से को और आगे बढ़ाते हुए कुछ खूबसूरत सी चीज़ आपको याद दिलाना चाहता हूँ सही पहचाना आपने काला तिल कितना कुछ है हमारे जीवन में जो काला होते हुए भी सुन्दर है आकर्षक है वो चाहे बालों का काला रंग हो या कजरारे नैनभगवान कृष्ण के सांवले सलोने रूप को ही ले लीजिए | नीबू वाली काली चाय का असली मजा तो आप तभी ले सकते हैं जब आसमान में काली घटायें छाई हो मेरे जैसे न जाने कितने लेखकों ने कितने पन्ने काले कर दिए सिर्फ अपनी बात को दूसरों तक पहुँचाने के लिए हाँ मेरे और आपके सभी के शैक्षिक जीवन  की शुरुआत का  आधार भी एक काला बोर्ड ही होता है  लेकिन फिर भी हम काले रंग से न जाने क्यों एक बचना चाहते हैं|

जीवन ने  हमें कई रंग दिए हैं उनमे से एक रंग काला भी है इंसान या उससे जुडी हुई कोई चीज़ अच्छी बुरी हो सकती है पर रंग नहीं आप रंगों की भाषा में आप इसको यूँ समझें हम काले रंग के खिलाफ नहीं है बल्कि समाज में होने वाली काली करतूतों के खिलाफ हैं फिर वो चाहे काला धन हो या काला बाजारी तो अपना रंग गोरा करने की बजाय जो रंग भगवान ने आपको दिया है उसमे खुश रहें पर समाज के कालेपन को खतम करने के लिए जो आप कर सकते हैं वो जरुर करें तो याद रखियेगा कोई रंग बुरा नहीं होता |
प्रभात खबर मे 22 /11/16 को प्रकाशित 

Sunday, November 20, 2016

शौचालय निर्माण तो स्वच्छ भारत का "पहला पड़ाव"

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही स्वच्छ भारत अभियान को अपनी प्राथमिकता में सबसे ऊँची पायदान पर रखा जिसमें साल 2014-15 में सरकार ने पचास लाख अस्सी हजार (5.8 मिलियन ) शौचालय बनाने का  लक्ष्य रखा था| स्वच्छ भारत मिशन के दो वर्ष के दौरान देश के शहरी क्षेत्रों में 22,97,389 व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण किया गया है। पहले दो वर्षो अर्थात मिशन की 40 प्रतिशत अवधि में 35 प्रतिशत लक्ष्य पूरा किया गया है। ऐसा खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करने के लिए किया जा रहा है।
बयान के अनुसारगुजरात और आंध्र प्रदेश ने इस वर्ष सितंबर तक तीन वर्ष पहले ही मिशन लक्ष्य पूरा कर लिया है। गुजरात में 4,06,388 शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य पूरा किया गया हैजबकि आंध्र प्रदेश ने शहरी क्षेत्रों में 1,93,426 शौचालयों का निर्माण कर अपने आप को शहरी क्षेत्रों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया है।सरकार को उम्मीद थी कि शौचालयों के निर्माण से देश स्वच्छता के मामले में बेहतर स्थिति में आ जाएगा पर व्यवहार में ऐसा होता नहीं दिख रहा है |इस समस्या के और भी पहलू हैं जिनको शौचालय निर्माण प्रक्रिया के साथ देखा जाना चाहिए |
अभी  आयी  भारत सरकार की स्वच्छता स्थिति रिपोर्ट” भारत में सफाई की समस्या के एक नए रुख की ओर इशारा कर रही है कि महज शौचालयों के निर्माण से भारत स्वच्छ नहीं हो जाएगाइस रिपोर्ट में भारतीय आंकड़ा सर्वेक्षण कार्यालय (एन एस एस ओ ) से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया गया है |देश में कूड़ा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) एक बड़ी समस्या है |ग्रामीण भारत में तरल कूड़े के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं है जिसमें मानव मल भी शामिल है देश के 56.4 प्रतिशत शहरी वार्ड में सीवर की व्यवस्था का प्रावधान है आंकड़ों के मुताबिक़ देश का अस्सी प्रतिशत कूड़ा नदियों तालाबों और झीलों में बहा दिया जाता है|यह तरल कूड़ा पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर देता है|यह एक गम्भीर समस्या है क्योंकि भूजल ही पेयजल का प्राथमिक स्रोत है |प्रदूषित पेयजल स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याएं पैदा करता है जिसका असर देश के मानव संसधान पर भी पड़ता है |
गाँव के 22.6 प्रतिशत वार्ड और शहर के 8.6 प्रतिशत वार्ड में एक भी स्वच्छ शौचालय लोगों के इस्तेमाल के लिए नहीं है |गंदे शौचालय महिलाओं में मूत्र संबंधी संक्रमण और त्वचा संबंधी रोगों का एक बड़ा कारण है |देश के 22.6 सामुदायिक शौचालय कभी साफ़ ही नहीं किये जाते हैं गाँवों में कूड़ा प्रबंधन का कोई तंत्र नहीं है लोग कूड़ा या तो घर के बाहर या खेतों ऐसे ही में डाल देते हैं |शहरों की हालत गाँवों से थोड़ी बेहतर है जहाँ 64 प्रतिशत वार्डों में कूड़ा फेंकने की जगह निर्धारित है लेकिन उसमें से मात्र 48 प्रतिशत ही रोज साफ़ किये जाते हैं |देश के तैंतालीस प्रतिशत शहरी वार्ड में घर घर जाकर कूड़ा एकत्र करने की सुविधा उपलब्ध है |पर जनवरी 2016 तक देश में एकत्रित कुल कूड़े का मात्र अठारह प्रतिशत का ही निस्तारण किया जा सका है|पर्याप्त कूड़ा प्रबन्धन(वेस्ट मैनेजमेंट ) के अभाव में शौचालय निर्माण प्रक्रिया के औचित्य पर सवालिया निशान लग जाते हैं |कूड़ा और मल का अगर उचित प्रबंधन नहीं हो रहा है तो भारत कभी स्वच्छ नहीं हो पायेगा |दिल्ली और मुमबई जैसे भारत के बड़े महानगर वैसे ही जगह की कमी का सामना कर रहे हैं वहां कूड़ा एकत्र करने की कोई उपयुक्त जगह नहीं है ऐसे में कूड़ा किसी एक खाली जगह डाला जाने लगता है वो धीरे –धीरे कूड़े के पहाड़ में तब्दील होने लग जाता है और फिर यही कूड़ा हवा के साथ उड़कर या अन्य कारणों से साफ़ –सफाई को प्रभावित करता है जिससे पहले हुई सफाई का कोई मतलब नहीं रहा जाता |इस व्यवस्था को यूँ भी समझा जा सकता है कि बारिश से पहले शहरों    के नगर निगम नाले की सिल्ट निकालते हैं और उस सिल्ट को नाले के किनारे ही छोड़ देते हैं और धीरे धीरे निकाली गयी सिल्ट फिर नाले में चली जाती है |
वेस्ट टू एनर्जी  रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के एक  शोध के मुताबिक  भारत में अपर्याप्त कूड़ा  प्रबन्धन  बाईस बीमारियों का वाहक बनता है |शौचालय निर्माण स्वच्छता मापने का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता |शौचालय तो मानव मल को एक जगह एकत्र करके उसे आगे बढ़ा देता है पर महत्वपूर्ण सवाल ये है कि इस मानव मल का होता क्या है शहरों में यह मानव मल एसटीपी में जाता है और अगर एस टी पी नहीं है या काम नहीं कर रहा है तो इसे नदियों तालाबों में बहा दिया जाता है जो जल को प्रदूषित कर देता है स्वच्छ भारत का यह मिशन तभी अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा  जब उचित कूड़ा और मल प्रबन्धन के तरीकों के साथ शौचालयों का निर्माण हो और उनकी साफ़ सफाई की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए |
नवोदय टाईम्स में 20/11/16 को प्रकाशित 

Wednesday, November 16, 2016

आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति का रूप है सेल्फी

अगर आप सोशल मीडिया प्रयोगकर्ता हैं तो आप दिन भर में कई बार ऐसी तस्वीरों से वाबस्ता होंगे जब लोग अजीब अजीब चेहरों के साथ खुद ही अपनी तस्वीरें पोस्ट करते दिखेंगे यह क्रिया अगर आज से ज्यादा नहीं दस साल पहले हो रही होती तो ऐसे लोगों को आप किसी मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह देते पर आज यह एक सामान्य प्रक्रिया है जिसे हम सेल्फी लेना कहते हैं और इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है |समाजशास्त्रीय नजरिये किसी चिंतक ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि मानव सभ्यता के इतिहास में एक ऐसा वक्त आएगा जब इंसान इतना अकेला पड़ जाएगा कि उसे अपनी तस्वीरें खुद ही खींचनी पड़ेंगी इसका एक विश्लेषण यह भी हो सकता है कि ऐसा समाज आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा की और अग्रसर है जब इंसान सिर्फ कहने को एक सामाजिक प्राणी भर बचा है सच यह है कि वह परले दर्जे के एक आत्मकेंद्रित जैविक रूप से मानव  में तब्दील होता जा रहा है |जी हाँ यह सेल्फी युग है और इसकी  एक सबसे बड़ी चुनौती है कि यह लोगों को आत्मकेंद्रित बना  रही है जिसमें स्मार्ट फोन का बड़ा योगदान है | हम भले ही हर वक्त दुनिया से जुड़े हों पर अपने आस पास से बेखबर हैं |इसी आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति का एक रूप है सेल्फी मतलब खुद से अपने आप की तस्वीर लेना |यह प्रयोग ज्यादातर लोग अपने स्मार्ट फोन से करते हैं| विचित्र भाब भंगिमा बनाये हुए  लोगों से दुनिया भर की सोशल नेटवर्किंग साईट्स भरी हुई हैं और यह रोग तेजी से फैलता जा रहा है|औसतन दुनिया भर की सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर पचास मिलीयन सेल्फी पोस्ट की चर्चा की जा रही है |सेल्फी शब्द चर्चा में तब आया जब साल 2013 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इस शब्द को वर्ड ऑफ़ दा ईअर के खिताब से नवाजा पर शोध के मुताबिक़ सेल्फी शब्द का प्रयोग साल 2002 में एक ऑस्ट्रेलियन इंटरनेट फोरम में किया गया पर इसके प्रयोग को गति स्मार्ट फोन के बढ़ते इस्तेमाल के बाद मिली पर भारत जैसे देश में सेल्फी इन दिनों एक नकारात्मक वजह से चर्चा में है कंटेंट ट्रैकर साईट प्राईसनोमिक्स के एक शोध के अनुसार दुनिया भर में सेल्फी खींचते वक्त होने वाली मौतों में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है यह शोध इंटरनेट पर साल 2014-15 में रिपोर्ट किये गए आंकड़ों पर आधारित है इस दौरान सारी दुनिया में सेल्फी खींचते कुल छियालीस मौतें हुईं जिसमें अकेले भारत में उन्नीस मौतें हुईं वहीं इसी अवधि में भारत से ज्यादा आबादी वाले देश चीन में सिर्फ एक मौत रिपोर्ट हुई |इन मौतों में मरने वाले व्यक्तियों में से  पचहत्तर प्रतिशत की औसत आयु इक्कीस वर्ष से कम थी |भले ही भारत जैसे विशाल देश  के अनुपात में सेल्फी से होने वाली मौतों का आंकड़ा अन्य दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों से काफी कम है पर यह आंकड़ा कई सवाल खड़े करता है कि अब वक्त आ गया है जब स्मार्ट फोन हमारे समाजीकरण का अहम् हिस्सा बन चुके हैं तो इनके प्रयोग का मानकीकरण किया जाए और लोगों को इस बात के लिए जागरूक किया जाए कि तकनीक का आविष्कार मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए हुआ है न कि उसे और जटिल बनाने के लिए| संकट इसलिए भी गहरा है क्योंकि  स्मार्ट फोन का ज्यादा इस्तेमाल युवा पीढी कर रही है जो इसके   प्रथम उपभोक्ता भी  हैं और उन्हें इसके इस्तेमाल का कोई तरीका विरासत में नहीं मिला है और परिणाम ज्यादा सेल्फी लेने का शौक और कुछ अनूठा करने के चक्कर में उससे होने वाली दुर्घटना|मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं ज्यादा सेल्फी लेना मनोविकार का लक्षण हैं जिसमें व्यक्ति आत्मुघद्ता का शिकार रहता है| मनोचिकित्सकों ने सेल्फियो को तीन भागों में बांटा है। दिन भर में तीन सेल्फी लेना और उसे सोशल मीडिया में पोस्ट न करना। इसे बॉर्डर लाइन सेल्फीटिस कहा गया है। दूसरे स्टेज पर एक्यूट आते हैं, जो उतनी तस्वीरें खींच सोशल मीडिया पर डालते हैं। तीसरे पर क्रोनिक आते हैं। यह प्रक्रिया छह बार से भी अधिक करते हैं। 
 
स्मार्ट फोन लोगों को जोड़ने के लिए है न कि लोगों से कट कर अपने में सिमटे रहने के लिए | ‘हम पर हावी होता यह मैं आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा भविष्य छोड़ जाएगा इसका फैसला होना बाकी है |
नवोदय टाईम्स दिल्ली में 16/11/16 को प्रकाशित लेख 

शहरी खांचे से नहीं निकला ऍफ़ एम्


सूचना और प्रसारण मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार अभी वर्तमान में   215 शहर रेडियो की एफ एम् सेवा का लुत्फ़ उठा रहे है और तृतीय चरण की नीलामी के पश्चात सौ ऍफ़ एम् चैनल जल्दी ही शुरू होने वाले हैं|इसके बाद भारत में कुल एफ एम् चैनलों की संख्या 345 हो जाने की उम्मीद हैभारत में एफ एम् प्रसारण की शुरुआत   23 जुलाई 1977 में तत्कालीन मद्रास(अब चेन्नई ) केंद्र से की थी पर लागत की अधिकता के कारण इस प्रयोग को पूरे भारत में प्रोत्साहित नहीं किया गया | नब्बे के दशक में आकाशवाणी ने देश के चार बड़े शहरो में एफ एम् सेवा प्रारम्भ की बाद में निजी प्रसारकों के इस क्षेत्र में उतरने से यह क्षेत्र एक बड़े बाजार में तब्दील हो गया है | एफ एम् स्टेशन  म्यूजिक रेडियो और टाक रेडियो  के बीच संतुलन नहीं बना पाए हैं|तथ्य यह भी है कि एक माध्यम के रूप में ऍफ़ एम् रेडियो अभी भी एक गंभीर माध्यम के रूप में जड़ नहीं जमा पाया है एक पूर्णता शहरी माध्यम के रूप में शुरू हुए रेडियो के इस नए अवतार को हाथों हाथ लिया गया पर लगभग आज दो दशक बीतने के बाद भी यह माध्यम इन्फोटेंमेन्ट माध्यम के रूप में उभरने की बजाय मात्र एक अगम्भीर  संगीत माध्यम के रूप में ही अपनी पहचान के लिए संघर्षरत है |
                     इस नीलामी के बाद एफ एम् चैनलों की पहुँच में  कई नए शहर आयेंगे व्यवसाय की दृष्टि से भले ही यह फायदे का सौदा हो पर कंटेंट के स्तर पर भारत के एफ एम् चैनल   एक ठहरे मनोरंजक  माध्यम के रूप में तब्दील हो गए हैं जो  पिछले बीस   सालों में सिर्फ मनोरंजन के नाम पर हमें फ़िल्मी गाने और प्रेम समस्याओं को ही सुना रहे हैं|तकनीकी तेजी ने मीडिया के अन्य रूपों में  बहुत बदलाव ला दिया है|पर भारत में अभी एफ एम् रेडियो की ताकत का दोहन होना बाकी है |इसका एक बड़ा कारण ऍफ़ एम् अपने शहरी माध्यम की छवि को तोड़ नहीं पाया है |पहला कारण पूरी तरह व्यवसायिक  माध्यम होने के कारण यह मात्र विज्ञापनदाताओ पर निर्भर है दूसरा निजी  ऍफ़ एम् चैनलों पर समाचारों का प्रसारण निषिद्ध होना |समाचारों का प्रसारण न होना एक नीतिगत मसला है पर सरकारों का निजी ऍफ़ एम् पर समाचारों के प्रसारण से डरना अपने आप में यह बताता है कि सरकार इस माध्यम की ताकत और संवेदनशीलता से परिचित है | जाहिर है कि सरकार रेडियो के मामले में कोई बदलाव नहीं चाहती वह यही चाहती है कि रेडियो श्रोता उन्हीं ख़बरों को जाने सुने जो वह लोगों को बताना चाहती है इसका बेहतरीन उदाहरण प्रधानमंत्री मोदी का मन की बात कार्यक्रम है जिसे सारे निजी ऍफ़ एम् चैनल प्रसारित करते हैं पर इस कार्यक्रम का विश्लेषण टीवी समाचार चैनलों में होता है |
                      भारत में हुई मोबाईल क्रांति ने ऍफ़ एम् रेडियो को हर हाथ में पहुंचा दिया है पर कंटेंट के नाम पर नए गाने फ़िल्मी गॉसिप और युवाओं की प्रेम संबंधी समस्याओं पर आधारित कार्यक्रम,ऐसे कार्यक्रम देश की युवा पीढी को एक ऐसा नागरिक बना रहे हैं जो जहनी तौर पर एकदम खाली हो जिसे सवाल करना न आता हो जिसके लिए भारत का मतलब महज फ़िल्में और उनकी व्यक्तिगत समस्याएं हों जिनमें सामूहिकता के लिए कहीं कोई जगह न हो |ऐसा भी नहीं है कि समाचारों के प्रसारण पर रोक के कारण कोई नवाचरिता निजी ऍफ़ एम् चैनल कर ही नहीं सकते पर उनकी तरफ से घिसा हुआ तर्क आता है कि लोग सुनना ही नहीं चाहते पर इसी कड़ी में लोक प्रसारक आकाशवाणी का मनोरंजक चैनल विविध भारती अपवाद है |विविधभारती की स्थापना विशुद्ध मनोरंजक चैनल के रूप में की गयी थी पर जिन जिन शहरों में विविध भारती ऍफ़ एम् बैंड पर सुनायी पड़ रहा है वहां वहां उसने निजी ऍफ़ एम् चैनलों को अकेले कड़ी टक्कर दी है और अपने मनोरंजक स्वरुप को बरकरार रखते हुए अपने कार्यकर्मों में पर्याप्त विविधता रखते हुए  अपनी सामजिक जिम्मेदारी को भी निभाया है और इन्फोटेंमेन्ट का सही संतुलन भी बनाया है  मतलब यह तर्क कि लोग सस्ती बातें और फ़िल्मी गानें ही सुनना चाहते हैं भोथरा हो जाता है |रेडियो और साहित्य के बीच कड़ी का काम करने वाली विधा रेडियो नाटक आज सिर्फ विविधभारती के सहारे जिन्दा है |तीसरे चरण के नए ऍफ़ एम् केन्द्रों के खुलने के बाद जब ऍफ़ एम् कस्बों और छोटे शहरों में पहुंचेगा तब क्या ये अपना शहरी चरित्र बदलते हुए वास्तविक भारत का प्रतिनिधित्व करेगा या उसे जाने पहचाने फोर्मुले पर चलेगा जिसका प्रयोग बड़े शहरों में किया जाता रहा है ,इसका फैसला होना बाकी है |
अमर उजाला में 16/11/15 में प्रकाशित 



Wednesday, November 9, 2016

छोटा सा घर है मगर

कभी कभी जिंदगी के बड़े सवालों का जवाब बहुत छोटी सी चीज़ में मिल जाता वो जो हमारे आस पास होती हैं पर हमारा ध्यान उन पर जाता ही नहीं लिखने बैठा तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या लिखूं तभी कुछ पंक्तियाँ कानो में पडी   “ हर घर चुपचाप ये कहता है इस घर में कौन रहता है ,छत बताती है ये किसका आसमान है रंग कहते हैं किसका ये जहाँ है कौन चुन चुन कर प्यार से इसे सजाता है कौन इस मकान में अपना घर बसाता है” हाँ ये घर ही तो है जिससे सब कुछ है |घर के बगैर सोचिये हमारा जीवन कैसा होता |घर से परिवार और परिवार से रिश्ते नातों का सफर सब कैसे आपस में कैसे जुड़े हैं  |इंसान की सामजिकता का आधार घर है  |विकास के क्रम में हमारी सारी तरक्की का केंद्र  घर ही तो है |आदि मानव अगर घर ही न बनाता तो आज दुनिया इतनी खूबसूरत न होती |दिन भर की भाग दौड के बाद हम सब अपने घर जाने को उतावले होते है वो जगह जो आपकी अपनी है जहाँ हम सुकून पाते हैं |
सुकून और घर के इस सफर में अगर हम संगीत को अपना हमसफर बना लें और ये गाना सुने तो सुकून दोगुना हो जाएगा लोग जहाँ पर रहते हैं उस जगह को वो घर कहते हैं हम जिस घर में रहते हैं उसे प्यार का मंदिर कहते हैं”(प्यार का मंदिर ) सही ही तो है घर अगर मंदिर है तो वहां शांति होगी बड़े बुजुर्गों का साथ होगा |अगर कभी आपको अपने घर से दूर जाना पड़े तो आप ही नहीं आपका घर भी आपको याद करता है क्योंकि घर तो रिश्तों से बनता है ईंट पत्थरो से तो मकान बनता है  “घर कब आओगे तुम बिन ये घर सूना सूना है” (बोर्डर ) पर आगे बढ़ने के लिए घर छोडना ही पड़ता है और हम इस दुनिया में अपना आशियाना बनाने अपने सपनों को सच करने  निकल पड़ते हैं |माता- पिता के प्यार से दूर, अपने अपनों का साथ छोड़ पर एक घर से दूसरे घर तक का ये सफर आसान नहीं होता पर इंसान बहुत फ्लैक्सेबल जीव होता है बहुत जल्दी हम कुछ नए रिश्ते बना लेते हैं और तब दिल अचानक गा उठता है ये तेरा घर ये मेरा घर किसी को देखना हो गर तो पहले आके मांग ले तेरी नज़र मेरी नज़र” (साथ साथ) पर ये घर यूँ ही नहीं बन जाता इसमें इंसानी रिश्तों के सारे रंग होते कहीं प्यार कहीं तकरार आपसी रिश्तों की खूबसूरती का एहसास घर ही कराता है |रक्षा बंधन में बहन भाई का अपने घर आने का इन्तिज़ार करती है वहीं त्योहारों में माँ बाप को अपने बेटे बेटियों के घर आने का इन्तिज़ार रहता है और कहीं एक पत्नी रोज शाम को अपने पति का घर लौटने का इन्तिज़ार करती है |
दुनिया बदल रही है अगर पति -पत्नी दोनों वर्किंग है तो छोटे बेटे बेटियों को अपने माता पिता के घर लौटने का इन्तिज़ार रहता है |देखा जाए तो रिश्ते तो बहाना है इन्तिज़ार तो घर करता है जिनके होने से कोई मकान घर बन जाता है |असल में रिश्तों की खूबसूरती को महसूस घर ही कराता है जहाँ कोई अनजाना आकर  रिश्तों की डोर में बंध जाता  |घर घर होता है वो छोटा हो या बड़ा इससे फर्क नहीं पड़ता अगर उसमे रहने वाले लोग आपस में रिश्तों की मीठी डोर से बंधे हैं छोटा सा घर है ये मगर तुम इसको पसंद कर लो” (डर ) तो घर के बहाने ही सही घर के उन रिश्तों पर भी ध्यान दीजिए जो बिना शर्त आपको प्यार दिए जा रहे हैं अपने अपनों का ख्याल कीजिये वो कोई भी हो सकता है वो बूढ़े माता पिता  आपका बेटा या बेटी या फिर पति पत्नी जिन्हें जीवन की भाग दौड में आप शायद उतना वक्त नहीं दे पा रहे हैं तो आज उन लोगों को शुक्रिया कहिये जिनके कारण आपका घर घर है |
प्रभात खबर में 09/11/16 को प्रकाशित 

Monday, November 7, 2016

वर्च्युल दुनिया में भी भेदभाव झेल रही हैं भारतीय महिलाएं

असमानता कैसी भी हो उसका असर समाज के हर हिस्से पर पड़ता है |भारत में स्त्री –पुरुष समाज के समान धरातल पर नहीं खड़े हैं लैंगिक नजरिये से यह कोई नया तथ्य नहीं है कि भारत में महिलाओं को समाज में अपनी जगह बनाने के लिए पुरुषों से कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है बात चाहे शिक्षा की हो या करियर या फिर जीवन साथी का चुनाव |सूचना क्रान्ति के इस युग में सोशल मीडिया के आगमन के साथ इस धारणा को बल मिला कि तकनीक इस लैंगिक असामनता को कम करने में कुछ मददगार होगी और इसमें अहम् योगदान फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साईट्स देंगी | फेसबुक के ही आंकड़ों के मुताबिक भारत में पंद्रह  करोड़ तीस लाख लोग इसका इस्तेमाल कर रहे थे पर यहाँ भी  विकसित देशों के विपरीत पुरुष वर्चस्व कायम है |भारत की महिलायें यहाँ भी उस पुरुषवादी मानसिकता का शिकार हैं जिसका सामना उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में करना पड़ता है यूनाइटेड किंगडम की संस्था “वी आर द सोशल” की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में फेसबुक का इस्तेमाल करने वाली कुल आबादी में महिलाओं का हिस्सा मात्र चौबीस प्रतिशत है यानि तीन पुरुष प्रयोगकर्ताओं के मुकाबले एक महिला प्रयोगकर्ता |एक ऐसा देश जो दुनिया में दूसरे स्थान पर सबसे ज्यादा स्मार्ट फोन प्रयोग करता है वहां महिलाओं के सम्बन्ध में ऐसे आंकड़े चौंकाते नहीं पर परेशान जरुर करते हैं | देश में इस समय दुनिया की सबसे युवा आबादी बसती है जो सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा प्रयोग करती है |पर विभिन्न आयु वर्गों के फेसबुक इस्तेमाल में 18 से 24 और 24 से 35 में यह अंतर सबसे ज्यादा है |वैसे भी फेसबुक एक शहरी और पढ़े लिखे लोगों का माध्यम है यह वह आबादी है जो पढी लिखी है और आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में है वहां  भी महिलायें पुरुषों के मुकाबले चुप हैं |तकनीक लिंग निरपेक्ष होती है पर उसका इस्तेमाल प्रयोग करने वाले की मानसिकता पर निर्भर करता है |
पितृ सत्तामक ढांचा और वित्तीय आत्मनिर्भरता का न होना
आंकड़ों के संदर्भ में अगर हम देखें तो चूंकि भारतीय सामाजिक ढांचा पितृ सत्तात्मक है और ज्यादातर  महिलाओं को वित्तीय आत्मनिर्भरता हासिल नहीं है इसलिए किसी भी घर में जब कोई नयी तकनीक आती है तो उसका पहला उपभोक्ता पुरुष ही होता है क्योंकि उसके पास वित्तीय आत्म निर्भरता है |स्मार्ट फोन आमतौर पर सामान्य फोन के मुकाबले थोड़े महंगे होते हैं तो महिलाओं को या तो घर के किसी पुरुष के छोड़े हुए मोबाईल मिलते हैं या सस्ते वाले बगैर इंटरनेट के फोन इस धारणा के साथ कि वे इंटरनेट वाले फोन का क्या करेंगी |वैसे भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म अपने आप को व्यक्त करने का मौका देते हैं पर एक आम हिन्दुस्तानी महिला को पत्नी या बहन के रूप में घरेलू निर्णय प्रक्रिया में वो स्थान नहीं दिया जाता (अपवादों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत के सम्बन्ध में  ) जिसकी हकदार वो हैं ऐसी स्थिति में वो आत्मविश्वास की कमी का शिकार हो जाती हैं |ऐसे में वो फेसबुक जैसे माध्यमों  पर या तो आने से हिचकती हैं और अगर आती हैं तो ज्यादा सक्रिय नहीं रहती हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि पता नहीं वो सही कह रही हैं या गलत |शिक्षा का पहला मौका किसी भी परिवार में लड़कों को पहले मिलता है तो लड़कियों का शिक्षित न होना भी उन्हें तकनीक से दूरी बनाये रखने में मदद करता है क्योंकि स्मार्ट फोन तकनीकी रूप से थोड़े जटिल होते हैं और उसके इस्तेमाल को सीखने में किसी कम पढ़े लिखे या अशिक्षित व्यक्ति को ज्यादा परेशानी होगी  |
सोशल मीडिया पर सुरक्षित नहीं हैं महिलायें और सामाजिक वर्जनाएं
तथ्य यह भी है कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष भारत में किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर ज्यादा सुरक्षित है वो कुछ भी लिख सकता है कैसी भी तस्वीरें डाल सकता है पर अगर महिलाएं फेसबुक पर पुरुषों जितनी बिंदास हो जाएँ तो उन्हें तुरंत चरित्र प्रमाण पत्र मिलने लग जाते हैं इसलिए कम ही महिलाएं फेसबुक पर ज्यादा मुखर रह पाती हैं और सामान्य महिलायें निजता के हवाले से या तो इससे दूर रहना पसंद करती हैं या फेसबुक का बहुत नियंत्रित उपयोग करती हैं |किसी सामान्य पुरुष के मुकाबले महिलायें ज्यादा खतरे में रहती हैं |मोर्फिंग के डर से अकेले की तस्वीरें कम डालना ,क्या लिखें क्या न लिखें इस संशय में रहना , लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे अगर मैंने यह तस्वीर लगा दी, अगर मेरा अकाउंट हैक हो गया तो ऐसी पीडायें हैं जिनसे एक पुरुष का सामना कभी नहीं होता है |समाचार पत्रों में अक्सर ऐसी घटनाओं का ब्यौरा रहता है जब किसी न किसी महिला को इन सबसे गुजरना पड़ता है कुछ तो सामाजिक तिरस्कार के डर से आत्महत्या तक कर लेती हैं | भारत में किसी भी महिला को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अजनबियों के मित्रता निवेदन मिलते हैं |समाज वैसे भी महिलाओं की यौनिकता को नियत्रण में रखना चाहता है इसलिए महिलाओं के मिलने जुलने ,हंसने ,उठने बैठने तक सभी स्तरों पर उनके लिए एक आदर्श मानक बनाये गए हैं जिससे अच्छी महिला और बुरी महिला का प्रमाण पत्र दिया जा सके और ये मानक फेसबुक जैसे सोशल प्लेटफोर्म पर भी लागू रहते हैं | पति के फेसबुक का पासवर्ड पत्नी को न पता हो पर पत्नी का पासवर्ड पति को पता होना चाहिए ऐसे बहुत से तुच्छ मानक आचरण भी महिलाओं के फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म से दूरी के कारण है |महिलाओं के प्रति असमान व्यवहार की जो लड़ाई जमीन पर चल रही थी अब उसकी शुरुआत वर्च्युल दुनिया में भी हो गयी है |महिलायें यह लड़ाई शिक्षा और वित्तीय आत्मनिर्भरता से ही जीत सकती हैं | 
नवभारत टाईम्स में 07/11/2016 को प्रकाशित 

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