Monday, April 29, 2013

बलात्कार गाँवों में ज्यादा होते हैं मगर वो सुर्खियाँ नहीं बनते


दिल्ली में बीते वर्ष सोलह दिसंबर जैसी वीभत्स घटना के बाद देशभर ,में खासकर मीडिया ने जिस तरीके से बलात्कार के मुद्दे को उठाया था और सरकार को कठोर कानून बनाने पर विवश कर दिया था उसके बाद तो यही लग रहा था की शायद अब ऐसी घटनाओं में कमी आएगी... लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. और दिल्ली ने एक और वीभत्स मंजर देखा जब पांच साल की मासूम को दरिंदगी का शिकार होना पड़ा यहाँ बात अगर राजधानी दिल्ली  की न होती तो इसे भी सामान्य  सी घटना मानकर बिसरा दिया जाता| जबकि कडवी सच्चाई यह है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में बलात्कार जैसी घटनाएं सामान्य हैं. राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय नई दिल्ली की शिक्षक  मेम्बर मृणाल सेन द्वारा न्यायालय द्वारा प्राप्त आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि साल 1983 से साल 2009 के बीच देश भर में हुए 75 फ़ीसदी बलात्कार के मामले गाँवों में हुए|इसे समझने के  लिए हमें ज़रा ग्रामीण भारत के आर्थिक और सामाजिक ढांचे पर नज़र डालनी होगी. जैसे जैसे भारत ने तरक्की का पैमाना प्रतिशत में अपनाया है उसका असर गावों पर भी दिखने लगा| ज़्यादातर घरों की रसोई में चूल्हों की जगह रसोई गैस ने ले ली| लोग पढ़ी लिखी बहुओं को वरीयता देने लगे| अनपढ़ रहने वाली गंवारू लड़कियां स्कूल जाने लगीं. थोड़ी पढ़ी लिखी लड़कियां  अब अपने अधिकार मांगने लगीं जिसका नतीजा ऑनर किलिंग के बढ़ते मामलों के रूप में सामने आया| मोबाईल फोन से लेकर इन्टरनेट और केबल टी वी की छतरियां हर घर पर देखी जाने लगीं   जिस तरह से ग्रामीणों ने शौचालयों से ज्यादा ज़रूरी मोबाईल फोन को समझा ठीक वही रवैया ग्रामीण महिलाओं की स्थिति पर भी लागू हो गया|गांवों में होने वाले ज्यादातर बलात्कार सुबह के वक्त होते हैं जब गाँव की महिलायें शौच के लिए,(घरों में शौचालय की अनुपलब्धता के कारण) खेत में जाती है|
शहरों में सिर्फ अपने तक सिमटे रहने के उलट ग्रामीणों आपस में मिलजुल कर रहने की प्रवृत्ति के कारण बलात्कार और ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं की भनक मीडिया या पुलिस को नहीं लगने पाती, क्योंकि यहाँ खामोशी की खाप अपना काम करती है जिससे बलात्कार के मामले दबा दिए जाते हैं|लोग  इसे गाँव की इज्ज़त   से जोड़कर देखते हैं| गाँव की सामाजिक आर्थिक बनावट शहरो से अलग है| गाँवों में महिला सशक्तिकरण अप्रत्यक्ष रूप से धन लालसा का परिणाम है,बेटी या पत्नी को पढाया जा रहा है क्योंकि प्राथमिक शिक्षा में लड़कियों के चयन से आय का एक अतिरिक्त स्रोत पैदा होता है. छात्रवृति के रूप में मिल रहा धन भी ग्रामीणों को लड़कियों को पढाने को प्रेरित कर रहा है|महिला सीट होने के करण घर कि महिलाओं को चुनाव लडवाना मजबूरी है क्यूंकि सत्ता कम से कम घर में बनी रहेगी. प्रधान के साथ ही प्रधान पति कि अवधारणा का जन्म इस बात को समझाने के लिए काफी है|तथ्य यह भी है कि  आय का साधन और हाथ  में सत्ता पाने के बाद इनमे से कुछ लड़कियां दहलीज लांघने का दम ख़म दिखा बदलाव की वाहक बन रही हैं| ग्रामीण स्त्रियों में अभी इतना आत्मविश्वास नहीं आया है कि  वे इस तरह की ज्यादतियों का खुलकर विरोध कर सके|. बलात्कार की  ज़्यादातर शिकार गरीब और पिछड़ी जाति की महिलाएं होती हैं| जिनके लिए ज़िन्दगी की पहली प्राथमिकता दो वक़्त की रोटी है. अगर वे किसी ऐसी ज्यादती का विरोध करती भी हैं तो उनके लिए इसके भी रास्ते बंद हो जाते हैं. मध्यमवर्गीय परिवारों में बदनामी का डर दिखाकर बात को छुपा लिया जाता है|बच्चों से यौन दुष्कर्म की घटनाओं के मामले में ज़यादातर आरोपित सगे संबंधी ही होते हैं, चूँकि गांवों में संयुक्त परिवार की परंपरा है इसलिए सम्बन्धियों पर भरोसा ज्यादा किया जाता है ऐसी स्थिति में पीड़ित बच्ची माता पिता को कुछ नहीं बता पता है और अगर बताता भी है तो उसकी बात पर विश्वास नहीं किया जाता| जिस तरह से हर देश समाज अपने संक्रमण काल से गुज़रते हैं ठीक उसी तरह से हमारे गाँव भी अपने संक्रमणकाल से गुज़र रहे हैं जहाँ न तो पूरी तरह से जागरूकता आई है और न तो तरक्की. यौन शिक्षा और उससे जुड़े अपराधों से निपटने के लिए एक लम्बा रास्ता तय करना  बाकी है|
गाँव कनेक्शन के 27 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित 

Friday, April 19, 2013

आभासी दुनिया के वास्तविक खतरे

इंटरनेट और  सोशल नेटवर्किंग साईट्स का विस्तार जहाँ लोगों को जोड़ रहा है वहीं संचार की विकसित होती यह नयी संस्कृति अपने साथ कई तरह की समस्याएं  भी ला रही है और भारत इसका अपवाद नहीं है जहाँ तकनीक का विस्तार तो बहुत तेजी से हो रहा है पर उसका प्रयोग किस तरह होना है यह अभी सीखा जाना है|जब बात बच्चों की हो तो चुनौती और ज्यादा गंभीर हो जाती है|तकनीक हमारे जीवन के हर पहलू पर असर डाल रही है| अमूमन खेल के मैदान पर होने वाली बच्चों की शरारतें जैसे एक दूसरे को चिढाना ,परेशान करना सोशल नेटवर्किंग साईट्स के जरिये  अब वेबसाईट पर सिमट रही हैं| फेसबुक,ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स का इस्तेमाल एक दोधारी तलवार की तरह होता है बच्चे जब इसका प्रयोग करते हैं तो वह कई तरह की सावधानियां नहीं बरतते जिससे वे अक्सर साइबर बुलिंग का शिकार हो जाते हैं|साइबर बुलिंग से मतलब किसी व्यस्क या बच्चे को किसी अन्य बच्चे या व्यस्क द्वारा डिजीटल प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल (इंटरनेट या मोबाइल आदि) करके सार्वजानिक रूप से प्रताड़ित या मानसिक रूप से परेशान किये जाने से है|टेलिनॉर द्वारा किये गए एक अध्यन के मुताबिक साल 2012 तक भारत में चार करोड़ बच्चे इंटरनेट पर सक्रिय थे| अध्ययन के अनुसार साल  2017 में ये आंकड़ा तीन गुने से भी ज्यादा बढ़कर  तेरह करोड़ हो जाएगा|यह आंकड़े जहाँ भविष्य के प्रति  उम्मीद जगाते हैं वहीं कुछ सवाल भी खड़े करते हैं|सबसे महत्वपूर्ण है कि इंटरनेट पर जो बच्चे जुड रहे हैं वो इस साइबर दुनिया में कितने सुरक्षित हैं,उन्हें इंटरनेट सलीकों(मैनर) के बारे में कितनी जानकारी है|आंकड़े इसकी बहुत अच्छी तस्वीर नहीं पेश कर रहे हैं|माइक्रोसॉफ्ट द्वारा जारी किये गए  ग्लोबल यूथ ऑनलाइन सर्वे के मुताबिक भारत के बच्चे दुनिया में तीसरे नंबर(तिरपन प्रतिशत) पर इंटरनेट  की दुनिया में साइबर बुलिंग का शिकार हो रहे हैं पहले दो स्थान पर क्रमशः चीन(सत्तर प्रतिशत) और सिंगापुर(अट्ठावन प्रतिशत)हैं|जागरूकता के अभाव में बच्चों को ये पता ही नहीं होता कि जब वे साइबर बुलिंग का शिकार हों जाएँ  तो क्या करें ऐसे में परिणाम अकेलापन,अवसाद  या कभी कभी आत्महत्या के रूप में सामने आता है|तकनीकी रूप से भारत एक सक्रमण काल से गुजर रहा है जिसमे आने वाली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से कहीं ज्यादा साइबर एक्टिव है ऐसे में अभिभावक ये मानकर कि साईबर दुनिया से बच्चों को जोड़ना उनके भविष्य के लिए अच्छा होगा, बच्चों को इंटरनेट के हवाले कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं जबकि उन्हें यहाँ भी अपने बच्चों को इस जानकारी के साथ साइबर दुनिया में डालना चाहिए कि वे क्या करें और क्या न करें पर चूँकि अभिभावक खुद ही इस जानकारी से महरूम हैं इसलिए बच्चे बगैर किसी जागरूकता के इंटरनेट पर आ जाते हैं |अब समय आ गया है कि स्कूल के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा के साथ इंटरनेट आधारित व्यवहार और शिष्टाचार को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए जिससे बच्चों को पता चल सके  कि दूसरों के साथ सम्मान और गरिमा के साथ इंटरनेट पर कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए उनका एक छोटा सा मजाक दूसरे पर कितना भारी पड़ सकता है |समस्या का कानूनी पहलू भी खासा उत्साहजनक नहीं है|भारत का साइबर बुलिंग कानून बच्चों और वयस्कों में कोई अंतर नहीं करता,बच्चों के लिए अलग से कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है,जबकि इस सन्दर्भ में बच्चों को अलग नजरिये से देखा जाना चाहिए|बाल मस्तिष्क पर साइबर बुलिंग का ज्यादा गंभीर प्रभाव पड़ता है जो उनकी मानसिकता को नकारात्मक भी बना सकता है|  भारत में सन 2000 में सूचना प्रोद्यौगिकी कानून बना ,2008 में इस कानून में कुछ संशोधन किये गए जिसकी धारा 66 ए में साईबर बुलिंग से सम्बंधित मामले आते हैं जिसको अब दंडनीय अपराध बना दिया गया है पर बच्चों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं को अलग परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए अट्ठारह साल से कम उम्र के बच्चों को साईबर सुरक्षा देने के लिए कानून में आवश्यक संशोधन किये जाने चाहिए एक और तथ्य महत्वपूर्ण है भारत का प्रोद्यौगिकी कानून 2008 में संशोधित किया गया था तब भारत में  सोशल नेटवर्किंग साईट्स ने अपने पैर पसारने शुरू ही किये थे  पर अब तस्वीर बिलकुल बदल गयी है और इनके प्रयोगकर्ताओं में एक बड़ा वर्ग उन बच्चों का भी है जो स्थिति की गंभीरता समझे बगैर नादानी कर जाते हैं या साईबर बुलिंग का शिकार होते रहते हैं|अमेरिका ,ब्रिटेन जैसे देश बच्चों को साईबर बुलिंग से बचाने के लिए हेल्पलाइन सेवा उपलब्ध कराते हैं पर फ़िलहाल भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है| अगले तीन साल में भारत दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा इंटरनेट उपभोक्ताओं को जोड़ेगा और देश की कुल जनसंख्या का 28 प्रतिशत इंटरनेट से जुड़ा होगा जो चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा जनसँख्या समूह होगा पर क्या हम साईबर दुनिया को अपने बच्चों के लिए सुरक्षित बना पायेंगे इसका उत्तर मिलना बाकी है |
अमर उजाला में 19/04/13 को प्रकाशित 

Thursday, April 18, 2013

फ़िल्मी हीरो


एक दिन मेरा भी सर चकराया
फ़िल्मी हीरो बनने का
भूत सवार हो आया
मुंगेरी लाल की तरह देखता था सपने
पता नहीं वे  कब लगेंगे मुझे अपने
             आखिर वो दिन भी आया
             जब मैं बम्बई पहुँच पाया
            मैंने फिल्मीस्तान स्टूडियो  का
            दरवाजा खटखटाया
            लेकिन वहां  मुझे दरबान ने भागया
इस तरह खटखटाए मैंने
सभी स्टूडियो के दरवाजे
सब जगह मुझे नजर आये बंद दरवाजे
थक हार कर पहुंचा होटल में
खाने को कुछ भी न था पॉकेट में
            लेकिन उनको भी मेरी गरीबी पर
            तरस न आया
           वहां से भी मुझे मारकर भगाया
           मेरा सपना टूटता नजर आया
           मेरा फ़िल्मी हीरो का भूत
          घर वापस आया

सुमन सौरभ में अप्रैल 1993 में प्रकाशित 

एक छोटा सा फलसफा जिंदगी का


प्यारी खड़िया
ये नाम मैंने ही दिया था तुम्हें  याद है कॉलेज के दिनों में और तुम मुझे स्लेट कहकर चिढाते थे ,खड़िया और स्लेट वक्त की मजबूरियों में मिल नहीं पाए, खैर वो वक्त बीत गया मुझे खुशी है कि तुम वापस अपनी दुनिया में लौट गए पर तुम्हारा असमंजस वाला रवैया बरकरार है. तुम्हें सब कुछ बहुत जल्दी चाहिए जिंदगी में फोकस बहुत जरूरी है एक वक्त तुम्हे मेरा साथ भी चाहिए था अपना करियर भी पर तुम बैलेंस नहीं बना पाए तो जिंदगी में बेलेंस बनाना सीखो. तुम जिंदगी के जिस दौर से गुजर रही हो कमोबेश हर इंसान गुजरता है मुझे लगता है तुम पहले अपने करियर पर ध्यान दो क्यूंकि एक बार करियर बन जाने पर जो फाइनेंशियल सिक्योरिटी मिलेगी उसका कोई मुकाबला  नहीं होगा तुम अपनी शर्तों पर जीवन जी पाओगी  तुम्हें निर्णय लेने के लिए अपने घरवालों का मुंह नहीं देखना पड़ेगा तो थोडा सा स्वार्थी बनो और अपने घरवालों को समझा दो कि तुम्हारी शादी के लिए जल्दबाजी न करें .तुम्हारे दूसरे दोस्त नौकरियां पा रहे  इससे परेशान होने की जरुरत नहीं.हर इंसान “सोना” न तो तुरंत खरीद सकता है और न ही बेच हाँ कबाड आप तुरंत खरीद सकते हैं और जब चाहें बेच भी सकते है .तुम “सोना” हो खड़िया, थोडा धीरज रखो और अपने वक्त का इन्तजार करो जो तुम्हे आज आगे जाते हुए दिख रहे हैं बहुत जल्दी तुम्हारे पीछे हो जायेंगे क्योंकि तुम्हारे नॉलेज की नींव मजबूत है वो कहावत तो सुनी होगी तुमने सौ सुनार की एक लुहार की तुम अनिर्णय की स्थिति में अपने दो साल वैसे ही खराब कर चुकी हो अब जो वक्त मिला है उसमे सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दो.यारी दोस्ती सब ठीक है पर तुम्हारे साथ दिक्कत ये है कि तुम जितनी जल्दी लोगों के करीब जाते हो उतनी ही जल्दी उनसे दूर भी हो जाते हो कभी सोचा है तुमने ऐसा क्यूँ होता है तुम दिल के बहुत साफ़ हो नतीजा तुम्हारा इस्तेमाल हो जाता है इस प्रोफेशनल दुनिया में थोड़े प्रोफेशनल बनो चुनिन्दा दोस्त बनाओ और उन्हें दुनिया की नजरो से दूर रखो जरूरी नहीं है कि कौन तुम्हारे दोस्त हैं उन्हें दुनिया जाने.उन दिनों जब हम साथ पढ़ा करते थे तुम्हारा सपना फेमस होने का था और तुम इसके लिए टीवी को एक आसान विकल्प मानते थे पर मेरी प्यारी खड़िया फेमस होने के लिए सिर्फ टीवी ही क्यों जहाँ रोज नए सितारे बनते है और पुराने डूब जाते हैं. तुम किसी भी फील्ड में फेमस हो सकते हो अगर तुम इस बात को अपने जेहन से निकाल दो कि तुम्हें सिर्फ  फेमस होना है.तुम कोई भी काम  डेडीकेशन और इनोवेशन के साथ करो पोपुलारिटी तुम्हारे पीछे पीछे भागेगी.तुम्हें लोगों को तोहफे में कवितायें देना अच्छा लगता है अब कितने लोग हैं जिनके पास ये हुनर है तुम्हारी ये खूबी तुम्हें दूसरों से अलग कर देती है और तुम्हारा गिफ्ट लोग सम्हालते भी हैं क्योंकि उनमें फीलिंग्स होती है ये है इनोवेशेन,और जब इनोवेशेन है तो तुम अपना भी कोई काम शुरू कर सकते हो क्यों नौकरी के पीछे भागना इस ओप्शन के बारे में भी सोचना.
तुम्हारे जैसी उम्रके लोगों के साथ एक और दिक्कत हो जाती है हाइपर होने की जब खुश हुए तो वो दिमाग में चढ गयी और दुखी हुए तो अपने आप से और अपने अपनों से भागने लगे वैसे तो तुम बहुत जल्दी चीजें भूल जाते हो पर शायद तुम्हें याद हो कभी तुम मुझसे बात करके इतना खुश होते और कहते कि  आज तो ट्रीट हो गयी और एक दिन अचानक तुम सब ऐसे भूले की अपनी स्लेट को अकेला छोड़ गए  किस्सा तो छोटा सा है मगर फलसफा बड़ा तो जो भी फैसला लो सोच समझ कर लो जिससे बाद में पछताना न पड़े खैर यूँ होता तो क्या होता मैंने पढ़ाई खत्म कर ली है और अब नौकरी कर रहा हूँ.जिंदगी आगे बढ़ चली है मुझे इन्तजार रहेगा कि तुमने जो अपने लिए सपने देखें हैं उनको पा लो.
तुम्हारा स्लेट     
आई नेक्स्ट में 18/04/13 को प्रकाशित 

Sunday, April 14, 2013

गाँवों में सबको चढा आई पी एल का जोश


गर्मियों का मौसम छुट्टियों का मौसम खेलो का मौसम शहर में तो मैदान गुलजार रहते हैं क्रिकेट से पर अब गाँव भी उदारीकरण की बयार और टीवी के प्रसार से इससे अछूते नहीं रहे आई पी एल भले ही क्रिकेट में मनोरंजन का तडका हो पर अब ये गाँवों में भी इसका जादू सर चढ़कर बोल रहा है |बाजार में बदलती इस दुनिया के हिसाब से बुरा कुछ नहीं है दर्शक खुश है विज्ञापनदाता पैसे बना रहे हैं टीवी को दर्शक और विज्ञापन मिल रहे हैं पर यह सब किसकी कीमत पर हो रहा है ये सवाल महत्वपूर्ण है|गाँव से शहर आये दादी दादा माता पिता वहां से अपने खेल भी लाये थे चाहे  वो आईस पाईस (लुका छुपी ),गिल्ली डंडा,खो खो या कबड्डी|धीरे धीरे ये खेल शहरीकरण की आंधी में अपना वजूद सम्हाल नहीं पाए और कबड्डी कब फिस्सड्डी बन गया हमें पता ही नहीं चला दादा दादी की पीढ़ी यादों का हिस्सा बन गयी और उनके बाद की पीढ़ी शहरी हो गयी जिसके पास देने के लिए एक ही खेल बचा क्रिकेट बाकी खेल की जगह रीयल मैदान की जगह वर्चुअल कम्प्युटर की स्क्रीन ने ले ली |एक उम्मीद जरुर थी कि गाँव में इनका वजूद है और रहेगा पर गाँव जब शहर जैसे बनने लगे और वैश्वीकरण की हवा वहां से गुजरी तो सारे खेल क्रिकेट जैसे हो गए |ऐसे में गाँव के पारंपरिक खेल लट्टू घुमाना, रस्सा खींचरस्सी कूद,सिकडी  बस यादों में ही बचे हैं| आज से कुछ वर्ष पूर्व तक जहाँ ग्रामीण अंचल में पारंपरिक खेलों की धूम मचा करती थी अब उनके स्थान पर आधुनिक खेलों ने कब्जा जमा लिया है गर्मियों की दोपहर गांव के बच्चों की धमा चौकड़ी से गुलजार रहा करती थी इस तरह के खेल बच्चों की  शारीरिक क्षमता बढ़ाने में बहुत उपयोगी रहते थे  लेकिन जब से गांवों में क्रिकेट व टेलीविजन का प्रचलन बढ़ा है ये खेल बस यदा कदा खेलते हुए देखे जा सकते हैं | कभी शाम होते ही गाँव में कबड्डी-कबड्डी की आवाजें लोगों में  जोश और उत्साह से भरी दिया करती थी फिर क्या बच्चा,बूढा और जवान सब इस खेल का लुत्फ़ लेने में डूब जाया करते थे । बिना किसी प्रकार के ताम झाम वाले इस खेल में लोगों  को अपनी शारीरिक व मानसिक फुर्ती  का प्रदर्शन करना पड़ता है।पर  ग्रामीणों का यह प्रमुख खेल गावों की सामान्य  दिनचर्या का हिस्सा नहीं रहा|क्रिकेट के आगे  हारते इन ग्रामीण खेलों को जीतने के लिए कई मोर्चों पर जीतना होगा चुनौती मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं पर समस्या कहाँ से शुरू हुई इसको समझने की जरुरत है इसका बड़ा कारण वैश्वीकरण है जहाँ सब कुछ एक जैसा है जहाँ वैविध्य की कोई जरुरत नहीं बस वो बिकना चाहिए और हमारे खालिश खेल इससे बच नहीं पाए खेल जबसे बाजार का हिस्सा हुए है तब से इससे कोई मतलब नहीं रह गया कि मानव सभ्यता के इतिहास में इनका अस्तित्व क्यों रहा है इनमें इतना वैविध्य क्यूँ है सब कुछ नफे नुकसान के चश्मे से देखा जाने लग गया है| तेज़ गति और भरपूर रोमांच से भरा  फ़ॉर्मूला वन खेल हो या चौके छक्के पर ठुमका लगाती चीयर लीडर पिछले कुछ सालों  में ग्लैमर और पैसे वाले खेल भारत के शहरों में जगह बना रहे हैं पर अब गाँव भी पिछड़ने के डर से हर उस चीज को अपना लेना चाहते हैं जो शहरों में हो रहा है| कोई भी बड़ा बदलाव अवसर लाता है और चुनौती भी गाँव में भी क्रिकेट लोकप्रिय हो रहा है इसका कारण विश्वस्तर पर क्रिकेट में भारत का लगातार अच्छा प्रदर्शन रहा है जिससे उसे मीडिया और कॉर्पोरेट घरानों का साथ मिला पर गाँव के अन्य खेल इस चुनौती में टिक नहीं पाए अगर इन पारंपरिक खेलों को बचाना  है तो सरकारी और कॉरपोरेट मदद के साथ-साथ पुराने खेलों में मार्केटिंग के आधुनिक तरीके अपनाने होंगे| इसका प्रमुख कारण यह है कि ग्रामीण खेलों के प्रति बच्चों की रुचि जगाने वाली कोई संस्था नहीं है। लोगों के बीच इन खेलों की लोकप्रियता बढ़ाई नहीं गई। इन ग्रामीण खेलों को सिखाने के लिये क्रिकेट की तरह का कोई कोच भी नहीं है।ये मार्केटिंग का दबाव ही था कि पंजाब में जब कबड्डी का विश्वकप आयोजित हुआ था तो लोगों को कबड्डी के इस विश्व कप के बारे में बताने के लिए शाहरुख खान को बुलाना पड़ा जिससे यह आयोजन मीडिया का ध्यान केंद्रित कर पाया बहरहाल हमारे खेल अभी क्रिकेट से बुरी तरह हार रहे हैं और हम एक दर्शक के तौर पर इन खेलों की हार पर महज दर्शक ही बने हैं और यह परम्परागत खेल हमारी ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं कि हमारा आधुनिक खेलों से कोई झगड़ा नहीं बस हमें तो हमारे हिस्से का मुट्ठी भर आकाश चाहिए |
गाँव कनेक्शन के 13 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित  

तुम्हारे जाने के बाद


तुम्हारे जाने के बाद
कुछ भी तो नहीं बदला
बस बदला है तो जीवन
अब रोज दाढी बनाने का झंझट नहीं
और सजना सवाँरना समय की बर्बादी
रेडियो मुंह चिढाता
अब वो छोटे मोबाईल संदेशे
नहीं आते
जिन्हें पढकर बस
यूँ ही मुस्कुरा दिया
करता था मैं
वो  शीशा जो खुरच गया था
उस दिन
अब टूट चुका है
जीवन तो चल रहा है
पर वो जोश कहाँ है
जो कभी तुमने दिया था
हाँ यही तो कहा था तुमने
आओ थोड़े दिन जी के देखा जाए
मैं भी बस बह गया था उस हौसले में
पर उधार के हौसलों से जीवन नहीं चलता
तुमने कहा था मेरे पास सब कुछ है
हाँ है तो फिर तुम्हारी जरुरत क्यों थी
कभी सोचा तुमने
पर मैं तो अब भी सोच रहा हूँ
सवाल बदले या जवाब
इस बदलती दुनिया में सब कुछ
इतना जल्दी क्यों बदल जाता है
जाड़े की वो  उस सुहानी शाम
जहाँ तुम छोड़ गए थे मुझे
वहीं रुका हूँ थमा हूँ
तुम्हारे जाने के बाद
कुछ भी तो नहीं बदला

(पुरानी डायरी के पन्नों से )


Tuesday, April 9, 2013

मुझे तो तेरी लत लग गयी

हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है पर कुछ बोलता हूँ एक लड़की थी दीवानी सी जहाँ जाती खुशियाँ बिखेरती नाम था परी दिन भर पढ़ाई करती चिल करती और जरुरत के वक्त इंटरनेट खोलती फिर एक दिन उसे जी नहीं उसे प्यार बिलकुल भी  नहीं हुआ बल्कि उसके एक करीबी दोस्त ने एक नेट इनेबल्ड एंड्रायड फोन भेंट किया फिर क्या उसकी कल्पनाओं को पंख लग गए नए नए एप्स डाउनलोड करना अपने दोस्तों से खूब चैट करना वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया जो इंटरनेट उसकी तरक्की के रास्ते खोल रहा था वो उसके जी का जंजाल बन गया एक दोस्त से बात करो तो दूसरा नाराज चैट पर दिन भर ऑन दिखने से उसके दोस्तों में गलतफहमियां पनपने लग गयीं कि वो दिन भर किसी से चैट करती है फिर क्या उसका आधा दिन उन गल्फह्मियों को दूर करने में और आधा दिन उन  दोस्तों से चैट करने में बीत जाता जो उसके चैट न कर पाने से दुखी थे .उसे पता ही नहीं पड़ा कि कैसे उसका ये शौक कब लत बन गया.हर दो मिनट में अपना मोबाईल चेक करती कि कहीं कोई मेसेज तो नहीं आया नतीजा उसके करीबी दोस्त उससे दूर हो गए वो बस जितने एप्स हो सकते हैं उन्हें अपने मोबाईल में भर लेना चाहती थी जिससे वो सबसे जुडी रहे  नतीजा एक पढ़ने लिखने वाली लड़की जो अपनी छोटी सी दुनिया में अपने चुनिन्दा दोस्तों के साथ खुश रहा करती थी इंटरनेट के एडिक्शन से कई तरह के दबाव से टूट कर रूखे स्वभाव की हो गयी बात बात में नाराज होने लगी पढ़ना लिखना छूट गया वो कई तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याओं की शिकार रहने लग गयी. रात में अजीब अजीब सपने देखती नींद आँखों से दूर हो गयी जिससे दिन में भी वो उनींदी सी रहती .उसके कई  करीबी दोस्त उससे दूर हो गए.ये महज कहानी नहीं बल्कि आज के यूथ के लाईफ की कडुवी रीयल्टी है.नेट के एडिक्शन के चक्कर में रीयल वर्ल्ड से नाता तोड़कर वर्चुअल वर्ल्ड में जीने वाले आज परी जैसे  लोग हमारे आस पास न जाने कितने मिल जायेंगे.टेक्नोलॉजी वक्त की जरुरत है पर इस जरुरत को हमें अपनी नीड के हिसाब से देखना होगा.हर उम्र और वक्त के हिसाब से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.पढ़ने लिखने की उम्र में हर वक्त ऐसा कोई संदेसा हर वक्त नहीं आएगा जिसको अगर आप मिस कर गए तो आसमान फट पड़ेगा.फोन पर इंटरनेट के आ जाने से समस्या ज्यादा गंभीर हो गयी है आप लोगों से कनेक्टेड रहें पर हर इंटरनेट के इस्तेमाल में एक डिसीप्लीन रहना बहुत जरूरी है नहीं तो ये शौक कब आपको धीरे धीरे खत्म करने लग जाएगा पता भी नहीं पड़ेगा इसलिए अपने काम के हिसाब से नेट के इस्तेमाल का वक्त तय कीजिये दोस्तों के साथ फन करने का एक निश्चित समय रखिये उसके बाद यदि कोई मेसेज आता है जिसमे हेलो,नमस्ते, क्या हो रहा है जैसे शब्द हों तो  इस बात की परवाह किये बगैर कि सामने वाला क्या सोचेगा जवाब मत दीजिए.आप एक बार इसको अपनी आदत बनायेंगे तो धीरे धीरे ऐसे लोग जो दिन भर ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो उनके खालीवाक्त के साथी बनें आपको संदेसा भेजना कम कर देंगे. बीच बीच में अपने मोबाईल को ऑफ करना सीखिए अपनी सोशल नेटवर्किंग साईट्स को आराम दीजिए जरूरी नहीं कि रोज कुछ न कुछ अपडेट करें थोडा वक्त अपने लिए निकालिए और देखिये दुनिया कितनी खूबसूरत है आपके कितने ऐसे दोस्त हैं जो आपके वर्चयुल साथ के लिए नहीं बल्कि रीयल साथ के लिए तरसते हैं कुछ एस्माय्ली भेज देने से भावनाओं का इजहार नहीं हो जाता इसके लिए किसी रिश्ते को जीना पड़ता है.टेक्नोलोजी को अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए अपनी जरुरत और तकनीक में संतुलन बनाइये तभी आप जिंदगी का सच्चा लुत्फ़ उठा पायेंगे.मैं तो आज अपना स्मार्ट  फोन ऑफ कर अपनी दोस्त से मिलने जा रहा हूँ जो नेट के एडिक्शन से उबरने की कोशिश कर रही है .आप क्या करेंगे जरुर बताइयेगा|
आई नेक्स्ट में 09/04/13 को प्रकाशित   

पसंद आया हो तो