Friday, July 27, 2012

Time for real friendship


प्रिय दोस्त अनूप
दिन बीत रहे हैं यादों में फिर वो बीते दिन फिल्म के फ्लैश बैक की तरह  सामने आ रहे हैं जब हम वाकई साथ थे जेबें खाली होने के बाद भी साथ फिल्में देखने का मौका और पैसा जुटा लेते थे... और आज.... । जेबों में उतने पैसे पड़े रहते हैंजितनी उस समय कल्पना में भी नहीं थेपर समयसाथबीते दिनों के धुंधलकों में कहीं खो गए हैं कुछ सवाल हैंजो अपना जवाब चाहते हैंपर कारणों की कसौटी पर कुछ भी ऐसा नहीं कि जो समझा कर उसे शांत कर सकूं...। इन्हीं बातों की वजह से आज सालों बाद तुम्हें कुछ लिखने का फैसला किया  मोबाइल के कीपैड और कंप्यूटर के  की-बोर्ड पर नाचती अंगुलियों में वह मजा नहींआता जो कभी  25 पैसे के पोस्टकार्ड में था पर समय बदल चुका है और तुम भी तब लिखना इतना मुश्किल भी नहीं था लाईफ में इतने कॉम्प्लीकेशन नहीं थे |आज भी पानी बरस रहा है। पानी की बूंदें की टपटप वो दिन याद दिला रही हैंजब हम भीगते हुए साइकिल से पूरे शहर का चक्कर लगाते थे। वो समोसे याद हैं,यूनिवर्सिटी के आज फिर मन हो रहा खाने का और साइकिल चलाते हुए भीगने कामगर....। साइकिल नहीं अब तो कार हैभीग नहीं सकते हम... सुना है वहां अब समोसे भी वैसे नहीं रह गए ठीक हमारी दोस्ती की  तरह| वो सरकारी स्कूल की दीवारें हमें कभी मिलने से नहीं रोक पाईं| मै हमेसा तुम्हारे साथ बंक मार कर वहीँ पहुँच जाता जहाँ साइकिलें हमारा इंतजार करतीं थीं और फिर शहर का कोई सिनेमा हाल हमारी पहुँच से दूर नहीं होता । इन पलों में हमारी साइकिलें भी ना जाने कितने ख्वाब बुन लिया करती थीं|ख्वाब तब हम लोग भी खूब देखते थे स्कूल में छुट्टी हो जाए इसके लिए किसी के भी मरने की दुवा मांग लेते थे कितने भोले थे सोचते थे बड़े हो कर हम खूब फ़िल्में देखेंगे साथ घूमेंगे दोस्ती के रिश्ते की वो गर्मी कहाँ गयी जब जाड़े में बगैर स्वेटर पहने तुमसे मिलने निकल पड़ते थे कितनी दीवारें फांद लेते थे आज फेसबुक और ट्वीटर जैसी वर्चुअल दीवारों को नही लाँघ पा रहे हैं | जिंदगी में हमारे पैदा होते ही ज्यादातर रिश्ते हमें बने बनाये मिले और उसमे अपनी च्वाईस का कोई मतलब था ही नहीं तुमसे हुई दोस्ती ही ऐसी थे  जिसे मैंने खुद बनाया था फिर दोस्ती की नहीं हो जाती है दोस्ती तो हो जाती है |
 कॉलेज और हमारी पढ़ाई का मिजाज़ बदले लेकिन हम नही बदले।जो बदल जाएँ वो हम कहाँ तब किसी ने कहा था रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहते तो कैसा मजाक उडाया था उसका हमने,ये नहीं जानते थे कि जिंदगी की राहों में दौड़ते दौड़ते कब हम अपना मजाक खुद बना बैठे पता ही नहीं चला |तुम हमेशा कहा करते थे कि जिंदगी जब सिखाती है अच्छा ही सिखाती है जिंदगी ने सिखाया तो पर बड़ी देर से कम्पटीशन की इस रेस में कब हम एक दूसरे के कमपटीटर बन गए पता ही नहीं चला| आज ऑफिस का टारगेट शब्द सोते जागते कानो में गूंजता है साल दर साल पूरा भी होता है लेकिन एक दूसरे  से मिलने की हसरत कहाँ गुम हो गयी इसकी तलाश है| इतने पुराने रिलेशन में कुछ शेयर करने जैसा था ही नहीं सब कुछ इतना स्वाभाविक था कि न मुझे कुछ बोलना पड़ता और न तुम्हें कुछ समझाना |मैं कहा भी करता था अनूप आँखों की भाषा पढ़ लेता है पर दोस्त जीवन में सब कुछ पा लेने की चाह में हम कब अजनबी बन गए पता ही नहीं चला तुमने अपने आप को साइलेंस के परदे में लपेट लिया और मैं कुछ कह ही नहीं पाया |गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट टू रिलीज हो रही है टिकट बुक कर रहा हूँ तुम्हारा इंतज़ार करूँगा मुझे उम्मीद है फेसबुक पर मुझे वर्चुअल देख कर बोर हो चुके होगे आज रीयल में मिलते हैं और पुराने लम्हों को जीते हैं .
तुम्हारा मुकुल
आई नेक्स्ट में 27/07/12 को प्रकाशित 

Friday, July 20, 2012

हथियारों की यह होड हमें कहाँ ले जायेगी


ब्रिटेन की संस्था ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार हर साल दुनिया भर  में छोटे हथियारों के लिए गोले-बारूद का चार अरब डॉलर से अधिक का कारोबार होता है. दुनिया भर में हर साल 12अरब गोलियों  का उत्पादन किया जाता हैऔर अगर धरती पर रहने वाली कुल जनसंख्या के आधार पर इसका अनुपात निकाला जाए तो हर व्यक्ति के हिस्से दो गोलियाँ  आती हैं. आमतौर पर युद्ध के प्राथमिक हथियार गोली और बारूद ही होते हैं और जिस हिसाब से युद्ध बढ़ता जाता है उसमे और बड़े हथियार शामिल हो जाते हैं पर सभी हथियारों के कार्यकरण में मूलतःगोली और बारूद की ही भूमिका होती है. दुनिया के बड़े संघर्ष मैदान बंदूकों और हथियार के जखीरे ही हैं. ऑक्सफैम के 'स्टॉप ए बुलेटस्टॉप ए वारनामक अभियान का उद्देश्य गोले बारूद की बिक्री पर नियंत्रण लगाना है. जिससे किसी भी संघर्ष को सशस्त्र और घातक होने से बचाया जा सके.अब जरा कुछ और तथ्यों पे भी गौर करें. साल २०१२ में एशिया के तीन देशों भारतपाकिस्तान और चीन ने अपने रक्षा बजट में बेतहाशा वृद्धि की थी. चीन का रक्षा बजट ११ फ़ीसदी की वृद्धि के साथ १०६ अरब डालर यानि ५२०० अरब रूपये से ऊपर पहुँच गयाजबकि भारत ने १७ फ़ीसदी वृद्धि के साथ १९३४०७ करोड़ और पाकिस्तान ने १० फ़ीसदी वृद्धि के साथ ५४५ अरब रुपए का बजट रखा. इन तीनो देशो में रक्षा पर किया जाने वाला खर्च विकास के अन्य  मदों की अपेक्षा काफी अधिक होता है. भारत में ही लें तो इस बार शिक्षा और स्वास्थ्य पर कुल मिलकर भी उतना खर्च नहीं किया गया होगा जितना रक्षा पर खर्च किया जा रहा है. यह चिंताजनक है. वैसे तो दुनिया में रक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाला देश अमेरिका है पर एशिया के इन तीन देशों में रक्षा पर खर्च होने के मायने इससे कहीं अलग हैं. ऑक्सफैम की रिपोर्ट इसलिए अहम् हैं कि गोलियों की यह संख्या तो एक नमूना मात्र है कि हथियारों कि होड़ में हमने कितने विनाश के साधन  जुटा डाले हैं.  बदलती दुनिया के साथ संघर्ष के नए रूप सामने आ रहे हैं इन संघर्षों के बढ़ने का मुख्य कारण अनियोजित विकास और आर्थिक असमानता ही  है. बाजार का अर्थशास्त्र नफे नुकसान से तय होता है और गोलियों का कारोबार लागत के हिसाब से एक अच्छा व्यवसाय है  जब जंग के मैदान में बाजार  घुस जाए तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है जरुरत इस तथ्य को समझने की है कि आज संघर्ष एक बड़ा बाजार है.  फ्रांस के रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के  मुताबिक साल 2001 से 2010 के बीच अमेरिकायूरोपीय संघरूस और इजरायल का दुनिया के नब्बे  प्रतिशत हथियार बाजार पर कब्जा रहा है जिसमे अमेरिका की भागीदारी 53.7 प्रतिशत रही.स्टॉक होम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एस आई पी आर आई ) की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2002-2006 के पांच सालों की तुलना में वर्ष 2007-11 में विश्व में हथियारों की खरीद और बिक्री में 24 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई.आंकड़े खुद बता रहे हैं की इस संघर्ष के बाजार में अमेरिका,इस्राईल और फ्रांस जैसे देश कितने बड़े खिलाड़ी बनकर उभरे हैं.इन आकडों में अवैध हथियारों की खरीद बिक्री शामिल नहीं है.एशिया और अफ्रीका के अल्पविकसित  देश जंग का मैदान बने हैं पर इन संघर्ष में प्रयोग किये जाने वाले ज्यादातर हथियार दुनिया के उन विकसित देशों में बन रहे हैं .किसी भी  देश के लिए हथियारों पर होने वाला खर्च किसलिए होता हैताकि वह आने वाली लड़ाईयों के लिए खुद को तैयार रख सके. जंग रोज नहीं होती पर कभी कभार होने वाली जंग के नाम पर डर का एक ऐसा वातावरण बन गया है कि सब एक दूसरे से आगे  रहना चाहते हैं. आंकड़ों के मुताबिक एशियाई और ओशिनियाई देशों की हथियार हिस्सेदारी कुल आयात में 44 प्रतिशत है जबकि यूरोपीय देशों ने 19 प्रतिशत मध्य पूर्व देशों  ने 17 प्रतिशत और अमेरिकी देशों ने11 प्रतिशत हथियारों का आयात किया. सबसे कम अफ्रीकी देशों ने नौ प्रतिशत हथियार आयात किए. दुनिया के कुल हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत रही और वह सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बना इसके बाद दक्षिण कोरिया ने दुनिया के कुल छह प्रतिशत और पाकिस्तान व चीन ने पांच-पांच फीसदी हथियारों का आयात किया.रक्षा पर होने वाली यह भारी  भरकम राशि जंग के इंतज़ार में खर्च होती रहती है. हथियारों को सहेजा जाता है. फिर वे वक़्त के साथ पुराने होकर बाहर हो जाते हैं और नए हथियारों पर खर्च. यानि जो पैसा खर्च हुआ उसका कोई फायदा नहीं. रक्षा पर खर्च होने वाले ये पैसे अगर विकास कार्यों पर खर्च हो जाएँ तो ज्यादा बेहतर होगा  भारत पाक और चीन आपसी मसले बातचीत से सुलटा लें तो इन खर्चों पर लगाम लगेगी और तीनो एक बड़ी संभावनाओं को जन्म देंगे. हथियारों कि यह होड़ और कुछ नहीं मानवता के खिलाफ लड़ाई है. क्या विकास के पैसों को सिर्फ आने वाली लडाइयों के नाम पर बर्बाद करना उस देश के लोगों का मानवाधिकार का हनन नहीं है. इस पर हमें विचार करना होगा. शायद तभी हम समझ पाएंगे कि किसी देश को कितने हथियार चाहिए और किसी को कितनी गोलियाँ 

अमर उजाला कॉम्पैक्ट में 20/07/12 को प्रकाशित लेख  

Monday, July 16, 2012

सिनेमा में रिश्तों पर नयी दृष्टि


अभी आयी फिल्म बोल बच्चन में स्त्रैण हाव भाव वाला अब्बास अली  हो या गैंग्स ऑफ वासेपुर में आइटम बॉय का चरित्र दोनों फ़िल्में अलग अलग दर्शक वर्ग के लिए बनाई गयीं पर दोनों फिल्मों में एक समानता है वो है समलैंगिक किरदार ,रिश्तों को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाता आया हिंदी सिनेमा पिछले दिनों कुछ बोल्ड हुआ और ऐसे अनछुए पहलूओं को सिनेमा के परदे  पर दर्शकों के सामने परोसने का साहस कर पाया। इन फिल्मों में रिश्तों की उलझन जटिलता उसका मर्म और दिल में दबे रहने वाले ऐसे जज्बातों को गुंथा गया जिसे आम तौर पर सभी के सामने कहने की हमारे समाज में परंपरा कभी नहीं रही है।  कुछ ने उसे अश्लीलता कहते हुए नकार दिया लेकिन सच को समाज का हिस्सा मानने वालों ने उस पर अपनी पसंद की मुहर भी लगाई।अब हिंदी सिनेमा केवल शादी ब्याह प्रेम कहानियों में बताए जाने वाले रिश्तों तक सीमित नहीं रहना चाहता। संवेदनशील विषयों को कहने से हम अब भी झिझकते हैं.खास तौर पर वह जो हमारे समाज का छिपा सच हैं। बोल्ड का मतलब केवल अभिनेता-अभिनेत्री के अंतरंग दृश्य नहीं हैं, रिश्तों की बारीकी भी है। 1992 से हिंदी सिनेमा में कथ्य और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मिता बढी है।सहजीवन,समलैंगिकता पुरूष स्ट्रीपर्स सेक्स और विवाहेतर संबंध और प्यार की नई परिभाषा से गढ़ी कहानियां फिल्मों के नए विषय हैं।जिस तेजी से समाज बदल रहा है. उतनी तेजी से फिल्मों में ये विषय नहीं आ रहे हैं।समलैंगिकता समाज का सच है पर इस मुद्दे की गंभीरता को अभी भी समझा नहीं जा रहा है इंसानी समाज का ये पक्ष अभी भी बहस के मुद्दे से दूर है | सेक्‍स को हमेशा प्रमुखता से प्रस्तुत  करने वाली हमारी फिल्मों में (कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाएतो बॉलीवुड में यौन विषयों पर आधारित तार्किक फिल्‍में कम ही बनी हैं) यह तथ्य अलग है कि आइटम डांस का तडका लगाये बिना  कोई फिल्म पूरी नहीं होती और फिल्म निर्माता हमेशा इस विषय से भय ही खाते रहे है। 
मगर कुछ निर्देशक ऐसे हैं जिन्होंने समलैंगिकता जैसे संवेदनशील मुददे पर काम किया है|खासकर युवाओं ने जिन्हें समाज में वर्जित माने जाने वाले मुददों को दिखाने से कोई गुरेज नहीं। फिल्मों में गे और लेस्बियन किरदारों को या तो प्रोटागोनिस्ट दोस्तों की तरह दिखाया जाता है या फिर ड्रेस-डिजाइनर के किरदार में। समय के साथ और दर्शकों की रुचि देखते हुए बॉलीवुड खुले तौर पर सामने आ रहा है। फायर, माई ब्रदर निखिल, दोस्ताना, फ्रेंडशिप,फैशन  और पेज ३ में समलैंगिकों के लिए समाज का नजरिया दिखाने की कोशिश की गई है।कुछ फिल्मों ने समलैंगिकों के लिए आम आदमी का नजरिया बदला है फिर भी समाज का एक बड़ा तबका उन्हें असामान्य ही मानता है।फिल्मों में समलैंगिक किरदारों को स्वीकार तो किया जा रहा है लेकिन उन्हें ज्यादातर फैशन या मीडिया जगत से जुड़ा दिखाया जाता है।इस विषय की पहली मेनस्ट्रीम हिंदी मूवी ओनीर निर्देशित माय ब्रदर निखिल है।समलैंगिक संबंधों और एड्स पीड़ितों की सामाजिक प्रताड़ना इसमें दिखती है। कहानी निखिल के इर्द गिर्द घूमती है. जिसे एड्स है। इसे समलैंगिक संबंधों के बजाए एड्स आधारित फिल्म की तरह प्रचारित किया गया। निर्देशक करण राजदान की गर्लफ्रेंड में लेस्बियन रिश्तों पर फोकस है। करण जौहर निर्देशित दोस्ताना गे-कॉमेडी थी। यह फिल्म दर्शकों को काफी रास आई यह फिल्म इसलिए भी चर्चित रही कि इसमें पहली बार दो पुरुषों के चुम्बन द्रश्य को दिखाया गया । बहुत से फिल्म निर्माता समलेंगिकता को केवल हास्य के रूप में इसलिए रखते हैं ताकि उन्हें फिल्म की रिलीज के दौरान दिक्कत न हो इसीलिये फिल्मों में ऐसे चरित्र तो बढ़ रहे हैं जिनके हाव भाव समलैंगिकों वाले हैं पर उनकी यौन रूचि पर सीधे कोई बात नहीं की जाती और फिल्मों के कथ्य में वो महज मजाक बन कर रह जाते हैं भले ही फिल्मों का विषय और प्रस्तुति काल्पनिक हो लेकिन कोई भी फिल्म अपने समय से निरपेक्ष नहीं रह सकती हर फिल्म पर उस समय का असर जरुर होता है जिस समय वह निर्मित की जा रही होती है समलैंगिक किरदारों को हास्य के साथ प्रस्तुत करना समाज में उनके प्रति गलत छवि का निर्माण करता है यह समलैंगिकों के साथ अन्याय भी है ।लिसा रे और शीतल सेठ की आइ कांट थिंक स्ट्रेट स्त्री समलैंगिकता पर आधारित थी। शमीम शरीफ निर्देशित फिल्म में दोनों अभिनेत्रियां अपनी यौन पहचान समझने की कोशिश में रहती हैं। फिल्म् डू नो वाय... न जाने क्यों पुरुषों के समलैंगिक रिश्तों की कहानी है। जो विषमलैगिक ढांचे के अनुसार नहीं चलते हैं| पश्चिमी देशों में पुरुष और स्त्री को अपने सेक्स रिश्ते के चुनाव की पूरी आजादी हैं। इसे विचार अभिव्यक्ति का ही हिस्सा माना जाता है पर भारत में स्थिति अलग है यहाँ सेक्स अभी भी टैबू है जिस पर बात करना वर्जित है | हम भारत से बाहर की फिल्में देखकर ऐसे बोल्ड विषयों को कहने के साहस पर खुश होते है लेकिन वही काम अगर भारत में हो तो पचा नहीं पाते। निर्देशकों के चरित्र उसकी प्रवृत्ति पर सवाल खड़े का कर देते हैं।
समलैंगिकों की  स्थिति का काफी दस्तावेजीकरण हो रहा है| जिनसे पता चलता है कि गे ,लेस्बियनहिजडा, ट्रांसजैन्डर्डऔर बाईसेक्स्युअल लोगों की मानव प्रतिष्ठा का बार-बार किस प्रकार उल्लंघन किया जाता है। उल्लंघनों का क्षेत्र व्यापक है। किन्नरों का सेक्स रैकेट के रूप में प्रयोग और पुलिसवालों द्वारा उनके बार-बार बलात्कार की घटनाएं हैं और उनके मानवाधिकारों का हनन भी शामिल है ।बहरहाल समलैंगिकता पूरी दुनिया में हमेशा मौजूद रही है परंतु इसे हमने सामाजिक कालीन के नीचे छिपा दिया था जो अब प्रकट हो रहा है। हाल ही में ऐसी फिल्मों की बढ़ती तादाद और प्रमुख अभिनेताओं द्वारा समलैंगिक किरदारों का निभाया जाना इस ओर इशारा करता है कि बॉलीवुड भी इस गंभीर मुद्दे की ओर उन्मुख है। समलैंगिकता को देश में कानूनी मान्यता मिल गई है तो उम्मीदें भी बढ़ी हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि हिंदी फिल्मकार किस तरह से इसको अपने विषयों का हिस्सा बनाते हैं। क्या वह दबी आवाजें कुचले रिश्ते संबंधों की कसमसाहट और समाज की नैतिकता किस चोले में रजत पटल का हिस्सा बनेगी.
राष्ट्रीय सहारा में 16/07/12 को प्रकाशित लेख 

Thursday, July 12, 2012

घर ना लौट पाने वाले बच्चों की दुनिया


किसी खोये या अपह्रत बच्चे का मिल जाना करुणा जगाता है और सनसनी खेज खबर भी पर उन बच्चों का क्या जो दुबारा कभी अपने घर नहीं लौटते.जो नहीं लौटते उनमे से ज्यादातर बाल तस्करी का शिकार हो जाते हैं.बाल तस्करी के कारणों में प्रमुख हैं बंधुआ मजदूरी,अवैध रूप से बच्चा गोद देना,भीख मांगना,पॉकेट मारी और वैश्यावृति आदि इसके अतिरिक्त वे बच्चे भी बाल तस्करी का शिकार होते हैं जो घर से भागे होते हैं या किन्हीं कारणों से अपने घर वालों से बिछड जाते हैं.स्थिति की भयावहता की तसदीक बचपन बचाओ संस्था के शोध द्वारा जुटाये गए वह  आंकड़े करते हैं जिनके अनुसार वर्ष 2008 से 2010 के मध्य 1,17,480 बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ कराई गयी. इनमें से 74,209 बच्चों को तो ढूंढ लिया गया पर 41,546 का आज तक कोई सुराग नहीं लग सका है. खाए पिए अघाए  लोगों के लिए ये महज आंकड़े हो सकते हैं पर जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है उनकी आवाज़ महज़ एक सिसकी बनकर रह जाती है.2006 में निठारी कांड में देश यह जानकर स्तब्ध रह गया था कि किस तरह  तीस बच्चों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गयी और पुलिस को कुछ पता ही नहीं चला.बचपन बचाओ शोध में जिन 20 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल किया गया उनमें से बच्चों के लापता होने की सर्वाधिक घटनाएँ एक अपेक्षाकृत विकसित राज्य महाराष्ट्र से सामने आयीं जहां वर्ष 2008 से 10 के मध्य 26,211 बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई हालांकि सबसे ज्यादा बच्चों के वापस मिलने के आंकड़े (18,706) भी महाराष्ट्र के ही हैं.आज भी गुम हुए 1,17,480 बच्चों में से लगभग 45 प्रतिशत यानि कि 41,546 के बारे में आज तक कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है.पश्चिम बंगाल जहां महाराष्ट्र के पश्चात सर्वाधिक बच्चों के गुम होने के मामले सामने आए, जिनमे से अधिकतर आज भी लापता हैं, के सीमावर्ती इलाकों इस प्रकार की  वारदातें सबसे ज्यादा रिपोर्ट की गईं। इससे ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि गुमशुदा बच्चों में से कईयों  सीमा पार ले जाया गया होगा. देश के पाँच मेट्रो दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु और मुंबई में सबसे चिंताजनक स्थिति दिल्ली और कोलकाता की है जहां से इन शहरों से गायब होने वाले 24,744 बच्चों मे से लगभग 89 प्रतिशत बच्चे  गायब हुए. जब ये हाल देश के सबसे आधुनिक एवं विकसित समझे जाने वाले शहरों का है तो बाकी शहरों की स्थिति के बारे में कुछ बेहतर सोचना ही बेमानी होगा. दिल्ली पुलिस के आकड़ों के अनुसार, राजधानी में प्रतिदिन औसतन 14 बच्चे गायब हो जाते है.आंकड़ों के अनुसार विगत दो वर्षों के दौरान १,१७,४८० बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गयी.यदि हम इन आंकड़ों को आधार मानकर सभी जिलों के आंकड़ों का अनुमान लगाएँ तो भारत मे प्रतिवर्ष लापता होने वाले बच्चों की संख्या लगभग ९६००० आएगी अर्थात प्रतिदिन अनुमानतः २६३ बच्चे लापता होते हैं.चिंताजनक बात यह है कि ये आंकड़े सिर्फ लिखित अभिलेखों पर आधारित हैं. ऐसे जाने कितने ही मामले होते हैं जो भिन्न-भिन्न कारणो से प्रकाश में ही नहीं आते हैं. हमारे देश मे इस संबंध में किसी निश्चित कानून का न होना भी बाल-तस्करी से जुड़े वास्तविक आंकड़े जुटाने में बाधक होता है.सरकार भी इस बेहद संवेदनशील मसले को आंकड़ों में उलझाकर अपनी ज़िम्मेदारी से बचती रहती है.पुलिस भी इस तरह के अपराधों के प्रति संवेदनशील रवैया नहीं अपनाती.इन  गायब होते बच्चों के लिए हमारा सामजिक आर्थिक ढांचा जिम्मेदार है गरीबी ,बीमारी,अशिक्षा और ज्यादा बच्चे एक ऐसा दुष्चक्र रचते हैं कि कुछ लोगों के लिए बच्चे बोझ हो जाते हैं और इससे बच्चे अपने परिवारों में ही बेगाने हो जाते हैं ऐसे में बच्चों का गायब होना वे नियति का फैसला माँ लेते हैं .एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि ज्यादातर गायब होने वाले बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जो सामजिक और आर्थिक रूप से समाज के निचले पायदान पर हैं .सड़कों पर भीख मांग रहे बच्चे किसके हैं ,कहाँ से आते हैं साल दरसाल इनकी संख्या क्यों बढ़ रही है. ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके जवाब अभी नहीं मिले हैं.
 दैनिक हिंदुस्तान में 12/07/12 को प्रकाशित 

Thursday, July 5, 2012

हाशिए की आवाज़ की अनदेखी


ब्रेख्त ने बीसवीं शताब्दी में रेडियो के लिए कहा था  कि रेडियो एकाउस्टिकल डिपार्टमेंटल स्टोर के रूप में केवल वितरण प्रणाली बनकर रह गया है पर वक्त के बदलाव के साथ रेडियो भी बदलता गया. इसके लिए भारतीय सुप्रीम कोर्ट का फरवरी 1995 में दिया गया निर्णय मील का पत्थर बना जिसमे कहा गया था कि ध्वनि तरंगे  तरंगे सार्वजनिक सम्पति है और इससे रेडियो के बहुआयामी विकास का रास्ता खुला पर इस बदलाव में वो  सामाजिक क्षेत्र पीछे  छूट  गया जहाँ भारत बसता है .अपने रेडियो का सपना देखने वाले ग्रामीण क्षेत्र की आवाज़ को सुनने में किसी को दिलचस्पी न रही.इन्हीं बदलाओं की प्रक्रिया में सामुदायिक रेडियो का जन्म हुआ जो अपने प्रसारण से  भौगोलिक और समान  अभिरुचि के श्रोताओं  की सेवा कर सकते हैं. वे ऎसी सामग्री का प्रसारण करते हैं जो कि किन्हीं स्थानीय/विशिष्ट श्रोताओं में लोकप्रिय हैजिनकी अनदेखी वाणिज्यिक या जन-माध्यम प्रसारकों द्वारा की जा सकती है.इनका सञ्चालन सामुदायिक स्तर पर होता है जो लाभ कमाने के लिए नहीं होते ,यह व्यक्ति विशेषसमूह और समुदायों की अपनी विविध कहानियों को कहनेअनुभवों को बांटने की प्रक्रिया को सुगम बनाते हैं,इससे पूर्व रेडियो दो तरह की प्रसारण भूमिका में शामिल था एक में रेडियो की भूमिका  व्यवसायिक थी और दूसरे में जन प्रसारक रूप में पर सामुदायिक रेडियो एक विकल्प देता है उन श्रोताओं को जो संख्या के हिसाब से रेडियो प्रसारकों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है या बाजार के नजरिये से जिनका कोई महत्त्व नहीं है सामुदायिक रेडियो स्टेशन पचास वॉट की शक्ति वाले ट्रांसमीटर की सहायता से  पांच से पंद्रह किलोमीटर के कवरेज क्षेत्र तक पंहुचने वाले छोटे रेडियो स्टेशन हैं जो ऍफ. एम. बैंड पर प्रसारण करते हैं. सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा इनकेव्यापारिक उपयोग पर रोक है। इन स्टेशनों को कॉमर्शियल एफ.एम. की तरह कारोबार करने की छूट कतई नहीं है. इनकी स्थापना का मुख्य  मकसद मनोरंजन करना न होकर शिक्षा,स्वास्थ्यपर्यावरण  पर जनजागृति लाना और लोकसंस्कृति के संरक्षण  के लिए कार्य करना है. यह सीमित मात्रा में ही विज्ञापन ले सकते हैं .आज भारत में कुल मिलकर मात्र १२६ हैं.देश की जनसँख्या ,आकार और विभिन्न भाषाओँ और संस्कृति के हिसाब से यह संख्या नाकाफी है. भारत के दो छोटे  पडोसी देश नेपाल और श्रीलंका का रिकोर्ड सामुदायिक रेडियो के संदर्भ में  बहुत बेहतर है. संभावनाओं के लिहाज़ से सरकार ने इसके विकास पर ध्यान नहीं दिया है. अब तक यही माना जाता रहा है कि सामुदायिक रेडियो का जिम्मा उस समुदाय से सम्बंधित लोगों को ही संभालना होगा. सरकार इस सन्दर्भ में मात्र स्पेक्ट्रम शुल्क में ही कुछ छूट दे रही है .अभी हाल ही में लाइसेंस फीस को तीन  गुना बढाकर ९१ हज़ार किया जाना और फिर उसे घटाना  यह दिखाता है कि सरकार सामुदायिक रेडियो के विकास के लिए सिर्फ बात ही करना चाहती है काम नहीं. सूचना समाज के इस युग में देश में बढते डिजीटल डिवाईड को कम करने का सामुदायिक रेडियो एक सशक्त माध्यम हो सकता है वंचितों के इस माध्यम को स्थापित करने में कोई सरकारी अनुदान या प्रोत्साहन नहीं दिया जाता यही कारण है कि सामुदायिक स्तर पर इसको चलाना इतना आसान नहीं है. सरकार लोगों को साक्षर करने के नाम पर करोड़ो खर्च कर रही है पर लोगों तक सूचना और ज्ञान का प्रसार करने के सबसे सशक्त माध्यम के रूप में पहचाने जाने वाले इस माध्यम के विकास पर खर्च करना उसे गंवारा नहीं है.जनप्रसारक आकाशवाणी  भी अब विज्ञापन से होने वाली आय पर ध्यान केंद्रित करने लग गया है .ऐसे  में  सामुदायिक रेडियो चैनलों की संख्या कैसे बढे यह यक्ष प्रश्न अभी भी कायम है . बाजारवाद के इस दौर में जब कारपोरेट समूहों द्वारा समाजसेवा भी इसलिए कि जाती है ताकि उनकी ब्रांड इमेज सुधारे तब यह उम्मीद करना कि कोई समूह आगे आकर सिर्फ समाजसेवा के लिए लिए पैसे खर्च करेगा बेमानी है.रही बात स्वयंसेवी संस्थाओं की तो यह सभी संस्थाएं अपने काम के लिए कहीं न कहीं से अनुदान पर निर्भर करती हैं और इन्हें मिलने वाले अनुदान में एक बड़ा हिस्सा सरकारी होता है. वस्तुस्थिति  यह है कि कुछ स्टेशनों को छोड़ दिया जाए तो सामुदायिक रेडियो स्टेशन अपना रोजमर्रा का खर्च निकालने में भी असमर्थ हैं, वे यह चाहते हैं कि सरकार कम से कम उन्हें वार्षिक लाईसेंस शुल्क से मुक्त कर दे.
बिना सरकारी प्रोत्साहन के सामुदायिक रेडियो का विकास असंभव नहीं तो कठिन ज़रूर है. सरकार को इसे मात्र रेडियो के रूप में न देखकर सूचना प्रसार के साधन के रूप में देखना होगा सरकार इस माध्यम का विकास करके समाज के वंचित लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में प्रभावी भूमिका निभा सकती है.
 अमर उजाला में 05/07/12 को प्रकाशित 

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