Saturday, December 26, 2009

अमेरिका यात्रा : दूसरा भाग


अद्भुत अमेरिका 
अद्भुत अमेरिका
अमेरिका में मेरी पहली सुबह बारिश की फुहारें लेकर आयी सुबह होते ही जिन्दगी का सबसे कठिन सवाल मेरे सामने था जी हाँ पापी पेट का चूँकि सुबह का नाश्ता, मैंने अपने एक साथी के साथ होटल के रेस्तरां का चक्कर लगाया वहां काफी कुछ था लेकिन भारतीय अंदाज़ से काफी जुदा हाँ एक और मजेदार बात बांटता चलूँ वहां के रेस्तरां का नियम है की आपको उसमे प्रवेश की अनुमति तभी मिलेगी जब आपका नाम बुलाया जायेगा उससे पहले आपको लॉबी में बैठकर इन्तिज़ार करना होगा ये नियम क्यों था इसका पता तो मुझे नहीं पड़ पाया क्योंकि वहां मेज खाली थीं शायद वो इस बात की पक्की व्वस्था करना चाहते हों की जब वेटर खाली हो तभी मेहमानों को अन्दर बुलाया जाए जिससे उन्हें ज्यादा इन्तिज़ार न करना पड़े .हमारे साथी ठहरे शुद्ध शाकाहारी इसलिए हमने बहार से कुछ खरीदने की सोची आस पास कई माल्स थे वहां जाने पर लगा कि क्यों अमेरिका को क्यों उपभोगवाद का गढ़ कहा जाता है सब कुछ बड़ा बड़ा जैसे छोटे का कोई कांसेप्ट ही न हो जो भी चाहिए थोक में ले जाइए मैंने भी ४ लीटर का एक जूस जार खरीद लिया जो अगले ७ दिन मुझे मेरे घर की याद दिलाता रहा मैं अपने दिन की शुरुवात जूस पी कर ही करता हूँ . माल्स घूमने पर लग रहा था कि अमेरिका एक सस्ता मुल्क है अगर आप डॉलर को भारतीय मुद्रा में बदल कर न सोचें तो कम से कम खाने पीने की चीजें सस्ती हैं . मैं अभी भी कन्वर्टर की समस्या से जूझ रहा था आखिरकार मैंने उसे खरीदने का फैसला किया एक छोटा सा प्लग और कीमत ११ डॉलर भारतीय मुद्रा में लगभग ५०० रुपये के आस पास मरता क्या न करता लेकिन अमेरिकी सरकार की नीतियों और उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के कारण ये मुझे नहीं खला क्योंकि अगर आप खरीदे सामान की रसीद रखते हैं तो आप एक माह के अन्दर उसको पुरी कीमत पर वापस कर सकते हैं वो भी बगैर किसी कारण के जब मैंने अपने कन्वर्टर को वापस किया तो मुझे सधन्यवाद मेरे पैसे वापस मिल गए हिन्दुस्तान में ये असंभव है .पहले हमें हमारे मेजबान सुबह बहार घुमाने ले जाने वाले थे लेकिन बाद में यह वक्त दिन के १२.३० हो गया समय का पालन कितनी खूबसूरती से अमेरिका में होता है इसका एहसास मुझे इसी दिन से हुआ और जब तक मैं वहां रहा हम लोग भले ही देर से आये हों लेकिन हमारे मेजबान कभी नहीं लेट हुए वो हमेशा अपने दिए हुए समय पर होटल की लॉबी में हमारा इन्तिज़ार करते मुझे याद आया हमारे यहाँ अगर आप किसी को लेने होटल गए हैं तो बगैर उसके कमरे में गए घनिष्ट होने का एहसास नहीं होता यह कहना जरा मुश्किल है कौन सही है और कौन गलत हम चले लोंग्बीच का जग प्रसिद्ध एक्येरियम देखने क्या जगह थी अमेरिकी चाहे कुछ जानते हों या न जानते हों लेकिन उन्हें चीज़ों को रोचक बनाना आता है चारों तरफ पानी के बड़े बड़े कांच के टैंक जिसमे शार्क से लेकर डोल्फिन तक दुनिया के सारे जलीय प्रजाति के जंतु (मुझे जीव विज्ञानं का ज्ञान कम है ) .
अद्भुत अमेरिका
यहाँ मुझे ऐसे कई लोग मिले जो इस एक्वेरियम में स्वयमसेवा करते थे बिना किसी पैसे के विज्ञानं के प्रति जागरूकता चीज़ों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने में आती है न कि संगोष्ठियों में सरकार और मीडिया को गरियाने से हम लोगों ने एक शो देखा जिसमे पानी के टैंक के अन्दर एक गोताखोर दर्शकों को जलीय जन्तुवों के बारे में माइक्रोफोन से बताता है यही वक्त था जन्तुवों को भोजन देने का अद्भुत था वो नज़ारा अभी मुझे एक सदमा लगना था घूमते घूमते शाम हो गयी थी तभी हमारे मेजबानों ने आग्रह किया कि क्या हम रात का भोजन थोडा जल्दी कर लें उस वक्त शाम के ४ बजे थे मैंने सोचा जल्दी का मतलब रात के ७ बजे होगा क्योंकि आम हिन्दुस्तानी रात का खाना रात के ८-९ बजे तक करता है . लेकिन बाद में ये जानकार मुझे झटका लगा पूरा अमेरिका रात के ७ बजे तक अपना शाम का भोजन समाप्त कर लेता है जय हो पश्चिमी सभ्यता की मेरा बचपना और जवानी ये सुनते सुनते ख़तम हो गयी कि पश्चिमी सभ्यता का असर है .
जब सेल्फी का जमाना नहीं था 
हम रात को देर तक जागते हैं देर से खाते हैं और सुबह देर तक सोते हैं वरना हमारी सभ्यता तो न जाने क्या क्या है गोया अमेरिका तो देखा नहीं था इसलिए जो बताया गया वो मान लिया वैसे भी हम लोग तो वाचिक परंपरा के अनुयायी हैं आज भी हम से प्रवचन करवा लीजिये कर देंगे कि दुनिया को ऐसे खूबसूरत बनाया जा सकता है ये किया जाना चाहिए लेकिन काम करने को कहा जाए तो हम इन्तिज़ार करेंगे कि पड़ोसी के घर में भगत सिंह पैदा हो जाए और वो क्रांति करे फायदा हमें मिले . तो ६ बजे तक हम एक रेस्तराओं में थे मैंने एक मांसाहारी पिज्जा का लुत्फ़ उठाया अमेरिका और यूरोप में मसालों का प्रयोग कम होता है इसलिए एक भारतीय के लिए यहाँ का भोजन बेस्वाद लग सकता है खूब सारा सलाद शायद यही इनकी सेहत का राज़ है अमेरिकी खूब लम्बे होते हैं एक और मिथक टूटा जी हाँ हम ठण्ड में ठन्डे पानी और बरफ का सेवन बंद कर देते हैं ठण्ड लग जाने का डर रहता है या शायद डर दिखाया जाता है आम भारतीय की जिन्दगी हमेशा डरते डरते बीतती है कभी भगवान् का डर कभी समाज का और कभी परिवार का इसलिए हम ये जान ही नहीं पाते कि डर आगे जीत होती है इसलिए जैसे हमें डराया जाता है हम बगैर तर्क किये उस डर को आगे की पीढी में ट्रांसफर करते रहते हैं. है न मजेदार बात तो मैं बताने जा रहा था कि आम अमेरीकी पानी को ढेर सारी बरफ के साथ पीना पसंद करते हैं चाय भी कोल्ड पसंद की जाती है मतलब चाय का पानी और ढेर सारी बरफ.
जारी है ............................

Friday, December 18, 2009

अमेरिका यात्रा :प्रथम भाग


दस दिन तक हमारा यही ठिकाना था 
अमेरिका नाम तो आपने जरूर सुना होगा और हर भारतीय की तरह वहां जाने की इच्छा भी जरुर की होगी मैं भी आप से अलग नहीं हूँ बचपने से एक सपना मेरे मन भी था कि काश एक बार अमेरिका यात्रा का मौका मिले खैर मौका मिला अब ये जानना आपके लिए जरूरी नहीं होगा कि मैं अमेरिका क्यों गया इससे मेरा यात्रा वृतांत एक सीमित पाठक वर्ग तक सिमट कर रह जाएगा मुझे अमेरिका के कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी लॉन्ग बीच की यात्रा करनी थी और हमारा लगभग १० दिन का प्रवास था ,हालाँकि यह मेरी पहली विदेश यात्रा नहीं थी लेकिन जैसा कि मेरी हर यात्रा में होता कुछ न कुछ अडचने आ जाती हैं और विदेश यात्रा अपने आप में एक अनचाहा डर भी साथ लाती है वैसा इस बार भी था यूँ कहें कि घर छोड़ना बुरा भी लगता है किन्तु अपने विस्तार के लिए यात्रा करना भी जरुरी है मै ४ दिसंबर को लखनऊ से दिल्ली के लिए उड़ा
सुबह की शुरुवात जूस के साथ और कंप्यूटर तो है ही 
होटल के बाहर का द्रश्य 
इस सफ़र का तो पता भी न पड़ा करीब ५० मिनट की उड़ान थी यहाँ से लगभग १० घंटे बाद अगली उड़ान थी जो हमें अबुधाबी ले जाने वाली थी किसी तरह हमें १० घंटे इंदिरा गाँधी एयर पोर्ट पर काटने थे .अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन पर आ कर लगता है कि भारत विकास कर रहा है लेकिन कुछ विदेशी सैलानी इसे दुनिया का सबसे ख़राब विमान पत्तन बता रहे थे एक भारतीय होने के नाते मुझे बुरा लगा लेकिन हर भारतीय की तरह मुझे भी सिर्फ बुरा लगा क्योंकि हम अपनी कमियों से सीख ले रहे होते तो शायद इतिहास कुछ और होता यूँ होता तो क्या होता न मैं होता ,न तू होता तो इस किस्से को यहीं छोड़ कर हम आगे चल पड़े सुबह ४ बजे हमारे विमान ने अबुधाबी के लिए उडान भरी और इसी के साथ मैं निकल पड़ा दुनिया के एक और देश करीब ४ घंटे की उड़ान उंघते हुए पूरी हुई क्योंकि पूरी रात जागते हुई कटी थी सुबह का सूरज जब उग रहा था हमारा विमान अबुधाबी विमान पत्तन पर उतर रहा था यहाँ हमें ३ घंटे काटने थे यहाँ से अगला विमान हमें न्यू यार्क ले जाने वाला था और लगभग १४ घंटे की उड़ान थी अब तक शरीर थक कर चूर हो चुका था ।नित्यक्रिया से फारिग होने के बाद मैंने एअरपोर्ट का चक्कर लगाया बहुत खूबसूरती से बनाया गया यह एअरपोर्ट मानवीय उद्यमशीलता  का जीता जागता नमूना है जब हम सुरक्षा जांच के लिए जा रहे थे तो मैंने रास्ते देखा कई बच्चों और एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को देखा जिन्हें बीच में रोक दिया गया और उन्हें इन्तिज़ार करने को कहा गया देखने में वे भारतीय उपमहाद्वीप के लगते थे एक बात और बताता चलूँ अबुधाबी एअरपोर्ट सुरक्षा जांच से पूर्व की सारी औपचारिकता ज्यादातर प्रवासी भारतीय ही निपटाते हैं ये वो लोग हैं जो बेहतर भविष्य की तलाश में खाड़ी देशों का रुख करते हैं . अबुधाबी में हमारी घड़ी डेढ़ घंटे पीछे हुई हम १४ घंटे की उड़ान के लिए तैयार थे अबुधाबी एअरपोर्ट पर हमारी दुबारा सुरक्षा जांच हुई अबुधाबी एअरपोर्ट पर सुरक्षा उतनी कड़ी नहीं थी सुरक्षा जांच के बाद हम विमान में थे विमान में जल्दी ही उन लोगों को देखा जिन्हें सुरक्षा जांच के वक्त इन्तिज़ार के लिए रोका गया था वो एक ही परिवार के कई बच्चे थे और एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था जो शायद उनका पिता था मै सारी यात्रा उन्हें ही देखता रहा मेरे मन में कई सारे सवाल उमड़ रहे थे मैं उनसे बात करना चाहता था , मै जानना चाहता था कि इतने सारे बच्चों को लेकर वो अमेरिका क्यों जा रहा था क्योंकि उनकी हालत ये बयां कर रही थी कि वे आर्थिक रूप से उतने संपन्न नहीं लग रहे थे कि वे महज देशाटन के लिए अमेरिका जा रहे हों जब हमारा विमान न्यू योर्क एअरपोर्ट पर उतरने वाला था तब हमें कुछ फॉर्म दिए गए जिन्हें भरना अनिवार्य था ये हर देश का एक नियम है कि आपको अपनी यात्रा का पूरा ब्यौरा आव्रजन अधिकारीयों को देना था वे फॉर्म नहीं भर पा रहे थे उन्होंने मेरी मदद माँगी मैंने मदद की भी वो फॉर्म अपनी हस्तलिपि में ही भरना होता (जैसा मै जानता हूँ ) तब मुझे पता लगा कि वो सब बंगलादेशी हैं हालाँकि वो हिंदी मिश्रित भाषा जानते थे लेकिन उन्होंने मुझसे हिंदी मे बात नहीं की जबकि मैंने उन्हें उस भाषा में बात करते सुना था मन में कई सवालों को लिए मै यही सोचता रहा ये छोटे बच्चे अपने अपनों से दूर कैसे रहेंगे और यहाँ क्या करेंगे मुझे उनमे कई भारतीय छोटू दिखे जो वहां कहीं न कहीं खप जायेंगे वैसे भी अमेरिका सबको अपना लेता हैं उसका इतिहास भी यही कहता है . न्यू योर्क के लिए उडान भरते वक्त मैंने ये नहीं सोचा था कि जिन्दगी एक नया अनुभव होने वाला था जिसे टाइम ज़ोन इफेक्ट कहा जा सकता है हम दिल्ली से ५ की सुबह ४ बजे उड़े थे लेकिन जब हम लगभग १४ घंटे की उड़ान के बाद न्यू योर्क पर उतरे तो उस वक्त दिन के तीन बज रहे थे इस तरह हमारी जिन्दगी से एक रात गायब हो गयी जो थी भी और नहीं भी जिन्दगी भी ऐसी ही है एक मृगतृष्णा हम भागते रहते हैं लेकिन सत्य तो मृत्यु है फिर भी ..........
भारतीय समय के हिसाब से जब हम न्युयोर्क  उतर रहे थे भारत में  ६ की सुबह हो रही थी लेकिन न्यू योर्क में उस वक्त ५ की शाम थी. १४ घंटे की थका देने वाली उड़ान के बाद जब हमारा विमान न्यू योर्क एअरपोर्ट पर उतर रहा था वहां हल्की बर्फ बारी हो रही अपनी आँखों से बर्फ गिरते देखने का यह मेरा पहला अनुभव था थोड़ी देर में जोरदार बारिश होने लग गयी जो हमारे लोस एंजलिस के लिए उड़ान भरते वक्त जारी रही ठण्ड बहुत थी और एक बार हम फिर ६ घंटे की उड़ान के लिए तैयार थे न्यू योर्क एअरपोर्ट काफी बड़ा और खूबसूरत है हमको एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल जाने के लिए ट्रेन पकडनी पडी लेकिन सुविधाओं के हिसाब से मुझे कुछ ख़ास नहीं लगा आप सब मुझसे असहमत हो सकते हैं .आव्रजन सम्बन्धी औपचारिकता निपटाने के बाद हम अमेरिका की सरज़मीन पर थे . अमेरीकी समय के अनुसार हम रात के ११ बजे लोस एंजलिस एयर पोर्ट पर उतर रहे थे ,शरीर थक कर चूर हो चुका था हमारे मेजबान एअरपोर्ट पर हमारा इन्तिज़ार कर रहे थे थोड़े देर में हम होटल के रास्ते में थे चौड़ी चौड़ी सड़कें जिनपर सरपट दौड़ते चौपहिया वाहन रौशनी से जगमगाता शहर वैसे जब हमारा विमान लोस एंजलिस एअरपोर्ट पर लैंड कर रहा था तो नीचे मैंने रौशनी में जगमगाता शहर देखा क्या खूबसूरती से समकोण पर काटती सड़कें पूरा शहर एक खूबसूरत लैंड एस्केप लग रहा था और मुझे याद आ रहा था बचपने में इतिहास की किताबों में पढी हड़प्पा सभ्यता के बारे में पढी बातें सारी सडकें एक दुसरे को समकोण पर काटती थीं हिन्दुस्तान अपने इतिहास से चिपका रहा और अमेरिका अपना भविष्य बनाता रहा मैंने अक्सर अमेरिका की आलोचना इस आधार पर सुनी है अरे वो क्या देश है उसका तो कोई इतिहास ही नहीं और मुझे ग़ालिब चाचा का शेर याद आता रहा "दिल के खुश रखने को ये ख्याल अच्छा है ग़ालिब " हड़प्पा सभ्यता की कुछ खास बातें मैं अमेरिका मैं देखने वाला था मसलन वहां की सफाई व्यवस्था . हम २० मिनट की ड्राइव के बाद लोंग्बीच शहर के होलीडे इन् होटल में थे . ड्राइव की बात पर बताता चलूँ अमेरिका में दूरी समय में मापी जाती है ब्लोगर सरताज समीर लाल की ये पंक्तियाँ पढ़ लीजिये अमेरिका का फलसफा समझ में आ जाएगा "अमेरीका का अजब शिगूफा है. बस सबसे अलग दिखना है, मानो यही मोटो हो. आज भी माईल में दूरी आँकते हैं जबकि पूरा विश्व किलो मीटर पर आ गया है. तापमान फेरेन्हाईट में, पेट्रोल गैलन में, वजन पॉण्ड में. " कुछ और जोड़ता चलूँ लाइट के जो स्विच हमारे लिए ऑफ होते हैं अमेरिका में ऑन होते हैं भारतीय कोई भी बिजली के उपकरण अमेरिका में नहीं चल सकते क्योंकि उनके प्लग अलग किस्म के होते हैं इसके लिए आपको कन्वर्टर की जरूरत होगी और इन समस्याओं का शिकार मैं अपने होटल पहुँचते हुआ पहले ऑन ऑफ का चक्कर समझा उसके बाद मैंने सोचा अपने सकुशल पहुँचने की सूचना घर दे दी जाए लेकिन मेरा लैपटॉप उचित प्लग न हो पाने के कारण नहीं चला बड़ी समस्या हुई खैर हमारी एक साथी इस की व्यवस्था कर के ले गयीं थी और वो प्लग उनोहेने मुझे सहर्ष दे दिया जिस से मैं अपना लैपटॉप चला पाया ये कन्वर्टर मेरे लिए एक बड़ी समस्या बना क्योंकि मैं अपने साथ बहुत से उपकरण ले गया था (वीडियो कैमरा , स्टिल कैमरा , मोबाइल , ऑडियो रिकॉर्डर इत्यादि ) और इन सबको चार्जिंग की जरुरत पड़ती है ,पहले दिन तो काम चला आगे मैं किश्तों में सोता था और सारी रात अपने उपकरणों को चार्ज करता था .
जारी .......................................................

Saturday, December 12, 2009

आ रहा हूँ मैं

प्रिय पाठकों आप जल्दी ही मेरी अमेरिका यात्रा के संस्मरण से रूबरू होंगे इंतज़ार कीजिये

पसंद आया हो तो