Saturday, December 26, 2009

अमेरिका यात्रा : दूसरा भाग


अद्भुत अमेरिका 
अद्भुत अमेरिका
अमेरिका में मेरी पहली सुबह बारिश की फुहारें लेकर आयी सुबह होते ही जिन्दगी का सबसे कठिन सवाल मेरे सामने था जी हाँ पापी पेट का चूँकि सुबह का नाश्ता, मैंने अपने एक साथी के साथ होटल के रेस्तरां का चक्कर लगाया वहां काफी कुछ था लेकिन भारतीय अंदाज़ से काफी जुदा हाँ एक और मजेदार बात बांटता चलूँ वहां के रेस्तरां का नियम है की आपको उसमे प्रवेश की अनुमति तभी मिलेगी जब आपका नाम बुलाया जायेगा उससे पहले आपको लॉबी में बैठकर इन्तिज़ार करना होगा ये नियम क्यों था इसका पता तो मुझे नहीं पड़ पाया क्योंकि वहां मेज खाली थीं शायद वो इस बात की पक्की व्वस्था करना चाहते हों की जब वेटर खाली हो तभी मेहमानों को अन्दर बुलाया जाए जिससे उन्हें ज्यादा इन्तिज़ार न करना पड़े .हमारे साथी ठहरे शुद्ध शाकाहारी इसलिए हमने बहार से कुछ खरीदने की सोची आस पास कई माल्स थे वहां जाने पर लगा कि क्यों अमेरिका को क्यों उपभोगवाद का गढ़ कहा जाता है सब कुछ बड़ा बड़ा जैसे छोटे का कोई कांसेप्ट ही न हो जो भी चाहिए थोक में ले जाइए मैंने भी ४ लीटर का एक जूस जार खरीद लिया जो अगले ७ दिन मुझे मेरे घर की याद दिलाता रहा मैं अपने दिन की शुरुवात जूस पी कर ही करता हूँ . माल्स घूमने पर लग रहा था कि अमेरिका एक सस्ता मुल्क है अगर आप डॉलर को भारतीय मुद्रा में बदल कर न सोचें तो कम से कम खाने पीने की चीजें सस्ती हैं . मैं अभी भी कन्वर्टर की समस्या से जूझ रहा था आखिरकार मैंने उसे खरीदने का फैसला किया एक छोटा सा प्लग और कीमत ११ डॉलर भारतीय मुद्रा में लगभग ५०० रुपये के आस पास मरता क्या न करता लेकिन अमेरिकी सरकार की नीतियों और उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के कारण ये मुझे नहीं खला क्योंकि अगर आप खरीदे सामान की रसीद रखते हैं तो आप एक माह के अन्दर उसको पुरी कीमत पर वापस कर सकते हैं वो भी बगैर किसी कारण के जब मैंने अपने कन्वर्टर को वापस किया तो मुझे सधन्यवाद मेरे पैसे वापस मिल गए हिन्दुस्तान में ये असंभव है .पहले हमें हमारे मेजबान सुबह बहार घुमाने ले जाने वाले थे लेकिन बाद में यह वक्त दिन के १२.३० हो गया समय का पालन कितनी खूबसूरती से अमेरिका में होता है इसका एहसास मुझे इसी दिन से हुआ और जब तक मैं वहां रहा हम लोग भले ही देर से आये हों लेकिन हमारे मेजबान कभी नहीं लेट हुए वो हमेशा अपने दिए हुए समय पर होटल की लॉबी में हमारा इन्तिज़ार करते मुझे याद आया हमारे यहाँ अगर आप किसी को लेने होटल गए हैं तो बगैर उसके कमरे में गए घनिष्ट होने का एहसास नहीं होता यह कहना जरा मुश्किल है कौन सही है और कौन गलत हम चले लोंग्बीच का जग प्रसिद्ध एक्येरियम देखने क्या जगह थी अमेरिकी चाहे कुछ जानते हों या न जानते हों लेकिन उन्हें चीज़ों को रोचक बनाना आता है चारों तरफ पानी के बड़े बड़े कांच के टैंक जिसमे शार्क से लेकर डोल्फिन तक दुनिया के सारे जलीय प्रजाति के जंतु (मुझे जीव विज्ञानं का ज्ञान कम है ) .
अद्भुत अमेरिका
यहाँ मुझे ऐसे कई लोग मिले जो इस एक्वेरियम में स्वयमसेवा करते थे बिना किसी पैसे के विज्ञानं के प्रति जागरूकता चीज़ों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने में आती है न कि संगोष्ठियों में सरकार और मीडिया को गरियाने से हम लोगों ने एक शो देखा जिसमे पानी के टैंक के अन्दर एक गोताखोर दर्शकों को जलीय जन्तुवों के बारे में माइक्रोफोन से बताता है यही वक्त था जन्तुवों को भोजन देने का अद्भुत था वो नज़ारा अभी मुझे एक सदमा लगना था घूमते घूमते शाम हो गयी थी तभी हमारे मेजबानों ने आग्रह किया कि क्या हम रात का भोजन थोडा जल्दी कर लें उस वक्त शाम के ४ बजे थे मैंने सोचा जल्दी का मतलब रात के ७ बजे होगा क्योंकि आम हिन्दुस्तानी रात का खाना रात के ८-९ बजे तक करता है . लेकिन बाद में ये जानकार मुझे झटका लगा पूरा अमेरिका रात के ७ बजे तक अपना शाम का भोजन समाप्त कर लेता है जय हो पश्चिमी सभ्यता की मेरा बचपना और जवानी ये सुनते सुनते ख़तम हो गयी कि पश्चिमी सभ्यता का असर है .
जब सेल्फी का जमाना नहीं था 
हम रात को देर तक जागते हैं देर से खाते हैं और सुबह देर तक सोते हैं वरना हमारी सभ्यता तो न जाने क्या क्या है गोया अमेरिका तो देखा नहीं था इसलिए जो बताया गया वो मान लिया वैसे भी हम लोग तो वाचिक परंपरा के अनुयायी हैं आज भी हम से प्रवचन करवा लीजिये कर देंगे कि दुनिया को ऐसे खूबसूरत बनाया जा सकता है ये किया जाना चाहिए लेकिन काम करने को कहा जाए तो हम इन्तिज़ार करेंगे कि पड़ोसी के घर में भगत सिंह पैदा हो जाए और वो क्रांति करे फायदा हमें मिले . तो ६ बजे तक हम एक रेस्तराओं में थे मैंने एक मांसाहारी पिज्जा का लुत्फ़ उठाया अमेरिका और यूरोप में मसालों का प्रयोग कम होता है इसलिए एक भारतीय के लिए यहाँ का भोजन बेस्वाद लग सकता है खूब सारा सलाद शायद यही इनकी सेहत का राज़ है अमेरिकी खूब लम्बे होते हैं एक और मिथक टूटा जी हाँ हम ठण्ड में ठन्डे पानी और बरफ का सेवन बंद कर देते हैं ठण्ड लग जाने का डर रहता है या शायद डर दिखाया जाता है आम भारतीय की जिन्दगी हमेशा डरते डरते बीतती है कभी भगवान् का डर कभी समाज का और कभी परिवार का इसलिए हम ये जान ही नहीं पाते कि डर आगे जीत होती है इसलिए जैसे हमें डराया जाता है हम बगैर तर्क किये उस डर को आगे की पीढी में ट्रांसफर करते रहते हैं. है न मजेदार बात तो मैं बताने जा रहा था कि आम अमेरीकी पानी को ढेर सारी बरफ के साथ पीना पसंद करते हैं चाय भी कोल्ड पसंद की जाती है मतलब चाय का पानी और ढेर सारी बरफ.
जारी है ............................

Friday, December 18, 2009

अमेरिका यात्रा :प्रथम भाग


दस दिन तक हमारा यही ठिकाना था 
अमेरिका नाम तो आपने जरूर सुना होगा और हर भारतीय की तरह वहां जाने की इच्छा भी जरुर की होगी मैं भी आप से अलग नहीं हूँ बचपने से एक सपना मेरे मन भी था कि काश एक बार अमेरिका यात्रा का मौका मिले खैर मौका मिला अब ये जानना आपके लिए जरूरी नहीं होगा कि मैं अमेरिका क्यों गया इससे मेरा यात्रा वृतांत एक सीमित पाठक वर्ग तक सिमट कर रह जाएगा मुझे अमेरिका के कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी लॉन्ग बीच की यात्रा करनी थी और हमारा लगभग १० दिन का प्रवास था ,हालाँकि यह मेरी पहली विदेश यात्रा नहीं थी लेकिन जैसा कि मेरी हर यात्रा में होता कुछ न कुछ अडचने आ जाती हैं और विदेश यात्रा अपने आप में एक अनचाहा डर भी साथ लाती है वैसा इस बार भी था यूँ कहें कि घर छोड़ना बुरा भी लगता है किन्तु अपने विस्तार के लिए यात्रा करना भी जरुरी है मै ४ दिसंबर को लखनऊ से दिल्ली के लिए उड़ा
सुबह की शुरुवात जूस के साथ और कंप्यूटर तो है ही 
होटल के बाहर का द्रश्य 
इस सफ़र का तो पता भी न पड़ा करीब ५० मिनट की उड़ान थी यहाँ से लगभग १० घंटे बाद अगली उड़ान थी जो हमें अबुधाबी ले जाने वाली थी किसी तरह हमें १० घंटे इंदिरा गाँधी एयर पोर्ट पर काटने थे .अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन पर आ कर लगता है कि भारत विकास कर रहा है लेकिन कुछ विदेशी सैलानी इसे दुनिया का सबसे ख़राब विमान पत्तन बता रहे थे एक भारतीय होने के नाते मुझे बुरा लगा लेकिन हर भारतीय की तरह मुझे भी सिर्फ बुरा लगा क्योंकि हम अपनी कमियों से सीख ले रहे होते तो शायद इतिहास कुछ और होता यूँ होता तो क्या होता न मैं होता ,न तू होता तो इस किस्से को यहीं छोड़ कर हम आगे चल पड़े सुबह ४ बजे हमारे विमान ने अबुधाबी के लिए उडान भरी और इसी के साथ मैं निकल पड़ा दुनिया के एक और देश करीब ४ घंटे की उड़ान उंघते हुए पूरी हुई क्योंकि पूरी रात जागते हुई कटी थी सुबह का सूरज जब उग रहा था हमारा विमान अबुधाबी विमान पत्तन पर उतर रहा था यहाँ हमें ३ घंटे काटने थे यहाँ से अगला विमान हमें न्यू यार्क ले जाने वाला था और लगभग १४ घंटे की उड़ान थी अब तक शरीर थक कर चूर हो चुका था ।नित्यक्रिया से फारिग होने के बाद मैंने एअरपोर्ट का चक्कर लगाया बहुत खूबसूरती से बनाया गया यह एअरपोर्ट मानवीय उद्यमशीलता  का जीता जागता नमूना है जब हम सुरक्षा जांच के लिए जा रहे थे तो मैंने रास्ते देखा कई बच्चों और एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को देखा जिन्हें बीच में रोक दिया गया और उन्हें इन्तिज़ार करने को कहा गया देखने में वे भारतीय उपमहाद्वीप के लगते थे एक बात और बताता चलूँ अबुधाबी एअरपोर्ट सुरक्षा जांच से पूर्व की सारी औपचारिकता ज्यादातर प्रवासी भारतीय ही निपटाते हैं ये वो लोग हैं जो बेहतर भविष्य की तलाश में खाड़ी देशों का रुख करते हैं . अबुधाबी में हमारी घड़ी डेढ़ घंटे पीछे हुई हम १४ घंटे की उड़ान के लिए तैयार थे अबुधाबी एअरपोर्ट पर हमारी दुबारा सुरक्षा जांच हुई अबुधाबी एअरपोर्ट पर सुरक्षा उतनी कड़ी नहीं थी सुरक्षा जांच के बाद हम विमान में थे विमान में जल्दी ही उन लोगों को देखा जिन्हें सुरक्षा जांच के वक्त इन्तिज़ार के लिए रोका गया था वो एक ही परिवार के कई बच्चे थे और एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था जो शायद उनका पिता था मै सारी यात्रा उन्हें ही देखता रहा मेरे मन में कई सारे सवाल उमड़ रहे थे मैं उनसे बात करना चाहता था , मै जानना चाहता था कि इतने सारे बच्चों को लेकर वो अमेरिका क्यों जा रहा था क्योंकि उनकी हालत ये बयां कर रही थी कि वे आर्थिक रूप से उतने संपन्न नहीं लग रहे थे कि वे महज देशाटन के लिए अमेरिका जा रहे हों जब हमारा विमान न्यू योर्क एअरपोर्ट पर उतरने वाला था तब हमें कुछ फॉर्म दिए गए जिन्हें भरना अनिवार्य था ये हर देश का एक नियम है कि आपको अपनी यात्रा का पूरा ब्यौरा आव्रजन अधिकारीयों को देना था वे फॉर्म नहीं भर पा रहे थे उन्होंने मेरी मदद माँगी मैंने मदद की भी वो फॉर्म अपनी हस्तलिपि में ही भरना होता (जैसा मै जानता हूँ ) तब मुझे पता लगा कि वो सब बंगलादेशी हैं हालाँकि वो हिंदी मिश्रित भाषा जानते थे लेकिन उन्होंने मुझसे हिंदी मे बात नहीं की जबकि मैंने उन्हें उस भाषा में बात करते सुना था मन में कई सवालों को लिए मै यही सोचता रहा ये छोटे बच्चे अपने अपनों से दूर कैसे रहेंगे और यहाँ क्या करेंगे मुझे उनमे कई भारतीय छोटू दिखे जो वहां कहीं न कहीं खप जायेंगे वैसे भी अमेरिका सबको अपना लेता हैं उसका इतिहास भी यही कहता है . न्यू योर्क के लिए उडान भरते वक्त मैंने ये नहीं सोचा था कि जिन्दगी एक नया अनुभव होने वाला था जिसे टाइम ज़ोन इफेक्ट कहा जा सकता है हम दिल्ली से ५ की सुबह ४ बजे उड़े थे लेकिन जब हम लगभग १४ घंटे की उड़ान के बाद न्यू योर्क पर उतरे तो उस वक्त दिन के तीन बज रहे थे इस तरह हमारी जिन्दगी से एक रात गायब हो गयी जो थी भी और नहीं भी जिन्दगी भी ऐसी ही है एक मृगतृष्णा हम भागते रहते हैं लेकिन सत्य तो मृत्यु है फिर भी ..........
भारतीय समय के हिसाब से जब हम न्युयोर्क  उतर रहे थे भारत में  ६ की सुबह हो रही थी लेकिन न्यू योर्क में उस वक्त ५ की शाम थी. १४ घंटे की थका देने वाली उड़ान के बाद जब हमारा विमान न्यू योर्क एअरपोर्ट पर उतर रहा था वहां हल्की बर्फ बारी हो रही अपनी आँखों से बर्फ गिरते देखने का यह मेरा पहला अनुभव था थोड़ी देर में जोरदार बारिश होने लग गयी जो हमारे लोस एंजलिस के लिए उड़ान भरते वक्त जारी रही ठण्ड बहुत थी और एक बार हम फिर ६ घंटे की उड़ान के लिए तैयार थे न्यू योर्क एअरपोर्ट काफी बड़ा और खूबसूरत है हमको एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल जाने के लिए ट्रेन पकडनी पडी लेकिन सुविधाओं के हिसाब से मुझे कुछ ख़ास नहीं लगा आप सब मुझसे असहमत हो सकते हैं .आव्रजन सम्बन्धी औपचारिकता निपटाने के बाद हम अमेरिका की सरज़मीन पर थे . अमेरीकी समय के अनुसार हम रात के ११ बजे लोस एंजलिस एयर पोर्ट पर उतर रहे थे ,शरीर थक कर चूर हो चुका था हमारे मेजबान एअरपोर्ट पर हमारा इन्तिज़ार कर रहे थे थोड़े देर में हम होटल के रास्ते में थे चौड़ी चौड़ी सड़कें जिनपर सरपट दौड़ते चौपहिया वाहन रौशनी से जगमगाता शहर वैसे जब हमारा विमान लोस एंजलिस एअरपोर्ट पर लैंड कर रहा था तो नीचे मैंने रौशनी में जगमगाता शहर देखा क्या खूबसूरती से समकोण पर काटती सड़कें पूरा शहर एक खूबसूरत लैंड एस्केप लग रहा था और मुझे याद आ रहा था बचपने में इतिहास की किताबों में पढी हड़प्पा सभ्यता के बारे में पढी बातें सारी सडकें एक दुसरे को समकोण पर काटती थीं हिन्दुस्तान अपने इतिहास से चिपका रहा और अमेरिका अपना भविष्य बनाता रहा मैंने अक्सर अमेरिका की आलोचना इस आधार पर सुनी है अरे वो क्या देश है उसका तो कोई इतिहास ही नहीं और मुझे ग़ालिब चाचा का शेर याद आता रहा "दिल के खुश रखने को ये ख्याल अच्छा है ग़ालिब " हड़प्पा सभ्यता की कुछ खास बातें मैं अमेरिका मैं देखने वाला था मसलन वहां की सफाई व्यवस्था . हम २० मिनट की ड्राइव के बाद लोंग्बीच शहर के होलीडे इन् होटल में थे . ड्राइव की बात पर बताता चलूँ अमेरिका में दूरी समय में मापी जाती है ब्लोगर सरताज समीर लाल की ये पंक्तियाँ पढ़ लीजिये अमेरिका का फलसफा समझ में आ जाएगा "अमेरीका का अजब शिगूफा है. बस सबसे अलग दिखना है, मानो यही मोटो हो. आज भी माईल में दूरी आँकते हैं जबकि पूरा विश्व किलो मीटर पर आ गया है. तापमान फेरेन्हाईट में, पेट्रोल गैलन में, वजन पॉण्ड में. " कुछ और जोड़ता चलूँ लाइट के जो स्विच हमारे लिए ऑफ होते हैं अमेरिका में ऑन होते हैं भारतीय कोई भी बिजली के उपकरण अमेरिका में नहीं चल सकते क्योंकि उनके प्लग अलग किस्म के होते हैं इसके लिए आपको कन्वर्टर की जरूरत होगी और इन समस्याओं का शिकार मैं अपने होटल पहुँचते हुआ पहले ऑन ऑफ का चक्कर समझा उसके बाद मैंने सोचा अपने सकुशल पहुँचने की सूचना घर दे दी जाए लेकिन मेरा लैपटॉप उचित प्लग न हो पाने के कारण नहीं चला बड़ी समस्या हुई खैर हमारी एक साथी इस की व्यवस्था कर के ले गयीं थी और वो प्लग उनोहेने मुझे सहर्ष दे दिया जिस से मैं अपना लैपटॉप चला पाया ये कन्वर्टर मेरे लिए एक बड़ी समस्या बना क्योंकि मैं अपने साथ बहुत से उपकरण ले गया था (वीडियो कैमरा , स्टिल कैमरा , मोबाइल , ऑडियो रिकॉर्डर इत्यादि ) और इन सबको चार्जिंग की जरुरत पड़ती है ,पहले दिन तो काम चला आगे मैं किश्तों में सोता था और सारी रात अपने उपकरणों को चार्ज करता था .
जारी .......................................................

Saturday, December 12, 2009

आ रहा हूँ मैं

प्रिय पाठकों आप जल्दी ही मेरी अमेरिका यात्रा के संस्मरण से रूबरू होंगे इंतज़ार कीजिये

Saturday, November 21, 2009

Travelling an experience


पिछले दिनों एक वेबसाइट के एक लेख पर नज़र पडी .लेख की शुरुवात कुछ इस तरह थी कि पिछले साल बुकर पुरूस्कार की दौड़ में दो भारतीय अरविन्द अडिग और अमिताव घोष शामिल थे , जिनमें मैदान अरविन्द अडिग के हाथ रहा लेकिन २००८ के लिए साहित्य का सबसे बड़ा पुरूस्कार यानि नोबेल पुरूस्कार फ़्रांसीसी लेखक जॉन मेरी गुस्ताव लाक्लेज़ियो की झोली में गया है.
लाक्लेज़ियो ट्रैवेल लेखक हैं .लेख आगे चलकर दूसरी दिशा में मुड़ जाता है लेकिन मेरा मन मुड़ गया दूसरी ओर मेरे जेहन में अपने बचपन में सुनी गयी वो सारी कहानिया घूमने लगी जो मैंने रजाई में अपने पिताजी के आगोश में दुबक कर या कभी कभी अलाव के गिर्द बैठकर सूनी थी. कभी सिंदबाद दा सेलर, तो कभी गुलिवर तरिवाल्स का कोई घटनाकर्म कभी हातिमताई कुछ न समझ आये तो ऐसे राजकुमार की कहानी जो रानी की तलाश में जंगल जंगल घूम रहा है .
सर्दियां शुरू हो गयीं हर मौसम से सबकी कुछ न कुछ यादें जुडी होती है ऐसा ही कुछ मेरे साथ है सर्दियां मुझे मेरे बचपन की याद बड़ी शिद्दत से कराती हैं आप भी सोच रहे होंगे कि मै आप लोगों पर इतना इमोशनल अत्याचार क्यों कर रहा हूँ मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है मै तो सिर्फ इतना याद दिलाना चाहता हूँ कि जिस टोपिक पर मै आज बात कर रहा हूँ वो हमारी जिन्दगी का कितना अहम् हिस्सा है जिसकी शुरुवात हमारे बचपने से हो जाती है मै बात कर रहा हूँ यात्रा की , सफ़र की, याद कीजिये भले ही बचपने की ज्यादातर कहानियां सफ़र से जुडी हुई रहती थीं आज के बच्चे कहानी सुनने की बजाय कार्टून देख कर सोते हों पर ज्यादातर कार्टून उन्हें यात्रा पर ले जाते हैं यात्राओं के बारे में सोचते हुए राहुल संस्क्रतायानन याद न आयें ऐसा हो सकता है क्या ? ट्रावोल्ग पढ़ते वक्त हमेशा ऐसा लगता है था कि घुमक्कड़ी के बाद इतना शानदार कैसे लिख लेते हैं लोग .लेकिन अब समझ में आने लगा है कि जब हम यातारों को जीना शुरू कर देते हैं तो यात्रा वृतांत अपने आप जी उठते हैं कहते है किसी पल को जीभर कर जी लेने के बाद ही डूब कर लिखा जा सकता है मैंने भी आज सफ़र को जीने की कोशिश की .
यात्राएँ हमारे चिंतन को विस्तार देती हैं आप ने वो गाना जरूर सुना होगा " जिन्दगी एक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना" यूँ तो देखा जाए तो जिन्दगी का सफ़र है तो सुहाना लेकिन इसके साथ जुडी हुई है अन्सर्तेंतिटी और ऐसा ही होता है जब हम किसी सफ़र पर निकलते हैं ट्रेन कब लेट हो जाए बस कब ख़राब हो जाए वगैरह वगैरह मुश्किलें तों हैं पर क्या मुश्किलों की वजह से हम सफ़र पर निकलना छोड़ देते हैं भाई काम तो करना ही पड़ेगा न सर्दियों में कोहरा कितना भी पड़े डेली पैसेंजर तो वही ट्रेन पकड़ते हैं जिससे वो साल भर जाते हैं कभी छोटी छोटी बातें जिन्दगी का कितना बड़ा सबक दे जाती हैं और हमें पता ही नहीं पड़ता है हर सफ़र हमें नया अनुभव देता है जिस तरह हमारे जीवन का कोई दिन एक जैसा नहीं होता वैसे ही दुनिया का कोई इंसान ये दावा नहीं कर सकता कि उसका रोज का सफ़र एक जैसा होता है कुछ चेहरे जाने पहचाने हो सकते हैं लेकिन सारे नहीं, जिन्दगी भी ऐसी ही है .अब देखिये सर्दी तो सबको लगती है मेरे पिताजी कहा करते हैं बेटा सर्दी बिस्तर पर ही लगती है बाहर निकलो काम पर चलो सर्दी गायब हो जायेगी मंजिल तभी तक दूर लगती है जब तक हम सफ़र की शुरुवात नहीं करते लेकिन एक बार चल पड़े और चलते रहे तो मंजिल जरूर मिलेगी . अब सफ़र पर निकले हैं तो किसी न किसी साथी की जरुरत पड़ेगी जरुरी नहीं आप साथी के साथ ही सफ़र करें साथी सफ़र में भी बन जाते हैं लेकिन साथी के सेलेक्टिओं मे सावधान रहें गलत साथी आपके सफ़र को पेनफुल बना सकते हैं और वैसा ही जिन्दगी का सफ़र में गलत कोम्पैनिओन आपके लिए प्रॉब्लम ला सकते हैं .आप ध्यान दे रहें कहते हैं जो सफ़र प्यार से कट जाए वो प्यारा है सफ़र नहीं तो मुश्किलों के बोझ का मारा है सफ़र वाकई सफ़र तो वाकई वही जो हँसते मुस्कराते कटे और तभी सफ़र का मज़ा भी है मेरा तो जिन्दगी का सफ़र जारी है जिन्दगी के इस मोड़ पर आप सबसे मुलाकात अच्छी लगी क्या आप भी जिन्दगी के इस सफ़र में मेरे साथी बनेंगे और आगे से जब भी किसी सफ़र पर निकालिएगा तो ये मत भूलियेगा कि ये जिन्दगी का सफ़र है और हर सफ़र की शुरुवात अकेले ही होती है लेकिन अंत अकेले नहीं होता साथ में कारवां होता है अपनों का अपने अपनों का यात्राएँ चाहे जीवन की हों या किसी दूर देश की या फिर घर से दफ्तर के बीच की ही क्यों न हो .ऐसी ही यात्राओं से कोई लाक्लेज़ियो नोबेल पुरूस्कार ले जाते हैं ओर कोई अपनी मंजिल पर पहुंचकर मुस्कुरा उठता है .सबकी यात्राओं का अपना अलग अलग सुख है .फिलहाल यह लेख लिहने की अपनी यह यात्रा में यहीं ख़तम करता हूँ ओर निकलता हूँ अपनी दूसरी यात्राएँ की ओर
२१ नवम्बर को आई नेक्स्ट में प्रकाशित

Friday, October 23, 2009

लेट'स विश अ लॉट


कभी कभी कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं कि हमारे दिमाग में अब तक फीड हुई परिभाषाएं एकदम नए रूप में सामने आ खडी होती हैं .अक्सर अपने बच्चे से मैं उसकी चॉकलेट की जिद या किसी और चीज़ के लिए जिद करते समय  उसे यही समझाता हूँ कि लालच बुरी बात है .एक  चॉकलेट  ही मिलेगी ज्यादा नहीं . मेरा बेटा शायद मेरे कहे को ज्यादा बड़े अर्थों में गुण रहा था .एक दिन उसने कहा पापा ,आप मुझसे ये क्यों कहते हैं कि लालच बुरी बात है .मुझे ज्यादा नंबर लाने का लालच है , तो क्या यह बुरा है ? मुझे स्पोर्ट्स में ट्राफी जीतने का लालच है, तो क्या यह गलत है ? मुझे लालच है कि मैं आपके साथ ज्यादा वक्त बिताऊं क्या यह गलत है ? बेटा अपनी बात कह चुका था और मैं उलझन में पड़ गया था .अब कहानी में यही थोडा सा ट्विस्ट है हमें बचपन से बताया जाता है कि लालच करना बुरी बात है जितनी चादर है उतना ही पैर पसारना चाहिए ये कहावतें आपने भी सुनी होगीं लेकिन जब हम हैं नए तो अंदाज़ क्यों हो पुराना तो आइये इस लालच के फलसफे को समझने की कोशिश की जाए.
बात थोड़ी पुरानी है एक जंगल में एक आदमी रहता था न पास में कपडा न ही रहने को मकान लेकिन उसके पास एक दिमाग था जो सोचता था समझता था उसने सोचा क्यों न उसके पास रहने को एक ऐसी जगह हो जहाँ उसे बारिश में भीगना न पड़े ठण्ड में ठिठुरना न पड़े और गर्मी भी कम लगे अब आप सोच रहे होंगे कि ये बात उसके दिमाग में आयी कहाँ से अब जंगल में रह रहा था तो जरुर उसने पक्षियों के घोंसले को देखा होगा खैर यहीं से मानव सभ्यता  का इतिहास बदल जाता है. इंसान ने अपने लिए पहले घर बनाया और फिर अपनी जरुरत के हिसाब से चीज़ों का आविष्कार होता गया .बैलगाडी से शुरू हुआ सफ़र हवाई जहाज़ तक पहुँच गया . कबूतर से चिठियों को पहुंचाने की शुरुवात हुई और आज ई मेल का जमाना है .बगल की बंटी की दुकान आज शॉपिंग मॉल्स  में तब्दील हो गयी ,घर के धोबी की जगह कब वाशिंग मशीन आ गयी हमें पता ही नहीं चला .लेकिन इन सब परिवर्तन में एक बात कॉमन है वो है लालच , लालच जीवन को बेहतर बनाने का, लालच जिन्दगी को खूबसूरत बनाने का ,लालच खुशियाँ मनाने का ,लालच आने वाले कल को बेहतर बनाने का. आप भी सोच रहे होंगे कि ये कौन सी उल्टी गंगा बहाई जा रही है लालच अच्छा भी होता है. लालच अगर अच्छा न होता तो हम ज्यादा का इरादा कैसे कर पाते, कैसे और ज्यादा विश करते . जब इरादा है और विश भी तो आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है . सचमुच आज सारी प्रोग्रेस सारी ग्रोथ लालच यानि और ज्यादा पाने की तम्मना से जुडी है थोडा और विश करो का फंडा ही तो हमें आगे ले जता है.लालच अगर अच्छा न होता तो हम ज्यादा का इरादा कैसे कर पाते कैसे और ज्यादा विश करते .अब तो मुझे लगने लगा है कि सारी दुनिया की तरक्की विज्ञानं के नए आविष्कार सब लालच का ही नतीजा हैं. सैचुरेशन पॉइंट से उठाकर आगे ले जाने का काम करता है हमारा लालच . एजुकेशन पीरीयड हो या जॉब टाइम हमारा लालच ही हमें आगे ले जाने को प्रेरित करता है .
अब जबकि लालच के इस पक्ष से सामना हुआ है तो मेरे मन में भी न जाने कैसे कैसे लालच पनपने लगे हैं .लालच इस दुनिया को हिंसा से मुक्त करने का शांति की बात को किताबों और भाषणों से निकाल कर सारी दुनिया में गूंजा देने का .आम आदमी को खास आदमी बना देने का लालच .एजूकेशन , हेल्थ रोजगार जैसी बेसिक चीज़ों को हर किसी के लिए उपलब्ध कराने का लालच वह भी बिना किसी ज्यादा मशक्कत के , करप्शन से मुक्ति का लालच .
अरे अरे मेरे लालच की लिस्ट तो बढ़ती ही जा रही है .यहीं रोकता हूँ इस लिस्ट को .लेकिन इतना जरूर है कि अब मैं अपने बेटे से यह नहीं कहूँगा कि लालच मत करो.बेटा खूब लालच करो और हर लालच के लिए जिद करो .उसे पूरा करो .बस यह लालच आशावादी सोच के साथ हो. तो अब आपका क्या ख्याल है लालच के बारे में .
आई नेक्स्ट में २३ अक्टूबर को प्रकशित

Monday, September 7, 2009

धुन जो साथ चले



कहते है, कभी कभी कोई गीत, सुबह सुबह आप सुन ले तो वो गीत आपके जहन पर पूरा दिन रहता है। हम  सारा दिन वो गीत, गाते गुनगुनाते रहते है। लेकिन उन गीतों का क्या,जिनके बोलों का कोई सीधा अर्थ नहीं निकलता फिर भी वो हमारी जबान पर चढ़ जाते हैं अगर ऐसा नहीं है तो गीतों से होने वाले संचार का कोई मतलब नहीं रहेगा आज गीतों की कहानी में थोडा ट्विस्ट है. वाकई ये गानों की दुनिया एकदम निराली है क्या आपने कभी सुना है कि किसी शब्द का कोई अर्थ न हो फिर भी गानों में उनका इस्तेमाल होता है चकरा गए न. मै कोई पहेली नहीं बुझा रहा हूँ आपने कई ऐसे गाने सुने होंगे जिनके कुछ बोलों का कोई मतलब नहीं होता है लेकिन गानों के लिये बोल जरुरी होते हैं किशोर कुमार की आवाज़ में ये गाना याद करिए ईना मीना डीका ,डाई डम नीका किसी शब्द का मतलब समझ में आया ?फिर भी ऐसे गाने जब भी बजते हैं हमारे कदम थिरकने लगते हैं. अब इस तरह के गानों से कम से कम ये तो सबक मिलता है कि इस जिन्दगी में कोई चीज़ बेकार नहीं बस इस्तेमाल करने का तरीका आना चाहिए वैसे भी क्रियेटिविटी का पहला रूल है हर विचार अच्छा होता है और ये हमारे गीतकारों की क्रियेटिविटी ही है कि वो गानों के साथ लगातार प्रयोग करते आये हैं.कभी धुन को शब्दों में ढाल देते हैं और कभी ऐसे शब्दों को गीत में डाल देते हैं कि हम गुनगुना उठते हैं अई ईया सुकू सुकू (फिल्म:जंगली ) ताजातरीन फिल्म कमीने का ढेन टणेन धुन को शब्द बनाने का बेहतरीन प्रयास है फ़िल्मी गानों के ग्लोबल होने का कारण शायद गीतकारों की प्रयोगधर्मिता ही है.” इस तरह के गानों के शब्दों का अर्थ भले ही न हो लेकिन ये सन्देश देने में तो सफल रहते ही हैं डांस की मस्ती को "रम्भा हो हो हो"(अरमान ) जैसे गीतों से बेहतर नहीं समझा जा सकता है .राम लखन फिल्म का गाना नायक की अलमस्ती को कुछ ऐसे ही शब्दों में बयां कर रहा है "रम प् पम प् पम ए जी ओ जी करता हूँ जो मैं वो तुम भी करो जी असल में इस तरह के शब्दों का काम गानों की बोली में भावना को डालना होता है हम हवा को देख नहीं सकते सिर्फ महसूस कर सकते हैं .गीतकार जब भावनाओं को नए तरीके से महसूस कराना चाहता है तो वह इस तरह के शब्दों का सहारा लेता है लेकिन यह काम बगैर संगीतकार के सहयोग  के नहीं हो सकता है .जिन्दगी में भी अगर मेहनत सही दिशा में की जाए तभी सफल होती है और हर काम खुद नहीं करने की कोशिश करनी चाहिए.. अगर आप मेरी बात समझ रहे हैं तो सुनिए ये गाना "डम डम डिगा डिगा मौसम भीगा भीगा".जिन्दगी में कितना कुछ है जो हम महसूस कर सकते हैं लेकिन एक्सप्रेस नहीं कर सकते और इन फीलिंग्स को एक्सप्रेस करने के लिए जब इन अजाब गज़ब से शब्दों का सहारा लेकर कोई गीत रच दिया जाता है तो ये अर्थहीन शब्द भी मीनिंगफुल हो जाते हैं . छई छपा छई छपाक के छई पानीयों पर छींटे उडाती हुई लडकी (हु तु तु) पानी के साथ खेल का इससे सुन्दर बयान क्या हो सकता है .गानों में इस तरह के प्रयोग की शुरुवात जंगली फिल्म से हुई .आप भी अभी तक याहू को नहीं भूले होंगे और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है .जिन्दगी भी तो कभी एक सी नहीं रहती ,गाने भी हमारी जिन्दगी के साथ बदलते रहे .आज की इस लगातार सिकुड़ती दुनिया में जहाँ एस ऍम एस भाषा के नए व्याकरण को बना रहा है .ऐसे में अगर गाने शब्दों की पारंपरिक दुनिया से निकल कर भावनाओं की दुनिया में पहुँच रहे हैं तो क्यों न गानों की इस बदलती दुनिया का जश्न मनाया जाए क्योंकि ये अजाब गज़ब गाने अब हमारी जिन्दगी का हिस्सा हैं.
आई नेक्स्ट में ७ सितम्बर २००९ को प्रकाशित

Monday, August 17, 2009

नो कन्फयूजन ओनली फ्यूजन



मै एक विज्ञापन  देख रहा था जिसमे घर में काम करने वाली एक महिला अंग्रेजी राइम गा रही और उसे देख कर उसका मालिक आश्चर्य चकित रह जाता है वाकई अंग्रेजी ग्लोबल तो थी ही अब लोकल भी होती जाती रही है शायद आपको समझ नहीं आया अंग्रेजी को अपनी भाषा के साथ जोड़ दीजिये और फिर देखिये लोकल होने का मज़ा हिंगलिश ऐसी ही तो बनी है अंग्रेजी और हिंदी का मिक्सचर ,आज का यांगिस्तानी हिंगलिश प्रेमी है अब यह अच्छा है या बुरा इसका फैसला भाषाकारों पर छोड़ दिया जाए . आप भी सोच रहे होंगे हमेशा गानों की बात करने वाला शख्स आज क्या मुश्किल बात कर रहा है . मै बिलकुल सिंपल बात करूँगा गानों की और फिल्मों की ये तो सिर्फ बैक ग्राउंड तैयार कर रहा था यानि आज बात होगी ऐसे हिंदी गानों की जो अंग्रेजी शब्दवाली रखते हैं.वैसे तो किसी हिंदी फिल्म में पहली बार अंग्रेजी गाना जूली फिल्म मै आया "माय हार्ट इस बीटिंग "लेकिन उसके बहुत पहले १९४७ में शेहनाई फिल्म में इस तरह के प्रयोग की शुरुवात हो चुकी थी जिसका गाना था "आना मेरी जान सन्डे के सन्डे " नमक हलाल फिल्म मे अमिताभ बचचन द्वारा बोली गयी अंग्रेजी को लोग आज भी याद करते हैं इसी कड़ी में "अमर अकबर एंथोनी " फिल्म का गाना माय नेम इस एंथोनी गोंसाल्विस आज भी लोगों को थिरकने पर मजबूर कर देता है. हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग सत्तर के दशक बाद बढा तब अंग्रेजी भाषा के एक दो शब्द ही प्रयोग  किये जाते लेकिन आज पूरे पूरे वाक्य यूज  किये जा रहे हैं .आई लव यू से शुरू हुआ  यह प्रयोग आज "मूव योउर बॉडी टूनाइट" (जॉनी  गद्दार ) तक पहुँच गया है. हिंदी और अंग्रेजी का ये फ्यूसन सिर्फ गानों तक सीमित नहीं है हिंदी फिल्में अगर आज ग्लोबल हो रही है तो इनके पीछे कहीं न कहीं भाषा का ये फ्यूसन जिम्मेदार  है. ये सिर्फ किस्मत कनेक्शन नहीं है हिंदी गाने इसीलिए खास रहे हैं क्योंकि वे अपने वक्त की भाषा को रिप्रेजेंट  करते हैं. आज हम डेली लाइफ मैं अंग्रेजी का यूज  ज्यादा कर रहे हैं उसका रिफ्लेक्शन  गानों मे भी दिख रहा है. यह भी सच है कि हिंदी के प्रति कोई प्रेम नहीं होने के बावजूद गीत-संगीत के कारण अनेक गैर हिंदी लोगों ने हिंदी सीखी है, तो फिर हम हिंदी भाषी क्यों इस ग्लोबल भाषा को सीखने में पीछे रहें .गानों का ये फ्यूसन नए अवसर लेकर आया है जिन्हें हिंदी आती है वे अंग्रेजी सीखें और जिन्हें अंग्रेजी आती है वे हिंदी सीखें . जरा 'टशन' का वो गाना याद कीजिए, 'वेरी हैप्पी इन माई हार्ट, दिल चांस मारे रे' 'तुम्हरे दिल के थिएटर मा दिल दीवाना बुकिंग एडवांस मांगे रे' तो आपके सामने सारी तस्वीर साफ हो जाएगी. 'आजकल गाने बोलचाल की भाषा में लिखे जाते हैं.अब देखिये न जिस डिस्को की शुरुवात बप्पी दा ने की थी "आई ऍम अ डिस्को डांसर " (डिस्को डांसर ) से की थी वो दौर अब और आगे बढ़ निकला है "इट्स टाइम टू डिस्को " (कल हो न हो ) अब अगर आज का यांगिस्तानी भाषा के इस फ्यूसन का लुत्फ उठा रहा है तो हम यही पूछेंगे न "व्हेयर इस दा पार्टी टू नाईट" (कभी अलविदा न कहना )पर इसका मतलब ये बिलकुल मत निकालिएगा दोस्तों की मैं हिंदी के खिलाफ हूँ किसी भी भाषा का विकास किसी दूसरी भाषा की कीमत पर नहीं होना चाहिए ऐसे में अगर दो भाषाएँ करीब आ रही हैं तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. भाषा एक बहती नदी है इसे बाँधा नहीं जा सकता और भाषा का विकास ऐसे ही होता आया है. सोचिये न हम कितने शब्द ऐसे बोलते हैं जो मूल रूप से हिंदी के नहीं हैं पर अब वो ऐसे अपना लिए गए हैं कि लगता है की वे हिंदी के ही शब्द हैं और यही तो हिंदी का कमाल है हिंदी को आगे बढ़ाने में जितना काम फिल्मों और गानों ने किया है उतना और कोई नहीं कर सकता तो फिर क्यों न हिंदी की सफलता का जश्न मनाया जाए . फिल्मों के सहारे ही सही हिंदी ग्लोबल तो हो रही है. "इट्स राकिंग" (क्या लव स्टोरी है )और फिर हमें ये भी तो नहीं भूलना चाहिए "ईस्ट और वेस्ट इंडिया इस दा बेस्ट" (जुड़वां)
आई नेक्स्ट में १७ अगस्त को प्रकाशित

Wednesday, July 1, 2009

कुछ कहती है ये बूंदें


बारिश शुरू होते ही जो पहली चीज हमारे जेहन में आती है वो लहलहाते हरे भरे खेत ,पानी से भरे तालाब कहीं न कहीं हमारे मन के अन्दर बैठा बच्चा मचल पड़ता है उस गाँव  में जाने को जिसे हम सिर्फ फिल्मों में देखते हैं कंक्रीट  के जंगल में जहाँ वाटर क्रायसिस  अपने चरम पर है , हम अपनी जिन्दगी में इतने उलझ चुके हैं कि  अगल बगल क्या हो रहा है कौन रहता है . शोले फिल्म के संवाद की तरह हमें कुछ नहीं पता ,कुछ भी नहीं पता. गाँव  हम शहर में पले बढे लोगों के लिए अब सिर्फ बचपन की यादों में बचा है. जब गर्मियां की छुट्टियाँ शुरू होते ही दादी बाबा या नाना नानी के यहाँ जाने की तैयारियां शुरू हो जातीथीं.देखा  आपका भी दिल मचल पड़ा गाँव  जाने के लिए गाँव और शहर के इस अंतर को मुन्नवर राणा साहब की ये पंक्तियाँ बखूबी बयां करती हैं
               “तुम्हारे शहर में सब मय्यत को भी कन्धा नहीं देते
                 हमारे गावं में छप्पर भी सब मिलकर उठाते हैं
अब किया क्या जाये ख़तम होते गाँव और बढ़ते शहरों को देखकर परेशान होया जाये और विकास के पहिये को रोक दिया जाए या  गाँव और शहर के बीच बढ़ते अंतर को पाटा जाए .पर ये होगा कैसे . आजकल ग्लोबल विलेज की बात होती है न की ग्लोबल सिटी या या ग्लोबल टाऊन मशहूर संचार साइंटिस्ट मार्शल मक्लुहान का मानना था कि एक दिन दुनिया संचार के मामले में एक  गाँव  जितनी छोटी हो जायेगी और ऐसा हो भी रहा है इसीलिए  गाँव  में पता खोजना उतना मुश्किल नहीं होता क्योंकि वहां सभी एक दूसरे से परिचित होते हैं.तो इन बरसते बादलों के बीच मेरे मन में कुछ विचार बरस पड़े अगर हम कुछ ऐसा कर पाते कि शहरों में भी  गाँव की खासियतें ले आ पाते तो आम के आम गुठलियों के भी दाम वाली बात हो जाती इसके लिए हमें कुछ खास नहीं करना है बस हमें अपने नज़रिए को थोडा सा बदलना पड़ेगा ज्यादा नहीं अपने आस पास नज़र डालिए हमें पता ही नहीं रहता कि हमारे फ्लैट के बगल में कौन रहता है किसी के पर्सनल  स्पेस में घुसपैठ किये बगैर हम अपने अडोस पड़ोस के बारे में जानकारी रख सकते हैं ज्यादातर आतंकवादी हमले हमारी इस लापरवाही से होते हैं कि हमें पता ही नहीं होता कि हमारे आस पास क्या हो रहा है .हम लोगों के सुख दुःख में शामिल होंगे तो कभी अपने आपको अकेला नहीं पायेंगे भूल गए क्या बहुत साल पहले अरस्तु कह कर गए हैं कि इंसान एक सामजिक प्राणी है .  गावं  इसीलिए अच्छे हैं क्योंकि वो ज्यादातर नेचर पर डिपेंडेंट   हैं पर शहर में हम कुछ ऐसा नहीं कर पाए जब लाइट चली जाती है और ए सी काम करना बंद कर देता है तब हमें हवा की कमी का एहसास होता है अगर ए सी को जरूरत के वक्त ही चलाये जाए तो बिजली भी बचेगी और हम नेचर से भी जुड़े रहेंगे .पेड़ लगाने के लिए जमीन की जरूरत होती है और जमीन ऐसी नहीं है कोई बात नहीं २-४ गमले तो लगाये जा सकते हैं. बारिश का पानी यूँ ही नालियों में बह जाता है और जमीन का वाटर लेवल लो होता जा रहा है अब अगर आपको घर के बाथरूम में ट्यूब वेल के पानी का मज़ा लेना है तो पानी तो बचाना ही पड़ेगा जरा सोचिये अगर हमें शहर में ही  गावं  का मज़ा मिलने लग जाए तो शहर और  गावं  का अंतर मिट जाएगा और विकास का फल सभी को मिलेगा तो सोच क्या रह रहे हैं आइये शहरों और गांवों के बीच इस दूरी को खत्म किया जाए और ग्लोबल विलेज को रियल सेंस में ग्लोबल कर दिया जाए .
आई नेक्स्ट में १ जुलाई को प्रकाशित


Tuesday, June 2, 2009

मन ये बावरा नहीं


यूँ तो मै हर बार आपके सामने जिन्दगी के एक नए रंग के साथ आता हूँ पर आज की बात कुछ अलग है गर्मी अपने पूरे शबाब पर है बारिश बस आने को है और ऐसे ही मौसम की एक शाम को जब मै कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था अचानक जिन्दगी के कुछ खट्टे मीठे पल दिल के किसी कोने से निकल पड़े और मुझे बीती यादों मे ले गए और मेरा मन उड़ चला बिन पंखों के... जी हाँ ये मन ही तो है जो कभी ज्यादा का इरादा करता है तो कभी कहता है जी लो जी भर के, ये आवाज़ हमारे अन्दर से आती हैहमसे बहुत कुछ कहती है और बस मैंने सोचा क्यों न आज मन की बातें मन से की जाएँ .मन है तभी सोच है और आज का यंगिस्तानी  जो सोचता है वही बोलता है और यहीं थोड़ी सी प्रॉब्लम होती है जिसे हम जेनरेशन गैप कहते हैं वो गाना है न मैं करता रहा औरों की कही मेरे बात मेरे मन मे ही रही . वो वक्त दूसरा था जब लोग अपनी खुशियों को मार कर अपने घर परिवार के लिए सब कुछ किया करते थे इतने पर तो ठीक था लेकिन समय बीत जाने के बाद उन्हें अपने किये गए सेकरीफाइसेस पर स्ट्रेस ज्यादा होता था क्योंकि वो लोग कहीं आगे निकल चुके होते थे जिनकी मदद की गयी थी .आज टाइम बदल गया है लोग ३० साल में घर और गाडी के मालिक बन जाते हैं. अवसर भी है और उन्हें पाने का मौका भी ऐसे में अगर खुशियाँ मनाने का मौका है तो बिलकुल उन खुशियों के लिए अपने मन के दरवाजे खोल, दीजिये मत परवाह कीजिये लोक लाज और समाज की बंदिशों की आज के युवाओं की यही सोच है.इंसान जितना बड़ा प्लाट खरीदता है उस पर उतना बड़ा मकान नहीं बनाता ,कुछ जगह बागीचे के लिए छोड़ देता है जितना बड़ा मकान बनाता है उस पर उतना बड़ा दरवाजा नहीं बनाता ,जितना बड़ा दरवाज़ा लगाता है उसका ताला उतना बड़ा नहीं होता और जितना बड़ा ताला होता है उसकी उतनी बड़ी चाभी नहीं होती लेकिन मकान का कण्ट्रोल चाभी पर ही होता है बात सीधी है अब सोचिये न इस छोटे से मन पर कितना ज्यादा बोझ होता है रिश्तों का समाज का और न जाने क्या -क्या . तो इस पर बंदिश लगा कर क्यों हम इसे बाँधने की कोशिश करते हैं . और यही प्रॉब्लम है जेनरेशन गैप से होने वाले कंफ्लिक्ट की परेंट्स अपने बच्चों को अपने टाइम के हिसाब से बनाना चाहते हैं लेकिन मोबाइल और इन्टरनेट के इस युग में जहाँ दुनिया हर पल बदल रही है हम अपने मन की सोच अपने बच्चों पर थोप नहीं सकते हैं आखिर उनके पास भी एक प्यारा सा मन है जो उड़ना चाहता है कुछ करना चाहता है . ऐसे में हम अगर चीज पर बंदिश लगायें कि तुम ये करो ये न करो नहीं तो बिगड़ जाओगे ये ठीक नहीं होगा जिस चीज को जितना दबाया जाता है वो उतने ही वेग से ऊपर उठती है कहीं बचपन में पढ़ा था लेकिन बात थी एकदम सोलह आने सच . रोग को छुपायेंगे तो वो और फैलेगा तो बेहतरी इसमें है कि हम अच्छे और बुरे का फर्क उन्हें समझा दें और फैसला उन पर छोड़ दें क्योंकि जिन्दगी उनकी है और इसका फैसला भी उन्हें पर छोड़ दें अगर ऐसा हो गया तो किसी को भी अपने मन को नहीं मरना पड़ेगा और जेनरेशन गैप की प्रॉब्लम सोल्व हो जायेगी. जरा सोचिये अगर साहित्यकार , फिल्मकार ,कलाकार जैसे लोग अपने मन की न सुन रहे होते तो क्या आज हम यहाँ होते क्योंकि सोसाइटी किसी भी चेंज को आसानी से एक्सेप्ट  नहीं करती. मन की बातें मन ही जानता है और इन बातों को समझने के लिए जरूरी है कि अपने मन को और अपने आस पास के लोगों को ऐसा एत्मोस्फीर दिया जाए कि उनका मन उड़ सके सोच सके.मन की बातें मन ही जानता है और इन बातों को समझने के लिए जरूरी है कि अपने मन को और अपने आस पास के लोगों को ऐसा एटमोस्फीयर दिया जाए कि उनका मन उड़ सके सोच सके .मेरे पिता जी कहा करते हैं शरीर को जितना कष्ट दोगे वो उतना ही स्वस्थ रहेगा नहीं तो आलसी हो जाएगा यही फलसफा हमारे मन पर भी लागू होती है अगर वो सोचेगा नहीं तो हम काम करने के लिए न तो खुद मोटिवेट होंगे और न दूसरों को कर पायेंगे यानि दूसरों के मन को भी उड़ने दीजिये और फिर देखिये दुनिया होगी मुट्ठी में।
आई नेक्स्ट में २ जून को प्रकाशित

Sunday, May 24, 2009

मेरी बात




मानवाधिकार शब्द से सही मायने मेरा परिचय १९९३ के वियना सम्मेलन और समाचार पत्रों में हुई उसकी कवरेज़ से हुआ और जैसा की हर हिन्दुस्तानी के साथ होता है मुझे भी हुआ इसके बारे में और जानने की जिज्ञासा हुई बात अधिकारों की जो ठहरी लेकिन इस शब्द की गंभीरता का एहसास और अधिकारों के साथ कर्त्यों का ज्ञान जिन्दगी ,समय और अध्ययन ने सिखा दिया लेकिन बात इतनी आसान नहीं है जितनी लग रही है मानवाधिकारों की अवधारणा पूर्णता नयी अवधारणा है जिसकी जड़ें कहीं न कहीं औधोगिक क्रांति और शिक्षा के प्रसार में हैं और जैसे जैसे दुनिया बदलती गयी मानवाधिकारों का दायरा भी बदलता गया लेकिन इतनी चीज़ों के बदलाव के बाद भी एक चीज़ जो नहीं बदली है वह है आदर्श मानवाधिकारों की प्राप्ति यह जितनी दुर्लभ १० दिसम्बर १९४८ को थी उतनी ही आज भी है जबकि हम आज ये दावा करते हैं की हम एक सभ्य समाज में रह रहे हैं लेकिन हकीकत क्या है यह कोई भी संवेदनशील इंसान कम से कम भारत में नज़र उठा कर देख सकता है. साल २००८ आदर्श मानवाधिकारों के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण वर्ष रहा है जब सारी दुनिया ने मानवाधिकारों की उदघोषणा के ६० साल मनाये और पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने का सपना फिर देखा गया लेकिन सपने तो सपने हैं फिर भी हम सपने देखना नहीं छोड़ते हैं क्योंकि ये सपने ही हैं जो हमें दुनिया को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं मानवाधिकार और मीडिया नामक यह कृति मेरे द्वारा देखे गए एक सपने का ही परिणाम है कि “जियो और जीनो दो” आज की इस ग्लोबल दुनिया में जहाँ सूचना ही शक्ति है वहां मीडिया की ताकत को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है और एक नए मीडिया युग से हम रूबरू होने के लिए तैयार हो रहे हैं भारत भी कोई अपवाद नहीं है इतनी गंभीर आर्थिक विषमताएं साथ लेकर भी ये देश आगे बढ़ रहा है एक तरफ टाटा अम्बानी और बिरला जैसे व्यवसायिक घराने हैं वहीँ देश की आधी से ज्यादा जनसँख्या सिर्फ एक वक्त का खाना खाती है जहाँ भ्रष्टाचार धीरे धीरे सामाजिक शिष्टाचार में तब्दील हो रहा है.
आइये थोडा पीछे चलते हैं और मानवाधिकार की प्रष्ठभूमि पर नज़र डालते हैं इंसानी सभ्यता के शुरुआत के समय से ही अर्थात जब मानव ने जंगली जीवन छोड़कर सामाजिक जीवन में कदम रखा तब से ही प्राकृतिक रूप से उसने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के दायरे बना लिए.धीरे धीरे सामाजिक जीवन का विस्तार हुआ,समाज ने एक व्यवस्थित आकार लेना शुरू किया तो, कुछ कायदे क़ानून भी बन गए,जिनके अनुसार कुछ काम करना अनिवार्य हो गए तो वहीँ कुछ काम को सामाजिक द्रष्टि से गलत ठहरा दिया गया. देश बदला दुनिया बदली और हमारे अधिकारों में भी बढ़ोतरी होती गयी लेकिन मानवाधिकार इस मायने में महतवपूर्ण हैं की मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार कोई अधिकार बगैर किसी जाति मज़हब रंग नस्ल से परे प्रदान किये गए . मनुष्य जैसे-जैसे सभ्यता की ऊँचाइयाँ हासिल करता जा रहा है, खेद का विषय है कि वैसे-वैसे ही बर्बरता के शिखर भी लाँघता जा रहा है। सारी दुनिया आज आतंक के साए तले जी रही है। खाड़ी देशों में तेल के कारण युद्ध है तो फिलिस्तीन में नस्ल के नाम पर युद्ध है। भारत और उसके पड़ोसी देश तरह-तरह की हिंसा से ग्रस्त हैं। इस सब में जाने कितने बच्चे बेघर होते हैं, जाने कितने बुजुर्ग बुढ़ापे के दर्द को झेलते हुए राहत शिविरों में वक्त काटने को मजबूर होते हैं। जाने कितने निर्दोष जन जेल और यातना शिविर में ठूँस दिए जाते हैं और न जाने कितनी औरतों की आबरू लड़ाई के बीचोबीच चिथड़े-चिथड़े कर दी जाती है। कुल मिलाकर हर ओर मनुष्य के जीने और रहने के मूलभूत अधिकारों का हनन होता दिखाई दे रहा है।ये तो कुछ बड़ी बातें हो गयी लेकिन हमारे दैनिक जीवन में प्रति दिन मानवाधिकारों का हनन होता है लेकिन हम उन्हें नज़रंदाज़ कर देते हैं लड़कियों को छेड़ा जाना या गालियाँ देना कुछ ऐसा ही मामला है लडकियां जहाँ इसे अपनी नियति मान चुकी हैं वहीँ इस पुरुष प्रधान दुनिया में हमने सब चलता है वाला रवेया अपना लिया है . ऐसा प्रतीत होने लगा है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस नए युग में यद्यपि मनुष्य दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने के अभियान में सफल होता दिखाई दे रहा है, तथापि उसकी मुट्ठी से उसके अपने जीवन के अधिकार छूटते जा रहे हैं।इसमें पुरुष महिलाएं बच्चे और बूढे सभी शामिल हैं इस २१ वीं शताब्दी की दुनिया में हर तीसरी महिला हिंसा वो चाहे घरेलू हो या सामजिक का शिकार हैं और प्रतारणा भरा जीवन जीने को मजबूर हैं .एच आई वी /ऐड्स के मरीज़ बड़ी संख्या में अकेलापन ,सामाजिक बहिष्कार जैसी यातनाओं को सहने के लिए मजबूर हैं .नन्हे बच्चों के कदम चलना सीखते ही मजदूर बना दिए जाते हैं और शिक्षा स्वास्थय और सही पालन पोषण के अधिकार से महरूम कर दिए जाते हैं . यही कारण है कि दुनिया भर में आज मानवाधिकारों के संरक्षण की चिंता बढ़ गई है। ऐसे में मुझे निर्मला पुतुल जी की ये पंक्तियाँ काफी सार्थक लगती हैं




मैं चाहती हूँ
आँख रहते अंधे आदमी की
आँख बनें मेरे शब्द
उनकी ज़ुबान बनें
जो जुबान रहते गूँगे बने
देख रहे हैं तमाशा
चाहती हूँ मैं
नगाड़े की तरह बजें मेरे शब्द
और निकल पडें लोग
अपने अपने घरों से सडक पर।” (मैं चाहती हूँ)
मुझे काफी दुःख के साथ कहना पड़ रहा है की मै एक ऐसे राज्य से आता हूँ जो मानवाधिकारों के हनन के मामले मे नंबर वन है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल मानवाधिकार हनन के 94,559 मामलों में सिर्फ यूपी से 55,216 मामले आए। पूरे देश से आयोग को जो मामले मिले, उसका 58.39 फीसदी हिस्सा यूपी से था। दिल्ली से 5,616 मामले सामने आए। इसके बाद गुजरात (3,813) और बिहार (3,672) का स्थान है। फिर हरियाणा (3,483) और राजस्थान (2,640) का नंबर आता है। उत्तराखंड से भी 1,916 केस दर्ज हुए।ये एक बानगी है की हम किस दुनिया में रह रहे हैं इस पुस्तक को लिखते वक्त एक बात मुझे हमेंशा कचोटती रही कि हम किस मुंह से एक सभ्य समाज मे रहने का दावा कर रहे हैं कयों हम दूसरो का हक़ मार कर आगे बढ़ना चाहते हैं क्या हम शांति से नहीं रह सकते हैं सोचो साथ क्या जाएगा के मंत्र का जाप करने वाला हिन्दुस्तानी क्यों अपनी कथनी और करनी में भेद करता है. मेरी इस पीडा को ये पंक्तियाँ बेहतर ढंग से व्यक्त करती हैं
“सैर करने निकला तो दिल में ये अरमान थे
एक तरफ हसीं दुनिया एक तरफ शमसान थे
चलते चलते एक हड्डी पर पैर पड़ा
हड्डी के बयां थे ओ जाने वाले जरा देख कर चल
हम भी कभी इंसान थे”
मानवाधिकारों के आदर्श की प्राप्ति तभी संभव है जब हम अपने इस दूहरे मापदंड को नहीं बदलेंगे. इस काम को मीडिया या जन माध्यमों के सहयोग किया जा सकता है एक पत्रकार होने के नाते मैं इसकी ताकत और सीमाओं को बेहतर समझ सकता है वैसे आज मीडिया को गरियाने का एक फैशन चल पड़ा है और हर आदमी इस बहती गंगा में डुबकी मार कर अपना परलोक सुधार लेना चाहता है मै इसको बुरा भी नहीं मानता कोई भी चीज़ आलोचना से परे नहीं हो सकती और मीडिया भी कोई अपवाद नहीं लेकिन "गलती अगर रुलाती है तो राह भी नयी दिखाती है " मीडिया एक वक्त में जहाँ पी एच डी डिग्री धारी को संबोधित कर रहा होता है तो उसी वक्त कोई पांचवी पास से तेज़ भी उसे देख /पढ़/सुन रहा होता है ऐसे में एक विशिस्ट स्तर को बनाये रखना मुश्किल होता है यही मीडिया की ताकत भी है और कमजोरी भी मीडिया एक यन्त्र है जिसे हमारे जैसे इंसान चलाते हैं जो भावनाओं संवेदनाओं और पुर्वग्रहो के पुतले हैं ये प्राणि इसी ग्रह के पुतले हैं किसी भी इंसान के समाजीकरण में उसका परिवार , स्कूल , उसकी शिक्षा और संस्कार अहम् भूमिका निभाते हैं जिससे उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है हर चैनल या अखबार बुरे नहीं हैं जैसा समाज में होता है कुछ अच्छे लोग हैं तो कुछ बुरे लोग भी हैं.
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा ये कोई साहित्यिक पंक्ति नहीं बल्कि एक हिंदी फिल्म का गाना है एक और बानगी देखिये हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेगे एक खेत नहीं एक बाग़ नहीं हम सारी दुनिया मांगेगे , इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा , "ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है "पर मजेदार बात ये है कि हमारा समाज हिंदी फिल्मों और उनके गानों को दोयम दर्जे का मानता है . ऐसे एक नहीं सैकडों उदाहरन मिल जायेंगे जिससे पता चलता है कि हमारा फिल्म मीडिया जागरूक और सज़ग है लेकिन कुछ जिम्मेदारी दर्शकों की भी बनती है मुझे वक्त फिल्म का एक संवाद याद आ रहा है “चिनॉय सेठ जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फैंकते जब जब लीक से हटकर भारतीय फिल्मकारों ने प्रयोग किये हैं उन्हें दर्शक नहीं मिले हैं . और ये तो आप सभी जानते हैं की भूखे पेट न होई हरि भजन गोपाला ऐसे वक्त में जब या तो हर जगह बाज़ार घुस गया है या पनप गया है वहां फिल्में सिर्फ समाज सेवा के लिए बनाई जाएँ कहीं से उचित नहीं लगता. फिल्में समाज का आइना होती हैं हर वक्त की फिल्में अपने वक्त के समाज का चित्रण करती हैं हाँ ये हो सकता है की प्रस्तुतीकरण में कल्पना की उडान थोड़ी लम्बी हो जाए पर कहीं न कहीं वो हमारे आस-पास ही होते हैं अमिताभ बच्चन का गुस्सैल चरित्र अपने वक्त के समाज का ही प्रतिनिधित्व कर रहा था जब लोग अपने आपको सरकारों द्वारा ठगे गए महसूस कर रहे थे.
चलिए बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी अब अखबारों की बात की जाए इसमें कोई शक नहीं है कि अखबारों की विश्वनीयता में कमी आयी है लेकिन अभी उन्हें गंभीर माध्यम का दर्जा हासिल है और मानवधिकारों की प्राप्ति में उनके द्वारा ही सर्वाधिक गंभीर प्रयास किये गए अभी भी अखबार की ख़बरों के आधार पर टी वी चैनेल खबरों से खेलते हैं लेकिन अखबार को पढने के लिए किसी का भी पढ़ा लिखा होना आवश्यक है ऐसे में अखबार माध्यम टी वी और फिल्म माध्यम से पिछड़ जाते हैं. कहते हैं अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे के पूरक हैं अपने कर्तव्यों को पूरा करते चलो अधिकार खुद बा खुद मिल जायेंगे लेकिन कर्तव्यों कि इतिश्री होने के बाद भी अधिकार न मिले तो जरुरत है जागने की और इस काम को बेहतर ढंग से मीडिया अंजाम दे रहा है चाहे वो उपभोक्ता अधिकारों के लिए "जागो ग्राहक जागो "अभियान हो या घरेलू हिंसा की रोकथाम के लिए "बेल बजाओ " अभियान हो.
लेकिन सब कुछ सरकार और मीडिया पर नहीं छोडा जा सकता है एक आजाद देश के नागरिक होने के नाते हमारा भी कुछ दायित्व बनता है ये होना चाहिए ये किया जाना चाहिए की मानसिकता को छोड़कर ये सोचा और किया जाए कि हम क्या कर सकते हैं हम मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिए किस तरह से योगदान दे सकते हैं .दुनिया को बेहतर बनाने की बात हो चुकी अब दुनिया को बदलने का वक्त है और बदलाव की इस गति को हमारे आपके जैसे ये छोटे प्रयास तेज़ कर सकते हैं लेकिन इसके लिए हमें अपनी कथनी और करनी के भेद को मिटाना होगा , हर हिन्दुस्तानी व्यवस्था से त्रस्त है परिस्थियों से परिचित भी और बदलाव भी चाहता है इसके लिए उसे एक भगत सिंह की जरूरत है लेकिन अपने घर मे नहीं पडोसी के घर में अगर ये मानसिकता रही तो मुझे इस स्थिति के लिए एक गीत की पंक्तियाँ याद आ रही हैं कसमे वादे प्यार वफ़ा बातें हैं बातों का क्या चलते -चलते एक आशा की किरण के साथ मैं अपनी बात ख़तम करता हूँ




राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नयी दिल्ली द्वारा आयोजित लेखक सम्मिल्लिन में दिया गया व्याख्यान (२१-२२ मई २००९ तीन मूर्ति भवन )

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