Monday, September 25, 2023

नाबालिगों के लिए इंटरनेट मीडिया पर सीमित पाबंदी

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 19 सितंबर को अपनी एक टिप्पणी में कहा अगर नौजवानों और विशेषकर स्कूल के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का प्रतिबंध लगा दिया जाए तो ये देश के लिए अच्छा होगा. इसके साथ ही कोर्ट ने सुझाव देते हुए ये भी कहा कि जिस उम्र में उन्हें वोट करने का अधिकार मिलता है तभी उन्हें सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने का मौका दिया जाना चाहिए. ये उम्र 21 या 18 हो सकती है| जस्टिस जी. नरेंद्र और जस्टिस विजयकुमार ए. पाटिल की खंडपीठ एक्स कॉर्प (पूर्व में ट्विटर) की अपील की सुनवाई कर रही थी. इसी दौरान ये टिप्पणी की गई. खंडपीड ने कहा, “स्कूल जाने वाले बच्चे सोशल मीडिया के आदी हो चुके हैं और ये देश के लिए अच्छा रहेगा कि उन पर पाबंदी लगाई जाए |लम्बे समय तक  स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का महत्वपूर्ण  हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों तक सब कुछ मौजूद है |

यह मोबाईल स्क्रीन अभिभावकों के लिए एक अंतहीन गुस्से का कारण बन रही है| एक तरफ बच्चे मोबाईल चाहते हैं दूसरी तरफ अभिभावक भले ही मोबाईल के लती बन चुके हैं और यह जानते हुए भी कि मोबाईल इंटरनेट में बहुत सी अच्छी चीजें बच्चों के लिए हैं, वे उन्हें देना भी चाहते हैं और नहीं भी ,यह सब मिलकर भारतीय घरों में  मानसिक द्वन्द का एक ऐसा वातावरण रच रहे हैं जिससे हर परिवार पीड़ित  है | हालांकि माध्यमों के चुनाव को लेकर भारतीय घरों में यह द्वन्द नया नहीं है पहले रेडियो सुनने फिर टीवी जब घर –घर पहुंचा तो ऐसा ही कुछ टेलीविजन के साथ हुआ कि टेलीविजन बच्चों को बिगाड़ देगा उन्हें ज्यादा टीवी नहीं देखना चाहिए ऐसी बहसें हर घर की कहानी हुआ करती थी पर मोबाईल स्क्रीन  की कहानी इन सब माध्यमों से अलग है |यह एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है जिसके साथ फोन और कैमरा लगा हुआ है जो हमारी जेब में आ जाता है या यूँ कहें यह हमें व्यस्त रहने के लिए उकसाता है और फिर हमारे व्याकुलता के स्तर को बढ़ाता है और अंत में हमें अपना लती (व्यसनी )बना देता है |

बच्चों के मामले में यह स्थिति और गंभीर होती है क्योंकि मोबाईल एक माध्यम के रूप में  ज्यादा व्यक्तिगत और मांग पर उपलब्ध कंटेंट प्रदान करता है जो अंतर वैयक्तिक सम्बन्धों की गतिशीलता  को प्रभावित करता है अतः इससे दूर हो पाना किसी के लिए भी मुश्किल होता है | विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, जहां एक साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन और लैपटॉप जैसे किसी भी उपकरण के संपर्क में नहीं रखा जाना चाहिए, वहीं एक से पांच साल तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम एक दिन में एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 6-14 साल के लिए, अधिकतम स्क्रीन समय प्रति दिन छह घंटे होना चाहिए, लेकिन केवल तभी जब बच्चे ने ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त की हो। अन्यथा, यह समय सीमा दो घंटे होनी चाहिए|एपलफोन  , माता-पिता को परिपक्व सामग्री तक पहुंच को प्रतिबंधित करने के लिए 'वयस्क वेबसाइटों को सीमित करें' विकल्प का चयन करने की भी अनुमति देता है। ये सीमाएं, जो गूगल के एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम का उपयोग करने वाले फोन पर भी मौजूद हैं, माता-पिता द्वारा एक पिन सेट करने पर निर्भर करती हैं जिसे केवल वे ही जानते हैं। कोलोरेडो विश्वविद्यालय,अमेरिका  के एक शोध में यह निष्कर्ष निकला है कि दुनिया के नब्बे प्रतिशत बच्चे (पांच साल से सत्रह साल की उम्र वाले )मोबाईल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं जिससे वे देर से सो रहे हैं और  उनकी नींद की गुणवत्ता  प्रभावित हो रही है नतीजा बच्चों की नींद और  एकाग्रता में कमी के रूप में सामने आता है|मोबाईल स्क्रीन से निकलने वाले  प्रकाश की  तरंग दैर्ध्य और गुणवत्ता,शरीर की आन्तरिक घड़ी और नींद लेने की प्रक्रिया पर असर डालती है जो शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को कम करता है यह हार्मोन ही हमारे शरीर को बताता है कि यह नींद लेने का समय है।स्क्रीन पहले की तुलना में लगातार छोटे होते जा रहे हैं इसलिए उनका इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर होता जा रहा है इसलिए बच्चों के लिए उनका इस्तेमाल ज्यादा आसान है जिस वक्त उन्हें सोना चाहिए वे मोबाईल पर वीडियो देख रहे होते हैं |

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बचपन और किशोरवस्था में अच्छी नींद का आना मोटापे के खतरे को कम करता है और बच्चों के संज्ञानात्मक व्यवहार को बेहतर करता है | इंटरनेट पर वीडियो देखे जाने की सुविधा का आगमन और अमेजन प्राईम वीडियो, नेट फ्लिक्स और यूट्यूब  जैसे वीडियो आधारित इंटरनेट चैनलों के आ जाने से स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय वीडियो कार्यक्रमों के लिए हमारी दिनचर्या का मोहताज नहीं रहा ,जब जिसको जैसे मौका मिले वो अपने मनपसन्द कार्यकर्मों का लुत्फ़ उठा सकता है,यह सुविधा अपने साथ कुछ समस्याएं भी ला रही है और इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं जो देर रात तक अपने मनपसन्द कार्यक्रम मोबाईल पर देख रहे हैं | यह अलग बात है कि हम मोबाईल स्क्रीन के मोह में ऐसे बंधे हैं कि इस बात पर गौर ही नहीं कर पा रहे हैं कि हमारे बच्चे भी मोबाईल स्क्रीन के चंगुल में फंसते  जा रहे हैं| जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है |भारत में इस माध्यम के इस्तेमाल का बहुत ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है |एक ही वक्त में माता –पिता और बच्चे साथ -साथ इसके प्रयोग से परिचित हो रहे हैं |

इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है और उसमें बच्चे भी शामिल हैं |मोबाईल स्क्रीन अब हमारे जीवन की सच्चाई है तो इससे काटकर हम अपने बच्चों को बड़ा नहीं कर पायेंगे तो इसके संतुलित इस्तेमाल का तरीका उन्हें सीखाया जाए उनकी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियों के खेल से लेकर पढने के अभ्यास तक का उचित सम्मिश्रण होना चाहिए |अब वक्त आ चुका है जब हमें तकनीक और उस पर उपलब्ध कंटेंट को अलग –अलग देखना सीखना होगा क्योंकि तकनीक कोई गलत या खराब नहीं होती उसके इस्तेमाल का तरीका सही या खराब होता है |जाहिर है जब माता –पिता का अपने बच्चों के साथ विश्वास का सम्बन्ध कायम  नहीं होगा तब तक वे  अपने बच्चों को मोबाईल के इस्तेमाल का सही तरीका नहीं सिखा पायेंगे|इस दिशा में इंटरनेट प्रदान करने वाली कम्पनियों को भी पहल करनी चाहिए जैसे कि सोते वक्त वाई-फाई राउटर अपने आप बंद हो जाए या उनमें चिल्ड्रेन मोड का एक विकल्प दिया जाए | इस तरह की व्यवस्था हो कि बच्चों द्वारा ज्यादा इस्तेमाल किये जा रहे एप रात में  न चले जैसे छोटे कदम बच्चों के मोबाईल इंटरनेट को व्यवस्थित कर सकते हैं |  

दैनिक जागरण में 25/09/2023 को प्रकाशित 

Thursday, September 21, 2023

भारत में बढ़ता डेटिंग एप का चलन

 

जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं | विवाह तय करने जैसी सामाजिक प्रक्रिया पहले परिवार और यहां तक कि खानदान के बड़े बुजुर्गोंमित्रोंरिश्तेदारों वगैरह को शामिल करते हुए आगे बढ़ती थीअब उसमें भी ‘’ लग गया है। 

मैट्रीमोनी वेबसाइट से शुरू हुआ ये सिलसिला अब डेटिंग एप्प्स तक पहुँच गया है । आम तौर पर इंटरनेट की सहायता से किसी सम्बन्ध  को बनाना एक विशुद्ध शहरी घटना माना जाता था और छोटे शहरों को इस प्रवृत्ति से दूर माना जाता था |इस सांस्कृतिक अवरोध के बावजूद डेटिंग का व्यवसाय भारत में तेजी से पैर पसार रहा है |इंटरनेट साईट स्टेटीस्टा के अनुसार इस समय देश में 38 मिलीयन लोग डेटिंग एप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और रेवेन्यु के हिसाब से यह संख्या विश्व में चीन और अमेरिका के बाद तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी संख्या है |ओनलाईन प्यार भारत में एक नयी परिघटना है साल 2013 से शादी कराने वाली वेबसाईटस सुर्ख़ियों में आना शुरू हुईं पर डेटिंग एप का ट्रेंड साल 2014 में टिंडर के आने के बाद शुरू हुआ और तबसे वैश्विक रूप से लोकप्रिय डेटिंग एपबम्ब्ल , हप्प्न , और हिन्ज देश में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं |जब से होमोसेक्सुअल्टी भारत में अपराध न रही “एलजीबीटीक्यू” समुदाय के लिए ग्रिंडर जैसे एप भी भारत आये पर बड़ी कम्पनियों में शामिल टिंडर और बम्ब्ल भी समान लिंगी साथियों के चुनाव की सुविधा भी देते हैं | देश की संस्कृतिक विविधता के हिसाब से सभी प्रचलित डेटिंग एप्स अंग्रेजी भाषा को ही प्रमुखता देते हैं , टिंडर ने हिन्दी भाषा में भी अपनी सेवा देनी शुरू कर दी है पर अभी भी अंग्रेज़ी का बोलबाला है जबकि देश की मात्र बारह प्रतिशत जनसंख्या ही अंग्रजी बोलती है |

जानकार मानते हैं कि भारत में भाषा की समस्या अब उतनी गंभीर डेटिंग एप के मामले में उतनी गंभीर नहीं क्योंकि लोग मोटे तौर पर यह जानते हैं कि एप चलता कैसे है जब संदेशों के आदान प्रदान की बात आती है तो लोग हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को रोमन में लिख लेते हैं |इन एप्स ने अपने भारतीय संस्करणों में भारतीयता को भी अपनाया है | सम्बन्ध बनाने में शादी की ही प्रधानता रही है और इसीलिये भारत में शादियाँ कराने वाली वेबसाईट्स तेजी से उभरी |देश की सबसे बड़ी शादी कराने वाली वेबसाईट मेट्रेमोनी डॉट कॉम के देश में पांच मिलीयन सक्रीय उपभोक्ता हैं | डेटिंग पूरी तरह से पश्चिमी अवधारणा है और जब ये विदेशी वेबसाईट्स भारत आयीं तो इन्हें दिक्कतों का सामना करना पडा इस स्थिति का मुकाबला करने में इन्होने अपनी रणनीति बदली जिसमें डेटिंग के सहारे ऐसे गंभीर सम्बन्ध विकसित करने पर जोर दिया गया जो शादी तक पहुंचें मतलब ऐसे एप्स अपनी एप्रोच में न तो डेटिंग जैसे कैजुवल रहें और न ही शादी कराने वाली वेबसाईट्स जैसे कठोर |सांस्कृतिक जतिलाताओं के कारण देश में डेटिंग एप्स को ज्यादा मान्यता नहीं दी जाती है पर जब छोटे शहरों में पले बढ़े लोग अपने शहरों  से बाहर निकले तो ये एप उनकी पसंद में शामिल हो गए पर वे अपने शहरों में इनका इस्तेमाल ज्यादा नहीं करते रहे हैं |विडम्बना यह हुई कि जब देश में लॉक डाउन लगा तो ये अलग –अलग जगहों पर बिखरे हुए लोग अपने घर लौट आये |

डेटिंग एप ट्रूली मैडली जो साल 2014 में बना उसके रेवन्यू में साल 2020 में दस गुना बढ़ोत्तरी उन शहरों से हुई जो देश के मेट्रोपोलिटन शहर नहीं थे और उसके कुल रेवन्यू में साल 2019 के मुकाबले चार गुना बढ़ोत्तरी हुई |सामाजिक रूप से देखेंतो जहां पहले शादी के केंद्र में लड़का और लड़की का परिवार रहा करता थाअब वह धुरी खिसककर लड़के व लड़की की इच्छा पर केंद्रित होती दिखती है। वर या वधू तलाशने का काम अब मैट्रीमोनिअल साइट व ऑनलाइन डेटिंग साइट कर रही हैं और वह भी बगैर किसी बिचौलिये के। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे पारदर्शिता आई है। कुछ और तथ्यों पर गौर किया जाना भी जरूरी है। इन एप्स  से बने रिश्तों  में धोखाधड़ी के कई मामले भी सामने आए हैं। दी गई जानकारी कितनी सही हैइसे जांचने का कोई तरीका ये एप्स उपलब्ध नहीं कराते। उनकी जिम्मेदारी लड़का-लड़की को मिलाने तक सीमित रहती है। हालांकिझूठ बोलकर शादी कर लेने में नया कुछ नहींपर इंटरनेट एप्स से बने रिश्तों  के पीछे कोई सामजिक दबाव नहीं काम करता और गड़बड़ी की स्थिति में आप किसी मध्यस्थ को दोष देने की स्थिति में भी नहीं होते। और न कोई ऐसा होता हैजो बिगड़ी बात को पटरी पर लाने में मदद करे।

प्रभात खबर में 21/09/2023 को प्रकाशित 

 

Wednesday, September 13, 2023

सिर चढ़कर बोल रहा है शोर्ट वीडियो का जादू

 इंटरनेट के आने से पहले की दुनिया में बदलाव की गति धीमी थी |नया देर से पुराना होता था पर अब यह प्रक्रिया इतनी तेज है कि नया  द्रुत गति से पुराना हो रहा है|सोशल मीडिया के आने के बाद लोगों ने अपनी बात कहने के लिए  ब्लॉग पोस्ट और तस्वीरों को जरिया  बनाया फिर वीडियो और आडियो कंटेंट की धूम मची पर तस्वीरें या फोटोग्राफ मांग में लगातार बने रहे |बात चाहे अपना जन्मदिन मनाते जोड़े की हो या दुनिया घूमती एक युवा लड़की की हर जगह तस्वीरें प्रमुखता से अपनी भूमिका निभा रही थी|ये तस्वीरों का ही कमाल  था|जिसने  मोबाइल से अपनी खुद की तस्वीरें लेने की कला सेल्फी को विकसित किया  और देखते -देखते सारी दुनिया में छा गयी|लेकिन  इंटरनेट पर रील्स की बढ़ती लोकप्रियता ने इन तस्वीरों   की लोकप्रियता को खत्म  तो नहीं पर कम जरुर कर दिया है|रील्स जैसा ही एक और प्रारूप इंटरनेट पर सुर्खियाँ बटोर रहा है |वह है "व्लॉगिंग"|ये  दो अलग-अलग डिजिटल मीडिया प्रारूप हैं जिनका उपयोग वीडियो सामग्री बनाने और साझा करने के लिए किया जाता है।जिनके कारण तस्वीरों की लोकप्रियता में कमी आ रही हैव्लॉगिंग का मतलब होता है कि व्यक्तिगत अनुभवोंज्ञानकलासाहित्ययात्राओं आदि को वीडियो के माध्यम से साझा करना।इनकी अवधि रील के मुकाबले ज्यादा होती है | रील्स एक प्रकार की वीडियो सामग्री है जो आमतौर पर एम् एक्स शोर्ट विडियोमौज ,जोश ,चिंगारी,मित्रों इन्स्टाग्राम,यूट्यूब और फेसबुक  जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर बनाई जाती है।हालाँकि  यह विभिन्न  विषयों पर छोटे-छोटे वीडियो होते हैं जिन्हें संगीतडायलॉग्सआदि के साथ तस्वीरों और क्लिप्स के साथ मिलाकर बनाया जाता है। रील में गति होती है जबकि तस्वीरों में अगर गति लानी भी  है तो रील्स का ही सहारा लेना पड़ेगा |सोशल इनसाइडर  के अनुसार रील्स इंस्टाग्राम पर किसी भी अन्य सामग्री प्रकार से दोगुनी पहुंच उत्पन्न करते हैं।रील्स की औसत पहुंच दर 30.81 प्रतिशत  हैजबकि कैरोसल  (ऐसी पोस्ट जिसमें एक से अधिक फ़ोटो या वीडियो हों , जिन्हें उपयोगकर्ता फ़ोन ऐप के माध्यम से पोस्ट पर स्वाइप करके देख सकते हैं। ) और फोटो  पोस्ट की औसत पहुंच दर क्रमशः 14.45 प्रतिशत  और 13.14प्रतिशत  है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 2022 और 2023 के बीच कैरोसल पोस्ट  की पहुंच दर में महत्वपूर्ण  गिरावट आई है।

स्टैटिस्टा की एक रिपोर्ट के अनुसारइन्स्टाग्राम  रील्स की पहुंच दर उन खातों के लिए कहीं अधिक है। जो कम फ़ॉलोअर्स रखते हैं500 फ़ॉलोअर तक के खातों की औसत पहुँच दर 892 प्रतिशत  होती है। हालांकि यह उन खातों की पहुँच दर से कई गुना जयादा  है जिनके पास ज्यादा  फ़ॉलोअर्स होते हैं,  पर बड़े खातों वालों के इन्स्टाग्राम  रील्स की पहुँच में  भी काफी महत्वपूर्ण वृद्धि देखी जा रही  है।

ये आंकड़े सुझाव देते हैं कि भारत में  फोटो ग्राफ    की तुलना में रील्स एक अधिक प्रभावी तरीका है जिससे भारत में जनसंचार करनेलोकप्रियता प्राप्त करने और जनों को परिवर्तित करने का सही तरीका है। डिमांड्सएज वेबसाईट के अनुसार 230.25 मिलियन इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताओं के साथभारत इंस्टाग्राम रील्स का सबसे बड़ा बाजार हैदूसरे नम्बर पर  अमेरिका (159.75 मिलियन) और तीसरे स्थान पट ब्राजील  (119.45 मिलियन) है।

रील्स के लोकप्रिय होने के कुछ कारण हैं. पहलावे स्थिर तस्वीरों की तुलना में अधिक आकर्षक हैंरील्स कहानियां बता सकती हैंगति दिखा सकती हैंऔर संगीत और ध्वनि प्रभाव जोड़ सकती हैंजो उन्हें दृश्य रूप से अधिक आकर्षक और देखने में दिलचस्प बना सकती हैंदूसरारील्स बनाने के लिए पहले से कहीं अधिक आसान हैंस्मार्टफोन और वीडियो संपादन ऐप्स के आगमन के साथकोई भी कुछ ही टैप के साथ एक रील बना सकता है. तीसरारील्स एक व्यापक दर्शकों तक पहुंचने का एक शानदार तरीका है. उन्हें इंस्टाग्राम यु ट्यूब शॉर्ट्स  जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर साझा किया जा सकता हैजिनके अरबों उपयोगकर्ता हैं|फिर भी स्थिर चित्रों का महत्त्व खत्म नहीं हुआ है |वे यादें कैद करने का एक अधिक स्थायी और कालातीत तरीका हैउन्हें घरों और व्यवसायों में मुद्रित और प्रदर्शित किया जा सकता हैजिन्हें कई  वर्षों तक संजोया जा सकता हैस्थिर तस्वीरें दूसरों से व्यक्तिगत तौर पर जुड़ने से  एक अधिक अंतरंग तरीका भी हैंजिनका उपयोग व्यक्तिगत कहानियां बताने और निजी क्षणों को साझा करने के लिए किया जा सकता हैउनका उपयोग विशेष अवसरोंयात्रा और रोजमर्रा की जिंदगी का दस्तावेजीकरण करने के लिए होता है|रील्स छोटे   मनोरंजक वीडियो साझा करने का एक शानदार तरीका है. जिनका उपयोग  अक्सर हास्यरचनात्मकता और व्यक्तित्व को प्रदर्शित करने के लिए होता हैइसलिएजबकि रील्स लोकप्रिय हो रहे हैंयह संभावना नहीं है कि वे पूरी तरह से स्थिर तस्वीरों को समाप्त कर देंगे | दोनों प्रारूपों की अपने ताकत और कमजोरियां हैंऔर वे आने वाले वर्षों में सह-अस्तित्व के साथ कितनी देर तक रह पायेंगे इसका फैसला होने में अभी वक्त है |

 नवभारत टाईम्स में 13/09/2023 को प्रकाशित 



साइबर अपराधियों का नया हथियार

 

जवान फिल्म के एक द्रश्य में एक शहर का ट्रैफिक बस एक क्लिक से बाधित कर दिया जाता है और लोगों की गाड़ियाँ आपस में लड़ जाती है|यह द्रश्य एक फ़िल्मी कल्पना नहीं बल्कि एक वास्तविकता है कि किसी भी कंप्यूटर नेटवर्क को कभी भी भेदा जा सकता है |लेकिन इसके लिए हमें प्रोफेशनल की जरुरत पड़ती |ए आई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के आने से प्रोफेशनल हैकर और शौकिया  हैकर के बीच का दायरा काफी सिमटा है और इंटरनेट का कोई भी दायरा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पहुँच से अब दूर नहीं रहा है |इन्हीं में से ताजा मामला फिशिंग ई मेल्स से जुड़ा है|फ़िशिंग एक प्रकार का कम्प्यूटरीकृत हमला है जिसका उपयोग अक्सर उपयोगकर्ता का डेटा चुराने के लिए किया जाता है| जिसमें लॉगिन क्रेडेंशियल और क्रेडिट कार्ड नंबर शामिल हैं। यह तब होता है| जब एक साइबर अपराधी या हैकर, एक विश्वसनीय संस्था का रूप धारण किये हुए लिंक को  किसी व्यक्ति के  ईमेल, व्हाट्स एप संदेश  या टेक्स्ट संदेश को  खोलने के लिए उकसाता  है।जैसे ही वह व्यक्ति ऐसा करता है उसकी गोपनीय जानकारियां या धन उस साइबर अपराधी या हैकर तक पहुँच जाता है | अमेरिका स्थित ईमेल सिक्योरिटी  कंपनी अब्नॉर्मल सिक्यूरिटी ने कहा कि उन्होंने अपने ग्राहकों के ई मेल में जनरेटिव एआई प्लेटफ़ॉर्मों से निर्मित  फिशिंग ईमेल देखे हैं। ये मेसेज  बहुत कुशलता  से बनाए गए हैं और एकदम असली  लगते हैं , जिससे उन्हें पहली नजर में पता लगाना कठिन होता है |कोई जब ऐसे ई मेल देखता है तो उसे कहीं से भी ऐसा नहीं लगता है कि यह एक फिशिंग हमला हो सकता है |

वर्षों से, फिशिंग ईमेल्स की पहचान के लिए लोगों को चेताया जाता रहा है कि सबसे पहले  इ मेल की भाषा देखें|अक्सर ये तरीका काम भी करता था |कॉर्पोरेट प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने कर्मचारियों को चेतावनी भी दी जाती  है कि वे फिशिंग ई मेल्स की पहचान के लिए वर्तनी की गलतियों, गलत  व्याकरण और अन्य त्रुटियों की खोज करने के लिए सतर्क रहें, जो ऐसे  लोगों के लिए सामान्य होती हैं जिनकी  अंग्रेजी संचार की पहली भाषा नहीं है या वे लोग कम पढ़े लिखे होते हैं ।लेकिन अब जनरेटिव एआई टूल्स, जिसमें ओपनएआई  का लोकप्रिय  चैटजीपीटी भी शामिल है, ऐसे ई मेल में  वर्तनी की गलतियों और अन्य त्रुटियों  को पलक झपकते ही  ठीक कर सकते हैं। इससे शौकिया हैकर्स के हाथों में भी, एआई अब एक प्रभावी खतरा बन गया है क्योंकि अब ऐसे फिशिंग ई मेल्स जनरेटिव एआई टूल्स की मदद से  निहायत ही व्यक्तिगत ई मेल बनाये जा सकते हैं |
सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल और अपनी निजता की परवाह न करने के कारण लोग अपनी बहुत सी जानकारियाँ इंटरनेट पर साझा करते रहते हैं |ऐसे में जिन लोगों को फिशिंग मेल्स किया जा रहा है| जनरेटिव एआई टूल्स  की मदद से उनके सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा का विश्लेषण करते हुए कुछ ही सेकंड में निहायत  व्यक्तिगत ईमेल बनाया जा सकता है |
यह  एक बड़े खतरे की आहट है |आपको अचानक एक ऐसा ई मेल दिखेगा जो आपकी पत्नी  या किसी करीबी दोस्त  से आ रहा है। उसके लिखने की शैली बात चीत के मुद्दे सब असली जैसे लगेंगे पर वे असली होंगे नहीं |वे ये जानते हैं कि आपका सबसे अच्छा दोस्त कौन है, और वो आपको कैसे मेल लिखता है | ऐसा इसलिए हो रहा है कि बड़े भाषा मॉडल्स जैसे कि चैटजीपीटी और गूगल का बार्ड, मानवों की तरह भाषा को समझते नहीं हैं, लेकिन वे वाक्य संरचना, साहित्यिक शैली और स्लैंग कैसे काम करते हैं, इसका विश्लेषण कर सकते हैं|अपनी इसी विश्लेषण क्षमता के आधार पर वे कभी-कभी तो  अद्वितीय सटीकता के साथ कोई दोस्त या पति अपने मेल में क्या  लिखेगा या लिख सकता है का पूर्वानुमान लगा सकते हैं |
बड़े भाषा मॉडल (LLMs) प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण कंप्यूटर प्रोग्राम होते हैं जो कृत्रिम न्यूरल नेटवर्क का उपयोग करके ए आई द्वारा निर्मित टेक्स्ट  बनाने में  सहायक होते हैं।ये टेक्स्ट अक्सर   सोशल मीडिया, समाचार साइटों, इंटरनेट फोरम्स और अन्य स्रोतों से एकत्रित किया जा  सकते हैं फिर इस टेक्स्ट सामाग्री को हैकर्स अपने हिसाब से अनुकूलित कर सकते हैं | जिसमें लेखन शैली की नक़ल भी शामिल है |अगर यही काम बगैर ए आई जेनरेटेड भाषा मोडलों के बगैर किया जाए तो इसमें महीनों लग सकते है जो काम अब सेकेंडों में हो सकता है |
चैटजीपीटी  और बार्ड में फिशिंग ईमेल जैसी  सामाग्री  निर्मित करने के इनबिल्ट सुरक्षा उपाय  है। लेकिन कई ओपन-सोर्स LLMs में कोई सुरक्षा उपाय नहीं हैं, और हैकर्स डार्कनेट फोरम्स पर इच्छुक खरीदारों को मैलवेयर लिखने के लिए मॉडल लाइसेंस कर रहे हैं।
एआई को विश्वसनीय डीपफेक (जिसमें वीडियो और आवाज की नक़ल शामिल है) तैयार करने के लिए प्रयोग किया भी जा रहा है जो फेक न्यूज को फैलाने में एक बड़ा कारक है।लेकिन  ईमेल, आवाज और वीडियो को शामिल करने वाले ऐसे हाइब्रिड हमले अब एक करीबी  वास्तविकता है। इसमें सबसे बड़ा खतरा है साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का क्योंकि ए आई ऐसे हाइब्रिड हमलों को और  ज्यादा मारक बना सकता है ऐसी भी संभावना है कि हम आज जहाँ तक सोच भी नहीं सके हैं वो ऐसे  हमलों के बारे सोच सकता है |
शतरंज जैसे खेलों में एआई ने पहले ही सिद्ध कर दिया है कि वे इंसानों को परास्त कर सकते हैं| इसी तर्ज पर देश में ऐसे साइबर हमले किये जा सकते हैं जिनका सामना करने के लिए हमारी सरकार या तंत्र तैयार ही न हो |हमें एक ऐसे रक्षात्मक एआई सिस्टम की आवश्यकता है  जिससे एआई-जनित साइबर हमलों का सामना किया जा सके।
अमर  उजाला में 13/09/2023 को प्रकाशित 

Sunday, September 10, 2023

लखनऊ, तुझसे ही सीखा है मैंने जीने का अंदाज


 लक्ष्मण ने बसाया था नवाबों ने संवारा 

 लखनऊ फ़िदा है तुझ पर ये नन्हा   सा  दिल हमारा |

गोमती के किनारे बसती है एक राहगुज़र,

 इन्ही राहों से निकलें हैं  हमारे सपने करते हैं सफ़र  ।

तुझे सोचने पर धडकता है मेरा दिल 

तहजीब और तमीज के इस शहर को भूलना बड़ा  मुश्किल |

ये मनाता है कभी ईद तो कभी दीवाली 

ये शहर नहीं होता कभी उम्मीद से खाली |

चिकनकारी की कढाई  और दशहरी की बातें, 

ये है लखनऊ की निशानियाँ  और उनकी रवायतें ।

इसके  सीने पर गुजरते हुए  तांगों की आवाज़,

 वो भीगती हुई मिट्टी की खुशबू और खुशी का आगाज़ |

ये शहर है लखनऊ, जिसकी दास्ताँ हैं अनमोल,

यहाँ की गलियों में छुपे  है अदबी  शायरी के बोल  

क़ैफियत से भरी हर जगह और  जिन्दादिली का राज  , 

लखनऊ, तुझसे ही सीखा है मैंने जीने का अंदाज ||


लखनऊ पर एक कविता 

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