Thursday, December 23, 2021

कार्यक्षेत्र में घटती महिलाओं की हिस्सेदारी

 


देश में महिलाओं की श्रमिक सहभागिता दर (लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट ) जो पूरे विश्व के अनुपात में वैसे ही बहुत कम है |उसमें और तेजी से गिरावट आई है |बेन एंड कम्पनी और गूगल की एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट पन्द्रह से चौबीस उम्र की महिलाओं में सबसे ज्यादा है| लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट के अनुसार रोजगार में महिलाओं की संख्या लगातार कम हो रही है | |उल्लेखनीय है कि श्रम शक्ति भागीदारी दर (LFPR) 16-64 वर्ष आयु के लोगों की कार्याश्रम हिस्सेदारी को दर्शाता है, जो वर्तमान में कार्यरत हैं या रोज़गार की तलाश कर रहे हैं| अध्यनरत किशोर, ग्रहणी अथवा 64 वर्ष आयु से अधिक के व्यक्ति इस में सम्मिलित नहीं हैं| इसी रिपोर्ट के अनुसार मई –अगस्त 2019 में लैंगिक रूप अनुपात में महिलाओं पर बेरोजगारी की मार ज्यादा पड़ रही है|इसी समय में जहाँ शहरी पुरुषों में बेरोजगार की दर छ  प्रतिशत हैं वहीं चौबीस प्रतिशत शहरी महिलायें बेरोजगार है |ग्रामीण क्षेत्र में भी पुरुषों में बेरोजगारी का औसत छ  है वहीं पंद्रह प्रतिशत महिलायें बेरोजगार है |स्नातक दस प्रतिशत पुरुष बेरोजगार है वहीं महिलाओं में यह प्रतिशत पैंतीस है | महिलाओं की श्रमिक सहभागिता दर (लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट )1990 में पैंतीस प्रतिशत थी जो साल 2018 में गिरकर सत्ताईस प्रतिशत हो गयी जो कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से काफी बेहतर है जहाँ यह आंकडा इसी समय में चौदह प्रतिशत से बढ़कर पच्चीस प्रतिशत पहुंचा पर भारत अभी भी बांग्लादेश ,नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों से पीछे है |

ग्लोबल इकोनोमिक फोरम द्वारा जारी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 में 156 देशों की सूची में भारत एक सौ चालीसवें  स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार  महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसर में बहुत तेजी से गिरावट हुई है। महिला श्रमबल भागीदारी दर 24.8 प्रतिशत से गिर कर 22.3 प्रतिशत रह गई। पेशेवर और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका घटकर 29.2  प्रतिशत हो गई है। वरिष्ठ और प्रबंधक पदों पर केवल 14.6 प्रतिशत महिलाएँ हैं। केवल 8.9 प्रतिशत कंपनियाँ ही ऐसी हैं जहाँ शीर्ष प्रबंधक पदों पर महिलाएँ अपना योगदान दे रही हैं।
लैंगिक समानता बढाने के लिए यदि अभी से प्रयास नहीं किये गए तो पुरुष और महिलाओं के बीच आर्थिक समृद्धि और रोजगार की खाई भारत में चिंताजनक रूप से बढ़ेगी|वर्तमान रुझानों के अनुसार आने वाले वर्षों में चालीस  करोड़ नौकरियों की आवश्यकता अकेले महिलाओं को है|तस्वीर का दूसरा पक्ष रोजगार में तकनीक पर बढ़ती निर्भरता है |महिलाऐं ज्यादातर प्रशासनिक एवं सूचना विश्लेषण जैसे रोजगार में प्रमुख भूमिका निभाती हैं परन्तु अब इन क्षेत्रों में कृत्रिम बुधिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और तकनीक  के बढ़ते दायरे  ने महिलाओं की अधिकता वाले रोज़गार के इस क्षेत्र को खतरे में डाल दिया है|जैसे –जैसे रूटीन किस्म की नौकरियों में  ऑटोमेशन बढेगा इससे सबसे ज्यादा दबाव महिलाओं पर बढ़ेगा, जिसका परिणाम महिलाओं में  उच्च बेरोज़गारी दर के रूप में सामने आएगा |वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार देश की जनसँख्या में महिलाओं की संख्या अडतालीस प्रतिशत है लेकिन देश की आर्थिक वृद्धि का लाभ महिलाओं को उतना नहीं मिल पाया |शिक्षा में ग्रामीण और शहरी दोनों महिलाओं की तादाद बढ़ रही है लेकिन फिर भी वे रोजगार में उतना योगदान नहीं दे रही हैं उसके लिए कुछ सामाजिक सांस्कृतिक कारक भी जिम्मेदार हैं |पुरुषों के लिए ज्यादा शिक्षा का मतलब बेहतर रोजगार में ज्यादा सहभागिता लेकिन महिलाओं के लिए ऐसा हमेशा नहीं होता है |यदि पति बेहतर कमाता है तो महिलाओं को काम करने की क्या जरुरत वाली मानसिकता भी एक बड़ी बाधा है |
देश में हर साल 239,000 लडकियों की म्रत्यु पांच वर्ष की उम्र के पहले ही हो जाती है |अस्सी प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले पैंसठ प्रतिशत महिलायें ही साक्षर हैं | सरकार ने महिलाओं को उद्यमी बनाने के लिए 2011 में विश्व बैंक के समर्थन से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (अब दीनदयाल अन्त्योदय- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन )शुरू किया जिसमें अब तक पचास मिलीयन  महिलाओं को स्वयम सहायता समूहों और उनकेउच्च महासंघों से जोड़ा गया है | इन समूहों ने विभिन्न वाणिज्यिक बैंकों से लगभग $ 30 बिलियन का लाभ उठाया है।ऐसी स्थिति  में नए रोज़गार के अवसरों को पैदा करना आज की जरुरत  है| जिसके लिए  अधिक से अधिक महिलाओं को उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित करना ही दीर्द्कालिक समाधान होगा न कि उन्हें सामान्य किस्म के रोजगार के लिए प्रेरित करना,नवाचार ही एक  ऐसा क्षेत्र है जहाँ भविष्य की महिला उद्यमीयों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए ज्यादा रोजगार सृजित किया जा सकता है क्योंकि महिलायें किसी महिला अधिकारी के नेतृत्व में ज्यादा सहजता से काम कर पाएंगी |महिला उद्यमियों की संख्या भी वैसे ही कम है  |इसमें सरकार की एक बड़ी भूमिका होगी जो महिलाओं को नवाचार के लिए प्रेरित करे वहीं उनके स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश बढ़ाने के ठोस प्रयास करने होंगे |महिलाओं के बीच उद्यमशीलता का विकास करके भारत की अर्थव्यवस्था को जहाँ गति दी जा सकती है वहीं भारतीय  समाज को लैंगिक रूप से बराबरी वाले समाज में परिणत करके दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है |
अमर उजाला के सम्पादकीय  पेज पर 23/12/2021 को प्रकाशित 

Monday, December 20, 2021

ओ टी टी वही आगे ,जिसमें लगा है देशी तड़का

  


सकता है आने वाले  वक्त में हम आने वाली पीढ़ियों को ये बताये कि एक ऐसा वक्त ऐसा भी समय गुजरा है जब हम सिनेमा हाल में फिल्म देखते हुए जब हमारे बगल में बैठा कोई अजनबी फिल्म की किसी बात पर कुछ मजाक में बोले और उस पंक्ति में बैठे हुए हर इंसान के मुंह से हंसी फूट पड़े | आपको ये बात भी एक मजाक लगे पर कम से कम आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं |भारत में कोरोना महामारी ने ओ टी टी प्लेटफोर्म में अभूतपूर्व व्रद्धि ला दी है फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की ) और कंसल्टिंग फर्म ई वाई की  रिपोर्ट के अनुसार 2019 में  28 मिलियन से अधिक भारतीयों ने और 2020 में 53 मिलियन ओ टी टी सब्सक्रिप्शन के लिए भुगतान किया,जो उनचास प्रतिशत की वृद्धि  है |वहीं अखबार के पाठकों में  छत्तीस प्रतिशत की कमी आई है और फिल्म के दर्शकों में कमी की यह दर बासठ प्रतिशत रही जबकि टेलीविजन के दर्शकों  में गिरावट की यह दर तेरह प्रतिशत है ओटीटीशब्द पारम्परिक केबल या सेटेलाइट टीवी सेवाओं के उपयोग के बिना इंटरनेट के माध्यम से फिल्मोंवेब श्रृंखला या किसी अन्य वीडियो सामग्री को दर्शकों तक पहुंचाता है |ओ टी टी प्लेटफोर्म (स्ट्रीमिंग सेवा) स्थापित करने के लिए टेलीविजन के मुकाबले  किसी बड़े पूंजीगत व्यय की आवश्यकता नहीं है|अगर आपके पास कंटेंट है तो इस विविधता वाले देश में आपको दर्शक मिल जायेंगे नेटफ्लिक्स और अमेजॉन के दबदबे वाली इस दुनिया में भारतीय बाजार में कई  देसी प्लेटफॉर्म्स ने भी सफलता का स्वाद चखा है। 

उदाहरण के लिएबालाजी टेलीफिल्म्स की सहायक कंपनी ऑल्ट बालाजी ने सितंबर 2021 तक 1.8 मिलियन उपभोक्ताओं को जोड़ा जो तीन साल पहले के 280,000 से कई गुना अधिक है। जी फाईव  और सोनी लिव  जैसे अन्य प्लेटफार्मों को न केवल भारत में बल्कि प्रवासी विदेशी दर्शकों ने सर माथे पर बिठाया  है |ये भारत की विविधता का ही कमाल है कि सारी दुनिया में अपने उपभोक्ताओं की संख्या के मामले में बड़ा नाम बन चुके नेटफ्लिक्स और अमेजॉन के सितारे भारत में इतने बुलंद नहीं हैं |स्ट्रीमिंग गाईड जस्ट वाच की एक रिपोर्ट के अनुसार 2021 की तीसरी तिमाही में डिज्नी प्लस  हॉटस्टार  पच्चीस प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ पहले स्थान  पर है। इस सूची  में दूसरे स्थान पर अमेजन प्राइम  वीडियो हैजिसकी  वृद्धि दर उन्नीस प्रतिशत  है और वहीं नेटफ्लिक्स इन तीनों में सबसे पीछे तीसरे स्थान  पर है और उसकी  वृद्धि दर सत्रह प्रतिशत  हैजिसमें पहले के मुकाबले कमी आई है। डिज्नी प्लस  हॉटस्टार लगातार तीसरी बार सबसे ज्यादा वृद्धि  के साथ पहले स्थान  पर बना हुआ है। इसी  साल जनवरी में डिज्नी प्लस हॉटस्टार की  वृद्धि दर  बीस प्रतिशत थी  जो तीसरी तिमाही यानी सितंबर तक बढ़कर पच्चीस प्रतिशत  हो गयी 

इसका सीधा असर नेटफ्लिक्स के ऊपर हुआ जिसकी वृद्धि दर  दूसरी तिमाही के मुकाबले तीसरी तिमाही में दो प्रतिशत  कम हुई है। डिज्नी प्लस  हॉटस्टार   और अमेजन प्राईम की सफलता का एक बड़ा कारण इन प्लेटफोर्म पर लगातार भारतीय भाषाओं में कंटेंट ओरिजनल कंटेंट का उपलब्ध कराया जाना भी है जबकि नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध ज्यादातर कंटेंट अंग्रेजी या अन्य यूरोपीय भाषाओं में हैं हालाँकि नेटफ्लिक्स अपने कंटेंट को भारतीय भाषाओं में डब कर रहा है पर क्षेत्रीयता के मामले में डिज्नी प्लस हॉटस्टार के कंटेंट में ज्यादा भारतीयता दिखती है और अमेजन भी भारतीय दर्शकों को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम परोस रहा है |दूसरा कारण अमेज़ॅन प्राइम परिवार के सदस्यों के लिए अलग-अलग खातों का उपयोग नहीं करता है - क्योंकि यह सब अमेज़ॅन प्राइम छतरी के नीचे है। आप अलग-अलग डिवाइस पर एक ही शो और फिल्में देखने के लिए स्वतंत्र हैंलेकिन अगर एक ही समय में आपके खाते पर बहुत से लोग स्ट्रीमिंग कर रहे हैं तो आपकी स्क्रीन पर एक संदेश आएगा ।नेटफ्लिक्स  आपके प्लान  के आधार परएक से चार दर्शकों के बीच कहीं भी कार्यक्रम देखने की सुविधा  देता है। इस सबमें अपेक्षाकृत रूप से डिज्नी प्लस हॉटस्टार  सेवा सबसे उदार है। जो अपनी  सदस्यता चार उपकरणों पर स्ट्रीमिंग की अनुमति देती हैजिसमें सात अलग-अलग प्रोफाइल बनाने का विकल्प भी होता है और भारत में इसकी लोकप्रियता का यह एक बड़ा कारण भी है 

आंकड़ों से इतर इतिहास गवाह है कि इंसानी व्यवहार में परिवर्तन कभी पीछे की ओर नहीं लौटता |कोविड काल ने  हमारी जीवन की दिनचर्या के हर क्षेत्र में असर डाला है और इनमें से बहुत सी चीजें अब हमेशा हमारे जीवन का हमेशा के लिए अंग बन जायेंगी |ओटीटी प्लेटफोर्म पर समय बिताना उनमें से ही कुछ एक है |हालाँकि ओटी टी पर अश्लीलता फैलाने के आरोप भी हैं पर कंटेंट के तौर पर जो विविधता है वो अब टेलीविजन के पास नहीं है उपर से असमय विज्ञापनों की भरमार दर्शकों की कार्यक्रम में तल्लीनता को तोडती है |तथ्य यहं भी है कि पारम्परिक रूप से फिल्मों को पहली टक्कर टेलीविजन से मिली फिर वी सी आर उसके बाद सी डी/डी वी डी आया पर हमारे सिनेमा हाल रूप बदल बदल कर इन सब चुनौतियों का समाना करते रहे |ओटीटी प्लेटफोर्म से मिलती इस चुनौती का सामना टीवी और फिल्म उद्योग कैसे करेगा इसका फैसला अभी होना है |

नवभारत टाईम्स में 20/12/2021 को प्रकाशित लेख 

 

Saturday, December 18, 2021

साइबर हमला और भारत

 

इंटरनेट अब हमारे जीवन का अभिन्न अंग है और इसके बगैर अब जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है|लेकिन इंटरनेट की दुनिया में कुछ भी सुरक्षित नहीं क्योंकि हैकर्स लगातार इंटरनेट पर हमले करते रहते हैं और दुनिया के तमाम देश इंटरनेट को सम्पूर्णसुरक्षित करने में लगे हुए हैं |  ताजा घटनाक्रम में   हैकर्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिकट्विटर अकाउंट में रविवार (12 दिसंबर) की सुबह 2.11 सेंध लगा दी। प्रधानमन्त्री कार्यालय ने ट्वीट कर जानकारी दी कि थोड़ीदेर के लिए प्रधानमंत्री  मोदी का अकाउंट हैक हुआ था ।प्रसिद्ध होलीवुड फिल्म डाई हार्ड फोर  के कथानक में एक ऐसी काल्पनिक समस्या का जिक्र किया गया है|जब अमेरिका के इंटरनेट पर एक अपराधी समूह का कब्ज़ा होता है और पूरे देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न  हो जाती है पर इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता और साइबर हमलों से निपटने में हमारी तैयारी कभी भी इस फ़िल्मी कल्पना को हकीकत का जामा पहना सकती है|इंटरनेट ने दुनिया को एक स्क्रीन  में समेट दिया है| समय स्थान अब कोई सीमा नहीं है बस इंटरनेट होना चाहिए, हमारे कार्य व्यवहार से लेकर भाषा तक हरक्षेत्र में इसका असर पड़ा है और भारत भी इस का अपवाद नहीं है|बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब चीन के हैकर्स (इंटरनेट को भेदने वाले ) ने भारत में वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) और भारतबायोटेक पर साइबर अटैक करने की कोशिश की थी| अक्तूबर 2020 में मुंबई एक बड़े हिस्से की पावर ग्रिड फेल हो गई थी और मुम्बई मेंअंधेरा छा गया। अमेरिका की मैसाचुसेट्स स्थित साइबर सिक्योरिटी कंपनी रिकॉर्डेडफ्यूचर ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चाइनीज सरकार समर्थित हैकर्स के एक ग्रुपने मैलवेयर के जरिए मुंबई में पावर ग्रिड को निशाना बनाया था। ।

हालंकि केन्द्रीयसरकार ने इस तरह के साइबर हमले को नहीं माना था |  अमेरिकी कंपनी आईबीएम (IBM) की साइबर हमलों की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2020 में भारत एक तरफ कोरोना महामारी से लड़ रहा था,तो उसे दूसरी तरफ साइबर हमलों से पूरे एशिया-प्रशांत इलाके में भारतको जापान के बाद सबसे ज्यादा साइबर हमले झेलने पड़ेमहतवपूर्णहै कि सबसे ज्यादा साइबर हमले बैंकिंग और बीमा क्षेत्र से जुडी हुई कंपनियों परहुए| 2020 में एशिया में हुए कुल साइबर हमलों में से सातप्रतिशत भारतीय कंपनियों पर हुए इंटरनेट के बढते विस्तार ने सायबर हमले की सम्भावना को बढ़ाया है|साइबर हमले कई तरह से हो सकते है जैसेवेबसाइट डिफेंसिंग इसमें किसी सरकारी वेबसाइट को हैक कर उसकी द्रश्य दिखावट को बदलदिया जाता है।जिससे यह पता चलता है कि अमुक वेबसाईट साइबर हमले का शिकार हुई है |दूसरा तरीका है फिशिंग या स्पीयर फिशिंग अटैक जिसमे हैकर ईमेल या मैसेज के जरिए लिंकभेजता है जिस पर क्लिक करते ही कंप्यूटर या वेबसाईट कासारा डाटा लीक हो जाता है।इसके अलावा बैकडोर अटैक भी एक तरीका है जिसमें कम्प्यूटरमें एक मालवेयर भेजा जाता हैजिससे उपभोक्ता की सारीसूचनाएं मिल सके। देश को साइबर हमलों से बचाने के लिए भारत में दो सस्थाएं हैं। एकहै सी ई आर टी जिसे कंप्यूटर इमरजेंसी रेस्पॉन्स टीम के नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना साल 2004 में हुई थी। दूसरी संस्था का नाम नेशनल क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर है जो रक्षा ,दूरसंचार,परिवहन ,बैंकिंग आदि क्षेत्रों की साइबर सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है ये 2014 से भारत में काम कर रही है। भारत में अभी तक साइबर हमलों के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। साइबर हमलों के मामले में फिलहाल आईटी एक्ट के तहत ही कार्रवाई होती है जिसमें वेबसाइट ब्लॉक तक करने तक केप्रावधान हैं लेकिन न तो प्रावधान प्रभावी हैं और न ही पर्याप्त । 

केंद्रीय शिक्षा,संचार तथा इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसारदेश में जनवरी से मार्च, 2020 के बीच देश में 1,13,334,अप्रैल से जून के बीच 2,30,223 और जुलाई सेअगस्त से बीच 3,53,381 साइबर हमले हुए हैं।वहीं साल 2017-18में साइबर अटैक से निपटने के लिए 86.48 करोड़दिए गए जिनमें से 78.62 करोड़ रुपये खर्च किए गए। साल 2018-19में 141.33 करोड़ रुपये जारी किये गए हुए,जबकि खर्च 137.38 करोड़ रुपये ही हुए। साल 2019-20में साइबर फंड के नाम पर 135.75 करोड़ रुपयेदिए गए हैं जिनमें से मात्र 122.04 करोड़ रुपये ही खर्च हुएहैं।कंप्यूटर की दुनिया ऐसी है जिसमें अनेक प्रॉक्सी सर्वर होते हैं और दुनिया भरमें फैले इंटरनेट के जाल पर दुनिया की कोई सरकार हमेशा नजर नहीं रख सकती ऐसे मेंजागरूकता के साथ बचाव की रणनीति ही देश को इन साइबर हमलों से बचा सकती है |एक आँकड़े के मुताबिक़ भारत दुनिया के उन शीर्षपाँच देशों में हैजो साइबर क्राइम से सबसेज़्यादा प्रभावित हैंपहले हैकर्स जहाँ भारतीय वेबसाइटों पर उन देशों के समर्थन में नारे लिख देते थे|जिस देश के लिए वो काम कर रहे होते थे पर ये परम्परा साल 2013-14के बाद से बदली है और  चुपचाप किए गए साईबर हमलों की मदद से जासूसी की जाती हैऐसे समय जब साइबर दुनिया में चुनौतियाँ लगातार  बढ़ रही हैंइन चुनौतियों से निपटने केलिए एक स्पष्ट रणनीति की कमी साफ़ दिखती  है|भारत में साइबर ख़तरों से निपटने के लिए पिछली राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति 2013में आई थीलेकिन पिछले आठ सालों में इंटरनेटकी दुनिया में  भारी बदलाव आए हैंस्पष्ट नीति के न होने से वजह से बहुत सारी असैन्यसंस्थाएँ उन पर हुए  साइबर हमलों के बारेमें जानकारी नहीं देतीक्योंकि उनके लिए क़ानूनी तौर पर ऐसा करना ज़रूरी नहीं है|  साइबर हमलों से  बचने के लिए देश के लिए यह जरुरी है कि इंटरनेटके लिए जरुरी  महत्वपूर्ण  तकनीकी मूलभूत सुविधाओं जैसे राऊटर्सस्विच सुरक्षा उपकरणों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बने|वर्तमान स्थिति में यह देश  के लिए ये आसान नहीं होगाक्योंकि भारतीय ऊर्जा स्टेशंसमोबाइल नेटवर्क जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में चीनी उपकरणों का वर्चस्व  हैइसी तरह रक्षा क्षेत्र में पश्चिम से आयातित उपकरणों का इस्तेमाल होता है |  

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 18/12/2021 को प्रकाशित 

Wednesday, December 8, 2021

आओ चलें गाँव की ओर

 

मई लगते ही सूरज अपने तेवर दिखाना शुरू कर देता है। स्कूल कॉलेज की छुट्टियाँ जहाँ समर कैंप्स की रौनक बढ़ा देती है वहीं आर्थिक रूप से समर्थ लोग किसी हिल स्टेशन पर सुक़ून भरे समय की तलाश में निकल पड़ते हैं। जब ऐसे ज़्यादातर लोग गर्मियाँ एंज्वॉय कर रहे होते हैंठीक उसी समयकिसी सुदूर गाँव में हमारा अन्नदाता अपनी अपनी नंगी झुलसी चमड़ी पर सूरज का तापमान माप रहा होता है। लहलहाती पकी फ़सल को देखकर आंखो में चमक के साथ चेहरे पर चिंता की झुर्रियां उसके किसान होने का प्रमाण देती हैं। एक ऐसे देश का किसान जिसके  खुरदुरे कंधों पर टिकाकर हम तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ रहे  है। पर खुद उसकी आजीविका  अभी भी सूर्य और इंद्रदेवता की मेहरबानी पर टिकी है|गाँव तो बेचारा है यादों में रहने वाले गाँव की हकीकत उतनी रूमानी नहीं है इस तथ्य को समझने के लिए किसी आंकड़े  की जरुरत नहीं है| गाँव में वही लोग  बचे हैं जो पढ़ने शहर नहीं जा पाए या जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं है| दूसरा ये मिथक कि खेती एक लो प्रोफाईल प्रोफेशन है जिसमे कोई ग्लैमर नहीं है फिर क्या गाँव धीरे धीरे हमारी यादों का हिस्सा भर हो गए हैं | जो एक दो दिन पिकनिक मनाने के लिए ठीक है  | शायद इसीलिये गाँव खाली हो रहे हैं और शहर जरुरत से ज्यादा भरे हुए |आखिर समस्या कहाँ है |गाँव को पुरानी पीढ़ी ने इसलिए पीछे छोड़ा क्योंकि  तरक्की का रास्ता शहर  से होकर जाता था | फिर जो गया उसने मुड़कर गाँव की सुधि नहीं ली |क्योंकि गाँव के लोग शहर जाकर कमा  रहे थे पर गाँव आर्थिक रूप से पिछड़े ही रहे |एक तरफ 6 लाख छोटे गाँव और दूसरी तरफ 600 शहर, कोई भी जागरूक और धन से संपन्न ग्रामीण शहर ही जाना चाहेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही| दुनिया की हर विकसित अर्थव्यवस्था ऐसे ही आगे बढ़ी है जिसमे कृषि क्षेत्र की उत्पादकता को बढ़ाया गया और बची श्रम शक्ति को औद्योगिकी करण में इस्तेमाल किया गया|भारत के गाँव के सामने विकल्प हैं पर यदि समय रहते इनको आज़मा लिया जाए|गाँव से पलायन इसलिए होता है कि वहां सुविधाएँ नहीं है सुविधाएँ के लिए धन की जरुरत है, और  वो दो तरीके से आ सकता है| पहला सरकार द्वारा दूसरा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप से|सरकार अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से काम करती है| इसमें अगर तेजी लानी है तो पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देना होगा| अब यहाँ समस्या ये है कि गाँव ,जनसंख्या के अनुपात में शहरों  से काफी छोटे होते हैं| इसलिए आधारभूत सेवाओं के विकास में लागत बढ़ जाती है और इनकी वसूली में भी देर होती है| जिससे निजी निवेशक पैसा लगाने से कतराते हैं| दूसरी समस्या ग्रामीण जनसँख्या का आर्थिक रूप से कमज़ोर  होना भी है क्योंकि जो जनसंख्या वर्ग दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा हो |उसे सुविधाओं की जरूरत बाद में होगी |इसी मानक को आधार बना कर शहरों की ओर ज्यादा ध्यान दिया जाता है|  जिससे गाँव विकास की दौड में पीछे छूट जाते हैं | इससे ग्राम पलायन के एक ऐसे दुष्चक्र का निर्माण होता है जिससे देश आज तक जूझ रहा है| सुविधाओं के अभाव में जिसको मौका मिलता है वो  लोग गाँव छोड़ देते हैं| क्योंकि  शहर में बिजली पानी और सडक की स्थिति गाँव से बेहतर है |  ऐसे लोग दुबारा गाँव नहीं लौटते|खेती छोटे और मझोले किसानों के लिए अब फायदे का सौदा नहीं रही |जोत छोटी होने के कारण खेती में लागत ज्यादा आती है और लाभ कम होता है , एक और कारण गाँव में आधारभूत सुविधाओं का अभाव समस्याओं को बढाता है और ये दुष्चक्र चलता रहता है |ग्रामीण अर्थव्यवस्था इस हद तक खेती के के इर्द गिर्द घूमती है कि कोई और विकल्प उभर ही नहीं पाया, हमारे खेत और गाँव के उत्पाद अपनी ब्रांडिंग करने में असफल रहे. खेती में नवचारिता वही किसान कर पाए जिनकी जोतें बड़ी थीं और आय के अन्य स्रोत थे| ऐसे लोग आज भी सफल हैं और अक्सर मीडिया की प्रेरक कहानियों का हिस्सा बनते हैं किन्तु  ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है.सहकारी आंदोलन की मिसाल लिज्जत पापड और अमूल दूध जैसे कुछ गिने चुने प्रयोगों को छोड़कर ऐसी सफलता कहानियां दुहराई नहीं जा सकीं.जिसका परिणाम ये हुआ कि गाँवों को शहर लुभाने लग गए और गाँव शहर बनने चल पड़े गाँव शहरों की संस्कृति को अपना नहीं पाए पर अपनी मौलिकता को भी नहीं बचा पाए जिसका परिणाम ये हुआ कि अपनी चिप्स और सिरका दोयम दर्जे के लगने लग गए पर यही ब्रांडेड चीजें अच्छी पैकिंग में हमें लुभाने लग गयीं हम अपनी सिवईं को भूल कर नूडल्स को दिल दे बैठे आखिर इनके विज्ञापन टीवी से लेकर रेडियो तक हर जगह हैं पर अपना चियुड़ा,गट्टा किसी और देश का लगता है पारम्परिक कुटीर उद्योग और कला ब्रांडिंग और मार्केटिंग के अभाव में रोजगार का अच्छा विकल्प नहीं बन पाए तो पर्यटन के अवसरों को कभी पर्याप्त दोहन किया ही नहीं गया नतीजा एक ऐसे गाँव में रहना जहाँ सुविधाएँ नहीं वहां के लोग  शहर जाकर मजदूरी करना बेहतर समझते हैं बन्स्बत अपने गाँव में रहकर खेती करना, सुविधाएँ किस तरह लोगों को आकर्षित करती हैं इसको पंजाब के खेतों में देखा जा सकता है |जहाँ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँव के किसान,खेतों मजदूरी और अन्य कार्य करने हर साल आते हैं|पर अब तस्वीर थोड़ी बदल रही है हर बदलाव जहाँ कुछ चुनौतियाँ लाता है वहीं कुछ अवसर भी उदारीकरण की बयार से गाँव के लोगों की क्रय शक्ति बढ़ रही है|नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन और क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत शहरी भारत के मुकाबले ज्यादा खर्च कर रहा है|, यानि गाँव उस दुष्चक्र से निकलने की कोशिश में कामयाब हो रहा है जो उसकी तरक्की में सबसे बड़ी बाधा रही है ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति बढ़ रही है|  गाँव में अब बिजली की उपलब्धता अब सहज है |सड़कों से अब सभी गाँव का जुड़ाव है | उन्नत भारत अभियान योजना तहत गाँव को उन्नत बनाने के लिए वहां के बुनियादी विकास और शिक्षा पर ज़ोर दिया गया है। शिक्षण संस्थानों द्वारा गाँव के विकास से सम्बंधित स्थानीय आर्थिक, समाजिक व अन्य समस्याओं का भी समाधान किया जाएगा। इस अभियान के अंतर्गत उच्च शिक्षा संस्थानों को गाँव से जोड़ा जा रहा है जहाँ वो अपने ज्ञान के आधार पर गाँव के विकास में भागीदार बन सकें। उच्च शिक्षा संस्थान ज्यादा से ज्यादा जिलों में पहुंचकर विकास कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं । ये संस्थान अनेक प्रकार के प्रोग्राम जैसे कि मशरुम खेती ,धुआं रहित चिमनी, ग्रामीण ऊर्जा , हस्त शिल्प ,स्वास्थ्य सेवा और जल प्रबंधन, ग्रामीण आवास , और अन्य विकासात्मक पहलुओं में सहायता प्रदान कर रहे हैं। पहले विभिन्न खतरनाक रोगों से गांव के गांव ही समाप्त हो जाते थे। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में हुई अभूतपूर्व क्रांति एवं ग्रामीणों में अपने स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता से ग्रामीणों के स्वास्थ्य स्तर में सुधार हुआ है।  इसके अतिरिक्त गाँवों में  इंटरनेट की पहुँच ने शहर और गाँव के बीच के अंतर को काफी हद तक कम किया है |ग्रामीण उत्पाद अब इंटरनेट के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच रहे हैं | आधुनिक तकनीक और जीवन-शैली की धमक वहां साफ सुनाई देने लगी है। गांवों में अब भी बहुत कुछ शेष है। गांव का विकास एक सुखद अनुभूति है। लेकिन हमें कोशिश करनी होगी कि विकास की प्रक्रिया में गांवों की आत्मा नष्ट न होने पाए, तभी गांव से जुड़ी सुखद अनुभूतियां जिंदा रह पाएंगीं।

 आकाशवाणी लखनऊ में दिनांक 08/12/2021 को प्रसारित रेडियो वार्ता 

Wednesday, December 1, 2021

वो रातों की मीठी नींद

 


आराम भला किसे नहीं पसंद होता और जब भी आराम की बात होती है सोना या नींद सबसे ऊपर होती है. वैसे अगर नींद न आ रही हो तो पहला समाधान यही दिया जाता है की दिमाग शांत करके कोई अच्छा सा गाना सुन लीजिए नींद आ जायेगी. अगर गाना नींद से ही संबंधित हो तो क्या कहने. जरा अपने बचपन को याद कीजिये, जब मां हमें सुलाने के लिए लोरी गाया करती थीं और हम मीठी नींद सो जाया करते थे. अच्छी नींद और गानों का पुराना संबंध रहा है. ऐसे में सोते वक्त ये गाना कैसा रहेगा “कोई गाता, मैं सो जाता”-(फिल्म-आलाप). हमारे मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध नींद से होता है. अगर आप बहुत प्रसन्न हैं, तो चैन की नींद आयेगी, नहीं तो आपकी रातों की नींद उड़ जायेगी. अब प्रसन्न होने की शर्त तो बहुत बड़ी है भई. जब ऑफिस से लेकर घर तक काम के दबाव हों, जब सरकारें अपनी मनमर्जी कर रही हों, हमारी मर्जी से चुने जाने के बावजूद. जब महंगाई रात-दिन हमारा मजाक उड़ा रही हो, जब करप्शन मुंह फाड़े हमें निगलने को तैयार बैठा हो. जब पूरा शहर विकास के नाम पर खुदा पड़ा हो तो हम प्रसन्न कैसे हो सकते हैं. खैर, मैं कुछ ज्यादा ही भावुक हो गया. नींद पर लौटता हूं. नींद आना और नींद का उड़ जाना सामान्य स्थितियों में हमारे डेली रूटीन पर डिपेंड करता है. अब अगर आप इस गाने की फिलॉसफी पर भरोसा करेंगे कि बम्बई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो रात को खाओ-पियो, दिन को आराम करो तो निश्चित ही नींद उड़ जायेगी और आप अनिद्रा रोग के शिकार हो जायेंगे. किसी काम में मन नहीं लगेगा और दिन भर आप उनींदे से रहेंगे. एक्सप‌र्ट्स कहते हैं कि अगर अच्छी नींद लेनी है तो दिन में खूब काम कीजिये और रात को आराम कीजिये नहीं तो आप सारी रात चांद को देखते हुए बिता देंगे. नींद और ख्वाब एक दूजे के लिए ही बने हैं पर ख्वाबों में जागते रहना, बेख्वाब सोने से अच्छा है. यूं ख्वाबों का बड़ा गहरा रोमैन्टिसिज़्म है, लेकिन असलियत ये है कि जब नींद गहरी हो और सपनों-वपनों की इसमें कोई गुंजाइश तक न हो तो सबसे अच्छा है. क्योंकि अगर नींद में लगातार सपने आ रहे हैं तो अच्छी बात नहीं है. ज्यादा सपने देखने का मतलब नींद की सेहत ठीक नहीं है. क्यों आजकल नींद कम ख्वाब ज्यादा हैं (फिल्म-वो लम्हे). हमारी सुबह सुहानी हो इसके लिए जरूरी है हम रात में अच्छी नींद लें. मीठी प्यारी नींद जो हमें हल्का महसूस कराये. सुबह आंख खुलते ही यह गाना अगर हमारे कानों में पड़े तो दिन की शुरुआत इससे बेहतर भला और क्या हो सकती है. “निंदिया से जागी बहार ऐसा मौसम देखा पहली बार”(हीरो). लेकिन नींद के कई दुश्मन हैं स्ट्रेस, टेंशन. ये सब तब होता है जब हम अपनी प्रजेंट सिचुएशन से संतुष्ट  नहीं हो पाते या कोई काम हमारे मन का नहीं होता. इसी वजह से जिंदगी में परेशानी होती है और नींद उड़ जाती है. वैसे डॉक्टर्स बताते हैं कि अच्छी नींद के लिये जरूरी है कि रात का खाना थोड़ा जल्दी खा लिया जाए. रात को नहाकर सोने से भी नींद अच्छी आ सकती है. हां, सोने से पहले टीवी देखना या कम्प्यूटर पर काम करने से बचें. सोते वक्त कुछ पढ़ने की आदत भी भली है. लेकिन अगर इन सब उपायों के बाद भी नींद उड़ी ही रहे तो डॉक्टर के पास ही जाना पड़ेगा. सबसे अच्छा तो यही होगा कि हमें डॉक्टर की जरूरत ही न पड़े. इधर हम बिस्तर की ओर बढ़ें और उधर नींद हमारी तरफ. 

प्रभात खबर में 01/12/2021 को प्रकाशित 

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