Wednesday, December 31, 2008

चला मैं चला


प्रिय दोस्तों 
मैं साल २००८ हूँ ,चौंक गए न, मैंने आप सभी के साथ काफी अच्छा वक्त गुजारा तो सोचा मैंने इस दुनिया को किस तरह समझा इस राज़ को आपके साथ बाँटता चलूँ .चलते-चलते क्यों ना अपनों से अपनी बात कर ली जाए .जिस तरह दुनिया का नियम है जो आया है उसे जाना है .मेरा भी जाने का वक्त हो गया है और मुझे इसे एक्सेप्ट करने में कोई प्रॉब्लम नहीं है और वैसे भी लाइफ में जो भी जैसे मिले अगर उसे वैसे ही एक्सेप्ट कर लिया जाए तो जिन्दगी थोड़ी आसान हो जाती है .ये है मेरा पहला सबक जो मै आपके साथ बांटना चाहता हूँ .
मुझे याद है जब मै आया था तो लोगों ने तरह तरह से खुशियाँ मना कर मेरा स्वागत किया था वे मानते थे कि मैं उनके जीवन में खुशियों की बहारें लेकर आऊंगा. कुछ की उम्मीदें पूरी हुई ,कुछ की उम्मीदें टूटी और कुछ को मायूसी हाथ लगी और अब उम्मीदों का बोझ मेरे छोटे भाई साल २००९ पर होगा .जाते साल का दूसरा सबक किसी से एक्सपेकटशन मत रखिये, क्योंकि अगर एक्सपेकटशन नहीं पूरी होंगी तो परेशानी होंगी .दिन तो इसी तरह से बीतते जायेंगे साल आते रहेंगे और जाते रहेंगे और हर साल लोग न्यू इयर से उम्मीदें लगाते रहेंगे.और यही उम्मीद हमें जीने की और आगे बढ़ने का मोटिवेशन देती है लेकिन कोरी उम्मीदों से लाइफ न तो बदलती है और न ही आगे बढ़ती है इसके लिए प्रयास अपने आपको करना पड़ता है ये प्रयास ही हमारी लाइफ को बेहतर बना सकता है .आप सभी न्यू इयर सलेबेरेशन की प्रेपरेशन में बिजी होंगे .साल के पहले दिन कहाँ पार्टी करनी है क्या रेसोलुशन लेना है लेकिन मैं जानता हूँ जैसा कि मेरे साथ हुआ है और मेरे छोटे भाई २००९ के साथ भी होगा .साल के पहले दिन का स्वागत आप जिस जोश और उमंग के साथ करेंगे वो आधा साल बीतते न जाने कहाँ गायब हो जाएगा .वो रेसोलुशन जो साल के पहले दिन हमने लिए थे हम आधे साल भी उन्हें निभा नहीं पायेंगे. और वो नया साल जिसका आप बेकरारी से इंतज़ार कर रहे थे आप को प्रॉब्लम देने लगेगा .तीसरा सबक सफलता के लिए डेडिकेशन के साथ कनसिसटेंसी भी जरूरी है .मैंने पिछले एक साल में जिन्दगी के कई मौसम देखें जिन्दगी कहीं गरमी की धूप की तरह गरम लगी , कभी बरसात की फुहार की तरह सुहानी और कभी सर्दी की ठंडी रातों की तरह सर्द ,मैंने होली ईद और दिवाली में सुख और उल्लास के पल देखे वहीँ मुंबई , जयपुर ब्लास्ट में इंसानी हैवानियत के साथ दुःख के पलों का सामना किया लेकिन मैं चलता रहा बीती बातों को छोड़ते हुए तो मेरा चौथा सबक परेशानियों की परवाह किए बिना अपना काम करते रहें क्योंकि कोई इन्सान महान नहीं होता , महान होती है चुनोतियाँ और जब एक आदमी इन्हें स्वीकार करें तब वो महान कहलाता है ।साल के सारे दिन एक जैसे ही होते हैं हर सुबह सूरज निकलता है और शाम होती है बस जिन्दगी के प्रति हमारा नजरिया और आगे बढ़ने की चाह साल के हर दिन को खुशनुमा और नए साल के पहले दिन जैसा बना सकती है और अगर आप ऐसा कर पाये तो आपको खुशियाँ मनाने और नए रेसोलुशन लेने के लिए नए साल का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा हर दिन खुशनुमा होगा और तब शायद जाते हुए साल को जाते हुए इतना दुःख भी न होगा जितना मुझे हो रहा है. तो नया साल नई बातों नई सोच का कुछ कर गुजरने का साल होना चाहिए .अपने आप से वादा कीजिये कि कुछ नया होगा ,जिन्दगी में , पर्सनल लाइफ में, प्रोफेशन में कुछ अलग एंड आय होप ये साल यूं ही नहीं गुजर जाएगा.आप सब के साथ बिताये पलों की मधुर स्मर्तियों के साथ मै जा रहा हूँ फ़िर न कभी न आने लिए तो जाते साल का अन्तिम सबक जिन्दगी आज का नाम है जो दिन आज बीत गया वो फ़िर कभी नहीं आएगा चाहे आप कुछ भी कर लें इसलिए जिन्दगी को जी भर कर जी लीजिये , क्योंकि कल किसने देखा कल आए न आए ?

इस नए साल में कुछ नया कीजिये
जो किया है उसके सिवा कीजिये
ख़त बधाई का बेशक लिखें दोस्तों
दुश्मनों के लिए भी दुआ कीजिये .

शुभकामनाओं के साथ हमेशा के लिए विदा
सिर्फ़ आपका

साल २००८।
आई नेक्स्ट मैं ३१ दिसम्बर को प्रकाशित

Monday, December 15, 2008

आइये फ़िल्म देखें

आज बहुत दिनों के बाद अपने हॉस्टल के दिनों की याद ताज़ा हो आयी और इस बात के एहसास भी हुआ की चाहे कितने डी वी डी / वी सी आर / टी वी के युग आते जाते रहें फिल्मों के प्रति जो दीवानगी भरिया जनता में है वो मंद जरूर हो सकती है ख़तम नहीं हो सकती है .मैं आज गज़नी फ़िल्म देखने गया बहुत अरसे बाद ब्लैक में टिकेट खरीदे हर जगह हाउस फुल .में बात हॉस्टल के दिनों की कर रहा था वो अज़ब ही दिन थे .उदैपुर की हसीं वादिया सिर्फ़ मस्ती भरे दिन हर शुक्रवार को पहला दिन पहला शो देखना और दोस्तों पर रौब ग़ालिब कर देना की गुरु निपटा दी .हालाँकि हॉस्टल छोड़ने से पहने जो मैंने आखिरी फ़िल्म देखी थी वो पहला शो न होकर आखिरी शो था दिन का मतलब निघत शो ९ से १२ . फ़िल्म थी तिरंगा शायद आपको याद हो जॉनी अपने राज कुमार साहब और नाना पाटेकर की जुगलबंदी .हॉस्टल से भाग कर उदैपुर के पारस सिनेमा हाल देखी क्या माहौल था हॉल में हर संवाद पर रेज्गारियों की बरसात , सीटियाँ , तालियाँ और बहार हाउस फुल का बोर्ड चलते चलते ये भी बता दूँ रात में फ़िल्म देखकर लौट ते वक्त पुलिस ने रोका इतनी रात कहाँ बताया पिक्चर देखकर बस फ़िर क्या था पकड़ लो वार्डेन को ख़बर करो .ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे , अगले दिन मुझे ११ क्लास में टॉप करने का पदक मिलना था ये सोच कर सिहर गए की कल बड़ी बदनामी होगी लेकिन पुलिस वालों को भी रहम आ गया और समझा कर छोड़ दिया की नैएट शो मत देखा करो ऐसा था हम लोगों का फ़िल्म देखने का शौक मतलब फ़िल्म के लिए कुछ भी करेगा काफी कुछ किया भी लेकिन वो कहानी फ़िर सही .खैर थोड़ा इमोशनल हो गया था असल में सीन ईस्ताब्लिशेद करना था की गज़नी देखकर मुझे आज से करीब १५ साल पहले का हॉल का माहौल याद आ गया .कमोबेस लखनऊ के सारे हाल हाउस फुल और आमिर खान की इंट्री पर जोरदार स्वागत मैंने भी फ़िल्म का लुत्फ़ लिया खासकर इंटरवल से पहले का बाद में तो वही पुरानी कहानी बदला लेकिन नायक के कुछ न कर पाने का एहसास आमिर ने बखूबी किया बहुत दर्द का एहसास कराया बाकी सब तो ठीक था लेकिन एक जगह अगर मैंने सही सुना तो स्क्रिप्ट पर इतना गौर करने की बाद भी एक गलती हो ही गयी है वोह है मुंबई से गोवा जाते वक्त आसिन जिस लडकी को ट्रेन में बचाती है वो अपने आप को लातूर का निवासी बताती है जबकि ख़बर जब आई बी एन ७ से प्रसारित होती है तो लड़कियों को उत्तर भारत के गाँव का बताया जाता है .ये उत्तर भारतियों के प्रति कोई पूर्वाग्रह है या कोई त्रुटी कह पाना मुश्किल है . कैमरा संगीत बहुत उत्तम है .गज़नी का किरदार बहुत भौंडा है एक मेडिकल कॉलेज के समारोह में मुख्या आतिथि बनकर जाने वाला व्यक्ति कैसा बेवकूफ हो सकता है या एक बेवकूफ कैसे एक बड़ी दवा कंपनी का मालिक हो सकता है जो लोगों की ह्तायेन करता रहता है वगैरह वगैरह .तो ये थी गज़नी की कहानी हमारी जुबानी जिन्दगी के किसी मोड़ पर फ़िर मुलाकात होगी

Thursday, December 11, 2008

मैं लखनऊ हूँ

मत पूछिये अहले दिल क्या हाल है लखनऊ
हर शहर हर दयार से बढ़कर है लखनऊ

में ऐसा ही हूँ जी हाँ में लखनऊ हूँ मुझे बसाया भले ही भगवान राम के भाई लछमन ने लेकिन मुझे सजाने सवारने का काम किया नवाबों ने इस तरह मैं गंगा जमुनी तहजीब की जीती जागती मिसाल हूँ, लखनऊ हर वक्त में कुछ खास रहा है ज्यादा पीछे न जाते हुए मैं अपनी बात नवाबों से शुरू करूँगा नवाबी दौर में , मैं अपने अदब ,तहजीब , और तमीज के लिए जाना जाता था बाद में मेरी पहचान बने दशहरी आम ,चिकनकारी और मीठी खुशबू दार रेवडियाँ ,वक्त बदलता रहा और मैं भी ,मेरे सीने पर गुजरने वाले इक्के तांगों की आवाज़ मेरे कानों में मीठा रस घोलती थी लेकिन कब इसकी जगह सरपट फर्राटा भरते दोपहिये और चोपहिये वाहनों ने ले ली इसका मुझे पता भी न चला , बारह महीने चलने वाला पतंगबाजी का दौर कब साल के कुछ दिनों में सिमट गया , अपने घरों में खुशबूदार जायेकेदार खाना पकाने वाले लोगों ने जगह जगह खुले फ़ूड कार्नर के पकवानों का लुत्फ़ लेना शुरू कर दिया इसका भी एहसास मुझे न हुआ , हुक्के चिलम का दौर कब ख़तम हुआ और उनकी जगह मॉडल शॉप ने ले ली ये मंज़र भी मैंने देखा , मैंने ये भी देखा की पुराने लखनऊ की याद को ताज़ा करने और पुराने दौर को जीने के लिए लखनऊ के लोगों ने लखनऊ महोत्सव मनाना शुरू कर दिया .
समय वाकई बहुत तेज़ी से बदलजाता है मुझे इन सारे बदलावों से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि अगर बदलाव न हो रहे होते तो मैं कब का मिट गया होता , परिवर्तन तो आगे बढ़ते रहने की निशानी है ये बदलाव होते रहेंगे तो मैं भी आगे बढ़ता रहूँगा . मैंने देखा अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि मैं अब पहले जैसा नहीं रहा ? क्या कोई इंसान हमेशा एक जैसा रहता है बच्चा कभी तो बड़ा होगा ही . मैं यही कहूँगा कि लोग भी अब पहले जैसे नहीं रहे .पुराने ज़माने में आबादी कम थी सिर्फ़ खेती से लोगों का काम चल जाता था और समय भी खूब रहा करता था और समय के सदुपयोग के लिए लोग पतंगबाजी किया करते थे शादियाँ तीन दिन में हुआ करती थीं पढ़ाई का महत्व लोग ज्यादा नहीं समझते थे . हर काम खरामा -खरामा (धीमे -धीमे ) हुआ करता था .
अब समय बदल चुका है मैं नहीं चाहता कि लोग २१वीन शताब्दी में भी मुझे सिर्फ़ नवाबों के कारण जाने , मैं नहीं चाहता कि लोग मुझे पिछडे शहर के नाम से जाने .बदलती दुनिया की रफ़्तार से कदम मिलाये रखने के लिए मुझे भी दौड़ना होगा .हम सिर्फ़ पुराने चित्रों के एल्बम देखते हुए और अतीत के गौरव को याद करके जिन्दगी न तो बिता सकते हैं और न ही उसे बेहतर बना सकते हैं नए एल्बम बनाने के लिए कुछ नया करना पड़ेगा , नहीं तो फर्क क्या रहेगा नए और पुराने लखनऊ में और तभी एल्बम भी नया बन पायेगा .
मेरे ऊपर जनसँख्या का दबाव बढ़ रहा है लेकिन उसी लिहाज़ से रोज़गार के अवसर भी बढे हैं .लखनऊ के लोग अब जिंदगी बिता नहीं रहे हैं बल्कि जी रहे हैं . लखनऊ महोत्सव जिन्दगी के महोत्सव हो जाने का उल्लास है .हर्ष है कि हम आज भी अपने अतीत और उससे जुडी हुई चीज़ों पर गर्व करते हैं लेकिन उन्हें ढोते नहीं हम आगे बढ़ना जानते हैं . हवाई जहाज़ के इस दौर मैं हम इक्के से कितनी दूर दौड़ पायेंगे इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है . आज लखनऊ शिक्षा और वज्ञानिक अनुसंधान केन्द्रों के मामले में भारत के नक्शे पर बहुत तेज़ी से उभरा है और इसका श्रेय यहाँ के बाशिंदों को जाता है जो पुरानी चीज़ों से चिपके नहीं रहे . ठहरा पानी गन्दा होता है बहता पानी साफ़ मैं बहता रहा हूँ और बहता भी रहूँगा. लखनऊ फ़ैल रहा है और विकसित भी हो रहा है
लखनऊ महज़ गुम्बद -ओ- मीनार नहीं
कूचा -ऐ -बाज़ार नहीं
इसके दामन में मुहबत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं


दैनिक जागरण लखनऊ में ११ दिसम्बर को प्रकाशित

Tuesday, December 9, 2008

मुस्कराहटों का मौसम

सर्दियों का मौसम आ गया आप भी सोच रहे होंगे की मै कौन सी नयी बात बता रहा हूँ. गर्मियों के बाद जाडा ही आता है और ये तो हमेशा से होता आया है इस जाडे के मौसम में रजाई लपेटे हुए मैंने फिल्मी गानों से मौसम के फलसफे को समझने की कोशिश की अब इस सर्दी के मौसम को ही लीजिये न ये मौसम बहुत ही अच्छा माना जाता है सेहत , खान -पान और काम काज के लिहाज़ से तो यूँ कहें कि मौसम गुनगुना रहा है गीत खुशी के गा रहा है (फ़िल्म :सातवां आसमान ) भले ही ये सर्दी का मौसम हो लेकिन इसके आने से चारों तरफ़ गर्माहट आ जाती है खाने में , कपडों में , और रिश्तों में भी , ज्यादातर शादी फंक्शन्स जाडे में ही तो होते हैं . .मौसम मस्ताना रस्ता अनजाना (फ़िल्म:सत्ते पे सत्ता) लेकिन एक बात ज्यादा महत्वपूर्ण  है कि इसी मौसम में हमें गर्मी की कमी एहसास होता है. ये मौसम का जादू है मितवा (हम आपके हैं कौन )कुदरत ने हमें हर चीज जोड़े में दी है सुख -दुख ,धरती- आकाश , सर्दी-गर्मी , काला -सफ़ेद और न जाने क्या क्या और सही भी है अगर दुःख न होता तो हम सुख को समझ ही न पाते और देखिये न हम इंसान धरती के मौसम के बदलने का इंतज़ार कितनी बेसब्री से करते हैं और हर मौसम का स्वागत करते हैं .अलबेला मौसम कहता है स्वागतम (फ़िल्म :तोहफा ) लेकिन जब जिन्दगी का मौसम बदलता है तो हमें काफी परेशानी होती है .आप सोच रहे होंगे की जिन्दगी का मौसम कैसे बदलता है ?जवाब सीधा है सुख दुःख , पीड़ा निराशा , जैसे इमोशंस जिन्दगी के मौसम तो ही हैं . दुनिया के मौसम का टाइम साइकिल फिक्सड रहता है यानि चेंज तो होगा लेकिन एक सर्टेन टाइम पीरियड  के बाद लेकिन इससे एक बात तो साबित होती है बदलाव का दूसरा नाम मौसम है . मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुस्कयेगा (फ़िल्म :शायद )जिन्दगी का मौसम थोड़ा सा अलग है इसके बदलने का टाइम फिक्सड नहीं है और प्रॉब्लम यहीं से शुरू होती है जब हम किसी चीज के लिए मेंटली प्रीपैरे न हों और वो हो जाए जिन्दगी का मौसम कब बदल जाए कोई नहीं जनता ये पोस्सितिव भी हो सकता है और निगेटिव  भी .पतझड़ सावन बसंत बहार एक बरस के मौसम चार (फ़िल्म :सिन्दूर ) बारिश के मौसम में हम बरसात को नहीं रोक सकते लेकिन छाता लेकर हम अपने आप को भीगने से बचा सकते हैं और यही बात जिन्दगी के मौसम पर भी लागू होती है यानि सुख हो या दुख कोई भी परमानेंट नहीं होता है यानि जिन्दगी हमेशा एक सी नहीं रहती है इसमे उतार चढाव आते रहते हैं मुद्दा ये है कि जिन्दगी के मौसम को लेकर हमारी तैयारी कैसी है.
कोई भी इंडीविजुअल   हमेशा ये दावा नहीं कर सकता है कि वो अपनी जिन्दगी में हमेशा सुखी या दुखी रहा है या रहेगा चेंज को कोई रोक नहीं सकता सुख के पल बीत गए तो दुःख के पल भी बीत जायेंगे .अमेरिका के प्रेसीडेंट ओबामा जिस दिन चुनाव जीते उसके एक दिन पहले उनकी नानी का निधन हो गया जिसे वो बहुत चाहते थे . दुख के साथ सुख भी आता है. अगर आपके साथ बहुत बुरा हो रहा है तो अच्छा भी होगा भरोसा रखिये.ऐसा हमारी आपकी सबकी जिन्दगी में होता है लेकिन हम सत्य को एक्सेप्ट करने की बजाय भगवान् और किस्मत न जाने किस किस को दोष देते रहते हैं अगर हम इसको मौसम के बदलाव की तरह एक्सेप्ट कर लें तो न कोई स्ट्रेस रहेगा और न ही कोई टेंशन लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है जब हमारे साथ सब अच्छा हो रहा होता है तो हम भूल जाते हैं कि जिन्दगी संतुलन का नाम है और संतुलन तभी होता है जब दोनों पलडे बराबर हों लेकिन हम हमेशा सिर्फ़ सुख की आशा करते है लेकिन बगैर दुख को समझे सुख का क्या मतलब जिन्दगी के दौड़ में पास होने के एहसास को समझने के लिए फ़ेल होने के दर्द को समझना भी जरूरी है . जहाज़ सबसे सुरक्षित पानी के किनारे होता है लेकिन उसे तो समुन्द्र के लिए तैयार किया गया होता है बिना लड़े अगर आप जीतना चाह रहे हैं तो आज की दुनिया में आप के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि जिन्दगी का मौसम बहुत तेजी से बदल रहा है जैसे हम हर मौसम के हिसाब से अपना रहन सहन बदल लेते हैं वैसे हमें जीवन में आने वाले हर बदलाव का स्वागत करना चाहिए .
क्योंकि मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुस्कयेगा (फ़िल्म :शायद)
तो इस बदलते मौसम का स्वागत मुस्कराते हुए करिए फ़िर मुलाकात होगी
आई नेक्स्ट में ९ दिसम्बर २००८ को प्रकाशित

Saturday, November 8, 2008

हर चेहरा कुछ कहता है

तेरे चेहरे में वो जादू है , जी हाँ चेहरे में भी जादू होता है यह सिर्फ़ एक फिल्मी गाने की पंक्तियाँ नहीं हैं बल्कि जिन्दगी की सच्चाई भी है. मुझे एक और गाना याद आ रहा है सलामी फ़िल्म का चेहरा क्या देखते हो दिल में उतर कर देखो न , बात एकदम खरी है दिल और चेहरे का एकदम सीधा सम्बन्ध है. लाख छुपाओ छुप न सकेगा राज हो कितना गहरा दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा . मेरी आदत है भीड़भाड़ में, सेमिनार में, ट्रेन की यात्राओं में मैं चेहरे मिलाया करता हूँ  .अगर अपरिचित का चेहरा अपने किसी परिचित से मिलता-जुलता हुआ तो मैं गिनने लगता हूँ कि दोनों की क्या-क्या अदाएं मिलती-जुलती हैं। ऐसे अपरिचितों से कभी बात करने की हिम्मत तो नहीं हुई, लेकिन मुझे लगता है कि हर चेहरा कुछ कहता है , अब इस गाने में तो यही कहा जा रहा है चेहरा है या चाँद खिला है (फ़िल्म :सागर )आईये आज चेहरे की भाषा को समझने की कोशिश की जाए.
                 रोज़ हम न जाने कितने चेहरे देखते हैं लेकिन कभी गौर नहीं करते असल में चेहरा हमारी पर्सनाल्टी  का आइना होता है और हर चेहरा कुछ कहता है लेकिन हम समझना चाहें तो , चेहरे से ही हमारी सोच और बॉडी लैंग्वेज का पता चलता है मतलब की परदे के पीछे क्या चल रहा है .डर से चेहरा काला पड़ जाता है गुस्से में चेहरा लाल हो जाता है ,शर्म से चेहरा गुलाबी हो जाता है और बीमारी में चेहरा पीला पड़ जाता है ये तो चेहरे के रंग हैं जो जिन्दगी की हलचल को बताते हैं पर ये रंग जो चेहरे पर दिखते हैं वह रियलिटी में हमारे दिल की भावनाएं होती हैं जो चेहरे पर दिखती हैं . हम अगर अन्दर से अच्छा महसूस कर रहे हैं तो चेहरे पर वो खुशी दिखेगी अगर दुखी हैं तो चेहरा डल दिखेगा अब जिन्दगी में सुख दुःख तो आते जाते रहेंगे और आप इससे बच नहीं सकते , तो क्यों न इनसे मुकाबला किया जाए प्रॉब्लम  से भागना कोई सॉल्यूशन नहीं हो सकता और चेहरे को अच्छा रखना है तो दिमाग को अच्छा रखना बहुत जरूरी है . दिमाग को अच्छा रखने का एक मात्र तरीका है कि अपना दिमाग हमेशा खुला रखा जाए और नए विचारों का स्वागत किया जाए यानि फ्लेक्सिबिल्टी जरूरी है किसी भी विचार से चिपका न जाए अगर मैं सही हूँ तो सामने वाला भी सही हो सकता है, अगर आपको कोई बात अच्छी लग रही है तो उसकी खुल कर तारीफ कीजिये अपनी किसी बात पर या अपने आप पर घमंड आपके चेहरे की खूबसूरती को ख़तम कर देगा . चेहरे की खूबसूरती का राज़ किसी फेयर नेस क्रीम में नहीं है बल्कि विचारों के खुलेपन  मे है . क्योंकि विचार ही तो हमारी आपकी सोच बनाते हैं और सोच ही आम इंसान को खास बनाती है और अगर आप ऐसा कर पाए तो लोग यही कहेंगे तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती .
                      चेहरे की बाहरी खूबसूरती को निखारने के अनेक प्रोडक्ट मार्केट में हैं लेकिन ये प्रोडक्ट आपके चेहरे को लांग लॉस्टिंग  खूबसूरती नहीं दे सकते ये खूबसूरती तो आपका दिमाग दे सकता है जो सोचता है समझता है इस छोटे से दिमाग को अगर आप खुला रखेंगे अपनी सकारात्मक सोच से तो आपका भी चेहरा निखरेगा .जिन्दगी में लाख दुःख हैं पीड़ा और चिंताएँ हैं फ़िर भी जिन्दगी खूबसूरत तो है ही न, हर एक के पास जिन्दगी को जीने के अपने कारण हैं पिता अपने बेटे के चेहरे को खुश देखना चाहता है पति पत्नी को और पत्नी पति को खुश देखना चाहती है टीचर अपने स्टूडेंट्स को , इन रिश्तों के दायरे को अगर बड़ा कर दिया जाए तो हर चेहरा खुशी से चमक रहा होगा .सोचिये की आपका कौन सा काम किसी के चेहरे पर मुस्कान सजा सकता है किसी को खुश कर सकता है उस काम की तलाश कीजिये और जिन्दगी को खूबसूरत बनाइये हाँ तो आज से उस काम की तलाश में लग जाइये और फ़िर देखिये आपका चेहरा भी कैसे दमकेगा और जो सेल्फ सटीस्फेक्सन मिलेगा उसका तो मज़ा ही अलग होगा चेहरे की खूबसूरती का राज हमारे पास ही है ख़ुद खुश रहिये और दूसरों को खुश रखिये तो आज से आप किसी खुशनुमा चेहरे को देखें तो उसकी सोच को सराहें और कहें तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है . जल्दी ही फ़िर मुलाकात होगी

आई नेक्स्ट में ६ नवम्बर को प्रकाशित

Tuesday, October 21, 2008

वक्त के साथ जरूरी है बदलाव :एक पाती बेटे के नाम

प्रिय बेटा
तुम्हारा ई मेल मिला .मैंने भी ई मेल करना सीख लिया है ये तो तुम देख ही रहे होगे अब मुझे तुमहें चिठ्ठी भेजने के लिए पोस्ट ऑफिस के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे तुम्हारा भेजा हुआ मोबाइल मुझे तुम्हारा अहसास कराता है ऐसा लगता है कि तुम मेरे आस पास हो मैं तुमसे जब चाहूँ बातें कर सकता हूँ कितनी बदल गयी हैदुनिया मुझ जैसे ओल्ड एजेड परसन के लिए यह सब तो वरदान है लाइफ कितनी कम्फटेबल (comfortable) हो गयी है .तुमने लिखा है कि इस बार दीपावली पर तुम घर नही आ पाओगे दुःख तो हुआ लेकिन इस बात कि तस्स्सली भी है कि तुम भले ही कितनी दूर हो लेकिन मैं तुमसे जब चाहूँ बात कर सकता हूँ और विडियो कांफ्रेंसिंग से देख भी सकता हूँ .मैं जब पहली बार अपने घर से बहार निकला था तो चिठ्ठी को घर तक पहुँचने में सात दिन लग जाते थे और अमेरिका से तुम्हारा भेजा गया गिफ्ट दो दिन में मिल गया , पैसे भी मेरे अकाउंट में ट्रान्सफर हो गए हैं .शुगर फ्री चोकलेट तुम्हरी मां को बहुत पसंद आई.बेटा एक बात तुम मुझसे अक्सर पूछा करते थे कि पापा घर से स्कूल की दूरी तो उतनी ही रहती है लेकिन रिक्क्शे वाला किराया क्यों हर साल बढ़ा देता है मैं तुम्हें इकोनोमिक्स के जरिये किराया क्यों बढ़ता है समझाता था लेकिन मैं जानता था कि मैं तुम्हें समझा नहीं पा रहा हूँ .इतनी उमर बीतने के बाद मुझे ये समझ में आ गया है कि चेंज को रोका नहीं जा सकता है और अगर वह अच्छे के लिए हो रहा है तो हमें बाहें फैला कर उसका स्वागत करना चाहिए . जब तुमने पहली बार कंप्यूटर खरीदने की डिमांड की थी तो मैं बड़ा कन्फुज (confuse) था एक मशीन से पढ़ाई कैसे होगी लेकिन तुम्हारी जिद के आगे मुझे न चाहते हुए भी कंप्यूटर खरीदना पड़ा और इसी कंप्यूटर ने हम सब की जिन्दगी बदल दी शुरुवात में मुझे लगता था की उमर के आखिरी पडाव पर मै यह सब सीख कर क्या करूँगा मैं अपनी पुरानी मान्यताओं पर टिका रहना चाहता था .तुम्हें काम करते देख थोड़ा बहुत मैं भी सीख गया और आज जब तुम हम सब से इतनी दूर हो तुम्हारी कमी जरूर खलती है लेकिन लाइफ में कोई प्रॉब्लम नहीं है .मुझे याद है कि तुम्हारी इंजीनियरिंग की फीस के ड्राफ्ट के लिए मुझे आधे दिन की छुटी लेनी पड़ती थी और बैंक में धक्के अलग से खाने पड़ते थे आज एक ई मेल या फ़ोन पर ड्राफ्ट घर आ जाता है.मेरी पुरानी मान्यत्वाओं से तुम अक्सर सहमत नहीं रहा करते थे और रैस्न्ली मुझे समझाते भी थे समझता तो मैं भी था बेटा लेकिन चेंज एक झटके में नहीं होता .तुम जब पहली बार दीपावली में मिठायिओं के साथ चोकलेट के पैकेट ले आए थे तो मैंने तुम्हें डाटा था कि तुम अपनी परम्पराएँ भूलते जा रहे हो खील बताशे की जगह चोकलेट और डिजाइनर पैकिंग की मिठियां नहीं ले सकती शायद तुम्हें याद हो बेटा तुमने कहा था पापा परम्पराओं को जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता अगर खील बताशे के साथ चोकलेट आ गयीं तो बुरा क्या ? परम्पराएँ अपने टाइम को रिप्रसेंट करती हैं जब टाइम चेंज हो रहा है तो क्यों न परम्पराएँ भी बदली जायें .
वाकई तुम सही थे बेटा ई कामर्स से कागज और इंक की कितनी बचत हो रही है जिससे इंविओर्न्मेंट को फायदा मिल रहा है अपना शहर भी तेज़ी से बदल रहा है शौपिंग मॉल्स ,मल्टीप्लेक्स खुल रहे हैं अब खुशियाँ मनाने के लिए किसी त्यौहार का इंतज़ार नहीं करना पड़ता है जब तुम विदेश से लौटे थे तब हम पहली बार किसी होटल में खाना खाने गए थे , तुमने मुझसे से एक बात कही थी पापा सेविंग्स बहुत जरुरी है लेकिन आप खुशियाँ मनाने के लिए त्योहारों का इंतज़ार क्यों करते हैं आप होली दीपावली में मेरे कपड़े क्यों सिलवाते थे .हालाँकि उस वक्त मुझे तुम्हारी बात बुरी लगी थी . आज जब मैं अपने आस पास की दुनिया को देखता हूँ तब मुझे लगता है तुम सही थे मेरी उमर के तमाम लोग अपने ही बनाये नियम कानूनों में सिमटे रहना चाहते हैं वो बदलना तो चाहते हैं न जाने किस डर से वो हर चेंज को डर की नज़र से देखते हैं लेकिन तुम लोगों को देखकर लगता है कि तुम लोग जिन्दगी को एन्जॉय कर रहे हो और जीना इसी का नाम है तुम लोगों को अपने ऊपर भरोसा है रिस्क लेना का माद्दा है और रिस्क लेने वाला ही जीतता है मैंने जिन्दगी में रिस्क नहीं लिया और जिन्दगी भर क्लर्क बना रहा लेकिन तुमने मेरे लाख विरोध के बावजूद सरकारी नौकरी को छोड़ अपना बिज़नस शुरू किया और मुझे फख्र है कि मैं तुम्हारा फादर हूँ .खुश रहना मेरे बेटे
दीपावली की शुभकामनायें
तुम्हारा पापा
आई नेक्स्ट २१ अक्टूबर 2008 को प्रकाशित

Friday, October 3, 2008

समय प्रबंधन

दोस्तों अपने अक्सर सुना होगा लोग कहते हैं क्या बताएं समय ही नहीं मिलता करना तो बहुत चाहते हैं लेकिन समय की कमी आड़े आ जाती है वैसे सभी के लिए दिन भर में समय २४ घंटे का ही मिलता है लेकिन कोई उसका अधिकतम सदुपयोग करता है और जो नहीं कर पता है वो आज कल की भागती जिन्दगी में पीछे छूट जाता है अगर जिन्दगी में कदम से कदम, मिला कर आगे बढ़ना है तो आज की सबसे बड़ी जरुरत समय प्रबंधन ही है
प्रभावी रूप से समय के प्रबंध शुरू करने के लिए, आपको लक्ष्य निर्धारित करने की आवश्यकता है. उचित लक्ष्य निर्धारित करने के बिना, आप परस्पर विरोधी प्राथमिकताओं में फंसकर एक भ्रम पर अपना समय व्यर्थ नष्ट कर देंगे. बचपने में एक कहावत सुनी थी समय अमूल्य होता है समय के साथ बचपना तो कहीं पीछे छूट गया और दुनिया कितनी आगे निकल गयी लेकिओं इस कहावत का मतलब वैसे का वैसे ही है.
समय वाकई बहुत मूल्यवान है अब ये हमारे हाथ में है की हम समय का इस्तेमाल कैसे करते हैं ? कहते हैं न गया वक्त फ़िर हाथ आता नहीं तो समय के जाने से पहले इसका प्रबंधन इस तरह किया जाए की इसकी कमी न खले .शुरुवात अपने दैनिक जीवन से करते हैं यानि सबसे पहले जिन्दगी के कुछ लक्ष्य निर्धारित कीजिये और निश्चित समय में उन्हें पाने की कोशिश कीजिये.
ये लक्ष्य अपने करिएर से लेकर आपसी रिश्तों तक कुछ भी हो सकता है और उसके बाद अपनी प्राथमिकताओं का निर्धारण कीजिये कहने का मतलब यह है की जीवन के कई सारे लक्ष्यों में कौन सा लक्ष्य आपकी प्राथमिकता है जीवन के हर मोड़ के साथ हमारी प्राथमिकतायें बदलती रहती हैं कभी करिएर हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होता है कभी परिवार .
समय प्रबंधन के बिना जीवन में सफलता की सीढियां नहीं चढी जा सकती हैं इसके लिए कुछ सुझाव पर अमल करें आप देखेंगे की आपके पास समय ही समय है ये उपाय हैं
* जीवन के बारे में स्पस्ट नजरिया रखें
*आप अपने आप से क्या चाहते हैं इसका स्पस्ट रूप से आप को पता हो जिससे आप उसी अनुरूप समय प्रबंधन कर सकें
*न कहने की आदत डालें जिससे आप लोगों के दबाव में न आकर अपने समय का दुरूपयोग को बचा पायेंगे
*लक्ष्य को स्पस्ट रखें उसी अनुसार कार्य करें
*सब चलता वाला रवैया छोड़कर अनुशासन का पालन करना चाहिए
*अपने सोने और उठने का समय निर्धारित करना चाहिए .
*अपने निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए किंतु इसके लिए समर्पण और धैर्य का होना बहुत जरुरी है .
वैश्वीकरण की इस दुनिया में टिके रहने का एक ही रास्ता है आगे बढ़ते रहना और बढ़ते रहने के लिए जरुरी है की हमें अपने मंजिल का पता हो और रस्ते में आने वाली मुश्किलों का भी अंदाजा हो ऐसे में समय प्रबंधन से ही हम आगे बढ़ सकते हैं लेकिन इस बात का हमेशा ख्याल रखें कि जिन्दगी में सब कुछ आपके हिसाब से नहीं होगा और इस स्थिति का हम अपने जीवन में अक्सर सामना करते हैं.
ऐसी स्थिति आने पर न तो घबराना चाहिए और न ही अन्वाश्यक तनाव को अपने उप्पर हावी होने देना चाहिए
अन्वाश्यक तनाव आपको आपके लक्ष्यों से भटका सकता है धैर्यपूर्वक स्थिति का सामना कीजिये और अपने जीवन के लक्ष्यों को पुन: निर्धारित कीजिये और देखिये कितनी जल्दी आप सफलता के कितने करीब पहुँच जाते हैं . तो अब तक आप समझ चुके होंगे हमारी जिन्दगी में समय प्रबंधन की क्या अहमियत है तो इंतज़ार किस बात का है आज से ही अपनी जिन्दगी को व्यवस्थित कीजिये.
मुमकिन है सफर हो आसान अब साथ भी चल कर देखें
कुछ तुम भी बदल कर देखो कुछ हम भी बदल कर देखें
अब वक्त बचा है कितना जो और लड़े दुनिया से
दुनिया के नसीहत पर थोड़ा सा अमल कर देखें

आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित वार्ता

गाँधी जी के लिए

गाँधी जयंती मतलब टी वी पर गाँधी फ़िल्म , ड्राई डे , प्रभात फेरी रामधुन होलीडे बस अब हमारे लिए गाँधी जयंती के यही मायने हैं इस तेजी से बदलती दुनिया में हमें भी बदलना होगा नहीं तो पीछे छूट जाने का खतरा बना रहेगा तो इस बार गाँधी जयंती को मानाने का तरीका बदला जाएहम हैं नए अंदाज़ क्यों हो पुराना . लेकिन इसके लिए यह भी इम्पोर्टेंट है की गाँधी जी को और उनके विचारों को रियल सेंस में समझ लिया जाए गाँधी जी अभी आउट डेटेद नहीं हुए हैं वैसे गाँधी जी का दर्शन, गाँधी जितना ही सिंपल था. इसको समझने के लिए बुक्स पढने की जरूरत नहीं है जियो और जीने दो ख़ुद भी आगे बढो और दूसरों को आगे बढ़ने में मदद करो इसलिए गाँधी जयंती को हमें जिस तरह मनाने में खुशी मिलती है वही गाँधी जी को याद करने का सबसे बढ़िया तरीका है.आप सोच रहे होंगे की गाँधी का हमारी आज की लाइफ से क्या लेना देना ? थोड़ा सा दिमाग पर जोर डालिए ये सब कुछ हमारी जिन्दगी से जुडा हुआ मामला है गाँधी का दर्शन हमारी आज की लाइफ और दुनिया को बेहतर बना सकता है . गाँधी का जीवन ही उनका दर्शन था उनका सारा जीवन प्यार और अहिंसा की धुरी पर टिका हुआ था. गाँधी ने हमें प्यार और अहिंसा की ताकत का एहसास कराया माफी मांग लेना साहस का काम है कायरता नहीं. इस फिलोसफी को अगर हम अपनी लाइफ से जोड़े तो हमें लगेगा की यह तो आर्ट ऑफ़ लिविंग है. इसलिए जब तक लाइफ रहेगी गाँधी का आर्ट ऑफ़ लिविंग भी रहेगा.
अब इस आर्ट ऑफ़ लिविंग को भूलने का क्या रिजल्ट हो रहा है इसको समझने की कोशिश करते हैं .हमने कभी सोचा है कि हमारी आज की जिन्दगी इतनी कोम्प्लिकैटेद क्यों होती जा रही है ?एक झूट को सच बनाने के लिए सौ झूट बोलना पड़ता है चूँकि पैसेंस किसी के पास है नहीं इसलिए कोई वेट नहीं करना चाहता है. कम समय में बहुत कुछ पा लेने की चाह स्ट्रेस पैदा करती है और स्ट्रेस फ्रस्ट्रेशन और एंगर को पैदा करता है इन सारी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन गाँधी के दर्शन में है गाँधी कहा करते थे इस धरती में सभी की आवश्कताओं को पूरा करने की क्षमता है लेकिन किसी एक व्यक्ति के लालच को वह पूरा नहीं कर सकती. हमारे पास जो कुछ है उसमे संतुष्ट रहने की बजाय हम कुछ और पाने के आशा करते रहते हैं और अकारण तनाव का शिकार होते हैं. सच बोलना महज़ किताबी जुमला नहीं है बल्कि एक सच्चाई है क्योंकि सच , सच होता है और झूट , झूट है (मोबाइल पर हम दिन भर में कितना झूट बोलते हैं ) ये स्ट्रेस और फ्रस्ट्रेशन दिमाग में वाइलेन्स पैदा करता है. इस स्थिति से हम अपनी रियल लाइफ में रोज दो -चार होते हैं रिक्शे वाले से दो -चार रुपये के लिए झगडा ,सड़क पर पहले गाड़ी कौन निकालेगा और न जाने क्या -क्या .आख़िर क्यों ? हम पलट कर देखें की हमारी रोज की जिन्दगी में हम लोगों से प्यार से कितना बोलते हैं किसी परेशान आदमी की जगह हम अपने आप को रखकर देखें तो शायद प्रॉब्लम बिगाड़ने न पायें और सिचुअशन को ख़राब होने से बचाया जा सके .सही बात को सही तरह से रखा जाए तो उसका असर लंबा होता है . कानून को अपने हाथ में लेना ,हड़ताल किसी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन नहीं हो सकता है .गाँधी भी प्रतिरोध करते थे और उनके प्रतिरोधों का ही परिणाम है कि आज हम आजाद हवा में साँस ले रहे हैं . वाइलेंस के लिए एक सभ्य समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए आत्म संयम से बड़ा कोई डिस्पिलिन नहीं है ये कुछ ऐसे जीवन मूल्य हैं जो गाँधी जी हमारे लिए छोड़ गए हैं ताकि जब कभी हयूमनिटी खतरे में हो ये ज्योति पुंज उसकी मदद करें . आज से गाँधी जी के आर्ट ऑफ़ लिविंग को अपनाइए देखिये जिन्दगी कितनी खुशगवार हो जायेगी आपकी और दूसरों की भी, और शायद ये सबसे अच्छा गिफ्ट होगा गाँधी जी को हमारी तरफ़ से

Monday, September 15, 2008

सबको लुभाती पैसे की खनक

फिल्मों और पैसों का गहरा रिश्ता है आज समझते हैं हिन्दी फिल्मी गाने पैसों को कितनी अहमियत देते हैं.पैसा ओ पैसा ये हो मुसीबत न हो मुसीबत (क़र्ज़ )कुछ ऐसी ही कहानी है आज की दुनिया मैं पैसे की आज जिसके पास पैसा है वो और ज्यादा पाना चाहता है जिसके पास नहीं है वो भी पैसा पाना चाहता है मतलब “पैसा पैसा करती है ये दुनिया” (सलीमा ), लापरवाह फ़िल्म का ये गाना तो यही बताता है “पैसा जिसके पास है दुनिया उसकी दास है” . पैसे की माया अपरम्पार है शायद इसी दर्शन को काला बाज़ार फ़िल्म का यह गाना आगे बढाता है “ठन ठन की सुनो झंकार कि पैसा बोलता है” . पैसा सर चढ़ कर बोलता है गलोब्लिजेशन के इस दौर में हर आदमी पैसा कमाने के किसी मौके को चूकना नहीं चाहता है .पैसा इंसान की एक जरूरत है लेकिन आज के इस दौर में ऐसा लगता है कि पैसा इंसान की एक मात्र जरुरत है पैसे पाने की चाह में कहीं छूटती जा रही है रिश्तों की गरमी और अपनेपन का एहसास सब कुछ मशीनी होता जा रहा है कोई बीमार है देखने जाने की बजाय कुछ कम पैसे खर्च करके एस ऍम एस भेज दीजिये गेट वेल सून , काम हो गया शुभकामना संदेश भेजना हो तो इ मेल कर दीजिये. और कुछ जयादा पैसे हों तो तरह तरह के कार्ड तो मौजूद हैं मतलब सारा खेल पैसे का ही है, सही ही कहा गया है सफलता अपनी कीमत मांगती है अगर आगे बढ़ना है तो समय के साथ तो दौड़ना ही पढेगा नहीं तो हम पीछे छूट जायेंगे.तो परवाह किसे है रिश्तों की गर्मी और अपनेपन के एहसास की अब किसे याद आती है गरमी की उन रातों की जब पुरा घर छत पर सोता था कूलर और एसी के बगैर भी वो रातें कितनी ठंडी होती थीं या जाडे की नर्म दोपहर में नर्म धूप सेंकते हुए सुख दुःख बांटना और वो नर्म धूप किसी हीटर के बगैर भी कितनी गरमी देती थी. वो छत पर बैठकर यूँ ही तारों को देखना .
विकास तो खूब हुआ है समय और स्थान की दूरियां घटी है इन सब के बावजूद दिलों में दूरियां बढ़ी है एक दूसरे पर अविश्वास बढ़ा है पैसा तो खूब है ,चैन नहीं है . होली या दीपावली की तैयारी महीनो पहले से होती थी चिप्स या पापड़ बनाने का मामला हो या पटाखे की खरीददारी कोई बनावट नहीं थी लेकिन आज तो “पैसा फैंको तमाशा देखो” (दुश्मन ) सब कुछ रेडी मेड है चिप्स पापड़ से लेकर चोकलेट में तब्दील होती हुई मिठाइयों तक , लेकिन रिश्ते न तो रेडी मेड होते हैं और न ही बाज़ार में मिलते हैं रिश्ते तो बनते हैं प्यार की उर्जा ,त्याग समर्पण और अपनेपन के एहसास से रिश्ते तो ही मकान को घर बनते हैं आज मकान तो खूब बन रहे हैं लेकिन घर गायब होते जा रहे हैं. त्यौहार मनाने के लिए अब साल भर इंतज़ार करने की जरुरत नहीं जेब में पैसा हो तो हर दिन दसहरा है और रात दिवाली है लेकिन मनी मस्ती और मोबाइल ही जिन्दगी नहीं है आज पैसा पॉवर का पर्यायवाची बन गया है . विटामिन ऍम (मनी ) का अत्यधिक सेवन समाज के स्वास्थ्य में समस्या ला सकता है विटामिन स्वास्थ्य के लिए अच्छे होते हैं लेकिन अति किसी भी चीज की बुरी होती है ऐसे में पैसे की प्यास को नियंत्रित करना जरुरी है मनी को जीवन का एक मात्र मिशन बनाना मनुष्य के मन की संवेदनाओं को मार सकता है . ये समय की मांग है या किसी भी कीमत पर सफल होने की चाह ? तो रिश्तों को कारपोरेट करण होने से बचाइए और चलिए आज यूँ करें की किसी पुराने रिश्ते को जिन्दा किया जाए किसी परिचित दोस्त या रिश्तेदार के घर बगैर किसी काम के चला जाए और देखा जाए कि बगैर पैसे के भी दुनिया में काफी जुटाया जा सकता है .
निदा फाजली साहब की इन पंक्तियों के साथ आप से विदा लेता हूँ:
मुमकिन है सफर हो आसां अब साथ भी चल कर देखें
कुछ तुम भी बदल कर देखो , कुछ हम भी बदल कर देखें
आंखों में कोई चेहरा हो , हर गाम पे एक पहरा हो
जंगल से चलें बस्ती में दुनिया को संभल कर देखें
दो -चार कदम हर रास्ता पहले की तरह लगता है
शायद कोई मंज़र बदले कुछ दूर तो चल कर देखें
लेखक मीडिया एक्सपर्ट हैं
आई नेक्स्ट १५ सितम्बर 2008 को प्रकाशित


Thursday, August 28, 2008

हर आँख में एक सपना हो …..

आज बात शुरू करते हैं सपनों से सपने हर इंसान के जेहन की एक ऐसी वर्चुअल रिअलिटी है जो वास्तविक न होते हुए भी उसे वास्तविक लगती है लेकिन यथार्थ को बेहतर बनानने का रास्ता सपनों से ही हो कर जाता है शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसने सपने नहीं देखे होंगे और जो सपने देखकर उनको सच करने की कोशिश करता है दुनिया उसे सफल मानती है . हिन्दी सिनेमा भी तो एक सपने की दुनिया का निर्माण करता है फिल्मों की कहानी और हर गीत के पीछे एक सपना ही तो होता है. इस दुनिया में शायद हर विचार के पीछे एक सपना ही होता है. फिल्मों ने सपने का प्रयोग कई गीतों में किया है जैसे मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू , तेरे मेरे सपने अब एक ही रंग हैं, एक न एक दिन ये कहानी बनेगी तू मेरे सपनों की रानी बनेगी, सपने सुहाने लड़कपन के मेरे नयनों में डोले बहार बन के, या फ़िर जैसे की सपने होते हैं सपने हैं सपने कब हुए अपने. वैसे सपनों की कहानी हमारे जीवन के साथ बढ़ती चली जाती है बचपन में दादा दादी नाना नानी की कहानियो से शुरू हो कर जीवन के अन्तिम समय तक चलती रहती है. बचपन में हम अच्छे खिलोनो का सपना देखते हैं तो जवानी में एक अच्छे जीवन साथी या एक बेहतर भविष्य का , चाँद तारे तोड़ लाऊं बस इतना सा ख्वाब है, और जीवन की शाम में हम उन सपनों का सपना देखते हैं जो हमने जवानी में देखे और उन्हें पूरा किया, सपने में देखा सपना, तो सपने देखने का ये सिलसिला पूरी उम्र चला करता है. लेकिन सही मायने में सपने देखने और उन्हें पूरा करने की उम्र तो जवानी ही है, क्योंकि तब तक आप जिन्दगी की हकीकत को समझ चुके होते हैं बचपने की नादानियों की जगह आप भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश में जुट जाते हैं और इस दौर के मालिक आप ख़ुद होते हैं और शायद इसीलिए हमारी फिल्मों के ज्यादातर किरदार युवाओं पर ही केंद्रित होते हैं क्योंकि युवाशक्ति ही वह शक्ति है जिसमें सपने देखने की ललक और उन्हें पूरा करने की ताकत होती है फिल्मों में दिखाया गया संसार भले ही काल्पनिक हो,कथानक और समस्या से निबटने का तरीका अवास्तविक हो लेकिन समाधान कहीं न कहीं वास्तविकता के आस पास होता है लगे रहो मुन्ना भाई” की गांधीगिरी इसका एक उदाहरण है “रंग दे बसंती” का कैडल मार्च भी हमें ये दिखाता है कि फिल्मों के समाधान वास्तविक जिन्दगी में काम कर सकते हैं सपने की ये कहानी भले ही आपको सपने जैसी लगे लेकिन विश्वास जानिए कि इस संसार में जो कुछ बेहतर हो रहा है उसके पीछे किसी का सपना जरूर है अगर हमने हवा में उड़ने का सपना न देखा होता तो शायद आज हम हवाई जहाज की यात्रा का आनंद नहीं ले रहे होते. मानव सभ्यता का विकास एक सपने का ही परिणाम है जो हमारे पूर्वजों ने देखा इसलिए सपने देखिये लेकिन ध्यान रहे सिर्फ़ सपने देखने से कुछ भी हासिल न होगा उन सपनों को हकीकत में बदलने की कोशिश कीजिये, और न कर पाइए तो तो उस सुंदर सपने को आने वाली पीढीयों के लिए छोड़ जाइये सपने जीवन का अभिन्न अंग हैं जो सिर्फ़ आपके हैं और जिन्हें आप से कोई नहीं छीन सकता है हम आज अगर बढे हैं तो कहीं न कहीं उसमे सपनों का योगदान जरूर है और उन सपनों को शुक्रिया कहने का सब से सुंदर तरीका है कि एक सुंदर सा सपना देखा जाए, हिन्दी फिल्में भी हमें सपने देखने के लिए प्रेरित करती हैं लेकिन सपने सिर्फ़ सपने देखने के लिए नहीं बल्कि अपने आस पास की दुनिया को बेहतर बनाने के लिए देखिये .
मुझे वीरेन डंगवाल जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है
मैं तसली झूठ मूठ की नहीं देता
हर सपने के पीछे एक सच्चाई होती है
हर कठिनाई कुछ न कुछ राह दिखा ही देती है
जब चल कर आए हैं इतने लाख वर्ष तो
आगे भी चल कर जायेंगे
आयेंगे आयेंगे
उजले दिन जरूर जायेंगे
आप सब से इस उम्मीद के साथ विदा लेता हूँ की इस दुनिया को बेहतर बनाने का आप सब जरूर एक सपना देखेंगे
आएये देखते हैं एक सुंदर सा सपना
आई नेक्स्ट में २८ अगस्त को प्रकाशित

Friday, August 8, 2008

मेरे घर आना जिन्दगी

जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफर कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं .ऐसी ही है जिन्दगी इसको समझने की कोशिश तो बहुत से दार्शनिकों , चिंतकों ने की लेकिन जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबह शाम , वास्तव में जिन्दगी तो चलने का ही नाम है और ये बात कितनी आसानी से एक फिल्मी गाने ने हमें समझा दी.हिन्दी फिल्मों के गाने यूँ तो पुरे देश में सुने और सराहे जाते हैं लेकिन ज्यादातर लोग इन गानों को गंभीरता से नहीं लेते .हिन्दी फिल्मों के गानों की एक अलग दुनिया है. और इस रंग बिरंगी दुनिया में जिन्दगी के लाखों रंग हैं सामान्य जन (Masses) को समझाने की बात आती है तो जो काम ये फिल्मं गाने कर सकते हैं वो बड़े से बड़ा साहित्यकार भी नहीं कर सकता. और अगर प्रशन जिन्दगी को समझने का हो तो काम और भी मुश्किल हो जाता है लेकिन गाने कितनी आसानी से जिन्दगी की दुश्वारियों , परेशानियों , अच्छाइयों को हमारे सामने लाते हैं .अब अगर लोगों के मिलने बिछड़ने की बात करें तो जिन्दगी के सफर में बिछड़ जाते हैं जो मुकाम वो फ़िर नहीं आते (आप की कसम), जिन्दगी की पहेली को उलझाता सुलझाता आनंद फ़िल्म का ये गाना जिन्दगी कैसी है पहेली हाय .हिन्दी फिल्मों के गानों में जिन्दगी के दर्शन को बहुत करीब से समझने की कोशिश की गयी है .जिन्दगी का टाइम अनिश्चित है इसलियी ज़मीर फ़िल्म के इस गाने में कहा गया है जिन्दगी हसने गाने के लिए है पल दो पल और इसी दर्शन को आगे बढाता अंदाज़ फ़िल्म का ये गाना जिन्दगी एक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना और जिन्दगी की सबसे बड़ी पहेली यही है की कल क्या होगा कल जो होना है फ़िर उसके लिए आज ही से क्यों परेशां हुआ जाए, लेकिन जिन्दगी खूबसूरत तो तभी होती है जब कोई साथी जिन्दगी में हो और शायद अनारकली फ़िल्म का ये गीत कहता है जिन्दगी प्यार की दो चार घड़ी होती है. साजन फ़िल्म के इस गाने में गीतकार अपने चरम पर है सांसों की जरुरत है जैसे जिन्दगी के लिए एक सनम चाहिए आशिकी के लिए प्यार की इसी ताकत का एहसास करता क्रांति फ़िल्म का ये गाना कि जिन्दगी की न टूटे लड़ी प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी .लेकिन जिन्दगी सीधी सपाट नहीं होती है और इसकी कई रंग होती हैं इसीको समझने की कोशिश करता आदमी और इंसान फ़िल्म का गाना जिन्दगी के रंग कई रे ओ साथी रे हम कई आयामों से जिन्दगी को समझने की कोशिश जरूर कर रहे हैं लेकिन फ़िर भी सत्यकाम फ़िल्म के इस गाने की तरह जिन्दगी है क्या बोलो जिन्दगी है क्या , यह तो एक व्यक्ति के द्रष्टिकोण के ऊपर निर्भर करता है.जिन्दगी में हमें जो मिला है या तो उससे संतुष्ट हो जाएँ या जिन्दगी को बेहतर बनांने की कोशिश करते रहें क्योंकि जिन्दगी रुकती नहीं किसी के लिए चलता रहे इंसान मुनासिब है जिन्दगी के लिए, मुझे समाधि फ़िल्म का एक गाना याद आ रहा है ये जिन्दगी है कौम की तू कौम पर लुटाये जा दोस्तों जिन्दगी तो एक ही है हाँ उसके रंग अलग अलग हैं और अगर जिन्दगी में उतार चढाव न हों तो जिन्दगी बेरंगी हो जायेगी ,फैसला हमें करना है हम अपने जीवन को शिकायत करते और दूसरों के बदलने के इंतज़ार में ख़तम कर दें या उस जिन्दगी को जो हमें मिली है बेहतर बनाने की कोशिश करें किस्सा छोटा सा है फलसफा बड़ा जो सफर प्यार से कट जाए वो प्यारा है सफर नहीं तो मुश्किलों के दौर का मारा है सफर अगली बार जब आप कोई प्यारा सा फिल्मी गाना सुने तो जरुर उसके माध्यम से जिन्दगी को समझने की कोशिश कीजियेगा. सीता और गीता फ़िल्म का गाना है जिन्दगी है खेल कोई पास कोई फ़ेल तो जिन्दगी के इस खेल को खेल की भावना से खेलिए और विरोधियों का दिल जीतने की कोशिश कीजिये क्योंके कोशिशें ही कामयाब होती है. जिन्दगी को बेबसी मत बनने दीजिये जिन्दगी को समझने का सिलसिला दूरियां फ़िल्म के इस गीत के माध्यम से ख़त्म करता हूँ जिन्दगी मेरे घर आना जिन्दगी .
जल्दी ही मुलाकात होगी
आई नेक्स्ट में ९ अगस्त 2008 को प्रकाशित

Wednesday, August 6, 2008

कुछ नमूने मेरी रचनाओं के



http://pressinstitute.org/U_Images/Vidh92.pdf
http://pressinstitute.org/U_Images/Vidh74.pdf

http://www.upkram.org/emagzine.php?pg=59


http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/10/071003_lucknow_bca.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/04/070424_workshop_lucknow.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2008/01/080110_lucknow_blind.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2008/02/080220_lady_electrician.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2008/04/080428_parul_boat.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2008/08/080804_preeti_album_lucknow.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/07/090730_lucknow_watch_skj.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/10/091018_saudi_jail_adas.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/11/091129_dalit_mortuary_adas.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/02/100222_music_punishment_mb.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2010/02/100228_holi_songs_sz.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/04/100427_kisan_robotp_awa.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/07/100724_mango_wine_dps.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/12/101224_waiter_doctor_ak.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/03/110308_cycle_english_va.shtml


http://www.dw-world.de/dw/article/0,,5242012,00.html
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/08/110824_mobile_news_ms.shtml
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/04/120414_dargarh_cigarette_ac.shtml



http://www.ichowk.in/culture/leh-is-flooded-with-labourers-from-bihar/story/1/774.html
http://www.ichowk.in/cinema/mentality-of-caste-system-is-deep-rooted-in-bollywood-too/story/1/1274.html
http://www.ichowk.in/culture/leh-3-idiots-jab-tak-hai-jaan-cinema-hall-district-administration-school-laddakh/story/1/912.html

http://www.khabarnonstop.com/2017/01/10/do-not-underestimate-women-power/

http://www.thelallantop.com/jhamajham/kitchen-utensils-from-the-era-of-your-grandparents-their-pictures-and-names-and-their-uses/

Friday, July 18, 2008

दर्द से रिश्ता बनाती फिल्में

मेरे जैसी पीढी के लोगों को बचपने से एक बात मुगली घुट्टी की तरह पिलाई गयी है कि फिल्में देखना बुरी बात है फ़िल्म देखने से आप बिगड़ जायेंगे . फिल्में कोरी फंतासी दिखाती हैं और रियलिटी से उनका कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता. फिल्मों के कथानक चाहे जितने ही काल्पनिक क्यों न हों वे समय और समाज से कटे हुए नहीं रह सकते सिनेमा ने हमेशा समाज को आइना दिखाया है, और बताया है सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं अपितु एक संसार है जो जीवन के हर एक भाग को छूता ही नहीं बल्कि प्रभावित भी करता है .उनका प्रस्तुतीकरण भले ही काल्पनिक हो लेकिन प्रॉब्लम अपने टाइम की ही होती हैं जैसे लोगों को फिल्में देखने का रोग होता है वैसे ही हिन्दी फिल्मों ने समय समय पर विभिन्न रोगों को कहानी का आधार बनाया है और दर्शकों को बताने की कोशिश की है की ये रोग क्या हैं ?भले ही ये बात आपको आश्चर्य जनक लगे लेकिन फिल्में समय से निरपेक्ष नहीं रह सकती जो भी समाज में है वो फिल्में जरूर दिखाती है.बात शुरू करते हैं १९५३ में बनी फ़िल्म आह से, उस वक़्त तपेदिक या टीबी एक लाइलाज रोग था नायक राजकपूर टीबी का शिकार होता है लेकिन नायिका नर्गिस तमाम सामाजिक प्रतिरोधों के बावजूद नायक का साथ देने का फ़ैसला करती है .खामोशी फ़िल्म मानसिक रोग की समस्या को दिखाती है .हिन्दी सिनेमा के इतिहास मे जिस रोग को सबसे ज्यादा बार दिखाया गया है वह है कैंसर आनंद ,सफर , मिली दर्द का रिश्ता ,वक्त रेस अगेंस्ट टाइम सभी फिल्मों के कथानक का आधार कैंसर ही था कमजोर ह्रदय की बीमारी पर मशहूर फ़िल्म कल हो न हो या यादाश्त जाने की बीमारी पर बनी फ़िल्म सदमा में श्रीदेवी और कमल हसन के भाव प्रवण अभिनय को कौन भूल सकता है जल्दी ही प्रर्दशित हुई फ़िल्म तारे जमीन पर दिस्क्लेसिया बीमारी की प्रॉब्लम से जूझ रहे पेरेंट्स के लिए उम्मीद की एक नयी किरण लेकर आयी है इसी कड़ी में स्जोफ्रिनिया रोग पर आधारित फ़िल्म यु मी और हम का नाम लिया जा सकता है . अंधेपॅन की समस्या रोग है या विकलांगता यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन हमारे फिल्मकारों ने इस समस्या को बड़े ही सार्थक तरीके से सिनेमा के परदे पर उतारा है.
अंधेपन की समस्या पर बनी फिल्मों में दोस्ती , मेरे जीवन साथी , जुर्माना, स्पर्श, ब्लैक , आँखें (नयी ), परवरिश आदि. प्रमुख हैं . ऐड्स रोग पर बनी फ़िल्म फ़िर मिलेंगे और माय ब्रदर निखिल ने जिस तरह रोग के बारे में दर्शकों को जागरूक किया है वो सराहनीय है . अगर इन फिल्मों के टाइम पीरिअड पर गौर करें तो साफ पता चलेगा की जिस टाइम पर समाज जिस रोग का जायदा शिकार हो रहा था फिल्मों की कहानियो में वैसे ही रोग शामिल हो रहे थे . फिल्मों में रोगी का चित्रण वास्तविक रोगियों में एक आशा का संचार करता है जो किसी भी गंभीर रोग से पीडित व्यक्ति के लिए बहुत जरुरी है उसे जीने की शक्ति और सकरात्मक उर्जा मिलती है. यानि लिव लाइफ किंग साइज़ हिन्दी फिल्मों का एक मशहूर डायलोग है इसे दवा की नहीं दुवा की जरुरत है ऐसी फिल्में वाकई रोगियों के लिए दुवा का काम करती है. ये फिल्मों का रोग है या रोग पर बनती फिल्में इसका आंकलन किया जाना बाकी है लेकिन जो लोग हिन्दी फिल्मों को निम्न स्तर का मानते हैं उनेह यह समझना जरुरी है की फिल्में पैसा कमाने का जरिए हो सकती हैं लेकिन फिल्मकारों को अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का एहसास है और जिसका रिफ्लेक्शन इन रोगों पर बनी फिल्मों में दीखता है .हमें यह नहीं भूलना चाहिए की भारत एक बड़ी जनसख्या वाला देश है जहाँ स्वास्थय जागरूकता के नाम पर सरकार ने भले ही अरबों खर्च कर दिए हों लेकिन अभी भी पल्स पोलियो जागरूकता अभियान के लिए अमिताभ बच्चन , शाहरुख़ खान और आमिर खान जैसे फिल्मी सितारों की मदद लेनी पड़ती है . ये एक्साम्पल है आम जनता का फिल्मों पर भरोसे का हर मीडिया की तरह फ़िल्म मीडिया की भी अपनी सीमायें हैं जिसमे व्यवसाय भी एक बड़ा करक है लेकिन रोगों पर बनने वाली फिल्मों की कम संख्या के लिए हम फिल्मकारों को दोष नहीं दे सकते हैल्थ आज भी एक आम आदमी की प्राथमिकता में बहुत नीचे है और शायद यही कारण है कि रोगों और रोगियों को ध्यान में रखते हुए ऐसी फिल्में कम बनती हैं. इसके बावजूद रोगों के बारे में जागरूकता फैलाने में फिल्मों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है.
१८ जुलाई 2008 को आई नेक्स्ट में प्रकाशित

Wednesday, July 2, 2008

समझ से सब संभव है

भारत में महिलाओं की स्थिति की बात की जाती है तो तुंरत उन्हें देवी का रूप मानकर एक आइडियल इमेज में बाँध दिया जाता है आदर्श माता , आदर्श पत्नी ,आदर्श बहू और न जाने क्या क्या गोया वो एक इंसान न हो कर एक मूर्ति हो जाती है और इसी सांचे में हमारा समाज एक महिला को देखना चाहता है. कोई भी महिला इस सांचे से बाहर जाती है तो उसे न जाने किन किन संबोधनों से नवाजा जाता है पिछले दिनों इस बात पर जोरदार चर्चा चली कि आज कल महिलाएं यौन स्वेच्छाचारिता का शिकार हैं और इनमें बड़ी भूमिका टीवी सीरियलो की है जिनमें विवाहेत्तर सम्बन्ध खूब दिखाए जा रहे हैं. जिनका समाज पर बुरा असर पड़ रहा है .पुरषों के विवाहेत्तर सम्बन्ध समाज आसानी से पचा लेता है किंतु महिलाओं के बारे में उसके अलग मानदंड होते हैं. जैविक रूप से दोनों ही मानव हैं.
किंतु समाज ने दोनों के लिए अलग अलग दायरे निश्चित कर दिए हैं महिलाओं की दशा सुधारने के लिए ये माना जाता है कि उन्हे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया जाना चाहिए लेकिन जब ये महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलम्बी होकर अपने जीवन के फैसले ख़ुद लेना शुरू कर देती हैं जिनमें जीवन साथी के चुनाव से लेकर यौन आनंद के तरीके तक सभी शामिल हैं तब महिलाओं के बारे में तरह तरह के सवाल उठाये जाने लगते हैं.महिलाओं को आगे बढाया जा रहा है लेकिन ऐसा करना समय की मांग है उदारी करण के इस युग में जहाँ आर्थिक विकास सफल होने का मुख्य आधार है समाज की आधी आबादी को घरों में बंद रखकर विकसित नही हुआ जा सकता किंतु उन्हे कितना आगे बढ़ना है और कैसे इसका फ़ैसला पुरूष ही कर रहे हैं यौन स्वच्छंदता के बारे में जितने भी विचार मानक हैं वो पुरूष मानसिकता से ग्रस्त हैं कोई महिला अपना यौन व्यवहार कैसे निर्धारित करेगी यह अभी भी उसके हाँथ में नहीं है खुलापन हमारे दिमाग में नहीं आ रहा है हम ये मान ही नहीं पाते की महिलाएं भी भावनाएं रखती हैं .एक तरफा प्यार में होने वाली दुर्घटनाओं का ज्यादा शिकार महिलाएं ही होती हैं क्यों ? क्योंकि वे अपनी यौन इच्छा का खुले आम इज़हार कर देती हैं .पुरूष ठुकराया ज़ाना या हारना नहीं चाहते हैं .
प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं का यौन आचरण निर्धारित करने के मामले में पुरूष मानसिकता कब तक हावी रहेगी और ये स्थिति समाज के दोहरे चरित्र को उजागर करती है यह कैसे सम्भव है कि महिलाओं का कोई कार्य समाज के लिए नुकसानदायक हो किंतु पुरुषों द्वारा किया गया वही कार्य समाज आसानी से पचा लेता है . किसी भी समाज के विकास के लिए महिलाओं और पुरुषों का आर्थिक , सामाजिक एवं मानसिक रूप से बेहतर होना जरूरी है किंतु बेहतरी के ये पैमाने लिंगभेद के चश्मे से नहीं देखे जाने चाहिए. महिलाओं द्वारा किया गया कोई कार्य अगर समाज के लिए सही नहीं है तो पुरुषों के उन कार्यों को भी ग़लत माना जाना चाहिए .यह कहना कि महिलाएं ऐसा कर रही हैं तो समाज में समस्या हो रही है उचित नहीं होगा .समाज में पैदा होने वाली कोई भी कुंठा समान रूप से पुरुषों और महिलाओं के लिए नुक्सान दायक होगी. हालाँकि स्तिथियाँ बदल रही हैं लेकिन उनकी गति बहुत धीमी है ये कुछ इसी तरह का मामला है की कुछ लाख शहरी घरों के टी वी केबल कनेक्शन से निर्धारित होने वाली टी आर पी किसी टी वी कार्यकर्म की लोकप्रियता को पूरे देश के सन्दर्भ में बता दिया जाता है उसी तरह कुछ शहरों में होने वाला बदलाव यह नहीं इंगित करता की महिलाओं के यौन व्यवहार को लेकर हमारा नजरिया बदल गया है ग्लोबलाइजेसन के दौर में हम दोहरे मापदंड ले कर समाज को आगे नहीं बढ़ा सकते. महिलाएं भी हाड मांस का पुतला हैं और उनकी भी अपनी भावनाएं संवेदनाएं हैं ऐसे में उनसे हर जगह पूर्ण आदर्श की उम्मीद करना उचित नहीं होगा वक्त की मांग है की महिलाओं को मानववादी नजरिये से देखा जाए और उनके कार्यों का आंकलन करते वक्त ये न भूला जाए की उनके सीने में भी एक दिल है जो अपने तरीके से जीना चाहता है आगे बढ़ना चाहता है

२ जुलाई २००८ को  आई नेक्स्ट में प्रकाशित

Friday, June 20, 2008

इटली यात्रा :अंतिम भाग

बोलोना के विशाल चर्च 
अब मेरे लौटने का दिन करीब आ चुका था |पूरे इटली में बहुत से चर्च हैं और बोलोना कोई अपवाद नहीं हैं |कुछ चर्च तो एक हजार साल पुराने हैं |मेरा कई चर्चों में जाना हुआ और हर जगह एक रूहानी शांति का अनुभव हुआ कारण सीधा था भगवान् और भक्त के बीच कोई बिचौलिया अर्थात पुजारी नहीं था |मैंने अपनी इच्छा से कुछ चर्च में मोमबत्तियां जलाईं और उनके वास्तु का गहनता से अध्ययन किया |सब कुछ शांत और मोहक था |
आख़िरी दिन बहुत व्यस्तता भरा था |पहले मुझे बोलोना विश्वविद्यालय के नए कैम्पस जाना था जहाँ मुझे एक व्याख्यान देना था|
बोलोना विश्वविद्यालय का नया परिसर 

बोलोना विश्वविद्यालय का नया परिसर 
उसके बाद बोलोना से पचास किलोमीटर दूर एक गाँव में एक विदाई भोज रखा गया था |गाँव में भोज का कारण मुझे बाद में बताया गया कि मैं इटली के ग्रामीण जीवन की एक झलक ले सकूँ |पहले मैं चल पड़ा बोलोना विश्वविदयालय के नए कैम्पस यह पुराने कैम्पस के मुकाबले ज्यादा खुला और विशाल था |जहाँ सब कुछ वैश्वीकरण के रंग में रंगा था |व्यख्यान से पहले मुझे पूरा विश्वविद्यालय घुमाया गया |मुझे बार –बार अचंभित करने वाली बात यही लग रही थी की किसी यूनिवर्सिटी में बार कैसे हो सकता है ?पुराने कैम्पस की तरह यहाँ भी बार था |जब मैंने अपना कौतुहल वहां के शिक्षकों के साथ बांटा तो सभी मुझे ऐसे देखने लगे जैसे मैंने कोई अजीब सी बात कह दी हो |विश्वविद्यालय की विशालता के आगे वहां छात्र संख्या बहुत कम थी इसके पीछे कारण यह बताया गया कि  यहाँ लोग उच्च शिक्षा कम ही लोग प्राप्त करने आते हैं ज्यादातर पहले ही उन्हें रोजगार मिल जाता है तो उच्च शिक्षा में लोग सिर्फ शोध करने के मकसद से ही आते हैं जिससे परिसर में भीड़ कम रहती है |एक बार  फिर भारत  और यहाँ के विश्वविद्यालय याद  आ गए |सिल्विया साए की तरह मेरे साथ थी जहाँ भाषा की समस्या आती वो हाजिर हो जाती |
दोपहर होने को आयी थी अब हम चल पड़े इटली के ग्रामीण जीवन की झलक देखने चारो तरफ खेत और उनके बीच में बना कॉटेजनुमा आवास जहाँ हमारे लिए भोजन की व्यवस्था की गयी थी |पुडिंग पेस्ट्री से लेकर अनेक शाकाहारी –मांसाहारी व्यंजन बारबेक्यू सजा हुआ था ,सच कहूँ तो ऐसा द्रश्य इससे पहले सिर्फ होलीवुड की फिल्मों में ही देखा था और एक दिन मैं ऐसी किसी पार्टी का हिस्सा बनूँगा ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था ,बाग़ में कुछ फल जाने पहचाने थे पर कुछ फलों के बारे में बिलकुल भी नहीं जानता था |सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर सिस्टम था जिससे खेत में बारिश में जैसे पानी बरसता है उसी विधी से सिंचाई की व्यवस्था थी |कुछ जंगली खरगोश भी फुदकते दिखे |
महिला बस चालक 
पर मैं वहां के लोगों से ज्यादा घुल मिल नहीं पाया क्योंकि उनमें से ज्यादातर अंग्रजी नहीं जानते थे और उनलोगों से बात करने के लिए बार –बार मुझे सिल्विया की मदद लेनी पड़ती |
मेरी अगले दिन सुबह की फ्लाईट थी जो पेरिस होते हुए मुझे भारत लाने वाली थी आने से पहले मुझे कुछ स्मारक चिन्ह खरीदने थे जिसके लिए बाजार जाना था और रात का खाना सिल्विया के उस घर में खाना था जहाँ वह अपने पुरुष मित्र के साथ रहती थी तो भाग दौड़ ज्यादा थी |हमने गाँव से विदा ली और बाजार लौट आये जहाँ एक और आश्चर्य मेरा इन्तजार कर रहा था जब बाजार में मैंने एक महिला बस चालाक को देखा जो बगैर किसी परेशानी के अपने काम को अंजाम दे रही थी मैंने पलक झपकाए बिना उसकी कई तस्वीरें खींच डालीं |सिल्विया ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं किसी दूसरे ग्रह से आया प्राणी हूँ जब मैंने अपने अचम्भे की वजह बताई तो वह हँसे बगैर न रह सकी |बाजार में भारत के अपने मित्रों के लिए कुछ उपहार खरीदे और उस वक्त यूरो खर्च करते वक्त मेरा दिल जल रहा था क्योंकि भारतीय रुपयों  में उनकी कीमत बहुत ज्यादा थी और चीजें उस मुकाबले कुछ भी नहीं पर मैं पहली बार भारत से बाहर निकला था तो सबकी कुछ न कुछ फरमाईशें थी |सिल्विया को पहले दिन से पता था कि मुझे इटैलियन खाना रास नहीं आ रहा है इसलिए जब हम उसके घर पहुंचे उसने पहला काम किया मेरे लिए कुछ चाइनीज खाना ऑर्डर कर दिया |उसका पुरुष –मित्र किसी काम से देश से बाहर गया था इसलिए उसने खाना बाजार से मंगवाना बेहतर समझा |उस दिन देर शाम तक (इटली में रात 9.30 बजे होती है ) बातें करते रहे |वह जानना चाहती थी कि मुझे इटली कैसा लगा और मैं उसकी भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछ रहा था |बातों –बातों में हमें समय का पता ही नहीं चला पर अब वक्त विदा लेने का था सिल्विया से और इटली से भी |
मैं अपनी जिन्दगी में कुछ नए अनुभवों का इजाफा किये हुए वापस लौट रहा था जहाँ मेरे अपने बेताबी से मेरे लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे |

विदा बोलोना विदा इटली .......................

इटली यात्रा :पांचवां भाग


गुजराती युवक जो इत्तेफाक से मिला 
मैं किसी भारत वासी की तलाश में था और मेरी खोज इस साप्ताहिक बाजार में आकर तब पूरी हुई जब मैंने इटैलियन के साथ –साथ अंगरेजी में लिखा देखा मेड इन इंडिया ,जहाँ राजस्थानी जूते और गुजराती कपडे बिक रहे थे और एक भारतीय लड़का बेपरवाह सा खड़ा  सिगरेट फूंके जा रहा था |मेरा मन प्रसन्नता से भर गया चलो कोई तो मिला मैंने हिन्दी में उससे पूछा “कहाँ से” उसने थोडा झिझकते हुए बताया कि वह गुजरात से इटली अवैध तरीके से काम धंधे की तलाश में आया है और न उसके पास वीजा है न पासपोर्ट |मैं उसकी पूरी  कहानी सुनना चाहता था |पर धंधे के टाईम उसकी मुझसे बात करने में रूचि नहीं थी |शायद उसे डर था कि कहीं मैं उसे पकडवा न दूँ |बाद में मुझे पता चला कि इटली में अप्रवासियों की संख्या बढ़ती जा रही है जिससे वहां के लोगों में काफी चिंता है |वो लड़का कई दिनों तक मेरे जेहन में घूमता रहा कि कैसे उसने भारत से इटली तक का सफर बगैर वैध कागजात के सहारे तय किया होगा ?क्या उसे अपने घर की याद नहीं आती होगी वगैरह वगैरह पर कहते हैं न जिन्दगी से बड़ी कोई क्रूर चीज नहीं होती मैं धीरे –धीरे उसको भूलने लग गया पर जब इस वृत्तांत को लिखते वक्त उसकी तस्वीर देखी तो वह घट्नाक्रम फिर आँखों के आगे घूम गया |
उस साप्ताहिक बाजार में मैंने काफी वक्त बिताया पर ले न सका कुछ भी मामला वही था मैं हर चीज की कीमत को भारतीय रुपयों में बदल कर सोच रहा था और उस लिहाज से वो सब खासी महंगी थी |विदेश यात्रा(खासकर विकसित देशों में )का आप तभी लुत्फ़ उठा सकते हैं जब आप स्थानीय मुद्रा को भारतीय रुपयों में बदल कर न देखें ,इटली में एक यूरो में पानी की बोतल बिकती है तो एक यूरो में आप हैन्किन बीयर का केन भी खरीद सकते हैं |
दीवारों पर उकेरी आकृतियाँ 
इटली के लोग खासे पढ़े लिखे और साहित्य कला के प्रेमी होते हैं और यह कला वहां की दीवारों पर देखी जा सकती है यहाँ तक की विरोध करने के तरीकों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है दीवारों पर आड़ी तिरछी रंग बिरंगी रेखाएं खींच कर कुछ लिख देना होता है |मुझे विरोध का ये तरीका बहुत भाया इससे शहर की खूबसूरती बढ़ जाती है |मैंने ऐसी ग्राफिटी शहर की दीवारों पर कई जगह देखी |मैं पहले ही लिख चुका हूँ |यह मेरी अनमनी यात्रा थी जिसमें मैंने कोई भी नोट्स नहीं लिए इसलिए जगहों चौराहों के नाम मुझे याद नहीं रहे हाँ पर कुछ चीजें और जगहें आज भी स्मृति में जीवित हैं जब मैंने पहली बार गैरीबाल्डी की एक भीमकाय मूर्ति देखी |
गैरीबाल्डी की मूर्ति 
मैंने गैरीबाल्डी को भी सिर्फ इतिहास की किताबों में पढ़ा था जिसे इटली के नायकों में से एक माना जाता है जिन्होंने इटली का एकीकरण किया था ,जब मैंने उसकी मूर्ति देखी तो मैं कुछ देर तक रुक कर उसे निहारता ही रहा |न जाने कितने भाव मेरे मन में आ जा रहे थे |
बोलोना का पुराना शहर एक गुलाबी शहर है जहाँ सारी इमारतें एक ही रंग की है हाँ नए शहर में बहु- रंगी बहु- मंजिली इमारतें हैं शहर की ऊँची मीनार से देखने पर शहर बहुत खुबसूरत दिखाई पड़ता है |
कुछ ऐसा दिखता है बोलोना 
किसी शहर के चरित्र को अगर समझना हो तो वहां की किताबों को देखना चाहिए और वही मैंने भी किया |भारत में जहाँ अंग्रेज़ी की किताबें ज्यादा दिखती हैं मुझे बोलों में इटैलियन भाषा में दुनिया भर का साहित्य मिला यहाँ तक की हमारी महाभारत और गीता भी इटैलियन भाषा में थी |महात्मा गांधी के ऊपर भी कुछ किताबें दिखी पर अंग्रेजी में कम ही किताबें दिखी |काश अपनी भाषा के प्रति ये लगाव हमारे देश में भी होता जहाँ चारो और अंग्रेजी का बोलबाला है |मैंने उस दूकान में कई घंटे किताबों को निहारते हुए बिताये और किताबों के बारे में सिल्विया मुझे बताती जा रही थी और मैं सबकुछ समझ लेना चाहता था|घूमते -घूमते भूख लग चुकी थी दिन में मैं बाहर ही इटली का कुछ भी खाना खाता पर शाम को मैं अपने होटल के नजदीक ताजमहल रेस्टोरेंट में बिरयानी उड़ना नहीं भूलता था |

सच कहूँ तो मुझे इटैलियन खाने में कहीं से कोई रूचि नहीं उत्पन्न हुई |हाँ दो दिन मैंने पिज्जा चाव से खाया |वहां पिज्जा की इतनी किस्में उपलब्ध थीं कि मैंने किस किस्म का पिज्जा खाया मुझे याद नहीं पर जो भी था स्वादिष्ट था |इटली में ही आकर मुझे पता पड़ा यहाँ सबसे महंगा गाय का गोश्त है और सबसे सस्ता मुर्गे का मांस है जिसे ज्यादातर निम्न आयवर्ग के लोग खाते थे |वाह री माया भारत में इसका उल्टा है अमूमन यहाँ गाय का गोश्त कई राज्यों में प्रतिबंधित है और भैंस का मांस ज्यादा खाया जाता है जो मुर्गे और बकरे के मुकाबले काफी सस्ता है |


Thursday, June 19, 2008

इटली यात्रा :तीसरा भाग

वीक एंड की तैयारी 
                               
पार्टी का आयोजन स्थल 
परिचर्चा ख़त्म होने के बाद मैं होटल के कमरे में थोड़ी देर आराम करने आया पर मैं इटली में होने को लेकर इतना  उत्साहित था कि मुझसे आराम नहीं हुआ ,मैं अकेले बोलोना शहर घुमने निकल पड़ा ,बाद में मुझे बताया गया ऐसा करना ठीक नहीं था क्योंकि एक तो मैं विदेशी दुसरे मुझे इटैलियन भाषा भी नहीं आती ऐसे में पूरी संभावना मेरे भटक जाने की थी |पूरा शहर किसी बड़ी पार्टी में तब्दील जान पड़ता था,कुछ भिखारियों को देखा वो इतने साफ़ सुथरे थे और सलीके से भीख मांग रहे थे कि मेरे दिमाग में जो भिखारियों की छवि बनी थी वो तार –तार हो रही थी |
सड़क पर भिखारी 
इस दिन पहली बार मैंने जाना कि वीक एंड क्या होता है पूरा शहर में जैसे उत्सव मनाया जा रहा हो लोग चारों ओर बिखरे हुए थे जो सम्पन्न थे वो अपनी गाड़ियों को लेकर आस पास की जगहों पर घुमने निकल पड़े थे और जो कम साधन सम्पन्न थे वो सड़कों पर मौज मस्ती कर रहे थे |
बड़ी मजेदार बात यह है कि मैं जिस होटल में ठहरा था उसका नाम तक मुझे नहीं याद था इसलिए मैं ज्यादा दूर नहीं गया और दो घंटे में होटल वापस लौट आया |शाम को मेरे सम्मान में एक भोज का आयोजन मेरी मेजबान सिल्विया के माता –पिता के घर किया गया था ,जहाँ तरह –तरह के मांसाहारी पकवान जिसमें ज्यादातर सूअर के गोश्त के थे और इटैलियन वाइन की व्यवस्था थी |वहां कई शहर के भद्र जन आमंत्रित थे |
मैं और सिल्विया 
बात चीत का सिलसिला जल्दी ही आतंकवाद के मुद्दे पर आ गया |मैंने उन सबको बताया कि कैसे पेरिस एयरपोर्ट में दाढी रखने के कारण  मेरी दो –दो बार तलाशी हुई |वहां पहली बार मैंने जाना कि यूरोप में भी अमेरिका के प्रति कोई अच्छी भावनाएं नहीं हैं खासकर आतंकवाद के मुद्दे पर |इटली आने से पहले मुझे सारे गोरे लोग एक जैसे लगते थे पर इटली में मेरे काफी भ्रम टूट रहे थे |
अब बारी खाने की थी |इतने सारे पकवानों के बावजूद मुझसे कुछ भी नहीं खाया नहीं जा रहा था सब कुछ सादा कोई मसाला नहीं ,मैंने किसी तरह गोश्त के कुछ टुकड़े ठूंसे |मुझे घर और घर के खाने की बड़ी याद आ रही थी |मेरा मन कर रहा था कि किसी तरह मैं वापस लखनऊ पहुँच जाऊं |पार्टी ख़त्म होते होते रात के ग्यारह बज गये |ख़ास यह बात थी कि इस पार्टी में किसी तरह का शोर शराबा नहीं था और न ही किसी तरह के संगीत की कोई व्यवस्था |इटली में पहली बार जाना विदेश में पले –बढे बच्चों में इतना स्वाव्लमबन और उद्यमशीलता कैसे आ जाती है |इटली में हर बच्चा चाहे लड़का हो या लडकी हाई स्कूल करते ही अपना घर स्वेच्छा से छोड़ देता है और खुद कमाई करते हुए अगर पढना चाहता है तो आगे की पढ़ाई करता है पर माता –पिता पर अपनी पढ़ाई का बोझ नहीं डालता |हाँ सप्ताहांत में जरुर अपने माता –पिता से मिलने आता है |
शहर का बाजार 
सिल्विया एक ऐसी ही लडकी थी जिसका पी एच डी वाइवा  लेने मैं आया था वह अपने पुरुष मित्र के साथ उसके फ़्लैट में रहती थी जिसे दोनों ने मिलकर खरीदा था और दोनों जल्दी ही शादी करने की सोच रहे थे |सिल्विया बोलोना विश्वविद्यालय में एक प्रोजेक्ट में कार्यरत थी |

देर रात मैं होटल पहुंचा|इतनी दूर मैं घर से पहली बार आया था मुझे लगा कि मुझे घर फोन करना चाहिए समय यही रात के बारह बजे थे इस उतावलेपन में मैं यह भूल गया कि इटली का समय भारत के समय से तीन घंटे पीछे था यानि इस समय यहाँ लखनऊ में रात के साढ़े तीन बज रहे होंगे और इस वक्त घर पर सभी गहरी नींद में सोये होंगे और हुआ भी वही फोन नहीं उठा |मैंने किसी तरह सोने की कोशिश की पर न जाने क्यों अब मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं इटली आया ही  क्यों ? शायद इसका एक बड़ा कारण भाषा और खाना था |बहरहाल अगली सुबह का इन्तजार था जब इटली घूमने जाना था |
                             
बांग्लादेशी कामगारों के साथ 
इटली यात्रा में आज मेरा तीसरा दिन था और मुझे रात में नींद अच्छी आयी सुबह मैंने इटली भाषा का पहला शब्द सीखा “बुनजुवार्नो” मतलब गुडमोर्निंग |ये शब्द भी बस महज इत्तेफाक से सीख पाया हुआ यूँ कि जब मैं होटल में सुबह के नाश्ते के लिए नीचे जा रहा था तो रास्ते में मुझे जो लोग भी भी मिलते वो
 “बुनजुवार्नो” कहते पहले तो मैं इसका मतलब समझ नहीं पाया |बाद में मुझे इस शब्द का सही मतलब पता लगा |मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि भले ही लोग आपसे परिचित हों या न हों मैं अपने सात दिनों के प्रवास में कुछ शब्द ही सीख पाया जैसे धन्यवाद को "ग्रात्शिया" कहते हैं |खैर खाने की एक बड़ी समस्या थी जिसका समाधान मेरी मेजबान ने निकाल लिया |मेरे होटल के बगल में ही एक भारतीय रेस्टोरेंट था जिसका नाम "ताजमहल" मुझे यह सोचकर अच्छा लगा चलो इसी बहाने अपने "मुलुक" के लोगों से बात होती पर मेरी यह धारणा जल्दी ही टूट गयी |जब मैं उस होटल में पहुंचा वो एक पाकिस्तानी का रेस्टोरेंट था चूँकि पाकिस्तान के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसकी ग्लोबल अपील हो पर भारत के पास ताजमहल था फिर क्या एक पाकिस्तानी ने भारतीय नाम से रेस्टोरेंट खोल लिया |मैंने उससे थोड़ी बहुत बात करने की कोशिश की पर उसका जवाब ठंडा था इससे अच्छा अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक रेस्टोरेंट में कुछ बांग्लादेशियों से मिला उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया |

Monday, June 16, 2008

इटली यात्रा -दूसरा भाग






दूसरे दिन मैं जल्दी ही सो कर उठ गया या ये कहें कि मुझे नींद ही नहीं पडी नए लोग नया परिवेश नयी भाषा सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था इसी दिन मुझे बोलोना विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट परिचर्चा में हिस्सा लेना था । एक खास बात जो मुझे बोलोना में दिख रही थी वो यह कि अपना काम सभी ख़ुद करते थे शायद इसका कारण श्रम का बहुत महंगा होना था । नहा धो कर मुझे होटल के नाश्ते के कक्ष में उपस्थित होना था अर्थात सेल्फ सर्विस नाश्ते की टेबल पर मुझे एक ही वस्तु समझ में आयी वह था फलों का रस बाकी सारी चीजें या तो मैं उनके बारे में जानता नहीं था या उनकी पैकिंग और इटालियन भाषा के कारण मुझे ये समझ नहीं आया कि वे क्या हैं । खैर अब वक्त था काम का , मुझे बोलोना विश्वविद्यलाया पहुचना था आम तौर पर एक विश्वविद्यालय की छवि जो किसी के भी मन में होगी वैसे ही मैंने भी कुछ सोच रखा था एक बड़ा सा मैदान होगा कुछ बोर्ड लगे होंगे वगैरह वगैरह , लेकिन वो सारी छवियाँ वहाँ पहुँच कर ध्वस्त हो गयी । बोलोना शहर लगभग एक हज़ार साल पुराना शहर है और बोलोना विश्वविद्यलाया दुनिया के सभी आधुनिक विश्वविद्यलाया में सबसे अधिक पुराना है । इस प्राचीन शहर की आधी से ज्यादा इमारतें वैसे ही हैं जैसे की वे आज से ६०० या ७०० साल पहले थीं .खास बात ये है की इस शहर में आधुनिकता और प्राचीनता का अद्भुत समागम देखने को मिलता है बाहर से इमारतें पुरानी हैं लेकिन भीतर से आधुनिकता का सारा साजो समान समेटे हैं और शायद ये संतुलन हमारे भारतीय शहर नहीं बना पाए आप किसी भी भारतीय शहर को देखें नए और पुराने का भेद स्पस्ट दिखेगा लेकिन यहाँ ऐसा .है . मैं बात कर रहा था बोलोना विश्वविद्यालय की टुकडों में फैला हुआ अलग भवन अलग काम के लेकिन वास्तुकला के हिसाब से इसकी खूबसूरती का कोई जवाब नहीं यहाँ गुजरने पर ऐस लागता है की आप आतीटी की गलियों से गुजर रहें हों . यहाँ इतिहास जीवंत हो उठता है शायद यही खासियत है इस जगह की . बाहर से यह किसी प्राचीन इमारत की तरह लगता है जहाँ कोई बोर्ड नहीं है लेकिन अंदर नवीन सभ्यता की एक से एक उन्नत चीज़ आपको नज़र आयगी विश्वविद्यालय में बार हिन्दुस्तान में कोई सोच नहीं सकता लेकिन यहाँ है बगैर किसी हो हल्ले के . जगह जगह मशीनें लगी हुई हैं जिनमें पैसा डाल कर आप अपने मतलब का पेय ले सकते हैं . खाश बात ये की इनको कोई तोड़ता नहीं और न ही किसी तरह का जुगाड़ लगाकर मुफ्त में चीजें हथियाने की कोशिश की जाती है .

विश्वविद्यालय के जिस हिस्से में परिचर्चा होनी थी वो इलेक्ट्रोनिक सुरक्षा के यंत्रों से युक्त था (वैसे बोलोना में के सभी रिहायशी इलाकों मैं इलेक्ट्रोनिक सुरक्षा यंत्रों का प्रयोग  होता है और हर चौराहे पर क्लोस सर्किट कैमरा लगे हैं ज्सिसे कोई भी यातायात के नियमों का उल्लंघन नही करता )
विश्वविद्यालय का माहौल किसी ओपन एयर थियटर जैसा लग रहा था .सब अपने आप में मगन पढने वाले पढ़ रहे थे और घूमने वाले घूम रहे थे . लड़के और लड़कियों में १:३ का अनुपात था . वैसे पूरे बोलोग्ना शहर में भी लड़कियां ही ज्यादा  दिखायी पड़ती हैं खास बात ये की यहाँ सिगरेट का बहुत प्रचलन है और लड़कियां भी खूब सिगरेट पीती हैं













इटली यात्रा :चौथा भाग

तीन दिन बीत चुके थे अब मेरे पास चार दिन का समय था,बोलोना घूमने के लिये पर सच बताऊँ मैं इस पूरी यात्रा में अनमना ही रहा शायद इसका कारण यह मेरी पहली विदेश यात्रा रही हो या इटली में अंग्रेजी भाषा का बहुत कम बोला जाना |इस अनमनेपन के कारण न तो मैं ज्यादा नोट्स ले पाया और न ज्यादा तस्वीरें ही खींच पाया |हर जगह वो अनमनापन मेरे दिमाग में छाया रहा इसलिए मैं ज्यादा रूचि नहीं ले रहा था |इसी यात्रा में मैंने एक और चीज सीखी कभी किसी यात्रा पर वीडियो कैमरे का इस्तेमाल न किया जाए और अगर किया जाए तो कम से कम ,मैंने वीडियो कैमरे का इस्तेमाल ज्यादा किया पर उन वीडियो फुटेज का इस्तेमाल भारत लौट कर कुछ कर नहीं पाया ,कुछ समय बाद वो वीडियो टेप कहाँ गए इसका भी पता नहीं |खैर जब मैं अमेरिका गया तो जो गलतियाँ इटली यात्रा में की थीं वो नहीं दुहरायीं |
कूड़ा उठाती सफाई कर्मी 

कूड़ा उठाती सफाई कर्मी 
खैर अब कुछ बातें इटली के दैनिक जीवन की सबसे पहली चीज कूड़ा प्रबंधन और ड्रेनेज सिस्टम ,मैं सात दिनों तक बोलोना में रहा ,गर्मियों के दिन थे फिर भी लगभग रोज बारिश होती थी पर पानी कहीं भी रोड पर या किसी जगह नहीं दिखता था |शहर के नीचे नालों का जाल था जिसका परिष्कृत रूप बोलोना के पास के शहर वेनिस में देखा जा सकता है |सड़कों पर गड्ढे नहीं थे और गलियां पक्की थी |कूड़ा रोड पर कहीं नहीं दिखता जगह –जगह बड़े डस्टबिन काली पौलीथीन के साथ रखे हुए हैं जिनको रोज सुबह कूड़ा उठाने वाली गाडी उठा लेती है |एक सुबह मैंने ऐसा ही नजारा अपने होटल की खिड़की से देखा जब एक चमचमाता ट्रक एक डस्टबिन के सामने रुका और उसमें दो सुन्दर लड़कियां सफ़ेद –काले कपड़ों में उतरी और और ट्रक में लगी मशीन ने उस डस्टबिन में रखे कूड़े को ट्रक में डाल दिया |भारत में ऐसे द्रश्य की कल्पना करना अभी भी न मुमकिन है |कूड़ा उठाने वाला ट्रक खटारे जैसा होगा और जितना कूड़ा वो उठाएगा उससे ज्यादा सड़क पर गिराते हुए जाएगा और बदबू इतनी ज्यादा होगी कि उसके पीछे आप अपनी मोटर साइकिल नहीं चला सकते| इटली में यही काम बड़े सौम्य तरीके से महिलाओं द्वारा किया जाता है और खुद भी वह सब इतनी साफ़ सुथरी होती हैं कि काम के बाद अगर वे किसी पार्टी में जाना चाहें तो आराम से जा सकती हैं |
साफ़ सुथरी सड़कें 
इटली में मेरे दिन बड़े सुहाने बीत रहे थे |मौसम भले ही गर्मी का था पर मुझे हमेशा कोट पहनना पड़ता था |धूल और प्रदूषण का नामों निशाँ नहीं था,मैं सात दिन के हिसाब से सात सेट कपडे ले गया था पर तीन सेट में ही काम चल गया वो भी इसलिए कि रोज –रोज एक ही कपडा पहनना ठीक नहीं लगता पर मेरा कोई भी कपडा गन्दा या काला नहीं हुआ|मेरे काले जूते को सात दिनों में एक बार भी पौलिश करने की जरुरत नहीं पडी |लोगों को कुत्ते पालने का बहुत शौक है पर ये जानवर सड़कों पर अगर गंदगी करते भी थे तो तुरंत उनका मालिक उस गंदगी को उठाकर डस्टबिन में दाल देता है |ये सिविक सेन्स अभी हम भारतीयों को सीखना है |तो दिन भर मैं घूमता और शाम को ज्यादातर हिन्दुस्तानी नाम वाले पाकिस्तान रेस्टोरेंट में भारतीय खाना खा लेता |मजेदार यह है कि इस्लाम में सूअर का मांस हराम है पर उस रेस्टोरेंट में सूअर आसानी से खाया जा सकता था |सच है जब पेट पर बनती है तो इंसान सब कुछ भूल जाता है |

साप्ताहिक बाजार गाड़ियों पर 
साप्ताहिक बाजार का द्रश्य 
मैं वहां किसी भारतीय को तलाश रहा था जिससे दो बोल हिन्दी में बतिया सकूँ और मेरी तलाश मुझे एक साप्ताहिक बाजार में ले गयी |यहाँ एक और आश्चर्य मेरा इन्तजार कर रहा था जिस खुली सडक से मैं दसियों बार गुजर चुका था |आज वहां लोगों का हुजूम था,पूरी जगह बहुत सारी खुली गाड़ियों से भरी हुई थी जिनके पीछे के हिस्से को खोलकर दुकान का रूप दे दिया था |यानि हफ्ते के एक दिन यह जगह बाजार बन जाती और बाकी दिन खुली चौड़ी रोड एक बार फिर भारत याद आया ,जहाँ इस तरह के बाजारों के लिए न कोई नियम है न कोई कानून |मैं अगले दिन भी उस सडक से गुजरा पर वहां कोई गंदगी का चिन्ह नहीं था लगता था जैसे कल यहाँ कोई बाजार लगा ही नहीं था |गंदगी के नाम पर अगर कोई चीज पूरे बोलोना शहर में दिखा था तो सिगरेट के टोटे मैं पहले भी लिख चुका हूँ लड़कों से ज्यादा लड़कियां सिगरेट पीती हैं और सिगरेट बहुतायत पी जाती है |वाइन इटली में जरुरी राशन की तरह खरीदी जाती है और इटली की वाइन पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है |चलिए चूँकि अभी मैं आपको वहां के साप्ताहिक बाजार से परिचित करा रहा था तो एक बार फिर वहीं लौट चलते हैं |लोगों की भीड़ बहुत थी पर कोई शोर नहीं था सब कुछ शांत| भारत में ऐसे बाजारों में इतना शोर होता है कि घबराहट होने लगती है पर वहां मुझे कोई परेशानी नहीं हो रही थी लड़कों से ज्यादा लड़कियां थी पर कोई छेड़-छाड़ नहीं थी |जिज्ञासावश मैंने सिल्विया से “ईव-टीजिंग” के बारे में पूछा हालंकि वह अच्छी अंग्रेज़ी जानती थी पर वह इस शब्द का मतलब समझाने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पडी क्योंकि उसने “ईव-टीजिंग” जैसे शब्द को कभी सुना ही नहीं था |वो मुझसे इस शब्द को सुनने के बाद काफी देर तक चुहल करती रही |पहली बार मुझे लगा ये मेरे सपनों का देश है जहाँ कोई आपको बिला वजह घूरता नहीं आप जो चाहे कपडे पहने जैसे कपडे पहने कोई फर्क नहीं पड़ता आप उन्मुक्त हो कर विचरण कर सकते हैं |
जारी .............................................

Sunday, June 15, 2008

इटली यात्रा प्रथम भाग




एक थका देने वाला दिन वीजा कि भाग दौड़ के साथ शुरू हुआ यात्रा का सिलसिला यूं तो दिल्ली का मौसम मेरी यात्रा के वक्त काफी सुहाना हो गया था और सोने पर सुहागा किया मेरे पुराने मित्र सौगत और अविनाश के साथ ने .रात ग्यारह बजे अविनाश ने मुझे दिल्ली के इंदिरा गाँधी अन्तर राष्ट्रीय पर छोडा और मैं मन में कई शंकाएँ और उमंगों के साथ एयर पोर्ट के अंदर प्रवेश किया .ये कहना कि सब बड़ा आसान था और मैं काफी रोमांचित था झूठ लिखने जैसा होगा यात्रा के पहले की कागजी औपचारिकताओं ने मुझे परेशान कर दिया था । उसके बाद दुनिया के एक ऐसे देश की यात्रा जिसका जिक्र या तो बचपन में इतिहास की किताबों में गैरीबाल्डी  , मैजिनी या कैवूर के किस्सों में ही पढ़ा था या बड़े होने पर सोनिया गाँधी के देश के नाते इतना ही परिचय था मेरा इटली से लेकिन एक दिन अचानक अपने आप को उस देश में महसूस करना जहाँ मुझे एक ओर रोमांचित कर रहा था वहीं दूसरी ओर मैं अंदर से डरा हुआ भी था और जो स्वाभाविक भी है क्योंकि डर सबको लगता है और गला भी सबका सूखता है मन में एक सपने के सच होने की खुशी भी थी कि मैं दुनिया और जिन्दगी को करीब से देख सकता हूँ वही मन के किसी कोने में एक डर भी था डर मुझे पेरिस से था वो डर क्यों था उसका जिक्र में आगे करूँगा ।
रात के १२.४० पर एयर फ्रांस की उड़ान ने दिल्ली से पेरिस का सफर शुरू किया रात काफी हो चुकी थी लेकिन सफर में मुझे नींद कम ही आती है मैंने एक फ़िल्म देखनी शुरू की तभी एयर होस्टेस खाने की प्लेट लेकर मेरे सामने खडी थी रात के दो बजे आप क्या खा सकते हैं ? लेकिन एयर फ्रांस का नियम यह है की वे अपने स्थानीय समय के हिसाब से खाने और नाश्ते का पर्बंध करते हैं गो की फ्रांस में उस वक्त रात के ९.३० बज रहे थे मैंने कुछ जूस पी कर अपने टिकट के पैसे वसूलने की कोशिश की लेकिन प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाया. फ्रांस के स्थानीय समय सुबह के ६ बजे और भारत के स्थानीय समय दिन के ९.३० बजे हमारा विमान पाकिस्तान अफगानिस्तान , इरान जर्मनी होते हुए पेरिस के चार्ल्स दी गौल एअरपोर्ट पर उतरा मौसम खुशगवार था यूरोप की सरज़मीन पर मेरा स्वागत सर्द हवाओं ने किया , वो सुबह काफी सुहानी थी . अब मेरे डर का सच सामने आने वाला था मुझे बताया गया था की पेरिस में अंग्रेजी बोलने वालों को पसंद नहीं किया जाता है .पेरिस से मुझे बोलोना की दूसरी फ्लाईट पकड़नी थी और समय कम था पेरिस का चलेस दी गौल एअरपोर्ट दुनिया के कुछ बड़े एअरपोर्ट में से एक है. एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल में जाने के लिए काफी वक्त के जरुरत होती है ऐसे में मेरा डरना लाजिमी था आधे घंटे तक रस्ते में आने वाले हर शख्स से में टर्मिनल २ डी का रास्ता पूछता रहा और कोई भी मुझे सही रास्ता नहीं बता पा रहा था न तो मैं किसी के बात समझ पा रहा था और न ही कोई मेरी झुन्झुलाहत में मैं एअरपोर्ट से बाहर आ गया एक बस वाले से मैंने मदद मांगी उसने अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में मुझे टर्मिनल २ डी का रास्ता बताया मैं किसी तरह टर्मिनल २ डी तक पहुँचा. मेरे हुलिए के कारण (दाढी) सिक्यूरिटी चेक पर मेरी दो बार जांच की गयी. खैर ये भी जिन्दगी का हिस्सा है मेरी सारी जल्दबाजी बेकार गयी क्योंकि बोलोना जाने वाली फ्लाईट आधे घंटे लेट थी . भारतीय समय के अनुसार मैं शाम के ४.३० बजे बोलोना एअरपोर्ट पर उतरा जहाँ बोलोना विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि मेरा इंतज़ार कर रहे थे. एअरपोर्ट से मैं सीधे अपने होटल पहुँचा जो बोलोना विश्वविद्यालया से एक दम करीब था और शहर के एकदम बीचों बीच स्थित था. शाम के समय मुझे बोलोना के अंतर्राष्ट्रीय संगीत संग्रहालय ले जाया गया यह संग्रहालय लगभग ५०० वर्ष पुराना था. जहाँ संगीत से संबंधित सैकडो वर्ष पुरानी पांडूलिपियाँ और वाद्य यन्त्र सुरक्षित हैं .बोलोना आने वाले सैलानियों को हिदायत है की वे यहाँ के संग्रहालयों में सामान्य परिधान में ही प्रवेश ले सकते हैं. पहले दिन मैं सूरज ढलने का इंतज़ार करता रहा पर रौशनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी .मुझे बताया गया की यहाँ सामान्यता रात के १० बजे रात होती है. शायद यही कारण की हमारे फ़िल्म निर्माता यूरोप में शूटिंग करने को बेताब रहते हैं क्योंकि वे कम समय मैं ज्यादा  काम कर सकते हैं . बोलोना का मौसम काफी सुहाना था सुबह और शाम अच्छी ठंड पड़ती है हालांकि अभी वहाँ गर्मियों का मौसम चल रहा है फ़िर भी हवा में नमी रहती है मैं जितने दिन भी रहा एकाध दिन छोड़ कर सामान्यता रोज बारिश होती थी. पहले ही दिन मुझे इस बात का एहसास हो गया था की इटली के लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति पर बहुत गर्व है पूरे बोलोना शहर में मुझे एक या दो साईन बोर्ड ही अंग्रेजी में दिखे. एक समस्या अभी आनी बाकी थी वो थी खाने की चूँकि मैं दिल्ली से आधी रात को उड़ा था इसलिए खाना खा के ही चला था दिन में सफर की थकन और तनाव के कारण कुछ नहीं खाया गया. लेकिन शाम को जब सूअर के मांस के साथ तरह तरह के पकवानों के साथ मेरा सामना हुआ तो मेरी हालत विचित्र थी हालांकि मैं मांसाहारी हूँ और मेरा मानना है की मांस , मांस है चाहे वो किसी का भी हो अगर आप मांस खाते हैं तो मांस में भेद मत कीजिये किंतु बोलोना में समस्या यह थी की वो उबले हुए मांस के टुकडे थे जिन्हें चीज के साथ सभी बड़े चाव के साथ खा रहे थे बगैर मसाले के मैंने कभी भोजन की कल्पना ही नहीं की थी फ़िर भी कुछ टुकड़े मैंने खाने की कोशिश की आख़िर पापी पेट का सवाल था |
पहला दिन इस एहसास में खत्म हो गया कि मैं विदेश में हूँ वही धरती वही आसमान पर ये भारत नहीं था |यह एक साफ़ सुथरी दुनिया थी जो भारत से कई मामलों में अलग थी |मैं पुरे दिन हिन्दी बगैर बोले रहा और यह एहसास मेरे लिए एकदम नया था हालांकि मैं बोल रहा था पर अपनी मात् भाषा नहीं बल्कि अंग्रजी ,भाषा को लेकर इटली में भी समस्या थी यहाँ ज्यादातर लोग अंगरेजी नहीं बोलते हैं लेकिन किसी तरह मैंने काम चलाना सीख लिया मुझे अगले सात दिन इसी मुल्क में गुजारने थे |


Monday, June 9, 2008

इटली यात्रा विशेष

प्रिय पाठकों

जल्दी ही आप मेरी इटली यात्रा के संस्मरणों से रूबरू होंगे .इंतजार करें

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