Monday, June 26, 2017

सिक्किम यात्रा :तीसरा भाग

महात्मा गांधी बाजार से होटल तक पहुँचने का रास्ता ड्राइवर तिलोक हमें अच्छी तरह समझा के
सिक्किम की टैक्सी 
गया था आपको सीढ़ियों से उतरना है और टैक्सी स्टैंड पर अम्दु बुलाई के लिए टैक्सी लेनी है वहीं हमारा होटल था जो इंदिरा बाई पास पर स्थित था कहना बड़ा आसान था पर मेरे जैसे आदमी के लिए थोडा मुश्किल था |इस कहानी को आगे बढ़ाने से पहले सिक्किम की टैक्सी के बारे में बता दूँ क्योंकि जहाँ तक मेरी जानकारी है ऐसी टैक्सियाँ पूरे भारत में कहीं न चलती होंगी |आपको जानकार हैरत होगी उत्तर भारत की मध्यम वर्ग की शान की शान की सवारी वैगन आर और आल्टो यहाँ ऑटो की तरह चलती हैं |गाड़ियाँ वही रहती हैं बस आगे का बोनट पीले रंग से रंग दिया जाता है कुछ के ऊपर टैक्सी लिखा रहता है नहीं तो ये पीला रंग ही किसी कार के टैक्सी होने की निशानी है |पहाडी भाग होने के कारण रिक्शा चल नहीं सकता और तीन पहिये वाले ऑटो को चलाना खतरनाक हो सकता है |
ट्रैफिक बूथ और व्यवस्थित ट्रैफिक 
आपको पूरे सिक्किम में उत्तर भारत की ये शान की सवारी टैक्सी के रूप में चलती दिखेंगी |एक जिज्ञासा मेरे मन में ही रह गयी जिसका जवाब मैं तलाश नहीं पाया |आम तौर पर पहाडी भागों में (कश्मीर, उत्तराखंड ) ये माना जाता है कि आल्टो और वैगन आर छोटी गाड़ियाँ होती और कमोबेश कमजोर भी इसलिए पहाड़ों में इनका बहुतायत से इस्तेमाल नहीं होता वहां बड़ी भारी गाड़ियाँ जैसे इनोवा ,सूमो ,क्वालिस जैसी गाड़ियाँ सफल रहती हैं क्योंकि ये ज्यादा मजबूत रहती हैं पर सिक्किम में इनका इस्तेमाल क्यों ज्यादा होता है पता नहीं चल पाया |गंगटोक शहर में भी दुपहिया वाहन मुझे न के बराबर दिखे और सुदूर इलाकों में भी यही गाड़ियाँ दिखी इसका मतलब आमतौर एक सामान्य सिक्किम निवासी गरीब नहीं है क्योंकि सुदूर पहाड़ों में बसे गाँवों के घरों में भी चार पहिया वाहन खड़े दिखे |वापस मुद्दे पर लौटते हैं मुझे बताया गया था अगर हम शेयर्ड टैक्सी लेंगे तो होटल तक किराया बीस रूपये प्रति व्यक्ति लगेगा और अगर पूरी टैक्सी लेंगे तो डेढ़ सौ रुपये हम टैक्सी स्टैंड पहुंचे ही थे कि हमारे साथ यात्रा कर रहे एक साथी यात्री अपनी पत्नी के साथ टैक्सी करने जा रहे थे उन्हें भी उसी होटल जाना था जब उन्होंने हमें देखा तो हमें भी अपने साथ आने के लिए कहा ये उनकी सदाशयता नहीं बल्कि पैसा बचाने का जुगाड़ था क्योंकि उन्होंने डेढ़ सौ में पूरी टैक्सी की थी पर टैक्सी वाले ने साफ़ –साफ़ कह दिया ड्राइवर समेत गाडी में पांच लोगों से ज्यादा नहीं बैठ सकते नियम सख्त है ढाई हजार रुपये का दंड लगेगा |नियम के प्रति ऐसी ईमानदारी अद्भुत थी वो बड़े आराम से हमें बैठा के पचास रुपये अतिरिक्त लेता तो भी हम फायदे में रहते पर उसने ऐसा नहीं किया |हमने एक सजी संवरी दूसरी टैक्सी ली जो लाल रंग की आल्टो थी जिसे एक खूबसूरत सांवला लड़का चला रहा था उसकी बोली से लगा उसका ताल्लुक बिहार से है पर मेरा अंदाजा गलत निकला उसकी जड़ें उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की थी पर वो पैदा यहीं हुआ था |पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगा तो माता –पिता ने गाडी खरीदवा दी उसकी वहां तीन गाड़ियाँ चलती थी उसने एक बोलेरो बलिया भी भेजी थी किराए पर चलवाने के लिए |मैंने पूछा कभी अपने माता –पिता के घर (बलिया ) जाते हो तो बोला साल में एक बार वहां जा के क्या करेगा वहां गोली पहले चलती बोली बाद में ,मैंने कहा फिर वही लोग जब बाहर के प्रदेश में जाते हैं तो ठीक कैसे हो जाते हैं उसका सीधा जवाब था यहाँ कानून टाईट है |मैं एक बार फिर सोच रहा था ऐसा क्यों ,किराया उतना ही पड़ा जितना हमें पहले बताया गया था न उससे कम न ज्यादा |
सडक पर बना पैदल पथ 

इस टैक्सी पुराण के बहाने मैं आपको गंगटोक की ट्रैफिक व्यवस्था के बारे में बताते चलूँ |पूरे शहर में सडक के किनारे –किनारे एक पैदल पथ है जिस पर पैदल चलने वाले लोग दिखेंगे |सडक संकरी हैं पर सड़कों पर सिर्फ गाड़ियाँ हैं लोग नहीं |टैक्सी सिर्फ टैक्सी स्टैंड पर रुकेगी चाहे आपका गंतव्य उससे कितना भी करीब क्यों न हो टैक्सी कहीं भी कभी भी नहीं रुकेगी |अगले दिन का एक वाकया है हम लोग घूम कर लौट रहे  थे और जोरदार बारिश हो रही थी सडक पर लोग नहीं थे पर हमारी टैक्सी होटल पर नहीं रुकी उसने  हमें भीगने से बचाने के लिए एक दूसरा रास्ता पकड़ा जो होटल के बेसमेंट में जाता था |वहां से होटल को फोन किया गया होटल वाले ने अपना वो बंद पड़ा बेसमेंट खोला जिससे चढ़ कर हम अपने कमरे तक पहुंचे |ये होती है नियमों के प्रति प्रतिबद्धता जिसका सम्मान भारत के जिस हिस्से में मैं रहता हूँ वहां नहीं दिखता |रात होते होते बादल उमड़ घुमड़ के बरसने लगे गंगटोक के होटल में एसी और पंखे नहीं होते इसलिए मैंने खिड़की खोल रखी थी मैं रात भर वर्ष्टि पड़े टापुर टुपुर सुनता रहा सुबह गंगटोक बादलों के आगोश में था और हमारा छान्गू झील जाने का कार्यक्रम बेकार हो चुका था क्योंकि बारिश से उस रास्ते पर भूस्खलन हुआ था और वह रास्ता पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया था इसी रास्ते पर आगे भारत चीन सीमा नाथू ला पास भी पड़ता है |सीमा देखने की मेरी कोई ख़ास इच्छा नहीं थी क्योंकि मैं राजौरी में भारत पाकिस्तान नियंत्रण रेखा देख चुका था पर छान्गू झील न देख पाने का दुख जरुर था |अब हमारे कार्यक्रम में तबदीली हो रही थी अब हमें नामची घूमने जाना जो गंगटोक से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर था |मैंने अपने ड्राइवर तिलोक से पूछा वहां क्या उसने कहा कुछ पूजा का है मैंने सोचा कुछ बौद्ध धर्म से सम्बन्धित मामला होगा मेरे लिए ज्यादा मजेदार प्रकृति का साथ जो गाड़ियों में चलने के कारण हमें रास्ते में मिलता था |
सडक किनारे बिकते  भुट्टे 
मैंने पहाड़ों पर इतनी ज्यादा हरियाली कहीं नहीं देखी थी और इतने घने जंगल मन को मोह लेते थे कश्मीर और उत्तराखंड में भी हरियाली है पर इतनी  नहीं आपको कहीं भी पचास मीटर से ज्यादा खाली पहाड़ नहीं  दिखेंगे चारों ओर सिर्फ पेड़ ही पेड |यहाँ के पहाड़ों पर ख़ास बात है कि बांस के झुरमुट खूब मिलेंगे जो यहाँ के पहाड़ों को उत्तर भारत के पहाड़ों से अलग बनाते हैं दूसरी ख़ास बात उन पहाड़ों से गिरते हुए छोटे मोटे सैकड़ों झरने ,जहाँ कोई झरना बड़ा हो गया उसे एक टूरिस्ट स्पॉट मान लिया गया |यहाँ साल के पेड़ और बांस के झुरमुट आपका  सर उठा के स्वागत करेंगे तो नामची की यात्रा हमने भीगे मौसम में शुरू की |गंगटोक के बाहरी हिस्से में कई भुट्टे बेचने वाली महिलाएं दुकान सजा कर बैठी थी और उनकी दुकान मक्के के खेतों से मिली हुई थी मतलब इससे ताजा भुट्टे आपको भारत के किसी पहाडी हिस्से में नहीं मिलने वाले |मैं तिलोक से सिक्किम के बारे में पूछ रहा था उसने भारत का सिर्फ एक शहर देखा था वो भी कोलकाता जहाँ उसकी पहली बीवी का घर था |पहली बीवी ? हाँ उसने मुझे छोड़ दिया तो मैंने दूसरी शादी कर ली जब हम लौटेंगे तो मेरी बीवी भी इसी गाडी में लौटेगी क्योंकि नामची उसका मायका था और वो अपने घर गयी थी |
भीगा भीगा मौसम 
बच्चे ?मैंने पूछा |दो हैं उसने बताया लेकिन वो गंगटोक में घर पर हैं वो अकेले गयी है |तलाक कैसे होता है बोला हम लोग कोर्ट नहीं जाते सब समुदाय में ही हो जाता शांति से वैसे भी सिक्किम में लड़के कम और लड़कियां ज्यादा हैं और लड़कियां ज्यादा लड़के छोडती हैं |तिलोक कहीं बाहर नहीं जाना चाहता वो यह भी चाहता है टूरिस्ट यहाँ खूब आयें लेकिन यहाँ बसने के बारे में न सोचें |हम उस भीगते मौसम में आगे बढे चले जा रहे थे |खिड़कियाँ खोल दी गईं इतनी शुद्ध हवा न जाने फेफड़ो 
में कब जाए |
जारी ...........

Sunday, June 25, 2017

सिक्किम यात्रा :दूसरा भाग

“बन जाखरी” जल प्रपात
गंगटोंक में एक रात बिताने के बाद अगली सुबह घूमने का कार्यक्रम शुरू हुआ पर मैं सिर्फ घूम नहीं रहा था मैं इस देश की विचित्रता को समझना चाहता था |भौगौलिक रूप से हमारी सुबह एकदम अलग हुई सामने पहाड़ों में बादलों ने डेरा डाला हुआ था और वो हमारे एकदम करीब थे |घूमने फिरने की जगह ज्यादातर एक जैसी होती हैं या तो इतिहास या प्राकृतिक या फिर मानव निर्मित कुछ अनूठी चीजें ,मैं समझना चाहता था जैसे उत्तर भारत के मैदानों में बैठकर हम अपने देश के जिन मुद्दों  के बारे में सोचते हैं क्या वाकई वो सारे देश के मुद्दे हैं या ये मुद्दे मीडिया निर्मित हैं जो एक निश्चित एजेंडे के साथ भावनाओं की चाशनी में लपेट कर हमारे सामने परोसे जाते हैं तो घूमने की शुरुआत करने से पहले बताते चलूँ सिक्किम अधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा 1975 में बना उससे पहले इसकी स्थिति भूटान जैसी थी |विचित्र किन्तु सत्य अब जरा 1975 के पहले के सिक्किम के बारे में सोचिये और अंदाजा लगाइए कि वहां के लोगों के लिए दिल्ली और वहां के निवासी कैसे होंगे |वैसे अंग्रेजों को लाख गाली दी जाए पर कम से कम हमें वो एक पूरा देश बना कर दे गए नहीं तो देश के अलग –अलग हिस्सों में अलग –अलग राजवंश शासन कर रहे थे और तब के निवासियों में भारत देश के प्रति वैसी आक्रमकता नहीं  थी जैसी आज देखने पढने को मिलती सच तो यह है देश के आधे से ज्यादा लोगोंको सच में अपने देश के बारे में कुछ पता ही नहीं है |खैर नाश्ता करके होटल से बाहर निकला तो लगा थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ यूरोप के देश में हूँ |सड़क पर कूड़ा उठाने वाली मशीन महिला सफाई कर्मियों के साथ काम पर लगी है शहर में कूड़ा डालने के लिए जगह जगह पात्र रखे हुए हैं और पूरे गंगटोक शहर में तीन दिन के प्रवास में मुझे कहीं कूड़ा और प्लास्टिक देखने को नहीं मिला |प्लास्टिक सिक्किम में बैन है या नहीं इसका पता मुझे नहीं पड़ पाया क्योंकि प्लास्टिक के लिफाफे हमारे पास थे और किसी ने हमें टोंका नहीं पर इतने साफ़ पहाड़ आपको न तो कश्मीर में मिलेंगे न उत्तराखंड में (ये दोनों जगह मेरी देखी हुई हैं ) ऐसे न जाने सवाल मेरे जहाँ में घूम रहे थे सिक्किम और और उत्तर प्रदेश दोनों भारत में हैं फिर साफ़ –सफाई को लेकर ऐसा आग्रह पूरे भारत में क्यों नहीं दिखता यहाँ लोग खुले में क्यों नहीं फारिग होते |आप को जानकार ताज्जुब होगा मुझे बताया गया कि लघुशंका भी खुले में लोग नहीं करते खासकर पहाड़ों में क्योंकि वो पूजनीय है ,मुझे अपना प्रदेश याद आया तो ऐसे न जाने कितने सांस्कृतिक सवालों से दो चार होते हुए हम निकल पड़े अपने पहले पड़ाव “बन जाखरी” जल प्रपात देखने |बन जाखरी एक ऐसा झरना जहाँ कभी कोई तांत्रिक रहता था और अपनी तंत्र विद्याओं से लोगों का इलाज करता था हमने वहां ऐसी कई गुफाएं वहां देखीं और एक गुफा में बाकयदा एक शिवलिंग भी था जिस पर काई जमी हुई थी जो इस और इशारा कर रहा था यहाँ अमूमन पूजा नहीं होती  पर वहां हमने किसी पर्यटक को पूजा करते नहीं देखा  |
गुफा में  शिवलिंग 
एक हरे भरे पहाड़ में उंचाई से  गिरता झरना जो मनोहारी द्रश्य पैदा करता है चूँकि यह हमारा सिक्किम में पहला दिन था इसलिए उस प्रपात कोदेख कर अच्छा लगा पर एक पूरे हफ्ते सिक्किम के जिन हिस्सों से हम गुजरे ऐसे छोटे बड़े सैकड़ों प्रपात पहाड़ों से गिरते देखे |पर्यटकों में ज्यादातर बिहार और पश्चिम बंगाल के ही थे वैसे अब तक के अपने पर्यटन के अनुभव से कह सकता हूँ कि बंगाली सबसे ज्यादा पर्यटन प्रेमी होते हैं आप लेह से कन्याकुमारी और राजस्थान से पूर्वोत्तर तक कहीं भी जाइए आपको बंगाली जरुर मिलेंगे पर ये पर्यटन के वक्त अपने में सिमटे रहते हैं |बन जाखरी में कुछ घंटे बिताने के बाद अगला ठिकाना रूमटेक मोनेस्ट्री थी पर आगे चलने से पहले थोडा सा ज्ञान हम भारतीय अपने देश के बारे में कितना कम जानते हैं और एक ही देश में कितने तरह की स्थितियां एक साथ हैं |सिक्किम में मात्र चार जिले हैं  पूर्व सिक्किम, पश्चिम सिक्किम, उत्तरी सिक्किम एवं दक्षिणी सिक्किम हैं जिनकी राजधानियाँ क्रमश: गंगटोक, गेज़िंग, मंगन एवं  नामची हैं गंगटोक पूरे सिक्किम की भी राजधानी है यानि शहरों के अपने मुख्यालय हैं जिन्हें वहां की राजधानी कहा जाता है यह चार जिले पुन: विभिन्न उप-विभागों में बाँटे गये हैं। "पकयोंग" पूर्वी जिले का, "सोरेंग" पश्चिमी जिले का, "चुंगथांग" उत्तरी जिले का और "रावोंगला" दक्षिणी जिले का उपविभाग है।उत्तर भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं शायद ऐसा वहां की भौगौलिक परिस्थिति के कारण हो |हमें गंगटोक ,ग्रेजिंग और नामची देखने का या कहें वहां से गुजरने का मौका मिला |रुम्टेक मोनेस्ट्री का रास्ता बहुत खराब था और धूप बहुत तेज पर गाड़ियों में एसी नहीं चलते अमूमन क्योंकि हवा रह रह कर ठंडी हवा इस धूप की तपन को कम कर देती है |गंगटोक से रुम्टेक की दूरी चौबीस किलोमीटर है |
रुम्टेक मोनेस्ट्री 
चूँकि मैंने लेह पूरा घूमा हुआ था इसलिए यहाँ मुझे ज्यादा आनंद नहीं आया लेह की मोनेस्ट्री के सामने यह कुछ भी नहीं है और इसका इतिहास भी ज्यादा पुराना नहीं है वैसे यह मठ लगभग तीन सौ साल पुराना है पर वर्तमान मठ का निर्माण 1960  में हुआ है  पर लेह के मुकाबले यहाँ  सुरक्षा का ज्यादा ताम –झाम है बगैर पहचान पत्र दिखाए आप यहाँ प्रवेश नहीं कर सकते यहाँ कबूतरों की एक बड़ी आबादी है जिन्हें आप दाने खरीदकर खिला सकते हैं |पूर्वोत्तर के राज्यों में जाने वाले पर्यटकों को मेरी सलाह अपना पहचान पत्र हमेशा अपने साथ रखें क्योंकि चीन से विवाद के कारण सेना से आपका आमना सामना होता रहेगा |
वैसे रुम्टेक मठ चर्चा में तब आया जब 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे तिब्बत से भागकर धर्मशाला होते हुए यहाँ आ गये कहानी में एक ट्विस्ट है एक और भारतीय करमापा भी थे जिन्हें दलाई लामा का समर्थन था और मठ की सम्पति को लेकर काफी विवाद हुआ मामला कोर्ट तक पहुंचा और अभी भी लंबित है |माना जाता है रुम्टेक मठ के पास 1.5 अरब डॉलर का खजाना है |दुनिया को मोह माया से ऊपर उठने की सीख देने वाले भी हमारे जैसे ही होते हैं अद्भुत किन्तु सत्य |17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे यहीं रहते हैं मैंने वहां घूम रहे लामा से पूछा क्या मैं 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे से मिल सकता हूँ क्योंकि मुझे बताया गया वो यहीं रहते हैं तो मुझे उत्तर मिला अभी वो कनाडा में हैं |
कबूतरों को दाना खिलाते पर्यटक 
एक और जिज्ञासा भी थी जिसका कोई भी लामा संतोष जनक उत्तर नहीं दे सका चूँकि मठ के अन्दर तस्वीर खींचने की इजाजत नहीं थी सो मैंने उस जिज्ञासा की तस्वीर नहीं ली हालाँकि लोग आसानी से मठ के अंदर की तस्वीरें ले रहे थे वैसे बगैर फ्लैश के तस्वीर लेने में कोई हर्ज नहीं होना पुरानी इमारतों में उकेरे भित्ति चित्र फ्लैश लाईट में खराब हो जाते हैं फिर भी भाईलोग धडधड फ्लैश चला रहे थे |मठ के अंदर घुसते सामने 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे का एक बड़ा सा चित्र है उसके नीचे दिया जल रहा है और नीचे बौद्ध परम्परा के अनुसार सिक्के और पैसे चढ़े हैं सिक्के बेतरतीब बिखरे हैं पर नोटों को एक कीप के आकार में मोड़कर खोंस कर लगाया गया ऐसा ही कुछ माहौल हमारे टैक्सी ड्राइवर ने अपनी गाडी में बना रखा था आप तस्वीर में देखकर उस माहौल का अंदाजा लग सकते हैं |
बौद्ध मठों में कुछ इस अंदाज में चढ़ावा चढ़ा रहता है 
जब हम मठ के अंदर की परिक्रमा करने गए तो हमने देखा 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे की तस्वीर के पीछे एक दीवार है और उसके पीछे गौतम बुद्ध की विशाल मूर्ति है जो उस दिवाल से छुप गयी है जिस पर 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे  की तस्वीर लगी हुई मतलब 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे की तस्वीर वाली दीवाल जल्दी बनाई गयी है जिसके पीछे बुद्ध की प्रतिमा छुप गयी है |17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे  को आगे कर बुद्ध को क्यों छिपाया गया मैंने लामा से पूछा उसने कहा पूजा करने के लिए किसकी पूजा ? उसने जो कुछ मुझे बताया वो मेरे सामान्य ज्ञान से परे था |दिन के दो बज चुके थे अब बारी थी  इंस्‍टीट्यूट ऑफ तिब्‍बतोलॉजी देखने की  यहां बौद्ध धर्म से संबंधित अमूल्‍य प्राचीन अवशेष तथा धर्मग्रन्‍थ रखे हुए हैं। यहां अलग से तिब्‍बती भाषा, संस्‍कृति, दर्शन तथा साहित्‍य की शिक्षा दी जाती है।पर हाय रे नियति इतवार होने के कारण यह संस्थान बंद था वैसे हमारे ड्राइवर ने बताया यह पिछले इतवार को खुला था उसी परिसर से लगा हुआ |
द्रुल चोर्तेन स्तूप 
द्रुल चोर्तेन स्तूप था बौद्ध परम्परा में पूजा का स्थल अपर ऐतिहासिक रूप से काफी नया मेरे जैसे घुमक्कड़ जीव के लिए यहाँ कुछ नया नहीं था सिवाय इसके कि पूरे परिसर में अलसाई बिल्लियों की संख्या काफी ज्यादा थी जिन पर पर्यटकों की आवा जाही का कोई असर नहीं था वो बस मस्ती में सोई हुई थीं | अब बारी फूल प्रदर्शनी देखने की थी |यह एक ऐसी जगह थी जहाँ पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए फूलों की प्रदर्शनी चलती रहती है वैसे सिक्किम को लोग पर्यावरण के प्रति बहुत जागरूक हैं फिर भी चोग्याल पाल्देन ठोंदुप नामग्याल मेमोरियल पार्क में लगे इस फ्लावर शो ने मेरी  पेड़ पौधों के प्रति कम जानकारी को थोडा और बेहतर किया |रास्ते में एक छोटा सा भवन दिखा जो सिक्किम विधानसभा होने की गवाही दे रहा था न कोई सिक्योरिटी का ताम झाम न कोई रोड ब्लोक मतलब अगर हम अपनी गाड़ी रोक कर उतरते तो मुश्किल से बीस मीटर भी हमसे दूर नहीं था |मैं जब तक अपना कैमरा निकालता हम आगे बढ़ गए जनतंत्र को सही मायने में परिभाषित करती वो इमारत मेरी यादों में है क्योंकि उसके गला –बगल की इमारतों में ऐसी घुली मिली थी कि वो ख़ास इमारत है इसका आभास उसे देखकर नहीं होता जी हम भारत के ही एक राज्य में थे |
फ्लावर शो की यादें 
 चार बज गए थे अब हमारे पास दो विकल्प थे होटल जाकर आराम करें या गंगटोक की मशहूर महात्मा गांधी मार्केट से कुछ खरीददारी की जाए |हालंकि व्यक्तिगत रूप से बाजार घूमना और कुछ खरीददारी मेरे लिए दुनिया के सबसे बेकार कामों में से एक रहा है पर जनमत बाजार घूमने के पक्ष में था मैंने बेमन से हाँ कह दी ,हालाँकि सच बताऊँ अगर मैंने गंगटोक का वो बाजार न देखा होता तो निश्चित रूप से मैं सिक्किम के समाजीकरण के इस पक्ष के लिए हमेशा के लिए वंचित रह जाता पर अनजानी जगह डर बहुत लगता है क्योंकि हमारा ड्राइवर हमें मार्केट अकेला छोड़कर चला जाने वाला था और वहां से हमें अकेले अपने होटल जाना था जो वहां से पांच किलोमीटर दूर था |मैंने अपने डर को काबू करते हुए हर चीज नोट कर ली यहाँ तक आपात काल में किस को फोन करना है वगैरह वगैरह पर विश्वास जानिये इतना सौम्य अहसास मुझे आजतक भारत के किसी बाजार में नहीं हुआ |सिक्किम में बादल आते जाते रहते हैं कभी चमकदार तेज धूप तो थोड़ी देर बाद काले बादल (वैसे भी हम बारिश के मौसम में थे वैसे सिक्किम में साल भर थोड़ी बहुत बारिश होती रहती है इसीलिए यहाँ के पहाड़ पर काई बहुत जमी रहती है )| 
गंगटोक का बाजार 
 पहाड़ पर स्थित बाजार में हम सीढ़ी चढ़कर पहुंचे भदेस शैली में इस बाजार को देखते हुए मेरे मुंह से निकला “ओ तेरी” करीब दो सौ मीटर की सीधी लेन जहाँ किसी तरह का कोई वाहन नहीं बीच में डिवाइडर की जगह बैठने के लिए बेंच दोनों तरफ और छोटे छोटे पेड़ सफाई का आलम यह कि आप सडक पर लेट सकते हैं और मजाल है कि धूल का कोई कण आपके कपड़ों या शरीर पर लगे |गुटखा सिक्किम में प्रतिबंधित है पान की इक्का दुक्का दुकाने है जो आपको बहुत खोजने पर मिलेंगी जिसे कोई अपना कोई बिहारी भाई चला रहा होगा |बाजार में कोई शोर नहीं सब शांत खुबसूरत लड़कियां घूम रही हैं ,बैठी हैं झुण्ड में वो भी खालिस पाश्चात्य परिधान में पर न तो कोई फब्ती कस रहा है न घूर रहा है और सब कुछ अनुशासित अद्भुत अभी कुछ और झटके लगने थे |पार्किंग का कोई झंझट नहीं क्योंकि गाड़ियों के लिए एक जगह निश्चित है और उससे आगे कोई अपने बड़े होने का रुवाब झाड़ते कोई नहीं जाता यही अंतर है उत्तर भारत से जहाँ जो जितना कानून तोड़ता है वो उतना बड़ा माना जाता है पर यहाँ कानून डंडे के जोर से नहीं लागू है बल्कि कानून का पालन लोगों के व्यवहार में |खरीदने लायक मुझे ऐसा कोई सामान नहीं मिला वही सारे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ब्रांड जिनसे हमारे माल्स भरे हुए वही यहाँ भी थे बस फर्क ये था कि ये सब छोटी छोटी दुकानों में थे |शराब की दुकान पर एक महिला अंग्रेजी शराब बेच रही है और लोगों की भीड़ है क्योंकि सिक्किम में  शराब उत्तर भारत के मुकाबले  बहुत सस्ती है और मजेदार बात यह कि लड़कियां भी बगैर डरे सहमे उस होती शाम को अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में खडी हैं |एक बार फिर मैं बहुत कुछ सोच रहा था ऐसा क्यों है हमारा भारत सामजिक व्यवहार में इतना अलग –अलग क्यों है |इनको स्वच्छ भारत अभियान की जरुरत क्यों नहीं बेटी बचाओ बेटी पढाओ कि इनको क्यों नहीं जरुरत है इनका जीवन कितना मुश्किल है फिर भी सामाजिक व्यवहार में हमसे इतना आगे क्यों है यहाँ इतने स्कूल कॉलेज भी नहीं हैं जितने उत्तर प्रदेश  ,बिहार में  है फिर इतना अंतर क्यों |हमें हर चीज को समझाना पड़ता है यह तो सब कुछ समझे हुए है |अभी और शानदार अनुभव होने थे बहरहाल अब हमें होटल लौटना था और समस्या यह थी कैसे होटल तक पहुंचूं |

............................................................जारी 

Friday, June 23, 2017

सिक्किम यात्रा :पहला भाग

गंगटोक कुछ ऐसा दिखता है 
मेरे लिए यात्रा का मतलब घूमना कभी नहीं रहा अमूमन मेरा पालन पोषण जिस परिवेश में हुआ है वहां महज घूमने के लिए यात्रा करना पैसे की बर्बादी है हाँ अगर आप किसी काम से कहीं जा रहे हैं और उसके साथ यात्रा हो जाए तो बढ़िया, मैंने अपने जीवन में कई परम्पराओं को तोडा है  जिसके गवाह मेरे अपने रहे हैं जब तक माता पिता के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर रहा उनके हिसाब से जीवन जीया पर जैसे ही आर्थिक रूप से स्वावलंबी हुआ सारी बेड़ियाँ एक एक करके तोड़ता गया और उन्हीं बेड़ियों में से एक है जब मौका मिले कहीं घूमने निकल जाओ |सच बताऊँ मैं बहुत आराम तलब आदमी हूँ और यात्रा मुझे कष्ट देती है पर यह कष्ट मुझे मजा देता है हर यात्रा के बाद मैं एक नए तरह का नजरिया लेकर वापस लौटता हूँ |मैं कौन हूँ इस दुनिया में क्या कर रहा हूँ ऐसे प्रश्नों के जवाब तो नहीं मिलते पर जवाब  के थोडा और करीब हो जाता हूँ और शायद इसीलिये जब भी मुझे मौका मिलता है मैं इस कष्ट का मज़ा लेने निकल पड़ता हूँ |वो कहते हैं न “मेरे मन कुछ और कर्ता के मन कुछ और” तो जिस यात्रा के लिए मैं इस बार निकल रहा था तब मेरे दिमाग में सिर्फ कुछ दिन आराम करना और भारत को थोडा और करीब से देखना था इससे ज्यादा कुछ नहीं था पर जब मैं इस यात्रा से लौटा तो जीवन के प्रति एक नया नजरिया पुष्ट होता गया और वो था “कर्ता बनने की कोशिश न करो” जीवन एक नदी है बस जिस तरफ नदी ले जा रही है चुपचाप बहते चलो,हम कुछ नहीं कर रहे हैं हमसे सब करवाया जा रहा है क्योंकि हमारा जीवन एकांगी नहीं यह बहुत से लोगों के जीवन से बंधा हुआ इसलिए यह संभव ही नहीं है कि आप कुछ कर रहे हैं |मैं अपनी बात और स्पष्ट करता हूँ और लौटता हूँ उस यात्रा वृतांत की ओर जिसकी उम्मीद में आप मेरा ब्लॉग पढ़ रहे हैं |इस बार मैंने पूर्वोत्तर भारत देखने का निश्चय किया पर कहाँ जाऊं कुछ समझ नहीं आ रहा था |गूगल किया और उससे भ्रम काफी बढ़ गया पूर्वोत्तर में कई राज्य हैं सबकी अपनी विशिष्टता हैं |मेरे पास किसी तरह एक हफ्ते का समय था तो मैंने सिक्किम जाने का निश्चय किया और जिसमें तीन दिन गैंगटोक एक दिन पीलिंग और दो दिन दार्जिलिंग शामिल थे| मैंने पहले ही लिखा मैं बहुत आरामतलब इंसान हूँ और उसी कारण पहले से ही सब व्यवस्था कर ली थी दिल्ली से बागडोगरा हवाई जहाज से,लखनऊ से दिल्ली ट्रेन से ,सब निश्चित था मतलब कहीं कोई तनाव न हो और मैं यात्रा का लुत्फ़ उठा सकूँ पर यहीं से होनी का खेल शुरू हुआ मेरी फ्लाईट के जाने और ट्रेन के  पहुँचने के बीच लगभग सात घंटे का फासला था पर हमारी ट्रेन रास्ते में ही रह गयी और फ्लाईट हमें छोड़ के बागडोगरा के लिए उड़ गयी |यात्रा अभी शुरू हुई थी कि मेरे अनुभवों का खजाना भरने लग गया एक नए तरह का अनुभव जिसकी आजतक कोई ट्रेन न छूटी हो उसे हवाई जहाज के छूटने का सदमा सहना था खैर थोड़ी देर तनाव रहा फिर गीता सार याद आया क्या ले के आये थे बस सारा तनाव छूमंतर |अब शांत दिमाग से आगे की योजना पर ध्यान देना था नए टिकट बुक करने थे और समय पर बागडोगरा पहुंचना था जिससे आगे की बुकिंग न प्रभावित न हो खैर एयरपोर्ट पहुँचने से पहले मैं टिकट बुक कर चुका था अब अगली फ्लाईट का इन्तजार था जो दिन के तीन बजे उड़ने वाली थी मैं सोच रहा था अगर मेरी फ्लाईट न छूटी होती तो इस वक्त मैं बागडोगरा में होता खैर जीवन यूँ होता तो क्या होता जैसी सोच में बीत ही जाता है |खैर हम नियत समय पर बागडोगरा पहुँच गये |बागडोगरा एयरपोर्ट सिलीगुड़ी शहर में सेना द्वारा बनाया एयरपोर्ट है हरे भरे खेतों के बीच एक बहुत छोटा सा हवाई अड्डा जहाँ आप परेशान हो जायेंगे पिछले एक दशक में पूर्वोत्तर भारत आने वाले पर्यटकों की संख्या में खासी वृद्धि हुई है पर एअरपोर्ट की हालत बुरी है खैर दिनभर की भगादौडी के बाद अभी हम अपनी मंजिल पर नहीं पहुंचे थे |यहाँ से सिक्किम की राजधानी गंगटोक हमारा ठिकाना थी लगभग एक सौ बीस किलोमीटर की सड़क यात्रा अभी और करनी थी वह भी पहाडी रास्तों में ,हमारी टैक्सी पहले से ही बुक थी |
तिस्ता दिन के समय 

ड्राइवर  सुकुल राय मिले ,पहली नज़र में मुझे वो एक घाघ टैक्सी ड्राइवर लगे मैंने सोचा पूरे रास्ते मैं चुप रहूँगा और दिन भर की थकान को सो कर पूरा करूँगा और हो भी क्यों न मैं सुबह तीन बजे से जग रहा था और मेरी ट्रेन के दिल्ली पहुँचने का सही समय साढ़े चार बजे था खैर हम बागडोगरा एयरपोर्ट से बाहर आये कहने को हम पश्चिम बंगाल में थे पर हर जगह बिहार के लोग मिल रहे थे उनके बोलने के अंदाज़ से साफ़ अंदाजा लगाया जा सकता था कि इनकी जड़ें बिहार में हैं |मैंने सुकुल जी से पूछा गंगटोंक पहुँचने में कितना वक्त लगेगा उसने कहा हम बड़ी आसानी से तीन साढ़े तीन घंटे में गंगटोंक पहुँच जायेंगे |मैंने शुक्र मनाया कि रात के नौ बजे तक हम होटल के अपने कमरे में होंगे पर वो दिन सचमुच एक खराब दिन था और आगे नियति हमारे सब्र की और परीक्षा लेने वाली थी हम सिलीगुड़ी से गंगटोंक के लिए बढे जमीन धीरे -धीरे ऊँची होने लगी मतलब हम पहाड़ पर जा रहे थे |सच बताऊँ किताबो के अलावा मुझे पूर्वोत्तर भारत का कोई ख़ास अंदाज़ा नहीं था पर यह यात्रा मेरी भारत के बारे में धारणा को हमेशा के लिए बदलने वाली थी |हम उत्तर भारतीय लोग सिर्फ टीवी चैनल से अंदाजा लगाते हैं कि भारत क्या है और उसकी समस्याएं कैसी हैं |मेरे अंदाज़े के विपरीत सुकुल (ड्राइवर ) एक भले और ईमानदार इंसान निकले अगर उनको मैं पूर्वोत्तर के वाहन चालकों का प्रतिनिधि मानूं तो जो मेरी धारणा उत्तर भारत के ड्राइवरों को देख कर बनी थी पूर्वोत्तर के ड्राइवर ज्यादा स्वाभिमानी और मेहनतकश होते हैं |उन्होंने बताया हम लगभग दो घंटे पश्चिम बंगाल में चलेंगे और पैतालीस मिनट सिक्किम में ,शाम हो चुकी थी सूरज डूब रहा था और पहाड़ पहले हरे फिर धीरे -धीरे काले होने लग गये हवा में ठंडक थी पर इतनी भी नहीं कि आपको ठंडक लगे गाड़ी के शीशे खोल दिए गये और मैं जल्दी से सिक्किम पहुँच जाना चाहता था |
डूबता सूरज और ऊपर चढ़ते हम 
पहाडी संकरे रास्ते को सुकुल जी नेशनल हाई वे बता रहे थे इतने संकरे रास्ते को हम उत्तर भारतीय गली ही कह सकते हैं गाड़ी धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी मेरी निगाह थकान के बावजूद रास्ते पर जमी हुई थी |मेरा एक अवलोकन रहा है वो चाहे लद्दाख हो या उत्तरांचल या फिर उडीसा और अब पूर्वोत्तर की देहरी पर सडक किनारे एक खाने की चीज जरुर मिलती और वो है भुट्टा (मक्का ) तो यहाँ भी सडक के किनारे भुट्टे बिक रहे थे बीच -बीच में में कुछ लोग मुज्ज़फर पुर की लीची भी बेच रहे थे हालांकि उससे सस्ती  लीची मैं लखनऊ में खाकर गया था |हमारे साथ -साथ तिस्ता नदी भी अपनी रास्ता तय कर रही थी |वही तिस्ता जिस पर येशु दास का मशहूर गाना "तिस्ता नदी सी तू चंचला सुनकर मैं बड़ा हुआ था |अँधेरा पूरी तरह घिर चुका था पर सडक पर लगने वाला जाम खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था हमारी गाड़ी सरक -सरक कर आगे बढ़ रही थी |सुकुल जी जो मूलतः सिक्किम के रहने वाले नेपाली गोरखा थे अपनी स्थानीय भाषा में आते हुए अपने साथी ड्राइवरों से बात कर रहे थे उनसे मिली सूचना के हिसाब से   हमारे पहुँचने का समय अब बढ़कर रात के ग्यारह बजे हो चुका था उन्होंने जो जाम लगने की  जो कहानी बताई वो काफी रोचक थी दो दोस्त एक इनोवा गाड़ी पर जा रहे थे दोनों में किसी बात पर झगडा हुआ और रक दोस्त ने इनोवा की चाभी निकाल कर उसे नीचे खाई में फेंक दिया और उनकी गाड़ी रोड पर खडी हो गयी बाद में सेना की मदद से उनकी गाड़ी सड़क के किनारे किसी तरह की गयी हमने जाते समय रोड पर उस खडी इनोवा और उन दोस्तों को भी देखा जिनको पुलिस वाले कुछ समझा रहे थे |धीरे –धीरे रात गहराने लग गयी और रास्ते सूने होने लग गए दुकाने बंद थी मैंने पूछा इतनी जल्दी अभी तो आठ ही बजे हैं सुकुल जी ने बताया यहाँ शाम के सात बजे दुकानें बंद हो जाती हैं और सुबह चार पांच बजे खुल जाती हैं |मैं भारत में ही था पर रास्ते में कोई गाड़ी हॉर्न नहीं बजा रही थी सब शान्ति से एक दूसरे को पास देते हुए आगे बढ़ रहे थे चढ़ती गाड़ी को रास्ता देने के लिए अगर गाड़ी थोड़ी पीछे भी करनी पड़े तो कोई हर्ज़ नहीं सब कुछ शान्ति से हो रहा था मोड़ पर जब दोनों तरफ की गाडिया एकदम अगल बगल होती ड्राईवर हँसते मुस्कुराते हुए एक दूसरे का हाल चाल लेते तिस्ता नदी की आवाज डराने वाली थी सिर्फ हर्र हर्र आवाज रास्ते में कई बाँध भी मिले जिनसे बिजली की जरूरतों को पूरा किया जा रहा है पर रात होने के कारण हम गाड़ी से नहीं निकले |फोटो खींचने का कोई सवाल ही नहीं था |रात के दस बज चुके थे अभी हम गैंगटोक से एक घंटे दूर थे पर भूख जोर मार रही थी सोचा चलो किसी पहाडी ढाबे के भोजन का आनंद लिया जाए वो भी धीरे –धीरे बंद हो रहे थे |गाड़ी किनारे लगी |हमने चाउमीन और चाय का ऑर्डर दिया |सुकुल जी ने हाथ मुंह धोने के लिए एक जगह दिखाई मैंने हाथ  मुंह धोने के बाद जैसे ही सर उठाया नीचे विशाल तिस्ता नदी अपने पूरे वेग से उस चांदनी रात में  बहती दिखी उस दुधिया रौशनी में तिस्ता का पानी चांदी जैसा चमक रहा था और मैं विस्मित खड़ा सोच रहा था आखिर कौन थे वे लोग जो सबसे पहले मानव सभ्यता के केन्द्रों से दूर यहाँ आकर बसे होंगे जहाँ जीवन कठिन लेकिन खुबसूरत है ,वो कौन से कारण रहे होंगे जो लोगों को मैदान छोड़कर पहाड़ में बसने के लिए प्रेरित करते होंगे वो भी तब जब सभ्यता को विकास का रोग नहीं लगा था और यहाँ बसना बहुत दुष्कर रहा होगा |बात ड्राइवरों की हो रही थी जब हम नाश्ता कर रहे थे मैंने सुकुल जी से कहा आप भी नाश्ता कर लो उन्होंने विन्रमता पूर्वक कहा वो सिर्फ चाय पीयेंगे |हम चाय पी ही रहे थे मैंने उनको अपने लिए एक शीतल पेय खरीदते देखा ,चूँकि उत्तर भारत में हमने ड्राइवरों का एक दूसरा रूप देखा भले ही ट्रेवल एजेंसी कहती है कि उनके खाने पीने से सवारी को कोई मतलब नहीं रहेगा पर वे इस जुगाड़ में रहते हैं कि पैसेंजर उनके खाने पीने का खर्चा उठाये पर यहाँ का ड्राइवर इस सारे मामले से ऊपर है और अपने खाने पीने का बोझ किसी भी जुगत से अपनी सवारी पर नहीं डाल रहा था मैंने तुरंत उन्हें पैसा देने से रोका और कहा इसका पैसा भी मैं ही दूंगा |हमारे इस वार्तालाप में ढाबा मालिक भी शामिल हो गया उसने पूछा मैं कहाँ से आया हूँ ,मैंने गर्व से बताया लखनऊ बस फिर क्या था वो बताने लगा वो भी लखनऊ से और विकास नगर में घर है मैंने कहा यहाँ काहे चले आये जंगल में उसने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और मुस्कुरा के बात को बदल गया उसकी बोलने की शैली से लग रहा था उसकी जड़ें बिहार में हैं हो सकता है लखनऊ में कोई रिश्तेदार रहता हो या उसका आना जाना लगा रहता हूँ एक उत्तर भारतीय के ढाबे में सारे कामगार मजदूर स्थानीय लोग थे यही है चमत्कार वो अपनी जमीन पर मजदूर थे और बाहर से आया एक आदमी मालिक बना बैठा था |अभी हमारा सफर जारी था सुकुल जी की हिन्दी को समझने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी इसलिए ज्यादा बातचीत न हो पा रही थी पर एक चीज  हम दोनों में कॉमन थी वो पुराने हिन्दी गानों के प्रति प्रेम खासकर नब्बे के दशक के जब हम जवान हो रहे थे |शांत चांदनी रात में हम नदीम श्रवण ,कुमार शानू ,अलका याग्निक और समीर की शानदार जुगलबंदी में गंगटोंक की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे रास्ते धीरे –धीरे चौड़े होते जा रहे थे पर उंचाई बढ़ती जा रही थे सिक्किम में  प्रवेश का एक विशाल द्वार हमारा स्वागत कर रहा था और गूगल मैप बता रहा था होटल देवाचीन रिट्रीट  दस मिनट की दूरी पर है  हम गैंगटोक में थे ..........

जारी 

Thursday, June 15, 2017

कैसे कारगर हो कूड़ा प्रबंधन

आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ ही कूड़े की समस्या मानव सभ्यता के साथ आयी |जब तक यह प्रव्रत्ति प्रकृति सापेक्ष थी परेशानी की कोई बात नहीं रही पर इंसान जैसे जैसे प्रकृति को चुनौती देता गया कूड़ा प्रबंधन एक गंभीर समस्या में तब्दील होता गया क्योंकि मानव ऐसा कूड़ा छोड़ रहा था जो प्रकृतिक तरीके से समाप्त  नहीं होता या जिसके क्षय में पर्याप्त समय लगता है और उसी बीच कई गुना और कूड़ा इकट्ठा हो जाता है जो इस प्रक्रिया को और लम्बा कर देता है जिससे कई तरह के प्रदुषण का जन्म होता है और साफ़ सफाई की समस्या उत्पन्न होती है |भारत ऐसे में दो मोर्चे पर लड़ाई लड़ रहा है एक प्रदूषण और दूसरी स्वच्छता की | वेस्ट टू एनर्जी  रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के एक  शोध के मुताबिक  भारत में अपर्याप्त कूड़ा  प्रबन्धन  बाईस तरह की बीमारियों का वाहक बनता है |कूड़े में  पौलीथीन एक ऐसा ही उत्पाद है जिसका भारत जैसे विकासशील देश में बहुतायत से उपयोग होता है पर जब यह पौलीथीन कूड़े में तब्दील हो जाती है तब इसके निस्तारण की कोई ठोस योजना हमारे पास नहीं है |लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में भारत सरकार  ने बताया देश में पंद्रह हजार टन प्लास्टिक कूड़ा पैदा होता है जिसमें से छ हजार टन उठाया नहीं जाता है और वह ऐसे ही बिखरा रहता है |पिछले एक दशक  में भारतीय रहन सहन में पर्याप्त बदलाव आये हैं और लोग प्लास्टिक की बोतल और प्लास्टिक में लिपटे हुए उत्पाद सुविधाजनक होने के कारण ज्यादा प्रयोग करने लग गए हैं |केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2014-15 में 51.4 मिलीयन टन ठोस कूड़ा निकला जिसमें से इक्यानबे प्रतिशत इकट्ठा कर लिया गया जिसमें से मात्र सत्ताईस प्रतिशत का निस्तारण किया गया शेष तिहत्तर प्रतिशत कूड़े को डंपिंग साईट्स में दबा दिया गया इस ठोस कूड़े में बड़ी मात्रा पौलीथीन की है जो जमीन के अंदर जमीन की उर्वरा शक्ति को प्रभावित कर उसे प्रदूषित कर रही है | भारत सरकार की स्वच्छता स्थिति रिपोर्ट” के अनुसार  देश में कूड़ा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) एक बड़ी समस्या है | इस रिपोर्ट में भारतीय आंकड़ा सर्वेक्षण कार्यालय (एन एस एस ओ ) से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया गया है |ग्रामीण भारत में तरल कूड़े के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं है जिसमें मानव मल भी शामिल है देश के 56.4 प्रतिशत शहरी वार्ड में सीवर की व्यवस्था का प्रावधान है आंकड़ों के मुताबिक़ देश का अस्सी प्रतिशत कूड़ा नदियों तालाबों और झीलों में बहा दिया जाता है|यह तरल कूड़ा पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर देता है|यह एक गम्भीर समस्या है क्योंकि भूजल ही पेयजल का प्राथमिक स्रोत है |प्रदूषित पेयजल स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याएं पैदा करता है जिसका असर देश के मानव संसधान पर भी पड़ता है |गाँवों में कूड़ा प्रबंधन का कोई तंत्र नहीं है लोग कूड़ा या तो घर के बाहर या खेतों ऐसे ही में डाल देते हैं |शहरों की हालत गाँवों से थोड़ी बेहतर है जहाँ 64 प्रतिशत वार्डों में कूड़ा फेंकने की जगह निर्धारित है लेकिन उसमें से मात्र 48 प्रतिशत ही रोज साफ़ किये जाते हैं |देश के तैंतालीस प्रतिशत शहरी वार्ड में घर घर जाकर कूड़ा एकत्र करने की सुविधा उपलब्ध है | कूड़ा और मल का अगर उचित प्रबंधन नहीं हो रहा है तो भारत कभी स्वच्छ नहीं हो पायेगा |दिल्ली और मुंबई  जैसे भारत के बड़े महानगर वैसे ही जगह की कमी का सामना कर रहे हैं वहां कूड़ा एकत्र करने की कोई उपयुक्त जगह नहीं है ऐसे में कूड़ा किसी एक खाली जगह डाला जाने लगता है वो धीरे –धीरे कूड़े के पहाड़ में तब्दील होने लग जाता है और फिर यही कूड़ा हवा के साथ उड़कर या अन्य कारणों से साफ़ –सफाई को प्रभावित करता है जिससे पहले हुई सफाई का कोई मतलब नहीं रहा जाता |उसी कड़ी में ई कूड़ा भी शामिल है | ई-कचरा या ई वेस्ट एक ऐसा शब्द है जो तरक्की के इस प्रतीक के दूसरे पहलू की ओर इशारा करता है वह पहलू है पर्यावरण की बर्बादी । भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग ४ लाख टन ई-कचरा उत्पन्न होता है. राज्यसभा सचिवालय द्वारा  'ई-वेस्ट इन इंडियाके नाम से प्रकाशित एक दस्तावेज के अनुसार भारत में उत्पन्न होने वाले कुल ई-कचरे का लगभग सत्तर प्रतिशत केवल दस  राज्यों और लगभग साठ प्रतिशत कुल पैंसठ शहरों से आता है| दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में ई-कचरे के उत्पादन में मामले में महाराष्ट्र और तमिल नाडु जैसे समृृद्ध राज्य और मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर अव्वल हैं | एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश का लगभग ९० प्रतिशत ई-कचरा असंगठित क्षेत्र केअप्रशिक्षित लोगों द्वारा निस्तारित किया जाता है| 
अमर उजाला में 15/06/17 को प्रकाशित 

Wednesday, May 31, 2017

सूचना,शिक्षा और मनोरंजन का मतलब सिर्फ इंटरनेट

मार्शल मैक्लुहान ने जब 1964 में जब “माध्यम ही संदेश है” जैसा क्रांतिकारी वाक्य दुनिया को दिया था तो किसी को भी उम्मीद नहीं थी उनका यह कथन कैसे आने वाले वक्त में जनमाध्यमों की दशा –दिशा तय करने वाला हो जाएगा |सच यह है कि किसी भी वक्त में कौन सा जनमाध्यम लोगों के बीच लोकप्रिय होगा यह उस वक्त के समाज  के तकनीकी चरित्र पर निर्भर करेगा |मतलब समाज में उस जनमाध्यम  का बहुतायत में प्रयोग किया जाएगा जिसकी तकनीक बहुसंख्यक वर्ग तक उपलब्ध होगी |भारत में अखबार ,रेडियो  से शुरू हुआ यह सिलसिला टीवी से होता हुआ इंटरनेट तक आ पहुंचा |लम्बे वक्त तक रेडियो भारत में  रेडियो ने एकछत्र राज किया फिर उसे टीवी से चुनौती मिली |भारत में टेलीविजन चैनल क्रांति अभी पैर पसार ही रही थी कि इंटरनेट के आगमन ने विशेषकर मोबाईल इंटरनेट ने   खेल के सारे मानक ही बदल दिए |अब सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का मतलब सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट हो गया है और भारत अपवाद नहीं है |एक्सेन्चर कम्पनी का डिजीटल कंज्यूमर सर्वे “विनिंग एक्सपीरियंस इन द न्यू वीडियो वर्ल्ड” यह बता रहा है कि सारी दुनिया में चित्र और ध्वनि माध्यम के रूप में टेलीविजन तेजी से अपनी लोकप्रियता खो रहा है और लोग डिजीटल प्लेटफोर्म (कंप्यूटर और स्मार्ट फोन ) पर टीवी के कार्यक्रम  देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं 2016 में 52 प्रतिशत व्यक्ति टीवी के कार्यक्रम देखने के लिए टेलीविजन  का इस्तेमाल अपने पसंदीदा उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रहे  थे 2017 में यह आंकड़ा गिरकर 23 प्रतिशत रह गया यानी कुल 55 प्रतिशत की गिरावट आई|इसी तरह  2016 में 32 प्रतिशत लोग टेलीविजन के कार्यक्रम देखने के लिए अपने पसंदीदा उपकरण के रूप में लैपटॉप और कंप्यूटर का प्रयोग कर रहे थे और यह आंकड़ा 2017 में बढ़कर 42 प्रतिशत हो गया है | इस सर्वे में दुनिया के छब्बीस देशों के छब्बीस हजार लोगों ने हिस्सा लिया |इस सर्वे में भारत का जिक्र विशेष तौर पर है जहाँ दर्शकों का टीवी कंटेंट देखने के लिए डिजीटल डीवाईस (कंप्यूटर और स्मार्ट फोन ) का प्रयोग टीवी के मुकाबले  बहुत तेजी से हो रहा है और यह दर अमेरिका और इंग्लैण्ड जैसे विकसित देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा है |2016 के मुकाबले  इस वर्ष  भारत में यह गिरावट अठहत्तर प्रतिशत  है |दर्शकों की रूचि में आया जीवन के हर क्षेत्र में असर डाल रहा है हाल के वर्षों मे आये डिजीटल बदलाव ने जनमाध्यमों के उपयोग पैटर्न को पूरी तरह बदल कर रख दिया |माध्यमों के डिजीटल होने से पहले रेडियो और टीवी भारतीय स्थितियों  में एक सामूहिक जनमाध्यम हुआ करते थे जिसका उपभोग पूरा  परिवार साथ किया करता था और इसलिए उनके कंटेंट में सामूहिकता पर जोर रहा करता था कारण तकनीक महंगी और लोगों की प्रतिव्यक्ति आय कम थी इसलिए जनमाध्यमों का उपयोग सिर्फ माध्यम उपभोग न बनकर एक उत्सव में परिणत हो जाता था |

डिजीटल उपकरणों के प्रति बढ़ती दीवानगी इस ओर इशारा कर रही है कि भारत सामूहिकता के इस दौर से निकल कर एक ऐसे समाज में बदल रहा है जहाँ “मैं” पर जोर है इसके कारण जनमाध्यमों में  कंटेंट के स्तर पर लगातार विविधता आ रही है और सिर्फ डिजीटल उपकरणों को ध्यान में रखकर सीरियल और अन्य कार्यक्रम बन रहे हैं |शहरों में पूरे परिवार का एक साथ बैठकर टीवी देखना अब इतिहास होता जा रहा है । स्माार्टफोन और कंप्यूटर ने हमारी इन आदतों को बदल दिया है। नई पीढ़ी की दुनिया अब मोबाइल और लैपटॉप में है, जो अपना ज्यादा वक्त इन्हीं साधनों पर बीता रही है। परिवार भले ही एकल और छोटे होते जा रहे हैं पर डिजीटल उपकरणों की संख्या बढ़ती जा रही है क्योंकि डिजीटल उपकरण को लोग अपनी रुचियों के हिसाब से अनुकूलित कर सकते हैं |परम्परागत टेलीविजन यह सुविधा अपने दर्शकों को नहीं देता |पर कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जिन पर चर्चा करना जरुरी है डिजीटल उपकरणों का अधिक प्रयोग दर्शकों को डिजीटल डिपेंडेंसी सिंड्रोम (डी डी सी ) की गिरफ्त में ला सकता है जिससे जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलता, तो बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है|डिजीटल संस्कृति अपनी अनुकूलन सुविधा के कारण इन्सान को अकेला बना रही है और टेलीविजन जैसे जनमाध्यमों के उपभोग में बदलाव की यह प्रवृति इस अकेलेपन को और बढ़ा सकती है |
नवोदय टाईम्स में 31/05/17 को प्रकाशित 

Friday, May 5, 2017

अब मौसम की खुशियाँ कहाँ

गर्मी आ गयी हैं पर इन गर्मियों में वो कशिश नहीं दिखती जो हमारे बचपन में दिखती थी न अब वैसी लू चलती है न अब गर्मी आने की वैसी तैयारी होती है जैसी हमारे जमाने में होती थी |गर्मी के आने से पहले सुराही या घड़ा खरीदा जाता था हम पिता जी की उंगली पकड़ के मंडी जाते थे जहाँ पिता जी न जाने उन घड़ों में क्या परखते थे ये हम आज तक न समझ पाए कि उन दिनों एक जैसे घड़े में क्या देखते थे |तब कूलर विलासिता की चीज थे एसी क्या होता है लोग जानते भी नहीं थे पर उन गर्मियों का इन्तजार हम साल भर करते थे शाम होते ही छत पर पहुँच जाना और उसे पानी डाल कर ठंडा करने की कोशिश करना क्योंकि तब पूरा परिवार सारी रात  उसी छत पर काटता था |सुबह सत्तू (चने का आटा) का नाश्ता किसी मैगी ,ब्रेड से ज्यादा लुभावना लगता था |हमारा शहर आज की तरह मेट्रो नहीं था वो कुछ कस्बाई रंगत लिए हुए था यानि हमारे माता पिता जो ठेठ गाँव से निकले थे और हम जैसे लोग जो उस शहर में पैदा हुए थे दोनों की दुनिया खुबसूरत थी न उन्हें शहर  की कमी खलती थी न हमें गाँव की |अब हर घर में एसी है सत्तू माल में बिकता है पर मेरा बेटा उसे डाउन मार्केट खाना समझता है उसे फास्ट फ़ूड  पसंद है जो अपने स्मार्ट फोन से मंगाना अच्छा लगता है |तपती धूप में वो अपने पिता के साथ कुछ मीटर भी नहीं चल सकता क्योंकि उसकी त्वचा खराब हो जायेगी |जंगल जलेबी उसने देखी नहीं क्योंकि वो मॉल में बिकती नहीं ऐसे न जाने कितने फल जिनको खाने के लिए हम साल भर गर्मियों का इन्तजार करते थे उसके लिए उनका कोई मायने नहीं |वो चाहे अमरख हो या कैथा या फिर खट- मिट्ठा फालसा जैसे फल जो हम जैसे गरीब परिवारों के लिए गर्मियों को उत्सव में बदल देते थे |उन दिनों हम यही फल पाकर अपने आपको खुशनसीब समझते थे |तब सनस्क्रीन नहीं होती थी और गर्मी कितनी भी क्यों न हों रात में घर की भीगी छत मस्त नींद सुला ही देती थी |अम्बार और करौंदा के अचार खाने का जायका बना देते थे |आज घर में एसी है अम्बार और करौंदा मॉल में नहीं मिलता कभी कभार फुठ्पाथ पर दिख जाता है |कैथा खाए हुए सदियाँ बीती अब मौसम बदलना जश्न मनाने का मौका नहीं होते सारा जोर मौसम के वेग को नियंत्रित करने पर होता है |छतें गायब हो गयीं आसमान में तारे गिने दशक बीत गये अब मौसम बदलने का मतलब समझ ही नहीं आता फ्रिज का ठंडा पानी और एसी की ठंडा हवा गर्मी को  महसूस नहीं होने देते शायद इसे ही मौसम का वैश्वीकरण कहते हैं जब सारे मौसम एक जैसे लगते हैं |सुख तो बहुत है पर अब बदलते मौसम वो खुशियाँ नहीं देते जैसा हमारे ज़माने में देते थे
प्रभात खबर में 05/05/2017 को प्रकाशित 

Saturday, April 29, 2017

रिश्ते चाहिए ? एप पर जाइए


वर्तमान समाज  एक एप का समाज है दुनिया  स्मार्ट फोन के रूप में हथेली में सिमट चुकी है |इंटरनेट और डेस्कटाप कम्प्यूटरों से शुरू हुआ  यह सिलसिला मोबाईल  के माध्यम से एक एप में  सिमट  चुका है पिछले एक दशक में इंटरनेट ने भारत को  जितना बदला उतना  मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास में किसी और चीज ने नहीं बदला है ,यह बदलाव बहु आयामी है बोल चाल  के तौर तरीके से  शुरू हुआ यह सिलसिला  खरीददारी  ,भाषा  साहित्य  और  हमारी अन्य प्रचलित मान्यताएं और परम्पराएँ  सब  अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह बदलाव इतना  तेज है कि इसकी नब्ज को पकड़  पाना समाज शास्त्रियों  के लिए भी आसान नहीं है  और  आज इस तेजी  के मूल में एप” ( मोबाईल एप्लीकेशन ) जैसी यांत्रिक  चीज  जिसके माध्यम से मोबाईल  फोन में  आपको किसी वेबसाईट को खोलने की जरुरत नहीं पड़ती |आने वाली पीढियां  इस  समाज को एक एप” समाज के रूप में याद  करेंगी जब  लोक और लोकाचार  को सबसे  ज्यादा  एप” प्रभावित कर रहा  था |हम हर चीज के लिए बस एक अदद एप” की तलाश  करते हैं |जीवन की जरुरी आवश्यकताओं के लिए  यह  एप” तो ठीक  था  पर  जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं |
भारत में है युवाओं की सबसे ज्यादा आबादी
संयुक्त राष्ट्र की एक  रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यहां 35.6 करोड़ आबादी युवा है भारत की अठाईस प्रतिशत  आबादी की आयु दस साल से चौबीस  साल के बीच है। सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में मौजूदा समय में युवाओं कीसबसे  सबसे अधिक है इसी आबादी का बड़ा हिस्सा वह है  जो स्मार्ट फोन का इस्तेमाल बगैर किसी समस्या करता है  ये तकनीक को अच्छी तरह जानते और समझते हैं |मोबाईल ख़ासा व्यक्तिगत माध्यम है और हर व्यक्ति अपनी जरूरतों के हिसाब से एप” चुनकर इंस्टाल कर सकता है |पिछले एक दशक में  शहरी भारतीय रहन सहन में ख़ासा परिवर्तन आया है और युवा जल्दी आत्म निर्भर हुए हैं जहाँ वो अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद ले रहा है |यूँ तो देश में  ऑनलाइन मैट्रीमोनी का कारोबार अगले तीन साल में 1,500 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसारवैवाहिक वेबसाइटों पर साल 2013 में 8.5 लाख प्रोफाइल अपलोड की गईजिनकी संख्या साल 2014 में बढ़कर 19.6 लाख हो गई। यानी एक साल में 130 फीसदी का इजाफा।पर डेटिंग एप का बढ़ता चलन इस ओर इशारा कर रहा है कि सम्बन्ध बनाने में भी अब लोग वेबसाईट के बजाय एप पर अधिक निर्भरता बढ़ा रहे हैं वर्तमान में डेटिंग एप  का आकार 13 करोड़ डॉलर से भी ऊपर चला गया है और जो लगातार बढ़ रहा  है। ओनलाईन डेटिंग साईट्स में अव्वल  टिंडर इंडिया का  दावा है कि उसे    एक दिन में 14 मिलियन स्वाइप्स होते हैं जो कि सितंबर 2015 में 75 लाख तक ही थे।ये डेटिंग एप अपनी प्रकृति में अलग अलग सेवाएँ देने का वायदा करते हैं वैसे भी भारतीय डेटिंग एप यहाँ की परिस्थितयों को बेहतर समझते हैं क्योंकि भारत रिश्तों और सेक्स के मामले में एक बंद समाज रहा है पर अब वो धीरे धीरे खुल रहा है |ट्रूली मैडली जैसे एप यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते  हैं कि कोई शादी शुदा  इस एप से न जुड़े वे महिलाओं की सुरक्षा का वायदा करते हैं वहीं टिनडर जैसा अन्तराष्ट्रीय ब्रांड गैर गंभीर सम्बन्धों को बढ़ावा देता है पर भारतीय डेटिंग प्लेटफोर्म शहरी भारतीयों का इस बात का भरोसा देते हैं कि आप गैर गंभीर सम्बन्धों को भविष्य में एक नाम दे सकें और अपने भविष्य के जीवन साथी को सिर्फ तस्वीर देख कर न चुने बल्कि उनके साथ एक गैर प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाएं और वक्त के साथ यह फैसला करें कि अमुक व्यक्ति एक जीवन साथी के रूप में आपके लिए बेहतर रहेगा या नहीं ,यहाँ ऐसे डेटिंग एप  ऑनलाइन मैट्रीमोनी साईट्स से एक कदम आगे निकल जाते हैं और एक उदार द्रष्टिकोण का निर्माण करते हैं जो भारतीय पारम्परिक वैवाहिक व्यवस्था से अलग एक विकल्प युवाओं को देते हैं जो जाति,धर्म और समाज से परे विवाह का आधार व्यक्ति की अपनी पसंद बनता है |इन डेटिंग एप की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑनलाइन प्लेटफार्म के अलावा ये विज्ञापनों के लिए पारम्परिक रूप से महंगे माध्यम टीवी का भी इस्तेमाल  कर रहे हैं |
तरह तरह के डेटिंग एप और उनसे जुड़े खतरे
ट्रूली मैडली, वू ,टिनडर,आई क्रश फ्लश और एश्ले मेडिसन जैसे डेटिंग एप भारत में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं जिसमें एश्ले मेडिसन जैसे एप किसी भी तरह की मान्यताओं को नहीं मानते हैं आप विवाहित हों या अविवाहित अगर आप ऑनलाईन किसी तरह की सम्बन्ध की तलाश में हैं तो ये एप आपको भुगतान लेकर सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है हालंकि डेटिंग एप का यह कल्चर अभी मेट्रो और बड़े शहरों  तक सीमित है पर जिस तरह से भारत में स्मार्ट फोन का विस्तार हो रहा है और इंटरनेट हर जगह पहुँच रहा है इनके छोटे शहरों में पहुँचते देर नहीं लगेगी |पर यह डेटिंग संस्कृति भारत में अपने तरह की  कुछ समस्याएं भी लाई है जिसमें सेक्स्युल कल्चर को बढ़ावा देना भी शामिल है |वैश्विक सॉफ्टवेयर एंटी वायरस  कंपनी नॉर्टन बाई सिमेंटेक के अनुसार ऑनलाइन डेटिंग सर्विस एप साइबर अपराधियों का मनपसंद प्लेटफार्म बन चुका है। भारत के लगभग 38 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि वह ऑनलाइन डेटिंग एप्स का प्रयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति  जो मोबाइल में डेटिंग एप रखते हैउनमें से करीब 64 प्रतिशत  महिलाओं और 57 प्रतिशत  पुरुषों ने सुरक्षा संबंधी परेशानियों का सामना किया है। आपको कोई फॉलो कर रहा हैआप की पहचान चोरी होने के डरके साथ-साथ उत्पीड़ित और कैटफिशिंग के शिकार होने का खतरा बरकरार रहता है।
नवभारत टाईम्स ,में 29/04/17 को प्रकाशित 

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