Sunday, December 16, 2012

सूचना प्रौद्योगिकी की सियासत

सूचना प्रौद्योगिकी ने भले ही पूरी धरती को एक गाँव बना दिया हो और हम सूचना समाज की ओर बढ़ चले हों पर भारत के गाँव बदलाव की इस बयार का सुख नहीं ले पाए हैं| वैसे तो देश में सूचना क्रांति के विकास के आंकड़े हौसला बढ़ाते हैं| मैककिन्सी ऐंड कंपनी द्वारा किया गया एक अध्ययन बताता है कि 2015 तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद तिगुनी होकर पैंतीस करोड़ से भी ज्यादा हो जाएगी पर तस्वीर का एक हिस्सा उतना चमकदार नहीं है हमारी करीब साठ प्रतिशत आबादी अब भी शहरों से बाहर रहती है। सिर्फ आठ प्रतिशत भारतीय घरों में कंप्यूटर हैं|इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक भारत की ग्रामीण जनसंख्या का दो प्रतिशत ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है। यह आंकड़ा इस हिसाब से बहुत कम है क्योंकि इस वक्त ग्रामीण इलाकों के कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से अट्ठारह  प्रतिशत को इसके इस्तेमाल के लिए दस किलोमीटर से ज्यादा का सफर करना पड़ता है।तकनीक के इस डिजीटल युग में हम अभी भी रोटी कपडा और मकान जैसी  मूलभूत समस्याओं के उन्मूलन में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं |खाद्य सुरक्षा बिल पास होने के इंतज़ार में है | अमरीका के अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति और शोध संस्थान और कन्सर्न वर्ल्डवाइड ने 79 देशों को लेकर एक  विश्व भुखमरी सूचकांक तैयार किया है जिसमें भारत को 65वें स्थान पर रखा गया है|भुखमरी से निपटने के मामले में भारत चीन ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और श्रीलंका से पीछे है| संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ की नई रिपोर्ट यह बताती है कि साल 2011 में दुनिया के अन्य देशों की मुकाबले भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें हुईं। गौरतलब है कि सूचना तकनीकी का इस्तेमाल मानव संसाधन की बेहतरी के लिए बहुत बड़ा प्रभाव छोड़ने में असफल रही है माना जाता रहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाएगा और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगा पर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की नयी रिपोर्ट हमारी आँखें खोल देती है जिसमे भारत को 176 देशों में भ्रष्टाचार के मामले में 94 पायदान पर रखा गया है|सूचना क्रांति का शहर केंद्रित विकास देश के सामाजिक आर्थिक ढांचे में डिजीटल डिवाईड को बढ़ावा दे रहा है| प्रख्यात जोखिम विश्लेषण फर्म मेपलक्राफ्ट  द्वारा जारी डिजिटल समावेशन सूचकांक में ब्रिक देशों के समूह में मात्र भारत को अत्यधिक जोखिम वाले देश  के रूप में वर्गीकृत किया गया है जिसका मतलब है कि आर्थिक विकास के बावजूद अभी भी देश की आबादी का बड़ा हिस्सा डिजीटल समावेशन से दूर है हालांकि बाजार का विस्तार हुआ है लेकिन आईसीटी के उपयोग का  असमान वितरण चिंता का बड़ा कारण है|
उदहारण के रूप में भारत की अमीर जनसँख्या का बड़ा तबका शहरों में रहता है जो सूचना प्रौद्योगिकी का ज्यादा इस्तेमाल करता है|उदारीकरण के पश्चात देश में एक नए मध्यम वर्ग का विकास हुआ जिसने उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को प्रेरित किया जिसका परिणाम सूचना प्रौद्योगिकी में इस वर्ग के हावी हो जाने के रूप में भी सामने आया देश की शेष सत्तर प्रतिशत जनसँख्या न तो इस प्रक्रिया का लाभ उठा पा रही है और न ही सहभागिता कर पा रही है|आश्चर्यजनक रूप से इसके पीछे भी बाजार का अर्थशास्त्र जिम्मेदार है न कि तकनीक का अभाव,सूचना प्रौद्योगिकी कोई लोककल्याणकारी नीति पर नहीं बल्कि मुनाफे के अर्थशात्र पर निजी कंपनियों के हाथों में हैं जिनका जोर फायदे को अधिकतम करना है, जाहिर तौर पर इसी लिए इंटरनेट सेवाओं का विस्तार शहरों और उनके इर्द गिर्द के कस्बों में ज्यादा हो रहा है|सामन्यत:एक ग्रामीण इलाके के निवासी की खरीद क्षमता शहरी निवासी से कम होती है इसीलिये बैंडविड्थ और कनेक्टीविटी की समस्या ग्रामीण इलाकों में ज्यादा है| नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्षपिछले दस वर्ष  में ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 0.4 प्रतिशत परिवारों को ही घर में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध थी।सूचना प्रौद्योगिकी के आने से यह उम्मीद जगी थी कि शहरों और गावों के बीच का अंतर घटेगा और गाँव बिना शहर हुए विकास की धारा का हिस्सा बनेंगे पर व्यवहार में यह डिजीटल डिवाईड उसी आर्थिक सुधार की प्रतिकृति हैं जिसमे अमीर और गरीब में फासला बढ़ रहा है| सूचना प्रौद्योगिकी  मानव समस्याओ का समाधान करने मे मदद करनेवाली मशीनो और प्रक्रिया का विकास प्रयोग है पर यदि इस तकनीक का वितरण असमान होगा तो यह समस्याएं कम करने की बजाय बढाएंगी|भारत जैसे विकास शील देश के ग्रामीण इलाकों में यह तकनीक जितनी जल्दी सर्व सुलभ होगी देश के विकसित राष्ट्र में बदलने का सपना उतनी जल्दी हकीकत बनेगा |
अमर उजाला में 16/12/12 को प्रकाशित 

Tuesday, December 11, 2012

वेब मीडिया बदल रहा है उपभोक्ताओं का मिजाज

इंटरनेट की शुरुआत से ही कन्वर्जेंस की संभावनाओं के असीमित विकल्प खुल गए थे, पर तकनीकी और कंटेंट के स्तर पर यह बदलाव हमारी मीडिया हैबिट पर किस तरह से असर करेगा, इसे लेकर आशंकाएं थीं। भारत जैसे देश में इस बारे में सभी मान रहे थे कि यह परिवर्तन बहुत समय लेगा और तब तक प्रचलित जन-संचार माध्यम अपनी धाक जमाए रखेंगे। सूचनाएं और समाचार पाने का सबसे तेज माध्यम अभी तक टेलीविजन ही था, पर अब यह तस्वीर बदलने लगी है और टेलीविजन को कड़ी टक्कर दे रहा है वेब मीडिया, यानी एक ऐसा माध्यम, जिसका प्रयोग इंटरनेट द्वारा किया जाता है।भारत जैसे देश में अभी इंटरनेट की ब्रॉड बैंड सुविधाओं का व्यापक विस्तार होना बाकी है, लेकिन अब इंटरनेट की सुविधा से लैस मोबाइल फोन मीडिया हैबिट के परिदृश्य पर बड़ा असर डाल रहे हैं। भारत में इस बदलाव की वाहक कामकाजी युवा पीढ़ी है, जो तकनीक पर ज्यादा निर्भर है और परंपरागत रूप से मीडिया उपभोग के समय का भी अधिकतम लाभ लेना चाहती है, यानी खबर पढ़ते-देखते समय भी अपने काम पर रहा जाए। एसी नील्सन के वैश्विक मीडिया खपत सूचकांक 2012 से पता चलता है कि एशिया (जापान को छोड़कर) और ब्रिक देशों में इंटरनेट मोबाइल फोन पर टीवी व वीडियो देखने की आदत पश्चिमी देशों व यूरोप के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है, यानी वेब मीडिया परंपरागत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बहुत तेजी से चुनौती दे रहा है।यही वजह है कि हर इलेक्ट्रॉनिक टीवी चैनल अब अपनी वेबसाइट पर ज्यादा ध्यान देने लगा है, जिसमें लाइव स्ट्रीमिंग के साथ खबरों का विश्लेषण और पुराने वीडियो भी उपलब्ध रहते हैं। बहरहाल, बदलाव का यह असर बहुआयामी है। समाचारपत्र और एफ एम रेडियो चैनल भी अपनी साइबर उपस्थिति पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। बीबीसी  व डायचे वेले जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रसारक अपने वेब पोर्टल पर खासा जोर दे रहे हैं। वहां दृश्य-श्रव्य सामग्री के अलावा गंभीर विश्लेषण हैं, वहीं समाचारपत्र ई-पेपर के अलावा अपनी वेबसाइट को लगातार अपडेट रख रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मीडिया उपभोग के मामले में टेलीविजन अब भी नंबर एक है, पर लोगों के इंटरनेट पर समय बिताने के मामले में बहुत तेजी से इजाफा हो रहा है, जिससे विज्ञापनदाताओं का झुकाव भी वेब की तरफ हो रहा है। निवेश पर सर्वाधिक लाभ एशिया-प्रशांत क्षेत्रों में डिजीटल मार्केटिंग चैनलों द्वारा हो रहा है, ऐसा इस रिपोर्ट का मानना है।
भारत के संदर्भ में यह बदलाव ज्यादा तेजी से होगा, क्योंकि मैकेंजी ऐंड कंपनी द्वारा किया गया एक अध्ययन बताता है कि 2015 तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद 35 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी, जिनके हाथों में एक ऐसी तकनीक होगी, जिससे उनकी परंपरागत टीवी पर निर्भरता कम होगी और इसमें बड़ी भूमिका स्मार्ट फोन निभाने वाले हैं।
हिन्दुस्तान में 11/12/12 को प्रकाशित 

Monday, November 19, 2012

अपनी अपनी रेखाएं


जिंदगी का त्यौहार,वैसे त्यौहार कोई भी हों वो जब आते हैं तो लगता है कि वो जाएँ ही ना छुटियाँ मस्ती,खाना पीना और भी बहुत कुछ आप भी सोच रहे होंगे कि मैं कौन अनोखी बात बता रहा हूँ.त्योहारों का आना जितना सच है उतना ही उनका जाना भी सच है. इन त्योहारों के मौसम में घर की सफाई में एक पुरानी किताब मिली जानते हैं उसका विषय था ज्योमेट्री जी हाँ रेखा गणित और क्या कुछ आँखों के आगे घूम गया वो स्कूल के दिन वो एल एच एस इस ईक्युल टू आर एच एस और इतिसिद्धम. तब लगता था हम ये सब क्यूँ पढते हैं वैसे भी गणित मुझे बहुत बोर करती थी. जिंदगी तो आगे बढ़ चली पर अब समझ आ रहा है जीवन में रेखा का क्या महत्व हैक्योंकि इसी पर जिंदगी का गणित टिका हुआ है.अब बात आपके सर के ऊपर से जा रही है चलिए मैं आपको समझाता हूँ रेखा मतलब लाइन, लिमिट ,सीमा या फिर कुछ आड़ी तिरछी सीधी पंक्ति वैसे इनका कोई मतलब नहीं है पर इन्हें सिलसिलेवार लगा दिया जाए तो किसी के घर का नक्शा बन जाता है तो कोई कुछ ऐसा जान जाता है जिसे कल तक कोई नहीं जानता था.रेखा ही है वो टूल है जिससे आप अपने सपनों को वास्तविकता का जामा पहना सकते हैं पर ये ध्यान रहे कि उस रेखा का डायरेक्शन किस तरफ है क्योंकि वो चाहे गणित का सवाल हो या जिंदगी की उलझन काफी कुछ आपके दिमाग के डायरेक्शन पर निर्भर करता है.
विषय कोई भी हो चाहे इतिहास, भूगोल गणित या फिर साहित्य बगैर रेखाओं के इनका कोई अस्तित्व नहीं है अब देखिये ना लिपि या स्क्रिप्ट भी तो कुछ रेखाओं का कॉम्बिनेशन है यानि दुनिया को समझने के लिए हमें रेखाओं की जरुरत है इतिहास में समयरेखा है तो भूगोल में अक्षांश और भूमध्य जैसी रेखाएं. कॉपियों में लिखने का अभ्यास पहले लाईनदार पन्नों से होता है बाद में जब हम अभ्यस्त हो जाते हैं तो उनकी जगह सफ़ेद पन्ने ले लेते है और तब हम कितनी भी जल्दी क्यूँ ना लिखें शब्द अपनी जगह से नहीं भागते वे उसी तरह लिखें जाते हैं जैसे हम लाईनदार कॉपियों में लिखते हैं.क्यूँ कुछ तस्वीर साफ़ हो रही है.जीवन में इन रेखाओं का कितना बड़ा दायरा है वो जीवन की रेखा से लेकर गरीबी रेखा तक देखा और समझा जा सकता है. लगता है बात थोड़ी भारी हो रही है और यांगिस्तानियों के पास भारी बात सुनने का वक्त नहीं है तो हम इसे थोडा आसान करते हैं. यानि लाईफ में स्वछंदता और उन्मुक्तता मौज मस्ती अच्छी है पर उसकी एक सीमा होनी चाहिए और इस रेखा को हमें ही खींचना चाहिए फेस्टिवल हमें जश्न मनाने का जहाँ  मौका देते हैं वहीं ये भी बताते हैं कि जीवन महज मौजमस्ती का नाम नहीं बल्कि समाज में हमारा पोजीटिव कंट्रीब्यूशन भी  है.महत्वपूर्ण है कि ये बात कोई दूसरा हमें ना बताये क्योंकि सेल्फ रेग्युलेशन,सेल्फ से आता है और यही सेल्फ रेग्युलेशन जो हमें अनुशासित करता है.जब हम दूसरे की सीमाओं का सम्मान करेंगे तो लोग खुद ब खुद हमें अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ देंगे पर हम ये सोचें कि हम सबके बारे में कुछ भी गॉसिप कर सकते हैं पर कोई हमारे बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा ऐसा होना मुश्किल है. सफल होने की कोई सीमा नहीं है पर ख्वाब अगर हकीकत के आइने में देखें जाएँ तो उनके सफल होने की गुंजाईश ज्यादा होती है मतलब अपनी सीमाओं को जानकर उसके हिसाब से जब योजनाएं बनाई जाती हैं तो वो निश्चित रूप से सफल होती हैं. तो मुझे तो अपनी सीमाओं  का अंदाजा है और अपनी जीवन रेखा को इसी तरह बना रहा हूँ कि मेरी जिंदगी के कुछ मायने निकले पर आप क्या कर रहे हैं जरुर बताइयेगा.
आई नेक्स्ट में 19/11/12 को प्रकाशित 

Saturday, November 17, 2012

सौगत और मैं राजौरी यात्रा पंचम भाग(यात्रा संस्मरण)

अगला दिन धर्म कर्म के नाम पर था दोनों परिवारों के दबाव में मैंने पर्यटक की भांति वैष्णो देवी जाने का निश्चय किया मैंने वैष्णो देवी करीब दस साल पहले आया था ये मेरी तीसरी वैष्णो देवी यात्रा होने वाली थी | हम अभी राजौरी से तीस किलोमीटर आगे चले होंगे तो रास्ते में एक भयानक एक्सीडेंट हुआ  देखा मोटरबाईक और एक कार में एक घायल युवक रोड पर पड़ा था उसको देख कर तो ऐसा लगा कि उसके जीवन की अंतिम साँसे चल रही हों हमारे साथ चल रहे पुलिस वालों ने कई गाडियां रोक कर उस युवक को अस्पताल पहुंचवाने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं वे लोगों से निवेदन कर रहे थे तभी भाभी ने फैसला किया कि उस युवक को अपनी गाड़ी में सवार कराया जाए राजौरी का जिला अस्पताल वहां से दूर था और हम लोग विपरीत दिशा में जा रहे थे जहाँ कोई अस्पताल पास में नहीं था |ड्राईवर रशीद ने बताया कि यहाँ से पांच किलोमीटर दूर एक सेना का अस्पताल था पता नहीं वे उस युवक का इलाज करेंगे या नहीं |भाभी ने फैसला किया कि किसी भी हालात में इसे अस्पताल ले चलेंगे और हमारी दोनों गाडियां अपनी अधिकतम गति से उन पहाड़ी सड़कों पर दौड़ने लगीं |तब मुझे एहसास हुआ कि इस खूबसूरत जगह पर जीवन कितना दुश्वार है चारों ओर पहाड उन पर घूमती हुई कम चौड़ी सड़कें और हर तरफ जंगल ऐसे में कोई भी दुर्घटना खतरनाक हो सकती है |दोनो गाडियां सेना के दो बैरीकेडिंग को नजरंदाज करते हुए सेना के अस्पताल पहुँची वहां तुरंत उसको भर्ती कर लिया गया हम सेना के मानवीय रूप से प्रभावित हुए बगैर ना रह सके चूँकि सेना वहां लंबे समय से है इसलिए जगह जगह उनके कैम्प और अस्पताल बने हैं |सड़कों और पुलों के मामले में सीमा सड़क संगठन(बी आर ओ ) ने बहुत अच्छा काम किया है ऐसी मुश्किल जगहों पर सड़क बनाना आसान काम नहीं है|
चार घंटे बाद हम कटरा पहुँच गए जहाँ से सिर्फ पांच मिनट के बाद हम वैष्णो मंदिर के हैलीपेड पर थे तकनीक ने यात्रा का समय कितना घटा दिया हेलीकॉप्टर की उड़ान मात्र पांच मिनट की थी |चालक के  बगल में दो लोग और पीछे चार लोग बैठाए जाते हैं आगे बैठने वालों को हिदायत दी जाती है कि चालक से बात ना करें और मशीनों को ना छेड़े जगह की कमी के कारण चालक अपनी सीट पर लटक कर बैठा था उसे देखकर मुझे भरी हुई टैक्सी याद आ गयी जिसका ड्राइवर ज्यादा सवारियों को बैठाने के लिए अपनी जगह भी कुर्बान कर देता है |
 हेलीकॉप्टरसे उड़ते हुए मुझे कटरा रेलवे स्टेशन दिखा जहाँ श्री नगर से जम्मू को जोड़ने वाली रेल पटरी बिछाने का काम तेजी से चल रहा है }इस रेल लाइन के शुरू होने के बाद जम्मू से श्रीनगर जाना पर्यटकों के लिए आसान हो जाएगा अभी जम्मू श्रीनगर से सिर्फ हवाई और सडकमार्ग से जुड़ा है |इस रेल लाइन को पहाड़ों के अंदर से निकला जा रहा है जिससे पर्यावरण को कम से कम नुक्सान हो |पहाड के ऊपर से निकालने में जंगलो को काटना पड़ता |
अब दो किलोमीटर के बाद हम मंदिर के प्रांगण में थे धर्म का कारोबार चरम पर एक संयोग रहा है कि में पहली बार वैष्णो देवी 1991 में दूसरी बार 2001 में और अब 2012 में आ रहा था हर बार मंदिर में परिवर्तन और कुछ नयी मूर्तियां दिखती,मंदिर लगातार भव्य हो रहा है ,भगवान के पैसा भी खूब आ रहा है| भगवान को रूप बदलते देखना अच्छा लगाता है आखिर वो भक्तों की परीक्षा ना ले तो भक्त उसे भगवान क्यों माने| भला हुआ मेरे माता पिता भगवान नहीं हैं नहीं तो वो मेरी परीक्षा ले ले कर मुझे हमेशा परेशान करते रहते शायद इसीलिये वो मेरे लिए भगवान से बढ़कर हैं |  पिछले बीस सालों में वैष्णो देवी उत्तर भारत में धार्मिक पर्यटन के बड़े क्षेत्र के रूप  में उभरा है उसमे कुछ फिल्मों और टी सीरीज कैसेट कम्पनी के मालिक स्व.गुलशन कुमार का बड़ा हाथ है |मैं तो निरपेक्ष रूप से धर्म के इस मर्म को समझ रहा था जहाँ कहीं घोड़े वाला ठग रहा है कहीं बैटरी टैक्सी वाला,प्रसाद के नाम पर  सब जय माता दी के नाम पर ,सुरक्षा के नाम पर डर भगवान के दरबार में जहाँ सब बराबर हैं वहां वी आई पी दर्शन भी था हमने फटाफट दर्शन किये और पैदल लौटने का फैसला किया गया क्योंकि शाम हो गयी थी और  हेलीकॉप्टर रात में नहीं चलते |उस दिन रात में दो बजे राजौरी पहुंचे सन्नाटे में परवेज ने बताया कि आज से पांच साल पहले रात में तो क्या शाम के बाद इस सड़क पर निकलना असम्भव था पर अब हालात एकदम सामान्य हैं |
सौगत अपने फोटोग्राफी के हुनर को दिखाते हुए 
राजौरी की शाम 
अगले दिन हम सो ही रहे थे तभी मुझे लगा कोई मुझे आवाज दे रहा है सुबह के सात बजे थे पता चला सौगत बकरीद होने के कारण नमाज की तैयारियों का जायजा सुबह से ले रहे थे उसी कड़ी में हमारे गेस्ट हाउस आ गए |मुझे आदेश मिला कि हम जल्दी तैयार हो जाएँ घर चलना है हमसभी ने आदेश का पालन किया थोड़ी देर में एक सरप्राईज़ हमारे लिए था जो मेरे लिए अप्रत्याशित था मैं यह मानकर चल रहा था कि आज बकरीद होने के कारण सौगत की व्यस्तता ज्यादा रहेगी पर सौगत ने सुबह सुबह सब व्यवस्था का जायजा लेकर पूरा दिन हमारे साथ बीताने का फैसला किया |आज कहीं नहीं जाना सामने लॉन में चटाई बिछ गयी और सोफे लग गए परिवार का हर सदस्य अपने अपने समूह के साथ बैठ गए पहले क्रिकेट और बैडमिंटन  हुआ फिर गाना  बजाना हम और सौगत इन सबसे दूर गुफ्तगू में व्यस्त हो गए कुछ पुराने किस्से कुछ नयी कहानी और बीच में हम सबकी जिंदगानी और इन सब में दोपहर होने को आयी समय कैसे पंख लगा के उडा पता ही नहीं चला बीच में सौगत ने कैमरे पर अपना कमाल दिखाया आज से दस साल पहले उसके कुछ फोटोग्राफ आज भी मेरे घर की शोभा बढ़ा रहे हैं एक बार फिर उसने कुछ कमाल की तस्वीरें निकाली|
दोपहर के भोजन की तैयारी 
अचानक उसने कहा आज का लंच कुछ अलग तरीके से किया जाए और फिर क्या था
राजौरी का किला 
घर में लगे केले के पत्ते काटे जाने लगे उनको धोकर एक शानदार लंच का इंतजाम किया गया |केले पर मछली और चावल इसके अलावा कुछ और मांसाहारी व्यंजन और भी थे मैंने मछली पर ध्यान केंद्रित किया क्योंकि ट्राउट लखनऊ में तो मिलने से रही इस गरीब मास्टर को | सौगत के घर से एक पहाड़ी पर मुझे एक किला पिछले दो दिनों से दिख रहा था मैंने कहा वहाँ क्या है सौगत ने पूछा चलेगा क्या मैंने कहाँ हाँ बस फिर क्या थोड़ी देर में लश्कर तैयार डी सी साहब की गाड़ी चल पडी दो किलोमीटर की ऊँचाई पर वो किला पुराना था पर अब वहां सेना का कब्जा है और खरगोशों की पूरी कॉलोनी बसी हुई थी कुछ छोटे ,कुछ बड़े और कुछ एकदम बच्चे, रात घिर रही थी राजौरी बिजली में जगमग कर रहा था हवा ठंडी थी सूरज डूब रहा था मेरा मन भारी हो रहा था कल मुझे अपनी दुनिया में लौटना है आज की रात राजौरी की आख़िरी रात थी पर मुझे लगता है जैसे जैसे उम्र बढ़ रही है मैं जिंदगी के प्रति निर्मम होता जा रहा हूँ |ये सब कुछ तो सपने जैसा लग रहा है अब वापस लौटने का वक्त था |रात के खाने पर मेरी खास पसंद पर मटन बना था जो जरुरत से ज्यादा स्वादिष्ट था मैं पिछले पांच दिन से लगातार मांसाहार कर रहा था |भारत में भ्रमण के दौरान ऐसा पहली बार हुआ था हम आख़िरी बार खाने की टेबल पर साथ साथ बैठे शायद पहली बार मैंने सौगत को थोड़ी देर के लिए जज्बाती होते देखा सौगत इस मामले में एकदम अलग है वो अपनी भावनाएं कभी नहीं दिखाता वो क्या सोच रहा है कोई नहीं जान सकता खाने के बाद  उसने फिर रोक लिया हम इधर उधर की बातें करने लग गए मैंने औपचारिकता वश उसे शुक्रिया कहा तो उसने मुझे झिडकते हुए कहा इस सबकी मुझे जरुरत नहीं अगले दिन हम भारत पाकिस्तान सीमा पर जाने वाले थे उसके बाद वहीं से जम्मू के लिए निकलना था जहाँ से मुझे लखनऊ लौटना था सौगत से स्टेशन पर मिलने की उम्मीद थी क्योंकि वो भी उसी दिन दिल्ली जा रहा था |
जारी .............................. 

Thursday, November 15, 2012


सौगत और मैं राजौरी यात्रा चतुर्थ भाग(यात्रा संस्मरण)

डी के जी की झोपडियां 

पच्चीस अक्टूबर को हम राजौरी को एक्सप्लोर करने निकल पड़े पहला पड़ाव था राजौरी से तीस किलोमीटर दूर बाबा गुलाम शाह की दरगाह इन्हीं संत के नाम पर अभी राजौरी में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी है |अब असली जम्मू कश्मीर देखने की बारी थी पहाड़ों के चक्कर लगते हुए हम कई गाँवों से गुजर रहे थे कई जगह सेब बिकते देखे सोचा खरीदा जाए भाव सुनकर खुशी का परवार ना रहा बीस रुपये किलो ,सीढीदार खेत मक्के की कटाई हो चुकी थी उनको सूखने के लिए खेतों में ही ढेर बना कर छोड़ दिया गया है मक्का और दूध बहुतायत में उपलव्ध है भूमिहीन किसानों की संख्या नगण्य है |मजदूर बहुत महेंगे है |मनरेगा का असर और काम दोनों दिख रहा था पहाड़ों से निकालने वाले चश्मे आस पास के दृश्यों  की सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे|चश्मे प्राकृतिक पानी के ऐसे स्रोत हैं जो पहाड़ों से निकलते हैं | पानी को बर्बादी से बचाने  के लिए जगह जगह नालियां बना दी गयीं जिससे लोग पानी का इस्तेमाल पीने और  खेतों के लिए करते हैं |परवेज बता रहे थे कि कैसे आतंकवाद के दिनों में इन रास्तों में शाम तो क्या दिन में भी लोग नहीं गुजरते थे रास्ते के कई हिस्से एनकाउंटर की खौफनाक कहानियों  के गवाह रह चुके थे पर अब सब शान्ति है खुदा करे ये शांति बनी रहे|दो घंटे के सफर के बाद हम दरगाह पहुँच चुके थे|
कितनी खूबसूरत तस्वीर है ये  कश्मीर है 
ऊँचाई पर बनी दरगाह लगभग २५० साल पुरानी है जहाँ चौबीस घंटे लंगर चलता है जिसमें चावल दाल और मक्के की रोटी प्रसाद में मिलती है हमने पहले दरगाह में सजदा किया और चादर चढ़ाई सबकुछ व्यवस्थित और शांत दरगाह का प्रबंधन सरकार द्वारा स्थापित ट्रस्ट करता है जो भी चढावा आता है उसकी बाकायदा नाम पते के साथ रसीद दी जाती है एक खास बात ये थी कि इस दरगाह पर सभी मजहब के लोग आते हैं जिनकी मन्नत पूरी हो जाती हैं उनमें कुछ मुर्गे और पशु भी चढाते हैं पर उन पशुओं का वध दरगाह परिसर में नहीं किया जाता है उन्हें जरूरतमंदों को दे दिया जाता है|दरगाह के लंगर में सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है यहीं नमकीन कश्मीरी चाय भी पीने को मिली |दरगाह पर भीड़ तो थी पर वो परेशांन करने वाले नहीं थी|
दरगाह में दो घंटे बिताने के बाद हम चल पड़े पर्यटक स्थल डी के जी देखने इसका फुलफॉर्म भूल रहा हूँ पर दरगाह से एक घंटे की यात्रा के बाद हम यहाँ पहुंचे क्या नज़ारे थे इस जगह पर हमारे सिवा कोई नहीं था सिर्फ बर्फ से ढंके पहाड जो पाक अधिकृत कश्मीर में थे ठंडी हवा हालाँकि धूप तेज थी पर ठण्ड थी एक पहाड़ी पर कुछ लकड़ी की झोपडियां बनाई गयी हैं जिनको गरम रखने के लिए सोलर एनर्जी का इस्तेमाल किया जाता है जिससे पर्यावरण को नुक्सान ना पहुंचे इसी पहाड़ी के समीप एक व्यू पॉइंट बनाया गया है जहाँ से पूरे राजौरी का नजारा लिया जा सकता है|हमारे पीछे पूँछ शहर दिख रहा था और उसके पार पाक अधिकृत कश्मीर सब कुछ एक था पर बीच में नियंत्रण रेखा भारत और पाकिस्तान को अलग अलग कर रही थी|
दूर दिखता पुंछ शहर बीच में बहती चिनाव नदी 
कश्मीरी  बंजारों का कैम्प 
दिन के भोजन की व्यवस्था यहीं की गयी थी|भुना चिकन खाने के बाद एक लड्डू जैसा मांस का व्यंजन परोसा गया जो भेंड के मांस  से बना था जिसे रिस्ता कहते हैं खाने में बहुत स्वादिष्ट था |चूँकि मैं बहुत कम खा पाता हूँ मैं एक से ज्यादा नहीं खा पाया |मुझे बताया गया कि यह कश्मीरी दस्तरख्वान का हिस्सा है जिमें भेंड के मांस को लकड़ी के बर्तन में गुंथा जाता है फिर दही के साथ पकाया जाता है|आतंकवाद प्रभावित इलाका होने के कारण पर्यटक यहाँ नहीं आते पर अब शांति हो जाने के बाद राजौरी में बहुत सारी ऐसी जगहें जो एकदम अनछुई हैं| ऐसे में मेरे जैसे इंसान के लिए जो भीड़ भाड़ कम पसंद करता है उसके लिए ऐसी जगहें जन्नत से कम नहीं हैं|खाना खा कर हम वहीं घूमें फोटोग्राफी की शांति इतनी की हम अपनी साँसों की आवाज़ को सुन सकते थे|शाम हो रही थी अब लौटने का वक्त रास्ते में दिखते चीड के पेड़ों पर जब सूर्य की किरणें पड़ती तो वो हरे पेड भी सुनहली आभा देते और बगल में बहने वाले पानी के चश्मे चांदी जैसे चमकते बहुत सी किताबों में इस तरह के द्रश्यों के बारे में पढ़ा था पर अपनी आँखों से प्रकृति के सोना चांदी को पहली बार देखा रहा था|लौटते वक्त परवेज ने बताया कि इन गावों में रहने वाले काफी लोग मध्यपूर्व के देशों में बेहतर जीवन की तलाश में चले गए हैं उनके भेजे हुए पैसों से गाँव के घरों में छत टिन की बनने लग गयी है मिट्टी या सीमेंट की छत बर्फबारी में घर की रक्षा नहीं कर पाती और ये टिन की छतों वाले घर सूर्य की किरणों से ऐसे चमक रहे थे जैसे पहाड पर अनगिनत शीशे रख दिए गए हों|
एक फोटो मेरी भी 
जगह जगह श्रीनगर से लौटते बंजारों के भेड़ बकरियों का झुण्ड हमारा रास्ता रोक रहा था जो सर्दियों में राजौरी जैसी जगहों पर लौट आते हैं और गर्मियों में फिर श्रीनगर का रुख कर देते हैं|धन के नाम पर इनके पास भेंड,बकरियां और घोड़े ही होते हैं जिनसे इनका जीवन चलता है ये सारा साल पैदल ही घूमते हैं|वापस लौटते समय मैं साथ बहती नदी में जाने से अपने आपको रोक नहीं पाया कुछ बंजारों का कैम्प लगा था और वे शाम के भोजन की व्यवस्था में लगे थे|पुरुष सुस्ता रहे थे महिलाएं चूल्हों पर रोटियां सेंक रही थी मैंने नदी में हाथ डाला बर्फ से भी ठंडा पानी था जो पहाड़ों पर जमी बर्फ के पिघलने से आ रहा था ये पानी गर्मियों में भी इतना ही ठंडा रहता है ऐसा मुझे बताया गया|सबको आगे भेजकर मैं आस पास के लोगों से बात करने लगा|पास ही एक दूकान थी जहाँ का दुकानदार आतंकवाद से प्रभावित रह चुका था|मेरे हाथ में कैमरा देखकर उसने बहुत खुलकर मुझसे बात नहीं की पर उसने बताया कि वो एस पी ओ (जम्मू कश्मीर सरकार का एक आतंकवाद विरोधी कार्यक्रम जिसमे सरकार लोगों को शस्त्र और मासिक तनख्वाह देती है )रह चुका था पर सरकार पैसे समय पर नहीं देती थी और जो पैसे मिलते वो भी बहुत कम थे इसलिए उसने किराने की दूकान खोल ली|हाँ एक बात जो मुझे अच्छी लगी वो नए  डी सी (जम्मू कश्मीर में डी एम् को डी सी कहते हैं )के जनता दरबार से खुश था वो रेड डालते हैं और तुरंत कार्यवाही करते हैं |उसे बिलकुल नहीं पता था कि मैं डी सी का दोस्त हूँ |शाम हो चुकी थी और हम वापस राजौरी में थे सौगत ने मुझे अपने ऑफिस बुला लिया जो उसके बंगले के ठीक सामने है वहां लोगों का जमावड़ा था वो काम भी कर रहा था और मुझसे बात भी करता जा रहा है |धीरे धीरे लोगों का जमावड़ा खत्म हुआ लेकिन उसको कुछ फाइलें अभी और भी निपटानी थी मैंने कहा आप काम करते चलें मैं इसी का आनंद उठा रहा हूँ |आखिरकार हमने घर का रुख किया जहाँ ठण्ड और हीटर के बीच दो परिवार जमा हुए और गप्पें मारने का एक और दौर शुरू हुआ|खाने में प्रसिद्ध ट्राउट मछली और चिकन था|ट्राउट का नाम डिस्कवरी पर खूब सुना था पर खाने का सौभाग्य पहली बार मिल रहा था|इधर उधर की बातें करते रात के ग्यारह बज गए और राजौरी में मेरा एक दिन और खतम हुआ |
जारी है .......................


सौगत और मैं राजौरी यात्रा तृतीय भाग (यात्रा संस्मरण)


चिंगस 
जंगल बचे इंसानी लाशों की कीमत पर , ये भी विकास का एक पहलू था |रास्ता मन मोह लेने वाला था सम्पूर्ण शांति का एहसास आप कर सकते थे राजौरी से लगभग तीस किलोमीटर पहले एक चिंगस नाम की जगह ,चिंगस के बारे में बताने से पहले आपको बता दूँ राजौरी का यह इलाका उस रास्ते का हिस्सा है जिस रास्ते से मुग़ल शासक गर्मियों में कश्मीर घाटी जाते थे |मुगलों के द्वारा बनवाई गयी सरायों के अवशेष आज भी मिलते हैं मैंने भी ऐसी दो सरायें देखीं पर अब उन जगहों पर भारतीय सेना का कब्ज़ा है जहाँ किसी आम आदमी के लिए जाना उतना आसान नहीं है चूँकि सेना का मामला था इसलिए मैंने अपना कैमरा नहीं निकाला|थोड़ी दूर चलने पर चिंगस नाम की वो सराय आ गयी जिसे मुग़ल बादशाह अकबर ने बनवाया था.आज ये मुख्य सड़क से सटा एक वीरान इलाका है जहाँ मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शरीर का कुछ हिस्सा दफ़न है|
चिंगस को फारसी भाषा में आंत कहते हैं किस्सा कुछ यूँ है कि मुग़ल बादशाह जहाँगीर अपनी बेगम नूरजहाँ के साथ अपने वार्षिक प्रवास के बाद कश्मीर से अपनी सल्तनत की ओर लौट रहे थे |
चिंगस :यहीं जहाँगीर की आंतें दफ़न हैं 
चिंगस सराय 
 चिंगस में उनकी तबियत खराब हुई और उनकी मौत हो गयी|उत्तराधिकार के संघर्ष को टालने के लिए नूरजहाँ इस बात का पता आगरा  पहुँचने से पहले सार्वजनिक नहीं करना चाहती थी|शरीर के वो हिस्से जो मौत के बाद सबसे जल्दी सड़ते हैं उन अंगों को इसी जगह काटकर निकल दिया गया और उनको यहीं दफना दिया गया जिसमें जहाँगीर की आंत भी शामिल थी|आंत और पेट के अंदरूनी हिस्से को निकाल कर उसके शरीर को सिल कर इस तरह रखा गया कि आगरा पहुँचने से पहले किसी को भी इस बात का आभास् नहीं हुआ कि जहाँगीर मर चुके हैं| इस तरह उसकी आँतों को जहाँ दफनाया गया वो चिंगस के नाम से प्रसिद्ध हो गया|यहाँ जहाँगीर की आँतों की कब्र आज भी सुरक्षित है लेकिन यहाँ एकदम सन्नाटा पसरा था लगता है यहाँ ज्यादा लोगों का आना जाना नहीं है हालांकि जम्मू कश्मीर पुरातत्व विभाग के लगे बोर्ड इस बात की गवाही दे रहे थे कि सरकार के लिए यह स्थल महत्वपूर्ण है|मैंने अपने कैमरे का यहाँ बखूबी इस्तेमाल किया|अब राजौरी करीब था हम भी थक चुके थे लखनऊ छोड़े हुए करीब चौबीस घंटे होने को आ रहे थे |शाम के पांच बजे हमने राजौरी में प्रवेश किया शांत कस्बाई रंगत वाला शहर जहाँ अभी विकास का कीड़ा नहीं लगा था और ना लोग प्रगति के पीछे पागल थे|जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी वो एक सरकारी गेस्ट हाउस था पर उसके कमरे को देखकर लग रहा था जैसे कोई शानदार होटल हो खैर सुबह के बाद से हमारी सौगत से कोई बात नहीं हुई थी हमें ये बताया गया कि साहब बाहर हैं शाम को लौटेंगे|शाम हो चली थी हमने एक बार फिर गरम पानी से नहा कर थकान को कम करने की कोशिश की पर नहाने के बाद पता  पड़ा यहाँ ठंडक का मामला गंभीर था लखनऊ के मुकाबले |अँधेरा घिर आया था मैं समय काटने के लिए नीचे उतर कर गेस्ट हाउस के लॉन में चहलकदमी शुरू करने लग गया |राजौरी अंधरे में डूब रहा था पहाड़ों पर रौशनियाँ जगमगाने लगी थीं|अचानक एक शोर सा उठा साहब आ गए साहब आ गए मैंने गेट पर नजर डाली मुझसे दौ सौ मीटर की दूरी पर एक लाल बत्ती वाली  सफ़ेद इनोवा हमारी तरफ आ रही थी जिसके अंदर सौगत बैठे हुए थे गाड़ी कुछ पलों में मेरे सामने आकर रुकी वो पल मेरे जीवन के कुछ रोमांचक पलों में से एक बन गया सौगत के साथ बिताए गए वो सारे साल  फ्लैश बैक में मेरी आँखों के आगे घूम गए|
राजौरी की शाम 
पुरानी यादें :मैं और सौगत उपराष्ट्रपति के कार्यक्रम में हैलीपेड पर 
           मुझे याद आया 2002 में पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर में एक बार उप राष्ट्रपति स्व. भैरव सिंह शेखावत दीक्षांत समारोह में आये थे| हैलीपेड से विश्वविद्यालय तक के डेढ़ किलोमीटर के फासले में उनकी फ्लीट में सबसे अंत में एक गाड़ी चल रही थी जो उनकी अधिकारिक फ्लीट का हिस्सा नहीं थी और उस गाड़ी में दो मास्टर बैठे थे एक उस सारे घटनाक्रम का वीडियो बना रहा था दूसरा मीडिया कर्मियों को ब्रीफिंग के लिए आवशयक घटनाओं को कलमबद्ध कर रहा था मसलन किन लोगों ने पुष्पगुच्छ दिए कौन हैलीपेड पर आगवानी के लिए आया वो दो मास्टर मैं और सौगत थे उन फर्राटा भरती गाड़ियों का एक  हिस्सा बन कर इतनी खुशी हुई थी कि उस पूरे वाकये को बाकी के मास्टरों को नमक मिर्च लगा कर कई दिन तक सुनाया गया (हम दोनों मीडिया में अपने अपने क्षेत्रों में विशेज्ञता के कारण कुलपतियों के सीधे संपर्क में रहा करते थे जो और शिक्षकों के लिए ईर्ष्या का विषय रहा करता था कम से कम मुझे ऐसा लगता था ) क्योंकि इस मौके पर पूरे विश्वविद्यालय से मात्र दो ही लोग हैलीपेड पर जाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाए थे| और आज सौगत खुद उस नायकत्व की स्थिति में था जहाँ एक पुलिस जिप्सी उसकी गाड़ी को सुरक्षा दे रही थी| वैसे भी राजौरी एक संवेदनशील जिला था इसलिए सुरक्षा हो सकता है आप लोगों को ये कोई बड़ी बात ना लगे पर मैं तो पलों में सदियाँ जी रहा था|मैंने उसको परिस्थितियों से लड़ते देखा था जूझते देखा था क्योंकि जब भी हम कोई काम प्लान करते थे उसमें कुछ ना कुछ गडबड जरुर आती थी पर काम हो जाता था| चलिए वापस लौटते हैं उस जगह जहाँ मैं सौगत से पांच साल बाद मिल रहा था |  मैं गाड़ी के पास पहुंचा उस समय मेरे स्थिति विचित्र थी जिसे शब्दों में वर्णन करना मुश्किल है मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं उससे कैसे मिलूँगा मैं अपनों से हाथ नहीं मिलाता और सौगत भी बिलकुल  औपचारिक नहीं था हमने आज तक कभी हाथ नहीं मिलाया क्यूंकि जब दिल मिल गया फिर हाथ मिलाने की क्या जरुरत है |
सौगत 
          गले लगने का विकल्प जोखिम भरा लग रहा था वहां उसके बहुत मातहत थे वे पता नहीं इस मिलन को किस तरह से देखें मैं इन्हीं विचारों में झूल रहा था कि सौगत बाहर निकला दो चार लोगों को कुछ निर्देश देने के बाद सीधे मेरी तरफ मुखातिब और बे कहकर गले लगा लिया चल ऊपर चल यहाँ कहाँ घूम रहा है |मतलब हम लोगों के बीच कुछ भी नहीं बदला था वो दोस्त भी क्या जो तमीज से बात करे ,हा हा |
थोड़ी देर में हम कमरे में बैठे थे दस मिनट के बाद निर्णय लिया गया कि यहाँ नहीं मजा आ रहा है ,घर चला जाए चूँकि मैं अपने परिवार के साथ गया था इसलिए ये दो परिवारों का पुनर्मिलन हो रहा था|किस्से, बातें,कहानियां भूले बिसरे लोग उनसे जुडी यादें पर मैं ठण्ड से ठिठुर रहा था जबकि ये अक्टूबर की शुरुवात थी और कमरे में और  बाहर हर जगह हीटर की व्यवस्था थी|भाभी से सौगत का स्वेटर लेकर पहना तब जाकर चैन पड़ा जबकि पहले से मैंने एक ऊनी इनर पहन रखा था अगले चार दिन मैंने सौगत के उस स्वेटर का खूब शोषण किया| हम रात के बारह बजे वापस अपने सुइट पहुंचे (कमरा कहना उस जगह की बेइज्जती होगी)
जारी है .......................


सौगत और मैं राजौरी यात्रा द्वितीय भाग(यात्रा संस्मरण)

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मंसूरी की वो शाम 

हम देर रात तक मंसूरी के सड़कों पर घूमें और देश के भावी प्रशासनिक अधिकारीयों के मन टटोले और जून के महीने में सर्दी से ठिठुरे क्योंकि रजाई एक ही थी ऐसा ही सौगत बिस्वास फिर मैं अपनी जिंदगी में रम गया बीच में एक बार छोटी सी मुलाक़ात हुई थी दिल्ली में जब मैं इटली जा रहा था सौभाग्य से सौगत उस वक्त दिल्ली में था उसके बाद से गोमती में बहुत सा पानी बह गया उसकी पोस्टिंग बदलती रहीं और हम कभी कभार फोन पर बात कर लिया करते थे एक बार यूँ ही सौगत ने एक प्रस्ताव रखा था कि चल हम लोग स्लीपर में भारत भ्रमण पर निकलते हैं बगैर किसी प्लानिंग के ये उसकी पोस्टिंग के शुरुवाती दिन थे उसके बाद वो भी व्यस्त होता गया और मैं बगैर किसी व्यस्तता के व्यस्त इंडिया टुडे ने जब मेरे ऊपर एक स्टोरी के लिए किसी एक ऐसे शख्स का नाम माँगा तो मुझे सिर्फ उसका नाम सूझा धर्म संबंधी मेरे विचारों में सबसे बड़ा परिवर्तन उसके पिता जी की किताबों को पढकर आया जिन्होंने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया शायद पहली बार मैंने किसी समस्या को मानवीय नजरिये से देखा ना हिंदू ना मुसलमान सिर्फ इंसान, तो बस ऐसे ही एक ही दिन मैंने फैसला किया मुझे सौगत से मिलने जाना है ना कोई काम था ना घूमने की इच्छा बस आमने सामने बैठकर गप्प लड़ाने का मन.राजौरी के लिए ट्रेन जम्मू तक ही जाती है वहां से लगभग 165 किमी दूर सडक से ही पहुंचा जा सकता है हालंकि राजौरी में एअरपोर्ट है पर वहां से से नियमित उड़ान का कोई सिलिसला नहीं है वो एअरपोर्ट ज्यादातर भारतीय सेना या मंत्रियों के हेलीकॉप्टर के काम ही आता है |
आतंकवाद के दिनों में राजौरी भी उन जिलों में से एक था जो आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित थे |अब समस्या ट्रेन के टिकट की थी मैंने दो दिन के टिकट बुक किये पर जाने के दिन आते आते मुझे लगा कि वो कन्फर्म नहीं हो पायेंगे आख़िरकार फिर उसी चीज का इस्तेमाल करना पड़ा जिसके बिना हिन्दुस्तान में कोई काम संभव नहीं होता यानि जुगाड एक ट्रैवल एजेंट से बात हुई तत्काल में उसने टिकट दिलवा दिया और हम चल पड़े सौगत से मिलने पांच साल बाद हम एक दूसरे को साक्षात देखने वाले थे |मैंने सौगत को फोन करके बता दिया कि मैं आ रहा हूँ उसने बगैर किसी उत्साह के स्वागत किया हालंकि ये उसका स्वभाव है जो मैं अच्छे तरीके से जानता हूँ फिर भी दिल में एक चोर था पहले हम साथ काम करते थे हमारे सुख दुःख साझे थे पर अब वो राजौरी का जिलाधिकारी था और मैं एक मास्टर,पता नहीं कैसे मिलेगा समय दे भी पायेगा या नहीं एक जिलाधिकारी और एक मास्टर की जुगलबंदी अब जमेगी भी या नहीं संशय तो था ही फिर मेरे पास और कोई प्रयोजन भी नहीं था कि हम तो फलां काम से जा रहे हैं मिल लिया तो ठीक है नहीं तो अपना काम करेंगे और घर लौट जायेंगे हमें तो ये भी पता नहीं था कि राजौरी जगह कैसी है बस ख़बरों में ही सुना था शायद इसीलिये मैं ज्यादा उनी कपडे नहीं ले जा रहा था सोचा जम्मू जैसा ही होगा जब जम्मू में ज्यादा ठण्ड नहीं पड़ती तो राजौरी भी ऐसा ही होगा पर हुआ इसका उल्टा राजौरी में अच्छी ठण्ड थी |मैं एक बार अगर राजौरी के भूगोल के बारे में गूगल ही कर लेता तो कुछ समस्या से बच सकता था पर हम तो निकल पड़े बस सौगत से मिलना है|ट्रेन समय से निकल पडी पन्द्रह घंटे के सफर के बाद हम जम्मू पहुँच जाने वाले थे सुबह हमारे पहुँचने से पहले सौगत का फोन आ गया था  कि आपको लेने के लिए लोग वहां हैं आप निश्चिन्त रहें जैसे ही ट्रेन रुकी दो लोग सीधे हमारे पास आये और हमारा सामान सम्हाल लिया जीवन में पहली बार खास होने का एहसास हुआ हम सीधे वी वी आई पी पार्किंग में पहुंचे जहाँ एक शानदार गाड़ी हमारे लिए आरक्षित थी और हम चल पड़े अभी हमें लंबा रास्ता तय करना | सुरक्षाधिकारी परवेज और ड्राईवर रशीद अगले चार दिन तक हमारे साथ साये की तरह रहने वाले थे हमें इसका कोई अंदाज़ा नहीं था दिन के दो बज तक हम  अखनूर पार कर चुके थे और उसके बाद राजौरी जिला शुरू हुआ सुंदरबनी के पी डबल्यू डी गेस्ट हाउस में दोपहर के भोजन की व्यवस्था थी खूबसूरत कमरा था जहाँ मैंने स्नान किया और भोजन पर टूट पड़े पता नहीं सौगत को मेरे मांसाहारी भोजन के लगाव की बात याद थी या ये सिर्फ एक संयोग था कि अगले चार दिन मुझे सिर्फ मांसाहारी भोजन परोसा गया जिसकी शुरुवात सुंदरबनी से हो रही थी चिकन चावल और नरम नरम रोटी फिर एक गरम चाय |हम तरोताजा  होकर फिर निकल पड़े अब रास्ता में सन्नाटा बढ़ रहा था जंगल घने हो रहे थे और एक पहाड़ी नदी लगातार हमारे साथ चल रही थी जिसका कोई नाम मुझे परवेज और रशीद बता नहीं पाए वो बोले ये जिस जगह से गुजरती है|
परवेज और रशीद 
 उस जगह का नाम नदी को दे दिया जाता है मैं जंगल और हरियाली में खो गया हम जगह जगह गाड़ी रोक कर फोटोग्राफी भी कर ले रहे थे पर मैंने अपने जीवन में इतनी शुद्ध और अच्छी हवा कहीं नहीं महसूस की थी मैं खूब लंबी लंबी साँसे ले रहा था |हम नौशेरा से गुजर रहे थे आर्मी के ट्रकों का आना जाना लगा था उसके बाद तीथवाल पड़ा 1947-48 मे यहाँ पाकिस्तानी कबाइलों ने यहाँ घुसपैठ कर ली थी मैंने इतिहास में पढ़ा था और आज देख रहा था इतिहास को जीना अच्छा लग रहा था |
 परवेज कहीं से पुलिस वाले नहीं लग रहे थे मैंने कहा भी कि यू पी में ऐसे पुलिस वाले क्यूँ नहीं हैं तो वो मुस्कुरा दिए पुलिस में होने की उन्होंने बड़ी कीमत चुकाई है जिसका पता मुझे बाद में पता चला उनके सगे छोटे भाई को आतंकवादियों ने मार दिया था |रास्ता लंबा था तो मैंने मिलिटेंसी के दौर की बात शुरू कर दी उस दर्द को शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है और जब जब मैंने जिस किसी से आतंकवाद के उस दौर की बात की तो लगा जैसे वे तटस्थ हो चुके हैं इतना कुछ झेलने के बाद  सुख दुख राग द्वेष सबसे बस ये जवाब हर बार मिला हम तो दोनों तरफ से मारे जा रहे थे मिलीटेंट को खाना ना दो तो वो मार देते थे और दे दो तो आर्मी |
राजौरी के रास्ते में 
 बातों बातों में आतंकवाद का  एक सकारात्मक पहलू एक चायवाले ने बताया कि हमारे जंगल अंधाधुंध काटने से बच गए नहीं तो इतनी हरियाली ना दिखती मेरे कैसे पूछने पर बड़ा मजेदार उत्तर मिला होता यूँ था कि पाकिस्तान से आये आतंकवादी जंगलों में पनाह लेतेथे दिन में अगर कोई लकड़ी काटने वाला जंगल में जाता तो उसे मार पीटकर जंगल से भगा देते थे जिससे सेना या पुलिस को उनकी छुपने की जगह का पता नहीं चलता था |इस तरह उन लोगों ने इतना दहशत का माहौल बना दिया कि लोग जंगलों में जाते ही नहीं थे जिससे अवैध कटाई पर पूरी तरह रोक लग गयी|

सौगत और मैं राजौरी यात्रा प्रथम भाग(यात्रा संस्मरण )

यात्राएं मुझे हमेशा सुकून देती हैं एक ऐसी ही  यात्रा पिछले दिनों हुई मैं बड़ा पेशोपेश में हूँ पहले उस व्यक्ति के बारे में बताऊँ जिसके लिए यात्रा की गयी या जगह के बारे में जहाँ यात्रा की गयी |मैं कोशिश करता हूँ कि आपको बारी बारी से दोनों का वर्णन मिलता रहे तो जम्मू कश्मीर के बारे में सबने सुना होगा खासकर  अपने नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण और  लंबे समय  तक आतंकवाद से पीड़ित राज्य के रूप में |जब जम्मू कश्मीर घूमने की बात  होती है तो दो चार जगह ही ध्यान में आती है एक वैष्णोदेवी और दूसरा श्रीनगर के आस पास का इलाका, एक आम मध्यमवर्गीय हिन्दुस्तानी होने के नाते मुझे भी कश्मीर के पर्यटक स्थलों के बारे में उतनी जानकारी नहीं थी| मैं दो बार जम्मू गया जा चुका था लेकिन वो बहुत साल पहले की बात है पर उसके आगे ना कभी सोचा और ना कभी मौका लगा पर पिछले पांच सालों से मैं लगातार वहां जाने के बारे में सोच रहा था पर मौका हाथ नहीं लग रहा था वहाँ जाने का कारण बहुत सीधा था अपने एक पुराने मित्र से मिलना जिससे एक दर्द का रिश्ता था सौगत नाम है उसका मैंने कभी उसके ऊपर एक पैरोडी भी बनाई थी हम होंगे कामयाब की तर्ज पर सौगत है बिस्वास पूरा है बिस्वास हा हा तो सौगत बिस्वास उनका पूरा नाम है| तो जम्मू कश्मीर जाने का प्रयोजन यूँ हुआ कि सौगत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (आई .ए. एस )हैं और जब से वे जम्मू कश्मीर पहुंचे तब से ना जाने कितनी बार आने को कह चुके थे वैसे भी सौगत से आख़िरी मुलाक़ात को लगभग पांच साल बीत चुके थे |
सौगत और मैं साल 2006 फरवरी 
  इस यात्रा पर निकालने से पहले मैं आप सबको अपनी और सौगत की कहानी बताना चाहता हूँ क्यूँ सौगत खास रहा मेरे लिए कुछ चीजें तो सौगत खुद नहीं जानता जो पहली बार इस ब्लॉग को पढ़ कर जानेगा तो पहले सौगत पुराण ,सौगत बिस्वास से मेरी मुलाक़ात 23 दिसंबर 1999 को पहली बार जौनपुर में हुई| मैं अपनी पहली नौकरी में नया नया था जाड़े के दिन एक लंबा लड़का हमारे विभाग के कमरे मे दाखिल हुआ और बोला  मैं यहाँ अपनी ज्वाईनिंग  देने आया हूँ चूँकि हमारा और सौगत का चयन एक साथ पूर्वांचल विश्वविद्यालय में हुआ था और मैं पहले कार्यभार ग्रहण कर चुका था तो मुझे सारी प्रक्रिया की जानकारी थी| मैंने उसकी मदद की और दिन भर साथ रहे अगले दिन से विश्वविद्यालय में जाड़े की छुट्टी हो जाने वाली थी और सौगत के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था मैं विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में रह रहा था तो सौगत ने मुझे एक अनोखा ऑफर दिया कि  उस  रात मैं उसके साथ उस होटल में रुक जाऊं अगले दिन मुझे लखनऊ और उसे दिल्ली लौटना था| मैं थोडा हिचक रहा था अभी उसको जाने हुए मुझे ६ घंटे भी नहीं हुये और वो इतना बेतकल्लुफ हो रहा था वो मेरी हिचक को समझ गया पर जो जवाब उसने दिया वो अप्रत्याशित था ओए मैं दूसरे टाईप का आदमी नहीं हूँ तू रुक सकता है मेरे साथ हा हा खैर उस रात ना तो मुझे नींद पडी और ना ही सौगत सोया|दो कारण  एक तो वो जौनपुर का काफी घटिया होटल था  दूसरा हम दोनों उस शहर के लिए नए थे तो क्या सारी रात हम बातें करते रहें जामिया एम् सी आर सी का पढ़ा सौगत मुझे एक नयी दुनिया का लग रहा था विषय पर उसका अद्भुत ज्ञान था उस पर दिल्ली का एक्सपोजर अद्भुत कॉकटेल उस दिन से जो साथ शुरू हुआ वो आज तक जारी है| हम् नौकरियां भले ही बदल रहे थे पर एक दूसरे से संपर्क हमेशा बना रहा उसी रात उसने अपने एक सपने को मुझसे हल्का सा बांटा था कि वो आई ए एस बनना चाहता है और इसलिए वो दिल्ली को छोड़कर जौनपुर जैसी छोटी जगह नौकरी करने को तैयार हो गया|मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि मानसिक रूप से मैं अभी भी सौगत के सामने कॉलेज का बच्चा ही था जिसे बाहर की दुनिया और उसकी मक्कारी के बारे में ज्यादा पता नहीं था, वहीं सौगत संतुलित था उसके दिल में क्या चल रहा है कोई नहीं जान सकता और मैं क्या करूँगा सारा विश्वविद्यालय जानता था ऐसे शुरू हुआ नयी नौकरी का सफर बहुत से लोग वहाँ मिले सब ही नए थे पर जो मानसिक मेल सौगत और पंकज के साथ हुआ वो किसी और के साथ ना हो पाया (पंकज की कहानी फिर कभी ) और ये बात सारा विश्वविद्यालय जान गया कि मुकुल इन दोनों से आगे नहीं देखता |ये अलग बात है कि सौगत ने संतुलन बनाये रखा और  अपने आप को बाहर ऐसी किसी छवि में नहीं बाँधा शाम को अक्सर होने वाली परिचर्चा में सौगत और पंकज मुझे अक्सर ये समझाया करते थे कि सबसे मिला करो पर जब तक मैं जौनपुर में रहा ऐसा कर नहीं पाया जिसका साथ नहीं पसंद है उनके साथ मैं औपचारिक संबंध भी ठीक से नहीं निभा पाया पर जिंदगी जैसे जैसे आगे बढ़ी प्रोफेशनलिज्म के नाम पर ये मक्कारी मैं भी सीख गया और चेहरे पर मुखौटा डालना आ गया |छुट्टियों के बाद सौगत ने मेरे बगल के मकान में कमरा ले लिया और हम साथ साथ विश्वविद्यालय आने जाने लग गए सौगत ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढ़ाई के निकलना चाहता था इसलिए दो साल बाद विश्वविद्यालय रहने चला गया क्योंकि आने जाने में बहुत समय लगता था पर इससे  हमारी जुगलबंदी में कोई कमी नहीं आई |पूर्वांचल का पत्रकारिता विभाग गुलजार रहने लगा हम अक्सर कुछ ना कुछ खुरापात किया करते थे वो कैमरा सम्हालता और मै कलम| सौगत के आई ए एस बन जाने से भले ही देश को योग्य अधिकारी मिल गया पर पत्रकारिता शिक्षा के लिए एक बड़ा नुक्सान हुआ अगर सौगत आज यहाँ होता तो व्यवहारिक पत्रकारिता शिक्षण का स्तर और बेहतर होता खैर क्या लिखूं क्या ना लिखूं समझ नहीं पा रहा हूँ कितनी शामें हमने साथ गुजारीं क्या बहसे हुआ करती थी |मैं एक श्रोता की हैसियत से काफी कुछ सीख रहा था| कितनी वाराणसी की यात्राएं हमने साथ की और उन यात्राओं में होने वाला फन आज भी रोमांचित करता (जौनपुर में मनबहलाव की कोई जगह नहीं थी तो अक्सर हम वाराणसी का रुख करते थे )|एक शिक्षक के रूप में मैंने सौगत से बहुत कुछ सीखा तो दिन बीतते रहे जब तक मेरे पास स्कूटर नहीं था कई दिन हम बस और जीप में लटक कर विश्वविद्यालय पहुँचते थे फिर गाड़ी आ गयी पर कुछ चीजें मुझे सौगत की नहीं समझ नहीं आती थी वो हिसाब किताब बहुत किया करता था जिसमे मैं पहले भी कच्चा था और आज भी हूँ पर अंत में होता वही था जो वह चाहता वो मेरे स्कूटर से विश्वविद्यालय जाता था तो आने जाने के पैसे देता था फिर एक नया फोर्मूला निकाला कि एक दिन मेरी स्कूटर जायेगी और एक दिन उसकी मोटर सायकिल, दिन भर के खाने का हिसाब किताब लगा कर मुझे खास सौगतियन स्टाईल में बताया यार देख मैं दिन भर के तीस रुपैये से ज्यादा खाने पर नहीं खर्च कर सकता बसऔर ये अभिनव प्रयोग विभाग में भी  हो रहे थे एक दिन निर्णय लिया गया कि नुक्कड़ नाटक होगा अब छात्रों के लिए ये समस्या का विषय हो गया लोगों को ज्यादा इसके बारे में पता नहीं था पर चार दिन में प्ले बनकर तैयार हो गया और लोगों की पर्याप्त सराहना भी मिली | बहुत सारे खट्टे मीठे अनुभव होते रहे सौगत मोमबत्ती जलाये डटे रहते और अपने बिंदास स्वभाव के कारण चर्चा का केंद्र रहते हम एक शादी में बनारस गए और भाई साहब ने जींस कुर्ते के ऊपर कोट पहन लिया और पहुँच गए कोई अगर कुछ कहता भी तो जवाब तैयार क्या हुआ |बहुत सारे उतार चढावों के बीच सौगत ने सितम्बर 2003 में जौनपुर छोड़ दिया उसका चयन निफ्ट दिल्ली में हो गया था जौनपुर मुझे कभी रास आया नहीं था पर विभाग में उसके साथ से ऊर्जा मिलती थी पर अब वो जा रहा था खैर उसके परिवार को विदा करने के बाद सौगत को रोक लिया गया कि एक रात हम फिर से पार्टी करेंगे पुराने दिन ताजा करेंगे हालंकि तब तक हमारे दल में  इसमें अविनाश और ब्रजेश दो और लोग जुड चुके थे | साल बीतते गए इस बीच वो निफ्ट से निकल कर जामिया एम् सी आर सी में लेक्चरर बन गया और मैं जौनपुर से लखनऊ आ गया फोन पर बात भी अक्सर नहीं होती हाँ पर जब मैं दिल्ली जाता  तो जम के धमाल होता था ये बात अलग है कि धमाल मचाने वाले दो ही लोग होते थे और ऐसा मौका उसके जौनपुर छोड़ने के बाद एक ही बार आया जब हम दिल्ली में मिले|
लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी मंसूरी में सौगत के साथ 
2006 में सौगत  लखनऊ में प्रैक्टिकल परीक्षाएं लेने आये थे  जब वो  अपने रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रहा था गेस्ट हाउस के उस कमरे में हम कितनी देर तक अपनी अपनी जिंदगियों के बारे में बात करते रहे मैं उसके आई ए एस के साक्षात्कार के किस्से सुनता रहा और फिर वो खबर आयी जिसका हम सबको इंतज़ार था एक सपना जिसको सौगत जी रहा था सच हुई उसका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया और वो मंसूरी प्रशिक्षण के लिए चला गया बीच बीच में कभी कभार बात हो जाती हमें मिले हुए एक साल हो चुके थे कि नियति ने फिर हमें मिला दिया हुआ कि जिस दिन सौगत के प्रशिक्षण का अंतिम दिन था मैं देहरादून में था सौगत से बात हुई और उसने हमें मंसूरी के लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी  में बुला लिया और रात ज्यादा हो जाने कारण मुझे भी उस संस्थान में एक रात रुकने का सौभाग्य प्राप्त हुआ अद्भुत अनुभव था |

सौगत और मैं राजौरी यात्रा प्रथम भाग(यात्रा संस्मरण )

यात्राएं मुझे हमेशा सुकून देती हैं एक ऐसी ही  यात्रा पिछले दिनों हुई मैं बड़ा पेशोपेश में हूँ पहले उस व्यक्ति के बारे में बताऊँ जिसके लिए यात्रा की गयी या जगह के बारे में जहाँ यात्रा की गयी |मैं कोशिश करता हूँ कि आपको बारी बारी से दोनों का वर्णन मिलता रहे तो जम्मू कश्मीर के बारे में सबने सुना होगा खासकर  अपने नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण और  लंबे समय  तक आतंकवाद से पीड़ित राज्य के रूप में |जब जम्मू कश्मीर घूमने की बात  होती है तो दो चार जगह ही ध्यान में आती है एक वैष्णोदेवी और दूसरा श्रीनगर के आस पास का इलाका, एक आम मध्यमवर्गीय हिन्दुस्तानी होने के नाते मुझे भी कश्मीर के पर्यटक स्थलों के बारे में उतनी जानकारी नहीं थी| मैं दो बार जम्मू गया जा चुका था लेकिन वो बहुत साल पहले की बात है पर उसके आगे ना कभी सोचा और ना कभी मौका लगा पर पिछले पांच सालों से मैं लगातार वहां जाने के बारे में सोच रहा था पर मौका हाथ नहीं लग रहा था वहाँ जाने का कारण बहुत सीधा था अपने एक पुराने मित्र से मिलना जिससे एक दर्द का रिश्ता था सौगत नाम है उसका मैंने कभी उसके ऊपर एक पैरोडी भी बनाई थी हम होंगे कामयाब की तर्ज पर सौगत है बिस्वास पूरा है बिस्वास हा हा तो सौगत बिस्वास उनका पूरा नाम है| तो जम्मू कश्मीर जाने का प्रयोजन यूँ हुआ कि सौगत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (आई .ए. एस )हैं और जब से वे जम्मू कश्मीर पहुंचे तब से ना जाने कितनी बार आने को कह चुके थे वैसे भी सौगत से आख़िरी मुलाक़ात को लगभग पांच साल बीत चुके थे |
सौगत और मैं साल 2006 फरवरी 
  इस यात्रा पर निकालने से पहले मैं आप सबको अपनी और सौगत की कहानी बताना चाहता हूँ क्यूँ सौगत खास रहा मेरे लिए कुछ चीजें तो सौगत खुद नहीं जानता जो पहली बार इस ब्लॉग को पढ़ कर जानेगा तो पहले सौगत पुराण ,सौगत बिस्वास से मेरी मुलाक़ात 23 दिसंबर 1999 को पहली बार जौनपुर में हुई| मैं अपनी पहली नौकरी में नया नया था जाड़े के दिन एक लंबा लड़का हमारे विभाग के कमरे मे दाखिल हुआ और बोला  मैं यहाँ अपनी ज्वाईनिंग  देने आया हूँ चूँकि हमारा और सौगत का चयन एक साथ पूर्वांचल विश्वविद्यालय में हुआ था और मैं पहले कार्यभार ग्रहण कर चुका था तो मुझे सारी प्रक्रिया की जानकारी थी| मैंने उसकी मदद की और दिन भर साथ रहे अगले दिन से विश्वविद्यालय में जाड़े की छुट्टी हो जाने वाली थी और सौगत के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था मैं विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में रह रहा था तो सौगत ने मुझे एक अनोखा ऑफर दिया कि  उस  रात मैं उसके साथ उस होटल में रुक जाऊं अगले दिन मुझे लखनऊ और उसे दिल्ली लौटना था| मैं थोडा हिचक रहा था अभी उसको जाने हुए मुझे ६ घंटे भी नहीं हुये और वो इतना बेतकल्लुफ हो रहा था वो मेरी हिचक को समझ गया पर जो जवाब उसने दिया वो अप्रत्याशित था ओए मैं दूसरे टाईप का आदमी नहीं हूँ तू रुक सकता है मेरे साथ हा हा खैर उस रात ना तो मुझे नींद पडी और ना ही सौगत सोया|दो कारण  एक तो वो जौनपुर का काफी घटिया होटल था  दूसरा हम दोनों उस शहर के लिए नए थे तो क्या सारी रात हम बातें करते रहें जामिया एम् सी आर सी का पढ़ा सौगत मुझे एक नयी दुनिया का लग रहा था विषय पर उसका अद्भुत ज्ञान था उस पर दिल्ली का एक्सपोजर अद्भुत कॉकटेल उस दिन से जो साथ शुरू हुआ वो आज तक जारी है| हम् नौकरियां भले ही बदल रहे थे पर एक दूसरे से संपर्क हमेशा बना रहा उसी रात उसने अपने एक सपने को मुझसे हल्का सा बांटा था कि वो आई ए एस बनना चाहता है और इसलिए वो दिल्ली को छोड़कर जौनपुर जैसी छोटी जगह नौकरी करने को तैयार हो गया|मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि मानसिक रूप से मैं अभी भी सौगत के सामने कॉलेज का बच्चा ही था जिसे बाहर की दुनिया और उसकी मक्कारी के बारे में ज्यादा पता नहीं था, वहीं सौगत संतुलित था उसके दिल में क्या चल रहा है कोई नहीं जान सकता और मैं क्या करूँगा सारा विश्वविद्यालय जानता था ऐसे शुरू हुआ नयी नौकरी का सफर बहुत से लोग वहाँ मिले सब ही नए थे पर जो मानसिक मेल सौगत और पंकज के साथ हुआ वो किसी और के साथ ना हो पाया (पंकज की कहानी फिर कभी ) और ये बात सारा विश्वविद्यालय जान गया कि मुकुल इन दोनों से आगे नहीं देखता |ये अलग बात है कि सौगत ने संतुलन बनाये रखा और  अपने आप को बाहर ऐसी किसी छवि में नहीं बाँधा शाम को अक्सर होने वाली परिचर्चा में सौगत और पंकज मुझे अक्सर ये समझाया करते थे कि सबसे मिला करो पर जब तक मैं जौनपुर में रहा ऐसा कर नहीं पाया जिसका साथ नहीं पसंद है उनके साथ मैं औपचारिक संबंध भी ठीक से नहीं निभा पाया पर जिंदगी जैसे जैसे आगे बढ़ी प्रोफेशनलिज्म के नाम पर ये मक्कारी मैं भी सीख गया और चेहरे पर मुखौटा डालना आ गया |छुट्टियों के बाद सौगत ने मेरे बगल के मकान में कमरा ले लिया और हम साथ साथ विश्वविद्यालय आने जाने लग गए सौगत ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढ़ाई के निकलना चाहता था इसलिए दो साल बाद विश्वविद्यालय रहने चला गया क्योंकि आने जाने में बहुत समय लगता था पर इससे  हमारी जुगलबंदी में कोई कमी नहीं आई |पूर्वांचल का पत्रकारिता विभाग गुलजार रहने लगा हम अक्सर कुछ ना कुछ खुरापात किया करते थे वो कैमरा सम्हालता और मै कलम| सौगत के आई ए एस बन जाने से भले ही देश को योग्य अधिकारी मिल गया पर पत्रकारिता शिक्षा के लिए एक बड़ा नुक्सान हुआ अगर सौगत आज यहाँ होता तो व्यवहारिक पत्रकारिता शिक्षण का स्तर और बेहतर होता खैर क्या लिखूं क्या ना लिखूं समझ नहीं पा रहा हूँ कितनी शामें हमने साथ गुजारीं क्या बहसे हुआ करती थी |मैं एक श्रोता की हैसियत से काफी कुछ सीख रहा था| कितनी वाराणसी की यात्राएं हमने साथ की और उन यात्राओं में होने वाला फन आज भी रोमांचित करता (जौनपुर में मनबहलाव की कोई जगह नहीं थी तो अक्सर हम वाराणसी का रुख करते थे )|एक शिक्षक के रूप में मैंने सौगत से बहुत कुछ सीखा तो दिन बीतते रहे जब तक मेरे पास स्कूटर नहीं था कई दिन हम बस और जीप में लटक कर विश्वविद्यालय पहुँचते थे फिर गाड़ी आ गयी पर कुछ चीजें मुझे सौगत की नहीं समझ नहीं आती थी वो हिसाब किताब बहुत किया करता था जिसमे मैं पहले भी कच्चा था और आज भी हूँ पर अंत में होता वही था जो वह चाहता वो मेरे स्कूटर से विश्वविद्यालय जाता था तो आने जाने के पैसे देता था फिर एक नया फोर्मूला निकाला कि एक दिन मेरी स्कूटर जायेगी और एक दिन उसकी मोटर सायकिल, दिन भर के खाने का हिसाब किताब लगा कर मुझे खास सौगतियन स्टाईल में बताया यार देख मैं दिन भर के तीस रुपैये से ज्यादा खाने पर नहीं खर्च कर सकता बसऔर ये अभिनव प्रयोग विभाग में भी  हो रहे थे एक दिन निर्णय लिया गया कि नुक्कड़ नाटक होगा अब छात्रों के लिए ये समस्या का विषय हो गया लोगों को ज्यादा इसके बारे में पता नहीं था पर चार दिन में प्ले बनकर तैयार हो गया और लोगों की पर्याप्त सराहना भी मिली | बहुत सारे खट्टे मीठे अनुभव होते रहे सौगत मोमबत्ती जलाये डटे रहते और अपने बिंदास स्वभाव के कारण चर्चा का केंद्र रहते हम एक शादी में बनारस गए और भाई साहब ने जींस कुर्ते के ऊपर कोट पहन लिया और पहुँच गए कोई अगर कुछ कहता भी तो जवाब तैयार क्या हुआ |बहुत सारे उतार चढावों के बीच सौगत ने सितम्बर 2003 में जौनपुर छोड़ दिया उसका चयन निफ्ट दिल्ली में हो गया था जौनपुर मुझे कभी रास आया नहीं था पर विभाग में उसके साथ से ऊर्जा मिलती थी पर अब वो जा रहा था खैर उसके परिवार को विदा करने के बाद सौगत को रोक लिया गया कि एक रात हम फिर से पार्टी करेंगे पुराने दिन ताजा करेंगे हालंकि तब तक हमारे दल में  इसमें अविनाश और ब्रजेश दो और लोग जुड चुके थे | साल बीतते गए इस बीच वो निफ्ट से निकल कर जामिया एम् सी आर सी में लेक्चरर बन गया और मैं जौनपुर से लखनऊ आ गया फोन पर बात भी अक्सर नहीं होती हाँ पर जब मैं दिल्ली जाता  तो जम के धमाल होता था ये बात अलग है कि धमाल मचाने वाले दो ही लोग होते थे और ऐसा मौका उसके जौनपुर छोड़ने के बाद एक ही बार आया जब हम दिल्ली में मिले|
लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी मंसूरी में सौगत के साथ 
2006 में सौगत  लखनऊ में प्रैक्टिकल परीक्षाएं लेने आये थे  जब वो  अपने रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रहा था गेस्ट हाउस के उस कमरे में हम कितनी देर तक अपनी अपनी जिंदगियों के बारे में बात करते रहे मैं उसके आई ए एस के साक्षात्कार के किस्से सुनता रहा और फिर वो खबर आयी जिसका हम सबको इंतज़ार था एक सपना जिसको सौगत जी रहा था सच हुई उसका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया और वो मंसूरी प्रशिक्षण के लिए चला गया बीच बीच में कभी कभार बात हो जाती हमें मिले हुए एक साल हो चुके थे कि नियति ने फिर हमें मिला दिया हुआ कि जिस दिन सौगत के प्रशिक्षण का अंतिम दिन था मैं देहरादून में था सौगत से बात हुई और उसने हमें मंसूरी के लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी  में बुला लिया और रात ज्यादा हो जाने कारण मुझे भी उस संस्थान में एक रात रुकने का सौभाग्य प्राप्त हुआ अद्भुत अनुभव था |

Saturday, October 27, 2012

सवाल सिर्फ हिरासत में मौत का नहीं


पुलिस किसी भी संवैधानिक तंत्र का वह अहम हिस्सा है जो देश की आंतरिक  नागरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार है |सूचना क्रांति के इस युग ने लोगों को जवाबदेही के प्रति जागरूक किया है और राज्यों की पुलिस भी इससे अछूती नहीं है |मित्र पुलिस, आपके साथ सदैव जैसे नारे हमें मुंह चिढाते लगते हैं,आंकड़े एक त्रासदी की तस्वीर पेश करते हैं |एशियाई मानवाधिकार केन्द्र नई दिल्ली द्वारा तैयार रिपोर्ट के मुताबिक, देश  में पिछले एक दशक से ज्यादा समय में कम से कम 14,231 लोग हिरासत में मारे गए,जिसका मतलब है प्रति दिन औसत रूप में चार व्यक्ति से ज्यादा पुलिस हिरासत में मरे ये आंकड़े जेल में हुई मौतों से अलग हैं | इस  अध्ययन का आधार भारत सरकार के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा दिए गए आंकड़ों पर आधारित है। पुलिस हिरासत में हुई मौत  गंभीर सवाल खड़े करती है रिपोर्ट के मुताबिक इन मौतों  का बड़ा कारण हिरासत में दी गयी  प्रताडना है जिससे पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हिरासत में आने के 48 घंटे के अंदर हो गयी | उल्लेखनीय है कि हिरासत में मौत उन राज्यों में ज्यादा हुई  है जहाँ आम तौर पर शांति है और किसी आंतरिक संघर्ष का इतिहास नहीं है | महाराष्ट्र में पिछले दशक में पुलिस हिरासत में सबसे ज्यादा 250 लोगों की मौत हुई।पुलिस की कार्यप्रणाली हमेशा पर अक्सर सवालिया निशान लगते रहे हैं|पुलिस को लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति सजग और आम लोगों का भरोसा जीतेने वाला होना चाहिए| देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एक लाख जनसंख्या पर मात्र 74 पुलिसकर्मी हैं जबकि बिहार में इतनी ही आबादी पर सिर्फ 63 पुलिस वाले हैं। देश में एक लाख की  आबादी पर स्वीकृत पुलिस कर्मियों की संख्या का राष्ट्रीय औसत 177.67 है लेकिन वास्तव में 134.28 पुलिस कर्मी ही तैनात है। संयुक्त राष्ट्र संघ के  मानक  के अनुसार एक लाख पर कम से कम 220 पुलिस कर्मी होने चाहिए।इस मामले में पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों में पुलिस जनता अनुपात सर्वाधिक है। मिजोरम में प्रति एक लाख पर 1084.99, नागालैंड में 1034.68, त्रिपुरा में 936.69, सिक्किम में 602.68 और अरुणाचल प्रदेश में 568.82 पुलिस कर्मी हैं। देश की राजधानी दिल्ली में  प्रति एक लाख पर 390.55 पुलिस कर्मी हैं जबकि इनकी स्वीकृत संख्या 431.29 है।
देश में पुलिस सुधार के लिए बनी कमेटियों का एक लंबा इतिहास रहा है| व्यवहार में कुछ भी होता न देख सुप्रीम कोर्ट ने पांच साल पहले राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में सुधार  के लिए व्यापक  सुझाव दिए थे,जिसमें 'पुलिस स्थापना बोर्ड' का गठन, पुलिस उत्पीड़न की सुनवाई के लिए राज्यों व जिला स्तर पर 'पुलिस शिकायत प्राधिकरण' गठित करना और सबसे महत्वपूर्ण अपराध की विवेचना और कानून एवं व्यवस्था का काम अलग अलग  करना भी शामिल था |जिससे पुलिस व्यवस्था पर पड़ रहे काम के बोझ को कम किया जा सके पर राज्यों की राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी के अभाव में यथा स्थिति जारी है और पुलिस व्यवस्था सत्ताधारी राजनैतिक दल की हितपूर्ति का साधन मात्र बनी हुई है |लोगों को अभी भी सही मायनों में मित्र पुलिस का  इन्तजार है | 
हिन्दुस्तान में 27/10/12 को प्रकाशित 

Monday, October 15, 2012

बच्चों के गोद लेने का गुणा भाग

आप लोगों ने सड़कों पर अक्सर ऐसे बच्चों को भीख मांगते ,सड़कों पर घूमते ऐसे न जाने कितने अबोध बच्चों को देखा होगा और उनके लिए कुछ करने की कसक भी मन में जगी होगी फिर दुनियादारी और नियम कानून के कठोर धरातल ने उस कसक को अचानक समाप्त कर दिया होगा |बच्चा गोद लेना या किसी बच्चे को अपनाना भारत में अभी भी सामान्य व्यवहार का हिस्सा नहीं बन पाया है और शायद इसीलिये बच्चों को अवैध रूप से गोद लेने का चलन भी बढ़ा है और बच्चों की तस्करी भी जिनकी पुष्टि बचपन बचाओ संस्था के शोध द्वारा जुटाये गए वह  आंकड़े करते हैं जिनके अनुसार वर्ष 2008 से 2010 के मध्य117480 बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ कराई गयी| इनमें से 74209 बच्चों को तो ढूंढ लिया गया पर 41546 का आज तक कोई सुराग नहीं लग सका है|सामान्य तौर पर एक  बच्चे को गोद लेना एक नए सम्बन्ध  की शुरुआत कही जा सकती है। यह एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिसमें एक दम्पति या एकल अभिभावक को एक बच्चाउनके बेटे या बेटी के रूप मेंहमेशा के लिए सौंप दिया जाता है। एकल पुरुष अभिभावक  को गोद के रूप में बेटी दिए जाने का प्रावधान नहीं है।याद रखें! जब आप किसी बच्चे को गोद लेते हैं तो आप इस बात को अच्छी तरह और दिल से मानते हैं कि उसे अपने बेटे/बेटी जैसा प्यार देंगे और अब उसकी अच्छी तरह से परवरिश एवं अच्छी शिक्षा की सारी जिम्मेदारी आप की है जिसे आप ख़ुशी-ख़ुशी निभाएंगे। गोद लेने की प्रक्रिया उस वक़्त से शुरू होती है जब बच्चे की जैविक माता या माता-पिता बच्चे का पालन-पोषण कर पाने में खुद को असमर्थ पातें हैं या किसी मजबूरी वश बच्चे को अपने पास  नहीं रख पाते। ऐसा बच्चे के जन्म के पहले भी हो सकता है और बच्चे के जन्म के बाद भी ।
पिछले साल भारत सरकार ने भारत में बच्चा गोद लेने का शुल्क बीस हजार रुपैये दुगुना से बढाकर कर चालीस हजार रुपैये कर दिया सेन्ट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथोरिटी के मुताबिक भारतीय गणराज्य तो गोद लेने के लिए कोई शुल्क नहीं लेता  पर चिल्ड्रन केयर फंड के लिये कुछ राशि सहयोग के रूप में ली जाती है|आंकड़ों की अगर बात करें तो पिछले पांच सालों में बच्चा गोद लेने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हुआ है| सेन्ट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथोरिटी के अनुसार 2006 में जहाँ कुल 3262 बच्चे गोद लिए गए वहीं ये संख्या साल 2011 आते आते यह आंकड़ा 6494 हो गया था इन आंकड़ों में देश के भीतर और विदेश में गोद लिए बच्चे शामिल हैं इन आंकड़ों के आगे भी कुछ तथ्य हैं जो वास्तविक हैं बस फर्क यह है कि आंकड़ों में भाव नहीं होते संवेदनाएं नहीं होतीं वे कोरे आंकड़े होते हैं पर गोद लेकर किसी बच्चे का अभिभावक बनना सीधे सीधे मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा मामला है|गोद लेने का शुल्क दुगुना कर देना यह बताता है कि संवेदनाएं भी मुफ्त में नहीं मिलती और इस शुल्क वृद्धि के निहितार्थ पर जरुर कुछ सवाल खड़े होते हैं|
संतति सुख अपने आप में पूर्ण शब्द है जिसको मुद्रा और माल बना कर बाजारतंत्र के हवाले कर देने का परिणाम निम्न  व मध्यम वर्ग के परिवारों की  संवेदनाओं पर आर्थिक रूप से उच्च वर्ग का हक होगा|  पूंजी के आधार पर वर्गीकरण के इस समय में हमारे मानवीय सूत्र लगातार परिजीवता  की  तरफ बढ़ रहें हैंहमारे स्व के अस्तित्व पर इन निर्णयों के जरिये बार बार हस्तक्षेप किया जा रहा है. नब्बे के दशक के बाद आये कथित बाजारवादी भूमंडलीकरण ने व्यक्ति के जीवन के हर पहलू को कहीं ना कहीं स्पर्श जरुर किया हैहम आँखे बंद कर कितना भी अनजान बनने कि कोशिश कर लें ऐसे निर्णय हमें आंखे खोलने ना सही पर आँखें मिचमिचाने को मजबूर जरुर करते हैंसमाज में उपभोक्तावादी  सरकारी निर्णयों में ‘’सहयोगराशि’’ शब्द का प्रयोग अध्ययन का विषय हो सकता है| इसमें कोई शक नहीं कि अनाथालय में गए बच्चों को एक बेहतर जीवन मिलना चाहिए और गोद देने पूर्व उनके भावी अभिभावकों की आर्थिक स्थिति का अच्छा होना उनके बेहतर भविष्य का संकेत हो सकता है पर आर्थिक  स्थिति बेहतर होने से यदि बच्चों का भविष्य सुधर रहा होता तो ये देश कब का बदल गया होता देश बनता है नागरिकों से जो संस्कारवान हों जिनको जीवन मूल्यों का ज्ञान हो पर मूल्य और संस्कार जैसे शब्द खरीदे बेचे नहीं जाते इनको जीना सीखाया जाता है |सिक्के का दूसरा पहलु यह भी है कि दुनिया की उभरती हुई आर्थिक शक्ति में ये बच्चे कहाँ से आ जाते हैं जिन्हें गोद लेने की जरुरत पड़ती है क्यों इनके माता पिता इनको त्याग देते हैं ? इन  बच्चों के लिए हमारा सामजिक आर्थिक ढांचा जिम्मेदार है गरीबी, अशिक्षा लिंग विशेष के प्रति पूर्वाग्रही रवैया और ज्यादा बच्चे एक ऐसा दुष्चक्र रचते हैं कि कुछ लोगों के लिए बच्चे बोझ हो जाते हैं|हमारा समाज भी इन ठुकराए हुए बच्चों के प्रति कोई खास संवेदनशील भूमिका नहीं निभाता ऐसे में इन बच्चों का एकमात्र ठिकाना अनाथालय ही होता भले ही सरकार ये दावा करे कि ये शुल्क वृद्धि बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया को सरल करेगी और बच्चों को एक बेहतर भविष्य मिलेगा पर तथ्य यह है कि भारत में किसी नवजात को गोद लेने में कम से कम चार से पांच माह का समय लग जाता है|हम सोंचना होगा कि क्या जीवन के अस्तित्व का एक मात्र आधार अर्थ ही है ? या अर्थ ही ऐसा घटक है जिससे हम संवेदनाओं का मूल्यांकन करें संतति सुख सार्वभौमिक है |शुल्क वृद्धि का ये फैसला न्याय संगत नहीं है इससे बच्चा गोद लेने वाले मध्य आय वर्ग के लोग हतोत्साहित होंगे|इस शुल्क वृद्धि का इस्तेमाल अगर गोद लेने वाले बच्चे पर ही किया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा इस शुल्क का एक हिस्सा ब्याज के साथ उन अभिभावकों को तब मिले जब बच्चा अट्ठारह साल की उम्र पूरी कर ले|इससे मध्य आयवर्ग के लोग भी बच्चा गोद लेने के लिए उत्साहित होंगे पर मध्य वर्ग की चिंता किसे है क्योंकि ये सारी व्यवस्था कुछ साधन संपन्न लोगों के लिए ही है|सरकार वैसे भी अपने निर्णयों से ये जाहिर कर चुकी है कि भारत का मध्यवर्ग आर्थिक रूप से संपन्न है जोमंहगा पानी खरीद कर पीता है, मंहगी आइसक्रीम खाता है,मगर गेहूं या चावल महंगा नहीं खरीदना चाहताहै |मानव संतति का अंगीकरण(गोद लेना ) किसी कोरे कागज को अपनाने जैसा है जो हमें बिना किसी लिखावट के मिलता है गोद लेने का यह पक्ष मनुष्यता कि गरिमा को बढाता है और मनुष्यता व पशुता के बीच भेद स्थापित करने वाली परिपाटी भीआर्थिक स्थिति के आधार पर प्राण का वर्गीकरण करना निश्चित रूप के मनुष्यता और पशुता के अंतर को कम करने जैसा ही है |
राष्ट्रीय सहारा में 15/10/12 में प्रकाशित 

Tuesday, October 9, 2012

जानलेवा बीमारियों से लड़ते बच्चे

स्वास्थ्य किसी भी देश की महत्वपूर्ण प्राथमिकता का क्षेत्र होता है पर आंकड़ों के हिसाब से भारत की तस्वीर  इस मायने में बहुत साफ़ नहीं है बाल स्वास्थ्य इसका कोई अपवाद नहीं है बच्चे देश का भविष्य हैं पर उन बच्चों का क्या जो भविष्य में बढ़ने की बजाय अतीत का हिस्सा बन जाते हैं | साल 2011 मेंदुनिया के अन्य देशों की मुकाबले भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें हुईं।ये आंकड़ा समस्या की गंभीरता को बताता है जिसके अनुसार भारत में  प्रतिदिन 4,650 से ज्यादा पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु होती है|संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ की नई रिपोर्ट यह बताती है कि बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में अभी कितना कुछ किया जाना है |संयुक्त राष्ट्र का यह  अध्ययन यह आंकलन करता  है कि भारत में जन्म लेने वाले प्रत्येक 1,000 बच्चों में से 61 बच्चे अपना  पांचवा जन्मदिन नहीं मना पाते हैं। महत्वपूर्ण बात ये है कि ये संख्या रवांडा (54 बच्चों की मृत्यु) नेपाल (48 बच्चों की मृत्यु) और कंबोडिया (43 बच्चों की मृत्यु) जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े देशों के मुकाबले ज्यादा है|सियेरा लियोन में बच्चों के जीवित रहने की संभावनाएं सबसे कम रहती हैं,जहां प्रत्येक 1,000 बच्चों में मृत्यु दर 185 है।दुनिया भर में बच्चों की मृत्यु की सबसे बड़ी वजह न्यूमोनिया है जिनसे १८ प्रतिशत मौतें होती हैं और दूसरी वजह डायरिया है जिससे ११ प्रतिशत मौतें होती हैं भारत डायरिया से होने वाली मौतों के मामले में सबसे आगे  है। 2010 में जितने बच्चों की मृत्यु हुईउनमें 13 प्रतिशत की मृत्यु वजह की डायरिया ही था  दुनिया में डायरिया से होने वाली मौतों में अफगानिस्तान के बाद भारत का ही स्थान  है।रिपोर्ट के मुताबिक भारत जैसे देशों में डायरिया की मुख्य वजह साफ़ पानी की कमी, और निवास के स्थान के आस पास गंदगी का होना है जिसकी एक वजह खुले में मल त्याग भी है |गंदगी ,कुपोषण और मूल भूत स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव मिलकर एक ऐसा दुष्चक्र रचते हैं जिनका शिकार ज्यादातर गरीब घर के बच्चे होते हैं |तथ्य यह भी है आर्थिक आंकड़ों और निवेश के नजरिये से भारत तरक्की करता दिखता है पर इस आर्थिक विकास का असर समाज के आर्थिक रूप कमजोर तबके पर नहीं हो रहा है जिसका परिणाम पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की ज्यादा मृत्यु ,वह भी डायरिया जैसी बीमारी से जिसका बचाव थोड़ी सावधानी और जागरूकता से किया जा सकता है | बढते शहरीकरण ने शहरो में जनसँख्या के घनत्व को बढ़ाया है| निम्न आयवर्ग के लोग रोजगार की तलाश में उन शहरों का रुख कर रहे हैं जो पहले से ही जनसँख्या के बोझ से दबे हैं नतीजा शहरों में निम्न स्तर की जीवन दशाओं के रूप में सामने आता है |गाँव जहाँ जनसंख्या का दबाव कम हैं वहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत दयनीय है और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर जागरूकता का पर्याप्त अभाव है|
 विकास संचार के मामले में अभी हमें एक लंबा रास्ता तय करना है जिससे लोगों में जागरूकता जल्दी लाई जाए विशेषकर देश के ग्रामीण इलाकों में| इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिसका प्रभाव ज्यादा है पर वह अपने मनोरंजन एवं सूचना में संतुलन बना पाने में असफल रहा है जिसका नतीजा संचार संदेशों में कोरे मनोरंजन की अधिकता के रूप में सामने आता है |सरकार का रवैया इस दिशा में कोई खास उत्साह बढ़ाने वाला नहीं रहा है देश के सकल घरेलु उत्पाद (जी डी पी ) का 1.4 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं  पर खर्च किया जाता है जो कि काफी कम है सरकार ने इसे बढ़ाने का वायदा तो किया पर ये कभी पूरा हो नहीं पाया | भारत सरकार के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य के अनुसार वह साल 2015 तक शिशु मृत्यु दर को प्रति 1,000 बच्चों पर 38 की संख्या  तक ले आयेगी |बढ़ती शिशु मृत्यु दर का एक और कारण कुपोषण भी है 'सेव द चिल्ड्रन'संस्था  का एक अध्ययन बताता  है कि भारत बच्चों को पूरा पोषण मुहैया कराने के मामले में बांग्लादेश और बेहद पिछड़े माने जाने वाले अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो से भी पिछड़ा हुआ है| हालांकिभारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 1990 के मुकाबले  46 प्रतिशत कम हुई है पर इस आंकड़े पर गर्व नहीं किया जा सकता|सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है  जब गरीबों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता पैदा की जाए  और उनकी जीवन दशाओं को बेहतर किया जाए. इस दिशा में सरकार को सार्थक पहल करनी होगी  पर यूनिसेफ की यह रिपोर्ट बताती है कि यह आंकड़ा प्राप्त करना आसान नहीं होगा| 
अमरउजाला में 09/10/12 को प्रकाशित 

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