Sunday, October 31, 2010

मीडिया को पढ़ने वाले ,मीडिया को पढाने वाले(हिन्दुस्तान सम्पादकीय )

                                                                      सीबीएसई ने अपने पाठ्यक्रम में ११ वीं और १२ वीं के छात्रों के लिए मीडिया का पाठ्यक्रम देने की बात कही. यह पाठ्यक्रम अगले सत्र से शुरू हो जायेगा. आम तौर देखा जाये तो इसमें कोई नई बात नहीं है. अन्य पाठ्यक्रमों  की तरह यह भी पढाया जायेगा पर जरा गौर करने पर इसके बड़े निहितार्थ निकलते हैं भारत में मीडिया शिक्षण का विकास ऊपर से नीचे की ओर हुआ यानि यह पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों से होते हुए स्कूल  तक पहुंचा है एक विषय के रूप में इतने वक्त में समय का पूरा पहिया घूम गया इसे समय की मांग कहा जाए या शिक्षा को बाजारोन्मुखी बनाना इसका आंकलन किया जाना अभी बाकी है  आजादी के बाद देश में तकनीकी दक्षता के लोगों की ज़रुरत को पूरा करने के लिए आई आई टी  जैसे संस्थान  खोले गए. इन संस्थानों से निकले लोगों की बदौलत हमने देश की बुनियादी संरचना सुधारी साथ ही विश्व में अपने आइटी पेशेवरों के माध्यम से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया . इसी तरह बेहतर प्रबंधन कर्मियों के लिए स्थापित किये गए आई आई एम् संस्थानों ने भी देश और दुनिया  को बेहतरीन पेशेवर प्रबंधक दिए , पर तस्वीर का दूसरा रुख भी है देश में रोजगार परक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आई टी आई और पोलीटेक्निक जैसे संस्थान खोले गए जहाँ कई रोजगार परक पाठ्यक्रम चलाये गए पर वे संतोषजनक परिणाम न दे सके . वर्तमान में मीडिया पाठ्यक्रम भारत के लगभग हर विश्व विद्यालय में चलाये जा रहे हैं इसके अतिरिक्त सैकड़ों की तादाद में निजी संस्थान भी देश के भावी पत्रकारों की पौध को तैयार करने में लगे हैं फिर भी आमतौर पर ये माना जाता है आज के जनमाध्यमों ने अपनी विश्वसनीयता खोयी जबकि आज प्रशिक्षित पत्रकारों का युग है और जनसंचार एक विषय के रूप में स्थापित हो चुका है फिर भी विश्वसनीयता का संकट है .विभिन्न संस्थानों से डिग्री धारी पत्रकार तो निकल रहे हैं पर जब वे नौकरी की तलाश में मीडिया संस्थानों में पहुँचते हैं तो अपने आपको एक अलग ही दुनिया में पाते हैं जहाँ उस   ज्ञान का कोई महत्व नहीं है जो उन्होंने अपने संस्थानों में सीखा है .सी बी एस ई द्वारा शुरू किये गए इस पाठ्यक्रम के बहाने ही सही पर अब वक्त आ चुका है कि हम अपनी मीडिया शिक्षा प्रणाली  पर एक बार फिर गौर करें .इंटर स्तर पर मीडिया शिक्षण की शुरुवात के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है की इस से छात्रों में संचार कौशल तथा जनमाध्यमों के प्रति उनकी समझ बढ़ेगी इसमें कोई शक नहीं है स्कूल स्तर पर मीडिया शिक्षण का फैलाव होने से लोगों में मीडिया के प्रति फैले हुए कई दुराग्रहों को दूर करने में मदद मिलेगी आजकल ये फैशन सा चल पड़ा है हर समस्या के लिए मीडिया को दोषी ठहरा देना .हमारी  शिक्षा प्रणाली में संचार कौशल सिखाने  के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं थी यह प्रयास शायद इस खालीपन को भर पाने  में सहायक होगा अक्सर विद्यार्थी अपने आपको ठीक तरह से व्यक्त न कर पाने के कारण रोजगार की दौड में पिछड़ जाते हैं.इसके अतिरिक्त यह पाठ्यक्रम उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी सहायक होगा .

 पत्रकारिताफिल्मरेडियो,मल्टीमीडिया ,विज्ञापन और जनसंपर्क जैसे विषयों के रूप में उन्हें नए क्षेत्रों का ज्ञान होने से वे अपने भविष्य की रूप रेखा बेहतर तरीके से बना पायेंगे पर  मीडिया शिक्षा में कुछ और भी चुनौतियाँ हैं सिद्धांत और व्यवहार में अक्सर अंतर आ जाता है स्नातक और स्नाकोत्तर स्तर पर मीडिया शिक्षा योग्य शिक्षकों के अभाव से जूझ रही है .विश्वविद्यालय अनुदान आयोग मीडिया शिक्षा को अन्य पारम्परिक पाठ्यक्रमों की तरह ही देखता है, कोई भी छात्र जब मीडिया  विषय का चुनाव करता है तो उसके दिमाग में एक मात्र लक्ष्य पत्रकारिता  या इस से जुड़े अन्य क्षेत्रों में रोजगार पाना होता है पर विश्व विद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी ) की गाईड लाइन मीडिया  शिक्षकों से  ये अपेक्षा करती है कि वे शोधपत्र लिखेंगे तथा मीडिया शोध को बढ़ावा देंगे जैसा कि अन्य विषयों में होता है यह बाध्यता शिक्षकों की व्यक्तिगत पदोनात्ति में भी लागू होती है अधिकारिक तौर पर किसी भी विश्वविद्यलय में मीडिया शिक्षक बनने की योग्यता का आधार यू जी सी की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट ) है इस परीक्षा में चयन का आधार किताबी ज्ञान और विश्लेषण शक्ति होती है इस स्थिति में ज्यादातर शिक्षक व्यावहारिक ज्ञान में दक्ष नहीं होते हैं और उनके द्वारा दी गयी शिक्षा में सिद्धांत और प्रयोग का सही मिश्रण नहीं होता और इसीलिये हमारे मीडिया संस्थान मीडिया बाजार की मांग के अनुरूप प्रोफेसनल तैयार नहीं कर पा रहे हैं .
और वहीं भारत के भावी पत्रकारों की पौध तैयार करने वाले संस्थानों के ज्यादातर शिक्षक मीडिया को अपना सक्रिय योगदान नहीं दे पाते हैं सिद्धांत और व्यवहार का यह अंतर छात्रों की गुणवत्ता पर असर डालता है  मीडिया के उच्च मानदंडों की प्राप्ति के लिए यह जरूरी है कि ऐसी पहल का स्वागत किया जाए पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया अपने आप में एक व्यापक शब्द और विषय है इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से सिर्फ तकनीकी ज्ञान की अपेक्षा नहीं की जाती उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि उनमे देश दुनिया की बेहतर समझ भी हो जिसके लिए अन्य विषयों का भी ज्ञान आवश्यक है समाज , राजनीति , अर्थशास्त्र ,संस्कृति को समझे बगैर कोई भी अच्छा जन संचारक नहीं हो सकता  भारत में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के फैलाव ने इसमें बहुत सारा ग्लैमर दे दिया है और छात्र सिर्फ तकनीक को समझ कर तुरंत  पत्रकार होना चाहता है यह एक बड़ा कारण है कि नयी पीढ़ी की जो पौध आज इस क्षेत्र में आ रही है उसमे गंभीरता का अभाव दिखता है इसलिए यह आवश्यक है की  पत्रकरिता  के पाठ्यक्रमों में बौद्धिक विषयों और अन्य सामयिक मुद्दों को ज्यादा जगह दी जानी चाहिए.भारत में मीडिया शिक्षण अभी भी दोराहे पर है जिसमे शोध और व्यवसायिकता का संतुलन नहीं कायम हो पाया है दूसरी ओर लगातार बदलती तकनीक ने इस विषय में बदलाव की गति को बहुत तेज कर दिया है . स्कूल स्तर पर इस  पाठ्यक्रम की शुरुवात ने एक अच्छा संकेत तो दिया है पर यह बदलाव मीडिया की उच्चशिक्षा को कितना बदल पाता है इसका फैसला समय को करना है .
*हिन्दुस्तान में दिनांक ३१ अक्टूबर २०१०  को प्रकशित 


       

Friday, October 22, 2010

उदयपुर संस्मरण यात्रा :अंतिम भाग

अजय का फॉर्म हाउस 

 शाम को नीमच माता का कार्यक्रम तय हुआ उदयपुर के लगभग हर कोने से ये पहाड़ी दिखती है जिस पर नीमच माता का मंदिर है मंदिरों से मेरा जुडाव अब  सिर्फ इतिहास और उनके स्थापत्य के कारण ही रहा है नीमच माता इस लिए खास है क्योंकि ये हमारे हॉस्टल के ठीक सामने वाली पहाड़ी पर बना इसके इतिहास की जानकारी किसी को नहीं है बस मंदिर है और लोग पूजा करते हैं जब हम पढते थे तो लगभग हर महीने एकाध बार वहां जरूर जाते थे इसके भी कई कारण थे एक तो वहां से शहर बड़ा खूबसूरत दिखता है पूरा उदयपुर लगभग ७५० मीटर ऊंचाई से बहुत ठंडी हवा चलती है और वहां शांति से बैठकर नारियल खाने का आनंद जिसमे ये भी नहीं लगता था कि पैसे की बर्बादी हुई क्योंकि वो तो भगवान के नाम पर प्रसाद चढ़ाया हुआ होता था और जब पास में पैसे ज्यादा न हो तो इतनी ऐयाशी करने का हक  हम जैसे गरीब लोगों को उन दिनों हुआ करता था सोचा चलो देखेंगे कि वहां से हमारा हॉस्टल कैसा दिखता है पहले नीमच जाने का जो हम लोगों का मनपसंद रास्ता था वो पहाड़ियों के रास्ते से था एक तो उस से थकान कम लगती थी और वो छोटा  भी पड़ता था तब सीढियां बनी हुई थीं पर हम कभी उससे चढ़े नहीं पर इस बार स्तिथियाँ बदली थी अब मैं पर्यटक बनकर इस शहर में आया था सब अजनबी थे वहां भी बदलाव की बयार बह रही थी सीढ़ियों की जगह एक गलियारा ऊपर तक बन गया था सीढियां गायब थीं पहाड़ी बदली बदली लग रही थी हमारा शोर्ट कट न जाने कहाँ गायब हो गया था हालाँकि सारे रास्ते मैं उस जगह का अंदाजा लगता रहा लेकिन न जाने वो भी पुराने लोगों की तरह कहीं गम हो गया था हॉस्टल तो मैं देख ही नहीं पाया एक तो शाम हो चली थी दूसरे बीच में बहुत निर्माण कार्य हो गया था मंदिर भी बहुत बदल गया था लगता है अब काफी धनी भक्त यहाँ आने लग गए हैं जिनकी मुरादें यहाँ पूरी हो रही हैं भगवान भी लगता है वैश्वीकरण का शिकार हो रहे हैं ऐसा लग रहा था हमारी प्यारी जगह जहाँ हम कभी बैठा करते थे वो भी गायब थी हवा तो अब भी ठंडी चल रही थी पर पहले जैसा सुकून नहीं था शायद शन्ति मंदिर में नहीं हमारे दिमाग में होती है जिसकी तलाश में हम न जाने कहाँ भटकते फिरते हैं देखिये न मैं भी कहाँ से कहाँ पहुँच गया था . जिन यादों की तलाश में मैं यहाँ तक आ चुका था वो तो कहीं थी ही नहीं कुछ भी तो ऐसा नहीं था फिर क्या चीज थी जो मुझे यहाँ खींच रही थी शायद अजय की दोस्ती मुझे हमेशा लगता था कि जिंदगी के किसी न किसी मोड पर हम टकरायेंगे जरुर और आज मैं उसी के कारण अपने पुराने शहर में था शाम को हमारा भोजन बावर्ची होटल में था जहाँ दक्षिण भारतीय व्यंजन का लुत्फ़ उठाया गया कष्ट इस बात का था अजय मुझे कही कुछ भी खर्च नहीं करने दे रहा था वो मेरी हर छोटी बड़ी जरुरत पर नज़र रखता था वो अगर हमारे साथ नहीं भी होता तो भी हर घंटे फोन करता धीरे धीरे हमारे लौटने का वक्त हो रहा था .आखिरी दिन हम लोगों ने होटल छोड़ दिया क्योंकि आख़िरी रात हमें अजय के फॉर्म हाउस में बितानी थी अजय अभी भी निश्चिंत नहीं था कि हम रात में वहां रुक पायेंगे या नहीं पर चूँकि अब हमें शहर छोड़ कर फॉर्म हाउस जाना था और वहां से एअरपोर्ट भी नजदीक था इसलिए मैंने कुछ देर के लिए पैदल शहर घूमने का फैसला किया पुराने लोग न सही पुरानी यादों को ही जी लिया जाए चेतक सर्कल , स्वप्नलोक,हाथीपोल फतहपुरा सब को विदा कह कर हम अजय के घर आ गए जहाँ से सबको फॉर्म हाउस के लिए निकलना था मुकेश अपने परिवार के साथ वहां हमसे जुड़ने वाला था अजय का परिवार हमारे साथ चल रहा था दोपहर के बाद हम सब अजय के फॉर्म हाउस पर थे .फोर्म् हाउस फिल्मों में देखा था कभी किसी फॉर्म हाउस में वक्त बिताने का पहला मौका था खूबसूरत भव्य विशाल मेरे पास इससे ज्यादा शब्द नहीं उसके बारे में लिखने को बीच में सुन्दर गोल लान सुन्दर मकान जहाँ आधुनिक जीवन की सब सुविधाएँ थी मुकेश के आ जाने के बाद क्रिकेट का खेल शुरू हुआ हालाँकि महिलाएं पहले से खेल रहीं थी पर अजय को कोई भी आउट नहीं कर पाया स्कूल के ज़माने से अजय क्रिकेट खेल रहा था इस बात के गवाह विद्या भवन की टूटी हुई डेस्कें थी फिर वहां लकडियों की कमी भी नहीं थी शाम घिर रही थी और उसके बाद जो सूर्यास्त मैंने वहां देखा वो अद्भुत था सूरज धीरे धीरे अस्ताचल को जा रहा था मैं टकटकी लगाये उसे देख रहा था अपने कैमरे की नज़र से आज उदयपुर में हमारी आख़िरी शाम थी बरसों के बिछड़े दोस्त मिले और आज के बाद फिर बिछड जाने वाले थे और फिर रह जानी थी यादें उदयपुर कल फिर मेरे लिए इतिहास हो जाने वाला था लेकिन इस बार बहुत कुछ यहीं छूट जाने वाला था मेरे मन का एक हिसा यहीं रह जाने वाला था अजय के पास , उसके फॉर्म हाउस पर जिंदगी तो चलती रहेगी मैं भी अपनी जिंदगी में मशगूल हो जाउंग और शायद अजय भी लेकिन जीवन के कुछ ऐसे पल हमेशा के लिए मेरी यादों का हिसा बन जाने वाले थे मैं चाह रहा था वक्त यहीं रुक जाए पर जो रुक जाये वो वक्त नहीं हो सकता दाल बाटी चूरमा तैयार था बरसों पहले खाया था क्लास कैम्प में आज फिर, जिंदगी एक  कैम्प ही तो है बस्ती है उजडती है पता नहीं अभी मुझे कितनी बार और बसना है उजड़ना है  खाना खत्म होते होते १० बज चुके थे और फिर अजय और मुकेश ने अपने परिवारों के साथ विदा ली इतना सन्नाटा और शांति जीवन में कम ही जगहों पर महसूस की है जब आप मौन से बातें कर सकें जब आप अँधेरे में देख सकें जब आप अपने  अंदर झाँक सकें कुछ ऐसा ही माहोल था चारों ओर अँधेरा  मैं सोच रहा था जिंदगी कितनी खूबसूरत लगती है कभी कभी पर कल मुझे फिर एक नयी दुनिया में होना है जहाँ दिल नहीं दिमाग चलता है जहाँ रिश्ते आपसी लेंन  देंन  और स्वार्थ पर बनते हैं अजय ने जो कुछ किया वो क्यों किया जिंदगी में इतने साल के बाद भी वो मुझे क्यों नहीं भूला कोई जवाब नहीं है इन प्रश्नों का मेरे पास आपके पास हो तो जरूर बताएगा चलते चलते अजय ने मेरे लिए एक विशेष गणेशजी की मूर्ति मुझे भेंट की जो उसने मेरे लिए अपने कारखाने पर बनवाई थी . अलविदा अजय जिंदगी को कुछ पल के लिए ही सही खूबसूरत बनाने के लिए शुक्रिया  अलविदा उदयपुर जिंदगी रही तो फिर मिलेंगे

नारू  जी फॉर्म हाउस के रखवाले 

फॉर्म हाउस का विहंगम दृश्य 

डूबता सूरज :कल फिर निकलेगा 

फॉर्म हाउस में बना घर 
समाप्त

उदयपुर संस्मरण यात्रा :पंचम भाग

मुकेश का प्रिंटिंग प्रेस साथ में अजय 
हल्दीघाटी 

 दोपहर हो चली थी मैं पहली बार अजय के घर जा रहा था सुन्दर आलीशान मकान अजय संगमरमर का एक व्यवसायी है और ऐसा लगता है कि उसका काम धंधा अच्छा चल रहा है अजय की माँ , पिता जी उसकी पत्नी से मुलाकात हुई अजय की माँ पारम्परिक भारतीय सास से एकदम अलग उनके अंदर सास वाली हनक तो थी लेकिन वे प्रगतिशील भी दिखीं मुझे हनक का कारण शायद अजय के पिता जी का बहुत सीधा होना हो वे सरकारी सेवा से मुक्त हो जीवन का आनंद ले रहे हैं अजय की माता जी को कर चलाने का जबरदस्त शौक है उन्होंने मुझे खुद ही बताया कि प्रतिदिन २० किलो मीटर कार चलाती हैं और सामाजिक रूप से काफी सक्रिय हैं जैन धर्म से सम्बन्धित कई संस्थाओं के माध्यम से वे समाज सेवा करती हैं अजय की शादी का एल्बम देखते वक्त एक पुराना मित्र उसमे दिखा तुरंत उसका नंबर खोजा गया मुकेश चौधरी उदयपुर के सबसे बड़े प्रिंटिंग प्रेस का मालिक उसने बड़ी आत्मीयता से हम सबको अपने घर आमंत्रित किया दोपहर का भोजन हमने मशहूर गुजराती होटल नटराज में किया ये होटल गुजरातियों में बहुत लोकप्रिय है वैसे खाने के मामले में राजस्थानी खाने का भी कोई जवाब नहीं बात खाने की चली है थोडा सा इस विषय पर बात कर ली जाए राजस्थान में जैन धर्म के मानने वालों की जनसँख्या काफी ज्यादा है यह धर्म पूरी तरह अहिंसा में विश्वास करता है इसलिए यहाँ मांसाहारियों की संख्या काफी काम है जब हम हॉस्टल में थे तो हमें इस चीज का बड़ा कष्ट था कि हफ्ते में एक दिन भी हमें मांसाहार नहीं मिलता था अब तो मेरे लिए बाहर खाना खाने का मतलब ही मांसाहार होता है चूँकि मैं उदयपुर की स्थिति जानता था इसलिए मैंने मांसाहार के बारे में सोचा ही नहीं फिर इतने दिनों के बाद असली राजस्थानी खाने का स्वाद मिल रहा था गट्टे की सब्जी , फाफड़ा , मिर्च बड़ा और सबसे अलग दाल बाटी चूरमा .खाने के बाद हम लोग मुकेश के घर पहुंचे मजेदार बात ये है कि मेरे उदयपुर छोड़ने के बाद मुकेश की अजय से ये दूसरी मुलाक़ात थी खैर देर आये दुरुस्त आये थोड़ी देर रुक कर हम लोग मुकेश की नयी प्रिंटिंग यूनिट देखने डबोक गए जबरदस्त मशीने लगाई हैं मुकेश ने एक मशीन साढे छ करोड की थी सबकुछ मशीन से हो रहा था उसके बाद कार्यक्रम ये बना कि यहीं से थोड़ी दूर पर अजय का फॉर्म हाउस है क्यों न उसे भी देख लिया जाए वो फॉर्म हाउस क्या छोटा जंगल कहूँगा मैं उसे शहर से दूर शांत पर उसमे बने एक छोटे से मकान में शहर की सारी सुविधाएँ थीं तो अजय ने एक प्रस्ताव रखा कि उदयपुर से जाने के पहले एक रात मैं यहाँ रुकूं वैसे अजय को शक था कि मैं शायद ही रात को यहाँ रुक पाऊंगा पर मैंने सहर्ष हाँ कर दी फॉर्म से लौटते लौटते शाम हो चली थी उस दिन रात का खाना हम लोगो ने होटल में ही खाया .अगला दिन काफी व्यस्त रहने वाला था सुबह अजय ने ड्रायवर समेत गाड़ी भेज दी थी जो हमें एकलिंग और नाथद्वारा ले जाने वाली थी एकलिंग नाथद्वारा और हल्दीघाटी ले जाने वाली थी . होटल से निकलते ही मैंने गाड़ी अपने हॉस्टल की तरफ मुड़वा दी हमारा हॉस्टल स्कूल से लगभग एक किलो मीटर दूर था जिसके सामने एक नहर बहा करती थी जो फतह सागर में गिरती थी एक दम सीधा रास्ता देवाली से होकर जाता था पर हम लोग उस रास्ते का प्रयोग नहीं करते थे एक शोर्ट कट था उस से हम लोग आया जाया करते थे अपने अरुणोदय सदन पर ये क्या मैं रास्ता भूल रहा था चारों तरफ मकान ही मकान जिन पहाड़ियों पर से हम गुजरा करते थे वहां कॉलोनी बन गयी थी नहर के उस पार जहाँ सिर्फ जंगल था मकानों की कतारें लग गयी थीं होस्टल शायद अब बंद हो चुका था चारों  तरफ घास कितनी अच्छी बुरी यादों का साथी आज खुद एक याद बन कर खड़ा था कमरों में ताले पड़े थे खट्टे मन से बाहर निकला सब बदल चुका था इसी हॉस्टल में जीवन का पहला नाटक खेला था और पहली बार मंच संचालन किया था और जो वाह वाही मिली थी उसने मेरे जीवन की दशा बदल कर रख दी थी मंच और मुकुल एक दूसरे के पर्याय हो गए जहाँ यारों के कहकहे लगते थे वो ईमारत आज इन्तिज़ार में हैं कहाँ गए वो लोग हमारे वार्डन जोशी साहब अपने घर हल्द्वानी गए थे उनसे मुलाकात न हो सकी अरुणोदय में समय का पहिया लगता है उल्टा घूम गया आगे जाने की बजाय पीछे चला गया सब कुछ अरुणोदय से ऐसे मुलाकात होगी सोचा न था . अरुणोदय के बाद हम चल पड़े इतिहास से मिलने हल्दीघाटी यहीं रास्ते में एक जगह है इसवाल वहां का फाफड़ा बहुत प्रसिद्द हैं तो चलते चलते उसका भोग लगाया फाफड़ा बेसन से बनता है और तली हुई मिर्च के साथ खाया जाता है राजस्थानी मिर्च की खास बात ये होती है ये देखने में तो काफी बड़ी होती हैं पर उतनी कडुवी नहीं होती ऐसी मिर्च का अपना एक अलग स्वाद आता है , हल्दीघाटी मेरा पहले भी देखा हुआ था लेकिन इस बार जो हल्दीघाटी देखा तो लगा हम अब इतिहास से पैसा बनाना सीख गए हैं हल्दीघाटी मुगलों और महाराणाप्रताप की लड़ाई के लिए याद किया जाता है दोनों तरफ पहाड़ी के बीच एक छोटा सा दर्रा जहाँ युद्ध हुआ था उसी जगह वो छोटा सा नाला जो अब सूख चुका है जिसको पार करते वक्त महाराणा का प्यारा घोडा चेतक स्वर्ग सिधार गया था पिछली बार जब मैं हल्दी घाटी आया था करीब २० साल पहले अपने भूगोल के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में जब हमारी पूरी क्लास ने एक रात का कैम्प किया था इसी टूर में अजय ने बस ऐसा भयानक नृत्य किया था जिसे मैं आज तक नहीं भूला हूँ तब बहुत कम पर्यटक यहाँ आया करते थे पर आज एक संग्राहलय यहाँ किसी सज्जन ने बनवा लिया है जिस से वो अच्छा पैसा बना रहे हैं यूँ हल्दीघाटी में ऐसा कोई चिह्न या साक्ष्य नैन है जिस से आप उस युद्ध को याद कर सकें सिर्फ पहाड है और जंगल चेतक जहाँ मरा था वो नाला भी सुख और सिकुड चुका है लेकिन जो नए लोग  आते हैं वो यहाँ बेवक़ूफ़ बनते हैं .फिर तीर्थ यात्रा एकलिंग जी और नाथद्वारा दोनों ही मंदिर बहुत खूबसूरत हैं अपने स्थापत्य के लिए पर इस बार अंदर न जा सके हम गलत समय पर वहां थे भगवान आराम कर रहे थे .वापस उदयपुर में अगला पड़ाव शिल्पग्राम एक खूबसूरत स्थल विदेशियों के लिए भारत के सभी प्रदेशों  के गांव के जीते जागते प्रतिरूप शाम बिताने की अच्छी जगह ...........
शिल्पग्राम 
अजय अपने परिवार के साथ 
जारी 
शिल्पग्राम 




अजय की माता जी 


अजय के भयानक नृत्य की यादें 
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उदयपुर संस्मरण यात्रा :चतुर्थ भाग

श्रीमती पुष्पा शर्मा 
जेहरा मैडम 

 मैं  जब तक उदयपुर में रहा फतेहसागर जाना नहीं भूल शाम को यहाँ भी काफी भीड़ होने लग गयी है और देर रात तक लोग यहाँ अपने परिवार के साथ घूमते रहते हैं फतहसागर तो गुलज़ार हुआ है पर वो शांति जो हमें अपने स्कूल के दौरान यहाँ आकर मिलती थी अब नहीं रही अगले दिन मैंने फैसला किया आज स्कूल चला जाए , अजय चूँकि देर से सोकर उठता है इसलिए उसे बताये बगैर मैं स्कूल पहुँच गया .लग ही नहीं रहा था ये वही इंटर कॉलेज है जहाँ चारों  तरफ रौनक रहा करती थी हँसते खिलखिलाते बच्चे हर जगह दिखते थे .  कैंटीन उजड़ी हुई वेद् प्रकाश शर्मा के उपन्यास से शब्द उधार लूँ तो विधवा की मांग की तरह सूनी सीधे प्रिंसपल रूम की तरफ गया आजकल प्रिंसपल श्रीमती पुष्पा शर्मा हैं जिन्होंने हमें ९.१०.और ११ में इंग्लिश  पढ़ाई थी मुझे उम्मीद कम  थी वो मुझे पहचान पाएंगी हालाँकि सुरक्षित रास्ते के तौर पर मैंने अपनी दाढी ,मूंछे गायब करवा दीं थी जिस से मैं पुराने जैसा लगू वो किसी काम से अपने कक्ष से बाहर निकल रहीं थी मैंने उन्हें देखते ही अभिवादन किया और अपना नाम बताया बस नाम बोलते ही उनके जेहन में हमारा पूरा बैच घूम गया तुरंत उन्होंने अपना सारा काम छोड़ कर मुझसे बात करना शुरू कर दिया मेरी पत्नी जो इस यात्रा में मेरे साथ थीं वो अचंभित सी सारा दृश्य देख रहीं थी बाद में उनकी टिप्पडी थी ऐसा भी कहीं होता है क्या तुरंत पुराने दिनों की याद को ताजा करने का सिलसिला शुरू हो गया जिसमे कैंटीन की ताजी कचौरियों की गर्माहट भी शामिल थीं ,पुष्पा मैडम से मैं उन दिनों सबसे ज्यादा बात किया करता था तभी जेहरा मैडम वहाँ आ गयीं जिन्होंने १० वीं कक्षा में विज्ञान पढाया था फिर बातें और मुलाकातें खूब हुई लेकिन जो तस्वीर मैं विद्या भवन की अपनी दिमाग में बना कर वहां लोगों से मिलने गया था उन सबसे नितांत अलग अनुभव हो रहा था जो दुखद था  वो वक्त अब बीत चुका था जब हम वहां पढ़ा करते थे वो सारे साथी वहां से जा चुके थे बहुत से शिक्षक या तो स्वर्गवासी हो गए थे या सेवामुक्त इन सबके बीच मैं अपने स्कूल को खोजने की कोशिश कर रहा था लेकिन वक्त बदल चुका था और दुनिया भी हमेशा भरा रहने वाला पुस्तकालय खाली  था किताबें कम  हो गयी थीं हमारी संगीत शिक्षिका वहाँ मिलीं उनकी बातों से लगा स्कूल से संगीत जा चुका है .कला की बारीकियां सिखाने वाले नसीम साहब अब बूढ़े हो चले थे इनके हाथ में कैमरा देख कर पहली बार मुझे कैमरे से प्यार हुआ था लेकिन अब की दुनिया पुरानी दुनिया जैसी नहीं थी सब कुछ वैसा ही था कुछ बदलावों को छोड़कर पर न जाने क्यों मैं उन सबसे अपने आप को जोड़ नहीं पा रहा था शायद यही जीवन है जो लगातार चलता रहता है आगे बढ़ता रहता है फिर यादों से जीवन की प्रेरणा ली जा सकती है पर उनसे चिपक कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता हम भी अपने क्लास रूम की ओर बढे न वैसे बच्चे थे न वैसा माहौल सब कुछ ठहरा हुआ, थमा हुआ   विद्या भवन की तरह अजय कहता है १९९३ के बाद स्कूल पीछे लौट गया नए ज़माने से टकराने की हिम्मत देने वाली संस्था का ये कायराना रवैया मुझे नहीं भा  रहा था. पुष्पा मैडम हमारे साथ थीं हालाँकि उन्हें कहीं जाना था फिर भी उन्होंने पूरा वक्त दिया मेरे कुछ प्रिय शिक्षकों में से ज्यादातर अब वहां नहीं थे पर उनकी स्मृतियों के निशान मैं वहां खोज रहा था खत्री साहब और उम्मेद सिंह दोनों अच्छे खिलाड़ी अब नहीं रहे ,रमेश शर्मा सर का भी निधन हो चुका है हाँ मधु मैडम से संक्षिप्त मुलाकात जरुर हुई हर जगह से भोजन का बुलावा घर आओ ढेर सारी बातें करेंगे मैं बेमन से नंबरों का आदान प्रदान कर रहा था मुझे पता था मुझे किसी के यहाँ नहीं जाना ये मेरा तरीका था अपने गुस्से को जताने का मैं तो उस विद्या भवन से मिलने आया था जहाँ जिंदगी का सबसे अलमस्त दौर गुजरा था पर ये क्या ये तो एक ठहरा हुआ संस्थान है
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन 

मैं और अजय स्कूल में 

जिसको न आगे बढ़ने की चाह है और न जिसके पास आने वाली पीढ़ियों को देने के लिए सुनहरे सपने हैं तभी अजय का फोन आ गया वो भी थोड़ी देर में स्कूल में मेरे साथ था अब मेरे साथ एक साथी था जो उन लम्हों को जी सकता है जो अब जीवन में कभी लौट कर नहीं आयेंगे सारी प्रयोगशालों का बुरा हाल था एक वक्त में यहाँ के लैब विश्वाविद्लयों  को टक्कर देते थे भूगोल लैब जहाँ माथुर साब बैठा करते थे वीरान सा पड़ा था माथुर साहब की एक खास बात थी जाडा ,गर्मी या बरसात वो सिर्फ पैंट शर्ट में ही मिलते थे नीली पैंट और हल्की नीली शर्ट किसी ने उन्हें कोट या स्वेटर पहने कभी नहीं देखा मुझे पता चला वो भी सेवा मुक्त हो चले हैं. कैंटीन में कुछ छोटे बच्चे दिखे हमारे वक्त में जूनियर सेक्सन का कोई भी बच्चा वहां जाने की हिम्मत नहीं करता था एसेम्बली हाल सिर्फ अपनी परछाई दिख रहा था वहाँ भी क्लास चलती देख मुझे थोडा अचरज हुआ विद्याभवन में जगह की कमी कभी नहीं रही फिर इस शांत खूबसूरत को क्यों नष्ट कर दिया गया . जेहरा मैडम से मिलने हम लोग जूनियर सेक्सन गए जहाँ कि अब वो इंचार्ज थी वहीं पुष्पलता श्रीमाली मैडम भी मिलीं जिन्होंने कभी हमें संस्कृत पढ़ाई थी वहां से लौटते वक्त जेहरा मैडम की आँखें भर आयें पर न जाने क्यों मुझे कुछ नहीं  हुआ क्या वाकई अब बच्चे संस्कारी नहीं रहे या दुनिया बदल गयी. अजय मेरी पत्नी को उन जगहों के बारे में बता रहा था जिनसे कुछ न कुछ किस्से जुड़े हुए थे पर मैं तो कहीं और था उन यादों में जिसका मैं और ये स्कूल साथ साथ कभी हिस्सा थे एक बारगी मुझे ये लगा कि शायद मुझे स्कूल आना ही नहीं चाहिए था कमसे काम यादों में तो सब कुछ वैसा ही रहता जैसा मैंने छोड़ा था पर अब तो सब बदल जाएगा हमेशा के लिए विद्या भवन अब पहले जैसा नहीं दिखेगा अब वास्तविकता कुछ और है  स्कूल घूमने के बाद मैंने विदा ली
उस जगह से जिसने मेरे व्यक्तित्व निर्माण में एक बड़ी भूमिका निभायी है अलविदा विद्या भवन पता नहीं इस जीवन में दुबारा आना हो या न हो 
पुष्प लता श्रीमाली मेरी संस्कृत शिक्षिका 
जारी ..................
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उदयपुर संस्मरण यात्रा :तृतीय भाग

मोती मगरी महाराणा प्रताप स्मारक 
फतह सागर 
 सुखाडिया सर्कल भी एक प्रमुख चौराहा है इस चौक का नाम राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री मोहन लाल् सुखाडिया के नाम पर है जहाँ खूबसूरत फोव्वारे लगे हैं अब बोटिंग होने लगी है जब हम लोग यहाँ पढते थे  तो होली वाले दिन यहाँ रंग खेल कर इसमें डुबकी लगाते  थे तब ये भी एक शांत इलाका था अब यहाँ भेल पूरी और पाव भाजी और मटका कुल्फी की दुकाने हैं दिन में फिर भी शांति रहती हैं लेकिन शाम होते ही यहाँ अच्छी  खासी भीड़ हो जाती है जैसे लखनऊ में बाग और नगर बहुतायत में हैं उसी तरह उदयपुर में जगहों का नाम सर्कल (सुखाडिया सर्कल ,चेतक सर्कल ) , और पोल (सूरज पोल , चाँद पोल ,हाथी पोल ) पर हैं मैंने जानने की कोशिश की पर इसका कोई सटीक उत्तर नहीं मिल पाया सुखाडिया सर्कल से लगा हुआ है सहेलियों की बाडी ,ये एक उद्यान है जहाँ खूब सारे फोव्वारे लगे हुए हैं उदयपुर के राजघराने की महिलाओं के लिए इस उद्यान का निर्माण किया गया था जहाँ वो अपना मन बहला सकें इस उद्यान की खास बात ये है कि इसमें पम्प या मोटर से फोव्वारों में पानी  नहीं आता इस उद्यान का सीधा सम्बन्ध फ़तेह सागर झील से है वहां पर इकठ्ठा हुए पानी के दबाव से इस उद्यान के फोव्वारे चलते हैं . खूबसूरत जगह है यहीं पर दूसरे दिन अजय से फिर मुलाक़ात हुई वो अपना काम छोड़ कर सिर्फ ये पता करने आया कि सब ठीक है कि नहीं या मुझे कोई परेशानी तो नहीं हालाँकि उदयपुर और यहाँ के स्थल मेरे लिए नए नहीं थे मैं यहाँ के चप्पे चप्पे से वाकिफ था फिर भी वो नहीं माना शाम को मिलने का वायदा करके वो चला गया इसके करीब में भारतीय शिल्प लोक कला मंडल है जहाँ  कठपुतली के शो होते है इसके अतिरिक्त भारतीय लोक कलाओं का अच्छा संग्रहण यहाँ है कठपुतली का शो राजस्थानी भाषा में था जो मुझे थोड़ी बहुत ही समझ में आती है लेकिन शो अच्छा था राजस्थानी भाषा में सा को हा बोलते हैं हम लोग अपने स्कूली दिनों में इसका काफी मजाक बनाया करते थे जैसे ये पूछना सेठ जी साबुन है क्या इसे राजस्थानी में बोलेंगे हेठ जी हाबुन है कई , कई मतलब क्या होता है .बेटी शब्द सभी के लिए समान रूप से प्रयोग होता है यानि लड़का लड़की सभी के लिए एक ही शब्द बेटी एक और वाक्य जिसने मुझे पुराने दिनों की याद दिला दी चल वा  कई बात नईं नईं शब्द नहीं के रूप में बोला जा है  मतलब छोडो यार कोई बात  नहीं आम राजस्थानी भोला और सीधा होता है ये धारणा मेरी पहले भी थी और इस बार की यात्रा में भी मुझे ऐसा ही महसूस हुआ उदयपुर में एक ही मॉल है जहाँ किसी भी हमारे तरफ के भाई के लिए हाथ साफ़ करना बहुत आसान है .दिन भर घूमने के बाद मुझे कोई थकान नहीं थी मैं यहाँ सिर्फ चार दिन के लिए था  और
सहेलियों की बाडी 
भारतीय लोक कला मंडल 
 ऐसे में आराम करने का कोई मतलब नहीं था वैसे भी मैं उदयपुर घूमने नहीं अपने बरसों पुराने मित्र से मिलने आया था .अब बारी थी मोती मंगरी घूमने की जहाँ महा राणा प्रताप ने घास की रोटी खाई थी ऐसा मुझे बताया गया था बरसों पहले एक पहाड़ी पर एक छोटा सा खंडहर नुमा किला है जहाँ महाराणा प्रताप की एक विशाल मूर्ति लगी है इतने सालों के बाद ये जगह भी बदल गयी खूब सारी और मूर्तियां लग गयीं और पार्क बना दिए पहले हम लोग यूँ ही घूमने चले जाया करते थे पर अब कैमरे तक का टिकट था यहाँ से फतह सागर बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ता है पर्यटन एक फलता फूलता उद्योग है इसकी जीती जगती मिसाल है उदयपुर के विभिन्न स्मारक जो कुछ बिक सके बेच डालो संस्कृति इतिहास यही तो वैश्वीकरण है क्या करेंगे गन्दा है पर धंधा है


सुखाडिया सर्कल

जारी .......................................
शाम को हमारे भोजन का इन्तिजाम सुखाडिया सर्कल पर था पाव  भाजी और भेल पूरी अपने जीवन में पहली बार इस यात्रा में खाना हुआ उसके बाद मैंने और अजय ने बर्फ का गोला खाने का निश्च्चय किया राज स्थानी में इसे गोटा बोलते हैं यानि हेठ जी गोटो है कई ,हा हा 

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Thursday, October 21, 2010

उदयपुर संस्मरण यात्रा :द्वितीय भाग

चेतक सर्कल जहाँ पिक्चर हाल भी है 

इस यात्रा पर आगे बढ़ने से पूर्व मैं आपको अजय और अपने स्कूल के बारे में थोडा सा बताता चलूँ मैं विद्या भवन स्कूल में १९८९ से १९९३ तक पढाई की आज तक मैंने अपने जीवन में इतना बड़ा और सुविधाओं वाला स्कूल नहीं देखा ये अलग बात है कि जब हम स्कूल पहुंचे उसकी सुविधाएँ पर्याप्त रख रखाव के खतम होने लग गयी थीं पर विद्या भवन में पूरे व्यक्तित्व विकास पर ध्यान दिया जाता था यानि पढाई –लिखाई के अलावा खेल कूद संगीत शिल्प आदि की सभी सुविधाये थी हाँ पर आप  इसे अनुशासन की कमी कहें या योग्य शिक्षकों का अभाव या विद्या भवन का बच्चों को सिखाने का अपना तरीका किसी बात पर जोर न देना इसलिए जो सीखना चाहता उसके लिए सब कुछ था बड़े बड़े खेल के मैदान होकी  का अलग फुटबाल का अलग बास्केट बाल कोर्ट सब कुछ था ऊपर से प्रकृति का साथ हरियाली शांत इलाका जहाँ आप मौन से एकाकार हो जाएँ पढ़ने के लिए एक बड़ा पुस्तकालय जहाँ दुनिया भर का साहित्य भरा हुआ था अगर कुछ कसर रह जाए तो सेवा मंदिर का पुस्तकालय भी था जो कि विद्या भवन ट्रस्ट का ही था अक्सर मैं सुबह होने वाली असेम्बली (प्रार्थना ) से गायब होकर सेवा मंदिर भाग जाया करता था जहाँ सारे अखबार पढ़ कर लौट आता ये बात तब की है जब हमें विद्या भवन में पढते हुए २ साल हो चुके थे .मुझे आज भी सामूहिक प्रार्थना समय की बर्बादी लगती है खैर ये मेरा मानना है और सब उस से सहमत हों ये जरूरी नहीं सेवा मंदिर पुस्तकालय बहुत ही खूबसूरत एवं व्यवस्थित था वे दिन धर्मयुग और रविवार के आख़िरी दिन थे साहित्य और अख़बारों से मेरा वास्तविक परिचय यहीं हुआ तब हमारे घर में एक अखबार ही आता था वैसे मेरे पिता जी का वश चले तो अब उसकी भी जरुरत नहीं है वहीं मैंने जाना देश और दुनिया कैसे बदल रही है ईराक का कुवैत पर आक्रमण हो या सोवियत संघ का पतन सबसे महत्वपूर्ण  मसला मंडल और कमंडल का उदय उन्हीं दिनों हुआ और मैंने भी खूब पढ़ा लेकिन अब लगता है इस मसले पर ज्यादातर जानकारियां एकपक्षीय थीं अजय से मेरी मुलाकात ११ वीं क्लास में हुई अजय किसी दूसरे स्कूल से आया था मैं भी पहली बार एक ऐसी क्लास में जिसमें शहर वाले बहुसंख्यक थे इस पहले हॉस्टल और शहर दोनों की टक्कर बराबर की रहा करती थी ऐसे में हम हॉस्टल वाले शहर वालों से थोड़ी दूरी बना कर  रहते थे ११ क्लास में सिर्फ ४ लोग ही हॉस्टल वाले थे इसका भी एक कारण था ११ क्लास में ज्यादातर हॉस्टल वासी विज्ञानं विषय की और चले गए और मैंने मानविकी (कला ) विषय लिया हालाँकि मेरे इस फैसले की तत्कालीन मित्रों ने सराहना नहीं की थी पर मुझे अपनी हैसियत पता थी इस तरह शहर के काफी लड़के मेरे मित्र हो गए लेकिन मुझे अजय का साथ ज्यादा अच्छा लगता था हालाँकि वो काफी शरारती था और शिक्षकों को परेशान उसके और उसके अन्य मित्रों का प्रिय शौक था मैं बस मूक दर्शक बन उन स्थितियों का आनंद लिया करता था दिन बीतते रहे और हमारी पढाई चलती रही साथ साथ दोस्ती भी पढ़ने लिखने में ठीक ठाक होने के कारण (ऐसा लोगों का मानना था ) कई स्वार्थी मित्र बन गए जो किसी न किसी बहाने अपना काम करवाना चाहते थे और हॉस्टल के चक्कर काटा करते थे अजय भी हॉस्टल आता था पर मेरे बहुत याद करने पर भी कोई ऐसा वाकया मुझे नहीं यादआया जब अजय हॉस्टल किसी काम से आया हो वो सिर्फ मुझसे मिलने आता था
मेरी चिठ्ठी जिसे अजय ने १५ साल से सम्हाल कर रखा था 
लेक पैलेस 
बातें बहुत सी हैं वो फिर कभी सही पर ११ और १२ में मेरे टॉप करने की खबर मुझे अजय के पत्रों से ही मिली थी १२ वीं के आख़िरी पर्चे के दिन ही हमारा आरक्षण था लखनऊ के लिए इसलिए मैं उस से बगैर मिले चला आया था लखनऊ आकार मैंने उसे दो बार पत्र लिखा था जिसमें एक बार उसका जवाब भी आया फिर हम सब अपनी अपनी जिंदगी में मशगूल हो गए मैंने भी सोचा अजय मुझे भूल गया होगा और अजय ने भी ये मान लिया था कि मैं भी उसे भूल गया ,पर जब इस बार मैं अजय से मिला तो उसने मेरे द्वारा १९९५ में लिखे दोनों पत्रों को दिखाया उन दोनों पत्रों को उसने इतने अच्छे से सम्हाल रखा था कि लगता है जैसे वे कल ही लिखे गए हों (शुक्रिया अजय )हालाँकि उन पत्रों को मैंने १५ साल पहले लिखा था सच सच कहूँ तो मुझे इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं थी क्योंकि मैंने उसे पत्र भी लिखा था ये बात मैं भी भूल चुका था (मुझे सिर्फ एक चिठ्ठी की याद थी ) कभी कभी यूँ ही बैठे बैठे बी एस एन एल की साईट पर उसका नंबर खोजता था पर वो कभी मिला नहीं मुझे लगता था अजय का स्वभाव ऐसा था नहीं कि वो कंप्यूटर से दोस्ती करेगा पर ये नियति का खेल देखिये मना जाता है कि मैं थोडा बहुत कंप्यूटर जानता हूँ पर मैं उसे नहीं खोज पाया और उसने पहले मुझे खोज लिया और फिर मैं उदयपुर में था सिर्फ अजय के लिए दूसरे दिन अजय अपनी पारिवारिक समस्याओं में व्यस्त था इसलिए हम लोगों ने अकेले घूमने का निश्चय किया पहले गुलाब बाग उदयपुर का छोटा सा चिड़िया घर जिसे आप १ घंटे में घूम सकते हैं फिर बारी थी लेक पैलेस और सिटी पैलेस की झील के बीच में बना हुआ एक महल जिसे अब एक होटल का रूप दे दिया गया है जिस से उदयपुर के पूर्व महाराणा के वंशजों का जीवन यापन होता है सिटी पैलेस अधिकारिक रूप से उदयपुर के महाराणाओं का महल रहा है (सिवाय महाराणा प्रताप के वे कभी महल में नहीं रहे अपने द्वारा ली गयी प्रतिज्ञा के कारण ) इसको बनवाने की शुरुवात महाराणा उदय सिंह ने की थी जिन्होंने उदयपुर शहर भी बसाया अपनी झीलों के कारण उदयपुर को भारत का वेनिस भी कहा जाता है इस महल को अब संग्रहालय का रूप दे दिया हो महाराणा के वंशजों ने जिसमे महंगे टिकट पर आप उदयपुर के पुराने इतिहास की झलक पा सकते हैं ध्यान रहे किसी भी तरह के कैमरे को अंदर ले जाने की फीस मात्र २०० रुपये है इस महल का हिस्सा निजी आयोजन के लिए भी दिया जाता है सशुल्क यहाँ जो भी चीजें हैं वो ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ज्यादा पुरानी नहीं हैं विदेशी पर्यटकों के लिए ये बड़े आकर्षण का केंद्र है इसका रखरखाव महाराणा मेवाड़ फाउन्डेसन करता है उदयपुर की झीलों में बने होटलों में अकसर कई रिअलिटी शो की शूटिंग होती रहती है राहुल और राखी का स्वयंवर यहीं हुआ जब मैं यहाँ पढ़ा करता था कई फिल्मों की शूटिंग 
मैं और अजय 
देखने का लुत्फ़ उठाया था जिसमे धर्म संकट , फूल बने अंगारे , खुदा गवाह थीं .अब बारी थी भोजन की मैंने चेतक सर्कल पर भोजन करने का निश्चय किया वैसे यहाँ चेतक सर्कल को चेटक सर्कल बोलते हैं शहर का व्यस्त चौराहा चेटक सर्कल जहाँ अब काफी भीड़ होने लग गयी है पहले ये एक शांत  इलाका था परिवर्तन प्रकृति का नियम है सुना था देखा उदयपुर में
जारी ................
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Wednesday, October 20, 2010

जो महका दे जीवन

पिछले दिनों मैंने जिंदगी का एक नया रंग देखा और हमेशा की तरह उसे फिल्मों की तरह जोड़ दिया हुआ यूँ कि करीब १९ साल के बाद अपने पुराने स्कूल जाना हुआ बगैर किसी कारण बस दिल ने कहा चलो और मैं चला गया वहाँ मुझे अपना एक सबसे प्यारा मित्र मिला जिसे मैंने पिछले १९ साल से नहीं देखा था और न बात की थी  ये अलग बात है कि वो स्कूल के दिनों का मेरा सबसे अच्छा दोस्त था अजय मोगरा  फेस बुक पर जाने से कुछ ही दिन पहले उसने मुझे खोज लिया और जब मैं वहां पहुंचा तो इंसाने रिश्ते का एक नया रंग देखा वो था दोस्ती मुझे लगा ही नहीं कि हम कभी बिछड़े भी थे  और ये फासला १९ साल का हो चुका था उसका प्यार और अपनत्व के आगे मुझे अपने का रिश्ते फीके से लगे . जिंदगी में हमारे पैदा होते ही ज्यादातर रिश्ते हमें बने बनाये मिलते हैं और उसमे अपनी चोइस का कोई मतलब ही  नहीं रहता लेकिन दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता होता है जिसे हम अपनी लाइफ में खुद बनाते हैं  फिर दोस्ती की नहीं हो जाती है दोस्ती तो हो जाती है तो आज बात फिल्म और दोस्ती की फिल्मों ने इश्क ,प्यार और मोहब्बत के बाद किसी मुद्दे पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है वो दोस्ती है “जाने तू या जाने न”  “रॉक ऑन , 'दिल चाहता है' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों में दोस्ती को ही मुख्य आधार बनाया गया है पर दोस्तों को दुवा देता  ये गाना जब आप सुनेंगे तो निश्चित ही आपको अपने सबसे अच्छे दोस्त की याद आ ही जायेगी  एहसान मेरे दिल पर तुम्हारा है दोस्तों ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों (फिल्म :गबन ) इस दुनिया में शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जो अपने दोस्तों का एहसान न मानता हो क्या कहेंगे आप दोस्ती यानी एक ऐसा रिश्ता है, जिसमें प्यार, तकरार, इजहार, इंकार, स्वीकार जैसे सभी भावों का मिक्सचर है जब दोस्ती पर गानों की बात चली है तो सबसे ज्यादा चर्चित गाना शोले का ही हुआ “ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे ,छोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे” दोस्ती है ही रिश्ता ऐसा न इसके लिए न समाज की स्वीकृति चाहिए और न ही मान्यताओं और परम्पराओं का सहारा तभी तो कहा गया है बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा सलामत रहे दोस्ताना हमारा (दोस्ताना )  जरा सोचिये बगैर दोस्ती के हमारा जीवन कैसा होता आफिस ,स्कूल , सिनेमा हाल , रेस्टोरेंट बगैर दोस्तों के कैसे लगते अगर नहीं समझ पा रहे हों तो अपने स्कूल का पहला दिन याद कीजिये जब आपका कोई दोस्त नहीं था या किसी दिन अकेले कोई फिल्म देखने चले जाइए और उसके बाद कहीं बाहर अकेले खाना कहिये फिल्म खुदगर्ज़ का ये गाना शायद इसी विचार को आगे बढ़ा रहा है “दोस्ती का नाम जिंदगी”, पर कभी ऐसा भी हो सकता है कि आपको दोस्ती करनी पड़ती है तो उस मौके के लिए भी गाना है “हम से तुम दोस्ती कर लो ये हसीं गलती कर लो “ (नरसिम्हा )
पर जिंदगी में रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं होते और ये बात दोस्ती पर भी लागू होती है कभी दोस्तों के चुनाव में भी गलती हो जाती है या गलतफहमियों से दोस्तों से दूरी हो जाती है और तब जो होता उसको बयां करता है ये गाना “दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है” (आखिर क्यों ) खैर हर रिश्ता कभी भी एक जैसा नहीं होता और वो बात दोस्ती पर भी लागू होती है  फिर आजकल की भागती दौडती दुनिया में अक्सर इस बात को दोष दिया जाता है कि इस से रिश्तों की संवेदनाएं खतम हो रही हैं पर एक रिश्ता तेज रफ़्तार  दुनिया में आज भी बचा हुआ है वो है दोस्ती क्योंकि ये कुछ मांग नहीं करता दोस्त , दोस्त होते हैं ये शिकायत हो सकती है कि समय की कमी है पर जब दोस्त मिलते हैं तो दोस्ती फिर से जवान हो जाती है तो चलिए किसी दोस्त को याद करते हैं एक एस ऍम एस करके या किसी सोसल नेट वोर्किंग साईट पर जाकर उसे हेल्लो बोलते हैं .
आई नेक्स्ट में २० अक्टूबर को प्रकाशित 

Tuesday, October 19, 2010

उदयपुर प्रवास -प्रथम भाग


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अजय मोगरा 


अठारह साल का वक्त कोई कम तो नहीं होता लेकिन समय का पहिया कब कैसे घूम जाता है ये पता ही नहीं चलता १९९३ में अप्रैल  के महीने में उदयपुर को मैंने अलविदा कहा था उसके बाद बस मन में यही कसक उठती थी कि एक बार जाना है उदयपुर कब पता नहीं लेकिन जाऊँगा भी तो किसके पास न कोई  जान न पहचान पुरानी साथी कहाँ गए होंगे कुछ पता नहीं तब इ मेल और फोन का जमाना भी नहीं था कुछ के पते थे लेकिन जिंदगी की दौड में वो भी कब पीछे छूटते चले गए पता ही नहीं चला और जिंदगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही पहले पढाई खतम हुई फिर नौकरी की आपाधापी हर दिन नयी समस्या लाता निजी जीवन में और व्यावसायिक जीवन में भी सुकून गायब हो गया ऐसे में एक ही चारा है करो या मरो तो मैंने करने की सोची और जीवन की रेस में दौड़ता रहा ये तो नहीं पता कि जाना कहाँ पर जाना है बहुत दूर कहाँ पता नहीं जिंदगी के मायने बदलते गए पर कहीं एक आस थी उस शहर को देखने की जिसे मैं बहुत पीछे छोड़ आया था जहाँ मैंने अपनी जिंदगी के कुछ अच्छे साल गुजारे हॉस्टल की यादें प्रकृति का साथ बोलने की आजादी और न जाने क्या क्या एक दिन ऑरकुट पर एक मित्रता निवेदन देखा हाँ अजय ही था अजय मोंगरा उदयपुर का साथी जल्दी ही उसका नंबर मेरे पास था अब मेरे पास एक बहाना  था उदयपुर जाने का उस जगह को देखने का जिसके सपने अभी भी मुझे आते हैं पर एक डर था पता नहीं अजय कैसे मिलेगा खैर जल्दी ही उदयपुर जाने का टिकट मेरे हाथ में था मेरी फ्लाईट रात के ८ बजे डबोक एयर पोर्ट पर उतर गयी हालांकि मैंने अजय को अपने आने की सूचना दे दी थी पर एक डर था अंदर अगर वो नहीं आ पाया अगर उसे कहीं जाना पड़ा खैर उतरते ही मैंने पहला फोन उसे किया और उसने हमेशा की तरह मजाक किया कि वो नहीं आ पा रहा है लेकिन जल्दी ही उसने मेरे सस्पेंस को खतम करते हुए बताया कि वो बाहर इन्तिज़ार कर रहा है उदयपुर एयर पोर्ट बहुत बड़ा नहीं है मैंने उसे देखते ही पहचान लिया थोडा मोटा हो गया था बाल भी कम हुए थे बाकी वैसे ही था बिंदास जल्दी ही हम उसकी गाड़ी में थे मैं पूरे शहर को अपनी आँखों में बसा लेना चाहता था उदयपुर मेरा उदयपुर जहाँ जिंदगी के मायने बदल गए प्राथमिकताएं बदल गयीं डबोक एयर पोर्ट शहर से करीब २५ किलो मीटर दूर है हमेशा की तरह शांत थोड़ी भीड़ बढ़ गयी थी फिर भी लखनऊ के मुकाबले बहुत शांति मैं गाँव से आये हुए किसी नए व्यक्ति की तरह पूरे शहर को देख रहा था १८ साल में बहुत सी स्मृतियाँ धुंधली हो गयी थीं रास्ते समझ में नहीं आ रहे थे इंसान कितना फ्लेक्सेब्ल जीव है कितनी जल्दी सब कुछ भूल कर आगे बढ़ जाते है पर मैं पीछे लौट रहा था १८ साल पीछे जब मैं उदयपुर को अलविदा कह गया था मैं कार में बोले जा रहा था कितना कुछ सुना देना चाहता था कितना कुछ समझ लेना चाहता था पता नहीं अजय को कैसा लग रहा होगा इसकी मैंने परवाह नहीं की वैसे जिंदगी मैं ऐसे मौके कम ही आये हैं जब मैंने किसी की परवाह नहीं की शायद मिडिल क्लास मेंटलिटी लोग क्या कहेंगे हम चलते चले जा रहे थे जल्दी हम शहर में थे उदयपुर लखनऊ के मुकाबले एक गाँव जैसा है पर अपनी ऐतिहासिक विरासत और झीलों के कारण हमेशा पर्यटकों का प्रिय स्थल रहा है .भोजन करने के बाद अजय ने हमें होटल छोड़ा जहाँ उसने हमारे ठहरने की व्यवस्था की थी रात के १०.३० बज चुके थे पर मुझे न तो सफर की थकान थी और न रात होने का डर हमारा होटल फतह सागर झील के ठीक बगल में था ये झील आज से १८ साल पहले मेरी कितनी शाम की साथी रही है  इसका मुझे खुद अंदाजा नहीं  था बहुत खुश हो तो फतह सागर चले जाओ और बहुत परेशानहो तो भी फतह सागर का किनारा आपका इन्तिज़ार कर रहा होता कभी एक भाई की तरह कभी एक दोस्त की तरह और कभी एक प्रेयसी की तरह फतह सागर झील हमारे स्कूल के ठीक पीछे थी और हम लोग अक्सर उसके किनारे जा कर बैठ जाया करते थे


फतह सागर और ऊपर सज्जन गढ़ का किला 


अरावली सदन यहीं नीचे मेस थी 
 मैं सबसे पहले फतह सागर से मिलना चाहता था वैसे राजस्थान हमेशा एक शांतिप्रिय प्रदेश रहा है हम जब यहाँ पढ़ने आये थे तो अक्सर हमें इस बात पर ताज्जुब होता था कि कैसे यहाँ ५० पैसे घंटा पर सायकिल मिला करती थी वो भी बिना किसी गारन्टी के लोगों को भरोसा था लोगों पर लखनऊ में ऐसी बातें सोचना भी थोडा मुश्किल है फतह सागर पूरा भरा था शायद उसे अंदाज़ा हो गया कोई पुराना बिछड़ा साथी बरसों बाद उससे मिलने आ रहा था यही सोच कर उसका भी दिल भर आया था मुझे बताया गया इस बार उदयपुर में कई साल बाद खूब बारिश हुई और सारी झीलें इस वक्त पानी से लबालब भरी हैं थोड़ी देर फतह सागर पर बैठने के बाद होटल वापस लौट आया उस रात मुझे लगभग एक दशक बाद चैन की नींद आयी जिसमें न कोई सपना था न यूँ ही आँख का  खुल जाना और फिर सारी रात आँखों आँखों में ही काट देने का कष्ट  सुबह जल्दी आँख खुल गयी सोचा चलो फतह सागर को दिन की रौशनी में देखने का लुत्फ़ उठाया जाए और हम पहुँच गए फतह सागर अजय ने ११ बजे आने को कहा था और हमारे पास काफी वक्त था काफी  कुछ बदल गया था फतह सागर का सामने का जंगल और खेत काफी कुछ खतम हो चुका था और सभ्यता के नए जंगल उग आये  थे जिन्हें हम विकास करना कहता हैं उनको देखकर लग रहा था उदयपुर तरक्की कर रहा था पर किस की कीमत पर इसकी फिक्र किसे है आओ विकास विकास खेलें इस खेल में जीत कौन रहा है ये तो पता नहीं पर उदयपुर हार रहा है .अजय ने स्कूल साथ चलने का वायदा किया था लेकिन मैं स्कूल देखने का लोभ नहीं छोड पाया फतह  सागर से एकदम करीब था मैंने सोचा अंदर नहीं जायेंगे बाहर से ही देख लेंगे अंदर अजय के साथ चलेंगे वहाँ पहुँचते ही एक झटका सा लगा एकदम शांत माहौल लग ही नहीं रहा था इतना बड़ा स्कूल जो कभी राजस्थान के शांति निकेतन के नाम से जाना जाता था वो शांत वीरान सा जंगल लग रहा था साथ के सारे होस्टल भी इस बात की गवाही दे रहे थे कि अब शायद यहाँ कोई नहीं रहता है बाहर से चक्कर लगाने के बाद हम अपने होटल लौट आये .
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