Friday, April 18, 2014

नए मीडिया पर चुनाव खर्च की पुरानी समस्या

इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, देश के 24 राज्यों में इंटरनेट उपयोगकर्ता मतदान में तीन से चार प्रतिशत तक का बदलाव लाएंगे। इस बार के लोकसभा चुनाव इस मायने में अनूठे हैं कि वर्चुअल वर्ल्ड प्रचार का नया सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। गूगल ने चुनाव समर्पित एक इलेक्शन हब विकसित किया है। प्रचार के पारंपरिक तरीकों के साथ तकनीक जुड़ रही है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के एक शोध के मुताबिक, इस बार चुनाव में पांच अरब रुपये खर्च किए जाएंगे, जो पिछले चुनाव के खर्च का तीन गुना है। राजनीतिक दल अपनी ऑनलाइन उपस्थिति के ऊपर अपने बजट का दो से पांच प्रतिशत खर्च कर रहे हैं।पहली बार हो रहा यह प्रयोग चुनौतियां व समस्याएं भी ला रहा है। माना जाता है कि सोशल मीडिया टीवी व अखबार से ज्यादा लोकतांत्रिक और निरपेक्ष हैं, पर इस नवजात मीडिया के रेवेन्यू मॉडल का आधार भी विज्ञापनों से होने वाली आय है। इस मुद्दे को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार और उस पर होने वाले व्यय के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इंटरनेट की व्यापकता और पहुंच देखते हुए इन दिशा-निर्देशों से बचकर प्रचार किया जा सकता है, जिससे आयोग को खर्च का वास्तविक आंकड़े मिलना मुश्किल है। हैश टैग और फीड को प्रमोट करने के लिए फर्जी अकाउंट का इस्तेमाल खूब किया जा रहा है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ग्लोबल प्लेटफॉर्म को आधार बनाकर छोटी कंपनियां कमेंट और लाइक का कारोबार कर रही हैं, जिसमें काले धन को खपाया जा रहा है। एक रिपोर्ट में फेसबुक ने खुद माना है कि उसके कुल एकाउंट में से 5.5 प्रतिशत से लेकर 11.2 प्रतिशत तक फर्जी एकाउंट हैं।फेसबुक के कुल प्रयोगकर्ताओं में भारत का स्थान दूसरा है। चुनाव के बाद ऑनलाइन विज्ञापन पर किए गए सारे खर्च का ब्यौरा राजनीतिक दलों को देना होगा। लेकिन इंटरनेट पर बहुत से राजनीतिक दलों के समर्थक अपने-अपने तरीके से अभियान चला रहे हैं, अगर इस अभियान के लिए कोई राजनीतिक दल उन्हें अनाधिकारिक रूप से पैसा दे रहा है, तो फिर उसका हिसाब कैसे लिया जाएगा? फर्जी एकाउंट जहां राजनीतिक दलों के लिए अंडरकवर एजेंट की तरह कार्य कर रहे हैं, वहीं नफरत व सामाजिक वैमनस्य बढ़ने वाले वक्तव्य का इस्तेमाल वोटों के ध्रुवीकरण और गलत जनमत निर्माण में किया जा रहा है। चुनाव के वक्त जहां बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ हो, वहां ऑनलाइन समर्थन से किसी भी प्रत्याशी की स्थिति को बेहतर बताकर उसके पक्ष में वोट जुटाए जा सकते हैं।
आदर्श आचार संहिता के निर्देश राजनीतिक दलों या प्रत्याशियों के लिए है। ऐसे में, वे अपने समर्थकों का इस्तेमाल करके इस आचार संहिता से बच सकते हैं। बेहतर निगरानी तंत्र से ही इससे निपटा जा सकता है। यह काम चुनाव आयोग को करना ही होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
हिन्दुस्तान में 18/04/14 को प्रकाशित 

Wednesday, April 9, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :अंतिम भाग (यात्रा वृतांत )


साथ साथ बहती झेलम 
केसर के खेत 
लेनपुरा में बादाम के पेड़ और केसर के खेत बगल में बहती झेलम नदी पम्पौर पार करने के बाद अब श्रीनगर करीब था.श्रीनगर ,अनंतनाग के मुकाबले रंगीन शहर था.शहर में घुसते ही बादामी बाग पड़ता है कभी यहाँ बादाम के बड़े बाग थे पर अब पूरे क्षेत्र में सेना का कब्जा है.कहते हैं जाड़ों में कश्मीर से रंग चला जाता है उस वक्त प्रकृति के दो ही रंग होते हैं स्याह सफ़ेद पर बसंत के आते आती धरती एकबार फिर सज जाती है सैलानियों का स्वागत करने के लिए.यूँ तो श्रीनगर में घूमने की बहुत सी जगहें थी पर मैंने सबसे पहले हारबन जाने का फैसला किया.रास्ते में कश्मीर के वजीर ए आजम का आधिकारिक आवास भी देखा जो गुपकार रोड पर है.हाँ तो ऐतिहासिक द्रष्टि से मेरे लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था जहाँ चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था हालांकि चौथी संगीति दो जगह हुई थी.एक कश्मीर और दूसरी श्रीलंका,मैं इतिहास का हिस्सा रही उस भूमि को देखना चाहता था उन लम्हों से एक बार फिर से दो चार होना चाहता था जिस विरासत को आज हम सम्हाल रहे हैं ईसा पूर्व पहली शताब्दी जब बौद्ध धर्म पूरे भारत में पाँव पसार चुका था.ऐसी जगह बार बार देखने को कहाँ मिलती है.बारिश अब तेज हो चुकी थी.हमारे ड्राइवर बशीर को ये समझ नहीं आ रहा था कि मैं वहां क्यूँ जाना चाह रहा हूँ क्यूंकि वहां कोई नहीं जाता पर मैं जिद पर अड़ा था,हम एक पतली सी सड़क पर पहुँच के रुक गए आगे का रास्ता पैदल पहाड़ी पर था,बारिश में कोई भी रास्ता बताने वाला नहीं था,पहाड पर चढ़ता चला जा रहा था और रास्ते में पड़ने वाली हर विचित्र सी जगह को हारवन बौद्ध स्तूप समझ कर निहारता था.थोडा आगे जाने पर नीले रंग का चिर परिचित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बोर्ड देख कर लगा कि शायद पहुँच गए पर अभी वो जगह दूर थी अंदाज़े से आखिरकार उस जगह तक पहुँच गए.बारिश के कारण मैं अपना कैमरा नहीं ले गया था इसलिए जल्दी जल्दी मोबाईल से तस्वीरें ली तभी कुछ लोग जो शायद उस जगह की देखभाल के लिए रखे गए थे,वहां आ गए उन्हें उस जगह के महत्त्व के बारे में बिलकुल भी अंदाजा नहीं था बस उन्हें इतना पता है कोई पवित्र जगह है जहाँ कभी बौद्ध लोग पूजा पाठ किया करते थे.मैं भीग के तर हो चुका था और ठण्ड भी लग रही थी पर मुझे खुशी थी कि मैं वहां तक पहुँच गया.उसके बाद हमारा ठिकाना शालीमार और निशात बाग बने ठण्ड और बर्फ के कारण बागों में अभी वैसी रौनक नहीं थी जैसी गर्मी में रहती है पर चिनार के चार सौ साल पुराने पेड़ देख कर ये एहसास हुआ इन पेड़ों ने जहाँगीर के राज से आधुनिक भारत तक का कितना लंबा सफर किया है और आज भी खड़े हैं शान से ,वैसे इन बागों में घूमना ऐसा था जैसे इतिहास आपके साथ चल रहा हो,जहाँगीर कभी यहाँ चले थे ,शाहजहाँ,औरंगजेब फिर अंग्रेज सब यहाँ आये और गए पर ये पेड़ पौधे निरपेक्ष भाव से सबके स्वागत के लिए तैयार रहे.



सामने ही खूबसूरत डल झील थी.एक बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा जिस हिसाब से पर्यटकों की आवाजाही है उस मुकाबले झील बहुत साफ़ है एक पूरा शहर बसा है मैंने झील में घूमते हुए सेना का कैम्प भी झील में देखा,बाजार घर ,स्कूल क्या नहीं था.हमने डल का चक्कर लगाया और चल पड़े हजरत बल देखने.हजरतबल की ये मस्जिद मुस्लिमों के लिए एक बड़े तीर्थ की तरह है.यहाँ मोहम्मद साहब की दाढी का एक बाल सुरक्षित है जिसे सुरक्षा कारणों से साल में सिर्फ दस बार जनता के दर्शन के लिए खोला जाता है.इस मस्जिद को शाहजहाँ ने बनवाया था बाद में इसका जीर्णोद्धार शेख अब्दुल्लाह ने कराया इसका गुम्बद दूर से ही बहुत खूबसूरत दिखता है पर अभी इसकी मरम्मत चल रही थी इसलिए हम इसकी असली खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद नहीं कर पाए.मस्जिद के अंदर पूरी शान्ति थी कुछ हाथ दुवा में उठे थे कुछ अपनी फ़रियाद रो रो कर रहे थे पर माहौल में रूहानी सुकून था.मस्जिद के प्रमुख से मैंने बात की,मैं उनका नाम भूल रहा हूँ.उन्हें ये जानकर नबहुत खुशी हुई कि मैं इतनी दूर से हज़रतबल आया हूँ. हजरतबल के करीब ही सामने कश्मीर विश्वविद्यालय था और मेरा मन मचल गया.कश्मीर के इस विश्वविदयालय देखने को हमने गाड़ी अंदर मुड़वा दी.हरा भर कैम्पस जिसमें विद्यार्थियों की खूब भीड़ थी ,पर छात्र छात्राएं काफी अनुशासित दिखे.इतनी भीड़ होने के बावजूद कोई हल्ला गुल्ला शोर शराबा नहीं.मैं पूछते हुए पत्रकारिता एवं जनसंचार बिभाग पहुंचा अब तक बारिश बंद हो चुकी थी और खिली खिली धूप निकाल आयी थी.धूप का मजा लेने बहुत से लोग बाहर निकाल आये.मैं विभाग के बाहर पहुंचा और विभाग के अध्यक्ष के बारे में पूछा था.
हजरत बल 
विभाग की एक शिक्षिका बाहर ही  खड़ी थी.उन्हें मेरे बारे में जानकर बड़ी खुशी हुई वो बड़े अदब से मुझे विभाग के अध्यक्ष प्रो मसूदी के कक्ष तक ले गयीं.वहां एक कश्मीर के फिल्म निर्देशक भी बैठे थे और फिर क्या बातचीत का सिलसिला शुरू होगया.जब उन्हें लगा कि मैं कश्मीर के दर्द को समझता हूँ और दूध मांगोगे खीर देंगे कश्मीर मांगोगे चीर देंगे टाईप का नहीं हूँ तो उनका दर्द छलका कैसे सेना के जवानों ने कितनी बार उनके साथ बदतमीजी की वो भी उन की उम्र का ख्याल किये बगैर,सबके पास ऐसा कुछ न कुछ था जो सेना से जुड़ा हुआ था.जाहिर है उनके पास एक रोजगार था समाज में हैसियत इसलिए भूल कर आगे बढ़ गए लेकिन दर्द तो गहरा है.उन्होंने मुझे बताया कि सेना का दिखना अब कम हुआ है पर जवान अब भी हैं हाँ वो ऐसी जगहों पर नहीं है जिससे आसानी से उन्हें देखा जा सके बस इतना अंतर आया है उनका मानना था कि सेना खुद ही यहाँ से जाना नहीं चाहती क्यूंकि उससे बड़े आर्थिक हित जुड़े हैं.सही भी जहाँ तक मेरी जानकारी है सेना के बजट का ऑडिट नहीं होता है.किसी भी जवान की कश्मीर पोस्टिंग पर उसके वेतन में अन्य जगह तैनात सैनिक के मुकाबले ज्यादा फायदा होता है ऐसा मुझे बताया गया.प्रो मसूद ने बताया कि ये पीढ़ी जिसे आप कैम्पस में देख रहे हैं इसने बुलबुल की नहीं बम्ब की वाज सुनी है.फिलहाल उपरी तौर पर शांति है पर कब तक रहेगी कोई नहीं जानता.भारत के बारे में इतनी कम जानकारी का आलम ये था कि और प्रदेशों के पोस्ट पेड़ फोन कश्मीर में  काम करते हैं ये उन्हें पता ही नहीं था.शैक्षिक रूप से मुझे कश्मीर विश्वविद्यालय एक विकसित विश्वविद्यालय लगा.मैंने कुछ बच्चों से मुलाक़ात की उनके बनाई समाचारपत्र और शोध्पत्रिका की एक पार्टी मुझे भेंट की गयी और मैंने वहां से विदा ली दोपहर हो चुकी थी और अभी काफी कुछ घूमना था और अगले ही दिन सुबह सुबह जम्मू के लिए कुछ कर देना था.श्रीनगर एक कॉस्मोपॉलिटन शहर है जहाँ खूब भीड़ और सारी बड़े शहर की सुविधाएँ हैं पर मनोरंजन के साधनों  का अभाव है.मशहूर लाल चौक पर लोगों का हुजूम था.फ्लाई ओवर भी मुझे दिखे.श्रीनगर की लालमंडी में एक अनोखा संग्रहालय है जिसे एस पी एस म्यूजियम के नाम से जाना जाता है . जहाँ कश्मीर के इतिहास की बहुत सी जानकारी मिल सकती है पर लोगों को इसके बारे में बहुत कम पता है.संग्रहालय बहुत सम्रद्ध है पर जगह की बहुत कमी है और रखरखाव बहुत खराब यहाँ मैंने मैमथ (लुप्त हो चुकी हाथी की प्रजाति )का अस्थि पिंजर देखा तो डायनासोर के अण्डों का जीवाश्म ,प्राचीन मूर्तियों और सिक्कों का विशाल संग्रह भी है.हम थक चुके थे लौटते वक्त हमने एक चौराहे पर एक टैंक देखा हमें बताया गया कि ये टैंक 1948 में पाकिस्तान की सेना से छीना गया था.टैंक को सजा संवार कर एक चौराहे पर खड़ा कर दिया गया है जो बादामी बाग के करीब है.हम बहुत सी चीजों को छोड़कर वापस अनंतनाग लौट रहे थे जहाँ सौगात का परिवार खाने पर हमारा इंतज़ार कर रहा था.मुझे खुशी इस बात की थी कि मैं लोगों से कह सकूंगा हाँ मैंने कश्मीर देखा है.रात को खाने पर मेरा मनपसंद मांसाहार इन्तजार कर रहा था.मैंने सौगत और भाभी से विदा ली दोस्त से बिछड़ते वक्त थोडा मन भावुक हो उठता है अब पता नहीं कितने सालों बाद मुलाक़ात हो ,फोन पर बात तो कभी कभार हो जाया करती है पर मुझे और सौगात दोनों को फोन पर ज्यादा बात करना पसंद नहीं है.दोनों की जिंदगियां आगे बढ़ रही हैं और यादें पीछे छूट रही हैं.अगला पूरा दिन हमें सड़क मार्ग की यात्रा करनी थी और शाम को हमें ट्रेन पकडनी थी जो मुझे वापस उस दुनिया में ले जाने वाली थी जहाँ से परेशान होकर मैं भागा था लेकिन लौटना तो था,फिर भी रात के ग्यारह बज ही गए .
समाप्त   

Tuesday, April 8, 2014

स्मार्टनेस का नया निशान

आपके शरीर पर कहीं कोई तिल है क्या?अरे तिल बोले तो वो ब्लैक मार्क जो आपकी ब्यूटी को बढा देता है.यानि हर ब्लैक चीज ख़राब नहीं होती.अब इलेक्शन और पौलीटिक्स जैसे सीरियस इश्यू को छोड़कर मैं कहाँ ब्यूटी मार्क जैसी चीजों में पड़ा हूँ.आपकी सोच सही है तो चलिए इलेक्शन की बात करते हैं.आप सबने कभी न कभी वोट जरुर दिया होगा और अगर न दिया हो तो इस बार वोट देने जरुर जाइएगा.हाँ हाँ मुझे पता है कि मैं न तो कोई सेलीब्रिटी हूँ न कोई बड़ा प्लेयर जिसकी बात आप मानें,मैं तो ये रिक्वेस्ट महज इसलिए कर रहा हूँ जिससे आगे जो मैं कहना चाह रहा हूँ वो आप समझ सकें.वैसे आपके चेहरे होंट या चेहरे पर कहीं ऐसी जगह वो प्यारा सा काला तिल है तो आप बड़ा प्राउड फील करते हैं और उस ऊपर वाले को शुक्रिया कहना नहीं भूलते जिसने आपको जीवन दिया,पर वो देश जिसने आपको उस जीवन के अलावा बहुत सी चीजें दी हैं कभी उसको थैंक यू कहने का मन नहीं करता उफ़ मैं फिर भटक गया हाँ तो मैं वोट की बात कर रहा था तो वोट देते वक्त हम सबकी उंगली पर एक निशान लगाया जाता है जो इस बात की तस्दीक करता है कि हमने अपना वोट दे दिया है मतलब स्याही की तरह का एक केमिकल,याद आया आपको हाँ वही,जब आप वोट देते हैं तब उसका रंग नीला होता है और फिर जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं वो काला हो जाता है.अब ये कौन सी बड़ी बात है होता होगा वैसे इससे आपको फर्क क्यूँ पड़े.फर्क तो पड़ना चाहिए क्यूंकि इस दुनिया में कुछ भी यूँ ही नहीं होता अच्छा छोडिये इस बात को ये बताइए कि आप अपना घर और अपने शरीर को साफ़ रखते हैं फिर रोज रोज क्यूँ नहाते हैं या घर में झाड़ू पोंछा क्यूँ करते हैं,इसलिए न कि गंदगी जमें नहीं रोज जब हम नहाते हैं या घर साफ़ करते हैं तो न तो कपडे काले होते हैं न शरीर पर लगने वाले साबुन का झाग.घर और शरीर का तो आपने सोच लिया पर देश के बारे में कब सोचेंगे. क्यूंकि कोई भी चीज हमेशा के लिए साफ़ नहीं रह सकती है गंदगी जीवन का हिस्सा है पर उसे साफ़ किया जा सकता है .इससे ये  प्रूव हुआ कि अगर सफाई नहीं होगी तो गंदगी खेल कर जायेगी अब जब आप सफाई करते हैं तो क्या होता भाई थोड़े बहुत तो हम भी गंदे होते हैं,कपडे गंदे होते हैं और शरीर भी.गंदे शरीर पर जब हम साबुन लगाते हैं तो पहले उसका झाग भी काला होता जैसे जैसे शरीर साफ़ होता जाता है.झाग भी सफ़ेद होता जाता है.कन्फ्यूज मत होइए वोट देते वक्त आपकी उंगली पर लगने वाला वो छोटा सा काला निशान बहुत कुछ कहता है पर हम समझ नहीं पाते.पहली बात गंदगी की सफाई,गंदगी में उतर कर ही की जा सकती है यनि अगर आपको लगता है कि देश की पौलीटिक्स गंदी हो रही है.गलत लोग चुनाव जीत कर आ रहे हैं तो इसमें आपको उतरना ही पड़ेगा.इसका सिर्फ ये मतलब नहीं कि आप सबकुछ छोड़कर राजनीति में कूद पड़ें.आप अपना करियर बनायें पर देश की  गंदगी को लगातार साफ़ करते रहने के लिए  जब भी वोट देने का मौका मिले अपने वोट का इस्तेमाल जरुर करें अगर आप वोट नहीं देंगे तो गंदगी जमा होती रहेगी.मैं आपसे क्रांति करने को नहीं कह रहा आपको बस अपनी उस छोटी सी जिम्मेदारी को निभाना है जिसकी देश हर पांच साल में आपसे उम्मीद करता है .वोट देना है तो देना है जरा सोचिये वो चुनाव कैसा होगा जब शत प्रतिशत वोटिंग होगी.अब एक्सक्यूज मत दीजिये जब आप पासपोर्ट से लेकर पिक्चर के टिकट तक हर जगह लाइन लग सकते हैं तो वोट देने के लिए क्यूँ नहीं.जब वोट देंगे तो आपकी उंगली पर लगा वो ब्लैक मार्क आपको इस बात का एहसास कराएगा कि देश को बेहतर बनाने और देश की सफाई करने में आपने अपना कंट्रीब्यूशन दिया है.अब आप समझ रहे होंगे मैंने शुरुवात में अपनी बात एक छोटे से काले तिल से अपनी बात क्यूँ शुरू की थी.जी वो छोटा सा काला तिल आपको स्मार्ट बना देता है पर स्मार्टनेस फिजीकल एपीरियंस के अलावा एक्शन पर भी डीपेंड करती है तो एक ब्यूटी मार्क ऊपर वाला देता है वो किसे मिलेगा किसे नहीं कोई नहीं जानता पर ये ब्यूटी मार्क हमें देश देता है पर हम उस पर हमें फख्र नहीं होता तो इस बार के इलेक्शन इस वोटिंग इंक के इस ब्यूटी मार्क को फैशन स्टेटमेंट बनाइये खुद भी वोट दीजिये और दूसरों को भी दिलवाइये .
आई नेक्स्ट में 08/04/14 को प्रकाशित 

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :सातवां भाग (यात्रा वृतांत )

रास्ते 
श्रीनगर पहुँचने से पहले कुछ बातें कश्मीरियों को ,प्यारे भोले पर हिन्दुस्तान से जोड़ नहीं पाते अपने आपको पहले आपको शक की निगाह से देखते हैं पर अगर आप उनके दर्द को समझ सकें या उन्हें ऐसा लगता है कि आप उनकी पीड़ा को समझते हैं तो वो अपना दिल खोल देते हैं.कश्मीर समस्या को बगैर कश्मीर देखे वहां के लोगों से बात किये समझा नहीं जा सकता है .हम् में से ज्यादातर लोग कश्मीर के मामले में दिमाग की बजाय दिल का इस्तेमाल करते हैं.उनके अंदर बहुत गुस्सा है भारत को लेकर भले ही उपरी तौर पर आपको न दिखे पर अंदर सबकुछ धधक रहा है और जैसे ही उनको मौका मिलता है वो सड़कों पर कभी कभार दिख जाता है.सेना को लेकर तो बहुत ही ज्यादा हालंकि सेना वहां कई अच्छे काम कर रही है .उसने सड़कें बनवाईं हैं स्कूल खोले हैं पर लोगों का दिल नहीं जीत पायी है .मैंने वहां के संभ्रांत लोगों से लेकर एकदम गरीब तबके से बात की सभी ने स्वागत किया शुरुवात में झिझके पर जब एक बार खुले तो ऐसा लगा उन की जगह मैं होता तो शायद यही सोचता.आपको एक रोचक बात बताऊँ.हम कश्मीर समस्या के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराते हैं.पाकिस्तान एक पक्ष हो सकता है पर सब कुछ उसका किया धरा नहीं है.जम्मू संभाग में ज्यादा भारत पाकिस्तान सीमा क्षेत्र पड़ता है जबकि कश्मीर में कम और जम्मू संभाग में ज्यादा हिंदू लोग रहते हैं पर समस्या कश्मीर में घाटी में ज्यादा है यानि वहां के लोग अभी तक भारत से अपने आप को जोड़ नहीं पाए हैं ये सिर्फ पाकिस्तान की शह नहीं है हाँ वो मौके का फायदा उठा रहा है पर लोग अभी तक नहीं जुड़े हैं उन्हें लगता है उनके साथ धोखा हुआ.1947 में जो उनके साथ वायदा किया गया वो क्यूँ नहीं निभाया गया.ये गुस्सा दबा पड़ा था पर लगातार के कुशासन जिसमे भारत सरकार भी दोषी थी और फिर सेना का अत्यचार ,तलाशी अपने ही लोगों के सामने बेइज्जती ,शर्मिंदगी मिला कर ऐसा गन्दा मामला तैयार हुआ है कि अभी दिल जीतने में सालों लगेंगे.अगर आतंकवाद की घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो कश्मीर में अपराध की दर काफी कम है.छोटे मोटे अपराध को छोड़ दें तो महीनों हो जातें किसी संगीन वारदात को घटे हुए.मैं आपको आगे ऐसे कई किस्से बताऊंगा जिनमें लोगों को बिला किसी वजह के ज़लील होना पड़ा.ऐसा हम लोगों के साथ एअर पोर्ट या अन्य कई जगहों पर होता है पर हम “होता है”कह के अपने काम में मशगूल हो जाते हैं.हमारे पास काम है लोग हैं मनोरंजन के साधन है.उम्मीदें हैं सेना हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है.हमारा कोई रिश्तेदार गायब नहीं हुआ है वो भी पूछताछ के नाम पर इसलिए अगर हम किसी सुरक्षा कर्मी के द्वारा किये गए व्यवहार से प्रताडित होते हैं तो मामला उतना ज्यादा गंभीर नहीं होता पर कश्मीर में जब यही सब कुछ किसी नौजवान के साथ होता है तो अपना ध्यान बंटाने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं होता.मनोरंजन के साधन हैं ही नहीं घाटी के सिनेमा हाल ज्यादातर बंद हो चुके हैं पच्चीस साल में एक पूरी पीढ़ी इसी माहौल में पली बढ़ी उसकी अपनी मनोवैज्ञानिक समस्याए हैं.धार्मिक सांस्कृतिक आधार पर वो अपने आप को पाकिस्तान के ज्यादा करीब पाते हैं.हम अक्सर कहते हैं पकिस्तान के पास है क्या.? पर ज्यादातर लोग आजादी चाहते हैं भारत से.फिलहाल बगैर सेना के कश्मीर की कल्पना करना असंभव है और ये उतना ही सच है जितना कि कश्मीर भारत का हिस्सा है.सरकारी कर्मचारी भी भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में पाकिस्तान का सपोर्ट करते हैं.
                               अब ये ऐसी चीजें जिसे आप सेना या बन्दुक के बल पर नहीं बदल सकते हैं इसके लिए उनका दिल जीतना पड़ेगा.
अवान्तिस्वामी मंदिर के  भग्नावशेष
अवान्तिस्वामी मंदिर के  भग्नावशेष
अगर किसी को लगता है कि अब शांति है या कश्मीर में सब ठीक है तो आप गलतफहमी में है ये ज्वालामुखी बुझा नहीं है अंदर अंदर सुलग रहा है.मैंने सडक मार्ग  से अनन्तनाग जाने का फैसला इसीलिये किया कि मैं ज़मीनी हालात समझ सकूँ.वायु मार्ग ज्यादा बेहतर विकल्प था जब मुझे ज्यादा समय वहां बिताने का मौका मिलता पर जो मैंने देखा और महसूस किया सड़क से जाने में वो नहीं जान पाता.फिलहाल हम श्रीनगर के रास्ते पर थे.अनंतनाग से श्रीनगर की दूरी लगभग 55 किलोमीटर है और पुलवामा नामका एक और जिला रास्ता बीच में पड़ता है.
बैट के कारखाने 

उससे पहले संगम नाम की जगह पर चारों तरफ लकड़ी के कुछ पट्टे अजीब तरह से रखे थे.पता पड़ा पूरे भारत में सबसे ज्यादा क्रिकेट बैट यहीं पर बनते हैं विलो नामक एक पेड़ यहाँ काफी मात्रा में उगता है जो लकड़ी के बैट के लिए सबसे मुफीद होता है.पुलवामा में ही अवान्तिस्वामी मंदिर के भग्नावशेष हैं.यह मंदिर भी मार्तंड मंदिर के आस पास बना विष्णु मंदिर है जिसे राजा ललितादित्य ने बनाया था पर अब ये सिर्फ खंडहर ही मंदिर का वास्तु भी मार्तंड मंदिर से मिलता जुलता है.हालंकि यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यहाँ अच्छा काम किया है यहाँ मंदिर में आने का टिकट लगता है.मंदिरों के मामले में मैंने देखा कि कोई भीड़ नहीं थी जबकि ये पुरातत्व से जुडे हुए स्थल सभी के महत्व के हैं पर शायद लोग कश्मीर यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता देखने आते हैं.पुलवामा कश्मीर की दूध राजधानी है यहाँ का दूध पूरी कश्मीर घाटी में भेजा जाता है सबसे ज्यादा श्रीनगर में .बारिश लगातार हो रही है और हम भीगते ठंडाते पर्यटन का मजा लूट रहे थे.मेरा नोट पैड लगातार भरता जा रहा था.मैं सौगत का आभारी हूँ कि उसे पता था कि मैं किस तरह की यात्राओं  को जीता हूँ इसलिए मेरे काम की चीजें सारी चीजें गाड़ी में डलवा दी गयी थी जब हम निकले थे तो बदली थी बारिश होने का कोई लक्षण नहीं दिख रहा था फिर भी छाता हमारे साथ था.अब हम शहर छोड़ चुके थे चारों तरफ चौड़े खेत दिखाई पड़ रहे थे. ये खेत केसर के थे पर अभी मौसम न होने के कारण हमें केसर को देखने का मौका नहीं मिला.
जारी ......

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :छठा भाग (यात्रा वृतांत )

श्री अनंतनाग मंदिर 
आज बड़ी होली का दिन था और सौगात का परिवार भी अनंतनाग जम्मू से आने वाला था तो कहीं बाहर न जाकर अनंतनाग में ही रहने का फैसला किया गया.पहले हम एक पुराने मंदिर गए होली के हुडदंग में जहाँ देश के अधिकाँश हिस्से  डूबे  थे. होली वाले दिन हमें उस मंदिर में कुछ गुलाल के चिह्न मंदिर में देखने को मिले वास्तव में भारत विविधताओं का देश है.उस मंदिर को देखकर मुझे एहसास हुआ कि एक वक्त यहाँ हिंदू धर्म  मानने वालो की प्रधानता रही होगी और यहाँ नागों की बहुतायत  रही होगी शायद इसी वजह से इसका नाम अनंतनाग पड़ा.मंदिर में घुसने से पहले हमारे साथ जो सुरक्षा गार्ड था. उसने सेना के जवानों को बताया हम मेहमान थे और मंदिर घूमना चाहते हैं तब हमें अंदर जाने दिया गया मंदिर के गेट पर एक बंकरनुमा चेक पोस्ट था उसके बाद मंदिर की शुरुवात होती है.पता पड़ा इस मंदिर के प्रांगण में सी आर एफ के जवान भी डटे हैं ये पता नहीं पड़ पाया कि वो मंदिर की सुरक्षा के लिए रुके हैं या उनकी यूनिट अस्थाई रूप से यहाँ कुछ दिन के लिए है.चारों तरफ मुस्लिम बाहुल्य इलाका बीच में ये मंदिर इस बात का गवाह है कि इतिहास के पन्नों में काफी कुछ बार बार बदला है.मंदिर में सन्नाटा पसरा था कोई पुजारी मुझे नहीं दिखा.कश्मीर के मंदिरों में मुझे एक जलाशय जरुर दिखा जिसमें पहाडो से आता साफ़ पानी इकट्ठा होता रहता है मंदिर के बाहर जलाशय से निकले उस पानी में लोग अपने दैनिक क्रिया क्रम निपटाते दिखे और हाँ उस कुण्ड में बहुत बड़ी बड़ी मछलियाँ भी पली रहती हैं.दर्शानार्थी उन्हें आंटे की गोलियाँ खिलाते और मंदिर में  होने के कारण उनका शिकार नहीं किया जाता तो उनका जीवन बड़े सुकून का होता है.मंदिर की दशा बता रही थी कि उसका जीर्णोधार किया गया है और काम अभी भी जारी है.इस मंदिर के कुंड में नाज जैसी आकृति के पौधे निकले हुए थे.आप तस्वीर में देख सकते हैं. बशीर ने बताया शहर की हर महत्वपूर्ण खाली जगह पर सेना का कब्ज़ा है और ये लोग अब जाने के मूड में नहीं दिखते.हमने कहकहे लगाये मैंने कहा कि आप लोग इतनी अच्छी खातिर करते हैं कि कौन जाना चाहेगा वैसे भी कश्मीर तो जन्नत है.हम शहर घूमने के बाद सौगत के घर पहुंचे भाभी आ चुकी थी ,थोड़ी देर होली की हंसी ठिठोली हुई.उसके बाद मामला फंसा असल में जिस सूर्य मंदिर को हम देख कर आये थे वो असली सूर्य मंदिर नहीं था.इंटरनेट की मदद से उस असली सूर्यमंदिर के भग्नावेशों को ढूढ निकाला गया पता पड़ा पुजारी ने हमें बेवकूफ बनाया असली सूर्य मंदिर उस मंदिर से आठ किलोमीटर दूर पहाड़ी पर मटन नामकी जगह पर है.ये लोग अपने पैसे के चक्कर में उन खंडहरों में जाने नहीं देते क्यूंकि वहां पूजा नहीं होती जबकि ये मंदिर कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी पुराना है.मैं सोच रहा था जम्मू कश्मीर सरकार को अपने टूरिस्ट डेस्टिनेशन की ठीक से बर्न्डिंग करनी चाहिए जिससे श्रीनगर पहलगाम ,गुलमर्ग जैसी जगहों पर से पर्यटकों का बोझ कम किया जाए मैंने इससे पहले राजोरी में भी यही महसूस किया कि यहाँ इतनी खूबसूरत जगहें हैं पर वहां कोई घूमने नहीं आता अब आतंकवादी घटनाओं का वैसा कोई खौफ नहीं अब सूर्य मंदिर के बारे में कितने कम लोग जानते हैं.प्लान ये बना शाम के चार के बजे के करीब इस मंदिर का  चक्कर  लगा लिया जाये.उससे पहले सौगात की अपने कार्यलय में व्यस्तता थी.मैंने उससे कहा अगर उसे समस्या न हो तो क्या मैं इसके साथ कार्यालय चल सकता हूँ.उसने खुशी खुशी मेरे अनुरोध को स्वीकार कर लिया.मैंने एक कोना पकड़ लिया और ये अंदाज़ा लगाने लगा कि यहाँ का प्रशासन कैसे काम करता है.जिलाधिकारी से मिलना बहुत आसान था.लोगों की दरख्वास्त अंग्रेजी और उर्दू में आती मुझे दिखी.अंग्रेजी में बात करने वाले लोग भी जनाब कह के संबोधित करते चूँकि चुनाव नजदीक थे इसलिए लगातार मीटिंग का सिलसिला चल रहा था और मैं अपने नोट्स ले रहा था.मैंने सौगात से किसी इतिहासकार से मिलाने की इच्छा प्रकट की उन्होंने अपने किसी मातहत को तुरंत बुला भेजा.उसने फौरी तौर पर तुरंत हामी भर दी पर मुझे लग गया था ये आदमी कुछ करेगा नहीं और हुआ भी वही शाम तक वो किसी इतिहासकार को न खोज पाया.
           
इस तस्वीर के बोर्ड में देखिये सरदार के आगे S लिखा है 
एक और मजेदार बात सौगत के कार्यालय में अनंतनाग के पूर्व जिलाधिकारियों की उत्तरवर्तन सूची लगी थी उसमें कुछ के आगे MR. लिखा था कुछ के आगे DR. लिखा था पर कुछ नाम के आगे S लिखा हुआ था MR और DR का मतलब तो मैं समझ रहा था पर इस S का मतलब क्या है.सौगत से पूछा जो जवाब मिला वो बड़ा अनूठा है कश्मीर में सरदार के आगे MR या DR न लगाकर S लिखते हैं मतलब सरदार क्या सरदार श्रीमान या डॉक्टर नहीं हो सकते दुबारा विचित्र किन्तु सत्य आप चाहे तो सौगत की तस्वीर के पीछे लगे बोर्ड में इसे खुद भी परख सकते हैं. 

मार्तंड मंदिर के भग्नावशेष

मार्तंड मंदिर के भग्नावशेष

मार्तंड मंदिर के भग्नावशेष
शाम को हम उस असली मार्तंड मंदिर को खोजने चल पड़े जिसके बारे में माना जाता है सातवीं –आठवीं शताब्दी में इसका निर्माण हुआ.ये एक ऐसे पठार पर बना हुआ है जहाँ से पूरी कश्मीर घाटी देखी जा सकती है पर अब इस विशालकाय मंदिर के ही खंडहर ही बचे हैं.उन खंडहरों के बीच जा कर लगा कि जब ये मंदिर अपने भव्य स्वरुप में रहा होगा तो कई किलोमीटर दूर से दिखता रहा होगा पर अब सिर्फ भग्नावशेष बचे हैं जिनकी भी कोई ठीक से देखभाल नहीं है मंदिर को सिर्फ कंटीले बादों से घेरा गया है और भारतीय पुरात्व विभाग का बोर्ड ही ये बताता है कि ये कोई महत्वपूर्ण इमारत है.बारिश हो रही थी फिर भी हमने भीगते हुए मंदिर को पूरा देखा.शाम को एक और अनोखी चीज से हमारा परिचय होना था.चूँकि कश्मीर में खतरनाक वाली ठण्ड पड़ती है इसलिए जो लोग साधन संपन्न लोग होते हैं वो कमरे के नीचे की जगह को खोखला छोड़ते हैं जिससे वहां जलती हुई लकडियाँ डाली जा सकें और फर्श लकड़ी की न बनवाकर उसकी जगह पत्थर लगवा देते हैं जिससे लकड़ी की गर्मी पत्थर में जाती है और पत्थर के ऊपर मोटा कालीन बिछा रहता है जिससे कालीन के साथ –साथ कमरा भी गरम रहता है .ये उपाय आधुनिक उपायों के मुकाबले ज्यादा स्वास्थ्यप्रद होता है .हीटर या ब्लोअर शरीर में पानी की कमी पैदा कर देते हैं जबकि इसमें ऐसा नहीं होता तो दो तीन घंटे तक महफ़िल वहीं सजी और उसके बाद स्वादिष्ट भोजन और कहवा अब हमारे लौटने का दिन करीब आ रहा था तो आख़िरी दिन श्रीनगर घूमने का कार्यक्रम रखा गया.श्रीनगर के लिए हम सुबह आठ बजे निकल गए मौसम ठंडा और सुहाना था.बूंदाबांदी हो रही थी.लोग उठ ही रहे थे मैंने देखा कि सेना के जवान दो दो के समूह में जम्मू श्रीनगर हाइवे पर जा रहे थे मेरे ये पता करने पर ये लोग इतनी सुबह कर क्या रहे हैं पता लगा ये इन का रोज का काम है ये हाइवे की पेट्रोलिंग कर रहे है.रात में अगर किसी ने बम्ब वगैरह रख दिया हो तो उसे खोज लिया जाए उनके साथ बम्ब निरोधक दस्ता और शिक्षित कुत्ते भी थे.अनंतनाग को श्रीनगर से जोड़ने वाला रास्ता चौड़ा हो रहा है.पेड़ काटे जा रहे हैं पर इस विकास की भारी कीमत “ग्रीन टनल” को चुकानी पड़ रही है.ग्रीन टनल का मतलब हरी सुरंग इस रास्ते के दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पेड लगे हैं जिनकी शाखाएं ऊपर आसमान में जुड जाती हैं जिससे सड़क पर ऐसा लगता है कि वो किसी हरे गलियारे गुजर रही है पर रोड चौड़ी करने के कारण एक तरफ के पेड़ काटे जा रहे हैं और ग्रीन टनल इतिहास हो रहा है.
ग्रीन टनल 
बसंत का मौसम होने के कारण पेड़ों  की पत्तियां गिर चुकी थीं इसलिए हम्ग्रीन टनल से गुजरने का वैसा लुत्फ़ नहीं उठा पाए जैसा गर्मियों में श्रीनगर आने वाले सैलानी उठाते हैं.सज्जाद ने आगढ़ किया कि मैं एक बार गर्मियों में जरुर कश्मीर की यात्रा करूँ जब सारे पेड़ पौधे और घाटी के फूलों का लुत्फ़ उठा सकूँ .इस वक्त तो हर जगह बर्फ है.हरियाली का लुत्फ़ तो कहीं भी  उठाया जा सकता है पर ऐसी बर्फ भारत में और कहाँ मिलेगी,सर्दियों में आने का दूसरा फायदा सैलानियों की भीड़ कम रहती है और आप सही मायने में पर्यटन का लुत्फ़ उठा सकते हैं .    जारी .....

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :पांचवां भाग (यात्रा वृतांत )

लिद्दर नदी और पहलगाम के नज़ारे 
बेताब वैली 
हम लोग पहलगाम के रास्ते पर पड़ने वाले मार्तंड मंदिर की तरफ बढ़ चले.बशीर हर मोड के किस्से कहानी से हमें परिचित कराता जा रहा है.रास्ते में कुछ उजाड घरों पर मेरी नजर गयी.मैंने पूछा कि ये क्या उसने बताया ये मकान उन पंडितों के हैं जो आतंकवाद  के दिनों में अपना घर छोड़कर पलायन कर गए थे.मैंने जब उन मकानों की तस्वीरें लेनी शुरू की तो उसने कहा साहब इन मकानों की तस्वीरें मत लो आप हिन्दुस्तान जा कर लोगों को बताओगे कि कश्मीर में बड़ा जुल्म है .मैंने उसकी बात को अनसुना करके तस्वीरें खींचना जारी रखा.फिर उसने एक साफ़ सुथरे पर्याप्त सुरक्षा वाले एक बड़े घर के पास गाड़ी रोक दी,मैंने पूछा कि ये क्या उसने जो बताया वो मुझे अचंभित करने वाला था ये वो मकान थे जो सरकार ने कश्मीरी पंडितों के लिए खुद बना कर दिए थे,मैंने किसी भी मीडिया इस तरह के वाकये का जिक्र पढ़ा ,देखा नहीं था,कुछ परिवार दिखे भी पर मेरे पास उनसे बात करने का वक्त नहीं था.
कश्मीरी पंडितों के खाली मकान 

मैंने एक बात खास देखी जैसे हमारे यहाँ पुर ,नगर जैसे विशेषण मोहल्लों  या रिहाईश के लिए इस्तेमाल होते हैं वैसे यहाँ “बल” का प्रयोग होता है जैसे खन्ना बल,गांदरबल ,हज़रत बल,मैंने इसका कारण जानने की कोशिश की तो जो पता चला वो यह था कि पुराने वक्त में कश्मीर में जगह जगह पानी था या पहाड तो बल उस सूखी जगह को कहते हैं. जहाँ लोग आकर व्यापार करते थे धीरे धीरे लोग वहाँ आकर बसने लोग और उसे सूखे स्थान के नाम के आगे “बल” लग गया.कश्मीर में आपको “बल” काफी सुनने को मिलेगा.अब मार्तंड मंदिर देखने की बारी थी .जाहिर है मंदिर एक ऐसी जगह था जहाँ कभी हिंदू आबादी ज्यादा रहती थी.मंदिर में घुसते मुझे झटका सा लगा मैं किसी प्राचीन स्थापत्य वाले मंदिर की कल्पना कर रहा था पर वहां तो सारा मामला नया था.एक बड़े तालाब की पीछे तीन गुम्बद ,तालाब में खूब सारी मछलियाँ जिनको लोग आंटे की गोलियाँ खिलाते थे और कुछ भी नहीं और पुजारियों का नाटक कहाँ से आये हैं पूजा करवा लो चूँकि मैं मंदिर पर्यटन की द्र्ष्टि से गया था न कि दर्शन करने तो मैंने कुछ तस्वीरें खींची और पुजारी से पूछा कि पुराना मंदिर कहाँ है उसने कहा यही है.
नकली सूर्य मंदिर 
मुझे लगा कुछ गलतफहमी हुई होगी या पुराना मंदिर भूस्खलन में गिर गया होगा उसकी जगह नया बनवाया गया होगा तो वहां से हम पहलगाम के लिए चले अभी तक थोड़ी बहुत सूरज की रौशनी थी पर धीरे धीरे वो रौशनी कम होती गयी और उसकी जगह बदली और धुंध ने ले ली.इसी रास्ते पर “बटकूट” गाँव पड़ा.इसी गाँव के मलिक नामके बाशिंदे ने सबसे पहले अमरनाथ गुफा खोजी थी और उसके वंशजों को अमरनाथ श्राइन बोर्ड आज भी एक निश्चित धनराशि देता है यूँ कहें धन्यवाद कहने का एक तरीका सौगत ने बाद में मुझे बताया कि इस धनराशि को लेकर मलिक के वंशजों में अब मुकदमेबाजी हो रही है.एक बार फिर हम धुंध और बरफ में खो जाने वाले थे.हमारे साथ स्थानीय लिद्दर नदी बह रही थी.गनीमत थी कि नदी नहीं जमी थी बाकी सबकुछ सफ़ेद सिर्फ नदी का पानी बह रहा था बाकी सब कुछ थमा हुआ शांत मैंने खिड़की खोली तो ठंडी हवा ने ऐसा स्वागत किया कि मुझे खिड़की बंद करनी पडी.ये एक ऐसी खूबसूरती है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है.पहलगाम ही वो जगह है जहाँ से “अमरनाथ”यात्रा शुरू होती है.पह्लगाम गर्मियों में अपनी हरियाली के लिए और जाड़ों में बर्फ के लिए प्रसिद्द है.हम घूमते हुए बेताब वैली की तरफ चले.बेताब वैली के नामकरण की अजीब कहानी है मुझे बताया कि अस्सी के दशक में यहाँ बेताब फिल्म की शूटिंग हुई थी.
छड़ी मुबारक यहीं रक्खी जाती है 
 तबसे यह जगह पर्यटन के मानचित्र में उभरी नहीं तो सिर्फ स्थानीय लोगों के अलावा यहाँ कोई नहीं आता पर अब ये एक बड़ा टूरिस्ट डेस्टीनेशन है .मन मोहने वाला द्रश्य सिर्फ लिद्दर नदी एक छोटी सी धार दिख रही थी चारों ओर सिर्फ बर्फ बर्फ मैं थोड़ी देर प्रकृति के इस रूप के साथ रम सा गया.भीड़ भाड़ खूब थी पर जितनी बर्फ हमारे चारों तरफ थी उस हिसाब से ठण्ड नहीं थी.बरफ इतनी ज्यादा थी कि सैलानियों के लिए लोग हाई बूट किराए पर दे रहे थे पर मुझे अपने वुडलैंड पर पूरा भरोसा था दूसरा मैंने फैसला किया कि मैं ज्यादा बर्फ के अंदर नहीं जाऊँगा.कुछ लोग दस रुपये में लकड़ी का डंडा बेच रहे थे जिससे लोग बर्फ में चल सके. नवविवाहित जोड़े काफी दिख रहे थे जो शायद हनीमून मनाने पहलगाम आये थे.अब सोचता हूँ तो लगता है कि मैं वाकई खुशनसीब हूँ ये खूबसूरती देखना कितने लोगों को नसीब होता है दोपहर होने वाली थी हम थोड़ी देर और घूमना चाह रहे थे.हमारे खाने की व्यवस्था होटल मांउट स्नो में की गई थी.तभी सौगत का संदेसा आया कि वो भी पहलगाम आ रहा है फिर क्या अंधा क्या चाहे दो आँखें अब आने वाला था मजा मैंने फैसला किया दोपहर का खाना थोड़ी देर से खाए जाएगा वो भी सौगत के साथ बस फिर क्या हमने बर्फ के मैदानों के चक्कर लगाये पहलगाम गोल्फ कोर्स ,अक्कड़ पार्क सब बर्फ में दबे थे और बगल में लिद्दर नदी बही जा रही थी.सौगत के आते ही हम भोजन पर टूट पड़े पर मुझे “कहवा” ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया.
कहवा का प्याला 
ठण्ड से बचने के लिए कश्मीर में कहवा एक आवश्यक आवश्यकता है कहवा  पाउडर के साथ केशर बादाम पिस्ता वाह वाह.
भूस्खलन वाली जगह का मुआयना 
भोजन के बाद सौगत ने मुझे बताया कि पहलगाम के आगे एक फोरेस्ट पार्क में भूस्खलन के कारण एक गाँव तीन दिन से पूरे शहर से कटा हुआ उसका काम देखने जाना है चलोगे क्या मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी.वहां काम जारी था लगभग डेढ़ सौ लोग गाँव का रास्ता साफ़ करने लगे थे पर मौसम के कारण काम में देर हो रही थी.सौगत को काम पर पहली बार देख रहा था इनको जवाब उनको सांत्वना किसी को डान्ट किसी को प्यार रास्ते में लोगों का काफिला मिला जिसने फ़रियाद की कि प्राइवेट होटल वाले अपने वाहन सड़क पर खड़ी कर रहे हैं जिससे पतली सड़क पर और जाम लग जाता है.समस्या का तुरंत समाधान किया गया.
टेबल टेनिस पर दो दो हाथ करते हम 
शाम ढलने लगी थी और हम अनंतनाग लौट पड़ेशाम का वक्त टेबल टेनिस और बिलियर्ड्स खेल कर बिताया टेबल टेनिस मैंने होस्टल छोड़ने के बाद नहीं खेला था वो शाम वाकई कुछ अजीब थी टेबल टेनिस में मेरी शुरुवात शानदार रही है एक वक्त मैं 6-1 से जीत रहा था पर मैच खत्म होते होते उलटफेर हुआ सौगत ने  मुझे सिर्फ  दो प्वाईंट ही जोड़ने का मौका दिया और मैं हार गया.शाम को मेरी मांग पर मछली की व्यवस्था की गयी मैंने मूली में पकी ट्राउट मछली पहली बार खाई.कश्मीरी वाजवान का यह अनुभव भी शानदार रहा,जैसे हम खाने को दस्तरख्वान बोलते हैं कश्मीर में इसे वाजवान बोला जाता है .एक बार फिर रात के बारह बजे और कश्मीर में एक और सुहाना दिन खत्म हुआ.    जारी ........

                                                                                                   

Monday, April 7, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :चौथा भाग (यात्रा वृतांत )

अनंतनाग की अलसाई सुबह 
अगले दिन सुबह थोड़ी देर से आँख खुली सुबह के आठ बजे थे पर ऐसा लगा पूरा अनंतनाग अभी सो ही रहा है कोई शोर शराबा नहीं सब कुछ थमा हुआ.बाहर बर्फ के ढेर और एक अलसाई सुबह ऐसा लगता है सूरज के दर्शन आज नहीं होने वाले.भारत के अधिकाँश हिस्सों में आज छोटी होली का त्यौहार मनाया जा रहा था पर यहाँ होली का दूर दूर तक कोई नाम लेवा नहीं वैसे मेरे लिए अच्छा ही था.मैं होली से बचने के लिए ही यहाँ भाग आया था.नाश्ते के लिए रात को हमसे पूछा गया था कि हम क्या पसंद करेंगे मैंने साफ़ कहा था कुछ भी हो बस खालिस कश्मीरी होना चाहिए तो सुबह गिर्दा और लवासा (कश्मीरी रोटी) के साथ मक्खन सब्जी के साथ हारून मियां हमारे कमरे पर हाज़िर थे.मेरे पांच दिन के प्रवास में हारून को हमेशा फिरन पहने देखा एकदम भक्ति भाव से उन्होंने हमारी सेवा की.एकदम सच्चे कश्मीरी पता चला वो यहाँ दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं जिसको शायद 130 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मिलते हैं पर खुद्दारी में कोई कमी नहीं,उनसे खूब बातें हुई आतंकवाद और सारे हालात पर उनका मानना था कि शिक्षा से ही समस्याएं दूर होंगी.आतंकवाद के कारण वो पढ़ नहीं पाए वो दूसरी में थे उसके बाद स्कूल नहीं जा पाए उसके पांच साल बाद वो सातवीं कक्षा में स्कूल गए और किसी तरह आठवीं तक पढ़ पाए.उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि वो अपने बच्चे को अनंतनाग के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ने भेजते हैं जहाँ “साहबों के बच्चे पढते हैं” मैंने पूछा फीस के पैसे कैसे लायेंगे वो बोलो मैं सारा दिन सारी रात मेहनत करूँगा पर अपने बच्चे को खूब पढ़ाऊंगा.कश्मीर का पढ़ाई का माध्यम  उर्दू और अंग्रेजी है अब कुछ स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जाने लगी है.जो ड्राइवर हमें अनंतनाग और कश्मीर के अन्य हिस्सों में घुमा रहा था उसके सुन्दर अंग्रेजी में लिखे ई मेल इस बात के गवाह हैं कि जिन लोगों को पढ़ने का मौका मिला है वो अंग्रेजी से भली भांति परिचित हैं.
पहलगाम का रास्ता 
वैसे पिछली रात तय ये हुआ था कि सौगत सुबह हमारे साथ नाश्ता करेंगे और हम उनका इंतज़ार कर रहे थे पर जब दस बस गए तो हमने मौका देख के चौका जड़ दिया यानि नाश्ता कर लिया तब सौगत का फोन आया कि देर तक सोता रह गया यार तुम नाश्ता कर लो मैं गाड़ी भेज रहा हूँ .पहलगाम घूम आओ फिर शाम को मिलते हैं.साहब का आदेश मानना ही था थोड़ी देर में पूरे लाव लश्कर के साथ एक गाड़ी हमारी खिदमत में हाज़िर थी.सौगत चूँकि अपने स्टाफ से ज्यादा परिचित नहीं थे फिर भी उन्होंने विशेष रूप से ऐसे दो लोगों को हमारे साथ भेजा जो उस जगह और वहां के इतिहास से ज्यादा परिचित हों हालंकि ये बात उन्होंने मुझे बाद में बताई पर वो मेरा स्वभाव जानते हैं कि मैं सवाल बहुत पूछता हूँ. बशीर और सज्जाद हमारे साथ थे.पहलगाम अनंतनाग से तीस किलोमीटर दूर है.पहले यह तय हुआ कि यहाँ कोई सूर्यमंदिर है जो कोणार्क से भी पुराना है तो पहले मैंने उसे देखने का फैसला किया.पहली बार अनंतनाग शहर को करीब से देख रहा था.बिजली की समस्या है पर उतनी नहीं जितनी उत्तरप्रदेश में है सड़कें जल्दी टूटती हैं कारण भ्रष्टाचार नहीं हर साल होने वाली बर्फबारी है,बर्फ को हटाने के लिए भारी मशीने इस्तेमाल की जाती हैं जो सड़क को नुकसान पहुंचाती हैं.शहर और आस पास के गाँवों में आने जाने के लिए सूमो टैक्सी के रूप में इस्तेमाल होती हैं.लखनऊ में लाश के वास्ते जैसी बसें यहाँ बहुतायत में दिखीं.गोश्त में ज्यादातर भेंड काटी जाती हैं या मुर्गा ,भेंड का गोश्त बकरे के मुकाबले थोडा सख्त होता है वैसे अगर कोई भी बूढा जानवर काट के पकाया जाए तो उसका गोश्त सख्त होता है.अखरोट खूब होता है यहाँ पचास पैसे का एक अखरोट और सेब अधिकतम तीस से चालीस रुपये किलो,हमें बिलकुल अंदाज़ा नहीं था लखनऊ से चलते वक्त की मार्च के महीने में इतनी ठण्ड और बर्फ झेलनी पड़ेगी और हम इसकी पूरी तैयारी से नहीं आये थे.हमने इसी बहाने बाजार का चक्कर लगाया किसी भी आम हिन्दुस्तानी बाजार जैसा पर ये कश्मीर था सुबह देर से जगता और शाम को जल्दी सो जाता.सड़कों पर फिरन पहने जयादातर पुरुष सड़कों पर दिखते लड़कियां बहुत कम दिख रही थी.मेरा अपना ओबसर्वेशन और लोगों से हुई बात चीत के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँच गया कि कश्मीर में गरीबी नहीं है पर बेरोजगारी बहुत है.कोई भी इंसान भूखा नहीं सोता भीख मांगने वाले लोग कम से कम मुझे तो नहीं दिखे.बाजार हों या मोहल्ले भीड़ भाड़ तो दिख रही थी पर मुझे न जाने क्यूँ ये शहर सूना सूना लग रहा था.हर शहर का अपना एक माहौल होता है शोर होता वो गायब था शहर में एफ एम् स्टेशन था पर कहीं कोई गीत संगीत की आवाज नहीं ये धर्म का मामला था या सभ्यता की निशानी मेरी समझ से परे है. 
क़दमों के निशान
कोई हवा में मोबाईल लहराता कोई गाना सुनता नहीं दिखा.सारे साईन बोर्ड उर्दू या अंग्रेजी में पूरे अनंतनाग में सिर्फ शहर के बाहरी हिस्से में फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया का एक गोदाम ऐसा था जिसमें हिन्दी में खाद्य निगम लिखा था.मकानों में ज्यादा रंग रोगन नहीं किया जाता और उनकी बाहरी सजावट पर भी कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता अधिकतर मकान सूने सूने लगते.सेना के जवान चौराहों पर दिखते हैं पर बहुत ज्यादा नहीं है.पान और गुटखे की दुकाने एकदम न के बराबर हैं पर ऐसा नहीं था कि बिलकुल भी न हों.मैंने एक बात गौर की लोग सिगरेट बहुत पीते हैं इसके पीछे क्या कारण है कोई बताने वाला नहीं मिला पर मुझे लगता है कहीं न कहीं बेरोजगारी से पैदा होने वाला तनाव और सेना की इतने लंबे समय से उपस्थिति इसका कारण हो सकता है.शराब की एक भी दूकान नहीं है. सरकारी आबकारी नीति का पता नहीं पर श्रीनगर में मैंने एक शराब की दूकान को बंकरनुमा दडबे में देखा मुझे बताया गया.इस दूकान को बंद कराने के लिए यहाँ ग्रेनेड हमला किया गया तब से ऐसा हाल है.पर तस्वीर का दूसरा रूख ये है कि अगर मैं अपने सूत्र पर भरोसा करूँ तो अनंतनाग में सत्तर प्रतिशत लोग शराब पीते हैं,विचित्र किन्तु सत्य और सेना अवैध रूप से शराब उपलब्ध कराती है.आम कश्मीरी हिन्दुस्तान के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता कुछ बड़े शहरो के नाम को छोड़कर वे अपनी दुनिया में खुश हैं उन्हें किसी की जरुरत नहीं                                                           जारी ................                                                                        

Friday, April 4, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :तीसरा भाग (यात्रा वृतांत )


गेस्ट हाउस का बाहरी भाग 
कुछ यूँ था बाहर का नजारा हमारे कमरे से 
गेस्ट हाउस के चारों तरफ बर्फ पडी थी हम उसी बर्फ के बीच रास्ता बनाकर अपने कमरे में पहुंचे.मैंने इतने सुंदर गेस्ट हाउस में रहने की कल्पना नहीं की थी. हमारे आने की पूर्व सूचना पर गेस्ट हाउस के केयरटेकर श्री युसूफ जी शाम चार बजे से इंतज़ार कर रहे थे.उन्होंने मुझे बताया कि डी सी साहब (कश्मीर मे डी एम् को डी सी कहते हैं )यानि सौगत ने दो हफ्ते पहले से उन्हें बता दिया था कि उनके कुछ मेहमान आ रहे हैं इसलिए वो अपने घर का काम जल्दी से जल्दी से खत्म करवा लेना चाहते थे पर घर की मरम्मत का काम अभी तक नहीं हो पाया इसलिए हमें इस गेस्ट हाउस में ठहराया गया.मैंने गेस्टहाउस को ऊपर से नीचे तक देखा सारी आधुनिक सुख सुविधाएँ और ठण्ड से बचने का सारा इंतजाम मैं तो उसकी खूबसूरती पर फ़िदा हो रहा  था एक सामान्य इंसान के लिए इस तरह का गेस्टहाउस एक विलासिता ही मानी जायेगी. गेस्टहाउस का वास्तु कश्मीर की शैली का था फर्श और छत लकड़ी की जिससे वो कमरे की गर्मी को बचा सकें और छत त्रिभुजाकार तिरछी जिससे बर्फ छत पर न रुके और नीचे आ जाए.वैसे भी ऐसे क्षेत्र जहाँ बर्फ गिरती है आप वहां के घरों में छत ढूढते रह जायेंगे क्यूंकि घरों में छत नहीं होती है.खैर कमरा गरम और आरामदेह था. मैंने तुरंत स्नान ध्यान किया वैसे ठण्ड इतनी थी कि पानी देखने की हिम्मत नहीं होती पर जब सारी सुविधाएँ हों तो ठण्ड का एहसास कहाँ होना था.गीजर में पानी गर्म था जिससे सफर की सारी थकान छू मंतर हो गई वैसे थकान लगी ही कहाँ थी.चाय इन्तजार कर रही थी पर मैंने युसूफ से कहा कि यदि सौगत का कार्यालय ज्यादा दूर न हो तो मैं वहां तुरंत जाना चाहूँगा.मैं युसूफ से जल्दी छुटकारा पाना चाहता था क्यूंकि इतने लंबे सफर के बाद मैं थोड़ी देर सुकून चाहता था पर वो साहब के सामने अपने नंबर बढ़ाने के चक्कर में मुझे छोड़ने को तैयार  नहीं थे .मैं सौगत से अकेले मिलना चाहता जब सरकारी ताम झाम न हो बस दो दोस्त हों और उनकी बातें पर युसूफ मियां छोड़ें तब न.मैंने उनसे बात चीत का सिलसिला शुरू कर दिया मुद्दा आतंकवाद और अब के कश्मीर के हालात थे.
                       
सौगत और मैं फुर्सत के कुछ पल साथ में 
युसूफ साहब पेशे से इंजीनियर थे.सरकारी सेवा में आने से पहले वो कई विदेशी कंपनियों के साथ काम कर चुके थे.जब उन्हें लगा कि मैं भारत माता का तटस्थ भक्त हूँ और समस्या की जड़ तक जाना चाहता हूँ कि कश्मीर में अभी तक सेना क्यूँ है,लोग अभी तक हिन्दुस्तान से अपने आप को क्यूँ नहीं जोड़ पाए तो उन्होंने खुल कर बोलना शुरू किया वो जब नौ दस साल के थे तब कश्मीर मे आतंकवाद ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए. पहले तो लगा कि ये वक्त भी बीत जाएगा पर वो वक्त इतनी जल्दी नहीं बीता अक्सर सेना घर गाँवों को घेर लेती है और उसके बाद शुरू होता पूछताछ और तलाशी का सिलसिला बहुत बुरा दौर था.कहीं कोई सुनवाई नहीं.एक तरफ आतंकवादी दूसरी तरफ मिलीटेंट.एक अपना किस्सा बताते हुए वो भावुक हो गए बोले मेरी नयी नौकरी लगी थी.मुझे पहली तनख्वाह मिली मैं घर वालों के लिए तोहफे लेकर बस से घर लौट रहा था.जब वो अपने घर के करीब पहुंचे.सेना ने बस को रोक लिया और सबको उतार कर अपने साथ ले लिया.युसूफ फर्राटेदार अंग्रेजी में बोले जा रहे थे.मैं सब कुछ भूल  कर उनके चेहरे के भाव पढ़ रहा था उनके चेहरे पर लाचारी और गुस्से के मिले जुले भाव आ जा रहे थे.वो बोले जा रहे थे “मैंने आर्मी वालों से पूछा मुझे कहाँ ले जाया जा रहा है वो भी अपने घर के इतने करीब आ जाने के बाद पर उन्हें कुछ भी नहीं बताया गया.हालंकि उनके साथ कोई ज्यादती नहीं की गई और तीन घंटे उलटे रास्ते ले जाने के बाद उन्हें इस जवाब के साथ छोड़ दिया गया कि आर्मी का काफिला उधर से गुजरना था और कुछ आतंकवादियों के उसी तरफ होने की आशंका थी.सेना को नहीं पता था कि कौन आतंकवादी है और कौन आम आदमी इसलिए सारे मुसाफिरों को रोक् लिया गया.उन्हें जाड़े की ठंडी रात में अपने घर से इतनी दूर अकेले छोड़ दिया गया कि वो उस  रात दो बजे कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर पहुंचे.वो कश्मीरी मिश्रित हिन्दी में  बोले मिलीटेंट की गलती की सजा मुजे (मुझे) क्यूँ उनको पकड़ो.बात में दम था मुझे भी आते वक्त सेना के ट्रकों और जवानों से परेशानी हो रही थी हालंकि मैं तो कुछ दिन के लिए आ रहा था पर इन लोगों ने दशकों तक इस दौर को झेला है.भले ही सेना कितनी भी सभ्य क्यूँ न हों पर हथियार बंद सैनिक और काफिले मनोवैज्ञानिक रूप से एक दबाव डालते हैं.ये मैंने भी खुद महसूस किया मैंने लखनऊ में कैंट एरिया के अलावा सेना को कहीं नहीं देखा पर यहाँ तो रास्ते में सेना के काफिले दहशत पैदा  करते हैं.हम जिस हाइवे पर आ रहे थे.वहां मैंने देखा कि सेना के काफिले छोटी गाड़ियों को जल्दी पास नहीं देते.सड़क सेना की नहीं है. सड़क सबकी है और उसपर चलने का अधिकार सबका है.जाहिद ने मुझे बताया कि रोज कम से कम पन्द्रह से बीस ड्राइवर सेना के लोगों से सड़क पर पास मांगने की कीमत गालियों और झापड से चुकाते हैं.किसी को भी इस स्थिति से गुस्सा आएगा वो कश्मीर हो या भारत का कोई हिस्सा पुलिस से थोडा बहुत लड़ा भीडा जा सकता है पर जब बात सेना की हो तो डर लगना स्वाभाविक है.आप शायद मेरी बात से इत्तेफाक न रखें पर किसी ऐसी जगह जाइए जहाँ सेना का ज्यादा मूवमेंट हो आपको थोड़ी देर में परेशानी होने लगेगी.युसूफ साहब बोले मेरे पास रोजगार था मैं नहीं बहका पर बहुत से लोग इतने खुशनसीब नहीं थे वो बहक गए.मेरा सीधा सवाल था कि क्या आर्मी के बगैर कश्मीर की कल्पना की जा सकती है वो बोले फिलहाल अभी तो नहीं आगे का अल्लाह जाने.मुझे उनकी साफगोई पसंद आयी.तभी सूचना आयी सौगत थोड़ी देर में वहां पहुँच रहे हैं.मेरी इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं.आठ बजे चुके थे.भूख सी भी लग रही थी तो तय यह पाया गया कि सब सौगत के घर खाना खायेंगे और बाकी की गपशप वहीं होगी.
सौगत के घर की बाद की तस्वीर तब काफी बर्फ हटाई जा चुकी थी 
सौगत के घर की भी वही हालत थी चारों तरफ बर्फ,हमारे गेस्टहाउस और सौगत के घर की दूरी मुश्किल से सात आठ सौ मीटर ही होगी.यह अनंतनाग का सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र था.सौगत अभी जल्दी ही यहाँ आया था इसलिए उसे खुद भी अपने घर के बारे में ज्यादा पता नहीं था हम दोनों ही साथ उस दो मजिले आलीशान घर को एक्सप्लोर करने निकल पड़े.घर के इतिहास के बारे में हमें कोई बताने वाला नहीं मिला पर उसकी बनावट से लगता है कि घर काफी पुराना है.अगर मैं सही हूँ तो ये कश्मीर के राजे रजवाडों के दौर का था जिसमें समय समय पर परिवर्तन होते रहे हैं.खाना खाते रात के बारह बज गए और हमें पता ही नहीं चला.मैंने सौगत से विदा ली.     जारी ......

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :दूसरा भाग (यात्रा वृतांत )

     
बर्फ देख कर रहा नहीं गया 
हम अनंतनाग की तरफ बढे जा रहे थे.सड़क पर जाम के कारण हमारी गाड़ी अक्सर रेंग रेंग कर बढ़ रही थी पर वो जाम कुंठित नहीं कर रहा था शायद आस पास के दृश्य इतने सुंदर थे कि मैं तो उन्हीं में रम सा गया.शायद यही कारण था कि जब भी जाम लगता ड्राइवर लोग एक दूसरे की मदद करते वो भी हंसते मुस्कुराते ज्यादातर सवारी गाड़ियों के ड्राइवर श्रीनगर को देश से जोड़ने वाले इस एक मात्र मार्ग पर चलते हैं इसलिए एक दूसरे से परिचित होते हैं और सडक पर एकदूसरे के हाल चाल लेते रहते हैं.हालांकि सभी कश्मीरी में ही बात कर रहे थे पर उनकी भाव भंगिमा से लगता था कि वो खुश थे अपने अभावों भरे जीवन से.हमारे ड्राइवर जाहिद को उस खतरनाक सड़क पर चलने के महीने के मात्र 4500 रुपये मिलते हैं जो लखनऊ के ड्राइवर के मुकाबले बहुत कम था और जान का जोखिम ज्यादा.जाहिद अनंतनाग में पला बढ़ा नौजवान था जिसका बचपना आतंकवाद के साये में बीता और जवानी सड़क पर बीत रही है उसने कश्मीर के बाहर एक ही शहर देखा वो था दिल्ली जहाँ वो इलाज के सिलसिले में गया था और डर कर वापस आ गया,उसे जो स्वास्थ्य संबंधी समस्या थी उसका सस्ता इलाज कश्मीर में नहीं हो सकता.इतना नरमदिल खुशमिजाज इंसान कैसे 4500 रुपये में अपना जीवन चलाता होगा ये मैं काफी देर तक सोचता रहा.खुद्दारी का आलम ये था कि उसने हमारे साथ चाय वगैरह जब भी पी हमारे लाख कहने पर पैसे नहीं देने दिए.वो बस मुझे यह कह कर निरूत्तर कर दिया कि आप हमारे मेहमान हो और कश्मीरी अपने मेहमान की इज्ज़त करते हैं.
                मुझे उत्तर प्रदेश के ड्राइवर आ रहे थे जो सवारी से चाय पीने के जुगाड में लगे रहते हैं.हम जैसे जैसे धरती के स्वर्ग के करीब होते जा रहे थे सड़क और मौसम दोनों का मिजाज बदल रहा था.सड़क पर हिन्दी उधमपुर के बाद ही गायब होने लग गई मतलब दुकानों के नाम और सड़क पर लगे मील के पत्थर उर्दू और अंग्रेजी भाषा में ही थे.हम हल्की बारिश में बर्फ की चादर में लिपटे पहाड़ों के बीच धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे.मैं बहुत ज्यादा उत्साहित हो रहा था चारों तरफ ऐसे दृश्य थे जो हमेशा मेरी कल्पना में रहे या उन्हें फ़िल्मी परदे पर ही देखा था पर यहाँ तो साक्षात चारों तरफ सब कुछ मेरी आँखों के सामने था.मेरी आदत है यात्राओं में,मैं बहुत कम बोलता हूँ पर मैं लगातार जाहिद से बोले जा रहा था,मुझे ये बिलकुल नहीं लग रहा था कि पिछले 36 घंटे में मैं सिर्फ चार घंटे ही सोया था.अचानक हमारी गाड़ी को रुकना पड़ा हम जवाहर टनल के पास थे और टनल पर गाड़ियों की लाइन लगी थी जिसमें ज्यादातर सेना के वाहन थे क्यूंकि हम जिस तरफ से जा रहे थे उस दिन सामान्य ट्रैफिक बंद था.इससे पहले कुछ फोन खड़ खड़ाये जाते जाहिद ने बताया कि टनल की विद्युत व्यवस्था में कुछ समस्या थी इसलिए टनल को बंद किया गया पर जल्दी ही टनल को खोल दिया गया और हमारी गाड़ी टनल के अंदर प्रवेश कर गई.
जवाहर टनल(सुरंग)
इतनी लंबी सुरंग में चलने का पहली बार सौभाग्य मिल रहा था जम्मू को कश्मीर और सारे देश के सड़क मार्ग से जोड़े रखने का काम पहाड़ों को काट कर बनाई गई  ये ढाई किलोमीटर की सुरंग करती है.एक तरफ आने का मार्ग है दूसरी तरफ जाने का मार्ग अंदर पीले बल्ब टिमटिमा रहे थे थोड़ी थोड़ी दूर पर पब्लिक् फोन बूथ के संकेत जरुर दिख रहे थे पर कोई फोन नहीं दिखा अंदर की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं थी,जगह जगह बिजली के तार लटके और पेंट उखड़ा हुआ था इसके रखरखाव का जिम्मा बी आर ओ यानि सीमा सड़क संस्थान करता है और चौबीस घंटे सेना के जवान मुस्तैदी से पहरा देते हैं.ये सुरंग कश्मीर के निवासियों की जीवन रेखा है सड़क मार्ग से होने वाला सारा व्यापार इसी पर निर्भर है इसलिए सुरक्षा की द्रष्टि से यह सुरंग बहुत संबेदनशील है.जैसे ही हम सुरंग से बाहर निकले जैसे लगा कोई पर्दा खुला अद्भुत दृश्य था.हम सचमुच कश्मीर में प्रवेश कर गए थी चारों तरफ बर्फ से लदे  पहाड क्या शानदार दृश्य था.मैं उसे बयान नहीं कर सकता सिर्फ महसूस कर सकता हूँ.हमारे कश्मीर पहुँचने के दो दिन पहले ही बहुत तगड़ी बर्फबारी हुई थी.मैं लखनऊ में अखबारों के माध्यम से यह जान रहा था कि मार्च के महीने में इतनी बर्फ सालों बाद कश्मीर में पडी और ये बर्फबारी इतनी तगड़ी थी कि एक बार हमारा जाना लगभग टल ही गया पर सौगत ने भरोसा दिया कि एक बार जम्मू पहुँच जाओ उसके बाद कोई दिक्कत नहीं होगी.आप लोगों को बताता चलूँ कि हम जिस दिन जम्मू से अनंतनाग के लिए चले वो सडकमार्ग पिछले सात दिन से बंद था इसलिए हमें उल्टी दिशा में भी जाम ज्यादा झेलना पड़ा.
बर्फ और रास्ता 
बीच-बीच में सौगत खुद भी फोन से हम लोगों की खैर खबर ली जा रही थी और उनका कार्यालय लगातार हमारे ड्राइवर के संपर्क में था.सौगत का मेहमान होने के कारण रास्ते में पड़ने वाले चेक पोस्ट पर हमें कोई समस्या नहीं आयी पर जाहिद ने बताया कि यहाँ की पुलिस भी चेकिंग के नाम बिलावजह गाड़ी रोकती पर्यटकों के सामान की तलाशी लेती है.पर्यटकों को परेशानी न हो इसलिए ड्राइवरों को घूस देनी पड़ती है हाँ घूस का रेट थोडा सस्ता है.कभी कभी बीस रुपैये में भी पुलिस वाले मान जाते हैं.हम बनिहाल से गुजर रहे थे उसके बाद क़ाज़ीगुंड और हमारी मंजिल अनंतनाग जहाँ सौगत हमारे इंतज़ार में थे.चूँकि सौगत को यहाँ आये हुए अभी एक महीना ही हुआ था इसलिए वो भी अकेले थे उनका परिवार जम्मू से होली वाले दिन हमसे जुड़ने वाला था तो दो पुराने दोस्त मिलने वाले थे.अब माहौल एक दम बदल गया था सड़कों पर भीड़ भाड़ एकदम कम हो रही थी.किसी किसी गाँव में चहल पहल दिखी पर गाडियां सिर्फ सड़कों पर दिख रही थी.
फिरन पहने लोग 
किशोर और बच्चे फिरन (कश्मीरी पहनावा ) पहने और अंदर कांगड़ी(अंगीठी) लिए इधर उधर दिख रहे थे.महिलायें और लड़कियां सड़क पर बनिहाल के बाद से बिलकुल भी नहीं दिखी.मैंने कहीं पढ़ा था जिंदगी स्याह सफ़ेद नहीं होती पर यहाँ जो मैं प्रकृति का रूप देख रहा था वो एकदम स्याह- सफ़ेद था चारों तरफ बर्फ और उसके बाद जो कुछ भी था वो चाहे किसी भी रंग का हो, दिख काला ही रहा था चाहे वो पेड़ हों या कुछ और पर इस स्याह सफेद वातावरण में ,मैं जिंदगी के सारे रंग देख रहा था.लोग प्रकृति से लड़ते जूझते जी रहे थे,पहाड़ों का जीवन वैसे भी कठिन होता है,मैं सैलानी बना अपने दोस्त से मिलने जा रहा था.हम संघर्ष के दिन के साथी रहे हैं.हम दोनों ने जो चाहा वो पाया पर वो दिन जो हम जौनपुर में छोड़ आये अब उनदिनों की अलमस्ती को याद करते हैं वो बेरंगे दिन अब रंगीन लगने लग गए हैं.सच है जो बीत जाता है वो बीत तो जाता है पर याद भी आता है.सौगात कश्मीर आ गए ,मैं लखनऊ,हम जो चाहते वो मिल तो गया पर काफी कुछ पीछे छूट गया उसकी कसक कम से कम मुझे तो है ही.पिछली बार जब हम मिले थे उसके बाद लगभग डेढ़ साल बाद हम मिल रहे थे इस बीच मैंने जीवन में काफी कुछ खोया पाया है और सौगत के साथ भी जरुर कुछ ऐसा ही हुआ होगा.इसी खोने पाने का नाम जीवन है.हम काजीगुंड पहुँच चुके थे और उम्मीद कर रहे थे कि शाम के सात बजे तक अनंतनाग पहुँच जायेंगे.बत्तियाँ जल चुकी थी और सडक पर सनाट्टा ऐसी ही बर्फ से भरी सड़क पर हमारी गाड़ी अनंतनाग (खन्नाबल)के सरकारी अतिथिगृह में पहुँच रही थी.
हम अनंतनाग में थे.
जारी .......                   




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