Tuesday, December 13, 2022

इंटरनेट की खतरनाक लत

 एक लड़की थी दीवानी सी जहाँ जाती खुशियाँ बिखेरती नाम था परी दिन भर पढ़ाई करती चिल करती और जरुरत के वक्त इंटरनेट खोलती फिर एक दिन उसे जी नहीं उसे प्यार बिलकुल भी  नहीं हुआ बल्कि उसके एक करीबी दोस्त ने एक नेट इनेबल्ड एंड्रायड फोन भेंट किया फिर क्या उसकी कल्पनाओं को पंख लग गए नए नए एप्स डाउनलोड करना अपने दोस्तों से खूब चैट करना वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया जो इंटरनेट उसकी तरक्की के रास्ते खोल रहा था वो उसके जी का जंजाल बन गया एक दोस्त से बात करो तो दूसरा नाराज चैट पर दिन भर ऑन दिखने से उसके दोस्तों में गलतफहमियां पनपने लग गयीं कि वो दिन भर किसी से चैट करती है फिर क्या उसका आधा दिन उन गल्फह्मियों को दूर करने में और आधा दिन उन  दोस्तों से चैट करने में बीत जाता जो उसके चैट न कर पाने से दुखी थे .

उसे पता ही नहीं पड़ा कि कैसे उसका ये शौक कब लत बन गया.हर दो मिनट में अपना मोबाईल चेक करती कि कहीं कोई मेसेज तो नहीं आया नतीजा उसके करीबी दोस्त उससे दूर हो गए वो बस जितने एप्स हो सकते हैं उन्हें अपने मोबाईल में भर लेना चाहती थी जिससे वो सबसे जुडी रहे  नतीजा एक पढ़ने लिखने वाली लड़की जो अपनी छोटी सी दुनिया में अपने चुनिन्दा दोस्तों के साथ खुश रहा करती थी इंटरनेट के एडिक्शन से कई तरह के दबाव से टूट कर रूखे स्वभाव की हो गयी बात बात में नाराज होने लगी पढ़ना लिखना छूट गया वो कई तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याओं की शिकार रहने लग गयी. रात में अजीब अजीब सपने देखती नींद आँखों से दूर हो गयी जिससे दिन में भी वो उनींदी सी रहती .उसके कई  करीबी दोस्त उससे दूर हो गए.ये महज कहानी नहीं बल्कि आज के यूथ के लाईफ की कडुवी रीयल्टी है.नेट के एडिक्शन के चक्कर में रीयल वर्ल्ड से नाता तोड़कर वर्चुअल वर्ल्ड में जीने वाले आज परी जैसे  लोग हमारे आस पास न जाने कितने मिल जायेंगे.टेक्नोलॉजी वक्त की जरुरत है पर इस जरुरत को हमें अपनी नीड के हिसाब से देखना होगा.हर उम्र और वक्त के हिसाब से टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.पढ़ने लिखने की उम्र में हर वक्त ऐसा कोई संदेसा हर वक्त नहीं आएगा जिसको अगर आप मिस कर गए तो आसमान फट पड़ेगा.फोन पर इंटरनेट के आ जाने से समस्या ज्यादा गंभीर हो गयी है आप लोगों से कनेक्टेड रहें पर हर इंटरनेट के इस्तेमाल में एक डिसीप्लीन रहना बहुत जरूरी है नहीं तो ये शौक कब आपको धीरे धीरे खत्म करने लग जाएगा पता भी नहीं पड़ेगा इसलिए अपने काम के हिसाब से नेट के इस्तेमाल का वक्त तय कीजिये दोस्तों के साथ फन करने का एक निश्चित समय रखिये उसके बाद यदि कोई मेसेज आता है जिसमे हेलो,नमस्ते, क्या हो रहा है जैसे शब्द हों तो  इस बात की परवाह किये बगैर कि सामने वाला क्या सोचेगा जवाब मत दीजिए.आप एक बार इसको अपनी आदत बनायेंगे तो धीरे धीरे ऐसे लोग जो दिन भर ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो उनके खालीवाक्त के साथी बनें आपको संदेसा भेजना कम कर देंगे. बीच बीच में अपने मोबाईल को ऑफ करना सीखिए अपनी सोशल नेटवर्किंग साईट्स को आराम दीजिए जरूरी नहीं कि रोज कुछ न कुछ अपडेट करें थोडा वक्त अपने लिए निकालिए और देखिये दुनिया कितनी खूबसूरत है आपके कितने ऐसे दोस्त हैं जो आपके वर्चयुल साथ के लिए नहीं बल्कि रीयल साथ के लिए तरसते हैं कुछ एस्माय्ली भेज देने से भावनाओं का इजहार नहीं हो जाता इसके लिए किसी रिश्ते को जीना पड़ता है.टेक्नोलोजी को अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए अपनी जरुरत और तकनीक में संतुलन बनाइये तभी आप जिंदगी का सच्चा लुत्फ़ उठा पायेंगे.मैं तो आज अपना स्मार्ट  फोन ऑफ कर अपनी दोस्त से मिलने जा रहा हूँ जो नेट के एडिक्शन से उबरने की कोशिश कर रही है .आप क्या करेंगे जरुर बताइयेगा|

प्रभात खबर में 13/12/2022 को प्रकाशित 

Tuesday, December 6, 2022

समाज को कहाँ ले जायेगी सोशल मीडिया रील्स

सोशल  मीडिया साईट्स ने हमारे हमारे जीवन को एक इवेंट में तब्दील करके एक आम इंसान को सेलीब्रेटी होने का एहसास करवाया |जहाँ उसे अपने दैनिक जीवन में होने वाले घटनाक्रम को लोगों के साथ साझा करके अपने ख़ास होने का एहसास हुआ|जहाँ जन्मदिन से लेकर शादी तक सब कुछ भव्य तरीके से साझा किया जा रहा था ,लेकिन फिर भी कुछ कमी थी |हम सेलीब्रेटी जैसा महसूस तो कर रहे थे पर हम सेलेब्रेटी थे नहीं |इस कमी को पूरा किया रील ने जिसकी शुरुआत टिक टाक से हुई पर उसके बैन होने  के बाद उसकी जगह इन्स्टा ग्राम रील ,यू ट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक रील जैसे कई एप्स  ने ले ली| शार्ट वीडियो एप्स की जिस कहानी की शुरुआत टिक टोक से शुरू हुई थी जून 2020 में उसके बैन होने के बाद एक लंबा रास्ता तय कर चुकी है |एम् एक्स शोर्ट विडियो, मौज ,जोश ,चिंगारी,मित्रों जैसे एप भी इस दुनिया में तहलका मचाये हुए हैं | युवाओं और किशोरों में शोर्ट वीडियो बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाईट एप्स की  बढ़ती लोकप्रियता का बड़ा कारण बढ़ती फेक न्यूज की आमद और चारित्रिक हनन की कोशिशों के बीच लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साईट्स ट्विटर और फेसबुक पर उपभोक्ताओं का अनुभव अब उतना सुहाना नहीं रहा| जितना आज से कुछ साल पहले रहा करता था |ऐसे में वो उपभोक्ता जो समाचार और राजनीति से इतर कारणों से सोशल मीडिया पर थे एक विकल्प की तलाश में थे जिसकी भरपाई  रील्स   ने बखूबी कर दी |आज हर कोई रील बना रहा है |स्कूल जाते बच्चों से लेकर बड़े फिल्म स्टार्स तक |अब अपनी कहानी खुद सुनाने का दौर है |

 दुनिया के दूसरे सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते इंटरनेट यूजरबेस को होस्ट करने वाले देश में  जहाँ हर कोई कैमरे के सामने सेलेब्रेटी बनना चाहता है, जहाँ फ़िल्में उनके सम्वाद और गाने  हमारे जीवन में इस हद तक घुसे हुए हैं कि कि उसके बगैर जीवन की कल्पना करना मुश्किल  है, वहां रील्स की सफलता आश्चर्यजनक नहीं है |

2016 में रिलायंस जिओ के लांच के बाद सस्ते डाटा के युद्ध ने इसको भारत में पाँव पसारने का बेहतरीन मौका  दिया | कोई भी जिसके पास एक स्मार्ट फोन इंटरनेट कनेक्शन के साथ है अपना नाचता गाता वीडियो अपनी भाषा में  बना सकता  है|जिसमें तस्वीरें शब्द और सुंदर वीडियो इफेक्ट भी आसानी से पिरोये जा सकते हैं|

रेड्शीर कंसल्टिंग फर्म की रिपोर्ट एंटरटेनमेंट एंड एडवरटाइजिंग राइडिंग द डिजीटल वेव के अनुसार वीडियो के ये लघु संस्करण फेसबुक और गूगल के बाद दूसरा सबसे बड़ा सेगमेंट है जहाँ लोग सबसे ज्यादा समय बिता रहे हैं |

शोर्ट वीडियो बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाईट एप्स के यूजर्स की संख्या साल 2025 तक 650 मिलीयन हो जायेगी |इसी रिपोर्ट के अनुसार शार्ट वीडियो एप्स आने वाले वक्त में ओ टी टी वीडियो कंटेंट को भी पछाड़ देगा |

डिजीटल विज्ञापनों की दुनिया में वीडियो के ये लघु संस्करण तेजी से अपने एजगाह बना आरहे हैं |साल 2019  से 2022 के बीच यह सेगमेंट 44  प्रतिशत की रफ़्तार  से बढ़ा |इसका कारण टियर टू शहरों में इंटरनेट का फैलाव है जिसने एक नयी मार्केट पैदा की है जहाँ ब्रांड उपभोक्ता तक सीधे पहुँच बना रहे हैं |हालाँकि मुद्रीकरण के लिहाज से भारत अभी बहुत शैशवावस्था में है लेकिन माना जा रहा  है कि डिजीटल विज्ञापन राजस्व का यह ढांचा आने वाले वर्षों में बहुत तेजी से बदलेगा |ब्रांड और एन्फ्लयून्सेर्स रील के माध्यम से अपने उत्पाद  को लोकप्रिय बना रहे हैं|जाहिर सी बात है इन रील्स को बनाने में किसी बड़े प्रोडक्सन हाउस की मदद नहीं ली जा रही है |इसका बड़ा कारण रील बनाने के प्लेटफोर्म का आसान इंटरफेस होना|जिसके लिए किसी को तकनीक के महारथ होने की जरुँरत नहीं है |

लेकिन कुछ सवाल ऐसे भी हैं जिनके जवाब अभी खोजे जाने हैं उसमें पहला मुद्दा निजता का है |टियर टू शहरों  से आने वाले रील वीडियो ज्यादातर लोगों के निजी परिवेश को ही  दिखा रहे हैं |वो कहाँ रहते हैं क्या करते हैं उनके परिवार के सदस्य कौन -कौन हैं |काफी कुछ इनमें दिख जा रहा है |दूसरा मुद्दा है अश्लीलता का अपने रील्स प्लेटफोर्म को लोकप्रिय बनाने के लिए लोग सॉफ्ट पोर्न और अश्लील चुटकुलों का सहारा ले रहे हैं |दूसरों के कंटेट को एडिट कर के अपना बना लेने की कोशिश यहाँ भी खूब  हो रही है |

अपनी रील में इंटरनेट पर पहले से मौजूद किसी मजाकिया क्लिप का इस्तेमाल करना नैतिकता द्रष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है |कोई व्यक्ति रोड क्रोस करते वक्त मेन होल में गिर जाता है और उसका फन्नी  वीडियो  किसी शार्ट वीडियो एप की मदद से इंटरनेट पर वायरल हो जाता है और फिर अनंतकाल तक के लिए सुरक्षित भी हो जाता है |क्या वह वीडियो उस व्यक्ति से अनुमति लेकर किसी एप पर डाला गया |जिसको देख कर हम कहकहे लगा रहे हैं |इंटरनेट के फैलाव ने बहुत सी निहायत निजी चीजों को सार्वजनिक कर दिया है|ये सामाजिक द्रष्टि से निजी चीजें जब हमारे चारों ओर बिखरी हों तो हम उन असामान्य परिस्थिति में घटी घटनाओं को भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा मान लेते हैं जिससे एक परपीड़क समाज का जन्म होता है और शायद यही कारण है कि अब कोई दुर्घटना होने पर लोग मदद करने की बजाय वीडियो बनाने में लग जाते है कि न जाने उस वीडियो का कौन सा हिस्सा क्लिप बन कर हमारे आस -पास घूमने लगे | अंत में सबसे बड़ा मुद्दा रील देखने में समय की बरबादी का है जिसमें दर्शक कोल्हू के बैल की तरह चलता तो बहुत है पर पहुंचता कहीं नहीं है |इंटरनेट की दुनिया में बिखरी हुई रील्स में फूहड़ चुटकुले ,दूसरों को तंग करने वाले मजाक का ज्यादा बोलबाला है |आने वाले वक्त में जैसे जैसे इन रील्स के दर्शक समझदार होते जायेंगे इन पर आने वाला कंटेंट भी बेहतर होगा |ऐसी उम्मीद की जा सकती है |

नवभारत टाईम्स में 06/12/2022 को प्रकाशित 

Saturday, November 26, 2022

तकनीक है असली खलनायक


 

श्रद्धा हत्याकांड यूँ तो महिलाओं के प्रति होने वाले वीभत्स अपराधों में से एक माना जाएगा |इसकी समाज शास्त्रीय विवेचना में हम इस हत्याकांड में तकनीक के हस्तक्षेप को नजरंदाज नहीं कर सकते | मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास में किसी और चीज ने नहीं बदला है ,यह बदलाव बहु आयामी है बोल चाल  के तौर तरीके से  शुरू हुआ यह सिलसिला  खरीददारी  ,भाषा  साहित्य  और  हमारी अन्य प्रचलित मान्यताएं और परम्पराएँ  सब  अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह बदलाव इतना  तेज है कि इसकी नब्ज को पकड़  पाना समाज शास्त्रियों  के लिए भी आसान नहीं है  और  आज इस तेजी  के मूल में “एप” ( मोबाईल एप्लीकेशन ) जैसी यांत्रिक  चीज  जिसके माध्यम से मोबाईल  फोन में  आपको किसी वेबसाईट को खोलने की जरुरत नहीं पड़ती |आने वाली पीढियां  इस  समाज को एक “एप” समाज के रूप में याद  करेंगी जब  लोक और लोकाचार  को सबसे  ज्यादा  “एप” प्रभावित कर रहा  था |

हम हर चीज के लिए बस एक अदद “एप” की तलाश  करते हैं |जीवन की जरुरी आवश्यकताओं के लिए  यह  “एप” तो ठीक  था  पर  जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं |स्टेइस्टा सर्वे कंपनी के अनुसार इंटरनेट पर जितने लोग एक्टिव हैं, उनमें से तीन प्रतिशत फिलहाल ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स या साइट का इस्तेमाल कर रहे हैं. 2025 तक इसकी संख्या बढ़कर 4.3 प्रतिशत हो जाएगी. वर्तमान में भारत में ऑनलाइन डेटिंग सेगमेंट में 53.6 करोड़ डॉलर का कारोबार हो रहा है. यह कारोबार 17. 61 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ रहा है. इन आंकड़ों से भारत में डेटिंग ऐप्स के भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन इस तस्वीर का एक और भी पहलू है |


इन डेटिंग एप से बनने वाले सम्बन्धों की कोई सामाजिक स्वीकृति नहीं रहती | डेटिंग एप से पहले सम्बन्ध साथ पढ़ाई लिखाई करने ,मोहल्ले या फिर साथ कम करते वक्त  की परिधि में बनते थे जिसमें काफी कुछ समानता हुआ करती थी |भले ही ये सम्बन्ध निजता के दायरे में आते थे पर आस -पास के लोगों को इनके बारे में एक अंदाज़ा हुआ करता था |यह अंदाजा बात बिगड़ने की सूरत में एक ढाल का काम किया करता था | श्रद्धा हत्याकांड अपने आप में एक बानगी है कि इंटरनेट की दुनिया में लगातार विचरने वाली युवा पीढी कितनी अकेली होती जा रही है |चैटिंग एप के स्क्रीन शॉट वायरल हो जाने की संभवनाओं के चलते लोग इस पर अनौपचारिक और अन्तरंग चर्चा करने से बचते हैं |मिल जुल के समस्याओं को समझाने का वक्त किसी के पास नहीं है | क्या डेटिंग ऐप्स पर मिले लोगों को एक-दूसरे के बारे में ज्यादातर जानकारी नहीं होती है?

सिर्फ नाम पता और तस्वीर देखकर मुलाक़ात तय कर ली जाती हैं और फिट उन मुलाकातों में जो कुछ दिख रहा है वो कितना असली है |इसकी गारंटी कोई भी नहीं ले सकता क्योंकि डेटिंग एप्स पर आने वाले  लोगों का कोई वेरिफिकेशन नहीं होता है और इसी बिंदु से असली समस्या शुरू होती है |नेटफ्लिक्स पर “द टिंडर स्विंडलर” वृत्तचित्र एक ऐसी ही सच्ची घटना का प्रस्तुतीकरण है जिसमें एक व्यक्ति अपने इन्स्टाग्राम अकाउंट के जरिये महिलाओं को ठगता है |चूँकि डेटिंग या रिश्ते जैसी चीजें वैसी भी बहुत निजी तरह का मामला होता है फिर उसमें असफलता जैसी चीजें लोग अपने अभिन्न मित्रों से बताने में संकोच करते हैं |सोशल मीडिया और डेटिंग एप जैसा प्लेटफोर्म पर अपनी पीड़ा रखना या मदद मांगना तो दूर की बात है |ऐसे में कोई भी व्यक्ति जो रिश्तों में ईमानदार नहीं है उसका मायाजाल चलता रहता है और उसकी वास्तविकता कभी सबके सामने नहीं आ पाती |

ट्रूली मैडली, वू ,टिनडर,आई क्रश फ्लश और एश्ले मेडिसन ,बम्बल जैसे डेटिंग एप भारत में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं जिसमें एश्ले मेडिसन जैसे एप किसी भी तरह की मान्यताओं को नहीं मानते हैं आप विवाहित हों या अविवाहित अगर आप ऑनलाईन किसी तरह की सम्बन्ध की तलाश में हैं तो ये एप आपको भुगतान लेकर सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है |

हालंकि डेटिंग एप का यह कल्चर अभी मेट्रो और बड़े शहरों  तक सीमित है पर जिस तरह से भारत में स्मार्ट फोन का विस्तार हो रहा है और इंटरनेट हर जगह पहुँच रहा है इनके छोटे शहरों में पहुँचते देर नहीं लगेगी |पर यह डेटिंग संस्कृति भारत में अपने तरह की  कुछ समस्याएं भी लाई है जिसमें सेक्स्युल कल्चर को बढ़ावा देना भी शामिल है |वैश्विक सॉफ्टवेयर एंटी वायरस  कंपनी नॉर्टन बाई सिमेंटेक के अनुसार ऑनलाइन डेटिंग सर्विस एप साइबर अपराधियों का मनपसंद प्लेटफार्म बन चुका है। भारत के लगभग 38 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि वह ऑनलाइन डेटिंग एप्स का प्रयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति  जो मोबाइल में डेटिंग एप रखते है, उनमें से करीब 64 प्रतिशत  महिलाओं और 57 प्रतिशत  पुरुषों ने सुरक्षा संबंधी परेशानियों का सामना किया है। आपको कोई फॉलो कर रहा है, आप की पहचान चोरी होने के डर, के साथ-साथ उत्पीड़ित और कैटफिशिंग के शिकार होने का खतरा बरकरार रहता है।

राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप में 26/11/2022 को प्रकाशित 

Tuesday, November 22, 2022

आंकड़ों की सुरक्षा का सवाल

 


इन्फोमोनिक्स की दुनिया  आंकड़ों से ही जुड़ी है |डाटा आज की सबसे बड़ी पूंजी है यह डाटा का ही कमाल  है कि गूगल और फेसबुक जैसी अपेक्षाकृत नई कम्पनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कम्पनियां बन गयीं है|डाटा ही वह इंधन है जो अनगिनत कम्पनियों को चलाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं |वह चाहे तमाम तरह के एप्स हो या विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साईट्स सभी उपभोक्ताओं  के लिए मुफ्त हैं |असल मे जो चीज हमें मुफ्त दिखाई दे रही है |वह सुविधा हमें हमारे संवेदनशील निजी डाटा के बदले मिल रही है |इनमे से अधिकतर कम्पनियां उपभोक्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए  गए आंकड़ों को सम्हाल पाने में असफल रहती हैं| जिसका परिणाम लागातार आंकड़ों की चोरी और उनके  दुरूपयोग के मामले सामने आते रहते हैं |साल 2020 में फेसबुक ने लगभग  छियासी बिलियन डॉलर और गूगल ने एक सौ इक्यासी  बिलियन डॉलर विज्ञापन से कमाए | सारी दुनिया में आज खोज का पर्याय बन चुकी कम्पनी का नाम है गूगल | गूगल इंटरनेट का प्रवेश द्वार है और खोज-विज्ञापन के बाजार में यह विशालकाय है।गूगल लगातार हमारे जीवन में घुसपैठ बढाता रहा सर्च इंजन से शुरू हुआ सफर ई मेल फोटो वीडियो और न जाने कितनी सेवाओं को जोड़कर हमारे जीवन को आसान करता रहा | लेकिन गूगल और उस जैसी टेक कम्पनियों का एक और चेहरा है जो अपने मुनाफे को बढाने के लिए लगातार अपने उपभोक्ताओं की निजी जानकारियों का अनाधिकृत इस्तेमाल करता है |ताजा मामला अमेरिका का है जहाँ  अमेरिका के 40 राज्यों ने गूगल  पर  बड़ी कार्यवाही  करते हुए भारी भरकम जुर्माना लगाने का फैसला  किया है| मिशिगन के अटॉर्नी जनरल डाना नेसेल के ऑफिस ने इस मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि चालीस  राज्यों ने गूगल पर यह कार्रवाई लोकेशन ट्रैकिंग केस में की है| कंपनी पर यह आरोप लगा था कि वह लोकेशन ट्रैकिंग प्रैक्टिस के जरिए ग्राहकों को गुमराह कर रही थी और  कंपनी ने उपयोगकर्ताओं के स्थानों को ट्रैक करना तब भी जारी रखा, जब उन्होंने  लोकेशन ट्रेकिंग  सुविधा को बंद करने का ऑप्शन चुना था | 

जांच में पाया गया कि Google ने कम से कम 2014 से उपभोक्ताओं को उनके स्थान ट्रैकिंग प्रथाओं के बारे में गुमराह करके राज्य उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का उल्लंघन किया था| गूगल की कमाई का ज्यादातर हिस्सा लोगों की व्यक्तिगत जानकारियों  के जरिए ही आता है| लोग अपने जरुरत की चीजों को  अपने ब्राउजर में खोजते हैं चूँकि मोबाईल एक व्यक्तिगत माध्यम है तो लोग जहाँ भी जाते हैं मोबाईल उनके साथ रहता है और वे किन ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं |यह सभी जानकारी गूगल के पास रहती है| ऐसे में इन डेटा के जरिए लोगों को उनकी पसंद का कंटेंट और ऐप्स उन्हें अपने स्क्रीन पर दिखने लगते हैं| इस मामले पर अमेरिका के चालीस  राज्यों ने गूगल के साथ समझौते के तहत अब गूगल को राज्यों को कुल 32 अरब रुपये यानी करीब 400 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का फैसला किया है| ध्यान देने वाली बात ये है कि यह अब तक का सबसे बड़ा प्राइवेसी समझौता है|

वही भारत जो कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर देश है वहां डेटा और डेटा प्राइवेसी को लेकर अभी भी कोई जागरूकता नहीं दिखती है|निजी जानकारियों को सुरक्षित रखने और इसके  गलत इस्तेमाल को रोकने  के लिए सरकार ने 11 दिसंबर 2019 को लोकसभा में पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल पेश किया था इस पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी रिपोर्ट सदन के समक्ष नवम्बर 2021 में रख दी है जिस पर आगे चर्चा होनी है |  उम्मीद की जा रही है कि इस बजट सत्र के बाद डिजीटल डाटा सुरक्षा बिल कानून का रूप ले लेगा |जिस तरह इंटरनेट की इस दुनिया में आंकड़े महत्वपूर्ण हो चले हैं इस बिल के कानून बनने में अभी वक्त है |देश में जिस तेजी से इंटरनेट का विस्तार हुआ उस तेजी से हम अपने निजी आंकडे (फोन ई मेल आदि) के प्रति जागरूक नहीं हुए हैं परिणाम तरह तरह के एप मोबाईल में भरे हुए जिनको इंस्टाल करते वक्त कोई यह नहीं ध्यान देता कि एप को इंस्टाल करते वक्त किन –किन चीजों को एक्सेस देने की जरुरत है |यदि किसी उपभोक्ता ने मौसम का हाल जानने के लिए कोई एप डाउनलोड किया और एप ने उसके फोन में उपलब्ध सारे कॉन्टेक्ट तक पहुँचने की अनुमति माँगी तो ज्यादातर लोग बगैर यह सोचे की मौसम का हाल बताने वाला एप कांटेक्ट की जानकारी क्यों मांग रहा है उसकी अनुमति दे देंगे |अब उस एप के निर्मताओं के पास किसी के मोबाईल में जितने कोंटेक्ट उन तक पहुँचने की सुविधा मिल जायेगी|यानि एप डाउनलोड करते ही उपभोक्ता आंकड़ों में तब्दील हुआ फिर उस डाटा ने और डाटा ने पैदा करना शुरू कर दिया |इस तरह देश में हर सेकेण्ड असंख्य मात्रा में डाटा जेनरेट हो रहा है पर उसका बड़ा फायदा इंटरनेट के व्यवसाय में लगी कम्पनियों को हो रहा है |ऐसे में लोगों की डेटा प्राइवेंसी पर बहुत बड़ा सवाल उठता है| 

दैनिक जागरण में 21/11/2022 को प्रकाशित 

 

Friday, October 14, 2022

दीपावली का रात कनेक्शन

 


दीपावली आ रही है पर मैं आप को याद क्यूँ दिला रहा हूँ,आप की समझदारी पर मुझे हमेशा भरोसा रहा है.हम तो आपको कुछ और याद दिला रहे हैं अच्छा ये तो आप सब जानते हैं कि दीपावली रात का त्यौहार है पर जरा गौर करिये हम जब दीपावली के बारे में किसी से पूछते हैं तो क्या कहते हैं अरे दीपावली किस दिन है. कहानी में यहीं ट्विस्ट है जब रात का त्यौहार है तो दिन की बात क्यूँ तो दीपावली के बहाने ही सही  मैंने जरा सा रात के बारे में सोचा तो न जाने क्या क्या याद आयावैसे याद से कुछ आपको याद आया क्या ?भाई याद का सीधा कनेक्शन रात से है.जब आप मन से अकेले होते हैं तो कितना कुछ याद आता है. रात के सन्नाटे में मन के किसी कोने से कितनी यादें निकल पड़ती हैं. रात अपने आप में एक फीलिंग है सुबह का इंतज़ार करते हुए रात काटना और बात है लेकिन रात को जीते हुए रात काटना बिल्कुल अलग मामला  है.

 हमारे जीवन में रात और दिन की समान जगह  है पर जब भी हम जीवन  की बात करते हैं तो बात सिर्फ दिन की होती है. बात समझे दिन इसलिए दिन है क्योंकि रात है. मैं बात को थोडा और सिंपल करता हूँ जब हम काले रंग के बारे में जानेगे तभी तो ये जान पायेंगे कि कौन कितना गोरा है.यानि इस जीवन में सबकी अपनी अपनी उपयोगिता  है और कोई भी बेकार  नहीं है.मैंने कहीं पढ़ा था बुराई कि सबसे बड़ी अच्छाई ये है कि वो बुराई है तो अगर कोई आगे बढ़ रहा है और आप उस जगह नहीं पहुँच पा रहें तो फ्रस्टेट न हों,अपने आप को पहचाने हो सकता हो आप उस काम के लिए बने न हों और वो काम करें जिसके लिए आप बने हों.जैसे रातदिन नहीं हो सकती और दिनरात नहीं. भाई इस फेस्टिव सीजन में मैं अपनी बात को फेस्टिवल के थ्रू ही कहूँगा तब शायद आप मुझे समझें तो मामला यूँ है कि आप होली में  पटाखे छुडाएं तो लोग आपको क्या कहेंगे?

 कोई भी काम शुरू करते जोश के साथ होश का भी इस्तेमाल करें महज इसलिए कि आजकल इसका बड़ा क्रेज है ,इसमें पैसा बहुत है जैसी बातों को ध्यान में रखकर कोई काम मत शुरू कर दीजिए. जिस तरह सारे दिन एक जैसे नहीं होते हैं और उसी तरह से सारी रातें भी एक जैसी नहीं होती हैं. किसी रात आप अपने किसी अज़ीज़ दोस्त की पार्टी में नाच गा रहे होतें तो किसी रात आप बिस्तर पर स्ट्रेस के कारण जगते हुए काट देते हैं और किसी रात आप ऐसा खूबसूरत सपना देखते हैं कि सुबह होने ही नहीं देना चाहते हैं.सबसे इम्पोर्टेंट हमारी जिंदगी में बहुत सारे ऐसे लोग है जिनका हमारी सफलता में योगदान होता है तो उनको भी नहीं भूलना चाहिए याद है न रात है तभी तो दिन है,तो दीपावली आपने हर साल मनाई होगी इस साल दीपावली की रात अपने उन दोस्तों के साथ मनाई जाए जो आपकी खुशी के लिए कुछ भी कर सकते हैं. अब तो आप मान ही लीजिए कि दीपावली तभी तक प्रकाश का त्यौहार है जब तक इस धरती पर अँधेरा है क्यूंकि कोई दिन में कोई पटाखे नहीं फोड़ता. तो कैसा लगा आपको दीपावली का रात कनेक्शन .

प्रभात खबर में 14/10/2022 को प्रकाशित 

Wednesday, June 29, 2022

खाने और गाने का कनेक्शन


 बचपने में सुनी एक कहावत भूख लगे तो खाना खाओ और डर लगे तो गाना गाओ अब ये कहाँ तक सही है. ये तो पता नहीं पर खाने और गाने का भी कोई सम्बन्ध हो सकता है भला. आइये जरा आज इस पर नज़र डालते हैं कि फ़िल्मी गाने इस सम्बन्ध को कैसे देखते हैं . तो भला इतना महत्वपूर्ण हिस्सा गानों से कैसे छूटा रह सकता था. वैसे वक्त के साथ साथ हमारे गाने और खाने के तरीके बदले हैं  . वैसे भी स्वस्थ खाओ तन मन जगाओ की बात कोई नयी नहीं है. इसी लिए ये गाना कहता है दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ (संत ज्ञानेश्वर ).  खाने में कुछ भी मिले मन से खाइए और अगर खिलाने  वाला कोई अपना साथी हो तो क्या कहने "रुखी सूखी रोटी तेरे हांथों  की खा के आया मज़ा बड़ा" (नायक ). वैसे भी खाने से पहले अगर नाश्ते की बात कर ली जाए तो कैसा रहेगा. डॉक्टर भी कहते हैं खाली पेट नहीं रहना चाहिए तो चने के बारे में क्या ख्याल है चना जोर गरम बाबू मैं  लाया मजेदार (क्रांति ) .खाना अगर अपनी मेहनत का मिले तो उसका क्या कहना क्योंकि "खून पसीने की जो मिलेगी तो खायेंगे नहीं तो यारों हम भूखे ही सो जायेंगे" (खून पसीना ).  नमक अगर खाने में न हो तो खाना बेस्वाद होता है. वैसे ही जिन्दगी में अगर उतार चढाव न हो तो ऐसी जिन्दगी का क्या मतलब. पर अति किसी चीज़ की अच्छी नहीं होती तो क्यों न थोडा सी  मिर्च खा ली जाए "उफ़ ये मिर्ची है ये मिर्ची "(बीवी न. वन )पर कभी ऐसा भी होता है कि हम घर पर नहीं होते हैं या किसी काम से बाहर का खाना खाना पड़ता है. जिसे हम स्ट्रीट फ़ूड कहते हैं "मैं तो रस्ते से जा रहा था मैं तो भेल पूड़ी खा रहा था(कुली  न. वन ) ". खाइए जरूर खाइए रोज रोज एक सा खाना भी मज़ा नहीं देता है तो इसका भी लुत्फ़ उठाइए, पर स्वास्थ्य  और सफाई   की कीमत पर नहीं अगर खाना साफ़ सुथरा है तो किसी को भी मिर्ची लगे. आप परवाह मत कीजिये .  खाना तभी आपके लिए बेहतर होगा  जब उसमे पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्व   होंगे. इसके जरुरी है कि खाने में फल और कुछ जरुरी चीजों की सही मात्रा हो. फल में तो गीतकारों का सबसे प्रिय फल है अंगूर. ये गाना जिन्दगी और खाने के फलसफे को कितनी खूबसूरती से बयां कर रहा है "ये जीना है अंगूर का दाना कुछ पक्का है कुछ कच्चा है. ध्यान दीजियेगा अधपका खाना आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है. खाना कुछ भी खाएं पर ठीक से पका कर खाएं .  हिन्दुस्तानी खाना बिना मिठाई के पूरा नहीं होता तो कुछ मीठा हो जाये ये अलग बात है कि इस बदलते वक्त में मीठे के प्रकार बदले है पर उनकी मिठास नहीं बदली है मिठाईयों की जगह चोकलेट और आईस क्रीम ने ले ली है तभी तो   चोकलेट आइस क्रीम लाइम जूस और टोफियाँ पहले जैसे मेरे शौक अब हैं कहाँ (हम आपके हैं कौन ).जी हाँ शौक तो बदलते रहते हैं वो चाहे गाने के हों या खाने के पर चलते चलते खाने के बाद अगर पान की बात न की जाए तो लगता है खाना पूरा नहीं हुआ तो “खायके पान बनारस वाला खुल जाए बंद अक्ल का ताला “(डान)

गर्मी के इस मौसम में डिफ्रेन्ट स्वाद के खानों का तड़का लगाते रहिये और जीते रहिये 

प्रभात खबर में 29/06/2022 को प्रकाशित 

Friday, May 27, 2022

स्वरोजगार की दिशा

   स्व रोजगार ये शब्द वर्ष 2020 के बाद से अचानक बहुत से ऐसे लोगों की जुबां आ गया है जो कभी किसी निश्चित आय और नौकरी के साथ जिदंगी गुजर बसर कर रहे थे।इन्वेस्टोपीडिया वेबसाइट के मुताबिक स्व रोजगार से जुड़ा व्यक्ति किसी नियोक्ता और निश्चित सैलरी के लिये कार्य नहीं कर रहा होता है। स्व रोजगार से जुड़ा व्यक्ति खुद ही अपनी विशेष स्किल के लिये जरिये अपनी आय जुटाता है। अब सवाल उठता है कि स्वरोजगार क्या होता है और किसे स्वरोजगार माने और किसे न मानें।सवाल उठ रहा है तो मतलब जवाब भी आपके आस पास ही होगा। स्वरोजगार से जुड़े व्यक्ति शैक्षिक और गैर ​शैक्षिक वर्ग दोनों से हो सकते हैं। मसलन अगर कोई व्यक्ति ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं, फिर भी वो अपनी सब्जी की दुकान के ​जरिये अपनी आजीविका चला रहा है और वहीं एक पढ़ा लिखा व्यक्ति जिसने ग्राफिक डिजाइनिंग में महारत हासिल है, वो अपनी स्क्लि के जरिये खुद का अपना काम करके या फ्रीलासिंग के जरिये अपनी आजीविका चला रहा है।


स्वरोजगार करने वालों में चाय वाले, किराना स्टोर, टैक्सी ड्राइवर ओला और उबर, रेहड़ी पटरी पर दुकान लगाने वाले, फूड कियोस्क, प्लंबर, इलेक्ट्रशियिन, इंश्योरेंस एजेंट, वित्तीय सलाहकार, वकील समेत विभिन्न क्षेत्रों के लोग जुड़े हुये हैं जो खुद ही अपनी आय का इंतजाम करते हैं।एक समय था जब जॉब मार्केट में इतनी ज्यादा प्रतियोगिता नहीं थी। लोग कम थे और नौ​करियों के अवसर ज्यादा थे। पर कोविड 19 महामारी के दौर ने एक बार फिर से सबको सिखा दिया है कि खुद के द्वारा शुरू किये कार्य और उससे मिलने वाली आजीविका की बात ही कुछ और है।कोविड 19 महामारी के दौर में आप सबको अपने घर के पास खुली जनरल मर्चेंट की दुकानों की महत्ता तो पता ही चल चुकी होगी, जब सब कुछ बंद था तो इन छोटीछोटी लाखों दुकानों ने ही करोड़ों लोगों को समय से दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली चीजें मुहैया कराई थीं।

क्या आपको पता है कि इन देश में कितने ड्राइवर हैं जो अपनी स्किल के बदौलत अपनी आजीविका चला रहे हैं?

आईटीआई, पॉलीटेक्निक, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, स्किल इंडिया जैसी योजनाएं और कार्यक्रम अब प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में रोजगार दिलाने का कार्य कर रहे हैं। इन कार्यक्रमों में अपनी मनपसंद ट्रेड चुनकर एक तरफ युवा खुद को जॉब मार्केट के लिये तैयार कर रहा है। वहीं बेहतर स्किल पाकर खुद का कार्य भी शुरू कर रहा है।   रेहड़ी-पटरी वालों को आत्मनिर्भर बनाने की पहल करते हुये आर्थिक मदद के लिए 2 जुलाई 2020 को प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि योजना को पेश किया गया। पीएम स्वनिधि योजना के तहत इसकी शुरुआत से लेकर अब तक 34 लाख से अधिक रेहड़ी-पटरी वालों को 3,628 करोड़ रुपये का कर्ज मंजूर किया जा चुका है। प्रधानमंत्री स्वनिधि स्कीम को आवास व शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा आत्मनिर्भर भारत अभियान के हिस्से के रूप में लॉन्च किया गया है। योजना के तहत रेहड़ी-पटरी या खोमचे वाले पहली बार में 10,000 रुपये तक का कर्ज प्राप्त कर सकते हैं।उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि इतने कम समय में ​34 लाख लोगों ने रेहड़ी पटरी पर खुद का कार्य शुरू या​ फिर शुूरू किये गये कार्य को आगे बढ़ाने के लिये 10,000 रूपये को लोन लिया। सीधे तौर पर इन 34 लाख लोगों के परिवार भी अपने जीविकोपार्जन के लिये इस कार्य पर ही निर्भर होंगे।

मैला ढोने वाले स्वच्छकारों के पुनर्वास के लिए स्वरोजगार योजना सरकारी क्षेत्र के बैंकों के लिए लागू है। इस योजना के तहत मैला ढोने वाले लोगों को मुख्यधारा में लाना है जिससे समाज में वो एक बेहतर जिंदगी जी सके और इज्जत के साथ अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सकें।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत नारे का मकसद भी यही है कि रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत जरूरतों के अलावा भी लोगों की सबसे बड़ी जरूरत रोजगार को भी पूरा किया जा सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में केंद्र सरकार प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रमजैसी योजना चला रही है।प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रमजहां एक ओर देश के युवाओं को रोजगार मुहैया करा रहा है तो वहीं दूसरी ओर कोविड संकट और लॉकडाउन के बाद सुस्त पड़ चुके तमाम कार्यक्षेत्रों को फिर से नई गति भी प्रदान कर रहा है।

खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने वित्त वर्ष 2021-22 में पीएमईजीपी के तहत अब तक के सबसे अधिक रोजगारों का सृजन करके पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। आयोग ने वित्त वर्ष 2021-22 में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत 8.25 लाख का अब तक का सबसे अधिक रोजगार सृजन दर्ज किया है। इसके साथ ही आयोग ने अभूतपूर्व रूप से 1.03 लाख नई विनिर्माण और सेवा इकाइयों की भी स्थापना की।पीएमईजीपी के तहत शुरू की गई इकाई को तीन साल तक सफलतापूर्वक चलाने के बाद दोबारा इकाई के विस्तार के लिए एक करोड़ रुपए का लोन फिर से लिया जा सकता है। इस पर भी 15 फीसदी सब्सिडी सरकार की ओर से दी जाती है। अधिक जानकारी के लिए आप kviconline.gov.in पर भी विजिट कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओडीओपी योजना भी स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली है। इस योजना के तहत हर जिले के प्रमुख उत्पाद के ​जरिये ​वहां के लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा जायेगा। साथ ही प्रत्येक जिले के उत्पाद विशेषों की बिक्री बढ़ाने के लिये ई कॉमर्स वेबसाइट के साथसाथ हर जिले के उत्पादों को वहां के रेलवे स्टेशन ब्रिकी और मार्केटिंग के लिये उचित स्थान भी मुहैया कराया जायेगा। आज का समय ऐसा है कि उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले युवा भी स्वरोजगार की तरफ प्रेरित हो रहे हैं। बहुत से युवा उद्यमशीलता की तरफ जा रहे हैं तो बहुत से युवा खुद से स्वरोजगार की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। आज से 10 साल पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि लखनउ जैसे शहर में एक चटोरी गली होगी और   वहां लगने वाली सैंकड़ों दुकानों को पढ़ेलिखे युवा चला रहे होंगे। या​ फिर एक एमबीए चाय वाला पूरे भारत में  प्रसिद्ध हो जायेगा।

किसी भी पौधे को पेड़ बनने में समय लगता है। साथ ही उस पौधे को सही देखरेख के साथ पानी, हवा, धूप की भी जरूरत होती है। तभी वह पौधा बड़ा होकर फल देता है। ऐसे ही स्वरोजगार योजनाओं से जुड़े युवाओं और अन्य लोगों को भी आर्थिक सलाह और सुरक्षा देनी होगी जिससे वो किसी से रोजगार न मांगकर खुद के स्वरोजगार को ज्यादा से ज्यादा फैलाने में लगे रहें।

आकाशवाणी लखनऊ से 26/05/2022 को प्रसारित वार्ता 

https://youtu.be/0E6-CVLvLLo

Friday, May 13, 2022

पुरानी चीजों की अहमियत

 


बदलाव प्रकृति का नियम है पर ये बदलाव  हमें इस बात का एहसास भी कराता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं. परिवर्तन का मतलब पुरानी चीजों से पीछा छुड़ाना नहीं है. सुनहरे  वर्तमान की नींव इतिहास पर ही रखी जाती है.मैं बिलकुल भारी भरकम बात करके आपको बोर नहीं करना चाहता .आज की दुनिया इंटरनेट की दुनिया जिसमे काफी कुछ आभासी है. कितना कुछ इसने बदल दिया है पर ये बदलाव यूँ ही नहीं हुआ है एक छोटा सा उदाहरण है इंटरनेट ने कागज़ पर हमारी निर्भरता को कम किया है. वो कागज़ जिससे हमारी ना जाने कितनी यादें जुडी हैं. वो स्कूल की नयी किताबें जिससे आती खुशबू आज भी हमें अपने बचपने में ले जाती है.हम उस दौर को एक बार फिर जी लेना चाहते हैं .वो कॉलेज की डिग्री का कागज़.  जिसने हमें पहली बार एहसास कराया कि हमने जीवन का अहम पड़ाव पार कर लिया. फिर वो शादी के कार्ड का कागज. जब हम एक से दो हो गएअपने  पहले अपोइंटमेंट लैटर  को कौन भूल सकता है. जब आपने पहली बार वित्तीय स्वतंत्रता  का लुत्फ़ उठाया, और ये सिलसिला चलता रहता है. पर अब सबकुछ ऑन लाइन है .लेकिन  कभी कभी तो प्रिंट आउट भी  निकलना पड़ता है. भले ही सब कुछ ऑन लाइन हो रहा है. फिर भी  कागज़ तो हमारे जीवन का हिस्सा है ही ना. अब इस लेख को कुछ लोग अखबार में पढेंगे. कुछ नेट पर तो हो गया न ऑन लाइन और ऑफ लाइन का कोम्बिनेशन .तो ये पेज जल्दी ही इतिहास का हिस्सा हो जायेंगे जब बच्चे लिखना पढ़ना कॉपी और कागज़ से नहीं टेबलेट और लैपटॉप पर सीखेंगेअब ग्रीटिंग कार्ड से लेकर शादी के कार्ड और अपोइंटमेंट लेटरसीधे   ई मेल या व्हाट्स एप  किये जाते हैं पर वो कागज़ के कुछ टुकड़े ही थे. जिन पर भविष्य के कंप्यूटर और इंटरनेट की इबारत लिखी गयी. बोले तो कागज़ ही ने  जिन्होंने हमें ऑफ लाइन से ऑन लाइन होने का जरिया दिया तभी तो किसी भी वेबसाईट के खास हिस्से को वेबपेज ही कहते हैं.  जबकि इस वेब पेज में उस पेज जैसा कुछ नहीं होत. जिसे हम जानते हैं तो सीधे दिल से जब हम जड़ों से जुड़े रहेंगे तो आगे बढते रहेंगे पर उनसे कट कर हम कभी तरक्की के रास्ते पर नहीं बढ़ पायेंगे .

पर ये तो आधी बात हुई मैं तो कुछ और ही कहना चाहता हूँ  कि जीवन में कितनी बातें ऐसी होती हैं. जिन्हें हम ऑबियस मानकर छोड़ देते हैं पर जरा सा दिमाग पर जोर डालने से  हमें पता पड़ता है कि उनकी हमारे जीवन में कितनी अहमियत होती है. कागज़ तो बहाना भर है आपको ये समझाने को हम कितने भी आगे क्यों  ना निकल जाएँ  पर अपने बेसिक्स को न भूलें.  मॉडर्न हो जाने का मतलब पुरानी चीजों  को भूल जाना नहीं है बल्कि उनको याद करके आने वाली दुनिया को और बेहतर करना है.अब उस मामूली कागज़ को लीजिए उसके साथ हम क्या करते हैं.हर मेल का प्रिंट आउट निकलना जरूरी तो नहीं है .प्रिंट आउट निकले पन्ने के दूसरी तरफ भी कुछ लिखा जा सकता है. पर हम उन्हें रद्दी मानकर फैंक देते हैं .हम जितना कागज़ ज्यादा इस्तेमाल करते हैं उतना ही पेड ज्यादा काटे जाते हैं तो कागज का इस्तेमाल सम्हाल कर कीजिये तभी हम अपने  पर्यावरण को बचा पायेंगे तो कागज़ की इस कहानी के साथ आज के लिए इतना ही....

प्रभात खबर में 13/05/2022 को प्रकाशित 

Thursday, April 7, 2022

अनछुए पहलुवो को उभारता हिन्दी सिनेमा

 स्त्रैण  हाव भाव वाले पुरुष चरित्र हिन्दी फिल्मों में हमेशा हास्य पैदा करने के माध्यम रहे हैं|चाहे वो शोले का वह कैदी हो जय वीरू को जेलर के खबरी का पता देता हो या  बोल बच्चन में अब्बास अली  हो या फिर  गैंग्स ऑफ वासेपुर में आइटम बॉय का चरित्र | ये तीनो  फ़िल्में अलग अलग दर्शक वर्ग के लिए अलग अलग समय में बनाई गयीं पर तीनों  में एक समानता हैवो है समलैंगिक किरदार|रिश्तों को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाता आया हिंदी सिनेमा पिछले सालों में  काफी  बोल्ड हुआ और ऐसे अनछुए पहलूओं को सिनेमा के परदे  पर दर्शकों के सामने परोसने का साहस कर पाया। इन फिल्मों में रिश्तों की उलझन जटिलता उसका मर्म और दिल में दबे रहने वाले ऐसे जज्बातों को गूंथा गया जिसे आम तौर पर सभी के सामने कहने की हमारे समाज में परंपरा कभी नहीं रही है।  कुछ ने उसे अश्लीलता कहते हुए नकार दिया लेकिन सच को समाज का हिस्सा मानने वालों ने उस पर अपनी पसंद की मुहर भी लगाई।अभी रिलीज हुई फिल्म बधाई दो इसी कड़ी में एक शानदार पहल है | हिंदी सिनेमा अब केवल शादीब्याहप्रेम कहानियों में बताए जाने वाले रिश्तों तक सीमित नहीं रहना चाहता। संवेदनशील विषयों को कहने से हम अब भी झिझकते हैं.खास तौर पर वह जो हमारे समाज का छिपा सच हैं। बोल्ड का मतलब केवल अभिनेता-अभिनेत्री के अंतरंग दृश्य नहीं हैंरिश्तों की बारीकी भी है। 1990 से हिंदी सिनेमा में कथ्य और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मिता बढी है।सहजीवन,समलैंगिकता पुरूष स्ट्रीपर्स सेक्स और विवाहेतर संबंध और प्यार की नई परिभाषा से गढ़ी कहानियां फिल्मों के नए विषय हैं।जिस तेजी से समाज बदल रहा है. उतनी तेजी से फिल्मों में ये विषय नहीं आ रहे हैं।समलैंगिकता समाज का सच है पर इस मुद्दे की गंभीरता को अभी भी समझा नहीं जा रहा है इंसानी समाज का ये पक्ष अभी भी बहस के मुद्दे से दूर है | सेक्‍स को हमेशा प्रमुखता से प्रस्तुत  करने वाली हमारी फिल्मों में (कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाएतो बॉलीवुड में यौन विषयों पर आधारित तार्किक फिल्‍में कम ही बनी हैं) यह तथ्य अलग है कि आइटम डांस का तडका लगाये बिना  कोई फिल्म पूरी नहीं होती और फिल्म निर्माता हमेशा इस विषय से भय ही खाते रहे है।

मगर कुछ निर्देशक ऐसे हैं जिन्होंने समलैंगिकता जैसे संवेदनशील मुददे पर काम किया है|खासकर युवाओं ने जिन्हें समाज में वर्जित माने जाने वाले मुददों को दिखाने से कोई गुरेज नहीं। फिल्मों में गे और लेस्बियन किरदारों को या तो प्रोटागोनिस्ट दोस्तों की तरह दिखाया जाता है या फिर ड्रेस-डिजाइनर के किरदार में। समय के साथ और दर्शकों की रुचि देखते हुए बॉलीवुड खुले तौर पर सामने आ रहा है। फायरमाई ब्रदर निखिलदोस्तानाफ्रेंडशिप,फैशन  और पेज ३ में समलैंगिकों के लिए समाज का नजरिया दिखाने की कोशिश की गई है।कुछ फिल्मों ने समलैंगिकों के लिए आम आदमी का नजरिया बदला है फिर भी समाज का एक बड़ा तबका उन्हें असामान्य ही मानता है।फिल्मों में समलैंगिक किरदारों को स्वीकार तो किया जा रहा है लेकिन उन्हें ज्यादातर फैशन या मीडिया जगत से जुड़ा दिखाया जाता है।इस विषय की पहली मेनस्ट्रीम हिंदी मूवी ओनीर निर्देशित माय ब्रदर निखिल रही है|फिल्म 'बॉम्बे टॉकीज़में करण जौहर की कहानी में रणदीप हुड्डा और साकिब सलीम का प्रसंग, 'कपूर एंड सन्समें फव्वाद ख़ान का किरदारकल्कि की 'मार्गरीटा विद स्ट्रॉसहित कई फिल्मों में रिश्तों को गंभीरता से दिखाया गया|

 निर्देशक करण राजदान की गर्लफ्रेंड में लेस्बियन रिश्तों पर फोकस है। करण जौहर निर्देशित दोस्ताना गे-कॉमेडी थी। यह फिल्म दर्शकों को काफी रास आई यह फिल्म इसलिए भी चर्चित रही कि इसमें पहली बार दो पुरुषों के चुम्बन द्रश्य को दिखाया गया । लेस्बियन लव स्टोरी 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगाफिल्म में इस तरह के  रिश्ते को लेकर स्पष्टता और निडरता देखी जा सकती है | आयुष्यमान खुराना और जितेन्द्र कुमार की 'शुभ मंगल ज्यादा सावधानभी इसी दिशा में समाज की बदलती सोच को दिखाने में सफल रही|

 बहुत से फिल्म निर्माता समलैंगिकता को केवल हास्य के रूप में इसलिए रखते हैं ताकि उन्हें फिल्म की रिलीज के दौरान दिक्कत न हो इसलिये फिल्मों में ऐसे चरित्र तो बढ़ रहे हैं जिनके हाव भाव समलैंगिकों वाले हैं पर उनकी यौन रूचि पर सीधे कोई बात नहीं की जाती और फिल्मों के कथ्य में वो महज मजाक बन कर रह जाते हैं|भले ही फिल्मों का विषय और प्रस्तुति काल्पनिक हो लेकिन कोई भी फिल्म अपने समय से निरपेक्ष नहीं रह सकती हर फिल्म पर उस समय का असर जरुर होता है जिस समय वह निर्मित की जा रही होती हैसमलैंगिक किरदारों को हास्य के साथ प्रस्तुत करना समाज में उनके प्रति गलत छवि का निर्माण करता है |यह समलैंगिकों के साथ अन्याय भी है ।लिसा रे और शीतल सेठ की आइ कांट थिंक स्ट्रेट स्त्री समलैंगिकता पर आधारित थी। शमीम शरीफ निर्देशित फिल्म में दोनों अभिनेत्रियां अपनी यौन पहचान समझने की कोशिश में रहती हैं। फिल्म् “डू नो वाय... न जाने क्यों” पुरुषों के समलैंगिक रिश्तों की कहानी है। जो विषमलैगिक ढांचे के अनुसार नहीं चलते हैंपश्चिमी देशों में पुरुष और स्त्री को अपने सेक्स रिश्ते के चुनाव की पूरी आजादी हैं। इसे विचार अभिव्यक्ति का ही हिस्सा माना जाता है पर भारत में स्थिति अलग है|यहाँ सेक्स अभी भी टैबू है जिस पर बात करना वर्जित है | हम भारत से बाहर की फिल्में देखकर ऐसे बोल्ड विषयों को कहने के साहस पर खुश होते है लेकिन वही काम अगर भारत में हो तो पचा नहीं पाते। निर्देशकों के चरित्र उसकी प्रवृत्ति पर सवाल खड़े का कर देते हैं।साल 2015 में  आई मनोज बाजपेयी की अलीगढ़ ने समलैंगिकता पर चल रही बहस को न सिर्फ एक नया मोड़ दिया बल्कि यह इस मामले में हिन्दी  सिनेमा के गंभीर  हो जाने की दिशा में बड़ा हस्तक्षेप  था |

 समलैंगिकों की  स्थिति का काफी दस्तावेजीकरण हो रहा हैजिनसे पता चलता है कि गे ,लेस्बियन हिजडाट्रांसजैन्डर्डऔर बाईसेक्स्युअल लोगों की मानव प्रतिष्ठा का बार-बार किस प्रकार उल्लंघन किया जाता है। उल्लंघनों का क्षेत्र व्यापक है। किन्नरों का सेक्स रैकेट के रूप में प्रयोग और पुलिसवालों द्वारा उनके बार-बार बलात्कार की घटनाएं हैं और उनके मानवाधिकारों का हनन भी शामिल है ।बहरहाल समलैंगिकता पूरी दुनिया में हमेशा मौजूद रही है परंतु इसे हमने सामाजिक कालीन के नीचे छिपा दिया था जो अब प्रकट हो रहा है। हाल ही में ऐसी फिल्मों की बढ़ती तादाद और प्रमुख अभिनेताओं द्वारा समलैंगिक किरदारों का निभाया जाना इस ओर इशारा करता है कि बॉलीवुड भी इस गंभीर मुद्दे की ओर उन्मुख है। समलैंगिकता को देश में कानूनी मान्यता मिल गई है तो उम्मीदें भी बढ़ी हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि हिंदी फिल्मकार किस तरह से इसको अपने विषयों का हिस्सा बनाते हैं। क्या वह दबी आवाजें कुचले रिश्ते संबंधों की कसमसाहट और समाज की नैतिकता किस चोले में रजत पटल का हिस्सा बनेगी|

 दैनिक जागरण में 07/04/2022 को प्रकाशित 

Tuesday, April 5, 2022

रेखाएं बेहद अहम हैं

 


नवरात्रि में घर की सफाई में एक पुरानी किताब मिली जानते हैं उसका विषय था ज्योमेट्री जी हाँ रेखा गणित और क्या कुछ आँखों के आगे घूम गया वो स्कूल के दिन वो एल एच एस इस ईक्युल टू आर एच एस और इतिसिद्धम. तब लगता था हम ये सब क्यूँ पढते हैं वैसे भी गणित मुझे बहुत बोर करती थी. जिंदगी तो आगे बढ़ चली पर अब समझ आ रहा है जीवन में रेखा का क्या महत्व हैक्योंकि इसी पर जिंदगी का गणित टिका हुआ है. रेखा मतलब लाइनलिमिट ,सीमा या फिर कुछ आड़ी तिरछी सीधी पंक्ति वैसे इनका कोई मतलब नहीं है पर इन्हें सिलसिलेवार लगा दिया जाए तो किसी के घर का नक्शा बन जाता है. तो कोई कुछ ऐसा जान जाता है जिसे कल तक कोई नहीं जानता था.रेखा ही है वो टूल है जिससे आप अपने सपनों को वास्तविकता का जामा पहना सकते हैं पर ये ध्यान रहे कि उस रेखा का डायरेक्शन किस तरफ है क्योंकि वो चाहे गणित का सवाल हो या जिंदगी की उलझन काफी कुछ आपके दिमाग के डायरेक्शन पर निर्भर करता है.

विषय कोई भी हो चाहे इतिहासभूगोल गणित या फिर साहित्य बगैर रेखाओं के इनका कोई अस्तित्व नहीं है अब देखिये ना लिपि या स्क्रिप्ट भी तो कुछ रेखाओं का कॉम्बिनेशन है यानि दुनिया को समझने के लिए हमें रेखाओं की जरुरत है. इतिहास में समयरेखा है तो भूगोल में अक्षांश और भूमध्य जैसी रेखाएं. कॉपियों में लिखने का अभ्यास पहले लाईनदार पन्नों से होता है बाद में जब हम अभ्यस्त हो जाते हैं तो उनकी जगह सफ़ेद पन्ने ले लेते है और तब हम कितनी भी जल्दी क्यूँ ना लिखें शब्द अपनी जगह से नहीं भागते. वे उसी तरह लिखें जाते हैं जैसे हम लाईनदार कॉपियों में लिखते हैं.

क्यूँ कुछ तस्वीर साफ़ हो रही है.जीवन में इन रेखाओं का कितना बड़ा दायरा है वो जीवन की रेखा से लेकर गरीबी रेखा तक देखा और समझा जा सकता है. जीवन  में स्वछंदता और उन्मुक्तता मौज मस्ती अच्छी है पर उसकी एक सीमा होनी चाहिए और इस रेखा को हमें ही खींचना चाहिए. त्यौहार  हमें जश्न मनाने का जहाँ  मौका देते हैं. वहीं ये भी बताते हैं कि जीवन महज मौजमस्ती का नाम नहीं बल्कि समाज में हमारा सकारात्मक योगदान  भी  है.महत्वपूर्ण है कि ये बात कोई दूसरा हमें ना बताये क्योंकि सेल्फ रेग्युलेशन,खुद  से ही आता है और यही सेल्फ रेग्युलेशन जो हमें अनुशासित करता है.जब हम दूसरे की सीमाओं का सम्मान करेंगे तो लोग खुद ब खुद हमें अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ देंगे पर हम ये सोचें कि हम सबके बारे में कुछ भी गॉसिप कर सकते हैं पर कोई हमारे बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा ऐसा होना मुश्किल है. सफल होने की कोई सीमा नहीं है पर ख्वाब अगर हकीकत के आइने में देखें जाएँ तो उनके सफल होने की गुंजाईश ज्यादा होती है. मतलब अपनी सीमाओं को जानकर उसके हिसाब से जब योजनाएं बनाई जाती हैं तो वो निश्चित रूप से सफल होती हैं. तो मुझे तो अपनी सीमाओं  का अंदाजा है और अपनी जीवन रेखा को इसी तरह बना रहा हूँ कि मेरी जिंदगी के कुछ मायने निकले पर आप क्या कर रहे हैं यह जरुर बताइयेगा.

प्रभात खबर में 05/04/2022 को प्रकाशित 

 

Friday, April 1, 2022

फैसलों का लम्बा खिंचता इन्तजार

 विधि द्वारा स्थापित व्यवस्था में जेल(कारागार) किसी भी अपराध का दंड है यानि जेलतंत्र का वो अंग है जो इस दर्शन पर आधारित है कि अपराधियों को समाज से दूर रखकर एक ऐसा वातावरण दिया जाए जहाँ वह आत्म चिंतन कर सकें ,पर  क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है

सरकार ने लोकसभा में 25 मार्च  को जानकारी दी है कि देश की विभिन्न अदालतों में 4|70 करोड़ से अधिक मुकदमे अटके हुए हैंसुप्रीम कोर्ट में ही 70,154 मुकदमे लंबित हैदेश की 25 हाईकोर्ट में भी 58 लाख 94 हजार 60 केस अटके हुए हैंइन लंबित मुकदमों की संख्या दो मार्च तक की है| इनमें से कुछ मामले पचास साल से भी ज़्यादा पुराने हैं|भारत में जेल सुधारों की  त्वरित आवश्यकता है |जिसका एक बड़ा कारण लंबित मुकदमों का बढ़ना ,न्यायाधीशों की कमी और सभी जेलों का क्षमता से ज्यादा भरा होना है|जिसका परिणाम कैदियों के खराब  मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में आ रहा है|जेल में यंत्रणा आम है| राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट  ‘जेल सांख्यिकी भारत 2020' के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिकभारत की जेलों में बंद हर चार में से तीन कैदी ऐसे हैं जिन्हें विचाराधीन कैदी के तौर पर जाना जाता हैदूसरे शब्दों में कहेंतो इन कैदियों के ऊपर जो आरोप लगे हैं उनकी सुनवाई अदालत में चल रही हैअभी तक इनके ऊपर लगे आरोप सही साबित नहीं हुए हैं|रिपोर्ट में यह जानकारी भी दी गई है कि देश के जिला जेलों में औसतन 136 प्रतिशत  की दर से कैदी रह रहे हैइसका मतलब यह है कि 100 कैदियों के रहने की जगह पर 136 कैदी रह रहे हैंफिलहालभारत के 410 जिला जेलों में 4,88,500 से ज्यादा कैदी बंद हैं| 2020 मेंजेल में बंद कैदियों में 20 हजार से ज्यादा महिलाएं थीं जिनमें से 1,427 महिलाओं के साथ उनके बच्चे भी थेमानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि भारत में विचाराधीन कैदियों की संख्या दुनिया भर के अन्य लोकतांत्रिक देशों की तुलना में काफी ज्यादा है|

  31 दिसंबर 2021 तक सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 21.03 है जो  आबादी के अनुपात  को देखते हुए  प्रति दस लाख में करीब 21 न्यायाधीश होता हैउच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 और 25 उच्च न्यायालयों में 1098 हैउच्च न्यायालयों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिकदिसंबर 2021 तक 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 898 फास्ट ट्रैक अदालतें काम कर रही हैं न्यायाधीशों की संख्या बढ़ानाउस समस्या के हल का एक पक्ष हो सकता हैजो भारत की खराब जेल व्यवस्था का एक बड़ा कारण है|जजों की संख्या कम होने से जेल में लंबित कैदियों की संख्या बढती जाती|जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है । इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2020 के आंकड़ों के मुताबिक भारत की जेलों में बंद 69 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैंयानी कि भारत की जेलों में बंद हर दस  में से सात  कैदी मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के इन्तजार में है | इस समस्या के सामाजिक आर्थिक पक्ष भी हैं |देश में गरीब व्यक्ति के लिए इंसाफ की लड़ाई ज्यादा  कठिन हैजिन्हें अच्छे और महंगे वकील मिल जाते हैं उनकी जमानत आसानी से हो जाती हैबहुत मामूली से अपराधों के लिए भी गरीब लोग लम्बे समय तक जेल में सड़ने को विवश होते हैं|स्वतंत्रता के पचहतर वर्ष के  बाद भी जेलों और कैदियों की दुर्दशा पर किसी ठोस और निर्णायक कार्रवाई का इन्तजार जारी  हैजेलों में भ्रष्टाचारगैरकानूनी गतिविधियांकमजोर और गरीब कैदियों का शोषणभेदभाव और उनसे सांठगांठ और दबंग अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने की तरह इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगते रहते  हैं|

 आपराधिक मुकदमों  में ज्यादातर के पूरा होने में औसत रूप से तीन से दस साल का समय  लगता हैहालांकि दोष सिद्धि का समय मुकदमों के लिए जेल में बिताए समय  से घटा दिया जाता हैलेकिन इसकी वजह से कई निर्दोषों को बगैर किसी अपराध के जेल की सज़ा काटनी पड़ती है,पिछले दशक में विशेष अपराधों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन कर इस मुद्दे को हल करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैंजिससे सुनवाई का इंतज़ार कर रहे लंबित मामलों में कमी आएगी पर फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन समस्या का एकमात्र हल नहीं है |इस व्यवस्था में जोर न्याय की बजाय समय पर होगा जो किसी भी दशा में  उचित नहीं माना जाएगा|दोषी पाए गए अधिकतर  कैदी बहुत गरीब हैंजेलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपेक्षित मुद्दा हैजिनके अभाव में कई बार कैदी गंभीर रोगों का शिकार हो जाते हैं खासकर एचआईवी पोसिटिव कैदियों को  इलाज के लिए जिला अस्पतालों के भरोसे रहना पड़ता है| यह मानसिकता कि जो जेल में रहते हैं वे सुविधाओं के लायक नहीं हैं।समस्या को और गंभीर बना देती है |सुप्रीम कोर्ट ने जेल सुधारों की सिफारिश करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अमिताभ रॉय की अध्यक्षता वाली समिति देश भर की जेलों की समस्याओं को देख रही है और उनसे निपटने के उपाय सुझा रही है।मार्च की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति को अगले छ माह में अपनी रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है |तब तक जेलों में बंद कैदियों का इन्तजार जारी रहने वाला है |

 अमर उजाला में 01/04/2022 को प्रकाशित 

Thursday, March 31, 2022

बेनकाब होता पश्चिमी मीडिया

 

साम्राज्यवाद  किसी भी रूप में इस बहुलता वाली दुनिया में स्वीकार्य नहीं है पर जब ये साम्राज्यवाद  सूचना के साथ जुड़ जाए तो स्थितियां काफी जटिल हो जाती हैं|सोशल  मीडिया  के आने से पहले दुनिया के  पास ऐसा कोई पैमाना नहीं था जिससे घटनाओं के विभिन्न आयामों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके क्योंकि जो बीत चुका था उसको रीयल टाईम में सहेजने   की कोई तकनीक हमारे समक्ष नहीं थी पर सोशल मीडिया ने दुनिया को नए सिरे से  ध्वनि चित्र और शब्दों के माध्यम से घटनाओं परिद्रश्यों को रीयल टाईम में सहेजने की सहूलियत दे दी |जिसका परिणाम यह हुआ कि आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई नेरेटिव गढ़ना उतना आसान नहीं है जितना आज से पन्द्रह  साल  पहले हुआ करता था |रूस युक्रेन  युद्ध हर मायने में  ग़लत है और इसका समर्थन कोई भी नहीं करेगालेकिन  इस मामले में ख़ुद पश्चिमी देशों का रिकार्ड भी बहुत खराब रहा है यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आक्रामक रुख़ की आलोचना निंदा  के बीच पहली बार पश्चिमी मीडिया  की नीति और निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं|हमले की कवरेज में पश्चिमी मीडिया के कथित पूर्वाग्रह की कलई अब धीरे धीरे खुल रही है  पश्चिमी मीडिया  रूस को विलेन बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैंजबकि अभी जारी संकट में अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों की भी भूमिका है |मुख्य धारा का पश्चिमी मीडिया कुछ महत्वपूर्ण अपवादों को छोड़कर घटनाओं को सही ऐतिहासिक संदर्भ में नहीं प्रस्तुत कर  रहा है। उनके अनुसार  रूस के राष्ट्रपति  व्लादिमीर पुतिन एक "ठगतानाशाह और हत्यारे" हैं। इस संघर्ष को बाइबिल में वर्णित डेविड बनाम गोलियथ  युद्ध के आधुनिक संस्करण के रूप में चित्रित किया जा रहा है। जिसमें एक असहाय छोटे देश को एक शिकारी पड़ोसी द्वारा कुचला जा रहा है।

इन सारी घटनाओं के बीच इस तथ्य को अक्सर भुला दिया गया  है कि पश्चिमी नेताओं द्वारा रूस के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव को सुरक्षा गारंटी का आश्वासन दिया गया था कि उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन या नाटोकम्युनिस्ट ब्लॉक से लड़ने के लिए एक ट्रांस-अटलांटिक सैन्य गठबंधन का  विस्तार नहीं करेगा और पूर्वी ब्लॉक के देशों को  सदस्यों के रूप में ग्रहण नहीं करेगा। नाटो यूरोप में साम्यवाद के विस्तार से लड़ने के लिए एक गठबंधन था। कम्युनिस्टों की हार और पूर्व सोवियत संघ के टूटने से अब यूरोप के लिए कोई खतरा नहीं था। हालाँकिशीत युद्ध के समय की मानसिकता पूरे यूरोप में बनी रही। न तो राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और न ही उनके उत्तराधिकारी या यूरोपीय नेता इसके लिए तैयार थे।

पोलैंडहंगरी और रोमानिया जैसे सभी पूर्व कम्युनिस्ट देशों में नाटो के तेजी से विस्तार  के समाचार को बहुमत से पश्चिमी मीडिया के द्वारा छोड़ दिया गया। अमेरिका और ब्रिटिश अखबारों और चैनलों के वर्चस्व वाले अंतरराष्ट्रीय प्रेस ने कमोबेश जो बाइडेन के प्रशासन की शीत युद्ध वाली  मानसिकता को इस युद्ध में भी आगे बढाया गया  है। पश्चिमी मीडिया हमेशा चीन विरोधी से ज्यादा रूस विरोधी रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हमेशा आलोचना की जाती हैलेकिन कभी भी उस लहजे  में नहीं जैसी  व्लादिमीर पुतिन के लिए की जा रही है । दूसरा दुखद तथ्य यह है कि जमीन पर मौजूद कुछ पत्रकार अपनी स्वाभाविक नस्लवादी मानसिकता को छुपा  नहीं पाए हैं। सीमा पार से अन्य यूरोपीय देशों में भागने के लिए मजबूर यूक्रेनी नागरिकों के लिए सहानुभूति उमड़ रही है। तथ्य यह है कि यूक्रेनी शरणार्थी साथी कोकेशियान हैं|अमेरिका का एक प्रमुख चैनल  सीबीएस न्यूज जिसे  फॉक्स न्यूज की तरह दक्षिणपंथी विचारधारा का नहीं माना जाता है। यहाँ वरिष्ठ विदेशी संवाददाता चार्ली डी अगाटा ने ट्वीट किया, "अब रूसियों  के आगे बढ़ने के साथहजारों लोगों शहर से भागने की कोशिश में है। लोग छिपे हुए हैं," उन्होंने आगे कहा, "लेकिन यह पूरे सम्मान के साथ इराक या अफगानिस्तान नहीं हैजहां दशकों से संघर्ष चल रहा है। यह एक अपेक्षाकृत सभ्यअपेक्षाकृत यूरोपीय शहर है जहां आप उम्मीद नहीं करेंगे कि यह होने जा रहा है।"अगर सोशल मीडिया का जमाना न होता तो उनकी यह टिप्पणी इतनी सुर्खियाँ  न बटोरती जैसे ही उन्होंने ट्विट किया बहुत से लोग तथ्यों के साथ उन्हें आईना दिखाने लगे |

वो चाहे ईराक पर हमला हो या सीरिया पर अमेरिकी नाटो बमबारी या फिर लीबिया में हमला पश्चिमी मीडिया अपने देशों की सरकारों के निर्णयों को जायज ठहराने में ऐसे नेरेटिव गढ़ता है कि ये देश स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व के पैरोकार लगते हैं जबकि इनके देशों की सरकारों के कर्मों से लाखों बेगुनाह भी मारे जाते हैं एस्सेल समूह के स्वामित्व एवं ज़ी मीडिया नेटवर्क के चैनलों का हिस्सा विओन चैनल ने रूसी विदेश मंत्री के बयान को अपने यूट्यूब चैनल पर दिखाया तो यूट्यूब ने विओन के यूट्यूब चैनल को ब्लोक कर दिया गया |

यह सोशल मीडिया का कमाल है कि अब पश्चिमी मीडिया के दोहरे चरित्र को उजागर करने वाली सारी बातें लोगों के बीच पहुँच रही हैं और शायद यही कारण है कि अब लोगों के सामने काउंटर नेरेटिव  सामने आ रहा है |2003 में अमेरिका के ईराक पर हमले के समय सोशल मीडिया नहीं था इसलिए पश्चिमी मीडिया ने जैसा बताया वो मान लिया गया था |

युक्रेन में भारी तबाही हो रही है लेकिन उसके प्रति दया करुणा के वो भाव सारी दुनिया में देखने को नहीं मिल रहे हैं कारण सीधा है रूस का पक्ष चैनलों से पूरी तरह से गायब है और पश्चिमी मीडिया के दोहरे चरित्र के कारण अब लोगों का उन पर यकीन नहीं होता है |इनके  समानता स्वतंत्रता  और बन्धुत्व के मानक अलग अलग देशों के लिए अलग हैं और अब दुनिया के यह बात भी समझ में आने लगी है |

 दैनिक जागरण में 31/03/2022 को प्रकाशित 

Thursday, March 10, 2022

गुस्से की सही वजह हो

 


खुश रहो न यार , छोडो न यार सब चलता है , गुस्साने से क्या होगा . ये कुछ ऐसी सीख हैं जो जिंदगी के किसी न किसी मोड पर आपको जरुर मिली होगी .चलिए थोड़ी देर ये मानकर देखते हैं कि ये सब बातें सही हैं मतलब गुस्साने से कोई फायदा नहीं होता . ज्यादा गुस्सा शरीर के लिए नुकसानदायक होता है . गुस्सा क्या है? गुस्सा एक साइकोलोजिकल स्टेट ऑफ माईंड, जब हम अपने आस पास की चीजों और व्यवहार से संतुष्ट नहीं होते हैं तब गुस्सा आता है. अब जरा मेडिकल साइंस की बात कर ली जाए. गुस्सा आना आपके नोर्मल होने की निशानी है पर ज्यादा गुस्सा आना ठीक नहीं है, लेकिन अगर आपको गुस्सा आता ही नहीं है. तो ये गुस्सा आने से ज्यादा खतरनाक है. गुस्सा दबाना शरीर और दिमाग पर बुरा इफेक्ट डालता है. जिससे नींद कम हो जाती है.  गुस्से को दबाने का शरीर और मन, दोनों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। नींद नहीं आती, थकान होती है, एकाग्रता कम होती है और इन सबका परिणाम अवसाद, चिंता और अनिद्रा के रूप में सामने आ सकता है. जिनसे कई गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं पर गुस्से के कई कुछ सकारात्मक पहलू  भी है .बात न तो नयी और न ही अनोखी. हाँ बस जरा सा नजरिया बदला है .इस दुनिया में बहुत कुछ बुरा है पर जो कुछ अच्छा है या हो रहा है वो कुछ लोगों के गुस्से के कारण ही है . जो स्टेटस-को मेंटेन नहीं रखना चाहते हैं जो गलत बात के आगे झुकना नहीं चाहते हैं. आइये देखते हैं गुस्सा किस तरह दुनिया और समाज को बदल रहा है अब जरा उन दिनों को याद करिये जब आपके घर में टीवी नहीं था और आपको पड़ोसी के घर टीवी देखने जाना पड़ता था. तब कैसा लगता था  बहुत गुस्सा आता था न लेकिन आपके गुस्से ने घर वालों को एहसास कराया कि घर में टी वी की जरुरत है .आइये थोडा पीछे चलते हैं बात महात्मा गाँधी की साऊथ अफ्रीका में उन्हें इसलिए ट्रेन से उतार दिया जाता है कि वो एक हिन्दुसतानी हैं. उन्हें भी गुस्सा आया था पर इस गुस्से को व्यक्त करने का तरीका उनका थोडा अलग रहा अहिंसा  का इस्तेमाल करके उन्होंने देश को आज़ाद कराने की कोशिश की .जिसमें वो कामयाब भी रहे .अक्सर गुस्से का सम्बन्ध संतुष्टि के स्तर से जुड़ा होता है. अब अगर आप संतुष्ट हो गए तो जो चीजें हमें मिली हैं. हम उन्हें वैसे ही स्वीकार कर लेंगे फिर न विकास की कोई गुंजाईश होगी और न बदलाव की. पर इसका मतलब ये मत निकालिए कि हमें बेवजह गुस्सा करने का हक मिल गया है कई बार गुस्सा हमारी सोच के गलत होने के कारण भी आता है. जिस चीज को आप पसंद नहीं करते अगर आप वही दूसरों के साथ कर रहे हैं तो इसका मतलब आपकी सोच सही नहीं है. ऐसे में आप के द्वारा यूँ ही लोगों पर सिस्टम पर गुस्सा करना गलत है. इसलिए गुस्सा  करते वक्त अपने दिमाग को खुला रखिये अगर आपका दिमाग कह रहा है कि आप सही हैं तो बिलकुल आपको गुस्सा करने का हक है. ऐसे में अपने गुस्से को निकालिए पर हाँ सभ्यता से गुस्से में आपको कुछ भी करने या बोलने का हक नहीं मिल जाता. आपके बॉस ने आपको डाटा आप बॉस का कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो ऑटो वाले पर अपना गुस्सा निकाल दिया. ये सही तरीका नहीं है. अपने एंगर का मैनजमेंट सही तरीके से अगर आप कर पायेंगे तो आपको लगेगा कि दुनिया को बेहतर बनाने में आपका योगदान दूसरों से कहीं ज्यादा होगा .क्या कहेंगे आप इस गुस्से के किस्से पर ..............

प्रभात खबर में 10/03/2022 को प्रकाशित 

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