Sunday, June 28, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत अंतिम भाग )

अब हुंडर के रेगिस्तान से चलने का वक्त था अब हमारे पास दो रास्ते थे वापस लेह लौट पड़ना या हुंडर से चालीस किलोमीटर दूर हॉट वाटर स्प्रिंग देखने जाना जहां गर्म पानी का सोता था |फैसला यह हुआ कि जब इतनी दूर निकल ही आये हैं तो हॉट वाटर स्प्रिंग को क्यों छोड़ दिया जाये |तो डिस्किट से सख्लरहोते हुए हम पनामिक हॉट वाटर स्प्रिंग देखने निकल पड़े सुबह के नौ बजे थे पर धूप तेज थी ये अलग बात है कि हवा की ठंडक से धूप चुभ नहीं रही थी |
गर्म पानी का सोता 
चालीस किलोमीटर मतलब कम से कम हमें डेढ़ घंटे वहां पहुँचने में लगेंगे |रास्ते में पड़ते हुए गांव मुझे उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गांवों की याद दिला रहे थे |गांव का सूनापन मुझे अपने बचपन की याद दिला रहा था जब गर्मी की छुट्टियों में हम गांव जाया करते थे और दोपहर में गांव एक दम सूने लगते थे ,पर बाहर चलती ठंडी हवा ये बता रही थी कि ये उत्तरप्रदेश की जेठ की दोपहरी नहीं है |ऊंची नीची बल खाती सड़क और बर्फ से लदे पहाड बीच –बीच में पत्थर के बने स्तूप और झंडीदार  गेट और प्रार्थना चक्र हमें बता रहे थे ये लद्दाख है |अगर बर्फ के लदे पहाड़ों को निकाल दिया जाये तो पूरा नुब्रा घाटी का इलाका किसी रेगिस्तानी इलाके का एहसास कराता है |कांटेदार झाडियाँ जिनसे खेत और मेड की हदबंदी की गई है |पनामिक से सियाचिन मात्र सत्तर किलोमीटर दूर था पर वहां के लिए आवश्यक तैयारी न होने के कारण हम वहां तक नहीं जा सके ऐसा ही कुछ कारगिल के साथ हुआ दोनों जगहें हमारी पहुंच में थी पर हम पहुंच न पाए |
पनामिक वाटर स्प्रिंग में एक मानव निर्मित कुण्ड है जिसमें ऊपर पहाड़ों से गर्म पानी आता है मैं थोड़ा ऊपर तक गया उसके स्रोत को खोजने गया पर गर्म पानी की कतार के अलावा कुछ पा नहीं पाया |हालँकि हम नुब्रा से नहा के चले थे पर प्राकृतिक रूप से गर्म पानी से नहाने का लोभ नहीं छोड़ पाए चूँकि नहाने का कुण्ड बहुत साफ़ सुथरा था और किसी छोटे स्विमिंग पूल का आभास दे रहा था तो डुबकी मारने में कोई बुराई नहीं थी ,मैंने धीरे से पैर उसमें डाला था कि लगा  पैर जल जाएगा |पैर तुरंत निकाल लिया और उस कुण्ड में नहाने की हिम्मत नहीं पड़ी |कुण्ड के साथ कइ बात रूम बने थे जिसमें बाल्टी से नहाया जा सकता था |उस बाथरूम में भी उसी सोते से पानी आ रहा था जहां से कुण्ड में आ रहा था तो धीरे –धीरे बाल्टी से नहा कर, प्राकृतिक रूप से गर्म पानी से नहाने का लुत्फ़ उठाया |दुर्भाग्य से उसी वक्त कैमरे की बैटरी जवाब दे गई और मोबाईल पहले ही डिस्चार्ज पड़ा था इसलिए वहां की ज्यादा तस्वीरें न ले पाया |
श्योक नदी सफर की साथी 
अब हम वापस लेह लौट रहे थे इस बार मैंने यह सोचा था कि खार्दुन्गा ला पर थोड़ी ज्यादा देर रुकेंगे पर आधे रास्ते लौटने पर पता पड़ा खार्दुन्गा ला में कोई गाड़ी पहाड़ी से नीचे गिर गई है |रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है इसलिए रास्ता बंद है |ये स्थिति बहुत विकट थी पर नजीर समझदार निकला उसने मुझे बताया हमें अस्सी किलोमीटर ज्यादा चलना पड़ेगा पर हम शाम तक चांग ला होते हुए लेह पहुंच जायेंगे |रोड पर खड़े रहने से चलते रहना बेहतर था |गाड़ी वापस मुडी और एक दूसरे रास्ते पर निकल पड़ी ये वही रास्ता आगे चलकर उस रास्ते से मिल जाना वाला था| जो पेंगोंग से लेह जाता है |ये रास्ता ज्यादा खराब था कहीं कहीं तो सड़क एकदम थी ही नहीं |पर नजीर को अंदाज़ा था इसलिए गाड़ी आगे बढ़ती रही |आधे रास्ते तक श्योक नदी हमारे साथ –साथ चलती रही मेरे लिए नदी समय काटने का अच्छा जरिया बनी |मैं उसकी धारा देखते और न जाने क्या –क्या सोचते हुए अपना सफर तय करता रहा|ऐसी कितनी दुर्गम जगहों पर मानव सभ्यता बसी और पनपी |प्रक्रति दोनों हाथों से  अपनी खूबसूरती लुटा रही थी |गाड़ी बीस की रफ़्तार से बढ़ी जा रही जहां रोड मिलती उसकी गति बढ़ जा रही थी |चूँकि पूरा लद्दाख सैन्य द्र्ष्टि से संवेदनशील है इसलिए सेना की गतिविधियां आपको हर  जगह दिखती रहेंगी पर कश्मीर घाटी जैसा नकारातमक मामला यहां नहीं है |
ऐसे प्रार्थना चक्र जगह -जगह देखे जा सकते हैं 

हम देर शाम लेह पहुंच गए |अब हमारी यात्रा समाप्त हो रही थी |आख़िरी दिन मैंने सौगत के साथ उसके ऑफिस में गुजारने का फैसला पहले से ही कर लिया था |सिंधु समारोह लेह में मेरे लौटने के अगले दिन शुरू हो रहा था |पूरा प्रशासन उसकी तैयारियों में व्यस्त था सौगत बार –बार मुझसे आग्रह कर रहे थे कि रुक जाओ मैं सस्ता टिकट करवा दूँगा अपना टिकट कैंसिल करवा दो, लखनऊ छोड़े ग्यारह दिन हो चुके थे |सिंधु समारोह का हिस्सा मैं भी बनना चाहता था पर 
लेह में आख़िरी रात 
परिस्थितयां ऐसी नहीं थी कि मैं रुक पाऊं |उस दिन हमने दिन का खाना उसके ऑफिस में साथ –साथ खाया |मेरे लिए खास कर लेह के बेहतरीन मोमो मंगवाए गए |उस दिन सौगत ने ऑफिस से जल्दी छुट्टी की |आमतौर पर वह रात के नौ बजे घर पहुंच पाता है पर उस दिन रात आठ बजे हम उसके घर पर इक्कठा हो चुके थे |मटन पक रहा था और कैम्प फायर की आग जल चुकी थी |अगले दिन सुबह सुबह हमारी दिल्ली के लिए उड़ान थी और मैं थोड़ा जल्दी गेस्ट हाउस पहुंचना चाहता पर सौगत ने अपनी टिपीकल स्टाईल में कहा चाचे इतनी जल्दी किस बात की है तुझे कल तो तू चला ही जायेगा |रात के डेढ़ बजे तक महफ़िल सजी रही |सौगत का वश चलता तो वो सारी रात न सोने देता पर मेरी हालत पर तरस खाकर उसने डेढ़ बजे हमें मुक्त कर दिया |गर्मी की उस ठंडी रात में हमने भारी मन से उससे विदा ली |यात्रा जरुर खत्म हो रही थी पर जिंदगी का सफर जारी था |हम वापस अपनी दुनिया में कुछ सुहानी यादों को जोड़े हुए लौट रहे थे |सच में कभी –कभी जिंदगी कितनी खूबसूरत लगती है |सौगत तुम याद आते हो बस ....................  
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समाप्त 

Friday, June 26, 2015

बर्फ के पहाड़ों से सीखें जिंदगी का फलसफा

वैसे गर्मी की बात आते ही पहला ख्याल जो जेहन में उठता है वो है गर्मी की छुट्टियाँ तो इस बार छुट्टियों में मैं भी लद्दाख की यात्रा पर निकल गया ,मैं समझ गया आप क्या सोच रहे हैं यही न की मैं छुट्टी  पर गया तो इससे आप सबको क्या मतलब .बात सही है पर आप इतनी जल्दी अधीर क्यों हो जाते हैं मैं जानता हूँ कि मेरी लद्दाख यात्रा से आपको कोई मतलब नहीं है पर जो कुछ मैं आगे लिखने जा रहा हूँ उस कहानी का एक किरदार हम सब कहीं न कहीं हैं .अब देखिये न हम सब कहीं न कहीं एक यात्रा में तो ही न बच्चे से जवान और जवान से बूढ़े फिर मौत ये है हर इंसान की यात्रा का किस्सा है .तो आज हम अपनी लद्दाख यात्रा के बहाने जिन्दगी के फलसफे को समझने की कोशिश करते हैं .जब हम किसी भी यात्रा में चलते हैं तो सब कुछ थम सा जाता है भले ही ट्रेन या बस चल रही होती पर हमारे अन्दर सब कुछ कितना शांत हो जाता और हो भी क्यों न हों जब हम सफर में होते हैं तो बाकी की दुनिया से कट जाते हैं यानि अब उस दुनिया में होने वाली किसी भी हलचल से पर हमारा कंट्रोल नहीं होता है. वैसे जैसे ही हमारी यात्रा ख़त्म होती है हम फिर दुनिया में होने वाली घटनाओं से जुड़ जाते हैं.हर सफ़र की एक मंजिल होती है उसी तरह हमारे जीवन का अंतिम सत्य तो मौत ही न ,अरे भाई डरिये मत जब हम सफ़र में निकलते हैं तो हमें क्या पता होता है कि सफर कैसा बीतेगा अब मुझे ही ले लीजिये दिल्ली एयरपोर्ट पर तीन घंटे इंतज़ार करना पड़ा .आखिर सफर जो करना था.उसी तरह जिन्दगी की इस यात्रा में कब ,क्या और कहाँ मिलेगा किसी को पता नहीं होता तो जिन्दगी में कल क्या होगा इस बात की परवाह किये बगैर अपना सफ़र जारी रखिये.वैसे भी किसी यात्रा में चलना ही हमारे हाथ में होता है बाकी ट्रेन ,बस या उस माध्यम पर निर्भर करता है जिस से हम यात्रा कर रहे होते हैं.
जब हम लेह में उतरे तो वहां  हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड थी जब पूरा भारत जलाने वाली गर्मी से झुलस रहा था हम रजाई लपेटे आग से हाथ ताप रहे थे चूँकि पुरी तैयारी से गए थे इसलिए उस ठण्ड का सामना आसानी से कर लिया तो जिन्दगी में हर रंग के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए क्या पता कब कौन सा जिन्दगी का रंग सामने आ जाए.वैसे लेह में भले ही ठण्ड थी पर धूप भी बहुत चमकीली निकलती थी तो दिन में ठण्ड उतना नहीं सताती थी .क्या समझे अरे भाई अगर यात्रा में कुछ कठिनाई आती है तो उससे निकलने का रास्ता भी.पूरा लद्दाख सर उठाये ऊँचे  पहाड़ो से घिरा है .कभी आपने गौर किया बर्फ से ढंके ये पहाड़ हमें बताते हैं जिन्दगी की यात्रा में भले ही कितनी मुश्किलें क्यों न आयें हमें तनकर उनका सामना करना चाहिए. हम नुब्रा घाटी की तरफ चले वहां का एन्वायरमेंट कई मामलों में अनोखा था पहले सूखे पहाड़ जिस पर एक तिनका भी नहीं उगता उसके बाद बर्फ से ढंका खार्दुंग ला  जहाँ ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और उसके बाद आयी नुब्रा घाटी जहाँ एक और रेगिस्तान था तो दूसरी ओर पहाड़ों से पिघलती बर्फ का पानी.अब देखिये न हमारी जिन्दगी भी तो ऐसी ही है ,कभी सुख तो कभी दुःख और हाँ कभी एक नीरसता भी जिसका कोई कारण नहीं होता फिर भी हम जिन्दगी का सफर तय करते रहते हैं. 
फिर हम विश्व प्रसिद्ध पैन्गोंग झील की तरफ जहाँ तेज हवाएं चलती हैं और शाम के वक्त झील के पास न जाने की ताकीद की जाती है पर इतनी तेज हवाओं में भी झील का पानी एक दम शांत रहता है .सफलता पाना और सफलता को पचाना दो अलग अलग बातें हैं जिन्दगी में वही लोग लम्बे समय तक सफल होते हैं जिनके पाँव सफल होने पर भी जमीन पर टिके रहते हैं ठीक पेन्गोंग झील के पानी की तरह. तो आगे से जब भी किसी सफ़र पर निकालिएगा तो ये मत भूलियेगा कि ये जिन्दगी का सफ़र है और हर सफ़र की शुरुवात अकेले ही होती है लेकिन अंत अकेले नहीं होता साथ में कारवां होता है अपनों का अपने अपनों का यात्राएँ चाहे जीवन की हों या किसी दूर देश की या फिर घर से दफ्तर के बीच की ही क्यों न हो . सबकी यात्राओं का अपना अलग अलग सुख है .फिलहाल यह लेख लिखने  की अपनी इस  यात्रा को मैं  यहीं ख़तम करता हूँ ओर निकलता हूँ अपनी दूसरी यात्राओं की ओर.
आई नेक्स्ट में 26/06/15 को प्रकाशित 

Thursday, June 25, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत नवां भाग )

पहाड़ में ऊंट की सवारी 
      खार्दूंगा ला के बाद गाड़ियों की भीड़ कम हो गयी और अब ढलान शुरू हो गयी अब हम नीचे उतर रहे थे |पहाड़ों की बर्फ धीरे –धीरे ख़त्म होने लगी |अब पहाड़ धूसर रंग के हो चले थे,सन्नाटा,ठंडी हवा,तेज चमकती धूप के साथ अब हमारे साथ श्योक नदी भी चल रही थी,गर्मी का मौसम था पर नदी अभी उतना पानी नहीं था इस बार बर्फ देर से पिघल रही थी |साफ़ नीला पानी उस वीराने में भी आँखों को ठंडक दे रहा था वैसे पानी था भी बहुत ठंडा | नुब्रा घाटी श्योक और नुब्रा नदी के संगम पर बसी है | नुब्रा घाटी का प्रशासनिक केंद्र डिसकिट है और यहीं पर शुरुवात में हमारे रुकने की व्यवस्था की गयी थी |गेस्ट हाउस पहुँचने पर नुब्रा के बारे में जैसा सुना था वैसा कुछ नहीं लगा एक पहाडी गाँव और छोटी सी मार्केट ,दोपहर का समय था ज्यादातर दुकाने बंद थीं ,पूरा गाँव अलसाया सा घरों में बंद था |
श्योक नदी 
मुझे लगा यह तो नाम बड़े दर्शन छोटे वाली कहावत चरितार्थ हो रही है |न रेगिस्तान न ऊंट न नाखिल्स्तान ,नुब्रा घाटी के बारे में जैसा पढ़ा था ऐसा कुछ भी नहीं था |गेस्ट हाउस यूँ तो अच्छा था पर लेह के गीजर पैलेस जैसी सुख सुविधाएं भी नहीं थी |दिन में यहाँ बिजली नहीं आती तो कुल मिला कर बड़ा नीरस सा माहौल था |हम इसी उहापोह में थे कि क्या करें तभी सौगत का संदेसा आया कि यहाँ से दस किलोमीटर दूर हुन्डर गाँव है जहाँ हम सैंड ड्युन्स का मजा ले सकते हैं और वहीं कोई ओर्गेनिक रिसोर्ट है जहाँ हम टेंट में रुक सकते हैं |फैसला हमें करना था |मैं अनिर्णय की स्थिति का शिकार हो रहा था |एक बार फिर सौगत ने राह दिखाई कि कमरे में बहुत बार रुके हो इस बार टेंट में रुकने का मजा लो |मैंने भी सोचा चलो एक बार टेंट में रुकने का मजा लिया जाए |
पहाडी रेगिस्तान 
टेंट में बसेरा 
एक बार फिर सामान बाँधा गया और हम हुन्डर के ऑरगेनिक रिसोर्ट चल पड़े |अभी कुछ किलोमीटर ही चले होंगे कि सारा नजारा बदल गया |एक छोटा मोटा पहाडी रेगिस्तान हमारे सामने था |नजीर ने हमें बताया कि यहीं अभी हमें कैमल राईड करनी है यनि ऊंट की सवारी वो भी ऐसे ऊँटों पर जो सारे भारत में यहीं पायें जाते हैं यनी डबल हम्प्ड कैमल दो कूबड़ वाले ऊंट ,यह नुब्रा की खासियत थी |हरियाली बढ़ रही थी पर यह हरियाली उन कांटेदार झाड़ियों की थी जो नुब्रा के इस रेगिस्तान में ही पायी जाती हैं |हम ऑर्गेनिक रिसोर्ट पहुँच रहे थे चारों ओर फ़िल्मी माहौल वाले टेंट ,झूले और मचान दिख रहे थे |मन में थोड़ी सी शंका थी अगर यहाँ व्यवस्था ठीक न निकली तो .................|मेरा तो .तो ही रह गया सब कुछ अद्भुत थी |एक डबल बेड रूम वाला जिसके साथ अटैच्ड बाथरूम सब कुछ प्राकृतिक ,पानी पहाड़ों से सीधे आ रहा था |हमारे टेंट के सामने एक छोटा सा तालाब था जिसमें मछलियाँ तैर रही थी |बगल में एक मचान बना हुआ था जिस पर चढ़ कर हम पुरे एरिये को देख सकते थे |ऊँचे –ऊँचे सफेदा के पेड़ ,पहाड़ों के बीच यह रिसोर्ट बना था|दिन में कोई बिजली नहीं दी जाती है सब कुछ प्राकृतिक था रौशनी के लिए सूरज,पानी पहाड़ों से सीधे आता हुआ | प्रकृति की गोद में हजारों बार यह शब्द पढ़ा है और शायद सैकड़ों बार लिखा भी है पर महसूस पहली बार कर रहा था |चाय पानी करके अब सैंड ड्युन्स का मजा लेना था |
डिसकिट मोनेस्ट्री
आते वक्त दूर से ही देखा था पर जैसे ही हम वहां पहुंचे लगा यह लद्दाख में ही संभव है चारो और पहाड़ कुछ पर बर्फ कुछ वीराने ,घाटी में दूर तक पसरा हुआ रेगिस्तान और बीच में बहता हुआ छोटा सा नाला उसके आस पास हरियाली ,दबंग सलमानखान के शब्दों में हम कन्फ्यूज हो गये कि हम हैं कहाँ  इसे रेगिस्तान कहें या  नखलिस्तान या पहाडी  इलाका ,पानी भी था ही |लोग ऊंट की सवारी का मजा ले रहे थे |पंद्रह मिनट की सवारी के दो सौ रुपये प्रति सवार कोई हाय हाय किच किच नहीं न कोई मोल भाव सब कुछ शान्ति से सम्पन्न हो रहा था लोग आ रहे थे लोग जा रहे थे |सूरज डूब रहा था हवा ठंडी हो रही थी लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी |वैसे लोगों के हुजूम को भीड़ कहना भीड़ के साथ ज्यादती होगी इतने विशाल क्षेत्र में शायद सौ या  दो सौ लोग होंगे|
रेगिस्तान में नखलिस्तान और नजीर 
शाम होते ही आसमान तारों से भर गया इतना साफ आसमान और तारों की झिलमिल हम वाकई प्रकृति की गोद में थे |रिसोर्ट में कैम्प फायर की व्यवस्था थी पर मैंने अपने टेंट में तान के सोने की सोची |रात शांत थी सिवाय कुछ कुत्तों की आवाज के जो रात भर भौंकते रहे |सुबह मैंने जल्दी उठकर बाहर घूमने की सोची पर ठण्ड के कारण हिम्मत न पडी |
सुबह हम डिसकिट मोनेस्ट्री की तरफ चल पड़े जहाँ सौ फीट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा लगी थी अपनी उंचाई के कारण यह मूर्ति पूरे डिसकिट में आसानी से दिखती है |बुद्ध का इतना आकर्षक और रंग बिरंगा रूप आप लद्दाख की विभिन्न मोनेस्ट्री में ही देख सकते हैं |देश के बाकी भागों में बुद्ध की मूर्तियाँ बहुत सादगी लिए होती हैं |
दिन के नौ बजे रह रहे थे हमारा अगला पड़ाव डिसकिट से सख्लर होते हुए पनामिक हॉट वाटर स्प्रिंग था जहाँ सोते से गर्म पानी निकलता है |यूँ तो यह एक गर्म पानी का सोता था पर ठण्ड में गर्म पानी के सोते को देखने का अपना लग सुख होता है |
 जारी .........................................................


Wednesday, June 24, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत आठवां भाग )

लेह का नवनिर्मित टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर 
नुब्रा घाटी जाने  से पहले की एक रात का किस्सा हुआ यूँ की सौगत ने जम्मू कश्मीर राज्य का पहला टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर लेह में बनाया है |जब मैं पहले दिन यहाँ पहुंचा था तो यह आकार ले रहा था जिसका उदघाटन जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद को करना था |यह टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर एकदम यूरोपीय तर्ज पर बनाया जा रहा था |सौगत ने बेकार पड़े एक पुराने डाक बंगले को इसके लिए चुना और इसका नवीनीकरण कराया जहाँ लेह के पर्यटक स्थलों को आडियो वीडिओ के माध्यम से दिखाया जाता है |एक छोटा सा संग्रहालय भी यहाँ बनाया गया है जहाँ से आपको लद्दाख की सभ्यता संस्कृति की आपको झलक मिल सकती है |इसके अलावा यहाँ एक ऑक्सीजन बार भी जहाँ आप ऑक्सीजन की कमी होने पर भुगतान करके ऑक्सीजन ले सकते हैं |एक और ख़ास बात यह सरकारी होते हुए भी एक कोर्पोरेट शैली में काम करता है |मेरे लिए खुद यह हैरत की बात थी कि यह लगातार बारह  घंटे सातों दिन सुबह के नौ बजे से रात के नौ बजे तक काम करता है |चूँकि लेह में विदेशी पर्यटक बहुत ज्यादा आते हैं और एक तरफ चीन और दूसरी तरफ पाकिस्तान से लगा होने के कारण यह एक संवेदनशील पर्यटक स्थल है |यहाँ आने वाले विदेशियों को बहुत ज्यादा परेशानी होती है टूरिस्ट एजेंट परमिट के नाम पर उनसे ज्यादा पैसे ऐंठते हैं और परेशानी अलग से |
कारवां बढ़ा जा रहा है 
सौगत ने पर्यटकों को इन सब परेशानियों से निजात दिलाने का एक केंद्रीयकृत तरीका निकाला सब कुछ ऑनलाइन |आप दुनिया के किसी भी देश से यहाँ आ रहे हों आप पहले ही अपना पंजीकरण यहाँ आने के लिए करा सकते हैं |इस टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर में आपको सारा सम्बन्धित साहित्य नक्शों समेत उपलब्ध कराया जाता है |आप अपने समय के हिसाब से यह आंकलन कर सकते हैं कि आपको क्या –क्या चीजें देखनी हैं |एक साल पहले तक पेंगोंग और नुब्रा घाटी जाने के लिए भारतीयों को भी परमिट बनवाना पड़ता था |अब यह व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है पर विदेशियों के लिए अभी भी अनिवार्य है और इसी परमिट के लिए उन्हें कलेक्टर ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ते हैं |इस टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर के बन जाने से सभी को बड़ी सहूलियत होने वाली थी |मेरे दस दिन के लेह प्रवास में मैंने इसे पूरा आकार लेते देखा | वैसे भी मुझे और सौगत को साथ बैठने का मौका देर रात मिलता और हम न गेस्ट हाउस पर मिलते न उसके घर पर हम कोई एक सुनसान जगह चुनते जहाँ हमारी बतकही में व्यवधान डालने वाला कोई न हो ,हम ऐसी ही एक बैठकी की प्लानिंग कर रहे थे कि सौगत ने मुझसे कहा एक काम कर टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर चले जाओ पर किसी को यह नहीं पता चलना चाहिए कि तुम मेरे दोस्त हो ,तुम्हें एक सामान्य पर्यटक बन कर जाना है और सेंटर कैसे काम कर रहा है इसकी मुझे रिपोर्ट देनी है |
पहाड़ों के बीच खार्दूंगा ला का रास्ता 
काम मुश्किल था पर करना तो था रात के आठ बज रहे थे |मैंने अपने दिमाग में पुरी प्लानिंग कर ली |नजीर को भी मैंने नहीं बताया गाडी टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर से पहले रोक कर मैंने नजीर से बहाना बनाया कि मुझे बाजार को देखना है इसलिए वो वहीं रुके उसने मेरे साथ आने की भरसक कोशिश की |किसी तरह उसे मैंने गाडी में ही रुकने को मनाया और मैं पहुँच गया टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर ,काम अभी भी चल रहा था |रिसेशप्सन पर दो महिलाओं ने मेरा स्वागत किया मैंने अपने आपको एक दुर्घटना का मारा बताया जो लेह में चार दिन के लिए फंस गया और अब मैं लेह घूमना चाहता हूँ |उन दोनों महिलाओं ने शान्ति से मुझे सुना फिर मेरे सामने एक नक्शा रख दिया जिसमें लेह के आस-पास की सारे पर्यटक स्थल की जानकारी थी |उन दोनों महिलाओं ने भरसक मेरी या एक भटके हुए पर्यटक की मदद की |किसी सरकारी अभिकरण में इस तरह के व्यवहार की मैंने बिलकुल भी उम्मीद नहीं की थी |
खार्दूंगा ला 

जैसे ही मैं वहां से निकला सौगत की गाडी वहां पहुँच गयी और मुझे मजबूरी में उसके साथ जाना पडा |मुझे सौगत के साथ देखकर उन दोनों महिलाओं के चेहरे पर कोई भाव नहीं आये ,मुझे यह देखकर तसल्ली हुई कि यहाँ के लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि यहाँ कौन आया उनका जो काम है वो पूरी तल्लीनता से अपना काम करेंगी |मेरे साथ जो हुआ उसकी रिपोर्ट मैंने सौगत को दे दी और चलने से पहले वहां के विजिटर रजिस्टर में उन महिलाओं की तारीफ़ भी लिखी |उनके द्वारा दिए गए पर्यटन साहित्य को  मैं अपने साथ लखनऊ इस वायदे के साथ ले आया कि मैं इन सबका हिन्दी में अनुवाद करके भेजूंगा ,वो भी मुफ्त में क्योंकि वहां सबकुछ या तो उर्दू में था या अंग्रेजी में मुझे उम्मीद है अगली बार जब मैं लद्दाख जाऊँगा तो मुझे सारी पर्यटन सामग्री हिन्दी में भी मिलेगी |सौगत ने मुझसे वायदा किया जितनी जल्दी मैं इन सबका अनुवाद करके भेज दूंगा उतनी जल्दी इसका अनुवाद प्रकाशित करा दिया जाएगा |
उस रात हम करीब एक बजे तक देश दुनिया की बातें करते रहे ,कितना कुछ बदल गया था हमारे जीवन में ,कितना कुछ था हमारे पास याद करने को,कितना कुछ था जो हम पहले कितनी आसानी से कर लिया करते थे पर अब नहीं कर सकते |
फुर्सत के लम्हे 
हम दोनों की जिन्दगी बहुत तेजी से बदल रही थी पर ये रिश्ता इसलिए अहम् था कि हम दोनों में बहुत कुछ ऐसा था जो साझा था हम भले ही अक्सर न मिलते हों ,फोन पर भी एकाध महीने में बात करते हों पर हमारा दर्द का रिश्ता है |
अगले दिन हम नुब्रा जाने के लिए तैयार थे |एक बार फिर ऑक्सीजन सिलेंडर गाडी में डाला गया ,टॉफी और हाजमोला से जेबें भरी गयी |नुब्रा लेह से 120 किलोमीटर दूर है |चूँकि हमें एक रात नुब्रा में रुकना था इसलिए समय की कोई समस्या नहीं थी |हम सुबह आठ बजे नुब्रा के लिए निकल पड़े |शुरुवात में रास्ता समतल था धीरे –धीरे उंचाई बढ़ने लगी |मैं रास्तों का आनंद ले रहा था |
ये रास्ते हैं पहाड़ के ....
हम एक बौद्ध श्मशान से गुजरे दुर्भाग्य से मैं उसकी तस्वीर न ले पाया ,फैसला ये किया गया कि जब नुब्रा से लौटेंगे तो तब थोड़ी देर वहां रुका जाएगा |पर लौटते वक्त हमें रास्ता बदलना पड़ा और वो श्मशान हमसे छूट गया |पहाड़ों का वीराना बढ़ रहा था ,सामने बर्फ से लदे पहाड़ थे जिनके बीच में से हमें गुजरना था |नुब्रा घाटी के लिए रास्ता खार्दुन्गा ला पास को पार कर जाना होता है | गेस्ट हाउस में हम जिस सुइट में रुके थे उसका नाम भी खार्दुन्गा ला था | खार्दुन्गा ला दुनिया की सबसे उंचाई पर बनी सड़क थी जिस पर गाड़ियाँ चल सकती थी |जैसे –जैसे खार्दुन्गा ला पास आ रहा था हमें लग रहा था जैसे हम बर्फ के देश में हो |चारों तरफ बर्फ पहाड़ पर बनी सडक ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने सफ़ेद कपडे पर पेन्सिल से रेखाएं खींच दी हों |

खार्दुन्गा ला पर गाडीयों की एंट्री होती है और आधे से ज्यादा पर्यटक यहाँ से वापस लेह लौट जाते हैं |आधे ही नुब्रा की ओर रुख करते हैं |तेज धूप निकली हुई थी पर बीच –बीच में मौसम बदल जाता और बदली छा जाती और हल्की बर्फबारी होने लगती | खार्दुन्गा ला पास पर अफरा तफरी का लाम था चारों तरफ गाड़ियाँ और लोग ,कुछ उस बोर्ड पर जाकर फोटो खिंचवा रहे थे जहाँ लिखा था दुनिया की सबसे ऊँची गाड़ियों के चलने लायक रोड |
जारी ...............................................................


Tuesday, June 23, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत सातवाँ भाग )

स्पितुक गोम्पा 
पेंगोंग से आने के बाद थकान तगड़ी थी इसलिए अगले दिन दूर नहीं जाने का फैसला किया |स्पितुक गोम्पा हमारे गेस्ट हाउस से दिखता था |आज इस गोम्पा की बारी थी |लेह में गोम्पा यत्र तत्र सर्वत्र फैले हैं |कुछ नए हैं कुछ पुराने हैं सबकी बनावट एक जैसी है पर चूँकि विदेशी पर्यटक वहां ज्यादा जाते हैं इसलिए भारतीय भी पहुँच जाते हैं |मैंने अपने लेह प्रवास में एक बात गौर की |भारतीय पर्यटकों की रूचि गोम्पा में बस पर्यटन की द्रष्टि से ज्यादा होती है |वे वहां के इतिहास विकास में कोई रूचि नहीं दिखाते |पुरातत्व की द्रष्टि से संरक्षित गोम्पा में जरुर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की तरफ से एक दो बोर्ड लगा दिए गए हैं बाकी गोम्पा में आपको जानकारी देने वाला कोई नहीं मिलेगा |
सभागार में फिल्म देखते बच्चे 

स्पितुक गोम्पा जाने से पहले मुझे बताया गया कि वहां गोम्पा के ऊपर एक काली मंदिर है |मैं भी उत्साहित हो गया क्योंकि यहाँ मुझे मंदिर नहीं दिखे जिनका ऐतिहासिक महत्व हो या छोटे –मोटे मंदिर भी नहीं दिखे जबकि रोज सुबह जब हम सोकर उठते तो अनुराधा पौडवाल के भजन  जरुर कानों में सुनायी पड़ते |मैं कई बार गेस्ट हाउस से निकल कर जानने की कोशिश की कि यह कहाँ बज रहा है पर सिर्फ आवाज से ही संतोष करना पड़ा |पहाड़ की उंचाई पर बना स्पितुक गोम्पा एयरपोर्ट के एकदम करीब है कि आप रनवे पर विमानों के उड़ने और आने को देख सकते हैं |मेरी रूचि काली मंदिर में थी |मैंने फटाफट गोम्पा का एक चक्कर लगाया और उस काली मंदिर की तरफ बढ़ चला |जूते  उतार कर और कैमरा बंद कर हम उस मंदिर जैसे कक्ष में घुसे पर ये क्या यहाँ भी बुद्ध की कालीनुमा मूर्ति थी जिसे अज्ञानी हिन्दू काली समझ लेते हैं |मुझे इसका एक कारण यहाँ शराब का चढ़ना भी हो सकता हो हालंकि यहाँ साफ़ –साफ़ लिखा हुआ है कि यहाँ शराब चढ़ाना मना है पर मैंने एक रम की एक बोतल को चढ़े हुए देखा|लेह के गोम्पाओं में प्रसाद का समाजवाद मुझे पसंद आया आप गोम्पा में कुछ भी चढ़ा सकते हैं |हिन्दू मंदिर की तरह यहाँ प्रसाद का क्लास नहीं है कि लड्डू या पेड़ा  वो भी फलां सामग्री का ही चढ़ेगा |शायद शराब भी इसका एक रूप था | आज पहाड़ बर्फ से भरे थे हम सही वक्त पर पेंगोंग का चक्कर मार कर लौट आये थे |

लेह पैलेस 
स्पितुक गोम्पा के बाद बारी थी लेह पैलेस देखने की |नौ मंजिला मिट्टी से बनी  यह इमारत पूरे लेह में दिखती है जहाँ कभी यहाँ के राजा रहा करते थे अब खंडहर में तब्दील हो रही है |पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अब इसके जीर्णोधार का काम अपने हाथ में लिया और अब यहाँ बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है इसको अपने पुराने स्वरुप में लाने के लिए |इसमें कोई शक नहीं है कि आम लद्दाखी उत्तर भारत के मुकाबले बहुत ईमानदार है |आप जितने लोगों का टिकट मांगेंगे वो बगैर पूछ ताछ के उतना टिकट दे देंगे |टिकट कहीं भी चेक नहीं किया जाता आपने टिकट ले लिया यही बहुत है कोई भी आपसे टिकट के लिए दरियाफ्त नहीं करेगा |
लेह पैलेस से शहर बहुत खुबसूरत दीखता है |चारों तरफ बौद्ध मन्त्र लिखित झंडियाँ और उसके बीच में लेह और बर्फ से लदे पहाड़| लेह पैलेस घूमते घूमते दोपहर हो आयी थी सोचा गया क्यों न मार्केट का एक चक्कर लगा लिया जाए |हम मार्केट में घुसे ही थे कि नजीर के पास फोन आया कि डेढ़ बजे सिन्धु संस्कृति सभागार में एक फिल्म का शो है |हमें तुरंत उधर का रुख करना है |फिल्म की बात से मैंने सोचना शुरू किया यहाँ मैंने न तो कोई मल्टीप्लेक्स देखा न कोई पिक्चर हाल पूछताछ करने पर पता चला दशकों पहले दर्शकों की कमी के चलते यहाँ का एकलौता पिक्चर हाल बंद हो चुका है और यहाँ इतनी फिल्मों की शूटिंग होने के  बाद भी यहाँ के लोग इन फिल्मों को बड़े परदे पर नहीं देख पाते |सौगत ने एक अभिनव प्रयोग शुरू  किया है|जिला प्रशासन हर शनिवार को शहर के हर स्कूल के बच्चों को फिल्म दिखाता है और बच्चे इस प्रयोग से खुश हैं |फिल्म देखने के बाद शान्ति स्तूप को देखने का निर्णय लिया गया |
शांति स्तूप 
करीब पच्चीस साल बनाया गया यह स्तूप बुद्ध का एक मंदिर है और एक ऊँची पहाडी पर बना है |जहाँ से सूर्यास्त का नजारा देखना बहुत खुबसूरत लगता है |हम जब वहां पहुंचे सूर्यास्त में देर थी और ठंडी हवा इतनी तेज़ चल रही थी कि ज्यादा देर वहां खड़े रहना बहुत मुश्किल था |हमें वहां से जल्दी निकलना पड़ा |लेह में एक और व्यस्त दिन ख़त्म हुआ| रात हो आयी थी और मैं एक बार फिर सन्नाटे की आवाज सुनने के लिए तैयार था |अगले दिन नुब्रा घाटी चलने की तैयारी थी |
जारी .................................................

Saturday, June 20, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत छठा भाग )


घास चरते  याक 
पिछली रात सोते सोते दो बज गया तीन घंटे की नींद के बाद सुबह-सुबह  हमें विश्वप्रसिद्ध पेंगोंग झील देखने जाना था |कार्यक्रम यूँ रखा गया कि हमें सुबह ७ बजे गेस्ट हाउस से निकलना था | पेंगोंग झील की प्रसिद्धी चर्चित फिल्म थ्री इडियट्स की शूटिंग के बाद और ज्यादा बढ़ गयी है | पेंगोंग लेह से लगभग 150 किलोमीटर दूर है और रास्ता बहुत ही खतरनाक है |तो सफ़र की तैयारी रात में ही शुरू हो गयी थी |नजीर ने एक ऑक्सीजन का सिलेंडर पहले ही गाडी में रख लिया था |वैसे सैलानियों को पेंगोंग जाते वक्त ऑक्सीजन सिलेंडर साथ में रखने की हिदायत दी जाती है |
झील का किनारा 
रास्ते के लिए ढेर सारी हाजमोला और टॉफी भी जरुरी है |पूरा रास्ता गोल गोल है रास्ते में बर्फबारी भी होती है इसलिए गाडी में लोहे की चेन भी राखी जाती है जिससे बर्फ पर गाडी फिसले नहीं हमें चांग ला पास से गुजरना था जो दुनिया का दूसरा सबसे ऊँचा रास्ता था |
पेंगोंग के किनारे 
इस यात्रा में कारू में तैनात मेजर पंकज अपने परिवार के साथ चलने  वाले थे मतलब हमें सेना की निगहबानी में चलना था तो कोई समस्या नहीं थी |नाश्ते खाने की जिम्मेदारी सेना की थी और हमारे जिम्मेदारी घूमने की ,धीरे –धीरे उंचाई बढनी शुरू हो गयी और पहाड़ जो अभी तक वीरान दिख रहे थे उन पर बर्फ की चादर दिखनी शुरू हो गयी |जैसे –जैसे हम आगे बढ़ते गये बर्फ की परत मोटी होती गयी ,बीच –बीच में हमें जमे हुए तालाब और नाले दिख रहे थे |गर्मी का मौसम था और बर्फ पिघल भी रही थी पर बहुत धीरे –धीरे|पूरा रास्ता ऐसा ही है जब उंचाई बढ़ती तो पहाड़ सफ़ेद हो जाते जैसे ही उंचाई घटती पहाड़ का रंग बदल जाता ,इतने रंगीन पहाड़ सिर्फ लद्दाख में ही देखे जा सकते हैं |रास्ता बहुत लम्बा और थका देने वाला था याक के भी दर्शन बीच –बीच में हो रहे थे जो यहाँ वहां हल्की जमी हुई घास जैसी चीज चर रहे थे  |आज नजीर हमारे साथ नहीं आया था इसलिए ड्राइवर से मैंने बात करनी शुरू कर दी |
रंग बिरंगे पहाड़ 
अली मुहम्मद दसवीं पास था उसका घर नुब्रा घाटी से नब्बे किलोमीटर आगे चुलुन्ग्खा गाँव में था |उसके गाँव की कहानी बड़ी विचित्र थी| चुलुन्ग्खा 1947 से पाकिस्तान का हिस्सा था |1972 की लड़ाई में इस हिस्से को भारतीय सेना ने जीत लिया और तब से यह भारतीय गांव हो गया | अली मुहम्मद सेना से बहुत खुश था उसने बताया की सेना और गाँव वाले एक दुसरे की भरपूर मदद करते हैं |सेना की मदद से गाँव में स्कूल बना है और हॉस्पिटल भी ,अगर गाँव में कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाता है तो सेना उसे हेलीकॉप्टर से अस्पताल पहुंचाती है |विचित्र किन्तु सत्य गाँव वाले सेना के लिए कुलियों का काम करते हैं |अली मुहम्मद के आधे रिश्तेदार उस पार मतलब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हैं जिनसे वो कभी नहीं मिला पर अब व्हाट्सएप पर उनके वीडियो आते रहते हैं |
सेना के कैम्प के पास 
वो और उसका परिवार भारत के साथ खुश है |बात पाकिस्तान की हो रही थी पर हम जा चीन की तरफ रहे थे | पेंगोंग का दो तिहाई हिस्सा चीन में है और एक तिहाई लगभग  पैंतालीस किलोमीटर भारत में हैं | पांच घंटे का रास्ता बहुत लम्बा लग रहा था एक तो रात को सोने को नहीं मिला उस पर बगैर धूप का चश्मा लगाये बर्फ के बीच से दिन में गुजरना आँखें चुंधिया रही थी |दिन के करीब एक बजे हम लोग पेंगोंग पहुँच गये |तस्वीरें तो पेंगोंग की पहले भी देखी थीं पर यह उससे ज्यादा खुबसूरत थी |मैंने फैसला किया मैं तस्वीरें कम खींचूंगा और सुन्दरता को आँखों में ज्यादा समेट लूँगा |
हम सेना के बेस कैम्प में रुके जहाँ आम लोगों का प्रवेश वर्जित था और वहां खडी पेट्रोलिंग बोट की तस्वीरें खींचने की मनाही थी |मेजर पंकज ने बड़े प्यार से मेरे कान में कहा|कुछ देश की सुरक्षा से जुड़े मसलों पर बात हुई ,हमें भी सेना की बोट पर झील में कुछ देर नौका विहार करने का लुत्फ़ मिला | फिर हम उस जगह पहुंचे जहाँ थ्री इडियट्स के अंतिम हिस्सों की शूटिंग हुई वहां पानी में कुछ देर अठखेलियाँ की ,पानी बहुत ठंडा था |पेंगोंग खारे पानी की झील है मतलब झील में नमक बहुत ज्यादा है ,बाकी झील के इतिहास और भूगोल की जानकारी देने वाला कोई मिला नहीं तो हम बस उसे निहारते रहे रंग बिरंगे पहाड़ों के बीच नीले रंग की झील ,जिसके  पानी का रंग समय के साथ बदलता है इसका कारण उसके आस –पास रंग बिरंगी आभा छोड़ने वाले पहाड़ हैं |
थ्री ईडियट शूटिंग पॉइंट 
यहं कुछ टेंट वाले भी हैं जहाँ रात में टेंट में रुका जा सकता है |एक दो रिसोर्ट भी हैं पर शाम के वक्त झील के पास बहुत तेज हवा चलती है |इसलिए झील के पास न जाने की हिदायत दी जाती है |पेंगोंग तक किस्मत वाले ही पहुँचते हैं सोचते बहुत लोग हैं तो मैं अपनी किस्मत पर इतरा रहा था |प्रकृति का साथ कुछ गिने चुने लोग और शान्ति |मैंने सेना के जवानों से पूछा आप लोग इस वीराने में दिन भर करते हैं |उनका रूटीन निर्धारित है सुबह शाम झील में पेट्रोलिंग औरछुट्टी मिलने का इन्तजार की घर जा सकें |
पेंगौंग में नौका विहार 
तीन बज रहे थे और हमारे लिए सेना के कैम्प में खाना लग चुका था |हवा तेज हो रही थी और रास्ते में बर्फबारी होने का अंदेशा था |जल्दी से भोजन निपटा कर हम वापस लौट चले हाँ लौटते वक्त सेना के जवानों ने हमें कुछ पत्थर भेंट किये वो क्या हैं ,कैसे हैं अभी इसका उत्तर नहीं मिला |पेंगोंग आते वक्त कुछ ख़ास बातों का ख्याल धुप का चश्मा ऑक्सीजन का सिलेंडर ,गर्म कपडे वैसे आधे रास्ते आपको गर्मी लगेगी फिर ठण्ड तो मौसम की इस धुप छाँव के लिए तैयार हो कर आइये|
जारी .........................................................................

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत पांचवां भाग )

लद्दाख की सड़कों पर मोटरसाइकिल सवार 
लद्दाख आये हुए तीन दिन बीत चुके थे |आज चौथा दिन था पर पहले रात का किस्सा ,वैसे किस्सा कुछ यूँ है मुझे उदयपुर में अपने हॉस्टल के दिनों की रातें बड़ी याद आती हैं ऐसा ही कुछ लेह में हुआ |रात मतलब सम्पूर्ण शान्ति जब चारों ओर अँधेरा क्योंकि अभी लेह को शहरी करण का रोग नहीं लगा है |हम एयरपोर्ट के ठीक रुके थे पर रात में कोई विमान आते जाते नहीं थे इसलिए यहाँ  निस्तब्धता को महसूस किया जा सकता है |कभी कभार किसी कुत्ते की भौंकने की आवाज़ जरुर इस सन्नाटे को तोडती पर मैं रात को महसूस कर सकता था |इस सन्नाटे में जब मेरा आई पोड पुराने  गानों की मधुर लहरी छेड़ता तो लगता यही स्वर्ग है जब मैं अपने आपको ,अपने होने को महसूस कर पा रहा हूँ |कुत्ते भौंकने से याद आया ,लद्दाख शहर में कुत्ते बहुत हैं इनसे थोड़ी दूरी बनाये रखी जाए तो बेहतर है |गेस्ट हाउस का प्रमुख खानसामा अकबर अली था उसको मिला कर करीब दस लोग गेस्ट हाउस में थे जिनमें ज्यादा महिलायें और सभी मुसलमान पर कश्मीर घाटी के मुकाबले यहाँ भारत विरोधी कोई भावनाएं नहीं हैं |
सब ये चाहते हैं कश्मीर घाटी में शांति हो जाए ,घाटी के मुकाबले यहाँ का मुसलमान भारत विरोधी नहीं हैं ज्यादातर ने हिन्दी स्कूलों के बजाय फिल्मों और धारावाहिकों से सीखी है |यहाँ हिन्दी स्कूलों में सिखाई जाती है लोग कितने अमन पसंद हैं इसकी झलक तब मिली जब मैंने लेह की जेल देखी पर उसका किस्सा आगे |खैर आज हमारा कार्यक्रम आल्ची मोनेस्ट्री देखने जाने का था जो लेह से करीब 65  किलोमीटर दूर है |एक बार फिर हम रास्ते में थे रास्ते में जांसकर नदी हमारे साथ –साथ बह रही थी |खुबसूरत मीलों लम्बी सड़क जिस पर बाईक सवार यदा कदा दिख जाते ये वो लोग हैं जो मनाली या श्रीनगर से सड़क के रास्ते लद्दाख की खूबसूरती देखने आते हैं और ये सभी मोटरसाइकिल किराए पर मिलती हैं |चूँकि रास्ते में पेट्रोल पम्प बहुत कम हैं इसलिए सभी की बाईक के पीछे पेट्रोल से भरे केन जरुर दिखते हैं |पहले मैग्नेटिक हिल पर हम रुके यह वह जगह है जहाँ यह माना जाता है कि यहाँ की एक पहाडी में चुम्बकीय शक्ति है |हमारे लिए यह कोई कौतुहल का विषय नहीं था चूँकि यह आल्ची के रास्ते में था इसलिए यहाँ भी रुक लिए कुछ फोटो खींचीं |नजीर ने गाड़ी को न्यूट्रल में डाल कर छोड़ दिया गाडी आगे बढ़ने लगी |
मैग्नेटिक हिल 
यहाँ सैलानियों का जमावड़ा लगा हुआ था खासकर मोटरसाइकिल सवार जो सेल्फी स्टिक के साथ विभिन्न मुद्राओं में फोटो खींच रहे थे |हम उस भीड़ में कुछ और ही सोच रहे थे |आमतौर पर किसी पहाडी इलाके में हरे भरे पहाड़ दीखते हैं पर लद्दाख अलग है यहाँ पहाड़ इतनी ज्यादा उंचाई पर हैं कि ऑक्सीजन की कमी के कारण कुछ नहीं उगता यानि स्याह सफ़ेद पहाड़ और इन पहाड़ों के बीच खड़ा मैं अपने अस्तित्व की तलाश कर रहा था |सच है लद्दाख में तन मन एकाकार हो जाते हैं |सामने के पहाड़ सूने नंगे थे पर पीछे के पहाड़ों पर खासी बर्फ गिरी हुई थी |सूरज अपनी तेजी से चमक रहा था |ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है जब मैं सुख की घड़ी में तटस्थ हो जाता हूँ राग द्वेष से परे सुख दुःख से मुक्त बस मैं होता हूँ ऐसा ही कुछ यहाँ महसूस कर रहा था |लगता था घड़ियाँ रुक गयी हैं और मैंने समय के चक्र को उस मैग्नेटिक हिल पर रोक लिया था |मेरी तटस्थता को नजीर की आवाज ने तोडा :सर चला जाए |हाँ चलना ही तो है तभी तो यहाँ तक आ पहुंचे हैं अभी कितनी दूर जाना है पता नहीं |
संगम 
थोड़ा आगे जाने पर संगम था ,हाँ इसे भी संगम कहते हैं जहाँ जांसकर और सिन्धु का मिलन होता है यहाँ से सिन्धु ही आगे बढ़ती है और जांसकर नदी उसमें विलीन हो जाती है |यहाँ रिवर राफ्टिंग का मजा लिया जा सकता है |हम जब वहां पहुंचे ही थे की बहुत तेज आंधी आ गयी ,हमें भागकर अपनी गाडी में शरण लेनी पडी ,फिर बूंदाबांदी शुरू हो गयी |आल्ची मोनेस्ट्री बाकी की सारी मोनेस्ट्री की ही तरह है बस इसे पुरातत्व विभाग का संरक्षण हासिल है यहाँ पर भी सब कुछ वैसा  ही था |
बौद्ध मन्त्र लिखी हुई झंडियाँ बुद्ध की मूर्तियाँ और दीवारों पर बुद्ध के विभिन्न अवतारों वाले भित्ति चित्र जो पर्याप्त संरक्षण के अभाव में खराब हो रहे हैं |कुछ भी हो हमें अपनी विरासत सम्हालना नहीं आया |इसके लिए भी हमें यूरोप या अमेरिका से सीखना चाहिए |यहाँ खुबानी के कुछ पेड़ों से कच्ची खुबानी तोड़ कर खाने का लुत्फ़ उठाया |

आल्ची गोम्पा 


लद्दाख के अन्य गोम्पाओं के मुकाबले आल्ची गोम्पा के आस पास बड़ा बाजार सजा हुआ है शायद यहाँ विदेशी सैलानी ज्यादा आते हों |तरह तरह के स्मृति चिन्ह आप यहाँ से खरीद  सकते हैं पर कीमत के हिसाब से सब बहुत महेंगे हैं |खुबानी लद्दाख में सबसे ज्यादा होने वाला फल है |अन्य पहाडी भागों के मुकाबले यहाँ चीड या देवदार के पेड़ नहीं होते हैं यहाँ सफेदा नाम का पेड़ होता है जिसकी लकड़ियों का इस्तेमाल मकान की बीम बनाने में किया जाता है |ये पेड़ ऊँचें तो होते हैं पर इन पर पत्तियां कम होती हैं ,तना ज्यादा लम्बा होता है आकार में यूकेलिप्टस के पेड़ जैसा कुछ |
सफेदा पेड़ 
पास में ही आल्चीको बाँध (डैम ) था तो फैसला किया गया क्यों न इन मानव निर्मित नए तीर्थों के दर्शन कर लिए जाएँ |सिन्धु जांसकर नदी पर पर बना यह बाँध दूर से ही दिखाई देता है |बाँध की तलहटी में खासी हरियाली है जहाँ सुंदर सरसों के फूल खिले हुए थे |किसी बाँध को करीब से देखने का यह पहला अवसर था |बाहर से यह बाँध भी बाकी के सारे बांधों जैसा ही है |पानी की एक एक विशाल धारा उपर से नीचे गिर रही थी और उसकी बौछारें हम तक आ रही थीं |चूँकि बाँध के आस –पास फोटोग्राफी वर्जित है इसलिए हम मन मसोस कर रह गये |अब बाँध के अन्दर जाना था जमीन से लगभग साथ फीट नीचे हम ऊपर बहती नदी के ठीक नीचे थे |यह विज्ञान का चमत्कार ही था उपर नदी अपने पूरे वेग में बह रही थी और उसके ठीक नीचे आलीशान एक विशाल कक्ष बना था जहाँ टर्बाइन लगी हुई थी
आल्चीको डैम 
जो जल उर्जा को विद्युत् उर्जा में बदल रही थी |सब कुछ कम्प्युटरीकृत बाँध के दरवाजे भी कंप्यूटर से खोले और बंद किये जाते थे |दीवारों में कई तरह के कंप्यूटर लगे हुए थे जो लगातार बाँध से सम्बन्धित सूचनाएं प्रेषित कर रहे थे |वहां के इंजीनियर बड़ी तत्परता से हमें एक –एक चीज समझा रहे थे |हम जितने नीचे आये थे उसके दुगुने नीचे टर्बाइन के पर थे |मुझे यह जानकर बड़ी हैरानी हुई कि बाँध की उत्पादन क्षमता पैंतालीस मेगावाट थी पर उससे उत्पादन मात्र पंद्रह मेगावाट का हो रहा था |बाँध इतनी बिजली बनाने में सक्षम था कि जिससे पूरे कश्मीर की बिजली मांग को पूरा किया जा सकता था पर ग्रिड न होने के कारण यह बाँध अपने द्वारा उत्पादित बिजली को किसी को बेच नहीं सकता था यहाँ
आल्चीको डैम की तलहटी 
तक पुरे लेह क्षेत्र में बिजली कटौती होती है भले ही वह कुछ देर की हो  |ग्रिड कब तक लगेगी मैंने पूछा जवाब आया कम से कम बीस साल अगर आज काम शुरू हो जाए तो ,तब तक बाँध को कम बिजली बनानी पड़ेगी | बीस साल का समय इस लिए बताया गया क्योंकि यह उंचाई पर बसा क्षेत्र था जहाँ खम्भे लगाना एक दुरूह कार्य था |वहां तीन विशाल टर्बाइन लगे हुए थे पर उत्पादन एक से ही हो रहा था |फोटो खींचने की मेरी आतुरता को देखते हुए मुझे वहां बाँध के एक मॉडल की फोटो कुछ सोचकर इजाजत दे दी गयी पर उस मॉडल के पास एक कौतुहल मेरा इन्तजार कर रहा था उस मॉडल के पास एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था जहाँ तरह –तरह के भगवान्  सजे थे |
बाँध का मॉडल 
आश्चर्य किन्तु सत्य कारण में भरोसा रखने वाला विज्ञान भी भगवान भरोसे था | 


पत्थर साहिब गुरुद्वारा 
इन विशाल वीरान पहाड़ों से  गुजरते हुए बार –बार मेरा मन यहाँ के वन्य जीवन के बारे में सोच रहा था ,तभी एक पहाडी लोमड़ी हमारे सामने आ गयी पर हमारे दस दिन के प्रवास में और किसी जंगली जानवर के दर्शन नहीं हुए जबकि हम औसतन सौ किलोमीटर प्रतिदिन इन्हीं वीरानों में चलते थे.नजीर ने जरुर बताया कि उसने पहाडी तेंदुआ को कई बार देखा है और वह भी वहां जहाँ हम रुके हुए हैं यानि हमारे गेस्ट हाउस के पास |
पहाडी लोमड़ी 
लौटते वक्त पत्थर साहिब  गुरुद्वारा में कुछ देर के लिए रुके यह गुरुद्वारा सेना द्वारा बनवाया गया है जहाँ सेना लंगर चलाती है |
उसके बाद सेना द्वारा निर्मित हाल ऑफ़ फेम संग्रहालय देखा गया जहाँ कारगिल युद्ध से जुडी हुई बातों के अलावा लद्दाख के इतिहास भूगोल की अच्छी जानकारी मिलती है इसके बगल में बच्चों के लिए सेना पार्क है जहाँ सेना की ट्रेनिंग के दौरान जो ,जो करतब करने पड़ते हैं वो सारे बड़े मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत किये गए हैं |
हाल ऑफ़ फेम संग्रहालय 
यह पार्क सेना के उन सामानों से बनाया गया है जो अब खराब हो चुके हैं |टिकट चालीस रुपये मात्र जबकि संग्रहालय का किराया पचीस रुपये मात्र |
शाम को शहर के एस एस पी ने एक छोटी सी दावत रखी थी वो लखनऊ के ही हैं और सौगत के बताने पर कि लखनऊ से उनका एक दोस्त आया हुआ हमें भी उस पार्टी में आमंत्रित किया गया |सुरों से सजी हुई उस पार्टी में कब रात के एक बज गए हमें खुद ही नहीं पता चला |सौगत ने मेरा परिचय शहर के एस एस पी सुनील कुमार गुप्ता से मेरा परिचय कराया |उनको देखते ही मुझे लगा कि इनको कहीं देखा है पर कहाँ ये बहुत दिमाग पर जोर डालने के बाद भी समझ नहीं आया |
एस एस पी डॉ सुनील गुप्ता (बीच में )
मैंने अपनी शंका सौगात से शेयर की और उनका जवाब हमेशा की तरह वैसा ही था जैसा की अमूमन ऐसे मुद्दों पर होता है अबे छोड़ न एक ही शहर कहीं देखा होगा |खैर एस एस पी साहब से जब बात चीत शुरू हुई तो पता चला हम एक ही समय में लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ें हैं |यह लखनऊ लौटकर पता चला हम और वो ग्रेजुएशन में एक ही क्लास में पढ़ा करते थे |उनका घर भी मेरे घर के पास ही निकला |अब बात चीत मुड़ चली थी शहर की कानून व्यवस्था पर मैंने अपना एक ओब्सर्वेशन उनसे शेयर किया |मैंने दिन में लेह का केन्द्रीय कारागार देखा था |उसकी दीवारें इतनी छोटी थीं की जेल के अन्दर का द्रश्य बाहर से बड़े आराम से दिखता है और जेल है भी बहुत छोटी मतलब उसका परिसर बहुत विशाल है पर दो चार कमरे ही बने दिखते हैं जिनसे कभी भी कोई भाग सकता है | जब मैंने अपनी यह शंका सुनील से जाहिर की तो उन्होंने एक और मजेदार बात बताई लेह जेल में इस वक्त मात्र 32 कैदी हैं जिनमें से 9 विचाराधीन है और कारगिल जिले के कैदी भी यहीं हैं |अब आप अंदाजा लगा सकते हैं लेह में अपराध कितना कम है |मेरा व्यक्तिगत रूप से यह मानना है लेह में आकर आपको लगता ही नहीं आप भारत में है जैसे पहाडी सड़क पर अक्सर  गाड़ियों का आमना सामना हो जाता है गलती किसी भी की हो गाली क्या मैंने अपने ड्राइवर को भुनभुनाते नहीं देखा गाली तो लगता है जैसे यहाँ दी ही नहीं जाती ये अलग बात है एक बार मैंने गेस्थाउस के कुक को गाली देते तब सुना था जब उसने बताया की चार घंटे से बिजली नहीं आ रही है और आप डी सी साहब (सौगत ) को फोन करो |लड़कियां औरतें पुरुषों से ज्यादा काम करती हैं और कोई ऐसा काम नहीं है जो वो न करती हों ,जहाँ पुरुष अधिपत्य हो ,लोग अनजान आदमी से मिलते हुए भी जुले अभिवादन करना नहीं भूलते|जिन्दगी थोड़ी मुश्किल है पर लोग खुशहाल हैं |
जारी ....................................................................

Friday, June 19, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत चौथा भाग )



थिकसे मोनेस्ट्री 
 थिकसे गोम्पा दूर से ही दिखाई पड़ता है भव्य ,खुबसूरत कुछ सीढियां चढ़कर हम गोम्पा के भीतर थे ,बुद्ध की विशाल प्रतिमा ,सारे गोम्पा का एक ही जैसा कार्यक्रम होता है और एक जैसी ही संरंचना ,यह लामाओं की एक पुरी दुनिया है जहाँ उनके काम की सारे चीजें मौजूद हैं इसलिए बाहरी दुनिया से जुड़ाव की उनकी कोई जरुरत ही न हो सुबह शाम प्रार्थना और बाकी के वक्त में पठन पाठन यहाँ मेरी मुलाक़ात स्तेंजीन लामा से हुई जो पिछले सताईस वर्षों से इस मठ में हुई |
स्तेंजीन लामा के साथ 
मेरी बात तो शुरू हुई थी बुद्ध के काली रूप को लेकर क्योंकि जहाँ तक मेरी जानकारी है बौद्ध धर्म दुनिया का एक मात्र ऐसा धर्म है जहाँ हिंसा के लिए रत्ती भर जगह नहीं है फिर ये काली रूप वाले बुद्ध की मूर्ति क्यों उन्होंने अपनी हिन्दी में मुझे समझाने की पूरी कोशिश की पर मेरी जिज्ञासाओं का अंत न देखकर उन्होंने मुझसे कहा कि वो हिंदी में मुझे समझा नहीं सकते लद्दाखी मुझे नहीं आती थी और वो अंग्रेजी जानते नहीं थे |पर मामला यहीं खत्म नहीं हुआ मैंने उनसे घर परिवार के बारे में जानकारी ली |उन्होंने बताया की वो जब छोटे थे तभी से यहाँ आ गए पर बीच –बीच में घर आते जाते रहते हैं |मैंने पूछा कि आपका मन घर परिवार बसाने का नहीं होता,उनका सीधा जवाब था नहीं पर कैसे इस प्रश्न का जवाब न दे पाए |शायद या तो मैं अज्ञानी था मुझे और कुछ पढने की जरुरत थी या वो बहुत ज्यादा विद्वान् हर गोम्पा में मैंने हिन्दू धर्म के अवतारों की तरह महात्मा बुद्ध की अनेक रूपों में मूर्तियाँ और भित्ति चित्र देखे |
थिकसे मोनेस्ट्री 
ऐसा क्यों और कब हुआ इस जिज्ञासा का समाधान पूरी यात्रा में नहीं हुआ |यह बौद्ध धर्म पर हिन्दू धर्म का प्रभाव था या कुछ और कारण ,भाषा की समस्या एक बड़ी बाधा थी हालांकि नज़ीर हमारे साथ था जो स्थानीय निवासी था पर वह मुसलमान था शायद इसी कारण वह किसी गोम्पा में हमारे साथ अन्दर नहीं जा रहा था |यह मैं अंदाजे से कह रहा हूँ मैंने कई बार उसे अंदर चलने के लिए कहा पर उसने कोई न कोई कारण देकर मुझे निरुत्तर कर दिया |वैसे भी भारत एक महान देश है यहाँ कानून का राज़ नहीं भावनाओं का राज़ चलता है तो उसकी भावनाएं आहत न हों जाएँ इसलिए मैंने जोर नहीं दिया,इस समस्या का जिक्र मैंने सौगत से भी किया और इस बात की गुजारिश की कि लेह के किसी पढ़े लिखे विद्वान् से मेरी बात करा दो पर ऐसा कोई मिल न सका कारण सीधा था पुरे लेह (लद्दाख ) में कोई विश्वविद्यालय नहीं है जहाँ कोई तटस्थ व्यक्ति   निरपेक्ष तरीके से 
आपकी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके ,बाकी विद्वान् तो कई हैं पर सब अपने नजरिये को थोपने की कोशिश करते हैं जैसा यहाँ लामा कर रहे थे |
थिकसे का प्रार्थना चक्र 
थिकसे गोम्पा के बाद बारी थी “शे पैलेस” देखने की,पहले यह लद्दाख के राजा का महल था पर अब  यहाँ बुद्ध का विशाल मंदिर है,पूरा परिसर सन्नाटे में था,ज्यादातर कमरे बंद थे चूँकि यह मंदिर था  यहाँ गोम्पा की तरह लामाओं की पढ़ाई  का काम नहीं होता है इसलिए यहाँ ज्यादा लामा नहीं रहते हैं  फिर तीस रुपये का टिकट कटाकर और जूते  खोलकर मैं अंदर गया |जिस लामा ने टिकट दिया वही हमारे साथ अंदर आया,नजारा कुछ ऐसा था बुद्ध की विशाल मूर्ति जिसका सर हमारे सामने थे बाकी का धड जमीन से कई फुट नीचे था जिसके पैरों के पास लद्दाखी परम्परा गत कपडे का टुकड़ा जिसको पहनाकर किसी अतिथि का स्वागत करते हैं सैकड़ों की संख्या में चढ़ाये हुए थे |
बुद्ध की विशाल प्रतिमा 
मुझे लगता है वो ऊपर से नीचे डाल दिए गये थे |वैसे सफ़र में सोचना सफर के मजे को खराब कर देता है पर एक मैं था जो सफर में होते हुए सोचे जा रहा था सारे मठ मंदिर आज से दौ सौ तीन सौ साल पहले बनाए गए थे तब न बिजली थी न सड़कें कैसे रहते होंगे यहाँ लोग इतनी विषम परिस्थितयों में ,मंदिर के अन्दर फोटो खींचने की मनाही थी |मैं मंदिर के चढ़ावे पर ध्यान देने लगा,माजा की बोतल,सोयाबीन के तेल की बोतलें,डिब्बाबंद दूध,डिब्बाबंद जूस, और न जाने क्या क्या और तो और जीरो कोक के कई केन भी चढ़े थे |मैंने वहां के पुजारी से पूछा हिन्दू मंदिरों में जो चढ़ावा चढ़ता है वो तो पुजारी का हो जाता है |यहाँ के चढ़ावे का क्या होता है उसने पानी टूटी फूटी हिंदी में बताया कि यह सब भक्तों का है जो मंदिर में आते हैं यह उनका है आप जो चाहें इसमें से ले सकते हैं |
प्रार्थना चक्र 
वाह प्यास लगी थी पर मैंने ज्यादा लालच किये हुए बिना एक माजा की बोतल उठा ली |हिन्दू धार्मिक स्थलों में तो पुजारी का ज्यादा से ज्यादा जोर कर्मकांड और दक्षिणा ऐंठने में रहता है पर यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था आपकी मर्जी हो कुछ चढ़ा दीजिये अगर नहीं चढ़ाएंगे तो न आप पुजारी की गाली खायेंगे न वो आपको घूर कर देखेगा |हम एक कमरे में गये जहाँ सैंकड़ों दिए जल रहे थे और हजारों सोयाबीन तेल की बोतलें रखीं हुई थीं पर कोई यह बताने वाला नहीं मिला की क्यों ?
शाम होने को आ रही थी और अभी हमें एक महत्वपूर्ण जगह जाना था जी हाँ रैंचो के स्कूल वही स्कूल जहाँ थ्री ईडियट फिल्म की शूटिंग हुई थी जहाँ रैंचो सब कुछ छोड़ छाड़कर रह रहा था (फिल्म में ) स्कूल को लद्दाखी में द्रुक पद्मा स्कूल कहते हैं पर अब यह पूरे  लेह में रैंचो स्कूल के नाम से जाना जाता है जहाँ सोलर उर्जा का अधिकतम इस्तेमाल किया जा रहा है |पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब स्कूल की कुछ जगहों पर ही घुमाया जाता है क्योंकि बच्चों की पढ़ाई में बाधा आती है |पहले एक काउंसलर ने स्कूल के इतिहास विकास और स्कूल को मिले पुरुस्कारों के बारे में बताया फिर स्कूल के लिए चंदे की बात कही ,वहां से पहले से उपस्थित कुछ पर्यटकों ने सेंटी होकर स्कूल के डोनेशन बॉक्स में चंदा डाला |
रैंचो स्कूल
कुछ ने  रैचो टीशर्ट और टोपी खरीदी |हम निर्लिप्त से खड़े बाजार और ब्रैंडिंग के रिश्ते  को समझ रहे थे इस दुनिया में बाजार से परे भी कुछ है क्या वो चाहे धर्म हो या स्कूल सब अपने आपको अपने अपने तरीके से बेच ही तो रहे थे,मठ के प्रवेश में लिया जाने वाला चाहे वो तीस रुपये का टिकट हो या चंदे की गुहार लगाती वो स्कूल की शिक्षिका सब ही तो बाजार में हैं |
रैंचो कैप 
मैं गलत हो सकता हूँ पर मेरा सोचने का तरीका कुछ ऐसा ही है |पांच रुपये का स्केल सौ रुपये में बेचा जा रहा है और लोग बड़े मजे से खरीद भी रहे हैं |क्यों न हो अब वह एक स्कुल नहीं ब्रांड बन चुका है और वो स्कूल ब्रांड न होता तो शायद हमारी गाडी उसके सामने से फर्राटा भरते निकल गयी होती |इसी तरह के विचारों में डूबते उतरते हम अपने गेस्ट हाउस की निकल पड़े |शाम के सात बज रहे थे फिर भी रौशनी ठीक ठाक थी |हवा में ठंडक बढ़ रही थी और हम थके मांदे लौट रहे थे |

जारी ...................................

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