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Tuesday, July 13, 2021

सौगत और मैं राजौरी यात्रा पंचम भाग(यात्रा संस्मरण)



अगला दिन धर्म कर्म के नाम पर था दोनों परिवारों ने वैष्णो देवी जाने का निश्चय किया
।मैं वैष्णो देवी करीब दस साल पहले आया था । ये मेरी तीसरी वैष्णो देवी यात्रा होने वाली थी । हम अभी राजौरी से तीस किलोमीटर आगे चले होंगे तो रास्ते में एक भयानक एक्सीडेंट हुआ देखा मोटरबाईक औए एक कार में ।

एक घायल युवक रोड पर पड़ा था उसको देख कर तो ऐसा लगा कि उसके जीवन की अंतिम सांसें चल रही हों, हमारे साथ चल रहे पुलिस वालों ने कई गाड़ियाँ रोक कर उस युवक को अस्पताल पहुंचवाने की कोशिश की,लेकिन कोई फायदा नहीं वे लोगों से निवेदन कर रहे थे तभी भाभी ने फैसला किया कि उस युवक को अपनी गाड़ी में सवार कराया जाए ।
राजौरी का जिला अस्पताल वहां से दूर था और हम लोग विपरीत दिशा में जा रहे थे । जहां कोई अस्पताल पास में नहीं था । ड्राईवर रशीद ने बताया कि यहां से पाँच किलोमीटर दूर एक सेना का अस्पताल था पता नहीं वे उस युवक का इलाज करेंगे या नहीं । भाभी ने फैसला किया कि किसी भी हालात में इसे अस्पताल ले चलेंगे और हमारी दोनों गाड़ियां अपनी अधिकतम गति से उन पहाड़ी सड़कों पर दौड़ने लगीं । तब मुझे एहसास हुआ कि इस खूबसूरत जगह पर जीवन कितना दुश्वार है चारों और पहाड़ उन पर घूमती हुई कम चौड़ी सड़कें और हर तरफ जंगल । ऐसे में कोई भी दुर्घटना खतरनाक हो सकती है । दोनों गाड़ियां सेना के बैरीकेटिंग को नजरंदाज  करते हुए सेना के अस्पताल पहुंची । वहां तुरंत उसको भर्ती कर लिया गया हम सेना के मानवीय रूप से प्रभावित हुए बगैर ना रह सके चूंकि सेना वहां लंबे समय से है इसलिए जगह-जगह उनके कैम्प और अस्पताल बने हैं । सड़कों और पुलों के मामले में सीमा सड़क संगठन (बी आर ओ) ने बहुत अच्छा काम किया है ऐसी मुश्किल जगहों पर सड़क बनाना आसान काम नहीं है ।
       चार घंटे बाद हम कटरा पहुंच गए जहां से सिर्फ पाँच  मिनट के बाद हम वैष्णो देवी के हैलिपैड पर थे । तकनीक ने यात्रा का समय कितना घटा दिया हेलीकॉप्टर की उड़ान मात्र पाँच मिनट की थी । चालक के बगल में दो लोग और पीछे चार लोग बैठाए जाते हैं आगे बैठने वालों को हिदायत दी जाती है कि चालक से बात ना करें और मशीनों को ना छेड़े । जगह की कमी के कारण चालक अपनी सीट पर लटक कर बैठा था उसे देखकर मुझे भरी हुई टैक्सी याद आ गयी जिसका ड्राइवर ज्यादा सवारियों को बैठाने के लिए अपनी जगह भी कुर्बान कर देता है  ।
     हेलीकॉप्टर से उड़ते हुए कटरा रेलवे स्टेशन दिखा । जहां श्री नगर से जम्मू को जोड़ने वाली रेल पटरी बिछाने का काम तेजी से चल रहा है, इस रेल लाइन के शुरू होने के बाद जम्मू से श्रीनगर जाना पर्यटकों के लिए आसान हो जाएगा अभी
जम्मू श्रीनगर से सिर्फ हवाई और सड़कमार्ग से जुड़ा है । इस रेल लाइन को पहाड़ों के अंदर से निकाला जा रहा है जिससे पर्यावरण को कम से कम नुक्सान हो । पहाड़ के ऊपर से रेलवे लाइन निकालने में जंगलों को काटना पड़ता ।
      दो  किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम मंदिर के प्रांगण में थे । धर्म का कारोबार चरम पर था । एक संयोग रहा है कि मैं पहली बार वैष्णो देवी 1991 में दूसरी बार 2001 में और अब 2012 में आ रहा था हर बार मंदिर में परिवर्तन और कुछ नहीं नई मूर्तियां दिखती, मंदिर लगातार भव्य हो रहा है, भगवान के पैसा भी खूब आ रहा है । भगवान को रूप बदलते देखना अच्छा लगता है । आखिर वो भक्तों की परीक्षा ना ले तो भक्त उसे  भगवान क्यों माने । पिछले बीस  सालों में वैष्णो देवी उत्तर भारत में धार्मिक पर्यटन के बड़े क्षेत्र के रूप में उभरा है उसमें कुछ फिल्मों और टी सीरीज कैसेट  कंपनी के मालिक स्व. गुलशन कुमार का बड़ा हाथ है । मैं तो निरपेक्ष रूप से धर्म के इस  मर्म को समझ रहा था जहां कहीं घोड़े वाला ठग रहा है कहीं बैटरी टैक्सी वाला ,प्रसाद के नाम पर सब जय माता दी  के नाम पर,सुरक्षा के नाम पर डर भगवान के दरबार में जहां सब बराबर हैं वहां वी आई पी दर्शन भी था । हमने फटाफट दर्शन किये और पैदल लौटने का फैसला किया गया क्योंकि शाम हो गई थी और हेलीकॉप्टर रात में नहीं चलते । उस दिन रात में  दो  बजे राजौरी पहुंचे सन्नाटे में परवेज ने बताया कि आज से पाँच साल पहले रात में तो क्या शाम के बाद इस सड़क पर निकलना असंभव था पर अब हालात एकदम सामान्य हैं ।
         अगले दिन हम सो ही रहे थे तभी मुझे लगा कि कोई मुझे आवाज दे रहा है सुबह के सात  बजे थे पता चला सौगत बकरीद होने के कारण नमाज की तैयारियों का जायजा सुबह से ही ले रहे थे उसी कड़ी में हमारे गेस्ट हाउस आ गए । मुझे आदेश मिला कि हम जल्दी तैयार हो जाएं घर चलना है हम सभी ने आदेश का पालन किया । थोड़ी देर में एक सरप्राइज़ हमारे लिए था जो मेरे लिए अप्रत्याशित था । मैं यह मान कर चल रहा था कि आज बकरीद होने के कारण स्वागत की व्यस्तता ज्यादा रहेगी पर सौगत नें सुबह सुबह सब व्यवस्था का जायजा लेकर पूरा दिन हमारे साथ बिताने का फैसला किया । आज कहीं नहीं जाना सामने लॉन में चटाई बिछ गई और सोफे लग गए परिवार का हर सदस्य अपने-अपने समूह के साथ बैठ गए । पहले क्रिकेट और बैडमिंटन हुआ फिर गाना बजाना । हम और सौगत इन सबसे दूर गुफ्तगू में व्यस्त हो गए कुछ पुराने किस्से कुछ नई कहानी और बीच में हम सब की जिंदगानी और इन सब में दोपहर होने को आयी । समय कैसे पंख लगा के उड़ा पता ही नहीं चला । बीच में सौगत ने कैमरे पर अपना कमाल दिखाया आज से दस साल पहले खींचे उसके कुछ फोटोग्राफ आज भी मेरे घर की शोभा बढ़ा रहे हैं । एक बार फिर उसने कुछ कमाल की तस्वीरें निकाली ।
      अचानक उसने कहा आज का लंच कुछ अलग तरीके से किया  जाए और फिर क्या था घर में लगे केले के पत्ते काटे जाने लगे उनको धोकर एक शानदार लंच का इंतजाम किया गया । केले पर मछली और चावल इसके अलावा कुछ और  मांसाहारी व्यंजन और भी थे । मैंने मछली पर ध्यान केंद्रित किया क्योंकि ट्राउट लखनऊ में तो मिलने से रही इस गरीब मास्टर को । सौगत के घर से एक पहाड़ी पर मुझे एक किला पिछले दो दिनों से दिख रहा था । मैंने कहा,वहां क्या है? सौगत ने पूछा,चलेगा क्या ? मैंने कहा, हाँ । बस फिर क्या, थोड़ी देर में लश्कर तैयार डी.सी.साहब की गाड़ी चल पड़ी दो  किलोमीटर की ऊंचाई पर । वह किला पुराना था पर अब वहां सेना का कब्जा है और खरगोशों की पूरी कॉलोनी बसी हुई थी कुछ छोटे, कुछ बड़े और कुछ एकदम बच्चे, रात घिर रही थी राजौरी बिजली में जगमग कर रहा था हवा ठंडी थी सूरज डूब रहा था मेरा मन भारी हो रहा था कल मुझे अपनी दुनिया में लौटना है आज की रात राजौरी की आखरी रात थी पर मुझे लगता है जैसे जैसे उम्र बढ़ रही है मैं जिंदगी के प्रति निर्मम होता जा रहा हूं । यह सब कुछ तो सपने जैसा लग रहा है अब वापस लौटने का वक़्त था । रात को  खाने पर मेरी खास पसंद पर मटन बना था जो जरूरत से ज्यादा स्वादिष्ट था । मैं पिछले पाँच दिन से लगातार मांसाहार कर रहा था । भारत में भ्रमण के दौरान ऐसा पहली बार हुआ था । हम आखरी बार खाने की टेबल पर साथ -साथ बैठे शायद पहली बार मैंने सौगत को थोड़ी देर के लिए जज्बाती होते देखा सौगत इस मामले में एकदम अलग है वह अपनी भावनाएं कभी नहीं दिखाता वह क्या सोच रहा है कोई नहीं जान सकता खाने के बाद उसने फिर रोक लिया हम इधर उधर की बातें करने लग गए । मैंने औपचारिकता वश उसे शुक्रिया कहा तो उसने मुझे झिड़कते हुए कहा इस सबकी मुझे जरूरत नहीं अगले दिन हम भारत पाकिस्तान सीमा पर जाने वाले थे उसके बाद वहीं से जम्मू के लिए निकलना था जहां से मुझे लखनऊ लौटना था सौगत से स्टेशन पर मिलने की उम्मीद थी क्योंकि वह भी उसी दिन दिल्ली जा रहा था ।
भारतीय रेल के जून 2021 अंक में प्रकाशित 

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सौगत और मैं राजौरी यात्रा चतुर्थ भाग(यात्रा संस्मरण)

डी के जी की झोपडियां 

पच्चीस अक्टूबर को हम राजौरी को एक्सप्लोर करने निकल पड़े पहला पड़ाव था राजौरी से तीस किलोमीटर दूर बाबा गुलाम शाह की दरगाह इन्हीं संत के नाम पर अभी राजौरी में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी है |अब असली जम्मू कश्मीर देखने की बारी थी पहाड़ों के चक्कर लगते हुए हम कई गाँवों से गुजर रहे थे कई जगह सेब बिकते देखे सोचा खरीदा जाए भाव सुनकर खुशी का परवार ना रहा बीस रुपये किलो ,सीढीदार खेत मक्के की कटाई हो चुकी थी उनको सूखने के लिए खेतों में ही ढेर बना कर छोड़ दिया गया है मक्का और दूध बहुतायत में उपलव्ध है भूमिहीन किसानों की संख्या नगण्य है |मजदूर बहुत महेंगे है |मनरेगा का असर और काम दोनों दिख रहा था पहाड़ों से निकालने वाले चश्मे आस पास के दृश्यों  की सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे|चश्मे प्राकृतिक पानी के ऐसे स्रोत हैं जो पहाड़ों से निकलते हैं | पानी को बर्बादी से बचाने  के लिए जगह जगह नालियां बना दी गयीं जिससे लोग पानी का इस्तेमाल पीने और  खेतों के लिए करते हैं |परवेज बता रहे थे कि कैसे आतंकवाद के दिनों में इन रास्तों में शाम तो क्या दिन में भी लोग नहीं गुजरते थे रास्ते के कई हिस्से एनकाउंटर की खौफनाक कहानियों  के गवाह रह चुके थे पर अब सब शान्ति है खुदा करे ये शांति बनी रहे|दो घंटे के सफर के बाद हम दरगाह पहुँच चुके थे|
कितनी खूबसूरत तस्वीर है ये  कश्मीर है 
ऊँचाई पर बनी दरगाह लगभग २५० साल पुरानी है जहाँ चौबीस घंटे लंगर चलता है जिसमें चावल दाल और मक्के की रोटी प्रसाद में मिलती है हमने पहले दरगाह में सजदा किया और चादर चढ़ाई सबकुछ व्यवस्थित और शांत दरगाह का प्रबंधन सरकार द्वारा स्थापित ट्रस्ट करता है जो भी चढावा आता है उसकी बाकायदा नाम पते के साथ रसीद दी जाती है एक खास बात ये थी कि इस दरगाह पर सभी मजहब के लोग आते हैं जिनकी मन्नत पूरी हो जाती हैं उनमें कुछ मुर्गे और पशु भी चढाते हैं पर उन पशुओं का वध दरगाह परिसर में नहीं किया जाता है उन्हें जरूरतमंदों को दे दिया जाता है|दरगाह के लंगर में सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है यहीं नमकीन कश्मीरी चाय भी पीने को मिली |दरगाह पर भीड़ तो थी पर वो परेशांन करने वाले नहीं थी|
दरगाह में दो घंटे बिताने के बाद हम चल पड़े पर्यटक स्थल डी के जी देखने इसका फुलफॉर्म भूल रहा हूँ पर दरगाह से एक घंटे की यात्रा के बाद हम यहाँ पहुंचे क्या नज़ारे थे इस जगह पर हमारे सिवा कोई नहीं था सिर्फ बर्फ से ढंके पहाड जो पाक अधिकृत कश्मीर में थे ठंडी हवा हालाँकि धूप तेज थी पर ठण्ड थी एक पहाड़ी पर कुछ लकड़ी की झोपडियां बनाई गयी हैं जिनको गरम रखने के लिए सोलर एनर्जी का इस्तेमाल किया जाता है जिससे पर्यावरण को नुक्सान ना पहुंचे इसी पहाड़ी के समीप एक व्यू पॉइंट बनाया गया है जहाँ से पूरे राजौरी का नजारा लिया जा सकता है|हमारे पीछे पूँछ शहर दिख रहा था और उसके पार पाक अधिकृत कश्मीर सब कुछ एक था पर बीच में नियंत्रण रेखा भारत और पाकिस्तान को अलग अलग कर रही थी|
दूर दिखता पुंछ शहर बीच में बहती चिनाव नदी 
कश्मीरी  बंजारों का कैम्प 
दिन के भोजन की व्यवस्था यहीं की गयी थी|भुना चिकन खाने के बाद एक लड्डू जैसा मांस का व्यंजन परोसा गया जो भेंड के मांस  से बना था जिसे रिस्ता कहते हैं खाने में बहुत स्वादिष्ट था |चूँकि मैं बहुत कम खा पाता हूँ मैं एक से ज्यादा नहीं खा पाया |मुझे बताया गया कि यह कश्मीरी दस्तरख्वान का हिस्सा है जिमें भेंड के मांस को लकड़ी के बर्तन में गुंथा जाता है फिर दही के साथ पकाया जाता है|आतंकवाद प्रभावित इलाका होने के कारण पर्यटक यहाँ नहीं आते पर अब शांति हो जाने के बाद राजौरी में बहुत सारी ऐसी जगहें जो एकदम अनछुई हैं| ऐसे में मेरे जैसे इंसान के लिए जो भीड़ भाड़ कम पसंद करता है उसके लिए ऐसी जगहें जन्नत से कम नहीं हैं|खाना खा कर हम वहीं घूमें फोटोग्राफी की शांति इतनी की हम अपनी साँसों की आवाज़ को सुन सकते थे|शाम हो रही थी अब लौटने का वक्त रास्ते में दिखते चीड के पेड़ों पर जब सूर्य की किरणें पड़ती तो वो हरे पेड भी सुनहली आभा देते और बगल में बहने वाले पानी के चश्मे चांदी जैसे चमकते बहुत सी किताबों में इस तरह के द्रश्यों के बारे में पढ़ा था पर अपनी आँखों से प्रकृति के सोना चांदी को पहली बार देखा रहा था|लौटते वक्त परवेज ने बताया कि इन गावों में रहने वाले काफी लोग मध्यपूर्व के देशों में बेहतर जीवन की तलाश में चले गए हैं उनके भेजे हुए पैसों से गाँव के घरों में छत टिन की बनने लग गयी है मिट्टी या सीमेंट की छत बर्फबारी में घर की रक्षा नहीं कर पाती और ये टिन की छतों वाले घर सूर्य की किरणों से ऐसे चमक रहे थे जैसे पहाड पर अनगिनत शीशे रख दिए गए हों|
एक फोटो मेरी भी 
जगह जगह श्रीनगर से लौटते बंजारों के भेड़ बकरियों का झुण्ड हमारा रास्ता रोक रहा था जो सर्दियों में राजौरी जैसी जगहों पर लौट आते हैं और गर्मियों में फिर श्रीनगर का रुख कर देते हैं|धन के नाम पर इनके पास भेंड,बकरियां और घोड़े ही होते हैं जिनसे इनका जीवन चलता है ये सारा साल पैदल ही घूमते हैं|वापस लौटते समय मैं साथ बहती नदी में जाने से अपने आपको रोक नहीं पाया कुछ बंजारों का कैम्प लगा था और वे शाम के भोजन की व्यवस्था में लगे थे|पुरुष सुस्ता रहे थे महिलाएं चूल्हों पर रोटियां सेंक रही थी मैंने नदी में हाथ डाला बर्फ से भी ठंडा पानी था जो पहाड़ों पर जमी बर्फ के पिघलने से आ रहा था ये पानी गर्मियों में भी इतना ही ठंडा रहता है ऐसा मुझे बताया गया|सबको आगे भेजकर मैं आस पास के लोगों से बात करने लगा|पास ही एक दूकान थी जहाँ का दुकानदार आतंकवाद से प्रभावित रह चुका था|मेरे हाथ में कैमरा देखकर उसने बहुत खुलकर मुझसे बात नहीं की पर उसने बताया कि वो एस पी ओ (जम्मू कश्मीर सरकार का एक आतंकवाद विरोधी कार्यक्रम जिसमे सरकार लोगों को शस्त्र और मासिक तनख्वाह देती है )रह चुका था पर सरकार पैसे समय पर नहीं देती थी और जो पैसे मिलते वो भी बहुत कम थे इसलिए उसने किराने की दूकान खोल ली|हाँ एक बात जो मुझे अच्छी लगी वो नए  डी सी (जम्मू कश्मीर में डी एम् को डी सी कहते हैं )के जनता दरबार से खुश था वो रेड डालते हैं और तुरंत कार्यवाही करते हैं |उसे बिलकुल नहीं पता था कि मैं डी सी का दोस्त हूँ |शाम हो चुकी थी और हम वापस राजौरी में थे सौगत ने मुझे अपने ऑफिस बुला लिया जो उसके बंगले के ठीक सामने है वहां लोगों का जमावड़ा था वो काम भी कर रहा था और मुझसे बात भी करता जा रहा है |धीरे धीरे लोगों का जमावड़ा खत्म हुआ लेकिन उसको कुछ फाइलें अभी और भी निपटानी थी मैंने कहा आप काम करते चलें मैं इसी का आनंद उठा रहा हूँ |आखिरकार हमने घर का रुख किया जहाँ ठण्ड और हीटर के बीच दो परिवार जमा हुए और गप्पें मारने का एक और दौर शुरू हुआ|खाने में प्रसिद्ध ट्राउट मछली और चिकन था|ट्राउट का नाम डिस्कवरी पर खूब सुना था पर खाने का सौभाग्य पहली बार मिल रहा था|इधर उधर की बातें करते रात के ग्यारह बज गए और राजौरी में मेरा एक दिन औरखत्म  हुआ |
जारी है .......................














भारतीय रेल के जून 2021 अंक में प्रकाशित 

सौगत और मैं राजौरी यात्रा तृतीय भाग (यात्रा संस्मरण)


चिंगस 
जंगल बचे इंसानी लाशों की कीमत पर , ये भी विकास का एक पहलू था |रास्ता मन मोह लेने वाला था सम्पूर्ण शांति का एहसास आप कर सकते थे राजौरी से लगभग तीस किलोमीटर पहले एक चिंगस नाम की जगह ,चिंगस के बारे में बताने से पहले आपको बता दूँ राजौरी का यह इलाका उस रास्ते का हिस्सा है जिस रास्ते से मुग़ल शासक गर्मियों में कश्मीर घाटी जाते थे |मुगलों के द्वारा बनवाई गयी सरायों के अवशेष आज भी मिलते हैं मैंने भी ऐसी दो सरायें देखीं पर अब उन जगहों पर भारतीय सेना का कब्ज़ा है जहाँ किसी आम आदमी के लिए जाना उतना आसान नहीं है चूँकि सेना का मामला था इसलिए मैंने अपना कैमरा नहीं निकाला|थोड़ी दूर चलने पर चिंगस नाम की वो सराय आ गयी जिसे मुग़ल बादशाह अकबर ने बनवाया था.आज ये मुख्य सड़क से सटा एक वीरान इलाका है जहाँ मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शरीर का कुछ हिस्सा दफ़न है|

चिंगस को फारसी भाषा में आंत कहते हैं किस्सा कुछ यूँ है कि मुग़ल बादशाह जहाँगीर अपनी बेगम नूरजहाँ के साथ अपने वार्षिक प्रवास के बाद कश्मीर से अपनी सल्तनत की ओर लौट रहे थे |
चिंगस :यहीं जहाँगीर की आंतें दफ़न हैं 
चिंगस सराय 
 चिंगस में उनकी तबियत खराब हुई और उनकी मौत हो गयी|उत्तराधिकार के संघर्ष को टालने के लिए नूरजहाँ इस बात का पता आगरा  पहुँचने से पहले सार्वजनिक नहीं करना चाहती थी|शरीर के वो हिस्से जो मौत के बाद सबसे जल्दी सड़ते हैं उन अंगों को इसी जगह काटकर निकल दिया गया और उनको यहीं दफना दिया गया जिसमें जहाँगीर की आंत भी शामिल थी|आंत और पेट के अंदरूनी हिस्से को निकाल कर उसके शरीर को सिल कर इस तरह रखा गया कि आगरा पहुँचने से पहले किसी को भी इस बात का आभास् नहीं हुआ कि जहाँगीर मर चुके हैं| इस तरह उसकी आँतों को जहाँ दफनाया गया वो चिंगस के नाम से प्रसिद्ध हो गया|यहाँ जहाँगीर की आँतों की कब्र आज भी सुरक्षित है लेकिन यहाँ एकदम सन्नाटा पसरा था लगता है यहाँ ज्यादा लोगों का आना जाना नहीं है हालांकि जम्मू कश्मीर पुरातत्व विभाग के लगे बोर्ड इस बात की गवाही दे रहे थे कि सरकार के लिए यह स्थल महत्वपूर्ण है|मैंने अपने कैमरे का यहाँ बखूबी इस्तेमाल किया|अब राजौरी करीब था हम भी थक चुके थे लखनऊ छोड़े हुए करीब चौबीस घंटे होने को आ रहे थे |शाम के पांच बजे हमने राजौरी में प्रवेश किया शांत कस्बाई रंगत वाला शहर जहाँ अभी विकास का कीड़ा नहीं लगा था और ना लोग प्रगति के पीछे पागल थे|जहाँ हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी वो एक सरकारी गेस्ट हाउस था पर उसके कमरे को देखकर लग रहा था जैसे कोई शानदार होटल हो खैर सुबह के बाद से हमारी सौगत से कोई बात नहीं हुई थी हमें ये बताया गया कि साहब बाहर हैं शाम को लौटेंगे|शाम हो चली थी हमने एक बार फिर गरम पानी से नहा कर थकान को कम करने की कोशिश की पर नहाने के बाद पता  पड़ा यहाँ ठंडक का मामला गंभीर था लखनऊ के मुकाबले |अँधेरा घिर आया था मैं समय काटने के लिए नीचे उतर कर गेस्ट हाउस के लॉन में चहलकदमी शुरू करने लग गया |राजौरी अंधरे में डूब रहा था पहाड़ों पर रौशनियाँ जगमगाने लगी थीं|अचानक एक शोर सा उठा साहब आ गए साहब आ गए मैंने गेट पर नजर डाली मुझसे दौ सौ मीटर की दूरी पर एक लाल बत्ती वाली  सफ़ेद इनोवा हमारी तरफ आ रही थी जिसके अंदर सौगत बैठे हुए थे गाड़ी कुछ पलों में मेरे सामने आकर रुकी वो पल मेरे जीवन के कुछ रोमांचक पलों में से एक बन गया सौगत के साथ बिताए गए वो सारे साल  फ्लैश बैक में मेरी आँखों के आगे घूम गए|
राजौरी की शाम 
पुरानी यादें :मैं और सौगत उपराष्ट्रपति के कार्यक्रम में हैलीपेड पर 
           मुझे याद आया 2002 में पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर में एक बार उप राष्ट्रपति स्व. भैरव सिंह शेखावत दीक्षांत समारोह में आये थे| हैलीपेड से विश्वविद्यालय तक के डेढ़ किलोमीटर के फासले में उनकी फ्लीट में सबसे अंत में एक गाड़ी चल रही थी जो उनकी अधिकारिक फ्लीट का हिस्सा नहीं थी और उस गाड़ी में दो मास्टर बैठे थे एक उस सारे घटनाक्रम का वीडियो बना रहा था दूसरा मीडिया कर्मियों को ब्रीफिंग के लिए आवशयक घटनाओं को कलमबद्ध कर रहा था मसलन किन लोगों ने पुष्पगुच्छ दिए कौन हैलीपेड पर आगवानी के लिए आया वो दो मास्टर मैं और सौगत थे उन फर्राटा भरती गाड़ियों का एक  हिस्सा बन कर इतनी खुशी हुई थी कि उस पूरे वाकये को बाकी के मास्टरों को नमक मिर्च लगा कर कई दिन तक सुनाया गया (हम दोनों मीडिया में अपने अपने क्षेत्रों में विशेज्ञता के कारण कुलपतियों के सीधे संपर्क में रहा करते थे जो और शिक्षकों के लिए ईर्ष्या का विषय रहा करता था कम से कम मुझे ऐसा लगता था ) क्योंकि इस मौके पर पूरे विश्वविद्यालय से मात्र दो ही लोग हैलीपेड पर जाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाए थे| और आज सौगत खुद उस नायकत्व की स्थिति में था जहाँ एक पुलिस जिप्सी उसकी गाड़ी को सुरक्षा दे रही थी| वैसे भी राजौरी एक संवेदनशील जिला था इसलिए सुरक्षा हो सकता है आप लोगों को ये कोई बड़ी बात ना लगे पर मैं तो पलों में सदियाँ जी रहा था|मैंने उसको परिस्थितियों से लड़ते देखा था जूझते देखा था क्योंकि जब भी हम कोई काम प्लान करते थे उसमें कुछ ना कुछ गडबड जरुर आती थी पर काम हो जाता था| चलिए वापस लौटते हैं उस जगह जहाँ मैं सौगत से पांच साल बाद मिल रहा था |  मैं गाड़ी के पास पहुंचा उस समय मेरे स्थिति विचित्र थी जिसे शब्दों में वर्णन करना मुश्किल है मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं उससे कैसे मिलूँगा मैं अपनों से हाथ नहीं मिलाता और सौगत भी बिलकुल  औपचारिक नहीं था हमने आज तक कभी हाथ नहीं मिलाया क्यूंकि जब दिल मिल गया फिर हाथ मिलाने की क्या जरुरत है |
सौगत 
          गले लगने का विकल्प जोखिम भरा लग रहा था वहां उसके बहुत मातहत थे वे पता नहीं इस मिलन को किस तरह से देखें मैं इन्हीं विचारों में झूल रहा था कि सौगत बाहर निकला दो चार लोगों को कुछ निर्देश देने के बाद सीधे मेरी तरफ मुखातिब “और बे” कहकर गले लगा लिया “चल ऊपर चल यहाँ कहाँ घूम रहा है” |मतलब हम लोगों के बीच कुछ भी नहीं बदला था वो दोस्त भी क्या जो तमीज से बात करे ,हा हा |
थोड़ी देर में हम कमरे में बैठे थे दस मिनट के बाद निर्णय लिया गया कि यहाँ नहीं मजा आ रहा है ,घर चला जाए चूँकि मैं अपने परिवार के साथ गया था इसलिए ये दो परिवारों का पुनर्मिलन हो रहा था|किस्से, बातें,कहानियां भूले बिसरे लोग उनसे जुडी यादें पर मैं ठण्ड से ठिठुर रहा था जबकि ये अक्टूबर की शुरुवात थी और कमरे में और  बाहर हर जगह हीटर की व्यवस्था थी|भाभी से सौगत का स्वेटर लेकर पहना तब जाकर चैन पड़ा जबकि पहले से मैंने एक ऊनी इनर पहन रखा था अगले चार दिन मैंने सौगत के उस स्वेटर का खूब शोषण किया| हम रात के बारह बजे वापस अपने सुइट पहुंचे (कमरा कहना उस जगह की बेइज्जती होगी)
जारी है .......................


भारतीय रेल के जून 2021 अंक में प्रकाशित 

सौगत और मैं राजौरी यात्रा द्वितीय भाग(यात्रा संस्मरण)


मंसूरी की वो शाम 

हम देर रात तक मंसूरी के सड़कों पर घूमें और देश के भावी प्रशासनिक अधिकारीयों के मन टटोले और जून के महीने में सर्दी से ठिठुरे क्योंकि रजाई एक ही थी ऐसा ही सौगत बिस्वास फिर मैं अपनी जिंदगी में रम गया बीच में एक बार छोटी सी मुलाक़ात हुई थी दिल्ली में जब मैं इटली जा रहा था सौभाग्य से सौगत उस वक्त दिल्ली में था उसके बाद से गोमती में बहुत सा पानी बह गया उसकी पोस्टिंग बदलती रहीं और हम कभी कभार फोन पर बात कर लिया करते थे एक बार यूँ ही सौगत ने एक प्रस्ताव रखा था कि चल हम लोग स्लीपर में भारत भ्रमण पर निकलते हैं बगैर किसी प्लानिंग के ये उसकी पोस्टिंग के शुरुवाती दिन थे उसके बाद वो भी व्यस्त होता गया और मैं बगैर किसी व्यस्तता के व्यस्त इंडिया टुडे ने जब मेरे ऊपर एक स्टोरी के लिए किसी एक ऐसे शख्स का नाम माँगा तो मुझे सिर्फ उसका नाम सूझा धर्म संबंधी मेरे विचारों में सबसे बड़ा परिवर्तन उसके पिता जी की किताबों को पढकर आया जिन्होंने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया शायद पहली बार मैंने किसी समस्या को मानवीय नजरिये से देखा ना हिंदू ना मुसलमान सिर्फ इंसान, तो बस ऐसे ही एक ही दिन मैंने फैसला किया मुझे सौगत से मिलने जाना है ना कोई काम था ना घूमने की इच्छा बस आमने सामने बैठकर गप्प लड़ाने का मन.राजौरी के लिए ट्रेन जम्मू तक ही जाती है वहां से लगभग 165 किमी दूर सडक से ही पहुंचा जा सकता है हालंकि राजौरी में एअरपोर्ट है पर वहां से से नियमित उड़ान का कोई सिलिसला नहीं है वो एअरपोर्ट ज्यादातर भारतीय सेना या मंत्रियों के हेलीकॉप्टर के काम ही आता है |

आतंकवाद के दिनों में राजौरी भी उन जिलों में से एक था जो आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित थे |अब समस्या ट्रेन के टिकट की थी मैंने दो दिन के टिकट बुक किये पर जाने के दिन आते आते मुझे लगा कि वो कन्फर्म नहीं हो पायेंगे आख़िरकार फिर उसी चीज का इस्तेमाल करना पड़ा जिसके बिना हिन्दुस्तान में कोई काम संभव नहीं होता यानि जुगाड एक ट्रैवल एजेंट से बात हुई तत्काल में उसने टिकट दिलवा दिया और हम चल पड़े सौगत से मिलने पांच साल बाद हम एक दूसरे को साक्षात देखने वाले थे |मैंने सौगत को फोन करके बता दिया कि मैं आ रहा हूँ उसने बगैर किसी उत्साह के स्वागत किया हालंकि ये उसका स्वभाव है जो मैं अच्छे तरीके से जानता हूँ फिर भी दिल में एक चोर था पहले हम साथ काम करते थे हमारे सुख दुःख साझे थे पर अब वो राजौरी का जिलाधिकारी था और मैं एक मास्टर,पता नहीं कैसे मिलेगा समय दे भी पायेगा या नहीं एक जिलाधिकारी और एक मास्टर की जुगलबंदी अब जमेगी भी या नहीं संशय तो था ही फिर मेरे पास और कोई प्रयोजन भी नहीं था कि हम तो फलां काम से जा रहे हैं मिल लिया तो ठीक है नहीं तो अपना काम करेंगे और घर लौट जायेंगे हमें तो ये भी पता नहीं था कि राजौरी जगह कैसी है बस ख़बरों में ही सुना था शायद इसीलिये मैं ज्यादा उनी कपडे नहीं ले जा रहा था सोचा जम्मू जैसा ही होगा जब जम्मू में ज्यादा ठण्ड नहीं पड़ती तो राजौरी भी ऐसा ही होगा पर हुआ इसका उल्टा राजौरी में अच्छी ठण्ड थी |मैं एक बार अगर राजौरी के भूगोल के बारे में गूगल ही कर लेता तो कुछ समस्या से बच सकता था पर हम तो निकल पड़े बस सौगत से मिलना है|ट्रेन समय से निकल पडी पन्द्रह घंटे के सफर के बाद हम जम्मू पहुँच जाने वाले थे सुबह हमारे पहुँचने से पहले सौगत का फोन आ गया था  कि आपको लेने के लिए लोग वहां हैं आप निश्चिन्त रहें जैसे ही ट्रेन रुकी दो लोग सीधे हमारे पास आये और हमारा सामान सम्हाल लिया जीवन में पहली बार खास होने का एहसास हुआ हम सीधे वी वी आई पी पार्किंग में पहुंचे जहाँ एक शानदार गाड़ी हमारे लिए आरक्षित थी और हम चल पड़े अभी हमें लंबा रास्ता तय करना |

सुरक्षाधिकारी परवेज और ड्राईवर रशीद अगले चार दिन तक हमारे साथ साये की तरह रहने वाले थे हमें इसका कोई अंदाज़ा नहीं था दिन के दो बज तक हम  अखनूर पार कर चुके थे और उसके बाद राजौरी जिला शुरू हुआ सुंदरबनी के पी डबल्यू डी गेस्ट हाउस में दोपहर के भोजन की व्यवस्था थी खूबसूरत कमरा था जहाँ मैंने स्नान किया और भोजन पर टूट पड़े पता नहीं सौगत को मेरे मांसाहारी भोजन के लगाव की बात याद थी या ये सिर्फ एक संयोग था कि अगले चार दिन मुझे सिर्फ मांसाहारी भोजन परोसा गया जिसकी शुरुवात सुंदरबनी से हो रही थी चिकन चावल और नरम नरम रोटी फिर एक गरम चाय |हम तरोताजा  होकर फिर निकल पड़े अब रास्ता में सन्नाटा बढ़ रहा था जंगल घने हो रहे थे और एक पहाड़ी नदी लगातार हमारे साथ चल रही थी जिसका कोई नाम मुझे परवेज और रशीद बता नहीं पाए वो बोले ये जिस जगह से गुजरती है|
परवेज और रशीद 
 उस जगह का नाम नदी को दे दिया जाता है मैं जंगल और हरियाली में खो गया हम जगह जगह गाड़ी रोक कर फोटोग्राफी भी कर ले रहे थे पर मैंने अपने जीवन में इतनी शुद्ध और अच्छी हवा कहीं नहीं महसूस की थी मैं खूब लंबी लंबी साँसे ले रहा था |हम नौशेरा से गुजर रहे थे आर्मी के ट्रकों का आना जाना लगा था उसके बाद तीथवाल पड़ा 1947-48 मे यहाँ पाकिस्तानी कबाइलों ने यहाँ घुसपैठ कर ली थी मैंने इतिहास में पढ़ा था और आज देख रहा था इतिहास को जीना अच्छा लग रहा था |
 परवेज कहीं से पुलिस वाले नहीं लग रहे थे मैंने कहा भी कि यू पी में ऐसे पुलिस वाले क्यूँ नहीं हैं तो वो मुस्कुरा दिए पुलिस में होने की उन्होंने बड़ी कीमत चुकाई है जिसका पता मुझे बाद में पता चला उनके सगे छोटे भाई को आतंकवादियों ने मार दिया था |रास्ता लंबा था तो मैंने मिलिटेंसी के दौर की बात शुरू कर दी उस दर्द को शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है और जब जब मैंने जिस किसी से आतंकवाद के उस दौर की बात की तो लगा जैसे वे तटस्थ हो चुके हैं इतना कुछ झेलने के बाद  सुख दुख राग द्वेष सबसे बस ये जवाब हर बार मिला हम तो दोनों तरफ से मारे जा रहे थे मिलीटेंट को खाना ना दो तो वो मार देते थे और दे दो तो आर्मी |
राजौरी के रास्ते में 
 बातों बातों में आतंकवाद का  एक सकारात्मक पहलू एक चायवाले ने बताया कि हमारे जंगल अंधाधुंध काटने से बच गए नहीं तो इतनी हरियाली ना दिखती मेरे कैसे पूछने पर बड़ा मजेदार उत्तर मिला होता यूँ था कि पाकिस्तान से आये आतंकवादी जंगलों में पनाह लेतेथे दिन में अगर कोई लकड़ी काटने वाला जंगल में जाता तो उसे मार पीटकर जंगल से भगा देते थे जिससे सेना या पुलिस को उनकी छुपने की जगह का पता नहीं चलता था |इस तरह उन लोगों ने इतना दहशत का माहौल बना दिया कि लोग जंगलों में जाते ही नहीं थे जिससे अवैध कटाई पर पूरी तरह रोक लग गयी|

भारतीय रेल के जून 2021 अंक में प्रकाशित 

सौगत और मैं राजौरी यात्रा प्रथम भाग(यात्रा संस्मरण )


यात्राएं मुझे हमेशा सुकून देती हैं एक ऐसी ही  यात्रा पिछले दिनों हुई मैं बड़ा पेशोपेश में हूँ पहले उस व्यक्ति के बारे में बताऊँ जिसके लिए यात्रा की गयी या जगह के बारे में जहाँ यात्रा की गयी |मैं कोशिश करता हूँ कि आपको बारी बारी से दोनों का वर्णन मिलता रहे तो जम्मू कश्मीर के बारे में सबने सुना होगा खासकर  अपने नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण और  लंबे समय  तक आतंकवाद से पीड़ित राज्य के रूप में |जब जम्मू कश्मीर घूमने की बात  होती है तो दो चार जगह ही ध्यान में आती है एक वैष्णोदेवी और दूसरा श्रीनगर के आस पास का इलाका, एक आम मध्यमवर्गीय हिन्दुस्तानी होने के नाते मुझे भी कश्मीर के पर्यटक स्थलों के बारे में उतनी जानकारी नहीं थी| मैं दो बार जम्मू गया जा चुका था लेकिन वो बहुत साल पहले की बात है पर उसके आगे ना कभी सोचा और ना कभी मौका लगा पर पिछले पांच सालों से मैं लगातार वहां जाने के बारे में सोच रहा था पर मौका हाथ नहीं लग रहा था वहाँ जाने का कारण बहुत सीधा था अपने एक पुराने मित्र से मिलना जिससे एक दर्द का रिश्ता था सौगत नाम है उसका मैंने कभी उसके ऊपर एक पैरोडी भी बनाई थी हम होंगे कामयाब की तर्ज पर सौगत है बिस्वास पूरा है बिस्वास हा हा तो सौगत बिस्वास उनका पूरा नाम है| तो जम्मू कश्मीर जाने का प्रयोजन यूँ हुआ कि सौगत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (आई .ए. एस )हैं और जब से वे जम्मू कश्मीर पहुंचे तब से ना जाने कितनी बार आने को कह चुके थे वैसे भी सौगत से आख़िरी मुलाक़ात को लगभग पांच साल बीत चुके थे |
सौगत और मैं साल 2006 फरवरी 
  इस यात्रा पर निकालने से पहले मैं आप सबको अपनी और सौगत की कहानी बताना चाहता हूँ क्यूँ सौगत खास रहा मेरे लिए कुछ चीजें तो सौगत खुद नहीं जानता जो पहली बार इस ब्लॉग को पढ़ कर जानेगा तो पहले सौगत पुराण ,सौगत बिस्वास से मेरी मुलाक़ात 23 दिसंबर 1999 को पहली बार जौनपुर में हुई| मैं अपनी पहली नौकरी में नया नया था जाड़े के दिन एक लंबा लड़का हमारे विभाग के कमरे मे दाखिल हुआ और बोला  मैं यहाँ अपनी ज्वाईनिंग  देने आया हूँ चूँकि हमारा और सौगत का चयन एक साथ पूर्वांचल विश्वविद्यालय में हुआ था और मैं पहले कार्यभार ग्रहण कर चुका था तो मुझे सारी प्रक्रिया की जानकारी थी| मैंने उसकी मदद की और दिन भर साथ रहे अगले दिन से विश्वविद्यालय में जाड़े की छुट्टी हो जाने वाली थी और सौगत के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था मैं विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में रह रहा था तो सौगत ने मुझे एक अनोखा ऑफर दिया कि  उस  रात मैं उसके साथ उस होटल में रुक जाऊं अगले दिन मुझे लखनऊ और उसे दिल्ली लौटना था| मैं थोडा हिचक रहा था अभी उसको जाने हुए मुझे ६ घंटे भी नहीं हुये और वो इतना बेतकल्लुफ हो रहा था वो मेरी हिचक को समझ गया पर जो जवाब उसने दिया वो अप्रत्याशित था “ओए मैं दूसरे टाईप का आदमी नहीं हूँ तू रुक सकता है मेरे साथ” हा हा खैर उस रात ना तो मुझे नींद पडी और ना ही सौगत सोया|दो कारण  एक तो वो जौनपुर का काफी घटिया होटल था  दूसरा हम दोनों उस शहर के लिए नए थे तो क्या सारी रात हम बातें करते रहें जामिया एम् सी आर सी का पढ़ा सौगत मुझे एक नयी दुनिया का लग रहा था विषय पर उसका अद्भुत ज्ञान था उस पर दिल्ली का एक्सपोजर अद्भुत कॉकटेल उस दिन से जो साथ शुरू हुआ वो आज तक जारी है| हम् नौकरियां भले ही बदल रहे थे पर एक दूसरे से संपर्क हमेशा बना रहा उसी रात उसने अपने एक सपने को मुझसे हल्का सा बांटा था कि वो आई ए एस बनना चाहता है और इसलिए वो दिल्ली को छोड़कर जौनपुर जैसी छोटी जगह नौकरी करने को तैयार हो गया|मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि मानसिक रूप से मैं अभी भी सौगत के सामने कॉलेज का बच्चा ही था जिसे बाहर की दुनिया और उसकी मक्कारी के बारे में ज्यादा पता नहीं था, वहीं सौगत संतुलित था उसके दिल में क्या चल रहा है कोई नहीं जान सकता और मैं क्या करूँगा सारा विश्वविद्यालय जानता था ऐसे शुरू हुआ नयी नौकरी का सफर बहुत से लोग वहाँ मिले सब ही नए थे पर जो मानसिक मेल सौगत और पंकज के साथ हुआ वो किसी और के साथ ना हो पाया (पंकज की कहानी फिर कभी ) और ये बात सारा विश्वविद्यालय जान गया कि मुकुल इन दोनों से आगे नहीं देखता |ये अलग बात है कि सौगत ने संतुलन बनाये रखा और  अपने आप को बाहर ऐसी किसी छवि में नहीं बाँधा शाम को अक्सर होने वाली परिचर्चा में सौगत और पंकज मुझे अक्सर ये समझाया करते थे कि सबसे मिला करो पर जब तक मैं जौनपुर में रहा ऐसा कर नहीं पाया जिसका साथ नहीं पसंद है उनके साथ मैं औपचारिक संबंध भी ठीक से नहीं निभा पाया पर जिंदगी जैसे जैसे आगे बढ़ी प्रोफेशनलिज्म के नाम पर ये मक्कारी मैं भी सीख गया और चेहरे पर मुखौटा डालना आ गया |

छुट्टियों के बाद सौगत ने मेरे बगल के मकान में कमरा ले लिया और हम साथ साथ विश्वविद्यालय आने जाने लग गए सौगत ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढ़ाई के निकलना चाहता था इसलिए दो साल बाद विश्वविद्यालय रहने चला गया क्योंकि आने जाने में बहुत समय लगता था पर इससे  हमारी जुगलबंदी में कोई कमी नहीं आई |पूर्वांचल का पत्रकारिता विभाग गुलजार रहने लगा हम अक्सर कुछ ना कुछ खुरापात किया करते थे वो कैमरा सम्हालता और मै कलम| सौगत के आई ए एस बन जाने से भले ही देश को योग्य अधिकारी मिल गया पर पत्रकारिता शिक्षा के लिए एक बड़ा नुक्सान हुआ अगर सौगत आज यहाँ होता तो व्यवहारिक पत्रकारिता शिक्षण का स्तर और बेहतर होता खैर क्या लिखूं क्या ना लिखूं समझ नहीं पा रहा हूँ कितनी शामें हमने साथ गुजारीं क्या बहसे हुआ करती थी |मैं एक श्रोता की हैसियत से काफी कुछ सीख रहा था| कितनी वाराणसी की यात्राएं हमने साथ की और उन यात्राओं में होने वाला
“फन” आज भी रोमांचित करता (जौनपुर में मनबहलाव की कोई जगह नहीं थी तो अक्सर हम वाराणसी का रुख करते थे )|एक शिक्षक के रूप में मैंने सौगत से बहुत कुछ सीखा तो दिन बीतते रहे जब तक मेरे पास स्कूटर नहीं था कई दिन हम बस और जीप में लटक कर विश्वविद्यालय पहुँचते थे फिर गाड़ी आ गयी पर कुछ चीजें मुझे सौगत की नहीं समझ नहीं आती थी वो हिसाब किताब बहुत किया करता था जिसमे मैं पहले भी कच्चा था और आज भी हूँ पर अंत में होता वही था जो वह चाहता वो मेरे स्कूटर से विश्वविद्यालय जाता था तो आने जाने के पैसे देता था फिर एक नया फोर्मूला निकाला कि एक दिन मेरी स्कूटर जायेगी और एक दिन उसकी मोटर सायकिल, दिन भर के खाने का हिसाब किताब लगा कर मुझे खास सौगतियन स्टाईल में बताया “यार देख मैं दिन भर के तीस रुपैये से ज्यादा खाने पर नहीं खर्च कर सकता बस”और ये अभिनव प्रयोग विभाग में भी  हो रहे थे एक दिन निर्णय लिया गया कि नुक्कड़ नाटक होगा अब छात्रों के लिए ये समस्या का विषय हो गया लोगों को ज्यादा इसके बारे में पता नहीं था पर चार दिन में प्ले बनकर तैयार हो गया और लोगों की पर्याप्त सराहना भी मिली | बहुत सारे खट्टे मीठे अनुभव होते रहे सौगत मोमबत्ती जलाये डटे रहते और अपने बिंदास स्वभाव के कारण चर्चा का केंद्र रहते हम एक शादी में बनारस गए और भाई साहब ने जींस कुर्ते के ऊपर कोट पहन लिया और पहुँच गए कोई अगर कुछ कहता भी तो जवाब तैयार क्या हुआ |बहुत सारे उतार चढावों के बीच सौगत ने सितम्बर 2003 में जौनपुर छोड़ दिया उसका चयन निफ्ट दिल्ली में हो गया था जौनपुर मुझे कभी रास आया नहीं था पर विभाग में उसके साथ से ऊर्जा मिलती थी पर अब वो जा रहा था खैर उसके परिवार को विदा करने के बाद सौगत को रोक लिया गया कि एक रात हम फिर से पार्टी करेंगे पुराने दिन ताजा करेंगे हालंकि तब तक हमारे दल में  इसमें अविनाश और ब्रजेश दो और लोग जुड चुके थे | साल बीतते गए इस बीच वो निफ्ट से निकल कर जामिया एम् सी आर सी में लेक्चरर बन गया और मैं जौनपुर से लखनऊ आ गया फोन पर बात भी अक्सर नहीं होती हाँ पर जब मैं दिल्ली जाता  तो जम के धमाल होता था ये बात अलग है कि धमाल मचाने वाले दो ही लोग होते थे और ऐसा मौका उसके जौनपुर छोड़ने के बाद एक ही बार आया जब हम दिल्ली में मिले|
लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी मंसूरी में सौगत के साथ 
2006 में सौगत  लखनऊ में प्रैक्टिकल परीक्षाएं लेने आये थे  जब वो  अपने रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रहा था गेस्ट हाउस के उस कमरे में हम कितनी देर तक अपनी अपनी जिंदगियों के बारे में बात करते रहे मैं उसके आई ए एस के साक्षात्कार के किस्से सुनता रहा और फिर वो खबर आयी जिसका हम सबको इंतज़ार था एक सपना जिसको सौगत जी रहा था सच हुई उसका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया और वो मंसूरी प्रशिक्षण के लिए चला गया बीच बीच में कभी कभार बात हो जाती हमें मिले हुए एक साल हो चुके थे कि नियति ने फिर हमें मिला दिया हुआ कि जिस दिन सौगत के प्रशिक्षण का अंतिम दिन था मैं देहरादून में था सौगत से बात हुई और उसने हमें मंसूरी के लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी  में बुला लिया और रात ज्यादा हो जाने कारण मुझे भी उस संस्थान में एक रात रुकने का सौभाग्य प्राप्त हुआ अद्भुत अनुभव था |

भारतीय रेल के जून 2021 अंक में प्रकाशित 

Friday, April 2, 2021

सिक्किम यात्रा :अंतिम भाग

पीलिंग की अगली सुबह कंचनजंघा पर्वतमाला में सूर्योदय के साथ शुरू हुई |सिर्फ चिड़ियों की चहचाहट और कोई मशीनी शोर नहीं ऐसी सुबह का आनन्द दशकों बाद उठाया था |गर्म पानी से नहाने के बाद एक बार फिर स्थानीय पर्यटन शुरू जो होना था |गाडी में कुछ दूर चलते ही पता लगा सडक पर जाम लगा पीछे गाड़ियों का काफिला बढ़ता ही गया पता चला आगे सडक पर बनाने का काम चल रहा है पर मजाल है किसी गाडी में हॉर्न की आवाज सुनाई पडी हो लगभग आधे घंटे के बाद सडक थोड़ी देर के लिए खोली गयी और हमारी गाडी उस जाम में से निकल गयी |
अगला पड़ाव था रिम्बी फाल या रिम्बी जलप्रपात वैसे सच बताऊँ तो सिक्किम झरनों का प्रदेश है आप सडक से कहीं की भी थोड़ी दूरी की यात्रा कीजिये आपको किसी न किसी पहाड़ से कोई झरना गिरता जरुर दिखेगा हाँ ये जरुर हो सकता है कि आकार में जो झरने के मानक हैं वो उस पर खरा न उतरे पर पानी पहाड़ों से गिरता आपको यत्र –तत्र दिख ही जाएगा तो रिम्बी झरना बस आकार में थोडा बड़ा है इसलिए वह एक पर्यटक स्थल बन गया है पर यहाँ के पर्यटक स्थल पर आपको स्थानीय लोग नहीं दिखेंगे और न ही भीड़ भाड़ रहती है गंदगी का नामों निशाँ नहीं है हाँ और जो गंदगी दिखेगी वो बाहर से आये पर्यटकों का छोड़ा हुआ सामान होगा |मतलब आम सिक्किम का निवासी पर्यवरण के प्रति खासा जागरूक है |रिम्बी फाल्स में ऐसा कुछ नहीं था जो अनोखा हो एक झरना जो काफी उंचाई से गिर रहा था पूरा का पूरा वातावरण प्रक्रतिक था और कोई भी मानवीय ढाँचे का निर्माण वहां नहीं किया गया था |यहीं रास्ते में दरप गाँव पड़ता है जहाँ बड़ी ईलायची की खेती होती है और कई सारे होम स्टे हैं जहाँ आप घर के वातावरण में रहकर पीलिंग की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं और ये होटल के मुकाबले सस्ते पड़ते हैं पर होटल की लक्जरी आपको नहीं मिलेगी जो कुछ मिलेगा वो सब प्राकृतिक होगा | अब बारी थी सिक्किम का एक बाग़ देखने की थी यूँ तो बाग़ में देखने कुछ होता नहीं पर यह सिक्किम का एक संतरे का बाग़ था |घुमावदार सीढीयों में तरह -तरह के पेड़ पौधे और उनके पीछे एक पहाडी नदी कल कल बह रही थी |संतरे का मौसम न होने के कारण हमें संतरे के छोटे -छोटे कच्चे फलों को देखकर दिल को खुश करना पड़ा जो भी हो पार्क था बहुत लुभावना |
सिक्किम का संतरे का बाग़ 
इसके और आगे एक प्रमुख झील का भी दर्शन करना था जो पहाड़ों की तलहटी में स्थित है जिसका नाम खेतोपलारी झील था |इस झील के पहुँचने का रास्ता बहुत संकरा और वीरान है अगर गाड़ियों की आवा जाही न हो तो यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि यहाँ बौद्ध धर्म से संबंधित इतना महतवपूर्ण केंद्र होगा जो हिन्दुओं  द्वारा भी पूजनीय है ऐसा माना जाता है कि यहाँ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं |यह झील करीब पैंतीस सौ साल पुरानी है जहाँ कुछ बौद्ध मठ हैं जहाँ पूजा हो रही थी |
खेतोपलारी झील
प्राकृतिक तौर पर यह इलाका पर्याप्त जैव विविधता लिए हुए था रास्तों और पहाड़ों पर जमी हुई काई बता रही थी कि यहाँ बारिश का पानी सूखने नहीं पाता कारण चारों तरफ ऊँचे ऊँचे पेड़ों का होना जो सूर्य की किरणों को धरती पर आने से रोक लेते हैं इसीलिये झील से मुख्य मार्ग का रास्ता जो करीब एक किलोमीटर का था ठंडा और फिसलन भरा था जबकि बाहर सूर्य अपनी तेजी के साथ विराजमान था |दोपहर के बारह चुके थे अब हमें पीलिंग वापस लौटना था और वहां से दार्जिलिंग के लिए प्रस्थान करना था |
करीब एक घंटे के बाद हम दार्जिलिंग के रास्ते में थे पीलिंग से दार्जिलिंग तक की दूरी करीब चार घंटे में पूरी होनी थी इस यात्रा के शुरू होने से पूर्व ही दार्जिलिंग में तनाव शुरू हो गया था

और हम निश्चिन्त नहीं थे कि हम दार्जिलिंग पहुँच पायेंगे भी या नहीं खैर उस दिन हमें बताया गया कि दार्जिलिंग में सब ठीक थे और आप दार्जिलिंग जा सकते हैं |वैसे एक बात बताऊँ जिन्दगी में घूमने का सिलसिला बड़ी देर से शुरू हुआ पर जब से मैंने होश सम्हाला अगर कहीं जाने का मन होता था तो वह दार्जीलिंग ही था शायद इसके लिए वे हिन्दी फ़िल्में जिम्मेदार थी जो उन दिनों दूरदर्शन पर दिखाई जाती थीं तो मन बल्लियों उछल रहा था कि आखिरकार मेरे जीवन की यह अधूरी इच्छा भी पूरी होने वाली है |सिक्किम पश्चिम बंगाल द्वारा प्रशासित स्वायत्तशासी क्षेत्र है जो सिक्किम से एक दम सटा हुआ है और इस क्षेत्र के अधिकतर निवासी नेपाली मूल के हैं जोअपने लिए अलग राज्य गोरखा लैंड की मांग लम्बे समय से कर रहे हैं |सिक्किम राज्य तक को सडक बहुत अच्छी है पर जहाँ से सिक्किम खत्म होता है और पश्चिम बंगाल की सीमा शुरू होती है रास्ता वहीं से खराब होना शुरू हुआ और जिसका चरम था दार्जिलिंग से पहले के पंद्रह किलोमीटर का रास्ता उस पहाडी रास्ते में आपको सडक खोजनी पड़ेगी |
दार्जिलिंग पीस पगोड़ा
थोड़ी देर समतल इलाके में चलने के बाद एक बार फिर हमारी गाडी पहाडी पर चढ़ने लगी |आस-पास के चाय बागान बता रहे थे हम दार्जिलिंग आ चुके थे पर शहर अभी थोड़ी दूरी पर था |
यार्ड में खड़ी टॉय ट्रेन 
शहर में घुसने पर दार्जिलिंग को लेकर जो मेरे सपने थे वो धीरे धीरे ध्वस्त होने शुरू हुए |काफी गन्दा शहर लोगों और गाड़ियों से भरा हुआ जैसे गर्मियों में शिमला और मंसूरी का हाल होता है लेकिन शहर में तनाव साफ़ महसूस किया जा सकता था जगह –जगह सेना और पुलिस की मौजूदगी यह बता रही थी कि सब ठीक नहीं है |हमारा ड्राइवर जिसका नाम मैं भूल चुका हूँ दार्जिलिंग की समस्या के बारे में बता रहा था और अभी जो आग भड़की है उसके पीछे ममता बनर्जी सरकार का बंगाली भाषा को अनिवार्य बनाने का तुगलकी फैसला था पर इसी के साथ अलग राज्य की मांग भी जोर पकड़ गयी जिससे हिंसा होने लग गयी |सच बताऊँ तो दार्जिलिंग को देखकर यह अहसास हुआ कि मैं यहाँ दोबारा नहीं आना चाहूँगा |अतिक्रमण और अनाधिकृत निर्माण ने पहाड़ों को बर्बाद कर दिया है हर जगह पर्यटकों की भीड़ और गंदगी |शाम हो चुकी थी इसलिए अब आराम का वक्त था वैसे भी सुबह साढ़े तीन बजे उठकर टाइगर हिल पर सूर्योदय देखने जाने का कार्यक्रम था हालंकि मेरी इसमें कोई रूचि नहीं थी पर एक बार फिर जनमत के फैसले के आगे झुकना पड़ा |
टाइगर हिल से सूर्योदय 
सुबह साढ़े तीन बजे दार्जिलिंग में ठीक ठाक ठण्ड थी हम टाइगर हिल जाने के लिए निकल पड़े |गाड़ियों और लोगों का हुजूम धीरे –धीरे बढ़ता गया उस जगह जहाँ से सूर्योदय का नजारा किया जाना था सुबह के चार बजे एक छोटा मोटा बाजार लगा था जहाँ ऊनी कपडे बिक रहे थे और हैरत की बात है लोग खरीद भी रहे थे |कुछ युवतियां थर्मस में कॉफ़ी बेच रही थी मैंने एक कोट डाल रखा था पर ठण्ड से बचने के लिए कॉफ़ी एक अच्छा विकल्प था बीस रुपये में एक छोटे से कागज के कप में कॉफ़ी मिली जो मीठी ज्यादा थी |आसमान का माहौल देखकर मैंने अंदाजा लगा लिया आज सूरज नहीं दिखेगा क्योंकि आसमान में बादल थे तो कंचनजंघा की चोटियों में से आज सूरज के दर्शन न हो पायेंगे इसलिए मैं वहां से पहले ही खिसक लिया और मेरा यह निर्णय सही साबित हुआ क्योंकि उस दिन सूरज नहीं निकला  और हम सूर्योदय के बाद गाड़ियों की होने वाली भागम भाग और जाम से बचकर पहले निकल गए |लौटते वक्त बतासिया लूप मेमोरियल पार्क का भ्रमण किया गया |
बतासिया वार मेमोरियल :फोटो साभार गूगल 
बतासिया लूप दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का एक स्टेशन है जहाँ एक वार मेमोरियल भी बनाया गया है जहाँ गोरखा रेजीमेंट के  उन सारे जवानों के नाम अंकित  है जो 1987 के बाद वीरगति को प्राप्त हुए |बतासिया लूप एक ऐसा स्टेशन है जहाँ रेलवे की पटरियां अंगरेजी का आठ बनाती हैं |अब कुछ बातें दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के बारे में दार्जिलिंग को विकसित करने का श्रेय अंग्रेजों  को जाता है यहाँ 1881 से नेरो गेज की ट्रेन अभी भी चलती है जिसे यूनेस्को की तरफ से वर्ल्ड हेरीटेज का दर्जा मिला है यह दो तरह के रास्ते पर चलती है पहला दार्जिलिंग से घूम स्टेशन जिसका आनंद जयादातर पर्यटक उठाते हैं इसे टॉय ट्रेन के नाम से जाना जाता है पर इसका किराया बहुत मंहगा है और दूसरा दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी जिसमें यह ट्रेन सत्तर किलोमीटर का रास्ता यह ट्रेन करीब आठ घंटे में पूरा करती है |

सडक से सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग का रास्ता बहुत अच्छा होने के कारण यह दूरी अब तीन घंटे में सिमट गयी है इसलिए लोग अब ट्रेन को प्राथमिकता नहीं देते ऐसे पर्यटक जिनके पास समय है और प्रकृति से प्यार वही अब इस ट्रेन से दार्जिलिंग तक का सफ़र तय करते हैं वैसे लम्बे समय तक यह टॉय ट्रेन मुम्बईया फिल्मों का हिस्सा रही है |आराधना फिल्म का वह मशहूर गाना “मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू” कौन भूल सकता है जो इसी ट्रेन पर शूट हुआ है |हम इस ट्रेन को चलता हुआ न देख पाए क्योंकि दार्जिलिंग में तनाव के कारण यह ट्रेन बंद थी हां यार्ड में जाकर जरुर इस ट्रेन को निहारा जो पिछले सौ सालों से भी ज्यादा दार्जिलिंग के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बनी हुई है |
पटरियों पर सजा बाजार 
ट्रेन के मुख्य ट्रैक पर यहाँ मेक शिफ्ट अरेंजमेंट वाली कई दुकानें भी हैं जो ट्रेन के आने पर बंद हो जाती हैं और जाने के बाद फिर खुल जाती हैं |बतासिया लूप पर सस्ते उनी कपडे आप खरीद सकते हैं |
होटल लौट कर थोडा सुस्ताने के बाद हम जापान सरकार द्वारा निर्मित पीस पेगोडा देखने गये तब तक बादल पूरे दार्जिलिंग को अपने जद में ले चुके थे और ऐसे मौसम में किसी पेगोडा को देखना उसकी सार्थकता सिद्ध कर रहा था शान्ति निस्तब्धता और प्रकृति का साथ |हम उसकी खूबसूरती में खोये ही थे तभी मेरी तन्द्रा को एक बुरी खबर ने तोडा शहर में हड़ताल हो गयी हम लोगों को तुरंत होटल लौटना होगा |लौटते वक्त वो दार्जिलिंग जो भीड़ और गाड़ियों से भरा था एकदम खाली हो गया हम जल्दी से होटल पहुंचे |बंद इतना जबरदस्त था कि हमारे होटल भी ताला पड़ा हुआ था हम लोगों के पहुँचने पर गेट खुला और फिर ताला बंद हो गया |अब दार्जिलिंग घूमने का सारा कार्यक्रम मुल्तवी होकर इस पर केन्द्रित था कि सुरक्षित वापस बागडोगरा कैसे पहुंचा जाए जहाँ से हमारी उड़ान अगले दिन थी पूरी दोपहर टैक्सी के जुगाड़ में बीत गयी करते –करते शाम को पांच बजे हम लोग दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी के लिए निकले और रात आठ बजे सिलीगुड़ी पहुँच गये |एक यात्रा अपने अंत की तरफ थी पर जिन्दगी की यात्रा और भटकन अभी भी जारी है किसी नए पड़ाव के इन्तजार में |
सिक्किम पर प्रख्यात निर्देशक सत्यजीत रे द्वारा बनाया गया वृत्तचित्र देखना चाहें तो यहाँ क्लिक करें |

 समाप्त 
भारतीय रेल के अप्रैल 2021 के अंक में प्रकाशित 


Thursday, April 1, 2021

सिक्किम यात्रा :पांचवां भाग

विदा गंगटोंक
अब गंगटोक से स्थायी रूप से विदा लेने की बारी थी सामान समेट कर गाड़ियों में भरा गया अब अगला ठिकाना पीलिंग था जहाँ हमें एक रात बितानी थी और पीलिंग घूमते हुए अगली शाम को ग्रेजिंग होते हुए दार्जिलिंग के लिए निकल जाना था |पीलिंग गंगटोंक से ज्यादा उंचाई पर है |पीलिंग की उंचाई 2,150 मीटर है और गंगटोंक से लगभग एक सौ तेरह किलोमीटर दूर है जहाँ पहुँचने में लगभग पांच घंटे लगने की उम्मीद थी |पीलिंग अपनी आबोहवा और सुन्दर दृश्यों के लिए मशहूर है |सुबह सात बजे के करीब हमने अपना होटल छोड़ दिया |

धीरे –धीरे गंगटोंक पीछे छूट गया और अब हम थे और हरे भरे पहाड़ आधा रास्ता वही था जिन रास्तों में हम पिछले दो दिन से आ जा रहे थे पर उसके बाद सब कुछ बदल जाने वाला था |रास्ता लम्बा था इसलिए मेरी नजर पर सडक पर चल रही गतिविधियों पर थी |हम लगभग जंगल में चल रहे थे पर बीच-बीच  में अपनी एक मोटरसाइकिल के साथ पुलिस कभी कभार दिख जाती थी इसमें ख़ास बात यह थी कि इनमें ज्यादातर महिलाएं थी जो उस वीराने में बगैर किसी भय के अपनी ड्यूटी बजा रही थी न बैठने के लिए कुर्सी न आस –पास कोई आबादी पर वो मुस्तैद थीं |मैंने कहीं पढ़ा था हमें वैसी पुलिस मिलती है जैसा हमारा समाज होता है सच है सिक्किम का समाज डरा हुआ नहीं था और नियम को मानने वाला भी |उत्तर भारत में दिन के समय भी कोई जगह लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है पर यहाँ कोई समस्या नहीं है |
बुद्ध की एक सौ तीस फीट ऊँची मूर्ति 

स्कूल जल्दी ही बंद होने वाले थे यहाँ गर्मियों की छुट्टियाँ बारिश में शुरू होती हैं इस वक्त परीक्षा का मौसम चल रहा था रास्ते में दो तीन के झुण्ड में लड़के लड़कियां अपना प्रश्न पत्र और क्लिप बोर्ड लिए आते जाते दिख रहे थे |इस वीराने में जहाँ गाड़ियाँ भी ज्यादा नहीं चल रही थी वो आराम से हँसते खेलते हुए अपनी मंजिल की तरफ बढे जा रहे थे |रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में आबादी ज्यादा नहीं थी पर एक चीज जो मुझे बार –बार मोहित कर रही थी यहाँ की लड़कियों के चेहरे पर छाई मुस्कान, इतनी अलहड़ और उन्मुक्त मुस्कान जिस पर मोहित हुए बगैर  नहीं रहा जा सकता |उनके पहनावे से यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ लड़कियों के पहनावे से उनके चरित्र की पहचान नहीं होती है हम नेशनल हाइवे से गुजर रहे थे और रास्ते में पड़ने वाली दुकानों में ज्यादातर लड़कियां ही थीं जो शॉर्ट्स और टी शर्ट में बड़े आराम से अपनी दुकान के सामने  बैठी थी या ग्राहकों को सामान बेच रही थी बगैर किसी हिचक के पूरे आत्मविश्वास के |
सूना पेट्रोल पम्प और पीछे कंचनजंघा की चोटियाँ 
यह मामला बता रहा है सिक्किम का समाज लैंगिक समानता के मामले में उत्तर भारत के अन्य राज्यों से कहीं आगे है |हम सिंगतम पार कर रहे थे यहाँ के पहाडी रास्तों की एक ख़ास बात मुझे समझ आयी कि क्यों यहाँ छोटी गाड़ियाँ भी बहुतायत से चलती हैं वो यह था कि आम तौर पर पहाड़ों पर एक तरफ पहाड़ होता है और दूसरी तरफ गहरी खाई जिसमें दुर्घटना होने पर गाडी कई फीट नीचे खाई में गिरती है अगर गाडी छोटी होती है तो जान जाने या चोटिल होने की आशंका रहती है पर सिक्किम के पहाड़ और यहाँ के रास्ते इस मायने में उत्तर भारत के पहाड़ों से अलग हैं यहाँ जिस तरफ खाई है उस तरफ भी बहुत पेड़ पौधे हैं जिससे गाड़ियों के नीचे गिरने का खतरा कम रहता है और अगर गिरी भी तो वो ज्यादा नीचे नहीं जा पाएंगी क्योंकि पहाड़ पर दूसरी तरफ भी बहुत से पेड़ हैं जिनमें साल और बांस की बहुतायत है |

पहाड़ पूरी  तरह से यहाँ संजोये गए हैं और विकास का वह रोग अभी यहाँ नहीं पहुंचा है |सिक्किम में सीढ़ीदार खेतों में खेती होती है जिनमें बड़ी इलायची और संतरा प्रमुख हैं |खेतों में यूरिया का इस्तेमाल नहीं होता और सरकार भी ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देती है इसलिए यहाँ आपको खाने के लिए जो कुछ मिलेगा वह शुद्ध ही मिलेगा |प्रदुषण न होने से शुद्धता का स्तर कई गुना बढ़ जाता है |रास्ते में हमारे ड्राइवर ने बताया कि  रवानगला कस्बे में एक बुद्ध पार्क पड़ता है|बस  उसको देखने की इच्छा बलवती हो उठी गाडी घुमवाई गयी |एक सौ तीस फुट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा दूर से ही दिखती है |
पीलिंग की वो सुहानी शाम 
बादलों की आवा जाही के बीच जब हम उस पार्क में पहुंचे तो बुद्ध प्रतिमा बादलों की छाँव में थी और हल्की बूंदा बांदी हो रही थी पर धीरे धीरे बादल चले गए और सूरज चमकने लग गया यह भी जल्दी बना पार्क है जिसका उदघाटन 2013 में बौद्ध गुरु दलाई लामा ने किया |मूर्ति के अन्दर पुजाग्रह है और इसके अंदर चलते चलते मूर्ति के सर तक पहुँच सकते हैं |जहाँ महात्मा बुद्ध के जीवन के कहानी को विशाल चित्रों में उकेरा गया है |शान्ति और शानदार मौसम यहाँ आप तन और मन से उस परालौकिक शक्ति से एकाकार हो सकते हैं |कई लोग वहां ध्यान कर रहे थे कुछ सो भी रहे थे ऐसा मुझे लगा हो सकता है वो ध्यान ही कर रहे हों पर हमारे पास इतना समय नहीं था इसलिए जल्दी ही हमने उस पार्क से विदा ली |करीब दिन के दो बजे हम पीलिंग के अपने होटल में पहुँच गए |पहली नजर में पीलिंग ने मुझे कुछ ख़ास आकर्षित नहीं किया हो सकता हो ये सफर की थकान हो या कुछ और उस वक्त धूप भी थी हमने फटाफट अपने कमरे में कब्ज़ा जमाया और एक चाय पी| यहाँ चाय के पाउच और बिजली की केतली हर होटल के कमरे में मिलेगी तो आपको बस पानी गर्म करना है और चाय कॉफ़ी जो पीना चाहें पीयें |कुछ देर सुस्ताने के बाद मैंने आस पास नजर डालने के लिए कमरे की खिड़की खोली थी तो देशी भाषा में अलबला गये इतने सुंदर द्रश्य की कल्पना नहीं की थी 

मेरे कमरे से बाहर का नजारा 
मेरे  पीछे हिमालय और आगे कंचनजंगा की चोटियाँ थी |मैंने सोचा जरा नहा कर सफर की थकान उतारी जाए पर पानी इतना ठंडा था कि हिम्मत जवाब सी देती दिखी लेकिन मैंने हथियार नहीं डाले और नहाया वो बात अलग है कि उस ठन्डे पानी से नहीं बल्कि गीजर के गर्म पानी से अब शाम गहरा रही थी और मैं पीलिंग की सड़कों पर था |मौसम का आलम यह था कि मुझे कोट डालना पड़ा सड़कें लोगों से भरी थी कुछ विदेशी भी थे पर शोर नाम की कोई चीज नहीं सब कुछ शांत मोटे तौर पर अगर लोगों को बदल दिया जाए तो मुझे एकबारगी लगा मैं यूरोप की किसी गली में घूम रहा था |

एक स्थानीय निवासी से बात करने पर पता चला यहाँ कुछ भी नहीं है बस मौसम के कारण सैलानी आते हैं तो आपको सिर्फ होटल ही मिलेंगे पर पीलिंग की वो शाम आज भी मेरे जेहन में जीवंत है पहाड़ जब धीरे धीरे हरे से काले होते जा रहे थे सड़कों पर गाड़ियों की हेडलाईट चमक रही थीं और मैं जून के महीने में कोट डाले हुए देश के एक ऐसे हिस्से में जहाँ मैं अजनबी था यूँ ही भटक रहा था |भटक ही तो रहा हूँ और शायद तभी भटकते हुए पीलिंग आ पहुंचा |मै सडक की रौशनी से दूर जाकर उन काले पहाड़ों को देख रहा था जो न जाने क्या क्या अपने अंदर समेटे हुए हैं |उस रात मैंने आईपोड को स्पीकर मोड में डाला और अपने कान के पास रखकर सोया शायद  सत्तर के दशक के उन मधुर गानों की स्वर लहरी में हिमालय और कंचनजंघा 
के वो पहाड़ भी सोये होंगे जो सदियों से जग रहे हैं
भारतीय रेल के अप्रैल 2021 के अंक में प्रकशित 

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