Friday, February 19, 2016

शिक्षा बिना उद्धार नहीं

मेक इन इण्डिया के प्रति सरकार बहुत गंभीर है सरकार का मानना है कि साल 2022  तक इससे दस करोड़ नयी नौकरियां सृजित होंगी और इस आशा के मूल में  यह विश्वास है कि भारत उत्पादन के क्षेत्र में चीन की तर्ज पर विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन का हब बनेगा |मेक इन इण्डिया के विचार के पीछे यह विचार है कि दुनिया के अन्य उद्यमियों  के साथ भारतीय भी तकनीक के क्षेत्र में  कुछ नया इनोवेशन करेंगे जिससे देश तेजी से आगे से बढ़ सकेगा |मेक इन इण्डिया की यह पहल स्वागत योग्य है पर डर इस बात का है कि यह कार्यक्रम महज दूसरे देशों की तकनीक का डंपिंग ग्राउंड बन कर न रह जाए क्योंकि आंकड़े कुछ और ही तस्वीर पेश कर रहे हैं संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) ने साल 2015 में जो ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स जारी किया उसमें भारत 81वें स्थान पर है| इस सूची में पहले स्थान पर स्विट्जरलैंड है वहीं चीन रूस और ब्राजील जैसे देश क्रमश: उन्तीसवें ,अड़तालीसवें और सत्तरवें स्थान पर हैं |यह सूची स्पष्ट ईशारा करती है भारत में बहुत ज़्यादा खोज नहीं हो रही, जो थोड़ा बहुत खोज हो रही है, उसमें सबसे आगे केंद्र सरकार की संस्था काउंसिल फ़ॉर साइंटिफ़िक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) है| इसने 10 साल में कुल  भारतीय 10,564 पेटेंट में से 2,060 पेटेंट हासिल किए हैं| इसके बाद सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कुछ बड़ी कंपनियां हैं|गौरतलब है कि भारत में बीते दस साल में सबसे ज़्यादा पेटेंट रसायन के क्षेत्र में शोध के लिए मिले हैं|लेकिन महत्वपूर्ण सवाल ये है कि हर क्षेत्र में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कौन से ऐसे कदम उठाये | राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार नीति की अभी तक घोषणा नहीं हो पायी है हालांकि साल 2009 के यूटिलाइज़ेशन ऑफ़ पब्लिक फ़ंडेड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बिल का भी यही मक़सद था पर इसका विरोध हुआ था कि किस तरह इन संस्थानों को पेटेंट लेने को मजबूर किया जा सकता है और कैसे इन पेटेंट पर किसी ख़ास कंपनी को ही लाइसेंस दिया जाएगा |एक और बड़ा मुद्दा यह भी था कि इन संस्थाओं को सरकारी पैसा मिलता है तो कोई निजी कंपनी कैसे इस शोध से फ़ायदा उठा सकती है|यह विधेयक 2014 में वापस ले लिया गया था| तथ्य यह भी है कि पांच प्रतिशत  से ज़्यादा पेटेंट व्यावसायिक रूप से सफल  नहीं होते |सरकारी संस्थानों के अधिकतर शोध उद्योगों के काम के नहीं होते  हैं, उनका ध्यान अकादमिक शोध पत्र प्रकाशित करने में ज्यादा होता है |आलोचकों का मानना है पेटेंट प्रणाली नई खोजों को नुक्सान ही पहुंचाती है, ख़ास कर सूचना प्रौद्योगिकी और सोफ्टवेयर  के क्षेत्र में|दूसरी बात भी है, सॉफ़्टवेयर क्षेत्र इतनी तेज़ी से बदलता है कि बीस  साल के पेटेंट का कोई मतलब नहीं है. भारतीय पेटेंट कार्यालय ने इन गाइडलाइंस को फ़िलहाल हटा दिया है |इनोवेशन के लिए शिक्षा पर ध्यान देने की जरुरत है आर्थिक विकास के लिए शिक्षित और कौशलयुक्त कामगारों का होना बहुत आवश्यक है, लेकिन देश में शिक्षा पर खर्च किए जाने वाले धन में कटौती की जा रही है| आज भारत का एक भी विश्वविद्यालय ऐसा नहीं जिसकी गिनती दुनिया के दो सौ  सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में होती हो | सरकार ने शिक्षा के लिए बजट 2015 में करीब 25 प्रतिशत की कटौती की है और उसके लिए आवंटित धनराशि को 82771 करोड़ रुपये से घटाकर 69074 करोड़ रुपये कर दी गयी थी |इस परिस्थिति में यदि देश के सत्तावन  फीसदी छात्रों के पास रोजगार प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करने वाला कौशल नहीं है, तो इसमें बहुत अधिक आश्चर्य नहीं होना चाहिए | आर्थिक विकास का आधार मानवीय क्षमता का विकास है | यदि मानवीय क्षमता में वृद्धि नहीं होगी और कौशलयुक्त श्रमशक्ति उपलब्ध नहीं होगी, तो आर्थिक विकास स्थायी रूप नहीं ले सकता | मेक इन इण्डिया कार्यक्रम का उद्देश्य दुनिया भर के उद्यमियों के लिए इस मकसद से शुरू किया गया है कि वे  भारत में अपने संयंत्र लगाकर देश में  अपने उत्पादों का निर्माण करें| ऐसा तभी हो सकता है जब विदेशी निवेशकों और उद्योगपतियों को भारत में कुशल श्रमशक्ति उपलब्ध हो |  इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा और रोजगार को आपस में जोड़ा जाये और छात्रों के भीतर नए-नए कौशल और क्षमताएं पैदा की जाएं. यह तभी संभव हो सकता है जब शिक्षा नीति में आवश्यक बदलाव किया जाए और उस पर अपेक्षित मात्रा में खर्च किया जाए नहीं तो भारत के शिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती ही जाएगी | व्यापारिक संगठन एसोचैम के ताजा अध्ययन में कहा गया है कि बीते दस वर्षों के दौरान निजी स्कूलों की फीस में लगभग 150 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. सरकारी स्कूलों के लगातार गिरते स्तर ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है |पिछले 2011 के जनगणना के आंकड़ों के मुकाबले भारतीय ग्रामीण निरक्षरों की संख्या में 8.6 करोड़ की और बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है|ये आंकड़े सामाजिक आर्थिक और जातीय जनगणना (सोशियो इकोनॉमिक एंड कास्ट सेंसस- एसईसीसी) ने जुटाए हैं|महत्वपूर्ण  है कि एसईसीसी ने 2011 में 31.57 करोड़ ग्रामीण भारतीयों की निरक्षर के रूप में गिनती की थीउस समय यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा थी|ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक़, 2011 में निरक्षर भारतीयों की संख्या 32.23 प्रतिशत थी जबकि अब उनकी संख्या बढ़कर 35.73 प्रतिशत हो गई है|साक्षरों के मामले में राजस्थान की स्थिति सबसे बुरी है यहां 47.58 (2.58 करोड़) लोग निरक्षर हैं|इसके बाद नंबर आता है मध्यप्रदेश का जहां निरक्षर आबादी की संख्या 44.19 या 2.28 करोड़ है.बिहार में निरक्षरों की संख्या कुल आबादी का 43.85 प्रतिशत (4.29 करोड़) और तेलंगाना में 40.42 प्रतिशत (95 लाख) है|शिक्षा एक ऐसा पैमाना है जिससे कहीं हुए विकास को समझा जा सकता है ,शिक्षा जहाँ जागरूकता लाती है वहीं मानव संसाधन को भी विकसित करती है |इस मायने में शिक्षा की हालत गाँवों में ज्यादा खराब है |सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून तो लागू कर दिया हैलेकिन इसके लिए सबसे जरूरी बात यानि ग्रामीण सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारने पर अब तक न तो केंद्र ने ध्यान दिया है और न ही राज्य सरकारों नेग्रामीण इलाकों में स्थित ऐसे स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं हैजो मौलिक सुविधाओं और आधारभूत ढांचे की कमी से जूझ रहे हैंइन स्कूलों में शिक्षकों की तादाद एक तो जरूरत के मुकाबले बहुत कम है और जो हैं भी वो पूर्णता प्रशिक्षित  नहीं हैज्यादातर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों का अनुपात बहुत ऊंचा है. कई स्कूलों में 50 छात्रों पर एक शिक्षक है|यही नहींसरकारी स्कूलों में एक ही शिक्षक विज्ञान और गणित से लेकर इतिहास और भूगोल तक पढ़ाता है| ध्यान रखा जाना चाहिए जब तक देश में शिक्षा की हालत ठीक नहीं होगी इनोवेशन को बढ़ावा नहीं मिलेगा |
राष्ट्रीय सहारा में 19/02/16 को प्रकाशित 

4 comments:

Suraj Verma said...

बहुत ज़रूरी होती शिक्षा,
सारे अवगुण धोती शिक्षा.
चाहे जितना पढ़ लें हम पर,
कभी न पूरी होती शिक्षा.
शिक्षा पाकर ही बनते हैं,
नेता, अफ़सर शिक्षक.
वैज्ञानिक, यंत्री व्यापारी,
या साधारण रक्षक.
कर्तव्यों का बोध कराती,
अधिकारों का ज्ञान.
शिक्षा से ही मिल सकता है,
सर्वोपरि सम्मान.
बुद्धिहीन को बुद्धि देती,
अज्ञानी को ज्ञान.
शिक्षा से ही बन सकता है,
भारत देश महान.

SIDDHARTH CHATTERJEE said...

Education is very important for an individual's success in life. Education provides pupils teaching skills that prepare them physically, mentally and socially for the world of work in later life. Education is the best investment for the people because well educated people have more opportunities to get a job which gives them satisfaction. Educated individuals enjoy respect among their colleagues and they can effectively contribute to the development of their country and society by inventing new devices and discoveries. Education is an important aspect of the work of society and it will raise the countryside issues and promote knowledge and understanding of rural communities.

The development of education and educational opportunities is built on creativity tempered by knowledge and wisdom gain through the experience of learning. Teachers are the most important factors for an innovative society because teachers' knowledge and skills not only enhance the quality and efficiency of education, but also improve the prerequisites of research and innovation.

PRASHANT TIWARI said...

शिक्षा सभी मनुष्यों का सबसे पहला और सबसे आवश्यक अधिकार है। बिना शिक्षा के हम अधूरे हैं, और हमारा जीवन बेकार है। शिक्षा हमें अपने जीवन में एक लक्ष्य निर्धारित करने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

ज्योति said...

शिक्षा वह प्रकाश है जिसके द्वारा बालक की समस्त शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा अध्यात्मिक शक्तियों का विकास होता है | इससे वह समाज का एक उतरदायी घटक एवं राष्ट्र का प्रखर चरित्र-संपन्न नागरिक बनकर समाज की सर्वांगीण उन्नति में अपनी शक्ति का उतरोतर प्रयोग करने की भावना से ओत-प्रोत होकर संस्कृति तथा सभ्यता को पुनर्जीवित एवं पुर्नस्थापित करने के लिए प्रेरित हो जाता है | जिस प्रकार एक ओर शिक्षा बालक का सर्वांगीण विकास करके उसे तेजस्वी, बुद्धिमान, चरित्रवान, विद्वान्, तथा वीर बनती है, उसी प्रकार दूसरी ओर शिक्षा समाज की उन्नति के लिए भी एक आवश्यक तथा शक्तिशाली साधन है |

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