Thursday, February 19, 2026

डिजिटल पीढ़ी का विरोधाभास

 इस तेजी से डिजिटल होती संस्कृति में हमारी पीढ़ी एक बड़े विरोधाभास से जूझ रही है। यूँ कहने को तो हम इंसानी सभ्यता की सबसे ज्यादा कनेक्टेड पीढ़ी हैं लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा अकेली है। ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया, रील्स की शोर-शराबे वाली दुनिया ने हमें अंदर से थका दिया है। इसी थकान और तनाव से बचने के लिए आज की जेन जी पीढ़ी ने एक नया तरीका ढूंढ लिया है जिसे बेड रॉटिंग कहते हैं। यह शब्द सुनने में जितना अजीब लगता है इसका अर्थ उतना ही सीधा है। इसका मतलब है जानबूझकर घंटों या दिनभर बिस्तर पर पड़े रहना और निष्क्रिय गतिविधियों में लिप्त रहना जैसे फोन स्क्रॉल करना, फिल्म देखना या बस लेटे रहना। हालांकि जेन जी इसे सेल्फ केयर यानी आत्म देखभाल का नया और क्रांतिकारी तरीका बताते हैं। भारत में हैशटैग बेड रॉटिंग पर आज लाखों व्यूज इस बात का सबूत है कि अब यह आदत भारतीय युवाओं के जीवन में भी गहरी पैठ बना रही है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सच में तनाव या बर्नआउट से लड़ने का एक कारगर तरीका है या फिर अपने जीवन से मुँह मोड़ लेना एक खतरनाक बहाना जो व्यक्ति को अवसाद और निष्क्रियता के अंधेरे कुएँ में धकेल रहा है।

बेड रॉटिंग शब्द का पहली बार इस्तेमाल 2023 में एक अमेरिकी टिकटॉक यूजर ने अपने वीडियो में किया था। देखते-देखते यह शब्द जेन जी शब्दावली का हिस्सा हो गया , जो हफ्ते में एक दिन बेड रॉटिंग करके एंटी प्रोडेक्टिविटी और सेल्फ केयर जीवन शैली को अपनाने लगे। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक भी युवाओं की इस प्रवृत्ति के प्रति अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक बेड रॉटिंग के पीछे कई कारण हैं, एक ओर बदलती जीवनशैली और बढ़ता तनाव इसका एक कारण है वहीं दूसरी ओर छात्रों के बीच हसल कल्चर भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी की मनोचिकित्सक निकोले होलिंग्सहेड बताती है कि हमारा समाज हमेशा से खुद को व्यस्त करने और अत्यधिक उत्पादक होने पर जोर देता है। ऐसे में उस सामाजिक दबाव को  जो हर पल कुछ न कुछ उत्पादक करने के लिए मजबूर करता है, को आज के युवा खारिज कर रहे हैं।

लेकिन इसके पीछे एक जटिल और गंभीर समस्या भी उभर रही है। मनोवैज्ञानिक इसे सिर्फ आराम नहीं बल्कि एक तरह के इमोशनल शटडॉउन की तरह भी देखते हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी भावनाओं, तनाव और जिम्मेदारियों से बचने के लिए बिस्तर को एक सुरक्षित किले की तरह इस्तेमाल करने लगता है। जिससे मानसिक थकावट, बेचैनी, अवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। भारत और दुनियाभर में मानसिक स्वास्थ्य के आंकड़े चिंताजनक हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार लगभग 10 प्रतिशत वयस्क किसी न किसी प्रकार के मानसिक विकार से ग्रसित हैं वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर करीब 21 आत्महत्याएं होती हैं जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। साल 2024 में आई विश्व खुशहाली रिपोर्ट में भारत ने 118वां स्थान प्राप्त किया था जो कि मानसिक चिंता को दर्शाता है।

हाल ही में ऑस्ट्रैलिया की एक मनोवैज्ञानिक संस्था जीएम5 की ओर से तेलंगाना और कर्नाटक के स्कूली छात्रों का सर्वेक्षण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक 24 प्रतिशत छात्रों में किसी न किसी तरह की मानसिक संकट के लक्षण मिले वहीं 6 से 10 प्रतिशत ऐसे छात्र मिले जो गंभीर या अति गंभीर श्रेणी में आते हैं जिन्हे तत्काल सहायता की आवश्यकता है। ऐसा ही एक रिपोर्ट रिसर्च संस्था सेपियंस लैब की ओर से भी जारी की गई । जिसमें कोविड महामारी के बाद 18-24 साल के भारतीय युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य की जुड़ी समस्याओं  का उल्लेख था। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में इस आयु वर्ग का औसत एमएचक्यू यानी मेंटल हेल्थ क्वोशियंट 28 था जो 2023 में गिरकर 20 हो गया साथ ही ज्यादातर युवाओं में किसी न किसी प्रकार की मानसिक समस्या मिली। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में साल 2024 में सामने आये एक बहुराष्ट्रीय शोध के मुताबिक दुनियाभर के किशोर प्रतिदिन औसतन 8 से 10 घंटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग करने, वीडियो गेम खेलने जैसी गतिहीन गतिविधियों में बिता रहे हैं।

हालांकि भारत में बेड रॉटिंग को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार ट्रैंड बना हुआ है , कुछ युवा इसके लिए एक्सटेंशन ऑफ द स्लीप, स्लीप वीकेंड या वीकेंड कोमा जैसे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। आज कल छुट्टियाँ घूमने फिरने या परिवार के साथ वक्त बिताने का समय नहीं रहीं बल्कि बिस्तर पर पड़े रहने का बहाना बन गई हैं । आज की जेन-ज़ी पीढ़ी अपने कमरे की चारदीवारी में सिमटकर, मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन के सामने पूरा दिन बिताना ज्यादा सहज महसूस करती है। खाना ऑर्डर करना हो तो ऑनलाइन, दोस्तों से बात करनी हो तो ऑनलाइन, जैसे वास्तविक दुनिया से जुड़ने की उनकी इच्छा धीरे-धीरे मिटती जा रही हो। दरअसल आज का युवा सूचनाओं के ऐसे महासागर में जी रहा है, जो कभी शांत नहीं होता, अंतहीन फीड्स, नेटफ्लिक्स, असीमित कंटेंट यह सब मिलकर डिजिटल ओवरस्टिम्यूलेशनका माहौल बनाते हैं। जिससे दिमाग को कभी आराम नहीं मिलता और बिस्तर एक आरामदायक ठिकाना बन जाता है। वहीं सोशल मीडिया पर सेल्फ केयर की गलत व्याख्या से इसे और अधिक बल मिलता है।

कभी-कभार भले बिस्तर पर आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा कर सकता है, लेकिन एक नियमित आदत से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बेड रॉटिंग से न्यूरोट्रांसमीटर्स विशेषकर डोपामिन और सेरोटोनिन के स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इनकी कमी से मोटिवेशन में गिरावट, उदासी, और ऊर्जा की कमी महसूस होती है , जो व्यक्ति को और निष्क्रिय बनाती है, और अंत में यह एक दुष्चक्र हो जाता है जिससे उदासी और बढ़ जाती है और उदासी से निष्क्रियता । पर इसका ये मतलब नहीं है कि हमें आराम नहीं करना चाहिए। तनावपूर्ण जीवन से एक ब्रेक लेना और खुद को रिचार्ज करना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि इसके साथ घर के बाहर निकलना, शारीरिक क्रियाएं करना, दोस्तों या परिवार के लोगों से बात करना भी उतना ही जरूरी है। आखिर में हमें एक संतुलन की आवश्यकता है जहाँ हम बिस्तर पर लेटकर फोन स्क्रॉल करने के बजाय, किताबें पढ़ना, संगीत सुनना या मेडिटेशन जैसी चीजें भी कर सकते हैं। इससे व्यक्ति में निष्क्रियता कम और सक्रियता बढ़ेगी। और यदि कोई इस चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहा है तो किसी मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से बात करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए। तभी हम अपनी युवा पीढ़ी को एक स्वस्थ, उत्पादक और खुशहाल भविष्य दे पाएंगे।
दैनिक जागरण में 19/02/2026  को प्रकाशित लेख 

Wednesday, February 18, 2026

स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की दीवारे

 

डेटा रिपोर्टल के मुताबिक 2025 तक सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या दुनिया में 5.24 अरब तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक आबादी का करीब 63 प्रतिशत है। वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की माने तो अब सोशल मीडिया केवल संवाद या संपर्क करने का एक माध्यम भर नहीं रह गया है बल्कि 34 प्रतिशत लोग इसका उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग अपना खाली समय बिताने और मनोरंजन के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। आज का सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से ज्यादा डाटा का बाजार बन गया है। हर क्लिक, हर लाइक, हर सेंकेंड बदलती स्क्रीन सब कुछ बेचा जा रहा है। और इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकॉनॉमी। इस इकॉनमी में वही कंटेंट टिकता है जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है। नतीजन हर घंटें हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं जिनमें गुणवत्ता से अधिक सतहीपन झलकता है। युवाओं में भी एक बड़ा वर्ग अब कंटेंट को सोचने के लिए बल्कि रिएक्ट करने के लिए देखता है। वहीं असहमति और आलोचना के डर से एक बड़ा वर्ग अब चुप्पी साध रहा है। यहीं से शुरु होती है एक डिजिटल त्रासदी, स्पाइरल ऑफ साइलेंस। दशकों पहले एक जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं।  

बीते एक दशक में दुनिया ने जिस तीव्रता से डिजिटल क्रांति को अपनाया है, उसने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। इस तकनीकी युग में जहाँ सूचना तक पहुँच सरल हुई है, संवाद की भौगोलिक सीमाएँ सिमटी हैं और अभिव्यक्ति के नए मंच विकसित हुए हैं, वहीं इसके कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया, जो कभी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देने वाले एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली कारक के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। आज स्थिति यह है कि लोग पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन संवाद पहले से कहीं अधिक सतही हो गया है। सोशल मीडिया पर अब बातचीत कम और प्रतिक्रिया बढ़ गई है, हर मुद्दा पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है, बीच के संवाद की जगह खाली हो गई है।

यह स्थिति उस शुरुआती ख्याल से बिल्कुल उलट है, जिसके साथ सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया था।
शुरुआत में यह माना गया था कि यह मंच आम आदमी की आवाज़ बनेगा। समाज में खुला संवाद होगा और विचारों का लोकतंत्रीकरण होगा। लेकिन आज एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने आती है, दुनिया एक मंच पर तो आ गई लेकिन यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है।

यह सिद्धांत आज सोशल मीडिया पर भी सटीक लागू हो रहा है।सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएँ, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके हैं। इसके चलते हमारे सामने वही विचार और ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है—जहाँ उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फँस जाते हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण उनसे छिप जाते हैं।
इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप बहुत से लोग अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर मौजूद तो रहते हैं, लेकिन सक्रिय भागीदारी नहीं करते—सिर्फ पोस्ट पढ़ते हैं, रील्स देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं।
उनके अंदर ये भावना आ जाती है कि उन्होंने कुछ लिखा तो वह ट्रेंड या लोकप्रिय नहीं होगा। धीरे-धीरे यह चुप्पी ऑनलाइन दुनिया के बाहर भी फैल रही है। दफ्तरों, कॉलेज और पारिवारिक चर्चाओं में भी लोग अपनी मौलिक राय व्यक्त करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएँ और केवल सहमति वाले विचार ही बने रहते हैं।
वेसलेयन यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर चुप रहते हैं वे अब असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं। अब बहुमत की राय वह नहीं है जो वे सोचते हैं बल्कि वह है जो प्लेटफॉर्म दिखाना चाहता है, एल्गोरिदम तय करता है कि कौन सी आवाज दिखेगी और कौन सी दब जाएगी।

आज हम ऐसे दो राहों पर खड़े हैं जहाँ तकनीक तो 2026 की है लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। वह सपना कि सोशल मीडिया लोगों के बीच दूरियाँ मिटाएगा आज एक डिजिटल भीड़ में बदल गया है जहाँ हम करोड़ों लोगों के बीच होते हुए भी अपनी बात कहने में असुरक्षित महसूस करते हैं। यह स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की बनाई दीवारे केवल हमारे फोन तक ही नहीं हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही है। अंतत: यह जिम्मेदारी हम यूजर्स की है, अगर हमें इस डिजिटल जेल औऱ फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है तो हमें मूक दर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना है जहाँ संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो। वरना यह ग्लोबल विलेज केवल एक संख्या और स्क्रीन का घर बनकर रह जाएगा, जहाँ लोग जुड़े तो रहेंगे लेकिन उनके बीच असली संवाद, समझ और रचनात्मकता लुप्त हो चुकी होगी। क्योंकि असली अभिव्यक्ति वही है जहाँ डर न हो और असली जुड़ाव वही है जहाँ मतभेद हों।
अमर उजाला में 18/02/2026 को प्रकाशित 

Wednesday, February 11, 2026

रियल एक्सप्रेशन की जरूरत

ए साल में आप सब जरुर खुशियों के साथ टैग हो गए होंगे,खुशियों के साथ हैंग आउट जारी होगा और चिली वेदर में चिलेक्स कर रहे होंगें.  अब चूँकि नया साल है तो मैंने सोचा क्यूँ न आपके साथ एक नयी भाषा में बात की जाए जिसे जेन ज़ी  ज्यादा बेहतर समझती है . जेन जी के लोग हमारी पीढ़ी से की मामले में अलग हैं जैसे उन्होंने इंटरनेट के साथ अपनी आँखें खोलीं |वे इंस्टा रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स के साथ पाले बढ़े.तरह तरह के मोबाईल के बारे जानना और चलाना उनके लिए बच्चों  का खेल है पर हम लोगों को सब सीखना पड़ा. उन्ही एप की दुनिया में तरह-तरह  के मेसेजिंग एप हैं. जिनमें प्रमुख हैं चैटिंग एप जैसे व्हाट्स एप। जब मैं ये लेख लिख रहा था तभी मुझे किसी व्हाट्स एप ग्रुप में यह चुटकुला पढ़ने को मिला. “कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है... अगर तुम  १०:३० बजे ही सो जाती है तो तुम्हारे  व्हाट्सएप्प पर "लास्ट सीन :३०  एमक्यों दिखाता हैहा हा और मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी असल में नए नए मोबाईल एप हमारी जिन्दगी में किस तरह असर डाल रहे हैं इसका अंदाजा हमें खुद नहीं है. यारी दोस्ती करना अच्छी बात है पर यारी दोस्ती जब ज्यादा लोगों से हो जायेगी तो समस्या आयेगी ही. क्योंकि एक ओर मोबाईल नेट  क्रांति ने हमें ग्लोबली कनेक्टेड तो कर दिया ही है.  वहीं कहीं हम बैकवर्ड न घोषित कर दिए जाएँ इस दौड़ में जितने चैटिंग एप इंटरनेट पर उपलब्ध हैं वो सबके सब हमारे मोबाईल पर होने चाहिए जैसी रेस में शामिल हो जाते हैं । इस दौड़ में जेन जी सबसे आगे हैं इस ललक ने कब हमें इतना एक्सप्रेशन लेस कर दिया कि हमें अपने रीयल एक्सप्रेशन को भूल टेक्नीकल एक्सप्रेशन यानि इमोजीस के गुलाम बन गये. हंसी आये या ना आये हा हा लिख कर कोई स्माईली बना दो.  सामने वाला यही समझेगा कि आप बहुत खुश हैं पर क्या आप वाकई खुश हैं क्यूँ अब मैं थोडा सा हंस लूँअक्सर हम चैट पर यही कर रहे होतें वर्च्युल चैटिंग में हम जीवन की रियल प्रॉब्लम का सल्यूशन ढूंढने लग गए हैं .हमारी फोनबुक में बहुत से लोगों के नंबर सेव रहते हैं और हम जितने ज्यादा चैटिंग एप डाउनलोड करेंगे हम उतने ही ज्यादा खतरे में रहेंगे क्यूंकि कोई न कोई चैटिंग एप हर कूल डूड यानि जेन जी  के मोबाईल में रहता है और इससे कोई भी ,कभी भी आपको संदेसा भेज सकता है. यह जाने बगैर कि आप बात करने के मूड में हैं कि नहीं.  दूसरी चीज है आपकी प्राइवेसी,चैटिंग एप और कुछ न बताएं तो भी ये तो सबको बता ही देते हैं कि आप किसी ख़ास एप पर कितने एक्टिव हैं अगर इससे बचना है तो कुछ और एप डाउनलोड कीजिये. ये तो आप भी मानेंगे कि बगैर काम की चैटिंग खाली लोगों का काम है या फिर आप इमोशनली वीक है.  

मेरे जेन ज़ी मामले और भी हैं ज्यादा चैटिंग ये बताती है कि आप फोकस्ड नहीं हैं चैटिंग करने के लिए उम्र पडी है.  ये टाईम कुछ पाने का ,कुछ कर दिखाने का है.बात जिन्दगी की हो या रिश्तों की हम जितने सिलेक्टिव रहेंगे उतना ही सफल रहेंगे और यही बात एप और चैटिंग पर भी लागू होती है,जो आपके अपने है उन्हें वर्च्युल एक्सप्रेशन नहीं रीयल एक्सप्रेशन की जरुरत है.ईमोजीस आँखों को अच्छी लगती हैं पर जरुरी नहीं कि दिल को भी अच्छी लगे. जो रिश्ते दिल के होते हैं उन्हें दिल से जोडिये नहीं तो एक वक्त ऐसा आएगा जब आप होंगे और आपकी तन्हाई मोबाईल की फोनबुक भरी होगी पर दिल की गलियां सूनी होंगीं तो अपने अपनों से मिलने जुलने का सिलसिला बनाये रखिये.  

 प्रभात खबर में 11/02/2026 को प्रकाशित 

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