Thursday, July 9, 2026

डिजीटल क्रांति का नया अध्याय

 सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन  महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी  है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के  ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही।

 IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।

तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार  का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता  है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।

लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?

 न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन  महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी  है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के  ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही।
 IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।
तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार  का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता  है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।
लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?
 न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।

दैनिक जागरण में 09 /07 /2026  को प्रकाशित लेख 

Thursday, June 25, 2026

एल्गोरिदम की दुनिया का दूसरा पहलू

 बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब इंटरनेट ने भारतीय समाज में दस्तक दी, तब इसे सामाजिक समता और लोकतांत्रिक चेतना का सबसे बड़ा मुक्तिदाता माना गया था। मुख्यधारा के समाजशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं का यह तर्क था कि जो समता भारतीय समाज सदियों के जातिगत, वर्गीय और भौगोलिक विभाजनों के कारण वास्तविक धरातल पर प्राप्त नहीं कर सका, वह यह आभासी दुनिया पलक झपकते ही दे देगी। कल्पना यह भी थी कि एक रेहड़ी-पटरी वाले और देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट अधिकारी की आवाज़ को डिजिटल मंचों पर बिना किसी संस्थागत दबाव के समान महत्व मिलेगा। लेकिन आज, न्यू मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में सच्चाई इस मीठी कल्पना के ठीक विपरीत खड़ी है। भारतीय इंटरनेट अब एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक स्पेस नहीं, बल्कि एक ऐसा 'अदृश्य डिजिटल पिंजरा' बन चुका है जो बैकएंड एल्गोरिदम, डेटा-मोनोपॉली और एआई के ज़रिए एक नई सामाजिक-आर्थिक वर्गीय व्यवस्था को जन्म दे रहा है। इसे हम "एल्गोरिद्मिक रंगभेद" (Algorithmic Apartheid) या "डिजिटल अछूतों का निर्माण" कह सकते हैं, जहाँ यूज़र को बिना बताए उसकी रीच, रोज़गार और सामाजिक हैसियत को एक गुप्त कोड से नियंत्रित किया जा रहा है।

आमतौर पर सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, एक्स (ट्विटर), आदि को सामान्य जनमानस के विचारों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि सोशल मीडिया सही मायने में एक ऐसा मीडिया है, जो किसी भी तरह के दबाव से मुक्त है। पिछले कुछ समय से जनमत के निर्माण में भी इसकी भूमिका तेजी से बढ़ी है, लेकिन सूचना साम्राज्यवाद के इस दौर में इंटरनेट भी सूचना के मुक्त प्रवाह का विकल्प बनकर नहीं उभर पा रहा है। यह एक ऐसे मायाजाल का निर्माण करता है जिसमें सब कुछ वास्तविक लगते हुए भी वास्तविक नहीं लगता है। इस मायाजाल की जड़ें केवल वैचारिक नियंत्रण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सबसे हिंसक प्रहार समाज के सबसे कमजोर और असुरक्षित तबके पर हो रहा है, जिसकी पुष्टि वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं के दस्तावेज़ भी करते हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की हालिया 'सुरक्षा और तकनीक' रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर की सरकारें और सीमा सुरक्षा बल अब प्रवासियों की पात्रता तथा आयु की जांच के लिए 'एआई फेशियल रिकग्निशन' तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू कर रहे हैं। इन रिपोर्टों में यह प्रमाणित किया गया है कि ये ब्लैक-बॉक्स एल्गोरिदम अश्वेतों, महिलाओं और प्रवासियों के प्रति जन्मजात रूप से पूर्वाग्रही हैं, जो बड़े पैमाने पर मानवीय बहिष्करण को जन्म दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर प्रवासियों को अलग-थलग करने वाला यह तकनीकी पूर्वाग्रह जब भारत के भीतर प्रवेश करता है, तो यह यहाँ सदियों से मौजूद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों के साथ मिलकर और अधिक हिंसक रूप अख्तियार कर लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि पहले से ही मुख्यधारा से कटे हुए समाज के हिस्से इस डिजिटल ढांचे में और पीछे छूटते चले जाते हैं।

भारतीय संदर्भ में यह एल्गोरिद्मिक रंगभेद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों को और गहरा कर रहा है। देश में इंटरनेट उपयोग में लैंगिक असमानता गहरी बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और GSMA Mobile Gender Gap Report के अनुसार, पुरुषों में इंटरनेट उपयोग दर लगभग 57% है, जबकि महिलाओं में यह केवल 33% है। मोबाइल इंटरनेट उपयोग में भी महिलाएँ पुरुषों से लगभग 50% पीछे हैं। इसके अलावा, डिजिटल कौशल में पुरुषों की भागीदारी 22.78% है, जबकि महिलाओं की केवल 13.91%। यह अंतर दर्शाता है कि डिजिटल पहुँच में लैंगिक असमानता भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनी हुई है। इस संरचनात्मक अंतर के कारण एल्गोरिदम पर अंग्रेजी और कुछ गिने-चुने शहरी केंद्रों का वर्चस्व स्थापित हो जाता है, जिसके चलते ग्रामीण भारत और क्षेत्रीय विमर्शों को एल्गोरिदम 'ट्रेंडिंग' की मुख्यधारा से बाहर कर देता है।

पहुंच और कौशल का यह लैंगिक व क्षेत्रीय अंतर जब एक ओर आम नागरिक को हाशिए पर धकेलता है, तो वहीं दूसरी ओर जो लोग इस डिजिटल स्पेस के भीतर मौजूद हैं, उनके लिए यह वर्चुअल दुनिया एक गहरे अविश्वास और असुरक्षा का मैदान बन जाती है। मुख्यधारा का विमर्श अब सत्य और असत्य के बीच के भेद को ही समाप्त करने पर आमादा है, जिसके पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनियंत्रित विकास काम कर रहा है। डिजिटल स्पेस में अब सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025 और 2026 के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा संचालित भ्रामक सामग्री और डीपफेक आज वैश्विक लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। एआई टूल्स का दुरुपयोग करके किसी भी व्यक्ति या विचार की सामाजिक हैसियत और गरिमा को पल भर में नष्ट किया जा सकता है।

विश्वसनीयता के इस संकट की भयावहता का अंदाज़ा महज़ कुछ सैद्धांतिक चेतावनियों से नहीं, बल्कि इसके पीछे काम कर रहे विस्फोटक आंकड़ों से लगाया जा सकता है। Resemble.AI की रिपोर्ट (2025) के अनुसार डीपफेक सामग्री की मात्रा में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। 2019 में जहाँ केवल 14,000 डीपफेक वीडियो मौजूद थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 8 मिलियन तक पहुँच गई — यानी लगभग 571 गुना वृद्धि। इसी रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 की तीसरी तिमाही तक हर तिमाही में औसतन 2,031 डीपफेक घटनाएँ दर्ज की गईं, जो 2023 की तुलना में 1,500% अधिक है। तकनीक की यह हिंसक बाढ़ जहां एक तरफ भ्रामक विमर्शों को जन्म देती है, वहीं दूसरी तरफ यदि कोई सचेत नागरिक इन बाधाओं को पार करके अपनी स्वतंत्र असहमति या प्रतिरोध दर्ज कराना चाहता है, तो इस तंत्र के पास उसकी आवाज़ को घोंटने के लिए और भी सूक्ष्म, अदृश्य हथकंडे मौजूद हैं।

इन बाधाओं को पार करके कोई यूजर अगर अपनी असहमति दर्ज कराता है तो उसके 'शैडो-बैनिंग' किये जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। वर्चुअल मंचों पर वैचारिक विरोध को दबाने के लिए 'शैडो-बैनिंग' जैसी अदृश्य सेंसरशिप का सहारा लिया जाता है। यूरोपीय डिजिटल राइट्स (EDRi) जैसी डिजिटल राइट्स वॉचडॉग संस्थाओं के शोध दर्शाते हैं कि बड़े टेक प्लेटफॉर्म अपने व्यावसायिक हितों और विज्ञापनों को बचाने के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील या सामाजिक आंदोलनों से जुड़े की-वर्ड्स की 'रीच' को बैकएंड से ही दबा देते हैं। इसमें यूज़र के अकाउंट को ब्लॉक नहीं किया जाता, बल्कि उसकी रीच को शून्य कर दिया जाता है। यूज़र को लगता है कि वह स्वतंत्र है और लोकतांत्रिक चर्चा का हिस्सा है, पर वास्तव में उसकी आवाज़ को एक तकनीकी पिंजरे में कैद कर दिया जाता है जहाँ कोई दूसरा उसे सुन ही नहीं पाता। यह 'सूचना साम्राज्यवाद' का सबसे सूक्ष्म और हिंसक स्वरूप है।

अभिव्यक्ति को कुचलने वाली यह अदृश्य सेंसरशिप किसी स्थानीय स्तर पर नहीं की जा रही, बल्कि यह सिलिकॉन वैली के वैश्विक तकनीकी एकाधिकारों की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसी कारण, वैश्विक स्तर पर तकनीकी नियंत्रण और नैतिकता को लेकर चिंताएं केवल अकादमिक दायरों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि अब अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्थाएं भी इस तकनीकी निरंकुशता को नियंत्रित करने के विकल्प तलाश रही हैं। सिलिकॉन वैली की कुछ गिने-चुने तकनीकी एकाधिकारों ने वैश्विक विमर्श को इस कदर जकड़ लिया है कि तकनीकी मंचों द्वारा फैलाए जा रहे ध्रुवीकरण और व्यावसायिक अंधाधुंधता से आज वैश्विक संस्थाएं भी चिंतित हैं। यही कारण है कि यूनेस्को द्वारा लगातार 'एथिक्स ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (Ethics of AI) पर वैश्विक नियम जारी किए जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भी अब यह बहस तेज है कि क्या यूरोपीय संघ के 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्ट' (EU AI Act) जैसे कड़े कानूनी मानदंडों और तकनीकी नैतिकता के अंतर्निहित सिद्धांतों के बिना इस बेलगाम तकनीक को इंसानी नियंत्रण के दायरे में वापस लाया जा सकता है? जब तक एआई और एल्गोरिदम के विकास में नैतिक मानदंडों और सामाजिक सुरक्षा को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह तकनीक केवल शक्तिशाली देशों और वैश्विक कंपनियों के हितों को साधने वाला 'डिजिटल रंगभेद' ही बनी रहेगी।

इस वैश्विक विमर्श के आलोक में, भारत जैसे समाज को यह गहराई से समझना होगा कि जो तकनीक ऊपरी तौर पर जितनी आकर्षक और तटस्थ दिखाई देती है, उसके नेपथ्य में उतने ही गहरे व्यावसायिक और वैचारिक हित छिपे होते हैं। तकनीकी निर्भरता के इस दौर में भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश को यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि कोई भी एल्गोरिदम या तकनीक कभी 'न्यूट्रल' या निष्पक्ष नहीं होती। वह हमेशा अपने निर्माता के आर्थिक लाभ और राजनीतिक दृष्टिकोण से संचालित होती है। यदि हमें इंटरनेट को इस 'अदृश्य डिजिटल पिंजरे' और वैचारिक रंगभेद से मुक्त कराना है, तो मात्र भारत के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' (DPDP Act) जैसे विनियामक कानून पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए हमें तकनीकी कंपनियों के बैकएंड कोड्स की सार्वजनिक ऑडिटिंग, स्वदेशी डेटा संप्रभुता और एआई प्रणालियों में सामाजिक न्याय के अंतर्निहित सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक के इस उपभोगवादी और दमनकारी तंत्र के सामने मूक दर्शक या केवल 'उपभोक्ता' बनने के बजाय, एक सचेत, प्रश्नकर्ता और प्रतिरोधी 'डिजिटल नागरिक' की भूमिका का निर्वाह करें।

 अमर उजाला में 25/06/2026 को प्रकाशित लेख 

Friday, June 19, 2026

बिना इंटरनेट वाला बचपन

 

बचपन की यादें खिड़की से आती उस ठंडी हवा की तरह होती हैं, जो तपती गर्मी में भी सुकून दे जाती हैं। आज जब जून के महीने में स्कूल बंद हैं, तो हर तरफ सन्नाटा दिखाई देता है। बच्चे अपने-अपने कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर मोबाइल, टैबलेट या गेमिंग कंसोल पर उंगलियां सरका रहे होते हैं। इस नजारे को देखकर अक्सर मन अतीत के गलियारों में लौट जाता है और दिल में एक ही सवाल उठता है—"यूँ होता तो क्या होता?" अगर आज भी हमारे पास वही पुराना, बिना इंटरनेट वाला बचपन होता, तो आज की पीढ़ी का जीवन कैसा होता?हमारे समय में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही एक अलग ही उत्साह होता था। न हमारे पास स्मार्टफोन थे और न ही सोशल मीडिया। तब हमारी छुट्टियां सिर्फ लूडो, कैरम,व्यापार(खेल ) और कॉमिक्स के सहारे बीत जाती थीं। 'चाचा चौधरी', 'साबू', 'बिल्लू' और 'पिंकी' के पन्नों में जो दुनिया छिपी थी, वह आज के किसी भी थ्री-डी गेम से कहीं ज्यादा चमकीली  थी।
उस समय किसी तरह का कोई 'डिस्ट्रेक्शन' (भटकाव) नहीं था। आज की पीढ़ी को हर पांच मिनट में एक नोटिफिकेशन चाहिए, लेकिन हमें सिर्फ अपनी अगली बारी का इंतजार रहता था।वो अभाव के दिन थे न बाजार न ही घर चीजों से भरे नहीं थे |हर चीज में बचत की आदत हमारे बचपने का अंग रहे |
आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि खुशियों को जीने से ज्यादा, उन्हें दूसरों को दिखाने की होड़ मची है। कहीं घूमने जाना हो, कुछ अच्छा खाना हो या बस घर में बैठकर समय बिताना हो—जब तक उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर 'फिल्टर' लगाकर पोस्ट न कर दी जाए, तब तक वह खुशी अधूरी मानी जाती है। यह लोभ बिलकुल भी नहीं था कि हम सबको बताएं कि हम क्या कर रहे हैं। हमारी खुशियां सार्वजनिक नहीं, बल्कि बेहद निजी हुआ करती थीं। अगर हमने कैरम में कोई बेहतरीन शॉट मारा या लूडो में लगातार तीन छक्के ले आए, तो वह खुशी सिर्फ उस कमरे में बैठे चार दोस्तों या भाई-बहनों के बीच की होती थी। उसे दुनिया भर से 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' बटोरने की जरूरत नहीं थी।
आज की फिल्टर वाली पीढ़ी शायद कभी यह समझ ही न पाए कि एक ऐसी भी दुनिया थी जहां चीजों को जबरदस्ती बेहतर या चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की जाती थी। हमारे समय में जो जैसा होता, हम उसी से दिल लगा लेते थे।
गली में किसी पुराने, खराब टायर को लकड़ी के टुकड़े से मारते हुए मीलों दौड़ाने में जो लुत्फ था, वह आज की महंगी रीमोट-कंट्रोल कार में भी नहीं है। खेलते समय जब लेदर या कॉर्क की गेंद नाली में गिर जाती थी, तो खेल रुकता नहीं था। उसे नाली से निकालकर बस सूखी मिट्टी से रगड़ कर साफ मान लेने का एक अनोखा हुनर हमारे पास था। न कीटाणुओं का डर था और न ही सैनिटाइजर की जरूरत। सब कुछ कितना सादा, स्पष्ट और वास्तविक था।
मेरी मां अक्सर कहा करती हैं कि खुशियां जितनी व्यक्तिगत होती हैं, उतनी ही सुरक्षित रहती हैं; उन्हें सबको बता  देने से नजर लग जाती है। मां के जमाने में इंटरनेट नहीं था, इसलिए वे और उनके दौर के लोग इस बात को गहराई से समझते थे कि असल आनंद दूसरों के दिखावे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ उस पल को महसूस करने में है।
आज की पीढ़ी 'वर्चुअल' (आभासी) दुनिया में इतनी खो चुकी है कि उसे असली रिश्तों की गर्माहट का अहसास ही नहीं है। वे इंस्टाग्राम के फिल्टर्स में चेहरे को तो सुंदर बना लेते हैं, लेकिन बचपन के उस असली, बेफिक्र और धूल-मिट्टी से सने चेहरे की मासूमियत खो चुके हैं।बेशक इंटरनेट ने हमें दुनिया भर की जानकारियां और सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसके बदले में उसने हमसे हमारा वह सादा और सच्चा बचपन छीन लिया। काश, आज का बचपन भी थोड़ा सादा, थोड़ा बिना फिल्टर वाला और थोड़ा और 'व्यक्तिगत' हो पाता!

प्रभात खबर में 19/06/2026 को प्रकाशित लेख

Thursday, June 11, 2026

एआई में बढ़ते निवेश से बदलता परिदृश्य

 

हाल ही में विश्व की बड़ी तकनीकी कंपनियों में से एक ओरेकल कॉर्पोरेशन द्वारा कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी की खबरें सुर्खियों में रही हैं। एक ही दिन में क़रीब 30 हज़ार कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की घटना ने सॉफ़्टवेयर उद्योग के भविष्य को लेकर एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। यह घटना केवल एक कंपनी का निर्णय नहीं, बल्कि उस व्यापक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते प्रभाव के कारण पूरे सॉफ़्टवेयर उद्योग में देखने को मिल रहा है। पिछले तीन दशकों में सॉफ़्टवेयर उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। विशेषकर भारत जैसे देशों ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियों ने न केवल लाखों लोगों को रोजगार दिया है, बल्कि भारत को वैश्विक आईटी हब के रूप में स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई है। इन कंपनियों का प्रमुख बिज़नेस मॉडल ‘सर्विस मॉडल’ रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में इंजीनियर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को सॉफ़्टवेयर सेवाएँ प्रदान करते रहे हैं।

यदि हम अतीत की ओर देखें, तो कंप्यूटर पर काम करने का मतलब होता था अलग-अलग सॉफ़्टवेयर का उपयोग। उदाहरण के लिए, लेखन के लिए माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, डेटा प्रबंधन के लिए एक्सेल, और फोटो संपादन के लिए फोटोशॉप जैसे टूल्स का उपयोग किया जाता था। हर कार्य के लिए अलग टूल और हर टूल को सीखने के लिए समय और कौशल की आवश्यकता होती थी।किन्तु आज यह परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अब उपयोगकर्ता केवल एक साधारण निर्देश यानी प्रॉम्ट देते हैं, जैसे “इस डेटा का विश्लेषण कर दो” या “इस फोटो को बेहतर बना दो” और एआई स्वयं ही पूरा कार्य कर देता है। इस परिवर्तन ने न केवल कार्यप्रणाली को सरल बनाया है, बल्कि पारंपरिक सॉफ़्टवेयर उद्योग की संरचना को भी चुनौती दी है।

एआई के बढ़ते प्रभाव के कारण वैश्विक आईटी बाज़ार में अस्थिरता भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। हाल के महीनों में सॉफ़्टवेयर कंपनियों के शेयरों में भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस और और मैकेंजी ग्लोबल की रिपोर्ट्स के अनुसार, टेक सेक्टर के वैल्यूएशन में तेज गिरावट देखी गई है, जिसका अनुमान 800 अरब डॉलर से 1 ट्रिलियन डॉलर तक लगाया गया है।इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण तब सामने आया जब एआई स्टार्टअप एनथ्रॉपिक ने अपने क्लाउड-आधारित एजेंट्स के लिए एआई प्लगइन्स पेश किए। ये टूल्स कानूनी विश्लेषण, वित्तीय मॉडलिंग, कोडिंग, ग्राहक सेवा और डेटा प्रोसेसिंग जैसे जटिल कार्यों को स्वचालित रूप से करने में सक्षम हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि जिन कार्यों के लिए पहले बड़ी सॉफ़्टवेयर टीमों की आवश्यकता होती थी, वे अब मशीनों द्वारा अधिक तेज़ और कम लागत में किए जा सकते हैं।
यह परिवर्तन केवल सॉफ़्टवेयर उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि रचनात्मक क्षेत्रों जैसे फिल्म और फोटोग्राफी पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है। पहले जहाँ पटकथा लेखन एक पूर्णतः मानवीय और रचनात्मक प्रक्रिया मानी जाती थी, वहीं अब एआई टूल्स की सहायता से कथानक संरचना, संवाद और चरित्र विकास कुछ ही मिनटों में संभव हो गया है। स्टोरीबोर्डिंग और विजुअल प्लानिंग जैसे कार्य, जो पहले विशेष सॉफ़्टवेयर और विशेषज्ञता पर निर्भर थे, अब टेक्स्ट-आधारित इनपुट से ही पूरे किए जा सकते हैं।

पोस्ट-प्रोडक्शन के क्षेत्र में भी सोरा, वियो और लूमा एआई जैसे टूल्स पारंपरिक वीडियो एडिटिंग और वीएफएक्स सॉफ़्टवेयर को चुनौती दे रहे हैं। ये टूल्स न केवल समय की बचत करते हैं, बल्कि रचनात्मक संभावनाओं का भी विस्तार करते हैं।फोटोग्राफी उद्योग में भी यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहाँ ‘कैप्चर’ की पारंपरिक अवधारणा अब ‘क्रिएशन’ में बदल रही है। पहले फोटोग्राफर का मुख्य कार्य सही समय, प्रकाश और फ्रेमिंग के माध्यम से एक क्षण को कैद करना होता था, जिसके बाद एडिटिंग सॉफ़्टवेयर का उपयोग किया जाता था। किन्तु अब एआई इस पूरी प्रक्रिया को एकीकृत कर रहा है। आज स्मार्टफ़ोन और कैमरे एआई की सहायता से स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं कि किस सेटिंग पर इमेज सबसे उपयुक्त होगी। इमेजिन एआई और आफ्टरशूट जैसे टूल्स न केवल फोटो चयन और संपादन को स्वचालित कर रहे हैं, बल्कि जेनरेटिव फिल जैसी तकनीकों के माध्यम से इमेज को पुनर्निर्मित और परिवर्तित भी कर रहे हैं।

तकनीकी इतिहास पर दृष्टि डालें तो सॉफ़्टवेयर उद्योग की उत्पत्ति 1970–80 के दशक की पर्सनल कंप्यूटिंग क्रांति से मानी जाती है, जब कंप्यूटर संस्थानों से निकलकर आम लोगों तक पहुँचना शुरू हुए। इसके बाद 2000 के दशक में इंटरनेट और क्लाउड सेवाओं के विस्तार ने इस उद्योग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। मैकिंज़ी वैश्विक संस्थान की रिपोर्टों में इस परिवर्तन को “डिजिटल रूपांतरण” की लहर के रूप में समझाया है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था में सॉफ़्टवेयर की केंद्रीय भूमिका स्थापित की थी। इस पूरे विकासक्रम में सॉफ़्टवेयर का स्वरूप “इंटरफेस-आधारित” रहा था जिसका मतलब है प्रत्येक कार्य के लिए अलग सॉफ़्टवेयर और उसका विशिष्ट इंटरफेस होता था। किन्तु बड़े भाषाई मॉडल्स के आगमन के साथ यह स्थिति तेजी से बदल रही है। स्टैनफोर्ड मानव-केंद्रित एआई संस्थान की “एआई सूचकांक रिपोर्ट 2024” के अनुसार, संवाद-आधारित इंटरफेस पारंपरिक ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस को चुनौती दे रहे हैं, जहाँ उपयोगकर्ता केवल सामान्य भाषा के माध्यम से जटिल कार्यों को संपन्न कर पा रहे हैं। इस प्रकार “बातचीत” स्वयं एक इंटरफेस का रूप लेती जा रही है।

इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम एआई-संचालित कोड जनरेशन के रूप में सामने आया है। २०२३ में आये गिटहब और माइक्रोसॉफ्ट के संयुक्त अध्ययन  के अनुसार, कोपायलट का उपयोग करने वाले लगभग 55–75% डेवलपर्स ने अधिक उत्पादकता और कम मानसिक थकान की सूचना दी। इससे यह स्पष्ट होता है कि अब बुनियादी कोड लेखन का कार्य धीरे-धीरे एआई द्वारा किया जा रहा है, जबकि मानव डेवलपर्स उच्च-स्तरीय समस्या-समाधान और डिजाइन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, “कोड लिखना” अब एक मुख्य कौशल न रहकर एक सहायक टूल में परिवर्तित हो रहा है। इसी प्रकार विश्व आर्थिक मंच की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट के मुताबिक़ एआई की बढ़ती भूमिका से पुनावृत्ति वाले नौकरी पेशा पर अधिक दबाव बनेगा, बल्कि उच्च स्तरीय विश्लेषणात्मक और रचनात्मक भूमिकाओं की माँग में वृद्धि होगी।

2025 में आई रॉयटर्स समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने एआई और नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग के चलते लगभग 12,000 से अधिक पदों में कटौती का संकेत दिया है।वहीं ओरेकल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन वेब सर्विसेज और गूगल जैसी कंपनियाँ बड़े पैमाने पर एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर रही हैं। गार्टनर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सॉफ़्टवेयर उद्योग अब सॉफ़्टवेयर एज अ सर्विस से एआई एज अ सर्विस मॉडल की ओर बढ़ रहा है। यानी अब कंपनियाँ सॉफ़्टवेयर नहीं, बल्कि “बुद्धिमत्ता” बेच रही हैं। हालांकि यह कहना अप्रासंगिक होगा कि एआई, सॉफ़्टवेयर उद्योग को पूरी तरह से खत्म कर देगा या यूजर्स की निर्भरता सॉफ्टवेयर से बिल्कुल कम कर देगा, सही बात यह है कि लोगों को टिके रहने के लिए को ख़ुद को एआई लिटरेसी और कर्मचारियों प्रॉम्ट इंजीनियरिंग जैसे महत्वपूर्ण कौशल सीखने और बदलती तकनीक के अनुरूप ख़ुद को ढालने की क्षमता सीखनी होगी ।
दैनिक जागरण में 11/06/2026 को प्रकाशित लेख 

Saturday, May 23, 2026

ए आई अवतार और स्मृतियों का कारोबार

 एक दिन आप सोकर  उठे हैं और देखें कि आपके मोबाईल पर अपने किसी ऐसे प्रियजन का वायस नोट या वीडियो नोट उन्हीं के मोबाईल नंबर से आपको मिले  जो अब इस दुनिया में नहीं हैं तो आपको कैसा लगेगा |इंटरनेट आज एक वास्तविकता है लेकिन कल तक किसी ने नहीं सोचा था इंटरनेट मृत्यु के बाद भी हमारे जीवन से जुड़ा रहेगा |पढ़ने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन भारत में मृत व्यक्तियों के एआई अवतार बनाने और 'ग्रीफ टेक'  का बाजार बहुत तेजी से फैल  रहा है |हाल ही में राजस्थान के अजमेर शहर में रहने वाले कपड़ा व्यापारी जयदीप शर्मा के विवाह समारोह के  रिसेप्शन में  स्क्रीन पर जयदीप के स्वर्गीय पिता प्रकट हुए, । उन्होंने न केवल नए जोड़े को शादी की शुभकामनाएं और आशीर्वाद दिया, बल्कि वहां मौजूद मेहमानों से भी बात की ।जयदीप ने स्थानीय टेक-क्रिएटर को खोजा था, जिसने उनके पिता की कुछ पुरानी तस्वीरों, पुराने वॉयस नोट्स और उनके व्यवहार के तौर-तरीकों का अध्ययन करके, एक मिनट का 'एआई डीपफेक अवतार' तैयार किया था। 
वैश्विक स्तर पर 'हियरआफ्टर एआई'और 'स्टोरीफाइल'  जैसी कंपनियां अब बाकायदा इस 'ग्रीफ टेक' (शोक तकनीक) को एक संगठित बिजनेस मॉडल में बदल चुकी हैं। ये कंपनियां किसी व्यक्ति के पुराने चैट्स, वॉयस मैसेज और सोशल मीडिया डेटा के आधार पर उनका डिजिटल भूत या 'घोस्ट बॉट' तैयार कर रही हैं। और भारत भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं|प्रथम दृष्टया यह किसी भावुक परिवार का अपने दिवंगत प्रियजनों के प्रति अगाध प्रेम और तकनीकी चमत्कार लग सकता है|लेकिन जहां भावनाएं तीव्र होती हैं, वहां बाजार सबसे पहले अपनी जड़ें जमाता है।

ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म 'ग्रैंड व्यू रिसर्च' (होराईजन डाटा बुक ) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 'एंड-ऑफ-लाइफ प्लानिंग' और 'डिजिटल लेगेसी सर्विसेज' (जिसमें एआई अवतार और डिजिटल यादें सहेजना शामिल है) का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। साल 2023 में भारतीय बाजार का कुल आकार 1,737.1 मिलियन डॉलर था। रिपोर्ट का अनुमान है कि यह बाजार 7.4% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ते हुए साल 2030 तक 2,820.20  मिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। इस अभूतपूर्व वृद्धि दर के साथ भारत इस क्षेत्र में एशिया-पैसिफिक का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है।ये मामला सिर्फ बाजार का नहीं बल्कि इसके अनेक  मनोवैज्ञानिक और विधिक पहलू भी हैं |जिन पर लोगों का ध्यान काम जा रहा है |
मनोविज्ञान के अनुसार, किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद 'शोक मनाना' एक बेहद जरूरी मानसिक और उपचारात्मक प्रक्रिया है। इंसान पहले रोता है, तड़पता है, इनकार की स्थिति से गुजरता है और अंत में  उस शून्यता और सत्य को स्वीकार कर जीवन में आगे बढ़ता है। लेकिन 'ग्रीफ टेक' इंसान को शोक की पहली अवस्था यानी 'इनकार' में ही हमेशा के लिए अटका कर रख देती है।

जब आपके पास एक ऐसा 'घोस्ट बॉट' या डिजिटल क्लोन हो जो मृत व्यक्ति की तरह ही आपके व्हाट्सएप पर मैसेज कर सके, उसकी हूबहू आवाज में फोन पर बात कर सके या वीडियो कॉल पर दिख सके, तो मानव मस्तिष्क कभी उस मृत्यु को स्वीकार ही नहीं कर पाएगा। यह तकनीक इंसान को एक अंतहीन अवसाद और 'अवास्तविक दुनिया' में धकेल सकती है । भारतीय संस्कृति में मृत्यु को एक महायात्रा माना गया है। जहां 'तर्पण', 'श्राद्ध' और 'अंतिम संस्कार' के जरिए मृत आत्मा को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है और उसकी स्मृतियों को दिल में एक पवित्र धरोहर के रूप में सहेजा जाता है। लेकिन एआई तकनीक मृत व्यक्ति को एक 'इंटरैक्टिव प्रोडक्ट' में बदल रही है, जिसे कुछ रुपये देकर कस्टमाइज किया जा सकता है। यह तकनीक हमें अमरता का एक ऐसा भयावह छलावा दे रही है जो वास्तव में हमारी मानवीय गरिमा को तहस नहस  कर सकती  है भारत का 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' मुख्य रूप से जीवित नागरिकों के डेटा अधिकारों की बात  करता है। लेकिन मृत व्यक्ति के व्यक्तिगत के आंकड़ों का कैसा और कहाँ तक इस्तेमाल हो सकता है ?क्या किसी मृत व्यक्ति के पुराने जीमेल, इंस्टाग्राम पोस्ट और व्हाट्सएप चैट्स को खंगालकर उसकी 'डिजिटल आत्मा' को फिर से बनाने  का अधिकार टेक कंपनियों या उनके  परिवार को होना चाहिए, यह बड़ा  सवाल है|
मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी मृत व्यक्ति के 'डिजिटल अवतार' के निर्माण के लिए उसकी मरणोपरांत सहमति को अनिवार्य बनाता हो या यह स्पष्ट करता हो किन परिस्थितियों में उनका डिजीतल अवतार बनाया जा सकता है । यह स्थिति पहचान की चोरी और ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोलती है। पश्चिमी देशों में 'प्रोजेक्ट दिसंबर' और 'सीयांस एआई' जैसी कंपनियां सस्ते में  चैट लॉग्स के आधार पर मृतकों के टेक्स्ट बॉट बना रही हैं।जो चैट जी पी टी जैसे  मॉडल्स पर चलता है। और बॉट मृत व्यक्ति की स्टाइल में बात करता है।इनका उद्देश्य उद्देश्य शोक में मदद करना है, लेकिन इनसे उपजी चिंताएं ज्यादा  गहरी हैं। कल को अगर ये कंपनियां दिवालिया हो जाएं या इस डेटा को किसी तीसरे पक्ष को बेच दें, तो मृत व्यक्ति की गरिमा और निजता का क्या होगा। 

ए आई बॉट असली व्यक्ति नहीं है। वह कभी गलत, बढ़ा चढ़ा कर  या अपमानजनक जवाब दे सकता है, बॉट को किसी और के द्वारा गलत इस्तेमाल  किया जा सकता है जिसमें मजाक, अश्लील समाग्री , और राजनीतिक दुरुपयोग जैसे मुद्दे हो सकते हैं |वैसे भी   मृत व्यक्ति  खुद को बचा  नहीं सकता। उस की "डिजिटल छवि" को तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। इससे पहले कि यह समस्या गंभीर हो यह नीति नियंताओं की जिम्मेदारी है  कि  केवल कानूनी स्तर पर 'मरणोपरांत भूल जाने के अधिकार'  को कड़ाई से परिभाषित किया जाए, बल्कि एक संवेदनशील समाज के रूप में हम यह भी समझें कि अपनों को खोने का दर्द सहना और उन्हें सम्मान के साथ विदा करना ही इंसान होने की पहली शर्त है। स्मृतियां पुरानी तस्वीरों, संस्मरणों और दिलों में ही अच्छी  लगती हैं न कि कोडिंग के जरिए कृत्रिम रूप से जिंदा किए गए 'डिजिटल भूतों' में ।
अमर उजाला में 23/05/2026 को प्रकाशित 

Tuesday, May 12, 2026

जीवन के संघर्ष का हमराही है गमछा

गर्मियां आ गयी वो भी पूरी शिद्दत से, बात गर्मी की हो तो शरीर को गर्मी से बचाने की पहली जरुरत टोपी होती है लेकिन टोपी एक शहरी अवधारणा ग्रामीण भारत जिस वस्त्र का उपयोग करता है उसे हम गमछे के नाम से जानते हैं . भारत की विविधता में गमछा कई नामों से जाना जाता है। उत्तर भारत में इसे अंगोछाअसम में गमोछाऔर दक्षिण भारत में अंगवस्त्रम कहते हैं। कहीं यह साफी है तो कहीं तुवालु। नाम चाहे जो भी होयह सूती वस्त्र अपनी सुगमता और बहुमुखी उपयोग के कारण हर संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।इसे उदारीकरण का असर कहें या शहरी होने की चाह गमछा तौलिये के मुकाबले शहरों में पिछड़ा सा लगता है.इसे इस तरह से कह सकते हैं  तौलिए और गमछे की तुलना दरअसल दो संस्कृतियों की तुलना है—एक जो दिखावे के भारीपन से दबी हैऔर दूसरी जो सादगी के हल्केपन में उड़ रही है।तौलिया एक ऐसा सामान है जिसे 'रखरखावकी बीमारी है। इसे इस्तेमाल करने के बाद सुखाना एक प्रोजेक्ट है। अगर धूप न मिलेतो यह दो दिन में ही ऐसी गंध छोड़ने लगता है जैसे किसी पुराने पुस्तकालय की सीलन भरी किताबें हों। तौलिया अहंकारी होता हैवह केवल बदन पोंछने का काम करेगावह भी तब जब आप उसे सम्मानपूर्वक स्टैंड पर टांगें। आप तौलिए से अपनी स्कूटी साफ नहीं कर सकतेन ही इसे सिर पर पगड़ी की तरह बांधकर लू से बच सकते.गमछा सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहींबल्कि एक चलता-फिरता स्विस आर्मी नाइफ है। 

इसके उपयोगों की सूची इतनी लंबी है कि इस पर शोध पत्र लिखा जा सकता है।सुरक्षा कवच: चिलचिलाती धूप में यही गमछा हेलमेट के नीचे पसीने का दुश्मन बनता है और चेहरे पर लपेट लिया जाए तो 'डाकूलुक के साथ-साथ लू से भी बचाता है।बाजार गए और थैला भूल गएकोई बात नहीं। गमछे के दो कोनों में गांठ लगाइए और देखिए कैसे यह दो किलो आलू और एक किलो टमाटर का बोझ हंसते-हंसते उठा लेता है.गाँव की पगडंडियों पर जब प्यास लगेतो इसी गमछे की चार परतें पानी छानने के काम आती हैं।किसी पार्क की बेंच गंदी हो या बस की सीट पर धूल होगमछा बिछाइए और 'महाराजाकी तरह विराजमान हो जाइए।आज की दुनिया 'सस्टेनेबिलिटीऔर 'ईको-फ्रेंडलीहोने का ढोंग कर रही हैलेकिन गमछा जन्मजात पर्यावरण प्रेमी है। तौलिए को धोने के लिए आपको बाल्टी भर पानी और ढेर सारे डिटर्जेंट की जरूरत पड़ती हैक्योंकि उसकी घनी बुनाई मैल को पकड़ कर बैठ जाती है। 

इसके विपरीतगमछा 'मिनिमलिस्टहै। आधा बाल्टी पानी और एक बार साबुन की टिकिया उस पर फिरा दी जाएतो वह चमक उठता है।सबसे बड़ी बात इसके सूखने की रफ्तार है। पंखे की हवा में भी यह दस मिनट में सूखकर तैयार हो जाता है। तौलिए की तरह इसे 'ड्रायरकी जरूरत नहीं पड़ती। इसका मतलब है—कम पानीकम बिजली और कम प्रदूषण। जब गमछा पुराना हो जाता हैतब भी वह हार नहीं मानता। वह 'पोछेके रूप में पदोन्नत होकर घर की सफाई करता है और अंत में मिट्टी में मिलकर विलीन हो जाता है। यह 'जीरो वेस्टजीवनशैली का असली ब्रांड एंबेसडर है।वहीं तौलिया आपको आलसी बनाता है। नहाने के बाद भारी तौलिए में लिपटे रहना एक सामंती सुख दे सकता हैलेकिन गमछा आपको फुर्ती देता है। गमछा कंधे पर होतो इंसान काम करने के लिए तैयार रहता है। यह श्रम की पहचान है। एक तरफ तौलिया है जो फाइव स्टार होटलों के सफेद कमरों में शोभा बढ़ाता हैऔर दूसरी तरफ गमछा है जो खेत की मेड़ से लेकर ऑफिस की कुर्सी तक हर जगह अपनी जगह बना लेता है।

अंत मेंयदि हम उपयोगितापर्यावरण और बहुमुखी प्रतिभा के तराजू पर तौलिए और गमछे को तौलेंतो गमछे का पलड़ा हमेशा भारी रहेगा। तौलिया एक जरूरत हो सकती हैलेकिन गमछा एक संस्कार है। यह हमें बताता है कि जीवन की जटिलताओं को सुलझाने के लिए किसी भारी-भरकम समाधान की नहींबल्कि एक हल्के और लचीले व्यवहार की जरूरत है।इसलिएअगली बार जब आप किसी मॉल में महंगे आयातित तौलिए को देखेंतो मुस्कुराइए और अपने कंधे पर रखे उस दो मीटर के सूती जादू को सहलाइएजो न केवल आपका बदन सुखाता हैबल्कि आपकी संस्कृति को भी जिंदा रखता है। तौलिया सिर्फ नहाने के बाद का साथी हैपर गमछा जीवन के हर संघर्ष का हमराही है।

 प्रभात खबर में 12/05/2026 को प्रकाशित लेख 

 


Saturday, May 2, 2026

ओ टी टी ने बदल दी डबिंग की दुनिया

 एक समय था जब डबिंग का मतलब केवल संवादों के शब्दशः अनुवाद से था। विदेशी फिल्मों या धारावाहिकों के संवाद हिंदी में बदले जाते थेपर उनमें भावसंदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अक्सर खो जाते थे। भाषा तो बदल जाती थीलेकिन पात्रों की आत्मासामाजिक संकेत और स्थानीय संवेदनाएँ अनुवाद की प्रक्रिया में फीकी पड़ जाती थीं। आज की डबिंग इस सीमित दृष्टि से बाहर निकल चुकी है। अब यह केवल भाषा परिवर्तन नहींबल्कि स्थानीयकरण और रचनात्मक पुनर्लेखन यानी ट्रांसक्रिएशन का माध्यम बन चुकी है। इस प्रक्रिया में केवल शब्द बदलना नहीं होताबल्कि भाव-रूप में री-क्रिएशन किया जाता है। उदहारण के तौर परयदि किसी अमेरिकन टीवी शो में कोई स्थानीय अंग्रेज़ी मुहावरा या चुटकुला है जिसे सीधे हिंदी में समझाया नहीं जा सकतातो उसे भारतीय संदर्भ में समतुल्य हंसी-मज़ाक या कहावत से बदला जाता हैताकि संस्कृति का रंग बना रहे। इसी प्रयास से आज के हिंदी डायलॉग में हिन्दी के लोक-गीतकहावतेंआलंकारिक भाषा और क्षेत्रीय हास्य तत्व शामिल किए जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक डबिंग अब केवल अनुवाद नहींबल्कि एक रचनात्मक स्थानिक अनुकूलन बन चुकी है।ऐसा नहीं है कि ओटीटी पर डबिंग केवल विदेशी कंटेंट को भारत में लोकप्रिय बना रही हैबल्कि यह भारतीय कंटेंट को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। सेक्रेड गेम्स ने ओटीटी पर भारतीय कंटेंट की वैश्विक यात्रा की शुरुआत कीजहाँ अंग्रेज़ीस्पैनिश और कोरियन जैसी भाषाओं में डब होकर इसने भारत की राजनीतिअपराध और सत्ता के जटिल यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में स्वीकृति मिली। इसके बाद दिल्ली क्राइम को मिला इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय सामाजिक यथार्थ वैश्विक दर्शकों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं आरआरआर ने विभिन्न भाषाओं में डब होकर ओटीटी के ज़रिए यह साबित कर दिया कि भाषा नहींबल्कि भावनात्मक भव्यता और कथा की ऊर्जा भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर पहुँचाने की असली ताकत है।

आज का युवा कोरियन ड्रामास्पेनिश थ्रिलर और हॉलीवुड सुपरहीरो फिल्में भारतीय घरों में उतनी ही सहजता से देखी जा रही हैं जितनी कभी हिंदी धारावाहिक देखे जाते थे। इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहींबल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी हैजिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबीमहंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फिल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फिल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारोंनिर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैंजिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा हैजिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

 

भारत जैसे विशाल और भाषाई रूप से विविध मनोरंजन बाज़ार में क्षेत्रीय भाषाओं की बढ़ती माँग ने इस उद्योग की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब कंटेंट किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया। उदाहरण के तौर परसाल 2024 में नेटफ्लिक्स ने अपने कंटेंट को दुनिया भर में 34 से अधिक भाषाओं में डब कियाजिनमें भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही। 2025 में डिज़्नी हॉटस्टार और जियोसिनेमा के विलय के बाद बने ओटीटी प्लेटफॉर्म जिओ हॉटस्टार ने भी बहुभाषी रणनीति को अपनी विस्तार नीति का केंद्र बनाया। जो क्रिकेट जैसे बड़े लाइव इवेंट्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों और वेब सीरीज़ तककंटेंट को हिंदी के साथ कई क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध करा रहा है।

भारत का ओटीटी बाजार पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। पीडब्लूसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में भारत का ओटीटी बाजार ने जहाँ 17 हजार करोड़ का आंकड़ा पार किया था वहीं 2028 में यह लगभग दोगुना होकर करीब 35 हजार करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस वृद्धि के पीछे सस्ते डेटा पैक्सबढ़ती इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्थानीय भाषाओं में कंटेंट का उपलब्ध होना प्रमुख कारण हैं। ऑर्मैक्स द्वारा प्रकाशित आईबीईएफ रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में भारत में ओटीटी उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 60 करोड़ पहुँच गई है जिनमें 14 करोड़ से अधिक पेड़ सब्सक्रिप्शन भी शामिल हैं। वहीं संस्था 6डब्लूरिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का डबिंग बाजार भी ओटीटी की गति से विस्तार कर रहा है, 2025-31 तक भारत का डबिंग बाजार 10 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ने का अनुमान है। भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियोंभाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।

वहीं ओटीटी और बहुभाषी रिलीज की बढ़ती माँग का सबसे प्रत्यक्ष लाभ डबिंग आर्टिस्ट्स को मिला है। ग्लोबल ग्रोथ इंसाइट की फिल्म डबिंग मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में डबिंग का वैश्विक बाजार करीब 4 बिलियन डॉलर पहुँच गया है जो साल 2033 तक 7 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत में भी पोस्टप्रोडक्शन और डबिंग सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही हैजिसके कारण डबिंग आर्टिस्ट्स के लिए अवसर और पारिश्रमिक दोनों में वृद्धि हुई है। इस बदलाव ने उन्हें न केवल स्थिर रोजगार और बेहतर पैकेज दिया हैबल्कि उनके पेशेवर सम्मान और प्रसिद्धि में भी बढ़ोतरी की है।

 
ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषासीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहींबल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदानप्रदान का भी युग हैजहाँ एक ओर युवा कोरियनस्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैंवहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं। आज का मनोरंजन केवल देखने का माध्यम नहींबल्कि एक वैश्विक संवादसांस्कृतिक पुल और रचनात्मक साझा अनुभव का प्रतीक बन चुका है। यही ओटीटी और डबिंग की असली ताकत और भविष्य की संभावनाएं हैं।

 दैनिक जागरण में 02/05/2026 को प्रकाशित 

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