Sunday, December 16, 2012

सूचना प्रौद्योगिकी की सियासत

सूचना प्रौद्योगिकी ने भले ही पूरी धरती को एक गाँव बना दिया हो और हम सूचना समाज की ओर बढ़ चले हों पर भारत के गाँव बदलाव की इस बयार का सुख नहीं ले पाए हैं| वैसे तो देश में सूचना क्रांति के विकास के आंकड़े हौसला बढ़ाते हैं| मैककिन्सी ऐंड कंपनी द्वारा किया गया एक अध्ययन बताता है कि 2015 तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद तिगुनी होकर पैंतीस करोड़ से भी ज्यादा हो जाएगी पर तस्वीर का एक हिस्सा उतना चमकदार नहीं है हमारी करीब साठ प्रतिशत आबादी अब भी शहरों से बाहर रहती है। सिर्फ आठ प्रतिशत भारतीय घरों में कंप्यूटर हैं|इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक भारत की ग्रामीण जनसंख्या का दो प्रतिशत ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है। यह आंकड़ा इस हिसाब से बहुत कम है क्योंकि इस वक्त ग्रामीण इलाकों के कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से अट्ठारह  प्रतिशत को इसके इस्तेमाल के लिए दस किलोमीटर से ज्यादा का सफर करना पड़ता है।तकनीक के इस डिजीटल युग में हम अभी भी रोटी कपडा और मकान जैसी  मूलभूत समस्याओं के उन्मूलन में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं |खाद्य सुरक्षा बिल पास होने के इंतज़ार में है | अमरीका के अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति और शोध संस्थान और कन्सर्न वर्ल्डवाइड ने 79 देशों को लेकर एक  विश्व भुखमरी सूचकांक तैयार किया है जिसमें भारत को 65वें स्थान पर रखा गया है|भुखमरी से निपटने के मामले में भारत चीन ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और श्रीलंका से पीछे है| संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ की नई रिपोर्ट यह बताती है कि साल 2011 में दुनिया के अन्य देशों की मुकाबले भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें हुईं। गौरतलब है कि सूचना तकनीकी का इस्तेमाल मानव संसाधन की बेहतरी के लिए बहुत बड़ा प्रभाव छोड़ने में असफल रही है माना जाता रहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाएगा और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगा पर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की नयी रिपोर्ट हमारी आँखें खोल देती है जिसमे भारत को 176 देशों में भ्रष्टाचार के मामले में 94 पायदान पर रखा गया है|सूचना क्रांति का शहर केंद्रित विकास देश के सामाजिक आर्थिक ढांचे में डिजीटल डिवाईड को बढ़ावा दे रहा है| प्रख्यात जोखिम विश्लेषण फर्म मेपलक्राफ्ट  द्वारा जारी डिजिटल समावेशन सूचकांक में ब्रिक देशों के समूह में मात्र भारत को अत्यधिक जोखिम वाले देश  के रूप में वर्गीकृत किया गया है जिसका मतलब है कि आर्थिक विकास के बावजूद अभी भी देश की आबादी का बड़ा हिस्सा डिजीटल समावेशन से दूर है हालांकि बाजार का विस्तार हुआ है लेकिन आईसीटी के उपयोग का  असमान वितरण चिंता का बड़ा कारण है|
उदहारण के रूप में भारत की अमीर जनसँख्या का बड़ा तबका शहरों में रहता है जो सूचना प्रौद्योगिकी का ज्यादा इस्तेमाल करता है|उदारीकरण के पश्चात देश में एक नए मध्यम वर्ग का विकास हुआ जिसने उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को प्रेरित किया जिसका परिणाम सूचना प्रौद्योगिकी में इस वर्ग के हावी हो जाने के रूप में भी सामने आया देश की शेष सत्तर प्रतिशत जनसँख्या न तो इस प्रक्रिया का लाभ उठा पा रही है और न ही सहभागिता कर पा रही है|आश्चर्यजनक रूप से इसके पीछे भी बाजार का अर्थशास्त्र जिम्मेदार है न कि तकनीक का अभाव,सूचना प्रौद्योगिकी कोई लोककल्याणकारी नीति पर नहीं बल्कि मुनाफे के अर्थशात्र पर निजी कंपनियों के हाथों में हैं जिनका जोर फायदे को अधिकतम करना है, जाहिर तौर पर इसी लिए इंटरनेट सेवाओं का विस्तार शहरों और उनके इर्द गिर्द के कस्बों में ज्यादा हो रहा है|सामन्यत:एक ग्रामीण इलाके के निवासी की खरीद क्षमता शहरी निवासी से कम होती है इसीलिये बैंडविड्थ और कनेक्टीविटी की समस्या ग्रामीण इलाकों में ज्यादा है| नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्षपिछले दस वर्ष  में ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 0.4 प्रतिशत परिवारों को ही घर में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध थी।सूचना प्रौद्योगिकी के आने से यह उम्मीद जगी थी कि शहरों और गावों के बीच का अंतर घटेगा और गाँव बिना शहर हुए विकास की धारा का हिस्सा बनेंगे पर व्यवहार में यह डिजीटल डिवाईड उसी आर्थिक सुधार की प्रतिकृति हैं जिसमे अमीर और गरीब में फासला बढ़ रहा है| सूचना प्रौद्योगिकी  मानव समस्याओ का समाधान करने मे मदद करनेवाली मशीनो और प्रक्रिया का विकास प्रयोग है पर यदि इस तकनीक का वितरण असमान होगा तो यह समस्याएं कम करने की बजाय बढाएंगी|भारत जैसे विकास शील देश के ग्रामीण इलाकों में यह तकनीक जितनी जल्दी सर्व सुलभ होगी देश के विकसित राष्ट्र में बदलने का सपना उतनी जल्दी हकीकत बनेगा |
अमर उजाला में 16/12/12 को प्रकाशित 

Tuesday, December 11, 2012

वेब मीडिया बदल रहा है उपभोक्ताओं का मिजाज

इंटरनेट की शुरुआत से ही कन्वर्जेंस की संभावनाओं के असीमित विकल्प खुल गए थे, पर तकनीकी और कंटेंट के स्तर पर यह बदलाव हमारी मीडिया हैबिट पर किस तरह से असर करेगा, इसे लेकर आशंकाएं थीं। भारत जैसे देश में इस बारे में सभी मान रहे थे कि यह परिवर्तन बहुत समय लेगा और तब तक प्रचलित जन-संचार माध्यम अपनी धाक जमाए रखेंगे। सूचनाएं और समाचार पाने का सबसे तेज माध्यम अभी तक टेलीविजन ही था, पर अब यह तस्वीर बदलने लगी है और टेलीविजन को कड़ी टक्कर दे रहा है वेब मीडिया, यानी एक ऐसा माध्यम, जिसका प्रयोग इंटरनेट द्वारा किया जाता है।भारत जैसे देश में अभी इंटरनेट की ब्रॉड बैंड सुविधाओं का व्यापक विस्तार होना बाकी है, लेकिन अब इंटरनेट की सुविधा से लैस मोबाइल फोन मीडिया हैबिट के परिदृश्य पर बड़ा असर डाल रहे हैं। भारत में इस बदलाव की वाहक कामकाजी युवा पीढ़ी है, जो तकनीक पर ज्यादा निर्भर है और परंपरागत रूप से मीडिया उपभोग के समय का भी अधिकतम लाभ लेना चाहती है, यानी खबर पढ़ते-देखते समय भी अपने काम पर रहा जाए। एसी नील्सन के वैश्विक मीडिया खपत सूचकांक 2012 से पता चलता है कि एशिया (जापान को छोड़कर) और ब्रिक देशों में इंटरनेट मोबाइल फोन पर टीवी व वीडियो देखने की आदत पश्चिमी देशों व यूरोप के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है, यानी वेब मीडिया परंपरागत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बहुत तेजी से चुनौती दे रहा है।यही वजह है कि हर इलेक्ट्रॉनिक टीवी चैनल अब अपनी वेबसाइट पर ज्यादा ध्यान देने लगा है, जिसमें लाइव स्ट्रीमिंग के साथ खबरों का विश्लेषण और पुराने वीडियो भी उपलब्ध रहते हैं। बहरहाल, बदलाव का यह असर बहुआयामी है। समाचारपत्र और एफ एम रेडियो चैनल भी अपनी साइबर उपस्थिति पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। बीबीसी  व डायचे वेले जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रसारक अपने वेब पोर्टल पर खासा जोर दे रहे हैं। वहां दृश्य-श्रव्य सामग्री के अलावा गंभीर विश्लेषण हैं, वहीं समाचारपत्र ई-पेपर के अलावा अपनी वेबसाइट को लगातार अपडेट रख रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मीडिया उपभोग के मामले में टेलीविजन अब भी नंबर एक है, पर लोगों के इंटरनेट पर समय बिताने के मामले में बहुत तेजी से इजाफा हो रहा है, जिससे विज्ञापनदाताओं का झुकाव भी वेब की तरफ हो रहा है। निवेश पर सर्वाधिक लाभ एशिया-प्रशांत क्षेत्रों में डिजीटल मार्केटिंग चैनलों द्वारा हो रहा है, ऐसा इस रिपोर्ट का मानना है।
भारत के संदर्भ में यह बदलाव ज्यादा तेजी से होगा, क्योंकि मैकेंजी ऐंड कंपनी द्वारा किया गया एक अध्ययन बताता है कि 2015 तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद 35 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी, जिनके हाथों में एक ऐसी तकनीक होगी, जिससे उनकी परंपरागत टीवी पर निर्भरता कम होगी और इसमें बड़ी भूमिका स्मार्ट फोन निभाने वाले हैं।
हिन्दुस्तान में 11/12/12 को प्रकाशित 

Monday, November 19, 2012

अपनी अपनी रेखाएं


जिंदगी का त्यौहार,वैसे त्यौहार कोई भी हों वो जब आते हैं तो लगता है कि वो जाएँ ही ना छुटियाँ मस्ती,खाना पीना और भी बहुत कुछ आप भी सोच रहे होंगे कि मैं कौन अनोखी बात बता रहा हूँ.त्योहारों का आना जितना सच है उतना ही उनका जाना भी सच है. इन त्योहारों के मौसम में घर की सफाई में एक पुरानी किताब मिली जानते हैं उसका विषय था ज्योमेट्री जी हाँ रेखा गणित और क्या कुछ आँखों के आगे घूम गया वो स्कूल के दिन वो एल एच एस इस ईक्युल टू आर एच एस और इतिसिद्धम. तब लगता था हम ये सब क्यूँ पढते हैं वैसे भी गणित मुझे बहुत बोर करती थी. जिंदगी तो आगे बढ़ चली पर अब समझ आ रहा है जीवन में रेखा का क्या महत्व हैक्योंकि इसी पर जिंदगी का गणित टिका हुआ है.अब बात आपके सर के ऊपर से जा रही है चलिए मैं आपको समझाता हूँ रेखा मतलब लाइन, लिमिट ,सीमा या फिर कुछ आड़ी तिरछी सीधी पंक्ति वैसे इनका कोई मतलब नहीं है पर इन्हें सिलसिलेवार लगा दिया जाए तो किसी के घर का नक्शा बन जाता है तो कोई कुछ ऐसा जान जाता है जिसे कल तक कोई नहीं जानता था.रेखा ही है वो टूल है जिससे आप अपने सपनों को वास्तविकता का जामा पहना सकते हैं पर ये ध्यान रहे कि उस रेखा का डायरेक्शन किस तरफ है क्योंकि वो चाहे गणित का सवाल हो या जिंदगी की उलझन काफी कुछ आपके दिमाग के डायरेक्शन पर निर्भर करता है.
विषय कोई भी हो चाहे इतिहास, भूगोल गणित या फिर साहित्य बगैर रेखाओं के इनका कोई अस्तित्व नहीं है अब देखिये ना लिपि या स्क्रिप्ट भी तो कुछ रेखाओं का कॉम्बिनेशन है यानि दुनिया को समझने के लिए हमें रेखाओं की जरुरत है इतिहास में समयरेखा है तो भूगोल में अक्षांश और भूमध्य जैसी रेखाएं. कॉपियों में लिखने का अभ्यास पहले लाईनदार पन्नों से होता है बाद में जब हम अभ्यस्त हो जाते हैं तो उनकी जगह सफ़ेद पन्ने ले लेते है और तब हम कितनी भी जल्दी क्यूँ ना लिखें शब्द अपनी जगह से नहीं भागते वे उसी तरह लिखें जाते हैं जैसे हम लाईनदार कॉपियों में लिखते हैं.क्यूँ कुछ तस्वीर साफ़ हो रही है.जीवन में इन रेखाओं का कितना बड़ा दायरा है वो जीवन की रेखा से लेकर गरीबी रेखा तक देखा और समझा जा सकता है. लगता है बात थोड़ी भारी हो रही है और यांगिस्तानियों के पास भारी बात सुनने का वक्त नहीं है तो हम इसे थोडा आसान करते हैं. यानि लाईफ में स्वछंदता और उन्मुक्तता मौज मस्ती अच्छी है पर उसकी एक सीमा होनी चाहिए और इस रेखा को हमें ही खींचना चाहिए फेस्टिवल हमें जश्न मनाने का जहाँ  मौका देते हैं वहीं ये भी बताते हैं कि जीवन महज मौजमस्ती का नाम नहीं बल्कि समाज में हमारा पोजीटिव कंट्रीब्यूशन भी  है.महत्वपूर्ण है कि ये बात कोई दूसरा हमें ना बताये क्योंकि सेल्फ रेग्युलेशन,सेल्फ से आता है और यही सेल्फ रेग्युलेशन जो हमें अनुशासित करता है.जब हम दूसरे की सीमाओं का सम्मान करेंगे तो लोग खुद ब खुद हमें अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ देंगे पर हम ये सोचें कि हम सबके बारे में कुछ भी गॉसिप कर सकते हैं पर कोई हमारे बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा ऐसा होना मुश्किल है. सफल होने की कोई सीमा नहीं है पर ख्वाब अगर हकीकत के आइने में देखें जाएँ तो उनके सफल होने की गुंजाईश ज्यादा होती है मतलब अपनी सीमाओं को जानकर उसके हिसाब से जब योजनाएं बनाई जाती हैं तो वो निश्चित रूप से सफल होती हैं. तो मुझे तो अपनी सीमाओं  का अंदाजा है और अपनी जीवन रेखा को इसी तरह बना रहा हूँ कि मेरी जिंदगी के कुछ मायने निकले पर आप क्या कर रहे हैं जरुर बताइयेगा.
आई नेक्स्ट में 19/11/12 को प्रकाशित 

Saturday, October 27, 2012

सवाल सिर्फ हिरासत में मौत का नहीं


पुलिस किसी भी संवैधानिक तंत्र का वह अहम हिस्सा है जो देश की आंतरिक  नागरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार है |सूचना क्रांति के इस युग ने लोगों को जवाबदेही के प्रति जागरूक किया है और राज्यों की पुलिस भी इससे अछूती नहीं है |मित्र पुलिस, आपके साथ सदैव जैसे नारे हमें मुंह चिढाते लगते हैं,आंकड़े एक त्रासदी की तस्वीर पेश करते हैं |एशियाई मानवाधिकार केन्द्र नई दिल्ली द्वारा तैयार रिपोर्ट के मुताबिक, देश  में पिछले एक दशक से ज्यादा समय में कम से कम 14,231 लोग हिरासत में मारे गए,जिसका मतलब है प्रति दिन औसत रूप में चार व्यक्ति से ज्यादा पुलिस हिरासत में मरे ये आंकड़े जेल में हुई मौतों से अलग हैं | इस  अध्ययन का आधार भारत सरकार के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा दिए गए आंकड़ों पर आधारित है। पुलिस हिरासत में हुई मौत  गंभीर सवाल खड़े करती है रिपोर्ट के मुताबिक इन मौतों  का बड़ा कारण हिरासत में दी गयी  प्रताडना है जिससे पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हिरासत में आने के 48 घंटे के अंदर हो गयी | उल्लेखनीय है कि हिरासत में मौत उन राज्यों में ज्यादा हुई  है जहाँ आम तौर पर शांति है और किसी आंतरिक संघर्ष का इतिहास नहीं है | महाराष्ट्र में पिछले दशक में पुलिस हिरासत में सबसे ज्यादा 250 लोगों की मौत हुई।पुलिस की कार्यप्रणाली हमेशा पर अक्सर सवालिया निशान लगते रहे हैं|पुलिस को लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति सजग और आम लोगों का भरोसा जीतेने वाला होना चाहिए| देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एक लाख जनसंख्या पर मात्र 74 पुलिसकर्मी हैं जबकि बिहार में इतनी ही आबादी पर सिर्फ 63 पुलिस वाले हैं। देश में एक लाख की  आबादी पर स्वीकृत पुलिस कर्मियों की संख्या का राष्ट्रीय औसत 177.67 है लेकिन वास्तव में 134.28 पुलिस कर्मी ही तैनात है। संयुक्त राष्ट्र संघ के  मानक  के अनुसार एक लाख पर कम से कम 220 पुलिस कर्मी होने चाहिए।इस मामले में पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों में पुलिस जनता अनुपात सर्वाधिक है। मिजोरम में प्रति एक लाख पर 1084.99, नागालैंड में 1034.68, त्रिपुरा में 936.69, सिक्किम में 602.68 और अरुणाचल प्रदेश में 568.82 पुलिस कर्मी हैं। देश की राजधानी दिल्ली में  प्रति एक लाख पर 390.55 पुलिस कर्मी हैं जबकि इनकी स्वीकृत संख्या 431.29 है।
देश में पुलिस सुधार के लिए बनी कमेटियों का एक लंबा इतिहास रहा है| व्यवहार में कुछ भी होता न देख सुप्रीम कोर्ट ने पांच साल पहले राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में सुधार  के लिए व्यापक  सुझाव दिए थे,जिसमें 'पुलिस स्थापना बोर्ड' का गठन, पुलिस उत्पीड़न की सुनवाई के लिए राज्यों व जिला स्तर पर 'पुलिस शिकायत प्राधिकरण' गठित करना और सबसे महत्वपूर्ण अपराध की विवेचना और कानून एवं व्यवस्था का काम अलग अलग  करना भी शामिल था |जिससे पुलिस व्यवस्था पर पड़ रहे काम के बोझ को कम किया जा सके पर राज्यों की राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी के अभाव में यथा स्थिति जारी है और पुलिस व्यवस्था सत्ताधारी राजनैतिक दल की हितपूर्ति का साधन मात्र बनी हुई है |लोगों को अभी भी सही मायनों में मित्र पुलिस का  इन्तजार है | 
हिन्दुस्तान में 27/10/12 को प्रकाशित 

Monday, October 15, 2012

बच्चों के गोद लेने का गुणा भाग

आप लोगों ने सड़कों पर अक्सर ऐसे बच्चों को भीख मांगते ,सड़कों पर घूमते ऐसे न जाने कितने अबोध बच्चों को देखा होगा और उनके लिए कुछ करने की कसक भी मन में जगी होगी फिर दुनियादारी और नियम कानून के कठोर धरातल ने उस कसक को अचानक समाप्त कर दिया होगा |बच्चा गोद लेना या किसी बच्चे को अपनाना भारत में अभी भी सामान्य व्यवहार का हिस्सा नहीं बन पाया है और शायद इसीलिये बच्चों को अवैध रूप से गोद लेने का चलन भी बढ़ा है और बच्चों की तस्करी भी जिनकी पुष्टि बचपन बचाओ संस्था के शोध द्वारा जुटाये गए वह  आंकड़े करते हैं जिनके अनुसार वर्ष 2008 से 2010 के मध्य117480 बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ कराई गयी| इनमें से 74209 बच्चों को तो ढूंढ लिया गया पर 41546 का आज तक कोई सुराग नहीं लग सका है|सामान्य तौर पर एक  बच्चे को गोद लेना एक नए सम्बन्ध  की शुरुआत कही जा सकती है। यह एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है जिसमें एक दम्पति या एकल अभिभावक को एक बच्चाउनके बेटे या बेटी के रूप मेंहमेशा के लिए सौंप दिया जाता है। एकल पुरुष अभिभावक  को गोद के रूप में बेटी दिए जाने का प्रावधान नहीं है।याद रखें! जब आप किसी बच्चे को गोद लेते हैं तो आप इस बात को अच्छी तरह और दिल से मानते हैं कि उसे अपने बेटे/बेटी जैसा प्यार देंगे और अब उसकी अच्छी तरह से परवरिश एवं अच्छी शिक्षा की सारी जिम्मेदारी आप की है जिसे आप ख़ुशी-ख़ुशी निभाएंगे। गोद लेने की प्रक्रिया उस वक़्त से शुरू होती है जब बच्चे की जैविक माता या माता-पिता बच्चे का पालन-पोषण कर पाने में खुद को असमर्थ पातें हैं या किसी मजबूरी वश बच्चे को अपने पास  नहीं रख पाते। ऐसा बच्चे के जन्म के पहले भी हो सकता है और बच्चे के जन्म के बाद भी ।
पिछले साल भारत सरकार ने भारत में बच्चा गोद लेने का शुल्क बीस हजार रुपैये दुगुना से बढाकर कर चालीस हजार रुपैये कर दिया सेन्ट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथोरिटी के मुताबिक भारतीय गणराज्य तो गोद लेने के लिए कोई शुल्क नहीं लेता  पर चिल्ड्रन केयर फंड के लिये कुछ राशि सहयोग के रूप में ली जाती है|आंकड़ों की अगर बात करें तो पिछले पांच सालों में बच्चा गोद लेने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हुआ है| सेन्ट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथोरिटी के अनुसार 2006 में जहाँ कुल 3262 बच्चे गोद लिए गए वहीं ये संख्या साल 2011 आते आते यह आंकड़ा 6494 हो गया था इन आंकड़ों में देश के भीतर और विदेश में गोद लिए बच्चे शामिल हैं इन आंकड़ों के आगे भी कुछ तथ्य हैं जो वास्तविक हैं बस फर्क यह है कि आंकड़ों में भाव नहीं होते संवेदनाएं नहीं होतीं वे कोरे आंकड़े होते हैं पर गोद लेकर किसी बच्चे का अभिभावक बनना सीधे सीधे मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा मामला है|गोद लेने का शुल्क दुगुना कर देना यह बताता है कि संवेदनाएं भी मुफ्त में नहीं मिलती और इस शुल्क वृद्धि के निहितार्थ पर जरुर कुछ सवाल खड़े होते हैं|
संतति सुख अपने आप में पूर्ण शब्द है जिसको मुद्रा और माल बना कर बाजारतंत्र के हवाले कर देने का परिणाम निम्न  व मध्यम वर्ग के परिवारों की  संवेदनाओं पर आर्थिक रूप से उच्च वर्ग का हक होगा|  पूंजी के आधार पर वर्गीकरण के इस समय में हमारे मानवीय सूत्र लगातार परिजीवता  की  तरफ बढ़ रहें हैंहमारे स्व के अस्तित्व पर इन निर्णयों के जरिये बार बार हस्तक्षेप किया जा रहा है. नब्बे के दशक के बाद आये कथित बाजारवादी भूमंडलीकरण ने व्यक्ति के जीवन के हर पहलू को कहीं ना कहीं स्पर्श जरुर किया हैहम आँखे बंद कर कितना भी अनजान बनने कि कोशिश कर लें ऐसे निर्णय हमें आंखे खोलने ना सही पर आँखें मिचमिचाने को मजबूर जरुर करते हैंसमाज में उपभोक्तावादी  सरकारी निर्णयों में ‘’सहयोगराशि’’ शब्द का प्रयोग अध्ययन का विषय हो सकता है| इसमें कोई शक नहीं कि अनाथालय में गए बच्चों को एक बेहतर जीवन मिलना चाहिए और गोद देने पूर्व उनके भावी अभिभावकों की आर्थिक स्थिति का अच्छा होना उनके बेहतर भविष्य का संकेत हो सकता है पर आर्थिक  स्थिति बेहतर होने से यदि बच्चों का भविष्य सुधर रहा होता तो ये देश कब का बदल गया होता देश बनता है नागरिकों से जो संस्कारवान हों जिनको जीवन मूल्यों का ज्ञान हो पर मूल्य और संस्कार जैसे शब्द खरीदे बेचे नहीं जाते इनको जीना सीखाया जाता है |सिक्के का दूसरा पहलु यह भी है कि दुनिया की उभरती हुई आर्थिक शक्ति में ये बच्चे कहाँ से आ जाते हैं जिन्हें गोद लेने की जरुरत पड़ती है क्यों इनके माता पिता इनको त्याग देते हैं ? इन  बच्चों के लिए हमारा सामजिक आर्थिक ढांचा जिम्मेदार है गरीबी, अशिक्षा लिंग विशेष के प्रति पूर्वाग्रही रवैया और ज्यादा बच्चे एक ऐसा दुष्चक्र रचते हैं कि कुछ लोगों के लिए बच्चे बोझ हो जाते हैं|हमारा समाज भी इन ठुकराए हुए बच्चों के प्रति कोई खास संवेदनशील भूमिका नहीं निभाता ऐसे में इन बच्चों का एकमात्र ठिकाना अनाथालय ही होता भले ही सरकार ये दावा करे कि ये शुल्क वृद्धि बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया को सरल करेगी और बच्चों को एक बेहतर भविष्य मिलेगा पर तथ्य यह है कि भारत में किसी नवजात को गोद लेने में कम से कम चार से पांच माह का समय लग जाता है|हम सोंचना होगा कि क्या जीवन के अस्तित्व का एक मात्र आधार अर्थ ही है ? या अर्थ ही ऐसा घटक है जिससे हम संवेदनाओं का मूल्यांकन करें संतति सुख सार्वभौमिक है |शुल्क वृद्धि का ये फैसला न्याय संगत नहीं है इससे बच्चा गोद लेने वाले मध्य आय वर्ग के लोग हतोत्साहित होंगे|इस शुल्क वृद्धि का इस्तेमाल अगर गोद लेने वाले बच्चे पर ही किया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा इस शुल्क का एक हिस्सा ब्याज के साथ उन अभिभावकों को तब मिले जब बच्चा अट्ठारह साल की उम्र पूरी कर ले|इससे मध्य आयवर्ग के लोग भी बच्चा गोद लेने के लिए उत्साहित होंगे पर मध्य वर्ग की चिंता किसे है क्योंकि ये सारी व्यवस्था कुछ साधन संपन्न लोगों के लिए ही है|सरकार वैसे भी अपने निर्णयों से ये जाहिर कर चुकी है कि भारत का मध्यवर्ग आर्थिक रूप से संपन्न है जोमंहगा पानी खरीद कर पीता है, मंहगी आइसक्रीम खाता है,मगर गेहूं या चावल महंगा नहीं खरीदना चाहताहै |मानव संतति का अंगीकरण(गोद लेना ) किसी कोरे कागज को अपनाने जैसा है जो हमें बिना किसी लिखावट के मिलता है गोद लेने का यह पक्ष मनुष्यता कि गरिमा को बढाता है और मनुष्यता व पशुता के बीच भेद स्थापित करने वाली परिपाटी भीआर्थिक स्थिति के आधार पर प्राण का वर्गीकरण करना निश्चित रूप के मनुष्यता और पशुता के अंतर को कम करने जैसा ही है |
राष्ट्रीय सहारा में 15/10/12 में प्रकाशित 

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