Thursday, January 19, 2012

राजनीति के विचारशून्य नारे


भारतीय लोकतंत्र में कोई भी चुनाव बगैर नारों के नहीं हो सकते नारे जो लोगों को किसी दल और उसकी सोच को जनता के सामने लाते हैं विकीपीडिया में नारों का जिक्र कुछ यूँ है नारा , राजनैतिकवाणिज्यिकधार्मिक और अन्य संदर्भों में, किसी विचार या उद्देश्य को बारंबार अभिव्यक्त करने के लिए प्रयुक्त एक यादगार  आदर्श वाक्य या सूक्ति है. इनकी आसान बयानबाज़ी  विस्तृत विवरणों की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती है, और इसलिए संभवतः वे अभीष्ट श्रोताओं के लिए प्रक्षेपण की बजाय, एकीकृत उद्देश्य की सामाजिक अभिव्यक्ति के रूप में अधिक काम करते हैं. देश के पांच राज्यों में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है और पांच साल में आने वाला चुनावी नारों का दौर लौट आया है पर सभी राजनैतिक पार्टियों के नारों में न  मौलिकता है न प्रयोगधर्मिता .दलों के भावी शासन का दर्शन भी नदारद है इससे ये पता पड़ता है कि हमारे राजनैतिक दल विचारों के दिवालियापन का शिकार हो चुके हैं. ये विचारों का दिवालियापन ही है कि ज्यादातर नारे फिल्मी गानों की तर्ज़ पर या उनके इर्द गिर्द रचे जा रहे हैं पहले के चुनाव नारों पर लड़े जाते थे पर अब चेहरों पर लड़े जा रहे हैं .राजनैतिक दल सत्ता में आने के बाद शासन का कैसा चेहरा देंगे जोर इस पर नहीं बल्कि कौन सा चेहरा शासन करेगा जोर इस पर है .जब चेहरे शासन करने लग जाएँ तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि लोकतंत्र में कैसे राजतंत्र प्रवेश कर गया है .नारे तो अभी भी गढे जा रहे हैं लेकिन न तो उनमे वो वैचारिक स्पष्टता और न ही नैतिक प्रतिबद्धता है जिससे मतदाता उनसे प्रभावित हो या वोट देते वक्त नारे उसके निर्णय को प्रभावित करें ,गरीबी हटाओ जैसा नारा आज भी लोगों को याद है.भले ही व्यवहार में गरीबी देश ना खत्म हुई हो लेकिन गरीबी जैसे विषय को सरकार की प्राथमिकता जरुर मिली . भ्रष्टाचार के विरोध में जब वी पी सिंह ने कांग्रेस पार्टी छोड़ी तो  राजा नहीं फ़कीर  है देश की तकदीर है जैसे नारों से उनका स्वागत किया गया और उन्होंने सामजिक न्याय के लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की,भले ही इसके लिए उन्हें अपनी सरकार कुर्बान करनी पडी.कथनी करनी के अंतर की यह कहानी सारी हकीकत खुद बयां कर रही है .इंदिरा गांधी जहाँ अपने गरीबी हटाओ जैसे नारों के लिए जानी जाती हैं वहीं उनके खाते में कुछ ऐसे नारे भी हैं जो आपातकाल की भयावता को बताते हैं "जमीन गई चकबंदी मे, मकान गया हदबंदी में,
द्वार खड़ी औरत चिल्‍लाए, मेरा मर्द गया नसबंदी में नारों को अगर समाजशास्त्रीय नजरिये से देखा जाए तो आज के चुनावी नारे कुछ शब्दों का संग्रह मात्र हैं जिनमे लफ्फाजी ज्यादा है .देश बदलना राज्य बदलना सुनने में भले ही अच्छा लगे पर ये होगा कैसे इसकी कोई रूपरेखा कोई भी राजनैतिक दल नहीं दे पा रहा है. साठ के दशक में राम मनोहर लोहिया ने जब  नारा दिया था, सोशलिस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ तो ये महज़ नारा नहीं एक बदलाव की पूरी तस्वीर थीजय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति के नारे ने पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया जिसकी चरम परिणिति सरकार परिवर्तन के रूप में सामने आयी . श्रीकांत वर्मा ने अपने संग्रह मगध में इसी वैचारिक खाली पन को कुछ यूँ बयान किया था :राजसूय पूरा हुआ,आप चक्रवर्ती हुएवे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं,जैसे कि यह कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता,कोसल में विचारों की कमी है .राजनीति जैसे बाँझ हो गयी है नेता तो आ रहे हैं दल भी बढ़ रहे हैं पर विचार खत्म  हो रहे हैं .परिवारवाद हर राजनैतिक दल के लिए एक आवश्यक आवश्यकता हो गया है बची हुई सीटों पर कास्ट और करेंसी जैसे फैक्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.हमें ये बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि नारे किसी भी लोकतंत्र के शासन के प्राथमिक माध्यम हैं  ऐसे में नारे अगर विचार केंद्रित ना होकर व्यक्ति केंद्रित हो जाएँ तो हमें समझ लेना चाहिए कि सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा. किसी भी लोकतंत्र में नए विचारों का न आना एक तरह की राजनैतिक शून्यता पैदा कर देता है जो शासन की दृष्टि से उचित नहीं होगा..राजनैतिक दल सत्ता में
 अमरउजाला में 19/01/12 को संपादकीय पृष्ठ पर  प्रकाशित लेख 

1 comment:

Navneet verma said...

VARTMAAN RAAJNEETI K NAARE VAASTAV ME VICHAARSUNYA HAI JINAME MAULIKTA, VAICHAARIKTA,PRASANGITA KA SPAST ROOP SE AABHAV NAZAR AATA HAI. PURANE SAMAY ME RAANAITIK DAL NAARON K MAADHYAM SE APNE VICHAAR EVAM UDDESYA SPAST KARTE THE LEKIN VARTMAAN K RAAJNAITIK DALOON K LOKTAANTRIK NAARON ME RAAJTANTRA KI SAPAST TASVEER NAZAR AATI HAI.

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