Friday, January 16, 2015

ऍफ़ एम् प्रस्तोताओं की फेसबुक वैचारिक शून्यता

                                     
मैं रेडियो का बहुत पुराना श्रोता रहा हूँ ,पहले आकाशवाणी फिर विविध भारती और यह सिलसिला ऍफ़ एम् आने तक जारी रहा,प्राइवेट ऍफ़ एम् आने के बाद मुझे उम्मीद जगी आकाशवाणी को प्रतिस्पर्धा मिलेगी और एक श्रोता की हैसियत से मैं फायदे में रहूँगा|रेडियो सही मायने में अभी भी भारत का जनमाध्यम है लेकिन ऐसा हुआ नहीं दिन रात बोलते रहने वाले इन निजी ऍफ़ एम् स्टेशन के रेडियो जोकियों से मैं ऊब गया|मैं इनकी ऊट पटांग बातों के अलावा इनसे कुछ और सुनना चाहता था मैं देश दुनिया के विभिन्न मुद्दों के बारे में इनकी राय जानना चाहता था |मुझे पता चला चूंकि निजी ऍफ़ एम् स्टेशन पर समाचारों के प्रसारण की छूट नहीं है इसलिए ये बेचारे दिन भर प्यार का इज़हार कैसे करें,लड़कियों को कैसे रिझाएँ  से लेकर त्यौहार कैसे मनाएं जैसी बातें करते रहते हैं |इस बीच दुनिया बदल रही थी टीवी और रेडियो के प्रस्तोता आज के नए सेलिब्रटी बनने लग गए थे|मैं भी इस बदलती दुनिया के हिस्से फेसबुक जैसी  सोशल नेटवर्किंग साईट्स में अपना मुकाम तलाशने लग गया जहाँ मुझे अखबार,टीवी और रेडियो के उन प्रस्तोताओं से दोस्ती करने का मौका मिला जिनसे साक्षात मुलाक़ात करने का मौका शायद अपने जीवन में न मिल पाए| यहाँ मुझे इनके निजी जीवन और विचार जानने का मौका मिला |वैसे भी किसी का फेसबुक अकाउंट उसके व्यक्तित्व का आईना होता है जहाँ हम उसकी पसंदगी और नापसंदगी को जान सकते हैं|
                                               
फेसबुक और ट्विटर जैसी साईट्स में अखबार और टीवी की दुनिया के बड़े नाम देश और दुनिया के मुद्दों पर धारदार तरीके से अपनी बात रख जनमत बनाने का काम कर रहे थे वहीं रेडियो की दुनिया के स्वनामधन्य रेडियो जॉकी (प्रस्तोता) हेलो कैसे हैं आप लोग, क्या आपने कभी किसी से  प्यार किया है,जैसी बेसिर पैर की बातें जो वे पहले से रेडियो पर बोलते चले जा रहे हैं  वही फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग पर भी कर रहे हैं|तर्क यह दिया जा सकता है कि फेसबुक हर किसी का अपना व्यक्तिगत माध्यम है और कोई किसी को हर मुद्दे पर लिखने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है|बात सही भी है पर फेसबुक जैसा माध्यम जिसकी आजकल जनमत निर्माण में बड़ी भूमिका है वहां लोग आपसे महज इसलिए जुड़े हुए हैं कि आप रेडियो के बड़े प्रस्तोता हैं उन लोगों को देश दुनिया और अन्य मुद्दों के बारे में आपकी क्या व्यक्तिगत राय मायने रखेगी और किसी मुद्दे या घटना विशेष के संदर्भ में जनमत निर्माण में असर डालेगी |फेसबुक जैसी अन्य सोशल नेटवर्किंग साईट्स में यहाँ रेडियो अन्य जन माध्यमों के प्रयोगकर्ताओं के मुकाबले एकदम फिसड्डी नजर आता है|
                                                      टीवी और समाचारपत्रों से जुड़े हुए लोग उन मुद्दों और घटनाओं पर बेबाकी से अपने फेसबुक अकाउंट के माध्यम से अपने विचार रख रहे हैं| वहीं निजी ऍफ़ एम् स्टेशन के ये रेडियो जॉकी जिनके पास  पर्याप्त मात्र में फेसबुक पर जनसमर्थन मौजूद है वे अपने फेसबुक अकाउंट को निजी ऍफ़ एम् का साइबर संस्करण बनाये हुए हैं जिनमें न तो कोई दिशा है न कोई विचार है न किसी बदलाव की छटपटाहट अगर कुछ है तो सिर्फ जो चल रहा है उसे चलाते रहो| उत्तर भारत के कई बड़े रेडियो जॉकी के फेसबुक अकाउंट को खंगलाने के बाद मैंने यह पाया कि यह रेडियो को एक ऐसा जनमाध्यम बनाने पर तुले हैं जो यह चाहता ही नहीं कि लोग किसी मुद्दे पर सोचें |सरकार ने सिर्फ रेडियो समाचारों के प्रसारणों पर रोक लगाई है आप जो रेडियो पर नहीं कह पा रहे हैं तो उसके लिए  फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग  को जरिया बनाया जा सकता है पर यहाँ  एक खतरा है फेसबुक पर कुछ कहने के लिए विचार होने चाहिए और ये रेडियो जॉकी या तो विचार शुन्यता का शिकार हैं या ये अपने एक्सपोज हो जाने का खतरा नहीं मोल लेना चाहते क्यूँकी जब आप किसी मुद्दे पर स्टैंड लेंगे तो लोगों को आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता का पता पड़ जाएगा और ये खतरा कोई भी जॉकी नहीं उठाना चाहता |तर्क यह भी दिया जाता है कि रेडियो संस्थान किसी भी मुद्दे पर अपने फेसबुक पेज से किसी वैचारिक विमर्श की इजाजत नहीं देते ठीक है आप अपने फेसबुक पेज से विमर्श को बढ़ावा नहीं दे सकते लेकिन आप अपने व्यक्तिगत अकाउंट से तो यह कार्य कर ही सकते हैं |फिलहाल इन सबके बीच में ऍफ़ एम्  रेडियो से कुछ जा रहा है तो वह है विचार

जनसत्ता में 20/01/15  को प्रकाशित 

2 comments:

Geetsangeet said...

रेडियो कार्यक्रम की तो शकल बदल दी गयी है.
आधे अधूरे प्रसंग और 'सतही-फूहड़' इन दो
श्रेणियों के बीच पाया जाने वाला हास्य,
अधिकांश समय उस चैनल के विज्ञापन और कुछ गीत या चर्चा. वो शब्द असल में "रेडियो जोकर " है. सुनने में खराब न लगे और जोकर शब्द का उपहास न बने इसलिए 'जाकी' बोलने लगे.

फेसबुक एक फंतासी सरीखा है. दबाना है कुछ बस,बटन एक ही है-लाईक. बटन दबाने और टिपण्णी का अनुपात देखिये !

arpit omer said...

इंसान पूरे दिन में जो पढ़ता है, जो कहता है, जो सोचता है वही बात अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट करता है . . . .
निजी चैनल के आरजे दिनभर वही सब मस्करी वाली बातें, आस पास में ट्रेफिक और मौसम का हाल में ही शो निकाल देते हैं . . .
टीवी और समाचारपत्रों से जुड़े लोग इसलिए बेबाकी से विचार रखते हैं क्योंकि उनके पास तमाम दिनभर की ख़बरों का विश्लेषण और सभी तरह के तर्क मौजूद होते हैं . . . मतलब साफ़ है कि आरजे मुद्दों पर कम फोकस कर पाते हैं शायद इसीलिए विचार ना रखते हों .... इसमें सबसे बड़ी खामी मुझे समाचार के प्रसारण की छूट न देने की भी लगती है . .

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