Monday, December 15, 2008

आइये फ़िल्म देखें

आज बहुत दिनों के बाद अपने हॉस्टल के दिनों की याद ताज़ा हो आयी और इस बात के एहसास भी हुआ की चाहे कितने डी वी डी / वी सी आर / टी वी के युग आते जाते रहें फिल्मों के प्रति जो दीवानगी भरिया जनता में है वो मंद जरूर हो सकती है ख़तम नहीं हो सकती है .मैं आज गज़नी फ़िल्म देखने गया बहुत अरसे बाद ब्लैक में टिकेट खरीदे हर जगह हाउस फुल .में बात हॉस्टल के दिनों की कर रहा था वो अज़ब ही दिन थे .उदैपुर की हसीं वादिया सिर्फ़ मस्ती भरे दिन हर शुक्रवार को पहला दिन पहला शो देखना और दोस्तों पर रौब ग़ालिब कर देना की गुरु निपटा दी .हालाँकि हॉस्टल छोड़ने से पहने जो मैंने आखिरी फ़िल्म देखी थी वो पहला शो न होकर आखिरी शो था दिन का मतलब निघत शो ९ से १२ . फ़िल्म थी तिरंगा शायद आपको याद हो जॉनी अपने राज कुमार साहब और नाना पाटेकर की जुगलबंदी .हॉस्टल से भाग कर उदैपुर के पारस सिनेमा हाल देखी क्या माहौल था हॉल में हर संवाद पर रेज्गारियों की बरसात , सीटियाँ , तालियाँ और बहार हाउस फुल का बोर्ड चलते चलते ये भी बता दूँ रात में फ़िल्म देखकर लौट ते वक्त पुलिस ने रोका इतनी रात कहाँ बताया पिक्चर देखकर बस फ़िर क्या था पकड़ लो वार्डेन को ख़बर करो .ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे , अगले दिन मुझे ११ क्लास में टॉप करने का पदक मिलना था ये सोच कर सिहर गए की कल बड़ी बदनामी होगी लेकिन पुलिस वालों को भी रहम आ गया और समझा कर छोड़ दिया की नैएट शो मत देखा करो ऐसा था हम लोगों का फ़िल्म देखने का शौक मतलब फ़िल्म के लिए कुछ भी करेगा काफी कुछ किया भी लेकिन वो कहानी फ़िर सही .खैर थोड़ा इमोशनल हो गया था असल में सीन ईस्ताब्लिशेद करना था की गज़नी देखकर मुझे आज से करीब १५ साल पहले का हॉल का माहौल याद आ गया .कमोबेस लखनऊ के सारे हाल हाउस फुल और आमिर खान की इंट्री पर जोरदार स्वागत मैंने भी फ़िल्म का लुत्फ़ लिया खासकर इंटरवल से पहले का बाद में तो वही पुरानी कहानी बदला लेकिन नायक के कुछ न कर पाने का एहसास आमिर ने बखूबी किया बहुत दर्द का एहसास कराया बाकी सब तो ठीक था लेकिन एक जगह अगर मैंने सही सुना तो स्क्रिप्ट पर इतना गौर करने की बाद भी एक गलती हो ही गयी है वोह है मुंबई से गोवा जाते वक्त आसिन जिस लडकी को ट्रेन में बचाती है वो अपने आप को लातूर का निवासी बताती है जबकि ख़बर जब आई बी एन ७ से प्रसारित होती है तो लड़कियों को उत्तर भारत के गाँव का बताया जाता है .ये उत्तर भारतियों के प्रति कोई पूर्वाग्रह है या कोई त्रुटी कह पाना मुश्किल है . कैमरा संगीत बहुत उत्तम है .गज़नी का किरदार बहुत भौंडा है एक मेडिकल कॉलेज के समारोह में मुख्या आतिथि बनकर जाने वाला व्यक्ति कैसा बेवकूफ हो सकता है या एक बेवकूफ कैसे एक बड़ी दवा कंपनी का मालिक हो सकता है जो लोगों की ह्तायेन करता रहता है वगैरह वगैरह .तो ये थी गज़नी की कहानी हमारी जुबानी जिन्दगी के किसी मोड़ पर फ़िर मुलाकात होगी

5 comments:

राजीव जैन Rajeev Jain said...

सर

आपने शायद सही पकडा है

मैंने भी यही सुना

वैसे हर शातिर कोई न कोई गलती कर बैठता है

वैसे दो मैंने भी पकडी हैं आप देख सकते हैं।

archana chaturvedi said...

Kahani to rochak hai sr ji mujhe bachpan se film dekhne ka bada shokh hai or ghr vale iske ulta par maine bhi suruvat daadi se ki film ko itna bada chada ke battati ki vo film dikhane ke liye raaji ho jati isi tahrah mere sikar badte gye or aaj meri puri famly mv dekhne sath jati hai

virendra kumar veer said...

kahani bahut hi rochak hai, filmo ki diwangi bachapan se hi thi aur issi liye maine aapni scolership aur jeb kharc se ek purani TV aur CD player ghar me bina bataye uatah laya tha.aur pura ghar saat milkar filmo ka anand leta hai.

samra said...

gajni first half mujhe achi lagi and second half bilkul achi nahi lagi ...lolz..
sir waise aapki purani baten jaan ke maza aaya..:)

Nikita Sareen said...

हॉस्टल लाइफ की यादे इंसान की ज़िन्दगी में " unforgettable memories " होती हैं । हॉस्टल लाइफ की मस्ती , लेट नाईट मूवीज , बर्थडे पार्टीज , नाईट आउट जैसी तमाम चीज़े हैं जो हम ता उम्र नहीं भूलते । आज भी जब हम दोस्तों के साथ बैठते हैं तो ये यादे फिर से तारो ताज़ा हो जाती हैं। जहाँ तक बात गजिनी की है , तो कुछ खामियों के होते हुए भी फिल्म ने खासी कमाई की और इसका म्यूजिक भी कर्णप्रिय था ।

पसंद आया हो तो