Thursday, June 25, 2026

एल्गोरिदम की दुनिया का दूसरा पहलू

 बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब इंटरनेट ने भारतीय समाज में दस्तक दी, तब इसे सामाजिक समता और लोकतांत्रिक चेतना का सबसे बड़ा मुक्तिदाता माना गया था। मुख्यधारा के समाजशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं का यह तर्क था कि जो समता भारतीय समाज सदियों के जातिगत, वर्गीय और भौगोलिक विभाजनों के कारण वास्तविक धरातल पर प्राप्त नहीं कर सका, वह यह आभासी दुनिया पलक झपकते ही दे देगी। कल्पना यह भी थी कि एक रेहड़ी-पटरी वाले और देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट अधिकारी की आवाज़ को डिजिटल मंचों पर बिना किसी संस्थागत दबाव के समान महत्व मिलेगा। लेकिन आज, न्यू मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में सच्चाई इस मीठी कल्पना के ठीक विपरीत खड़ी है। भारतीय इंटरनेट अब एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक स्पेस नहीं, बल्कि एक ऐसा 'अदृश्य डिजिटल पिंजरा' बन चुका है जो बैकएंड एल्गोरिदम, डेटा-मोनोपॉली और एआई के ज़रिए एक नई सामाजिक-आर्थिक वर्गीय व्यवस्था को जन्म दे रहा है। इसे हम "एल्गोरिद्मिक रंगभेद" (Algorithmic Apartheid) या "डिजिटल अछूतों का निर्माण" कह सकते हैं, जहाँ यूज़र को बिना बताए उसकी रीच, रोज़गार और सामाजिक हैसियत को एक गुप्त कोड से नियंत्रित किया जा रहा है।

आमतौर पर सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, एक्स (ट्विटर), आदि को सामान्य जनमानस के विचारों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि सोशल मीडिया सही मायने में एक ऐसा मीडिया है, जो किसी भी तरह के दबाव से मुक्त है। पिछले कुछ समय से जनमत के निर्माण में भी इसकी भूमिका तेजी से बढ़ी है, लेकिन सूचना साम्राज्यवाद के इस दौर में इंटरनेट भी सूचना के मुक्त प्रवाह का विकल्प बनकर नहीं उभर पा रहा है। यह एक ऐसे मायाजाल का निर्माण करता है जिसमें सब कुछ वास्तविक लगते हुए भी वास्तविक नहीं लगता है। इस मायाजाल की जड़ें केवल वैचारिक नियंत्रण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सबसे हिंसक प्रहार समाज के सबसे कमजोर और असुरक्षित तबके पर हो रहा है, जिसकी पुष्टि वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं के दस्तावेज़ भी करते हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की हालिया 'सुरक्षा और तकनीक' रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर की सरकारें और सीमा सुरक्षा बल अब प्रवासियों की पात्रता तथा आयु की जांच के लिए 'एआई फेशियल रिकग्निशन' तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू कर रहे हैं। इन रिपोर्टों में यह प्रमाणित किया गया है कि ये ब्लैक-बॉक्स एल्गोरिदम अश्वेतों, महिलाओं और प्रवासियों के प्रति जन्मजात रूप से पूर्वाग्रही हैं, जो बड़े पैमाने पर मानवीय बहिष्करण को जन्म दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर प्रवासियों को अलग-थलग करने वाला यह तकनीकी पूर्वाग्रह जब भारत के भीतर प्रवेश करता है, तो यह यहाँ सदियों से मौजूद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों के साथ मिलकर और अधिक हिंसक रूप अख्तियार कर लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि पहले से ही मुख्यधारा से कटे हुए समाज के हिस्से इस डिजिटल ढांचे में और पीछे छूटते चले जाते हैं।

भारतीय संदर्भ में यह एल्गोरिद्मिक रंगभेद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों को और गहरा कर रहा है। देश में इंटरनेट उपयोग में लैंगिक असमानता गहरी बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और GSMA Mobile Gender Gap Report के अनुसार, पुरुषों में इंटरनेट उपयोग दर लगभग 57% है, जबकि महिलाओं में यह केवल 33% है। मोबाइल इंटरनेट उपयोग में भी महिलाएँ पुरुषों से लगभग 50% पीछे हैं। इसके अलावा, डिजिटल कौशल में पुरुषों की भागीदारी 22.78% है, जबकि महिलाओं की केवल 13.91%। यह अंतर दर्शाता है कि डिजिटल पहुँच में लैंगिक असमानता भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनी हुई है। इस संरचनात्मक अंतर के कारण एल्गोरिदम पर अंग्रेजी और कुछ गिने-चुने शहरी केंद्रों का वर्चस्व स्थापित हो जाता है, जिसके चलते ग्रामीण भारत और क्षेत्रीय विमर्शों को एल्गोरिदम 'ट्रेंडिंग' की मुख्यधारा से बाहर कर देता है।

पहुंच और कौशल का यह लैंगिक व क्षेत्रीय अंतर जब एक ओर आम नागरिक को हाशिए पर धकेलता है, तो वहीं दूसरी ओर जो लोग इस डिजिटल स्पेस के भीतर मौजूद हैं, उनके लिए यह वर्चुअल दुनिया एक गहरे अविश्वास और असुरक्षा का मैदान बन जाती है। मुख्यधारा का विमर्श अब सत्य और असत्य के बीच के भेद को ही समाप्त करने पर आमादा है, जिसके पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनियंत्रित विकास काम कर रहा है। डिजिटल स्पेस में अब सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025 और 2026 के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा संचालित भ्रामक सामग्री और डीपफेक आज वैश्विक लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। एआई टूल्स का दुरुपयोग करके किसी भी व्यक्ति या विचार की सामाजिक हैसियत और गरिमा को पल भर में नष्ट किया जा सकता है।

विश्वसनीयता के इस संकट की भयावहता का अंदाज़ा महज़ कुछ सैद्धांतिक चेतावनियों से नहीं, बल्कि इसके पीछे काम कर रहे विस्फोटक आंकड़ों से लगाया जा सकता है। Resemble.AI की रिपोर्ट (2025) के अनुसार डीपफेक सामग्री की मात्रा में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। 2019 में जहाँ केवल 14,000 डीपफेक वीडियो मौजूद थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 8 मिलियन तक पहुँच गई — यानी लगभग 571 गुना वृद्धि। इसी रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 की तीसरी तिमाही तक हर तिमाही में औसतन 2,031 डीपफेक घटनाएँ दर्ज की गईं, जो 2023 की तुलना में 1,500% अधिक है। तकनीक की यह हिंसक बाढ़ जहां एक तरफ भ्रामक विमर्शों को जन्म देती है, वहीं दूसरी तरफ यदि कोई सचेत नागरिक इन बाधाओं को पार करके अपनी स्वतंत्र असहमति या प्रतिरोध दर्ज कराना चाहता है, तो इस तंत्र के पास उसकी आवाज़ को घोंटने के लिए और भी सूक्ष्म, अदृश्य हथकंडे मौजूद हैं।

इन बाधाओं को पार करके कोई यूजर अगर अपनी असहमति दर्ज कराता है तो उसके 'शैडो-बैनिंग' किये जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। वर्चुअल मंचों पर वैचारिक विरोध को दबाने के लिए 'शैडो-बैनिंग' जैसी अदृश्य सेंसरशिप का सहारा लिया जाता है। यूरोपीय डिजिटल राइट्स (EDRi) जैसी डिजिटल राइट्स वॉचडॉग संस्थाओं के शोध दर्शाते हैं कि बड़े टेक प्लेटफॉर्म अपने व्यावसायिक हितों और विज्ञापनों को बचाने के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील या सामाजिक आंदोलनों से जुड़े की-वर्ड्स की 'रीच' को बैकएंड से ही दबा देते हैं। इसमें यूज़र के अकाउंट को ब्लॉक नहीं किया जाता, बल्कि उसकी रीच को शून्य कर दिया जाता है। यूज़र को लगता है कि वह स्वतंत्र है और लोकतांत्रिक चर्चा का हिस्सा है, पर वास्तव में उसकी आवाज़ को एक तकनीकी पिंजरे में कैद कर दिया जाता है जहाँ कोई दूसरा उसे सुन ही नहीं पाता। यह 'सूचना साम्राज्यवाद' का सबसे सूक्ष्म और हिंसक स्वरूप है।

अभिव्यक्ति को कुचलने वाली यह अदृश्य सेंसरशिप किसी स्थानीय स्तर पर नहीं की जा रही, बल्कि यह सिलिकॉन वैली के वैश्विक तकनीकी एकाधिकारों की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसी कारण, वैश्विक स्तर पर तकनीकी नियंत्रण और नैतिकता को लेकर चिंताएं केवल अकादमिक दायरों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि अब अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्थाएं भी इस तकनीकी निरंकुशता को नियंत्रित करने के विकल्प तलाश रही हैं। सिलिकॉन वैली की कुछ गिने-चुने तकनीकी एकाधिकारों ने वैश्विक विमर्श को इस कदर जकड़ लिया है कि तकनीकी मंचों द्वारा फैलाए जा रहे ध्रुवीकरण और व्यावसायिक अंधाधुंधता से आज वैश्विक संस्थाएं भी चिंतित हैं। यही कारण है कि यूनेस्को द्वारा लगातार 'एथिक्स ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (Ethics of AI) पर वैश्विक नियम जारी किए जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भी अब यह बहस तेज है कि क्या यूरोपीय संघ के 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्ट' (EU AI Act) जैसे कड़े कानूनी मानदंडों और तकनीकी नैतिकता के अंतर्निहित सिद्धांतों के बिना इस बेलगाम तकनीक को इंसानी नियंत्रण के दायरे में वापस लाया जा सकता है? जब तक एआई और एल्गोरिदम के विकास में नैतिक मानदंडों और सामाजिक सुरक्षा को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह तकनीक केवल शक्तिशाली देशों और वैश्विक कंपनियों के हितों को साधने वाला 'डिजिटल रंगभेद' ही बनी रहेगी।

इस वैश्विक विमर्श के आलोक में, भारत जैसे समाज को यह गहराई से समझना होगा कि जो तकनीक ऊपरी तौर पर जितनी आकर्षक और तटस्थ दिखाई देती है, उसके नेपथ्य में उतने ही गहरे व्यावसायिक और वैचारिक हित छिपे होते हैं। तकनीकी निर्भरता के इस दौर में भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश को यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि कोई भी एल्गोरिदम या तकनीक कभी 'न्यूट्रल' या निष्पक्ष नहीं होती। वह हमेशा अपने निर्माता के आर्थिक लाभ और राजनीतिक दृष्टिकोण से संचालित होती है। यदि हमें इंटरनेट को इस 'अदृश्य डिजिटल पिंजरे' और वैचारिक रंगभेद से मुक्त कराना है, तो मात्र भारत के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' (DPDP Act) जैसे विनियामक कानून पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए हमें तकनीकी कंपनियों के बैकएंड कोड्स की सार्वजनिक ऑडिटिंग, स्वदेशी डेटा संप्रभुता और एआई प्रणालियों में सामाजिक न्याय के अंतर्निहित सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक के इस उपभोगवादी और दमनकारी तंत्र के सामने मूक दर्शक या केवल 'उपभोक्ता' बनने के बजाय, एक सचेत, प्रश्नकर्ता और प्रतिरोधी 'डिजिटल नागरिक' की भूमिका का निर्वाह करें।

 अमर उजाला में 25/06/2026 को प्रकाशित लेख 

Friday, June 19, 2026

बिना इंटरनेट वाला बचपन

 

बचपन की यादें खिड़की से आती उस ठंडी हवा की तरह होती हैं, जो तपती गर्मी में भी सुकून दे जाती हैं। आज जब जून के महीने में स्कूल बंद हैं, तो हर तरफ सन्नाटा दिखाई देता है। बच्चे अपने-अपने कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर मोबाइल, टैबलेट या गेमिंग कंसोल पर उंगलियां सरका रहे होते हैं। इस नजारे को देखकर अक्सर मन अतीत के गलियारों में लौट जाता है और दिल में एक ही सवाल उठता है—"यूँ होता तो क्या होता?" अगर आज भी हमारे पास वही पुराना, बिना इंटरनेट वाला बचपन होता, तो आज की पीढ़ी का जीवन कैसा होता?हमारे समय में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही एक अलग ही उत्साह होता था। न हमारे पास स्मार्टफोन थे और न ही सोशल मीडिया। तब हमारी छुट्टियां सिर्फ लूडो, कैरम,व्यापार(खेल ) और कॉमिक्स के सहारे बीत जाती थीं। 'चाचा चौधरी', 'साबू', 'बिल्लू' और 'पिंकी' के पन्नों में जो दुनिया छिपी थी, वह आज के किसी भी थ्री-डी गेम से कहीं ज्यादा चमकीली  थी।
उस समय किसी तरह का कोई 'डिस्ट्रेक्शन' (भटकाव) नहीं था। आज की पीढ़ी को हर पांच मिनट में एक नोटिफिकेशन चाहिए, लेकिन हमें सिर्फ अपनी अगली बारी का इंतजार रहता था।वो अभाव के दिन थे न बाजार न ही घर चीजों से भरे नहीं थे |हर चीज में बचत की आदत हमारे बचपने का अंग रहे |
आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि खुशियों को जीने से ज्यादा, उन्हें दूसरों को दिखाने की होड़ मची है। कहीं घूमने जाना हो, कुछ अच्छा खाना हो या बस घर में बैठकर समय बिताना हो—जब तक उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर 'फिल्टर' लगाकर पोस्ट न कर दी जाए, तब तक वह खुशी अधूरी मानी जाती है। यह लोभ बिलकुल भी नहीं था कि हम सबको बताएं कि हम क्या कर रहे हैं। हमारी खुशियां सार्वजनिक नहीं, बल्कि बेहद निजी हुआ करती थीं। अगर हमने कैरम में कोई बेहतरीन शॉट मारा या लूडो में लगातार तीन छक्के ले आए, तो वह खुशी सिर्फ उस कमरे में बैठे चार दोस्तों या भाई-बहनों के बीच की होती थी। उसे दुनिया भर से 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' बटोरने की जरूरत नहीं थी।
आज की फिल्टर वाली पीढ़ी शायद कभी यह समझ ही न पाए कि एक ऐसी भी दुनिया थी जहां चीजों को जबरदस्ती बेहतर या चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की जाती थी। हमारे समय में जो जैसा होता, हम उसी से दिल लगा लेते थे।
गली में किसी पुराने, खराब टायर को लकड़ी के टुकड़े से मारते हुए मीलों दौड़ाने में जो लुत्फ था, वह आज की महंगी रीमोट-कंट्रोल कार में भी नहीं है। खेलते समय जब लेदर या कॉर्क की गेंद नाली में गिर जाती थी, तो खेल रुकता नहीं था। उसे नाली से निकालकर बस सूखी मिट्टी से रगड़ कर साफ मान लेने का एक अनोखा हुनर हमारे पास था। न कीटाणुओं का डर था और न ही सैनिटाइजर की जरूरत। सब कुछ कितना सादा, स्पष्ट और वास्तविक था।
मेरी मां अक्सर कहा करती हैं कि खुशियां जितनी व्यक्तिगत होती हैं, उतनी ही सुरक्षित रहती हैं; उन्हें सबको बता  देने से नजर लग जाती है। मां के जमाने में इंटरनेट नहीं था, इसलिए वे और उनके दौर के लोग इस बात को गहराई से समझते थे कि असल आनंद दूसरों के दिखावे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ उस पल को महसूस करने में है।
आज की पीढ़ी 'वर्चुअल' (आभासी) दुनिया में इतनी खो चुकी है कि उसे असली रिश्तों की गर्माहट का अहसास ही नहीं है। वे इंस्टाग्राम के फिल्टर्स में चेहरे को तो सुंदर बना लेते हैं, लेकिन बचपन के उस असली, बेफिक्र और धूल-मिट्टी से सने चेहरे की मासूमियत खो चुके हैं।बेशक इंटरनेट ने हमें दुनिया भर की जानकारियां और सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसके बदले में उसने हमसे हमारा वह सादा और सच्चा बचपन छीन लिया। काश, आज का बचपन भी थोड़ा सादा, थोड़ा बिना फिल्टर वाला और थोड़ा और 'व्यक्तिगत' हो पाता!

प्रभात खबर में 19/06/2026 को प्रकाशित लेख

Thursday, June 11, 2026

एआई में बढ़ते निवेश से बदलता परिदृश्य

 

हाल ही में विश्व की बड़ी तकनीकी कंपनियों में से एक ओरेकल कॉर्पोरेशन द्वारा कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी की खबरें सुर्खियों में रही हैं। एक ही दिन में क़रीब 30 हज़ार कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की घटना ने सॉफ़्टवेयर उद्योग के भविष्य को लेकर एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। यह घटना केवल एक कंपनी का निर्णय नहीं, बल्कि उस व्यापक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते प्रभाव के कारण पूरे सॉफ़्टवेयर उद्योग में देखने को मिल रहा है। पिछले तीन दशकों में सॉफ़्टवेयर उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। विशेषकर भारत जैसे देशों ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियों ने न केवल लाखों लोगों को रोजगार दिया है, बल्कि भारत को वैश्विक आईटी हब के रूप में स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई है। इन कंपनियों का प्रमुख बिज़नेस मॉडल ‘सर्विस मॉडल’ रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में इंजीनियर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को सॉफ़्टवेयर सेवाएँ प्रदान करते रहे हैं।

यदि हम अतीत की ओर देखें, तो कंप्यूटर पर काम करने का मतलब होता था अलग-अलग सॉफ़्टवेयर का उपयोग। उदाहरण के लिए, लेखन के लिए माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, डेटा प्रबंधन के लिए एक्सेल, और फोटो संपादन के लिए फोटोशॉप जैसे टूल्स का उपयोग किया जाता था। हर कार्य के लिए अलग टूल और हर टूल को सीखने के लिए समय और कौशल की आवश्यकता होती थी।किन्तु आज यह परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अब उपयोगकर्ता केवल एक साधारण निर्देश यानी प्रॉम्ट देते हैं, जैसे “इस डेटा का विश्लेषण कर दो” या “इस फोटो को बेहतर बना दो” और एआई स्वयं ही पूरा कार्य कर देता है। इस परिवर्तन ने न केवल कार्यप्रणाली को सरल बनाया है, बल्कि पारंपरिक सॉफ़्टवेयर उद्योग की संरचना को भी चुनौती दी है।

एआई के बढ़ते प्रभाव के कारण वैश्विक आईटी बाज़ार में अस्थिरता भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। हाल के महीनों में सॉफ़्टवेयर कंपनियों के शेयरों में भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस और और मैकेंजी ग्लोबल की रिपोर्ट्स के अनुसार, टेक सेक्टर के वैल्यूएशन में तेज गिरावट देखी गई है, जिसका अनुमान 800 अरब डॉलर से 1 ट्रिलियन डॉलर तक लगाया गया है।इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण तब सामने आया जब एआई स्टार्टअप एनथ्रॉपिक ने अपने क्लाउड-आधारित एजेंट्स के लिए एआई प्लगइन्स पेश किए। ये टूल्स कानूनी विश्लेषण, वित्तीय मॉडलिंग, कोडिंग, ग्राहक सेवा और डेटा प्रोसेसिंग जैसे जटिल कार्यों को स्वचालित रूप से करने में सक्षम हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि जिन कार्यों के लिए पहले बड़ी सॉफ़्टवेयर टीमों की आवश्यकता होती थी, वे अब मशीनों द्वारा अधिक तेज़ और कम लागत में किए जा सकते हैं।
यह परिवर्तन केवल सॉफ़्टवेयर उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि रचनात्मक क्षेत्रों जैसे फिल्म और फोटोग्राफी पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है। पहले जहाँ पटकथा लेखन एक पूर्णतः मानवीय और रचनात्मक प्रक्रिया मानी जाती थी, वहीं अब एआई टूल्स की सहायता से कथानक संरचना, संवाद और चरित्र विकास कुछ ही मिनटों में संभव हो गया है। स्टोरीबोर्डिंग और विजुअल प्लानिंग जैसे कार्य, जो पहले विशेष सॉफ़्टवेयर और विशेषज्ञता पर निर्भर थे, अब टेक्स्ट-आधारित इनपुट से ही पूरे किए जा सकते हैं।

पोस्ट-प्रोडक्शन के क्षेत्र में भी सोरा, वियो और लूमा एआई जैसे टूल्स पारंपरिक वीडियो एडिटिंग और वीएफएक्स सॉफ़्टवेयर को चुनौती दे रहे हैं। ये टूल्स न केवल समय की बचत करते हैं, बल्कि रचनात्मक संभावनाओं का भी विस्तार करते हैं।फोटोग्राफी उद्योग में भी यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहाँ ‘कैप्चर’ की पारंपरिक अवधारणा अब ‘क्रिएशन’ में बदल रही है। पहले फोटोग्राफर का मुख्य कार्य सही समय, प्रकाश और फ्रेमिंग के माध्यम से एक क्षण को कैद करना होता था, जिसके बाद एडिटिंग सॉफ़्टवेयर का उपयोग किया जाता था। किन्तु अब एआई इस पूरी प्रक्रिया को एकीकृत कर रहा है। आज स्मार्टफ़ोन और कैमरे एआई की सहायता से स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं कि किस सेटिंग पर इमेज सबसे उपयुक्त होगी। इमेजिन एआई और आफ्टरशूट जैसे टूल्स न केवल फोटो चयन और संपादन को स्वचालित कर रहे हैं, बल्कि जेनरेटिव फिल जैसी तकनीकों के माध्यम से इमेज को पुनर्निर्मित और परिवर्तित भी कर रहे हैं।

तकनीकी इतिहास पर दृष्टि डालें तो सॉफ़्टवेयर उद्योग की उत्पत्ति 1970–80 के दशक की पर्सनल कंप्यूटिंग क्रांति से मानी जाती है, जब कंप्यूटर संस्थानों से निकलकर आम लोगों तक पहुँचना शुरू हुए। इसके बाद 2000 के दशक में इंटरनेट और क्लाउड सेवाओं के विस्तार ने इस उद्योग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। मैकिंज़ी वैश्विक संस्थान की रिपोर्टों में इस परिवर्तन को “डिजिटल रूपांतरण” की लहर के रूप में समझाया है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था में सॉफ़्टवेयर की केंद्रीय भूमिका स्थापित की थी। इस पूरे विकासक्रम में सॉफ़्टवेयर का स्वरूप “इंटरफेस-आधारित” रहा था जिसका मतलब है प्रत्येक कार्य के लिए अलग सॉफ़्टवेयर और उसका विशिष्ट इंटरफेस होता था। किन्तु बड़े भाषाई मॉडल्स के आगमन के साथ यह स्थिति तेजी से बदल रही है। स्टैनफोर्ड मानव-केंद्रित एआई संस्थान की “एआई सूचकांक रिपोर्ट 2024” के अनुसार, संवाद-आधारित इंटरफेस पारंपरिक ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस को चुनौती दे रहे हैं, जहाँ उपयोगकर्ता केवल सामान्य भाषा के माध्यम से जटिल कार्यों को संपन्न कर पा रहे हैं। इस प्रकार “बातचीत” स्वयं एक इंटरफेस का रूप लेती जा रही है।

इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम एआई-संचालित कोड जनरेशन के रूप में सामने आया है। २०२३ में आये गिटहब और माइक्रोसॉफ्ट के संयुक्त अध्ययन  के अनुसार, कोपायलट का उपयोग करने वाले लगभग 55–75% डेवलपर्स ने अधिक उत्पादकता और कम मानसिक थकान की सूचना दी। इससे यह स्पष्ट होता है कि अब बुनियादी कोड लेखन का कार्य धीरे-धीरे एआई द्वारा किया जा रहा है, जबकि मानव डेवलपर्स उच्च-स्तरीय समस्या-समाधान और डिजाइन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, “कोड लिखना” अब एक मुख्य कौशल न रहकर एक सहायक टूल में परिवर्तित हो रहा है। इसी प्रकार विश्व आर्थिक मंच की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट के मुताबिक़ एआई की बढ़ती भूमिका से पुनावृत्ति वाले नौकरी पेशा पर अधिक दबाव बनेगा, बल्कि उच्च स्तरीय विश्लेषणात्मक और रचनात्मक भूमिकाओं की माँग में वृद्धि होगी।

2025 में आई रॉयटर्स समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने एआई और नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग के चलते लगभग 12,000 से अधिक पदों में कटौती का संकेत दिया है।वहीं ओरेकल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन वेब सर्विसेज और गूगल जैसी कंपनियाँ बड़े पैमाने पर एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर रही हैं। गार्टनर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सॉफ़्टवेयर उद्योग अब सॉफ़्टवेयर एज अ सर्विस से एआई एज अ सर्विस मॉडल की ओर बढ़ रहा है। यानी अब कंपनियाँ सॉफ़्टवेयर नहीं, बल्कि “बुद्धिमत्ता” बेच रही हैं। हालांकि यह कहना अप्रासंगिक होगा कि एआई, सॉफ़्टवेयर उद्योग को पूरी तरह से खत्म कर देगा या यूजर्स की निर्भरता सॉफ्टवेयर से बिल्कुल कम कर देगा, सही बात यह है कि लोगों को टिके रहने के लिए को ख़ुद को एआई लिटरेसी और कर्मचारियों प्रॉम्ट इंजीनियरिंग जैसे महत्वपूर्ण कौशल सीखने और बदलती तकनीक के अनुरूप ख़ुद को ढालने की क्षमता सीखनी होगी ।
दैनिक जागरण में 11/06/2026 को प्रकाशित लेख 

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