Monday, April 27, 2026

नया गेमिंग नियम: डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास

 


देश बदला दुनिया बदली इसी के साथ सभ्यता के लिए सबसे जरूरी मनोरंजन के भी तौर तरीके बदले |फिर खेल भी कहाँ पिछड़ने वाले थे |जब सब डिजिटल हो रहा है तो खेल क्यों न हो ?पर मामला इतना सा भर नहीं है |इंटरनेट के मौद्रिकीकरण ने खेलों को भी नहीं छोड़ा और जब डिजिटल खेलों के साथ धन जुड़ा वहीं से मामला गंभीर हो गया |लंबे इंतजार के बाद  1 मई 2026 की तारीख एक मील का पत्थर साबित होने जा रही है। इसी दिन से देश में 'ऑनलाइन गेमिंग नियम, 2026' (PROG Rules) लागू हो रहे हैं। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि उस जटिल डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास है जिसमें भारत का युवा और निवेश जगत पिछले एक दशक से उलझा हुआ था। 10 साल की लंबी वैधता वाले गेमिंग सर्टिफिकेट और बिना पैसे वाले खेलों को पंजीकरण से मुक्ति देने जैसे प्रावधानों के साथ सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह 'नियंत्रण' से अधिक 'नियमन' पर भरोसा कर रही है। इस नियमन की सबसे बड़ी उपलब्धि 'कौशल' (Skill) और 'किस्मत' (Chance) के बीच के सदियों पुराने विवाद को तकनीकी रूप से परिभाषित करना सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. के.आर. लक्ष्मणन बनाम तमिलनाडु राज्य जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया है कि कोई भी खेल 'कौशल का खेल' तब कहलाता है जब उसमें खिलाड़ी की मानसिक योग्यता, रणनीति, निर्णय लेने की क्षमता और अनुभव जीत का मुख्य आधार होते हैं।
इसके विपरीत, 'किस्मत का खेलवह है जहाँ परिणाम पूरी तरह से भाग्य या संयोग पर निर्भर करता हैजैसे सट्टेबाजी या लॉटरी। नए नियम इस अंतर को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सख्ती से लागू करते हैं। सरकार ने 'रियल मनी गेमिंगके उन रूपों को प्रतिबंधित कर दिया है जो सट्टेबाजी (Betting) के करीब थेजबकि 'ई-स्पोर्ट्सऔर कौशल आधारित खेलों को बढ़ावा देने का रास्ता साफ किया है। यह स्पष्टता निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण थीक्योंकि बिना परिभाषा के करोड़ों का निवेश हमेशा जोखिम में रहता था।
भारत में गेमिंग अब केवल समय बिताने का साधन नहींबल्कि एक विशाल आर्थिक शक्ति है। ल्युमिकाई (Lumikai) की प्रतिष्ठित वार्षिक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडिया गेमिंग 2023-24' है के अनुसारभारत का गेमिंग बाजार वर्तमान में लगभग 3 बिलियन डॉलर का मूल्य रखता है। विदित  हो कि यह उद्योग 28% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़ रहा है। जो 2028 तक 5 बिलियन डॉलर के जादुई आंकड़े को छू लेगा।
भारत में वर्तमान में लगभग 50 करोड़ से अधिक गेमर्स हैंजिनमें से एक बड़ा हिस्सा 'इन-गेमखरीदारी के जरिए राजस्व में योगदान दे रहा है। यह वृद्धि केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैयह भारत को वैश्विक सॉफ्टवेयर और एनीमेशन हब बनाने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है।
हालांकि आलोचक ये मानते हैं कि इन नियमों के आने में थोड़ी देर हुई जिसका फायदा उठाया कर देश के लाखों युवाओं और किशोरों को सट्टे की लत लगी और ये लोग रातों रात अमीर बनने  के सपने देख कर इस तरह के खेलों के आदी हो गए जिनमें पैसा शामिल राहत था |, लेकिन इसके पीछे की जटिलताओं को समझना आवश्यक है। देरी के मुख्य रूप से तीन कारण बताए जा सकते हैं
पहला ये है कि  भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार 'जुआ और सट्टेबाजीराज्य सूची (State List) का विषय है। कर्नाटकतमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने जब अपनी सीमाओं में गेमिंग पर प्रतिबंध लगायातो मामला अदालतों में पहुँचा। केंद्र सरकार को एक ऐसा मध्य मार्ग खोजना था जो राज्यों की शक्तियों का सम्मान करे और पूरे देश के लिए एक समान डिजिटल ढांचा भी प्रदान करे। दूसरा कारण है तकनीकी अस्पष्टता मतलब  पारंपरिक खेलों के विपरीतऑनलाइन गेम्स के एल्गोरिदम इतने जटिल होते हैं कि यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जीत कौशल से हुई है या सॉफ्टवेयर द्वारा नियंत्रित 'किस्मतसे। सरकार को विशेषज्ञों की समितियों और तकनीकी ऑडिटर्स की एक फौज तैयार करनी पड़ी जो इन दावों की पुष्टि कर सकें।तीसरा है आर्थिक और सामाजिक संतुलन साधना  एक तरफ 28% GST लगाने का आर्थिक दबाव था और दूसरी तरफ युवाओं में गेमिंग की लत (Gaming Disorder) से जुड़ी सामाजिक चिंताएं। सरकार एक ऐसा कानून चाहती थी जो न तो उद्योग का गला घोंटे और न ही समाज की युवा पीढी को  जोखिम में डाले।
नए नियमों के तहतएक बार किसी गेम को उसकी श्रेणी (कौशल या मनोरंजन) के आधार पर सर्टिफिकेट मिल जाता हैतो वह दस  साल तक वैध रहेगा। यह गेम डेवलपर्स को एक दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है। सबसे राहत की बात छोटे डेवलपर्स और छात्रों के लिए है, बिना वित्तीय लेनदेन वाले खेलों (Social & Casual Games) को अनिवार्य पंजीकरण की कतार से बाहर रखा गया है। इससे कॉलेज कैंपस और छोटे स्टार्टअप्स में 'इनोवेशनकी लहर आएगी।      उपभोक्ता सुरक्षा के लिए  आयु सत्यापन (Age Verification) और खर्च की सीमा तय करने जैसे फीचर्स से छात्रों और बच्चों पर गेमिंग के दुष्प्रभाव कम होंगे।विदेशी निवेश (FDI) में  स्पष्ट नियमों के कारण अब वैश्विक गेमिंग कंपनियाँ भारत में अपने सर्वर और ऑफिस स्थापित करने में संकोच नहीं करेंगी।पांच  बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह में ग्राफिक्स डिजाइनर्सकोडिंग एक्सपर्ट्स और डेटा एनालिस्ट्स के लिए लाखों नए अवसर पैदा होंगे।
मई से लागू होने वाले ये नियम भारतीय गेमिंग जगत की 'शुद्धिका काम करेंगे। भारत अब गेमिंग के क्षेत्र में केवल एक 'उपभोक्ता' (Consumer) नहींबल्कि एक 'नियामकऔर 'निर्माता' (Creator) के रूप में उभर रहा है। यह नियमों और विकास का वह संतुलित संगम हैजिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से थी।
 प्रभात खबर में 27 अप्रैल 2026 को प्रकाशित लेख


Friday, April 24, 2026

ए आई के नक़्शे में भारत

 

वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल एक तकनीकी शब्द मात्र  नहींबल्कि 'चतुर्थ औद्योगिक क्रांति' (Industry 4.0) का मुख्य स्तंभ बन चुका है। हाल ही में बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) रिपोर्ट 2025 द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसारभारत 92% AI एडॉप्शन दर  के साथ विश्व के अग्रणी देशों की सूची में पहले स्थान  पर है। यह आंकड़ा  न केवल भारत की डिजिटल शक्ति  को दर्शाता हैबल्कि वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी देता है।रिपोर्ट के अनुसार भारत (92%) ने स्पेन (78%) और ब्राजील (76%) जैसे उभरते बाजारों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है।आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका (64%) और जापान (51%) जैसे तकनीकी रूप से परिपक्व देश ए आई  एडॉप्शन की इस दौड़ में पिछड़ रहे हैं।उल्लेखनीय है कि यहाँ 'एडॉप्शनका अर्थ केवल ए आई के परिचय से नहींबल्कि सक्रिय उपयोग से है (कम से कम सप्ताह में कई बार)।भारत की इस बढ़त के पीछे कई तर्क दिए जा सकते हैं |जिसमें सबसे प्रमुख है भारत की विशाल युवा आबादी 'डिजिटल नेटिवहै।संज्ञानात्मक लचीलापन (Cognitive Flexibility) युवाओं में अधिक होता हैजिससे वे नई जटिल तकनीकों को शीघ्र आत्मसात कर लेते हैं और भारत इसमें अपवाद नहीं है|दूसरा है लीपफ्रॉगिंग (Leapfrogging) की प्रवृत्ति मतलब भारत ने कई पारंपरिक चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत डिजिटल समाधानों को अपनाया है।
 ये उसी तरह का मामला है जैसे भारत ने लैंडलाइन फोन  के युग को छोड़कर सीधे मोबाइल क्रांति कीवैसे ही अब वह पारंपरिक सॉफ्टवेयर से सीधे AI-इंटीग्रेटेड सिस्टम की ओर बढ़ रहा है।तीसरा कारण: भारतीय श्रम बाजार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का होना है। यहाँ AI को 'जॉब रिप्लेसमेंटके बजाय 'जॉब एनहांसमेंटटूल के रूप में देखा जा रहा हैजिससे व्यक्तिगत उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि होने की सम्भावना है।भारत की 'नंबर 1' रैंकिंग केवल उपयोग तक सीमित नहीं हैबल्कि यह 'AI रेडीनेस' (AI तत्परता) को भी रेखांकित करती है। भारत सरकार का 'IndiaAI' मिशननेशनल स्ट्रैटेजी फॉर  एआई   और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों जैसे IITs और विश्वविद्यालय स्तर पर  एआई   पाठ्यक्रमों का समावेश इस तत्परता को आधार प्रदान कर रहा है। भारत मेंनीति आयोग का कहना है कि एआई को अपनाने से 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 957 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि हो सकती है और देश की वार्षिक विकास दर में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। भारत ने भी नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए राष्ट्रीय रणनीतिनामक एक चर्चा पत्र के माध्यम से एआई पारिस्थितिकी तंत्र को गति देने की अपनी रणनीति शुरू की है। भारत दुनिया का सबसे सस्ता और सबसे बड़ा डेटा उपभोक्ता है।  एआई   को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा ही ईंधन है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है |जिस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है

जापान और अमेरिका जैसे देशों में निम्न एडॉप्शन दर के पीछे 'संस्थागत जड़ताऔर 'सख्त नियामक ढांचे'  उत्तरदायी हैं। जिसमें  ए आई लिए जरुरी आवश्यक आंकड़ों की पूर्ति के लिए सख्त नियम हैं और वहां की जनसंख्या अपने आंकड़ों के लिए ज्यादा सजग है|दूसरा  वहाँ डेटा गोपनीयता (Privacy) और कॉपीराइट कानूनों की जटिलता ने तकनीक के मुक्त प्रसार को धीमा किया हैजबकि भारत में 'ओपन-सोर्स कल्चरऔर नवाचार के प्रति उदार दृष्टिकोण ने इसे गति दी है।आने वाले समय में भारत को भी ऐसे कई सवालों से दो चार होना पड़ेगा |सबसे जरुरी है कि भारत का ए आई इस्तेमाल में स्वरुप कैसा होगा?जिसे क्रियेटर बनाम कंज्यूमर के नजरिये से समझा जा सकता है | दुनिया में हुई  'सोशल मीडिया क्रांति' (2004-2015) के दौरान भारत एक 'इनोवेटर' (बनाने वाला) के बजाय केवल 'कंज्यूमर' (उपयोगकर्ता) बनकर रह गया था|ए आई के आने के बाद यह बहस भी जोरो पर थी क्या वैसी ही गलती कहीं भारत दुबारा तो नहीं दोहरा देगा |भारत केवल वैश्विक AI मॉडल्स जैसे चैट जी पी टी, गूगल जेमिनी,को-पाइलेट का उपभोक्ता बना रहेगाया हम अपने खुद  के 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' (LLMs) विकसित कर पाएंगे? इस सवाल का जवाब समय के गर्भ में है |

हमें एल्गोरिथमिक बायस (Bias) और डेटा संप्रभुता पर शोध की ज्यादा आवश्यकता है। एल्गोरिथमिक बायस डेटा में छिपे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दोहराता हैजिससे ए आई द्वारा भेदभावपूर्ण निर्णय संभव हैं जिसमें भारत जैसे विविधता वाले देश में किसी राज्य में कोई बात सही होती वहीं दूसरे राज्य या संस्कृति में हो सकता है वो सही बात गलत हो ऐसे में ए आई कई तरह की गलतियां कर सकता है । वहींडेटा संप्रभुता यह सुनिश्चित करती है कि भारतीयों का डेटा देश की सीमाओं और कानूनों के अधीन रहे। इन पर शोध अनिवार्य है ताकि तकनीक निष्पक्ष हो और डिजिटल उपनिवेशवाद से बचा जा सके।भारत अब डिजिटल विभाजन  के दूसरी ओर नहींबल्कि केंद्र में खड़ा है। 92% एडॉप्शन रेट इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था भविष्य की चुनौतियों के लिए न केवल तैयार हैबल्कि उन्हें आकार देने में सक्षम है। भारत का यह ' एआई   मोमेंटउसे आने वाले दशकों में उसे  वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का केंद्र बिंदु बनाएगा या नहीं इसके लिए थोड़ा इन्तजार करना होगा |

अमर उजाला में 24/04/2026 को प्रकाशित 

 

Tuesday, April 14, 2026

इंटरनेट थका रहा है जेन ज़ी को

 


यूँ कहने को तो हम इंसानी सभ्यता की सबसे ज्यादा कनेक्टेड पीढ़ी हैं लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा अकेली है। ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया, रील्स की शोर-शराबे वाली दुनिया ने हमें अंदर से थका दिया है। इसी थकान और तनाव से बचने के लिए आज की जेन जी पीढ़ी ने एक नया तरीका ढूंढ लिया है जिसे बेड रॉटिंग कहते हैं। यह शब्द सुनने में जितना अजीब लगता है इसका अर्थ उतना ही सीधा है। इसका मतलब है  जानबूझकर घंटों या दिनभर बिस्तर पर पड़े रहना और निष्क्रिय गतिविधियों में लिप्त रहना जैसे फोन स्क्रॉल करना, फिल्म देखना या बस लेटे रहना। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सच में तनाव या बर्नआउट से लड़ने का एक कारगर तरीका है या फिर अपने जीवन से मुँह मोड़ लेना एक खतरनाक बहाना जो व्यक्ति को अवसाद और निष्क्रियता के अंधेरे कुएँ में धकेल रहा है।

बेड रॉटिंग शब्द का पहली बार इस्तेमाल 2023 में एक अमेरिकी टिकटॉक यूजर ने अपने वीडियो में किया था। देखते-देखते यह शब्द जेन जी शब्दावली का हिस्सा हो गया जो हफ्ते में एक दिन बेड रॉटिंग करके एंटी प्रोडेक्टिविटी और सेल्फ केयर जीवन शैली को अपनाने लगे। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक भी युवाओं की इस प्रवृत्ति के प्रति अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे हैं।

मनोवैज्ञानिक इसे सिर्फ आराम नहीं बल्कि एक तरह के इमोशनल शटडॉउन की तरह भी देखते हैंजहाँ व्यक्ति अपनी भावनाओंतनाव और जिम्मेदारियों से बचने के लिए बिस्तर को एक सुरक्षित किले की तरह इस्तेमाल करने लगता है। जिससे मानसिक थकावटबेचैनीअवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

हालांकि भारत में बेड रॉटिंग को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार ट्रैंड बना हुआ है कुछ युवा इसके लिए एक्सटेंशन ऑफ द स्लीपस्लीप वीकेंड या वीकेंड कोमा जैसे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। आज कल छुट्टियाँ घूमने फिरने या परिवार के साथ वक्त बिताने का समय नहीं रहीं बल्कि बिस्तर पर पड़े रहने का बहाना बन गई हैं । आज की जेन-ज़ी पीढ़ी अपने कमरे की चारदीवारी में सिमटकरमोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन के सामने पूरा दिन बिताना ज्यादा सहज महसूस करती है। खाना ऑर्डर करना हो तो ऑनलाइनदोस्तों से बात करनी हो तो ऑनलाइनजैसे वास्तविक दुनिया से जुड़ने की उनकी इच्छा धीरे-धीरे मिटती जा रही हो। दरअसल आज का युवा सूचनाओं के ऐसे महासागर में जी रहा हैजो कभी शांत नहीं होताअंतहीन फीड्सनेटफ्लिक्सअसीमित कंटेंट यह सब मिलकर डिजिटल ओवरस्टिम्यूलेशनका माहौल बनाते हैं। जिससे दिमाग को कभी आराम नहीं मिलता और बिस्तर एक आरामदायक ठिकाना बन जाता है। वहीं सोशल मीडिया पर सेल्फ केयर की गलत व्याख्या से इसे और अधिक बल मिलता है।

 कभी-कभार भले बिस्तर पर आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा कर सकता हैलेकिन एक नियमित आदत से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पर इसका ये मतलब नहीं है कि हमें आराम नहीं करना चाहिए। तनावपूर्ण जीवन से एक ब्रेक लेना और खुद को रिचार्ज करना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि इसके साथ घर के बाहर निकलनाशारीरिक क्रियाएं करनादोस्तों या परिवार के लोगों से बात करना भी उतना ही जरूरी है। आखिर में हमें एक संतुलन की आवश्यकता है जहाँ हम बिस्तर पर लेटकर फोन स्क्रॉल करने के बजायकिताबें पढ़नासंगीत सुनना या मेडिटेशन जैसी चीजें भी कर सकते हैं। इससे व्यक्ति में निष्क्रियता कम और सक्रियता बढ़ेगी। तभी हम अपनी युवा पीढ़ी को एक स्वस्थउत्पादक और खुशहाल भविष्य दे पाएंगे।

 

प्रभात खबर में 14/04/2026 को प्रकाशित 

पसंद आया हो तो