Monday, December 2, 2013

अंगदान की परम्परा शुरू करने की जरुरत


दुनिया की बड़ी आबादी वाले देशों में से एक भारत में में प्रतिवर्ष लगभग 5,00,000लोग वक़्त पर अंग न मिल पाने के कारण मौत का शिकार हो  जाते हैं।इन सारे लोगों को बचाया जा सकता था यदि भारत में स्वैच्छिक रूप से लोग अंगदान करते|ज्यादातर उन्हीं लोगों को समय रहते अंग मिल पाते हैं जो आर्थिक  रूप से संपन्न होते हैं|आर्थिक सम्पन्नता के इसी आधार के कारण मानव अंगों के अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है| एक व्यक्ति द्वारा किये गए अंगदान से सामान्य रूप में  लगभग सात व्यक्तियों को जीवनदान मिल सकता है।अंगदान में एक बड़ी समस्या अस्पतालों द्वारा समय से रोगी को मष्तिस्क मृत (ब्रेन डेड ) घोषित न कर पाना भी है जिससे मृतक व्यक्ति के अंग खराब होने लगते हैं| वर्ष 1994 में सरकार ने ‘मानवीय इंद्रियों के प्रत्यारोपण के लिए अधिनियम, 1994’ कानून बनाया ताकि विभिन्न किस्म के अंगदान और प्रत्यारोपण गतिविधियों को सुचारु रूप दिया जा सके। चिकित्सकीय कार्यों के लिए मानवीय इंद्रियों को निकालने, उनका भंडारण करने और उनके प्रत्यारोपण को नियमित करने के अलावा इस कानून का मकसद था कि इंद्रियों के व्यावसायिक लेन-देन को रोका जा सके, ब्रेनडेड को स्वीकार किया जाए और इन मरीजों को संभावित इंद्रियदाताओं के तौर पर प्रयुक्त किया जाए। ध्यान रहे कि प्रस्तुत अधिनियम ने पहली दफा ब्रेनडेड की अवधारणा को कानूनी जामा पहनाया। यह कानून अन्य देशों में प्रयोग में लाये जाने वाले क़ानूनों से कुछ अधिक कठोर है। किसी भी व्यक्ति को ब्रेन-डेड घोषित करने एवं उसके अंगों के प्रत्यारोपण का कार्य केवल चंद अधिकृत अस्पताल ही कर सकते हैं। किसी को ब्रेन-डेड घोषित करने के लिए कम से कम चार डॉक्टरों सहमति होनी आवश्यक है। साथ ही यह परीक्षण 6 घंटों के अंतराल पर करना होता है और समय के जरा सा भी अधिक हो जाने पर अंगदान मुश्किल हो जाता है। अन्य कई देशों में किसी को भी ब्रेन-डेड घोषित करने के लिए केवल दो डॉक्टरों की सहमति चाहिए होती है और दो परीक्षणों के मध्य कोई निश्चित अंतराल रखना भी आवश्यक नहीं है। 1994 में बने इस अधिनियम की कुछ खामियों को मानव अंग प्रत्यारोपण (संसोंधन) अधिनियम, 2011 में दूर करने की कोशिश की गयी है। इस अधिनियम के अंतर्गत नेशनल ऑर्गन एवं टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (एन ओ टी टी ओ) की स्थापना की गयी। इसका मुख्य कार्य होगा देश भर में अंगदान से जुड़ी विभिन्न प्रक्रियाओं एवं गतिविधियों पर नजर  रखना। भारत में प्रति दस लाख  व्यक्ति अंगदान करने वालों की संख्या सिर्फ 0.8 है। यह संख्या विश्व के नया देशों की तुलना में नगण्य है। भारत में इस संख्या के कम होने के पीछे कई कारण हैं जैसे सही जानकारी का अभाव, धार्मिक मान्यताएँ, सांस्कृतिक भ्रांतियाँ और पूर्वाग्रह। विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और जर्मनी में यह संख्या औसतन 10 से 30 के बीच है। स्पेन में प्रति दस लाख लोगों में 35.1 अंगदान करते हैं। इसका प्रमुख कारण है की स्पेन, बेल्जियम, सिंगापुर और कुछ अन्य देशों में अंगदान ऐच्छिक  न होकर अनिवार्य है। हालांकि भारत में ऐसा कर पाना फ़िलहाल  संभव नहीं है परंतु उचित जानकारी एवं  जागरूकता पैदा कर इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है। हर साल देश में  50,000हजार हार्ट ट्रांसप्लांट , 2,00,000 लीवर ट्रांसप्लांट 30,000 बोन मैरो ट्रांसप्लांट एवं 15,00,00 किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है लेकिन इसका लाभ  दो  प्रतिशत मरीजों को भी नहीं मिल पाता  है |
हिंदुस्तान में 2/12/13 को प्रकाशित 

3 comments:

shalu awasthi said...

yes sir...bharat mein angdaan ki parampara shuru akrna behad awashyak ho gaya hai
its d need of n hour
and bohot hi accha likha hai apne
n it will useful especially 4 acid attack patients...since they need donated skin...(Y)

Prasanna Badan Chaturvedi said...

वाह... उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

Sudhanshuthakur said...

सर अभी कही न कही गाड़ी धीरे-धीरे रेंगना शुरू हुई है और लोग देहदान के लिए आगे आना शुरू कर रहे हैं ।

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