Friday, August 29, 2014

मुद्दा शिक्षकों को जिम्मेदार बनाने का भी है

निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व के सभी शीर्ष नेताओं ने इसे सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों का एक हिस्सा बनाया और वर्ष 2015 तक हर बच्चे को प्राइमरी शिक्षा मुहैया कराने का निर्णय लिया। भारत के लिए इस आज की तारीख में इस लक्ष्य की प्राप्ति सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद भी लगभग असंभव दिखती है। किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चों के हाथ में होता है और बच्चों का भविष्य उनके शिक्षकों के हाथ में। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है की देश का भविष्य शिक्षकों के हाथ में होता है। पर देश के भविष्य के ये कर्णधार आजकल कक्षाओं से अदृश्य होते जा रहे हैं। हाल ही में बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश के एक विद्यालय की एक अध्यापिका पिछले तेईस वर्षों से अनुपस्थित चल रही हैं। हालांकि यह  एकाकी घटना हो सकती है जिसे हर शिक्षक के संदर्भ में सही नहीं ठहराया जा सकता है। पर यह भी एक कटु सत्य है कि कक्षाओं से शिक्षकों की अनुपस्थिति भारत में एक चिरकालिक समस्या है। शिक्षकों की कक्षाओं से अनुपस्थिति शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के सबसे निंदनीय स्वरूपों में से एक है। वैसे तो कक्षाओं से शिक्षकों की अनुपस्थिति के कई कारण हैं जिनमें से कुछ वास्तविक भी हैं परंतु इसका सबसे बड़ा कारण है शिक्षकों का सरकारी वेतन  लेते हुए भी दूसरे कार्यों जैसे निजी कोचिंग चलाने में व्यस्त रहना। शिक्षकों की अनुपस्थिति का एक और प्रमुख कारण है उनको अन्य सरकारी कार्यों जैसे चुनावों में लगा देना। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों का प्रतिशत 11 से 30 के बीच में है।कार्तिक मुरलीधरन कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय सेन डीयोगे, के शोध के मुताबिक  शिक्षकों की अनुपस्थिति से भारत को प्रतिवर्ष लगभग 1.5 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है। भारत के संदर्भ में चिंतनीय बात यह है कि अनुपस्थित होने के वैध कारण जैसे मेडिकल, आधिकारिक छुट्टी, प्रतिनियुक्ति, राजपत्रित छुट्टियाँ, कुल अनुपस्थिति के केवल 10 प्रतिशत हिस्से को दर्शाते हैं। अनाधिकारिक छुट्टियों से न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि पढ़ाई की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह सबसे ज्यादा नुकसानदायक आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए होता है जिनके लिए शिक्षा ही उन्नति का एक मात्र जरिया है। भारत सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान पर बहुत खर्च किया है। यह खर्च जुटाने के लिए अतिरिक्त कर भी लगाया गया। पर इस अभियान का मूल उद्देश्य जो कि शिक्षा के आधारभूत ढांचे और उसकी गुणवत्ता को बेहतर बनाना था पूर्ण नहीं हो पाया है। चूंकि शिक्षा पर होने वाले खर्च का एक सबसे बड़ा भाग शिक्षकों की तनख़्वाह पर खर्च होता है, इतने बड़े पैमाने पर कक्षाओं से शिक्षकों की अनुपस्थिति का सीधा मतलब है बहुमूल्य सार्वजनिक धन का दुरुपयोग। विश्व बैंक की एक शोध  के अनुसार भारत के सरकारी स्कूलों के औचक निरीक्षण के दौरान लगभग 25 प्रतिशत शिक्षक अनुपस्थित पाये गए और जो उपस्थित थे उनमें से  भी केवल आधे ही कक्षाओं में पढ़ाते मिले। अनुपस्थिति का प्रतिशत महाराष्ट्र, जो कि एक अधिक सम्पन्न राज्य है, में लगभग 15 प्रतिशत था जबकि अपेक्षाकृत पिछड़े राज्य झारखंड में 42 प्रतिशत। साथ ही इस स्टड़ी में यह भी पाया गया कि तनख़्वाह की कमी या अधिकता का शिक्षकों की अनुपस्थिति से कोई संबंध नहीं पाया गया। जो शिक्षक अधिक अनुभवी थे और ज्यादा तनख़्वाह आहरित करते हैं वे भी उतना ही अनुपस्थित रहते हैं जितना की अनुबंध पर कार्य करने वाले वे शिक्षक जो कम तनख़्वाह पाते हैं। प्राइवेट स्कूलों में अनुपस्थिति की समस्या न के बराबर है। वर्ष 2010 में एम॰आइ॰टी द्वारा कराये गए एक सर्वे के अनुसार भारत में अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों पर जब कैमरों से निगाह रखी गयी और उनकी तनख़्वाह को उनके काम करने के वास्तविक दिनों से जोड़ दिया गया तो अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों की संख्या में लगभग 21 प्रतिशत की कमी आई। यह आंकड़ा इस तथ्य को इंगित करता है कि यदि शिक्षकों की तनख़्वाह को उनके काम करने के दिनों से सीधे जोड़ दिया जाये तो शिक्षकों के अनुपस्थित रहने की समस्या से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। इसके अलावा बेहतर निरीक्षण के तरीकों और कठोर अनुशासनिक निर्णयों द्वारा भी इस समस्या से निपटारा पाया जा सकता है। साथ ही विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि शिक्षकों को स्कूलों बेहतर मूलभूत सुविधाएं प्रदान की जाएँ तो भी उनके अनुपस्थित होने की दर में कमी आती है। हालांकि इन सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षकों को उनकी ज़िम्मेदारी और उनके कार्य की महत्ता का एहसास दिलाया जाए।
अमर उजाला में 29/08/12 को प्रकाशित 

5 comments:

avinash vimal said...

yes sir you are right hamare INDIAN CONSITITUTION ke (ARTICAL-21-k) me right to education ko diya gaya hai. iss artical ko banane ka uddesh pura karna bahut jaruri hai.

avinash vimal said...

yes sir you are right hamare INDIAN CONSITITUTION KE (ARTICAL- 21-K)ME RIGHT TO EDUCATION ko diya gya hai. Is artical ko banane ka uddesh pura karna bahut jaruri hai.

Vaishali Sharma said...

Shiksha aur shikshak dono hi ek dusre ki phechan hotey hai .. bhut jaruri hoti shiksha .. ye ek dam shi hai, mere nazr me baat hm sirf shikshako ki ku kare baat to hr us insaan ki hojati hai yaha jaha hm baat apne kartavyo aur apni nitiyo ki karte hai kul milakr hr insan ko apne kary ke parati nicahaver aur pardarshi hona chaiye kuki yehi wo cheze hoti hai jo insaan ko uske jeevan k sahi mulyo ko use sikhati hai ..jo insaan apne jeevan ke adhar ko nhi smajh sakta to jeevan bhar apne ap se uljha rhta hai jarurat hai apne kartavyo ka palan karne ki aur ise bojh na samjhne ki.. kuki shiksha kartavyo ka bodh karti hai aur ise hme seekh lena chaiye...

Vaishali Sharma said...

Shiksha aur shikshak dono hi ek dusre ki phechan hotey hai .. bhut jaruri hoti shiksha .. ye ek dam shi hai mere nazr me baat hm sirf shikshako ki ku kare baat to hr us insaan ki ho jati hai yaha jaha hm baat apne kartavyo aur apni nitiyo ki karte hai kul milakr hr insan ko apne kary ke parati nicahaver aur pardarshi hona chaiye kuki yehi wo cheze hoti hai jo insaan ko uske jeevan k sahi mulyo ko use sikhati hai ..jo insaan apne jeevan ke adhar ko nhi smajh sakta to jeevan bhar apne ap se uljha rhta hai jarurat hai apne kartavyo ka palan karne ki aur ise bojh na samjhne ki..

Vaishali Sharma said...

Shiksha aur shikshak dono hi ek dusre ki phechan hotey hai .. bhut jaruri hoti shiksha .. ye ek dam shi hai mere nazr me baat hm sirf shikshako ki ku kare baat to hr us insaan ki ho jati hai yaha jaha hm baat apne kartavyo aur apni nitiyo ki karte hai kul milakr hr insan ko apne kary ke parati nicahaver aur pardarshi hona chaiye kuki yehi wo cheze hoti hai jo insaan ko uske jeevan k sahi mulyo ko use sikhati hai ..jo insaan apne jeevan ke adhar ko nhi smajh sakta to jeevan bhar apne ap se uljha rhta hai jarurat hai apne kartavyo ka palan karne ki aur ise bojh na samjhne ki..

पसंद आया हो तो