Monday, December 1, 2014

असमय दम तोड़ता देश का भविष्य

स्वास्थ्य किसी भी देश के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता वाला क्षेत्र होता है, पर आंकड़ों के हिसाब से भारत की तस्वीर इस मायने में बहुत उजली नहीं है। बाल स्वास्थ्य भी इसका कोई अपवाद नहीं है। बच्चे देश का भविष्य हैं पर उन बच्चों का क्या जो भविष्य की ओर बढ़ने की बजाय अतीत का हिस्सा बन जाते हैं! साल 2011 में, दुनिया के अन्य देशों की मुकाबले भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें हुई। यह आंकड़ा समस्या की गंभीरता को बताता है जिसके अनुसार भारत में प्रतिदिन 4,650 से ज्यादा पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु होती है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ की नई रिपोर्ट भी यह बताती है कि बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में अभी कितना कुछ किया जाना है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ‘लेवल्स एंड ट्रेंड्स इन चाइल्ड मोरटैलिटी-2014’ में कहा गया है कि साल 2013 में भारत में 13.4 लाख से अधिक बच्चों की मौत के मामले दर्ज किए गए। 1990 में भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार बच्चों के जन्म पर 88 थी, जो 2013 में घटकर 41 हो गई। जाहिर है कि स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन मौजूदा हालात भी संतोषजनक कतई नहीं हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैसे तो लोगों की सेहत के लिए काफी इंतजाम किए गए हैं और मानवाधिकारों की स्थिति में भी सुधार हुआ है, लेकिन अब भी बहुत से इलाकों और समुदायों में बहुत गहरी असमानता बनी हुई है। इनमें से भी करीब एक चौथाई यानी 25 फीसद मौतें सिर्फ भारत में होती हैं। नाइजीरिया में करीब दस फीसद मौतें होती हैं। दुनिया भर में जन्म के पांच साल के भीतर ही करीब एक करोड़ 27 लाख बच्चों की मौतें होती हैं। उनमें से आधी यानी करीब 63 लाख बच्चों की मौत सिर्फ पांच देशों में होती है। भारत में 1990 के बाद से बाल मृत्यु दर के मामलों में आधे से अधिक की गिरावट आई है, लेकिन पिछले साल पांच से कम उम्र के बच्चों की मौत की सबसे अधिक मामले भारत में ही दर्ज किए गए हैं। साफ-सफाई की कमी एक बहुत बड़ी चुनौती है क्योंकि इसी से गंभीर बीमारियां फैलती हैं। जिनकी चपेट में आने से बच्चों की मौत तक हो जाती है। दक्षिण एशियाई देशों में अब भी करीब 70 करोड़ बच्चों को शौच करने के लिए खुले स्थानों पर जाना पड़ता है। जन्म के पहले महीने में विश्व में कुल जितने बच्चों की मौत होती है, उनमें से करीब दो तिहाई मौतें सिर्फ दस देशों में होती हैं। संयुक्त राष्ट्र का यह अध्ययन यह आकलन करता है कि भारत में जन्म लेने वाले प्रत्येक एक हजार बच्चों में से इकसठ बच्चे अपना पांचवा जन्मदिन नहीं मना पाते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संख्या रवांडा (54 बच्चों की मृत्यु), नेपाल (48 बच्चों की मृत्यु) और कंबोडिया (43 बच्चों की मृत्यु) जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े देशों के मुकाबले ज्यादा है। सिएरा लियोन में बच्चों के जीवित रहने की संभावनाएं सबसे कम रहती हैं जहां प्रत्येक एक हजार बच्चों में मृत्यु दर एक सौ पचासी है। दुनिया भर में बच्चों की मृत्यु की सबसे बड़ी वजह न्यूमोनिया है जिसके कारण अठारह प्रतिशत मौतें होती हैं। दूसरी वजह डायरिया है जिससे ग्यारह प्रतिशत मौतें होती हैं। भारत डायरिया से होने वाली मौतों के मामले में सबसे आगे है। डायरिया एक ऐसी बीमारी है जिससे थोड़ी-सी जागरूकता से बचा जा सकता है और इससे होने वाली मौतों की संख्या में कमी लाई जा सकती है। 2010 में जितने बच्चों की मृत्यु हुई, उनमें तेरह प्रतिशत की मृत्यु की वजह डायरिया ही था। दुनिया में डायरिया से होने वाली मौतों में अफगानिस्तान के बाद भारत का ही स्थान है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत जैसे देशों में डायरिया की मुख्य वजह साफ पानी की कमी और निवास स्थान के आसपास गंदगी का होना है। इसकी एक वजह खुले में मल त्याग भी है। गंदगी, कुपोषण और मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव मिलकर एक ऐसा दुष्चक्र रचते हैं जिसका शिकार ज्यादातर गरीब घरों के बच्चे होते हैं। वास्तविकता यह भी है कि आर्थिक आंकड़ों और निवेश के नजरिये से भारत तरक्की करता दिखता है, पर इस आर्थिक विकास का असर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों पर नहीं हो रहा है। इसी का परिणाम पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की बड़ी तादाद में मृत्यु के रूप में सामने आता है, वह भी डायरिया जैसी बीमारी से, जिसका बचाव थोड़ी सावधानी और जागरूकता से किया जा सकता है। बढ़ते शहरीकरण ने शहरों में जनसंख्या के घनत्व को बढ़ाया है। निम्न आयवर्ग के लोग रोजगार की तलाश में उन शहरों का रु ख कर रहे हैं जो पहले से ही जनसंख्या के बोझ से दबे हुए हैं। इसका नतीजा शहरों में निम्न स्तर की जीवन दशाओं के रूप में सामने आता है। दूसरी तरफ, गांवों में जहां जनसंख्या का दबाव कम हैं, वहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत दयनीय है और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर पर्याप्त जागरूकता का अभाव है। विकास संचार के मामले में अभी हमें एक लंबा रास्ता तय करना है जिससे लोगों में जागरूकता जल्दी लाई जाए। विशेषकर देश के ग्रामीण इलाकों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रभाव ज्यादा है, पर वह अपने मनोरंजन एवं सूचना में संतुलन बना पाने में असफल रहा है। इसका नतीजा संचार संदेशों में कोरे मनोरंजन की अधिकता के रूप में सामने आता है। संचार के परंपरागत माध्यम भी अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं। वैसे भी वैश्वीकरण की लहर इन परंपरागत माध्यमों के लिए खतरा बन कर आई है। सरकार का रवैया इस दिशा में कोई खास उत्साह बढ़ाने वाला नहीं रहा है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) का 1.4 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है जो कि काफी कम है। सरकार ने इसे बढ़ाने का वायदा तो किया पर ये कभी पूरा हो नहीं पाया। यह स्थिति तब है जबकि भारत सरकार के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य के अनुसार वह साल 2015 तक शिशु मृत्यु दर को प्रति 1,000 बच्चों पर 38 की संख्या तक ले आएगी। बढ़ती शिशु मृत्यु दर का एक और कारण कुपोषण भी है। ‘सेव द चिल्ड्रन‘ संस्था का एक अध्ययन बताता है कि भारत बच्चों को पूरा पोषण मुहैया कराने के मामले में बांग्लादेश और बेहद पिछड़े माने जाने वाले अफ्रीकी देश ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो’
से भी पिछड़ा हुआ है। हालांकि भारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 1990 के मुकाबले 46 प्रतिशत कम हुई है, पर इस आंकड़े पर गर्व नहीं किया जा सकता। सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब गरीबों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता पैदा की जाए और उनकी जीवन दशाओं को बेहतर किया जाए। इस दिशा में सरकार को सार्थक पहल करनी होगी। पर यूनिसेफ की यह रिपोर्ट बताती है कि यह आंकड़ा प्राप्त करना आसान नहीं होगा।
राष्ट्रीय सहारा में 01/12/14 को प्रकाशित 

1 comment:

Geetsangeet said...

उम्मीद है कुछ और सत्यार्थी आगे आयेंगे और
अभियान को आगे बढ़ाएंगे .

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