Friday, March 20, 2015

टेक्नोलॉजी के साथ हमारी सोच भी हो स्मार्ट

एपल ने अपनी नई स्मार्ट वाच लांच कर दी है यानि अब  वह दिन दूर नहीं जब  स्मार्ट वाच हर कलाई पर सजी दिखेगी वैसे भी आजकल स्मार्ट होने का जमाना है वो चाहे फोन हो या टीवी या फ्रिज सब स्मार्ट होने चाहिए अब तो स्मार्ट चश्मे और घर भी बनने लग गए हैं.वैसे स्मार्ट होने में कोई बुराई भी नहीं है अब सुबह हो गयी है अभी आप सब भी नहा धोकर स्मार्ट बन कर घर से निकलेंगे. शरीर और चीजों को  तो स्मार्ट बनाया जा सकता है और बनाया जा भी रहा है लेकिन जब बात महिलाओं की आती है तब हमें  एक बार सोचना पड़ता है कि क्या हम वाकई एक स्मार्ट एज में जी रहे हैं.तकनीक जितनी तेजी से बदल रही है अगर उतनी तेजी से हमारी मानसिकता बदलती तो दुनिया ज्यादा खुबसूरत दिखती.
एक छोटा सा एक्सामपल है मेरी तरह आपके पास बहुत से प्रमोशनल एस एम् एस आते होंगे.मेरे पास अक्सर एक एस एम् एस आता है. मेरा नाम ए बी सी (लडकी का नाम) अकेले हो,बोर हो रहे हो तो मुझे इस नंबर पर फोन करो.हम इस एस  एम् एस को पढ़कर बस डीलीट कर देते हैं.मेरे दिमाग में ऐसे मेसेज को देखकर ख्याल आया कि आखिर इस तरह के विज्ञापन संदेशों की जरुरत क्यों है.मजेदार बात है कि ऐसे एस एम् एस लड़कियों को भी भेजे जाते हैं कायदे से तो उनके पास लड़कों के नाम से एस एम् एस भेजे जाने चाहिए और दूसरी बात क्या बातें करने के लिए लड़कियां ही फ्री बैठी रहती हैं.ये छोटा सा एस एम् एस हमारे समाज के लोगों के जेहन में क्या चल रहा है ,उसकी बानगी भर है क्योंकि ऐसे एस एम् एस विज्ञापन हवा में नहीं बनते कहीं न कहीं समाज में एक सोच है कि लड़कियों से रोमांटिक बात करना पुरुषों का जन्मसिद्ध अधिकार है.पर यही हरकत अगर कोई लडकी करना शुरू कर दे तो क्या होता है उसको बताने की जरुरत नहीं.लड़कियों को जितनी तेजी से हमारा समाज कैरक्टर सर्टिफिकेट देता है,उसकी आधी तेजी लड़कों के लिए आ जाए तो देश की लड़कियों का जीवन थोडा बेहतर हो जाए.
अच्छा आप मेरी बात यूँ न मान लीजिये चलिए जरा याद कीजिये अपने मोहल्लों के चौराहों से लेकर दुकानों तक सुबह शाम लड़के झुण्ड लगाये आती जाती लड़कियों को घूरते ,फब्तियां कसते  अपने स्मार्ट फोन के साथ  जीवन का आनंद उठाते दिखते हैं कि नहीं दिखते.इससे एक बात तो साबित होती है कि हमारे समाज में लड़कियां नहीं लड़के ज्यादा फ्री रहते हैं ,न तो  उन्हें घर के सामान्य काम काज करने होते हैं न ही उनके किसी काम पर समाज से तुरंत कैरक्टर सर्टिफिकेट मिलने का डर होता है. ऐसा द्रश्य किसी भी शहर, कस्बे में देखा जा सकता है और लड़कियों को छोड़ दिया जाता है अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए वो भी अकेले पर इस पूरे प्रोसेस में लड़कियां बहुत अकेले होती हैं.यानि विज्ञापन भी जेंडर स्टीरियो टाइपिंग का शिकार हैं क्योंकि उनको बनाने वाले भी इसी समाज के लोग हैं और उनका पालन पोषण इसी तरह की चीजों को देखते हुआ है और उनकी मानसिकता भी वैसी बन गयी है.एस एम् एस विज्ञापन से आगे टीवी विज्ञापनों पर चलें तो वहां भी कहानी कुछ ऐसी ही है जहाँ लैंगिक असमानता साफ़ साफ़ दिखती है.आलम यह है कि पुरुषों के अंडर गारमेंट से लेकर शेविंग क्रीम और गाड़ी तक के टायर में महिलाओं का इस्तेमाल एक सेक्स सिम्बल के रूप में किया जा रहा है| आप यूँ भी समझ सकते हैं कि मैं अकेली हूँ बोर हो रही हूँ जैसे एस एम् एस विज्ञापनों की सोच को टेलीविजन पर असीमित विस्तार मिल जाता है,जहाँ किसी भी कमोडिटी को महिलाओं के साथ दिखाया जाना जरुरी है.आप भी सोच रहे होंगे कि बात तो स्मार्ट वाच और गैजेट से शुरू हुई थी पर मामला इतना गंभीर होगा आपने सोचा न था.जी हैं स्मार्ट टेक्नोलॉजी  स्मार्ट सोच के साथ अच्छी लगती है नहीं तो ‘ये बन्दर के हाथ में उस्तुरा’ जैसी बात हो जायेगी. जरा सोचियेकैसा हो जब किसी  सूप के ऐड मे छोटी छोटी भूख पापा शांत कराये और मेनी पोको पेंट्स में बच्चे  को पापा अच्छी नींद सुलायें.ह्रदय  को स्वस्थ रखने वाले विज्ञापन में पत्नी की सेहत का ख्याल पति भी करे.वाशिंग पाउडर से लेकर टॉयलेट सफाई  के विज्ञापन में महिलाओं के साथ –साथ पुरुष भी कदम से कदम मिलाकर चलते दिखें.
अगर ऐसा कभी  हो पायेगा तो दुनिया भर के  स्मार्ट गैजेट के पास रखने की यूटीलटी सिद्ध होगी क्योंकि हमारी सोच भी टेक्नोलॉजी  की तरह स्मार्ट है.आप कब से अपनी सोच को स्मार्ट बना रहे हैं .
आई नेक्स्ट में 20/03/15 को प्रकाशित 

5 comments:

Naincy Kashyap said...

HAAN SIR BIKUL SAHI KAHA SIR APNE LADKIYO KO SIRF OBJECT KI TARAH HI DEKHA JATA H SOCIETY M JINTE BHI DETERGENT K ADS AATE H USME SIRF FEMALES HI KAPDE DHOTI DIKHAYI JATI ISME SIRF YAHI BATANE KI KOSHISH KI JATI H KI FEMALES K KAM HI HAI KAPDE DHONA MALES SIRF SAF KAPDE PEHEN K GHAR SE NIKALTE HUA DIKHAYI DETE H OR DOOSRI TARAF VAHI HM SMART HONE KI BAT KRTE H..SABSE PEHLE HME APNI SOCH BADALNI HOGI

Fatima Lubna said...

Sir your article depicts the true face of our society. You have rightly said, women are used as mere Sex Symbol in advertisement. The presentation of women in today's time has been reduced to being nothing more than an object to increase sale of the product. Women are considered weaker sex but in today's era they are excelling in every field be it academics,housework or job etc.

neha bhandari said...

bhoot khoob sir sahi kaha apne sabse phle hme apni soch bdalni hogi mahilao ke prati tbhi jake is desh ki sahi mayene main tarakki hogi..lekin agar aisa hi chalta rha tab hum chahe kitna bhi advance ho jaye sab useless hoga ...

Vaishali Gupta said...

Ek taraf hm technology or digital India ki baat krte h or smart hone ki baat krte h or dusri taraf hamari soch abhi bhi nichle tapke ki h.

Suraj Verma said...

बिल्कुल सर। हम और हमारी सरकार बाते तो बहुत बहुत बड़ी बड़ी करती है। लड़कियों को लेकर लेकिन उनको जो अधिकार मिलने चाहिए । वो आज भी अधूरे है। हमे खुद सोचना चाहिए की हर चीज़ मे बदलाव आ चुका है, सभी कुछ स्मार्ट हो चला है , तो लड़कियों,और महिलाओं के प्रति हमारी सोच क्यों नही स्मार्ट हो रही ।

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