Thursday, October 1, 2015

हमारे गांव क्यों पिछड रहे हैं

   
  शिक्षा एक ऐसा पैमाना है जिससे कहीं हुए विकास को समझा जा सकता है ,शिक्षा जहाँ जागरूकता लाती है वहीं मानव संसाधन को भी विकसित करती है |इस मायने में शिक्षा की हालत गाँवों में ज्यादा खराब है |वैसे गाँव की चिंता सबको है आखिर भारत गाँवों का देश है पर क्या सचमुच ? गाँव शहर  जा रहा है और शहर का बाजार गाँव में नहीं  आ रहा है नतीजा गाँव की दशा आज भी वैसी है जैसी आज से चालीस- पचास साल पहले हुआ करती थी सच ये है कि भारत के गाँव आज एक दोराहे पर खड़े हैं एक तरफ शहरों की चकाचौंध दूसरी तरफ अपनी मौलिकता को बचाए रखने की जदोजहदपरिणामस्वरुप  भारत में ग्रामीण अनपढ़ लोगों की संख्या घटने की बजाय बढ़ रही है|पिछले 2011 के जनगणना के आंकड़ों के मुकाबले भारतीय ग्रामीण निरक्षरों की संख्या में 8.6 करोड़ की और बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है|ये आंकड़े सामाजिक आर्थिक और जातीय जनगणना (सोशियो इकोनॉमिक एंड कास्ट सेंसस- एसईसीसी) ने जुटाए हैं|महत्वपूर्ण  है कि एसईसीसी ने 2011 में 31.57 करोड़ ग्रामीण भारतीयों की निरक्षर के रूप में गिनती की थी| उस समय यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा थी|ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक़, 2011 में निरक्षर भारतीयों की संख्या 32.23 प्रतिशत थी जबकि अब उनकी संख्या बढ़कर 35.73 प्रतिशत हो गई है|साक्षरों के मामले में राजस्थान की स्थिति सबसे बुरी है यहां 47.58 (2.58 करोड़) लोग निरक्षर हैं|इसके बाद नंबर आता है मध्यप्रदेश का जहां निरक्षर आबादी की संख्या 44.19 या 2.28 करोड़ है.बिहार में निरक्षरों की संख्या कुल आबादी का 43.85 प्रतिशत (4.29 करोड़) और तेलंगाना में 40.42 प्रतिशत (95 लाख) है|गाँवों में निरक्षरता के बढ़ने के कई आयाम हैंगाँव की पहचान उसके खेत और खलिहानों और स्वच्छ पर्यावरण से है पर खेत अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं भारत के विकास मोडल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह गाँवों को आत्मनिर्भर बनाये रखते हुए उनकी विशिष्टता को बचा पाने मे असमर्थ रहा है यहाँ विकास का मतलब गाँवों को आत्मनिर्भर न बना कर उनका शहरीकरण कर देना भर रहा है|विकास की इस आपाधापी में सबसे बड़ा नुक्सान खेती को हुआ है |
                      भारत के गाँव हरितक्रांति और वैश्वीकरण से मिले अवसरों के बावजूद खेती को एक सम्मानजनक व्यवसाय के रूप में स्थापित नहीं कर पाए|इस धारणा का परिणाम यह हुआ कि छोटी जोतों में उधमशीलता और नवाचारी प्रयोगों के लिए कोई जगह नहीं बची और खेती एक बोरिंग प्रोफेशन का हिस्सा बन भर रह गयी|गाँव खाली होते गए और शहर भरते गए|इस तथ्य को समझने के लिए किसी शोध को उद्घृत करने की जरुरत नहीं है गाँव में वही युवा बचे हैं जो पढ़ने शहर नहीं जा पाए या जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं हैदूसरा ये मान लिया गया कि खेती एक लो प्रोफाईल प्रोफेशन है जिसमे कोई ग्लैमर नहीं है |शिक्षा रोजगार परक हो चली है और गाँवों में रोजगार है नहीं नतीजा गाँव में शिक्षा की बुरी हालत|
                        सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून तो लागू कर दिया है| लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी बात यानि ग्रामीण सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारने पर अब तक न तो केंद्र ने ध्यान दिया है और न ही राज्य सरकारों ने| ग्रामीण इलाकों में स्थित ऐसे स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है| जो मौलिक सुविधाओं और आधारभूत ढांचे की कमी से जूझ रहे हैं| इन स्कूलों में शिक्षकों की तादाद एक तो जरूरत के मुकाबले बहुत कम है और जो हैं भी वो पूर्णता प्रशिक्षित  नहीं है| ज्यादातर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों का अनुपात बहुत ऊंचा है. कई स्कूलों में 50 छात्रों पर एक शिक्षक है| यही नहींसरकारी स्कूलों में एक ही शिक्षक विज्ञान और गणित से लेकर इतिहास और भूगोल तक पढ़ाता है. इससे वहां पठन-पाठन के स्तर का अंदाजा  लगाना मुश्किल नहीं है| जहाँ स्कूलों में न तो शौचालय है और न ही खेल का मैदान

अमर उजाला कॉम्पेक्ट 01/10/15 को प्रकाशित 

14 comments:

Naincy Kashyap said...

sabse pehle logo ko apni soch ko badalna hoga .villages k schools m ladkiya padhne isliye nhi jati kyonki vahan toilets nhi h or vahi doosri taraf unke parents ladki per paisa isliye nhi lagate ki are ye to shadi k layak ho gyi.aaisi hi gambhir halat sarkari schools ki bhi h jahan peena k saf pani nhi h toilets nhi h baithne ko seat nhi h or sarkari school m teacher kabhi aate bhi h to sare subjects ek hi teacher padhte h sarkari schools k teachers apne bache ko sarkari schools m nhi balki private schools m dalte h jisse unko in samasyayo k samna na krna padhe. shaher m padhate h .Jin logo k pas thoda bhi paisa h vo log turant shaher ki taraf baghte hai.
or vahi log villages m h jo kisi kabil nhi h...

Khan Kajal said...

All across the Indian globe condition of our villagers is alike, it's deteriorated.this post is an eye opener and deserves to be shared..

Karishma Lalwani said...

Very true lines said beautifully. Education should be made must for all and villagers should be provided with proper facilities. Only then there will be no need to migrate to urban area.

Unknown said...

Bcz sir sara devlpment sif city me hoo rha hi or villages me koi dhyan nhi dey rha ...

Garima Bhatt said...

जैसा की गांधी जी ने कहा है की भारत की आत्मा गावों में निवास करती है। लेकिन आज के इस भौतिक युग में गावों के लोग भी शहर में रहते है और जो बचे है गांवो में वो शहर आने की तलाश में है। कुछ गावों की हालत तो आज भी बहुत दयनीय है। जहा पर आज भी सिर्फ रूढ़ियों और अंधविश्वासों को मानते है।

anam kidwai said...

One of the problems which has caused lop sided development of the country is the ideology of uniformity. The kind of development model that is attempted to being copied is to an extent capitalistic. With the onset of FDI and number of MNC's, the whole concentration is on profit making and therefore elimination of middlemen workers. Somehow India has got confused between Nehru's socialist country and Modi's capitalistic ideas.
Probably that's why the villages have been lagging behind in order to compete with fast urban metropolitan cities.

ANKIT Yadav said...

my answer is village is good place green and nature area , so government is encourage for agriculture and farmer but construct building what different in village and city .village area so encourage for only on green life ..... but it is reality that our villages need more and more from our government....

meghna singh said...

Quality and access to education is the major concern in rural schools as there are fewer committed teachers, lack of proper text books and learning material in the schools.Parental illiteracy is another cause for lack of interest to become literates. Lack of motivation on the part of teachers, who generally are academically low- qualified and have chosen this profession as a last resort, is a serious problem.

Sakshi Bhargava said...

Education develops awareness and human resources. However in a country like India, wherein 70% of the population still lives in villages; it is obvious that villages are approaching the city but the urban market is not reciprocating in a meticulous manner towards the rural one.
The present development policy should work towards the making of a self reliant village and not the urbanization of that area in particular.

varun said...

firstly there is a problem in villages is community (cast),,, children who belongs to high community have rights to study and other work,,,

APARNA DIXIT said...

NOT ONLY THINKING NOR ONLY EVILS MAKES VILLAGE UNDERDEVELOPED BUT IT IS THE PATHETIC MALE DOMINATING SOCIETY WHICH RESTRICTS THE DEVELOPEMENT

Navneet verma said...

BHARAT GAANVON KA DESH HAI,HAMARE DESH K SARVAGEEN VIKAAS K LIYE AAVSYAK HAI KI GAANVON KA VIKAS SAMPURNA KSHMTA K SAATH SABHI KSHETRON ME KIYA JAAYE. GRAMEEN VIKAS K LIYE SABSE AHAM BAAT HAI KI SHIKSHA KA VIKAS PURJOR TAREEKE SE EVAM IMAANDAARI K SAATH KARNA HOGA TATHA RAJYA EVAM KENDRA SARKAARON K SAATH-SAATH NAAGRIKON KO BHI APNI JIMMEDAARIYON KO SAMAJH KAR USKA ANUPALAN KARNA HOGA TABHI GRAM VIKAS SAMBHAV HOGA.

Suraj Verma said...

हमारी सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए । गॉंवो के विकास से ही देश का विकास होगा। और इसके लिए जरुरी है की गॉंवो मे शिक्षा,बिजली,विद्यालय ,आदि के विकास पर सरकार को बल देना चाहिए । तभी गांव विकसित होंगे ।

aditya singh said...

Agar log apni thodi indriyon pe kabu kr le tho gaon kya sehar bi sudhar jayega. seher aur gaon dono ka hi bht mehaittva hai. ye sakar ka concept issi liye aya tha ki hmko ek behtar samaj ya behtar jeevan jeene ka avsar mile. agar log apne andar ke lalach ko tyag de aur samvidhan me jo jo baat likhi hai uska puri tarha se palan kre tho gaon ka bi vikas ho jayega. aur kyon kehta hai ki sehero ki halat bht acchi hai, haalat dono hi jaghe chintajanak hai

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