Wednesday, December 9, 2015

बदलता रहता है जिन्दगी का मौसम

सर्दियों का मौसम आ गया आप भी सोच रहे होंगे की मै ऐसी  कौन सी नयी बात बता रहा हूँ| गर्मियों के बाद जाडा ही आता है और ये तो हमेशा से होता आया है इस जाडे के मौसम में रजाई लपेटे हुए मैंने फिल्मी गानों से मौसम के फलसफे को समझने की कोशिश की है  अब इस सर्दी के मौसम को ही लीजिये न, ये मौसम बहुत ही अच्छा माना जाता है सेहत खान -पान और काम काज के लिहाज़ से तो यूँ कहें कि मौसम गुनगुना रहा है गीत खुशी के गा रहा है (फ़िल्म :सातवां आसमान ) भले ही ये सर्दी का मौसम हो लेकिन इसके आने से चारों तरफ़ गर्माहट आ जाती है खाने में कपडों में और रिश्तों में भी ज्यादातर शादी विवाह के कार्यक्रम जाडे में ही तो होते हैं | मौसम मस्ताना रस्ता अनजाना (फ़िल्म:सत्ते पे सत्ता) लेकिन एक बात ज्यादा महत्वपूर्ण  है कि इसी मौसम में हमें गर्मी की कमी एहसास होता है| ये मौसम का जादू है मितवा (हम आपके हैं कौन )कुदरत ने हमें हर चीज जोड़े में दी है सुख -दुख ,धरती- आकाश सर्दी-गर्मी काला -सफ़ेद और न जाने क्या क्या और सही भी है अगर दुःख न होता तो हम सुख को समझ ही न पाते और देखिये न हम इंसान धरती के मौसम के बदलने का इंतज़ार कितनी बेसब्री से करते हैं और हर मौसम का स्वागत करते हैं |अलबेला मौसम कहता है स्वागतम (फ़िल्म :तोहफा ) लेकिन जब जिन्दगी का मौसम बदलता है तो हमें काफी परेशानी होती है |आप सोच रहे होंगे की जिन्दगी का मौसम कैसे बदलता है ?जवाब सीधा है सुख दुःख पीड़ा निराशा जैसे भाव  जिन्दगी के मौसम तो ही हैं | दुनिया के मौसम का समय चक्र  निश्चित रहता है यानि परिवर्तन तो होगा लेकिन एक निश्चित समय के बाद लेकिन इससे एक बात तो साबित होती है बदलाव का दूसरा नाम मौसम है | मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुस्कयेगा (फ़िल्म :शायद )जिन्दगी का मौसम थोड़ा सा अलग है इसके बदलने का समय  निश्चित  नहीं है और समस्या  यहीं से शुरू होती है जब हम किसी चीज के लिए मानसिक रूप से तैयार  न हों और वो हो जाए जिन्दगी का मौसम कब बदल जाए कोई नहीं जनता ये सकारात्मक  भी हो सकता है और नकरातमक   भी |पतझड़ सावन बसंत बहार एक बरस के मौसम चार (फ़िल्म :सिन्दूर ) बारिश के मौसम में हम बरसात को नहीं रोक सकते लेकिन छाता लेकर अपने आप को भीगने से बचा सकते हैं और यही बात जिन्दगी के मौसम पर भी लागू होती है यानि सुख हो या दुख कुछ  भी हमेशा के लिए नहीं होता है यानि जिन्दगी हमेशा एक सी नहीं रहती है इसमे उतार चढाव आते रहते हैं मुद्दा ये है कि जिन्दगी के मौसम को लेकर हमारी तैयारी कैसी है|
कोई भी व्यक्ति    हमेशा ये दावा नहीं कर सकता है कि वो अपनी जिन्दगी में हमेशा सुखी या दुखी रहा है या रहेगा परिवर्तन  को कोई रोक नहीं सकता सुख के पल बीत गए तो दुःख के पल भी बीत जायेंगे |अमेरिका के प्रेसीडेंट ओबामा जिस दिन चुनाव जीते उसके एक दिन पहले उनकी नानी का निधन हो गया जिसे वो बहुत चाहते थे | दुख के साथ सुख भी आता है| अगर आपके साथ बहुत बुरा हो रहा है तो अच्छा भी होगा भरोसा रखिये|ऐसा हमारी आपकी सबकी जिन्दगी में होता है लेकिन हम सत्य को स्वीकार  करने की बजाय भगवान् और किस्मत न जाने किस किस को दोष देते रहते हैं अगर हम इसको मौसम के बदलाव की तरह स्वीकार  कर लें तो न कोई स्ट्रेस रहेगा और न ही कोई टेंशन लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है जब हमारे साथ सब अच्छा हो रहा होता है तो हम भूल जाते हैं कि जिन्दगी संतुलन का नाम है और संतुलन तभी होता है जब दोनों पलडे बराबर हों लेकिन हम हमेशा सिर्फ़ सुख की आशा करते है लेकिन बगैर दुख को समझे सुख का क्या मतलब जिन्दगी की  दौड़ में पास होने के एहसास को समझने के लिए फ़ेल होने के दर्द को समझना भी जरूरी है | जहाज़ सबसे सुरक्षित पानी के किनारे होता है लेकिन उसे तो समुन्द्र के लिए तैयार किया गया होता है बिना लड़े अगर आप जीतना चाह रहे हैं तो आज की दुनिया में आप के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि जिन्दगी का मौसम बहुत तेजी से बदल रहा है जैसे हम हर मौसम के हिसाब से अपना रहन सहन बदल लेते हैं वैसे हमें जीवन में आने वाले हर बदलाव का स्वागत करना चाहिए |क्योंकि मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुस्कयेगा (फ़िल्म :शायद)
तो इस बदलते मौसम का स्वागत मुस्कराते हुए करिए फ़िर मुलाकात होगी
 प्रभात खबर में 09/12/15 को प्रकाशित 

4 comments:

Udan Tashtari said...

Behatreen!

Zubi Husain said...

but unlike the weather, life' seasons are more or less in our hands. if, we consider that humans are a product of their own choices and every action has a consequence.

Suraj Verma said...

जब तक मन में दुर्बलता है
दुख से दुख, सुख से ममता है।
पर सदा न रहता जग में सुख
रहता सदा न जीवन में दुख।
छाया-से माया-से दोनों
आने-जाने हैं ये सुख-दुख।
मन भरता मन, पर क्या इनसे
आत्मा का अभाव भरता है!
बहुत नाज था अपने सुख पर
पर न टिका दो दिन सुख-वैभव,
दुख? दुख को भी समझा सागर
एक बूँद भी नहीं रहा अब!
देखा जब दिन-रात चीड़-वन
नित कराह आहें भरता है!
मैंने दुख-कातर हो-होकर
जब-जब दर-दर कर फैलाया,
सुख के अभिलाषी मन मेरे
तब-तब सदा निरादर पाया।
ठोकर खा-खाकर पाया है
दुख का कारण कायरता है।
सुख भी नश्वर, दुख भी नश्वर
यद्यपि सुख-दुख सबके साथी,
कौन घुले फिर सोच-फिकर में
आज घड़ी क्या है, कल क्या थी।
देख तोड़ सीमायें अपनी
जोगी नित निर्भय रमता है।
जब तक तन है, आधि-व्याधि है
जब तक मन, सुख दुख है घेरे;
तू निर्बल तो क्रीत भृत्य है,
तू चाहे ये तेरे चेरे।
तू इनसे पानी भरवा, भर
ज्ञान कूप, तुझमें क्षमता है।
सुख दुख के पिंजर में बंदी
कीर धुन रहा सिर बेचारा,
सुख दुख के दो तीर चीर कर
बहती नित गंगा की धारा।
तेरा जी चाहे जो बन ले,
तू अपना करता-हरता है।

Arun Pratap said...

mausam jab jb badlta hai to sbhi ke man dol uthta hai. mano ki mor jaisa man dol rha ho.anewale mausam ka swagat karte hai.theek usi prakar hmare jivan kal ke daur badlte hai.ydi mh yah shoch le ki apne jivan ko ek hi jaisa mahuil ke prives rkhe rhe to ye ho nhi sakta.kyoki jivan bhi mausam ki tarh hi badlta rhata hai.jaise........sukh-dukh,ucha-nicha,adi ke tathy hai.es prakar hm jindgi ko badlte privesh me anusar badlte rahte hai.aur es prakar indgi ka communication bna rhta hai.

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