Friday, April 1, 2016

डिजीटल तकनीक को चुनौती देते अखबार

भारत वास्तव में विचित्रताओं का देश है |एक तरफ जब दुनिया के तमाम देश डिजीटल कंटेंट की बढ़त के कारण समाचार पत्रों गकी प्रसार संख्या में आयी गिरावट से जूझ रहे हैं|अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में गिरावट की यह दर ओडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन के आंकड़ों के अनुसार लगभग दस प्रतिशत वार्षिक है|वहीं भारत का समाचार पत्र उद्योग फिक्की के पी एम् जी की एक रिपोर्ट के अनुसार अगले तीन साल तक आठ प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि से बढेगा |इस वक्त यह उद्योग तीस हजार करोड़ मूल्य का है |फिच रेटिंग की भारतीय इकाई इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों का बाजार 2017 तक दस से बारह प्रतिशत की दर से बढेगा और यह वृद्धि अंग्रेजी समाचार पत्रों के मुकाबले ज्यादा होगी |भारत की कुल जनसंख्या में  मात्र दस प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी बोलते हैं जिससे भारत की विशाल जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा अपनी सूचना जरूरतों की पूर्ति के  लिए हिन्दी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के समाचार पत्र पर निर्भर रहता है| इसमें हिन्दी का सबसे बड़ा बाजार है जो लगभग  उनतालीस प्रतिशत है और अंग्रेजी भाषा का लगभग सोलह प्रतिशत है |क्षेत्रीय भाषाओँ के समाचार बाजार बढ़ने का पहला  बड़ा कारण अंग्रेजी के पाठकों के बाजार का स्थिर हो जाना और नए जुड़ते अंग्रेजी के पाठकों का डिजीटल सामाग्री को प्राथमिकता देना है|आम तौर पर अंग्रेजी भाषा का पाठक आर्थिक रूप से क्षेत्रीय भाषाओँ के पाठकों के मुकाबले ज्यादा सम्रद्ध होता है ऐसे में अंग्रेजी भाषा के नए पाठक के पास प्रिंट सामग्री के मुकाबले डिजीटल सामग्री का विकल्प ज्यादा सुलभ होता है,क्योंकि डिजीटल सामग्री के लिए डिजीटल उपकरणों (कंप्यूटर,लैपटॉप,स्मार्टफोन )का होना आवश्यक है जो भारतीय परिस्थितियों में अभी भी एक महंगा माध्यम है इसलिए अंग्रेजी भाषा के पाठक के पास क्षेत्रीय भाषाओँ के पाठकों के मुकाबले मुद्रित समाचार माध्यमों  से मुंह मोड़ने का पर्याप्त कारण उपलब्ध रहता है|दूसरा कारण भारत की साक्षरता दर का निरंतर बढ़ना और हिन्दी सहित दूसरी क्षेत्रीय भाषाओँ के नए पाठकों का उदय भी है|भारत के ग्रामीण इलाकों में साक्षरता की दर जो 1991 में 45 प्रतिशत थी वह 2011 में बढ़कर उनहत्तर प्रतिशत हो चुकी है|भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले नव साक्षर अपनी सूचना जरूरतों की पूर्ति के लिए अपनी सामजिक और आर्थिक स्थित के कारण हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ को ही प्राथमिकता देता हैगूगल के आंकड़ों के मुताबिकअभी देश में अंग्रेजी भाषा समझने वालों की संख्या 19.8 करोड़ हैऔर इसमें से ज्यादातर लोग इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। तथ्य यह भी है कि भारत में इंटरनेट बाजार का विस्तार इसलिए ठहर-सा गया हैक्योंकि सामग्रियां अंग्रेजी में हैं। आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट पर 55.8प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में हैजबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती हैऔर दुनिया के मात्र 21 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी की समझ रखते हैं। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं मेंजो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैंइंटरनेट सामग्री क्रमशः 0.8 और 0.1 प्रतिशत ही उपलब्ध है। ज्यादातर अंग्रेज़ी के समाचार पत्रों में शहरों के समाचारों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता  क्योंकि उनके पाठकों का बड़ा हिस्सा शहरों में ही रहता है |
 इण्डिया रेटिंग की इस रिपोर्ट के अनुसार ई कॉमर्स आने वाले वक्त में अखबारी विज्ञापनों  का बड़ा जरिया बनेंगे क्योंकि इनके बाजार में बड़ी वृद्धि होनी है और देश की ग्रामीण जनसँख्या को अपने बारे में बताने के लिए इन ई कॉमर्स कम्पनियों को ऐसे माध्यम की जरुरत पड़ेगी जो पाठकों की अपनी भाषा में हो ऐसे में हिन्दी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के अखबार एक अच्छा विकल्प साबित होंगे जिनके माध्यम से वो पाठकों को अपने प्रथम उपभोक्ता में तब्दील कर पायेंगे|एसोचैम के अनुसार भारत में ई कॉमर्स का बाजार 2016 में  पैंसठ प्रतिशत की दर से बढेगा जिससे ढाई लाख करोड़ रुपये की आय होगी जिसका एक बड़ा हिस्सा हिन्दी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के समाचार पत्रों में विज्ञापनों पर खर्च किया जाएगा| विज्ञापनों  पर जितना ज्यादा खर्च किया जाएगा उतना ही  क्षेत्रीय भाषाओँ के समाचार पत्र समर्द्ध होंगे और नए केन्द्रों से समाचार पत्रों का प्रकाशन होगा जिसमें भारत के वे क्षेत्र भी शामिल होंगे जिनकी समस्याओं की या तो आज तक सुनवाई नहीं हुई है या बड़े शहरों की समस्याओं  के आगे उनकी समस्याएं समाचार पत्रों की प्राथमिकता में नहीं आ पाती हैं |आज के डिजीटल दौर में बस्तर में जिस तरह क्षेत्रीय पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है वो भारत में क्षेत्रीय भाषा की बढ़ती ताकत का उदहारण है कि मौजूदा दौर में समाचार पत्रों की भूमिका बढी है |इस प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ में है कि क्षेत्रीय भाषाओं का बढ़ता बाजार कब तक डिजीटल तकनीक को चुनौती देता रहेगा |
अमर उजाला में 01/04/16 को प्रकाशित लेख 

2 comments:

Shireen Ansari said...

भारत में अख़बार की लोकप्रियता का ये भी एक कारण है कि इसमें तकनीक का उपयोग ज़्यादा नहीं होता और न ही स्मार्टफोन या कम्प्यूटर की आवश्यकता होती है किसी भी ख़बर को पढ़ने के लिए।

Suraj Verma said...

सर मेरा मानना है, कि हमारी आज की जनरेशन काफी हद तक जागरूक है, और chetriye भाषा को महत्व दे रही है यही वजह है कि हमारे अखबार ,डिजिटल तकनीक को चुनौती दे रही है ,और भविष्य में डिजिटल तकनीक को चुनौती देती रहेगी।

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