Thursday, April 7, 2016

गाँव को गाँव ही रहने दें

गाँव तो  जिन्दा हैं पर गाँव की संस्कृति मर रही है गाँव शहर  जा रहा है और शहर का बाजार गाँव में आ रहा है पर उस बाजार में गाँव की बनी हुई कोई चीज नहीं है|सिरका,बुकनू(नमक और विशेष मसालों का मिश्रण)पापड जैसी चीजों से सुपर मार्केट भरे हैं पर उनमें न तो गाँवों की खुशबू है न वो भदेसपन जिसके लिए ये चीजें हमारे आपके जेहन में आजतक जिन्दा हैं |सच ये है कि भारत के गाँव आज एक दोराहे पर खड़े हैं एक तरफ शहरों की चकाचौंध दूसरी तरफ अपनी मौलिकता को बचाए रखने की जदोजहद|विकास और प्रगति के इस खेल में आंकड़े महत्वपूर्ण हैं भावनाएं संवेदनाओं की कोई कीमत नहीं |वैश्वीकरण का कीड़ा और उदारीकरण की आंधी में बहुत कुछ बदला है और गाँव भी बदलाव की इस बयार में बदले हैं |गाँव की पहचान उसके खेत और खलिहानों और स्वच्छ पर्यावरण से है पर खेत अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं भारत के विकास मोडल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह गाँवों को आत्मनिर्भर बनाये रखते हुए उनकी विशिष्टता को बचा पाने मे असमर्थ रहा है यहाँ विकास का मतलब गाँवों को आत्मनिर्भर न बना कर उनका शहरीकरण कर देना भर रहा है|विकास की इस आपाधापी में सबसे बड़ा नुक्सान खेती को हुआ है |भारत के गाँव हरितक्रांति और वैश्वीकरण से मिले अवसरों के बावजूद खेती को एक सम्मानजनक व्यवसाय के रूप में स्थापित नहीं कर पाए|इस धारणा का परिणाम यह हुआ कि छोटी जोतों में उधमशीलता और नवाचारी प्रयोगों के लिए कोई जगह नहीं बची और खेती एक बोरिंग प्रोफेशन का हिस्सा बन भर रह गयी|गाँव खाली होते गए और शहर भरते गए|इस तथ्य को समझने के लिए किसी शोध को उद्घृत करने की जरुरत नहीं है गाँव में वही युवा बचे हैं जो पढ़ने शहर नहीं जा पाए या जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं हैदूसरा ये मान लिया गया कि खेती एक लो प्रोफाईल प्रोफेशन है जिसमे कोई ग्लैमर नहीं है फिर क्या गाँव धीरे धीरे हमारी यादों का हिस्सा भर हो गए जो एक दो दिन पिकनिक मनाने के लिए ठीक है पर गाँव में रहना बहुत बोरिंग है फिर क्या था गाँव पहले फिल्मों से गायब हुआ फिर गानों से धीरे धीरे साहित्य से भी दूर हो गया|समाचार मीडिया में वैसे भी गाँव सिर्फ अपराध की ख़बरों तक सीमित और इस स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है

खुली अर्थव्यवस्था,विशाल जनसँख्या जो खर्च करने के लिए तैयार है  और तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था ये सारी चीजें एक ऐसे भारत का निर्माण कर रही हैं जहाँ व्यापार करने की अपार संभावनाएं हैं भारत तेजी से बदल रहा है पर आंकड़ों के आईने में अभी भारत बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के व्यापार के लिए एक आदर्श देश नहीं बन पाया है |मॉर्गन स्टेनली की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के शहर  अभी भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं |इस रिपोर्ट में भारत के दौ सौ शहरों का अध्ययन किया गया है रिपोर्ट में शामिल शहरों में छाछ्ट प्रतिशत के पास अभी भी कोई सुपर मार्केट नहीं है |कोल स्टोरेज की  पर्याप्त संख्या में न होने के कारण अधिकतर भारतीय अपने दैनिक जीवन से जुडी हुई चीजों की खरीद फरोख्त आस पास की दुकानों से खरीदते हैं |पचहतर प्रतिशत भारतीय शहरों (रिपोर्ट में शामिल शहर )में कोई बेहतरीन पांच सितारा सुविधाओं से युक्त होटल नहीं है|
देश की अर्थव्यवस्था तभी तेज गति से दौड़ेगी जब निवेश तेजी से होगा जिससे उत्पादन बढेगा और विदेशी निवेश तभी तेजी से बढेगा जब पर्याप्त आधारभूत सुविधाओं की उपलब्धता होगी पर हमारे शहर आवश्यक आधारभूत सुविधाओं के अभाव का सामना कर रहे हैं|अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सरकार ने मेक इन इण्डिया और स्मार्ट सिटी परियोजना पर काम शुरू किया|मेक इन इण्डिया कार्यक्रम का उद्देश्य देश में सौ मिलीयन रोजगार का स्रजन करना और देश की जी डी पी में उत्पादन योगदान को सत्रह प्रतिशत से बढ़ाकर पच्चीस प्रतिशत करना है |कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब पर पर इस कार्यक्रम की सफलता निर्भर करती है|सबसे पहला है आधारभूत ढांचे का विकास एक ऐसी जगह जहाँ से व्यवसाय का विकास किया जा सके जिसमें शामिल है सडकबिजली और रेल व्यवस्था का नेटवर्क,बहुत प्रयास के बावजूद भारत अभी भी पर्याप्त सड़कें नहीं बना पाया हैबंदरगाहों की संख्या और रेल नेटवर्क का विस्तार भी उस गति से नहीं हुआ है जिसकी उद्योग जगत को दरकार है |दो साल पहले उत्तर पूर्व राज्य के किसानों को अपनी शानदार फसल को औने पौने दाम पर इसलिए बेच देना पड़ा था क्योंकि पर्याप्त परिवहन सुविधा न होने के कारण उस फसल को भारत के दुसरे राज्यों में भेजा जाना संभव नहीं था|चीन से समुद्र के रास्ते मुंबई  माल आने में बाढ़ दिन लगते हैं वहीं उसी सामान को सडक से उत्तरांचल पहुँचने में बीस दिन लग जाते हैं |तथ्य यह भी है कि आधारभूत सुविधाएँ एक दिन में विकसित नहीं हो सकती इसके लिए सरकार को प्रयास करना होगा और निवेश के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देना चाहिए और यह निवेश महज आर्थिक न होकर सामाजिक और ग्रामीण भी होना चाहिए|आर्थिक जगत टैक्स सुधारों का लम्बे समय से इन्तजार कर रहा है जिसमें समान वस्तु एवं सेवा करइंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राईट्स पालिसी और बैंकरप्सी कोड जैसे अहम् नियम शामिल हैं जिन पर लम्बे समय से फैसला लंबित है |पिछले साल विश्व बैंक की इज ऑफ़ डूईंग बिजनेस इंडेक्स में भारत बारह  स्थान चढ़कर एक सौ तीसवें नंबर पहुंचा पर यह स्थान मैक्सिको और रूस जैसे देशों से काफी पीछे है जो क्रमश: अड़तीस और इक्यावन स्थान पर हैं और जहाँ व्यसाय शुरू करने का अवसर भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा सरल है इस इंडेक्स में हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान हमसे बस थोड़ा ही पीछे है जो एक सौ अड़तीसवें स्थान पर है |‌‍‍‌‍ एक और चुनौती जिससे भारत जूझ रहा है विकास की इस दौड़ में गाँवों के पीछे छूट  जाने का भयमेक इन इण्डिया में होने वाला अधिकाँश निवेश शहर केन्द्रित है या उन जगहों पर होगा जहाँ आधारभूत ढांचा पहले से उपलब्ध हैनिवेश की पहली शर्त आधारभूत ढांचा होने से भारत के गाँव एक बार फिर  आगे बढ़ने से वंचित रह जायेंगे जिस तेजी से शहर विकसित हो रहे हैं क्योंकि उनकी क्रय शक्ति कम है जिससे निजी निवेशक गाँव में निवेश करने से हिचकते हैं और आधारभूत ढांचे का सबसे बुरा हाल गाँवों में ही हैऐसे में उनके विकास की जिम्मेदारी एक बार फिर सरकार भरोसे रह जायेगीइस कार्यक्रम में गाँवों की अनदेखी की जा रही है सारा जोर शहरों पर है|शहर केन्द्रित विकास का यह मोडल भारत की परिस्थितियों में कितना सफल होगा  इसका फैसला होना अभी बाकी है क्योंकि विकास का तात्पर्य समेकित विकास से है न कि सिर्फ शहरों के विकास से हैमेक इन इंडिया कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार व्यवस्था गत खामियों को कितनी जल्दी दूर करती है और आधारभूत सुविधाओं को कितनी जल्दी उपलब्ध कराती है 
राष्ट्रीय सहारा में 06/04/16 को प्रकाशित 

12 comments:

Shireen Ansari said...

गांव के विकास के लिए बेहतर तो यही होगा कि सरकार जो योजनाएँ बनाती है वह केवल काग़ज़ों तक ही सीमित न रहे, बल्कि उसका लाभ गांव को असल में मिले। जिस से देश की उत्पादकता दर बढ़ेगी। और तो और किसानों की आत्महत्या और उनके पलायन करने जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं।

Shireen Ansari said...
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Shireen Ansari said...

गांव के विकास के लिए बेहतर तो यही होगा कि सरकार जो योजनाएँ बनाती है वह केवल काग़ज़ों तक ही सीमित न रहे, बल्कि उसका लाभ गांव को असल में मिले। जिस से देश की उत्पादकता दर बढ़ेगी। और तो और किसानों की आत्महत्या और उनके पलायन करने जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं।

Shireen Ansari said...

गांव के विकास के लिए बेहतर तो यही होगा कि सरकार जो योजनाएँ बनाती है वह केवल काग़ज़ों तक ही सीमित न रहे, बल्कि उसका लाभ गांव को असल में मिले। जिस से देश की उत्पादकता दर बढ़ेगी। और तो और किसानों की आत्महत्या और उनके पलायन करने जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं।

Aanya Jain said...

nowadays, people are busy in building cemented trees( buildings and malls) and ruining the greenry. now, they are attacking the rural areas and the lands there. the farmers are not getting the land for their agricultural purposes since few builders grab their land either by force or by foul deed. therefore there must some programs in order to develop villages without ruining its authenticity.

Aanya Jain said...

nowadays, people are busy in building cemented trees( buildings and malls) and ruining the greenry. now, they are attacking the rural areas and the lands there. the farmers are not getting the land for their agricultural purposes since few builders grab their land either by force or by foul deed. therefore there must some programs in order to develop villages without ruining its authenticity.

harshit singh said...

goverment ko gavo ko badalney say jada unko unki mulbhut suvidha deyney par bal deynaa chaiye.agar sab desha hathiyar banaye gay to khana kon banaye gaa.

Suraj Verma said...

जिस देश की अधिकतर आबादी गांव में निवास करती हो ,और फिर भी गांव की ऐसी दशा । सच तो ये है की आज़ादी के बाद से किसी ने भी गांव के विकास पर जोर नहीं दिया। वादे तोह बहुत हुए लेकिन कागज़ों पर। जहाँ विकास की जरुरत नहीं वहां विकास के ऊपर विकास हो रहा है। और जहां जरुरत है वहाँ बिलकुल भी नहीं हो रहा । इस विषय पर सोचना चाहिए।

vanya dixit said...

गाँव का नाम सुनते ही एक सोंधी मिट्टी की खुश्बू का एहसास होने लगता है ! गाँव से हमारी संस्क्रति होती है और परम्परायें भी गाँव से ही बनतीं है ! भाग्यवान होते हैं वे लोग जिनके पास गाँव होता है ! यदि हम अपने गाँव को आर्दश गाँव बनाने का प्रयास करेंगे तो हमें यूँ शहर की ओर मुख करके भागने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ! आज हम अपने भारत के गाँवों की वास्तविकता को बारीकी से समझ पा रहे हैं आपकी पोस्ट बेहद सराहनीय है सर !

Prashant Tiwari said...

सरकार विभागों व प्रशासन पर कड़े नियम लागू करे कि हर किसान, हर आम आदमी को उसका हक मिले। गांव से शहरों और शहरों से अन्य राज्यों या देश-विदेशों की ओर रूख करने वाले अपनी जन्मभूमि व अपने देश का गौरव बढ़ाए। विदेशों या बड़े शहरों में जाने से बड़प्पन नहीं है। मुश्किलें और बुराई भले ही रास्ता रोकेंगी लेकिन अगर अच्छे भी बूरे ही बन गए तो अच्छे और बूरे में फर्क क्या रहेगा? वैसे ही सब शहरों, देशों व विदेशों की ओर रूख करेंगे तो वो गांवों के हरे-भरे खेत, माटी की खुशबू कहां होगी?

लौटना तो वतन ही होगा क्योंकि अपनी भूमि अपनी ही होती है वो चाहे गांव की हो या फिर देश के किसी भी कोने की। वक्त रहते नहीं समझे तो बाद में पछतावे के इलावा हमारे पास कुछ नहीं रहेगा। क्योंकि हम जैसा बोएंगे, काटेंगे भी तो वो ही। सभी तो सरकारी नौकरी में नहीं लगेंगे, सभी विदेशों में बेहतरीन पदों पर नहीं पहुंचेंगे क्योंकि सबकी अपनी हदें हैं। उडऩा जरूरी है लेकिन अपने पंखों के हौंसलों को देखकर उड़ान भरने में ही भलाई है, किसी की देखा-देखी करके नहीं। आजकल सब एक-दूसरे की भागम-भाग में लगे हैं। अपनी मेहनत, अपनी प्रतिभा सही जगह इस्तेमाल करने की बजाए दूसरों की देखा-देखी में जो है उसे ही खत्म करने पर तूल दे रहे हैं। हमें संभलना होगा और समझना होगा कि हम जहां है वहां होना भी किसी फक्र से कम नहीं। सोचने का विषय है और वो भी गंभीरता से।

Ami Nisha said...

Firstly we all have to change our thinking to make villages as our cities because mostly things for our living are gained from villages that is wheat rice vegetables and so on.we should concentrate on the culture and lifestyle of these villages which is always pending in papers and the condition of these villages are worse which need proper attention.

chaudhary king arjan said...

mai bachpan me jab nani ke ghar jata tha to mujhe nani non tel bhaat khilati thi isme namak halka tel aur chawl ko mix karke banate hai ...mujhe bahut acha lagta tha ...but jab mai wapass ghar atta tha aur mummy se magta tha to mummy gussa karti thi ki ...ye sab jab mahman aya kare to na magga karo...tab to mai chota tha to zid karta tha but ab mai bada ho gaya hu samjh a gayi hai fir bhi..logo ke samne sharam se ni khata hu.. lakin jab man karta hai mujhe to samaj se chup kar ghar me khata hu kuki majbur kar diya hai society ne mujhko ..ARJAN CHAUDHARY

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