Friday, May 5, 2017

अब मौसम की खुशियाँ कहाँ

गर्मी आ गयी हैं पर इन गर्मियों में वो कशिश नहीं दिखती जो हमारे बचपन में दिखती थी न अब वैसी लू चलती है न अब गर्मी आने की वैसी तैयारी होती है जैसी हमारे जमाने में होती थी |गर्मी के आने से पहले सुराही या घड़ा खरीदा जाता था हम पिता जी की उंगली पकड़ के मंडी जाते थे जहाँ पिता जी न जाने उन घड़ों में क्या परखते थे ये हम आज तक न समझ पाए कि उन दिनों एक जैसे घड़े में क्या देखते थे |तब कूलर विलासिता की चीज थे एसी क्या होता है लोग जानते भी नहीं थे पर उन गर्मियों का इन्तजार हम साल भर करते थे शाम होते ही छत पर पहुँच जाना और उसे पानी डाल कर ठंडा करने की कोशिश करना क्योंकि तब पूरा परिवार सारी रात  उसी छत पर काटता था |सुबह सत्तू (चने का आटा) का नाश्ता किसी मैगी ,ब्रेड से ज्यादा लुभावना लगता था |हमारा शहर आज की तरह मेट्रो नहीं था वो कुछ कस्बाई रंगत लिए हुए था यानि हमारे माता पिता जो ठेठ गाँव से निकले थे और हम जैसे लोग जो उस शहर में पैदा हुए थे दोनों की दुनिया खुबसूरत थी न उन्हें शहर  की कमी खलती थी न हमें गाँव की |अब हर घर में एसी है सत्तू माल में बिकता है पर मेरा बेटा उसे डाउन मार्केट खाना समझता है उसे फास्ट फ़ूड  पसंद है जो अपने स्मार्ट फोन से मंगाना अच्छा लगता है |तपती धूप में वो अपने पिता के साथ कुछ मीटर भी नहीं चल सकता क्योंकि उसकी त्वचा खराब हो जायेगी |जंगल जलेबी उसने देखी नहीं क्योंकि वो मॉल में बिकती नहीं ऐसे न जाने कितने फल जिनको खाने के लिए हम साल भर गर्मियों का इन्तजार करते थे उसके लिए उनका कोई मायने नहीं |वो चाहे अमरख हो या कैथा या फिर खट- मिट्ठा फालसा जैसे फल जो हम जैसे गरीब परिवारों के लिए गर्मियों को उत्सव में बदल देते थे |उन दिनों हम यही फल पाकर अपने आपको खुशनसीब समझते थे |तब सनस्क्रीन नहीं होती थी और गर्मी कितनी भी क्यों न हों रात में घर की भीगी छत मस्त नींद सुला ही देती थी |अम्बार और करौंदा के अचार खाने का जायका बना देते थे |आज घर में एसी है अम्बार और करौंदा मॉल में नहीं मिलता कभी कभार फुठ्पाथ पर दिख जाता है |कैथा खाए हुए सदियाँ बीती अब मौसम बदलना जश्न मनाने का मौका नहीं होते सारा जोर मौसम के वेग को नियंत्रित करने पर होता है |छतें गायब हो गयीं आसमान में तारे गिने दशक बीत गये अब मौसम बदलने का मतलब समझ ही नहीं आता फ्रिज का ठंडा पानी और एसी की ठंडा हवा गर्मी को  महसूस नहीं होने देते शायद इसे ही मौसम का वैश्वीकरण कहते हैं जब सारे मौसम एक जैसे लगते हैं |सुख तो बहुत है पर अब बदलते मौसम वो खुशियाँ नहीं देते जैसा हमारे ज़माने में देते थे
प्रभात खबर में 05/05/2017 को प्रकाशित 

3 comments:

ansh said...

I also believe there's a major change in climate because of increasing air conditions and it's now become a chain reaction because summers are getting hotter every season, more people are buying AC's and since there are more AC's there's more change in climate. I remember when I was a kid, whenever there was a power cut, we used to sleep on the roof and there was no fear of dengue or chikungunya from a mosquito bite, neither there were a significant number of mosquitos, increasing pollution and population are laying down foundation for much bigger problems for the future. In my free time, whenever I look at the night sky, I don't see stars anymore, that shimmering night sky which I remember from my childhood is now full of smog.

Yes, I do agree with you that now, there's a major change in weather, it may be any season, you don't feel or enjoy it as we used to do years back and we should take it seriously.

Raksha Singh said...

"वक़्त गुज़र गाया ,
उमर ढल सी गयी,
बचपन जैसे ही आया याद,
ज़िंदगी थम सी गई .."

This is indeed a beautiful article with blend of million emotions which can actually act as roller coaster ride for any 90s kid.

gyanendra Bhargava said...

हमें मौसम के विपरीत रहने की आदत होती जा रही है,इसलिए मौसम भी अपना चक्र बदल रहा है तथा उसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
मौसम से पुरानी यादों को जोड़कर लेख की खूबसूरती मौसम की तरह बढ़ जा रही है। हृदयस्पर्शी अनुभव भरा लेख है।

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