Sunday, June 25, 2017

सिक्किम यात्रा :दूसरा भाग

“बन जाखरी” जल प्रपात
गंगटोंक में एक रात बिताने के बाद अगली सुबह घूमने का कार्यक्रम शुरू हुआ पर मैं सिर्फ घूम नहीं रहा था मैं इस देश की विचित्रता को समझना चाहता था |भौगौलिक रूप से हमारी सुबह एकदम अलग हुई सामने पहाड़ों में बादलों ने डेरा डाला हुआ था और वो हमारे एकदम करीब थे |घूमने फिरने की जगह ज्यादातर एक जैसी होती हैं या तो इतिहास या प्राकृतिक या फिर मानव निर्मित कुछ अनूठी चीजें ,मैं समझना चाहता था जैसे उत्तर भारत के मैदानों में बैठकर हम अपने देश के जिन मुद्दों  के बारे में सोचते हैं क्या वाकई वो सारे देश के मुद्दे हैं या ये मुद्दे मीडिया निर्मित हैं जो एक निश्चित एजेंडे के साथ भावनाओं की चाशनी में लपेट कर हमारे सामने परोसे जाते हैं तो घूमने की शुरुआत करने से पहले बताते चलूँ सिक्किम अधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा 1975 में बना उससे पहले इसकी स्थिति भूटान जैसी थी |विचित्र किन्तु सत्य अब जरा 1975 के पहले के सिक्किम के बारे में सोचिये और अंदाजा लगाइए कि वहां के लोगों के लिए दिल्ली और वहां के निवासी कैसे होंगे |वैसे अंग्रेजों को लाख गाली दी जाए पर कम से कम हमें वो एक पूरा देश बना कर दे गए नहीं तो देश के अलग –अलग हिस्सों में अलग –अलग राजवंश शासन कर रहे थे और तब के निवासियों में भारत देश के प्रति वैसी आक्रमकता नहीं  थी जैसी आज देखने पढने को मिलती सच तो यह है देश के आधे से ज्यादा लोगोंको सच में अपने देश के बारे में कुछ पता ही नहीं है |खैर नाश्ता करके होटल से बाहर निकला तो लगा थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ यूरोप के देश में हूँ |सड़क पर कूड़ा उठाने वाली मशीन महिला सफाई कर्मियों के साथ काम पर लगी है शहर में कूड़ा डालने के लिए जगह जगह पात्र रखे हुए हैं और पूरे गंगटोक शहर में तीन दिन के प्रवास में मुझे कहीं कूड़ा और प्लास्टिक देखने को नहीं मिला |प्लास्टिक सिक्किम में बैन है या नहीं इसका पता मुझे नहीं पड़ पाया क्योंकि प्लास्टिक के लिफाफे हमारे पास थे और किसी ने हमें टोंका नहीं पर इतने साफ़ पहाड़ आपको न तो कश्मीर में मिलेंगे न उत्तराखंड में (ये दोनों जगह मेरी देखी हुई हैं ) ऐसे न जाने सवाल मेरे जहाँ में घूम रहे थे सिक्किम और और उत्तर प्रदेश दोनों भारत में हैं फिर साफ़ –सफाई को लेकर ऐसा आग्रह पूरे भारत में क्यों नहीं दिखता यहाँ लोग खुले में क्यों नहीं फारिग होते |आप को जानकार ताज्जुब होगा मुझे बताया गया कि लघुशंका भी खुले में लोग नहीं करते खासकर पहाड़ों में क्योंकि वो पूजनीय है ,मुझे अपना प्रदेश याद आया तो ऐसे न जाने कितने सांस्कृतिक सवालों से दो चार होते हुए हम निकल पड़े अपने पहले पड़ाव “बन जाखरी” जल प्रपात देखने |बन जाखरी एक ऐसा झरना जहाँ कभी कोई तांत्रिक रहता था और अपनी तंत्र विद्याओं से लोगों का इलाज करता था हमने वहां ऐसी कई गुफाएं वहां देखीं और एक गुफा में बाकयदा एक शिवलिंग भी था जिस पर काई जमी हुई थी जो इस और इशारा कर रहा था यहाँ अमूमन पूजा नहीं होती  पर वहां हमने किसी पर्यटक को पूजा करते नहीं देखा  |
गुफा में  शिवलिंग 
एक हरे भरे पहाड़ में उंचाई से  गिरता झरना जो मनोहारी द्रश्य पैदा करता है चूँकि यह हमारा सिक्किम में पहला दिन था इसलिए उस प्रपात कोदेख कर अच्छा लगा पर एक पूरे हफ्ते सिक्किम के जिन हिस्सों से हम गुजरे ऐसे छोटे बड़े सैकड़ों प्रपात पहाड़ों से गिरते देखे |पर्यटकों में ज्यादातर बिहार और पश्चिम बंगाल के ही थे वैसे अब तक के अपने पर्यटन के अनुभव से कह सकता हूँ कि बंगाली सबसे ज्यादा पर्यटन प्रेमी होते हैं आप लेह से कन्याकुमारी और राजस्थान से पूर्वोत्तर तक कहीं भी जाइए आपको बंगाली जरुर मिलेंगे पर ये पर्यटन के वक्त अपने में सिमटे रहते हैं |बन जाखरी में कुछ घंटे बिताने के बाद अगला ठिकाना रूमटेक मोनेस्ट्री थी पर आगे चलने से पहले थोडा सा ज्ञान हम भारतीय अपने देश के बारे में कितना कम जानते हैं और एक ही देश में कितने तरह की स्थितियां एक साथ हैं |सिक्किम में मात्र चार जिले हैं  पूर्व सिक्किम, पश्चिम सिक्किम, उत्तरी सिक्किम एवं दक्षिणी सिक्किम हैं जिनकी राजधानियाँ क्रमश: गंगटोक, गेज़िंग, मंगन एवं  नामची हैं गंगटोक पूरे सिक्किम की भी राजधानी है यानि शहरों के अपने मुख्यालय हैं जिन्हें वहां की राजधानी कहा जाता है यह चार जिले पुन: विभिन्न उप-विभागों में बाँटे गये हैं। "पकयोंग" पूर्वी जिले का, "सोरेंग" पश्चिमी जिले का, "चुंगथांग" उत्तरी जिले का और "रावोंगला" दक्षिणी जिले का उपविभाग है।उत्तर भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं शायद ऐसा वहां की भौगौलिक परिस्थिति के कारण हो |हमें गंगटोक ,ग्रेजिंग और नामची देखने का या कहें वहां से गुजरने का मौका मिला |रुम्टेक मोनेस्ट्री का रास्ता बहुत खराब था और धूप बहुत तेज पर गाड़ियों में एसी नहीं चलते अमूमन क्योंकि हवा रह रह कर ठंडी हवा इस धूप की तपन को कम कर देती है |गंगटोक से रुम्टेक की दूरी चौबीस किलोमीटर है |
रुम्टेक मोनेस्ट्री 
चूँकि मैंने लेह पूरा घूमा हुआ था इसलिए यहाँ मुझे ज्यादा आनंद नहीं आया लेह की मोनेस्ट्री के सामने यह कुछ भी नहीं है और इसका इतिहास भी ज्यादा पुराना नहीं है वैसे यह मठ लगभग तीन सौ साल पुराना है पर वर्तमान मठ का निर्माण 1960  में हुआ है  पर लेह के मुकाबले यहाँ  सुरक्षा का ज्यादा ताम –झाम है बगैर पहचान पत्र दिखाए आप यहाँ प्रवेश नहीं कर सकते यहाँ कबूतरों की एक बड़ी आबादी है जिन्हें आप दाने खरीदकर खिला सकते हैं |पूर्वोत्तर के राज्यों में जाने वाले पर्यटकों को मेरी सलाह अपना पहचान पत्र हमेशा अपने साथ रखें क्योंकि चीन से विवाद के कारण सेना से आपका आमना सामना होता रहेगा |
वैसे रुम्टेक मठ चर्चा में तब आया जब 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे तिब्बत से भागकर धर्मशाला होते हुए यहाँ आ गये कहानी में एक ट्विस्ट है एक और भारतीय करमापा भी थे जिन्हें दलाई लामा का समर्थन था और मठ की सम्पति को लेकर काफी विवाद हुआ मामला कोर्ट तक पहुंचा और अभी भी लंबित है |माना जाता है रुम्टेक मठ के पास 1.5 अरब डॉलर का खजाना है |दुनिया को मोह माया से ऊपर उठने की सीख देने वाले भी हमारे जैसे ही होते हैं अद्भुत किन्तु सत्य |17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे यहीं रहते हैं मैंने वहां घूम रहे लामा से पूछा क्या मैं 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे से मिल सकता हूँ क्योंकि मुझे बताया गया वो यहीं रहते हैं तो मुझे उत्तर मिला अभी वो कनाडा में हैं |
कबूतरों को दाना खिलाते पर्यटक 
एक और जिज्ञासा भी थी जिसका कोई भी लामा संतोष जनक उत्तर नहीं दे सका चूँकि मठ के अन्दर तस्वीर खींचने की इजाजत नहीं थी सो मैंने उस जिज्ञासा की तस्वीर नहीं ली हालाँकि लोग आसानी से मठ के अंदर की तस्वीरें ले रहे थे वैसे बगैर फ्लैश के तस्वीर लेने में कोई हर्ज नहीं होना पुरानी इमारतों में उकेरे भित्ति चित्र फ्लैश लाईट में खराब हो जाते हैं फिर भी भाईलोग धडधड फ्लैश चला रहे थे |मठ के अंदर घुसते सामने 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे का एक बड़ा सा चित्र है उसके नीचे दिया जल रहा है और नीचे बौद्ध परम्परा के अनुसार सिक्के और पैसे चढ़े हैं सिक्के बेतरतीब बिखरे हैं पर नोटों को एक कीप के आकार में मोड़कर खोंस कर लगाया गया ऐसा ही कुछ माहौल हमारे टैक्सी ड्राइवर ने अपनी गाडी में बना रखा था आप तस्वीर में देखकर उस माहौल का अंदाजा लग सकते हैं |
बौद्ध मठों में कुछ इस अंदाज में चढ़ावा चढ़ा रहता है 
जब हम मठ के अंदर की परिक्रमा करने गए तो हमने देखा 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे की तस्वीर के पीछे एक दीवार है और उसके पीछे गौतम बुद्ध की विशाल मूर्ति है जो उस दिवाल से छुप गयी है जिस पर 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे  की तस्वीर लगी हुई मतलब 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे की तस्वीर वाली दीवाल जल्दी बनाई गयी है जिसके पीछे बुद्ध की प्रतिमा छुप गयी है |17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे  को आगे कर बुद्ध को क्यों छिपाया गया मैंने लामा से पूछा उसने कहा पूजा करने के लिए किसकी पूजा ? उसने जो कुछ मुझे बताया वो मेरे सामान्य ज्ञान से परे था |दिन के दो बज चुके थे अब बारी थी  इंस्‍टीट्यूट ऑफ तिब्‍बतोलॉजी देखने की  यहां बौद्ध धर्म से संबंधित अमूल्‍य प्राचीन अवशेष तथा धर्मग्रन्‍थ रखे हुए हैं। यहां अलग से तिब्‍बती भाषा, संस्‍कृति, दर्शन तथा साहित्‍य की शिक्षा दी जाती है।पर हाय रे नियति इतवार होने के कारण यह संस्थान बंद था वैसे हमारे ड्राइवर ने बताया यह पिछले इतवार को खुला था उसी परिसर से लगा हुआ |
द्रुल चोर्तेन स्तूप 
द्रुल चोर्तेन स्तूप था बौद्ध परम्परा में पूजा का स्थल अपर ऐतिहासिक रूप से काफी नया मेरे जैसे घुमक्कड़ जीव के लिए यहाँ कुछ नया नहीं था सिवाय इसके कि पूरे परिसर में अलसाई बिल्लियों की संख्या काफी ज्यादा थी जिन पर पर्यटकों की आवा जाही का कोई असर नहीं था वो बस मस्ती में सोई हुई थीं | अब बारी फूल प्रदर्शनी देखने की थी |यह एक ऐसी जगह थी जहाँ पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए फूलों की प्रदर्शनी चलती रहती है वैसे सिक्किम को लोग पर्यावरण के प्रति बहुत जागरूक हैं फिर भी चोग्याल पाल्देन ठोंदुप नामग्याल मेमोरियल पार्क में लगे इस फ्लावर शो ने मेरी  पेड़ पौधों के प्रति कम जानकारी को थोडा और बेहतर किया |रास्ते में एक छोटा सा भवन दिखा जो सिक्किम विधानसभा होने की गवाही दे रहा था न कोई सिक्योरिटी का ताम झाम न कोई रोड ब्लोक मतलब अगर हम अपनी गाड़ी रोक कर उतरते तो मुश्किल से बीस मीटर भी हमसे दूर नहीं था |मैं जब तक अपना कैमरा निकालता हम आगे बढ़ गए जनतंत्र को सही मायने में परिभाषित करती वो इमारत मेरी यादों में है क्योंकि उसके गला –बगल की इमारतों में ऐसी घुली मिली थी कि वो ख़ास इमारत है इसका आभास उसे देखकर नहीं होता जी हम भारत के ही एक राज्य में थे |
फ्लावर शो की यादें 
 चार बज गए थे अब हमारे पास दो विकल्प थे होटल जाकर आराम करें या गंगटोक की मशहूर महात्मा गांधी मार्केट से कुछ खरीददारी की जाए |हालंकि व्यक्तिगत रूप से बाजार घूमना और कुछ खरीददारी मेरे लिए दुनिया के सबसे बेकार कामों में से एक रहा है पर जनमत बाजार घूमने के पक्ष में था मैंने बेमन से हाँ कह दी ,हालाँकि सच बताऊँ अगर मैंने गंगटोक का वो बाजार न देखा होता तो निश्चित रूप से मैं सिक्किम के समाजीकरण के इस पक्ष के लिए हमेशा के लिए वंचित रह जाता पर अनजानी जगह डर बहुत लगता है क्योंकि हमारा ड्राइवर हमें मार्केट अकेला छोड़कर चला जाने वाला था और वहां से हमें अकेले अपने होटल जाना था जो वहां से पांच किलोमीटर दूर था |मैंने अपने डर को काबू करते हुए हर चीज नोट कर ली यहाँ तक आपात काल में किस को फोन करना है वगैरह वगैरह पर विश्वास जानिये इतना सौम्य अहसास मुझे आजतक भारत के किसी बाजार में नहीं हुआ |सिक्किम में बादल आते जाते रहते हैं कभी चमकदार तेज धूप तो थोड़ी देर बाद काले बादल (वैसे भी हम बारिश के मौसम में थे वैसे सिक्किम में साल भर थोड़ी बहुत बारिश होती रहती है इसीलिए यहाँ के पहाड़ पर काई बहुत जमी रहती है )| 
गंगटोक का बाजार 
 पहाड़ पर स्थित बाजार में हम सीढ़ी चढ़कर पहुंचे भदेस शैली में इस बाजार को देखते हुए मेरे मुंह से निकला “ओ तेरी” करीब दो सौ मीटर की सीधी लेन जहाँ किसी तरह का कोई वाहन नहीं बीच में डिवाइडर की जगह बैठने के लिए बेंच दोनों तरफ और छोटे छोटे पेड़ सफाई का आलम यह कि आप सडक पर लेट सकते हैं और मजाल है कि धूल का कोई कण आपके कपड़ों या शरीर पर लगे |गुटखा सिक्किम में प्रतिबंधित है पान की इक्का दुक्का दुकाने है जो आपको बहुत खोजने पर मिलेंगी जिसे कोई अपना कोई बिहारी भाई चला रहा होगा |बाजार में कोई शोर नहीं सब शांत खुबसूरत लड़कियां घूम रही हैं ,बैठी हैं झुण्ड में वो भी खालिस पाश्चात्य परिधान में पर न तो कोई फब्ती कस रहा है न घूर रहा है और सब कुछ अनुशासित अद्भुत अभी कुछ और झटके लगने थे |पार्किंग का कोई झंझट नहीं क्योंकि गाड़ियों के लिए एक जगह निश्चित है और उससे आगे कोई अपने बड़े होने का रुवाब झाड़ते कोई नहीं जाता यही अंतर है उत्तर भारत से जहाँ जो जितना कानून तोड़ता है वो उतना बड़ा माना जाता है पर यहाँ कानून डंडे के जोर से नहीं लागू है बल्कि कानून का पालन लोगों के व्यवहार में |खरीदने लायक मुझे ऐसा कोई सामान नहीं मिला वही सारे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ब्रांड जिनसे हमारे माल्स भरे हुए वही यहाँ भी थे बस फर्क ये था कि ये सब छोटी छोटी दुकानों में थे |शराब की दुकान पर एक महिला अंग्रेजी शराब बेच रही है और लोगों की भीड़ है क्योंकि सिक्किम में  शराब उत्तर भारत के मुकाबले  बहुत सस्ती है और मजेदार बात यह कि लड़कियां भी बगैर डरे सहमे उस होती शाम को अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में खडी हैं |एक बार फिर मैं बहुत कुछ सोच रहा था ऐसा क्यों है हमारा भारत सामजिक व्यवहार में इतना अलग –अलग क्यों है |इनको स्वच्छ भारत अभियान की जरुरत क्यों नहीं बेटी बचाओ बेटी पढाओ कि इनको क्यों नहीं जरुरत है इनका जीवन कितना मुश्किल है फिर भी सामाजिक व्यवहार में हमसे इतना आगे क्यों है यहाँ इतने स्कूल कॉलेज भी नहीं हैं जितने उत्तर प्रदेश  ,बिहार में  है फिर इतना अंतर क्यों |हमें हर चीज को समझाना पड़ता है यह तो सब कुछ समझे हुए है |अभी और शानदार अनुभव होने थे बहरहाल अब हमें होटल लौटना था और समस्या यह थी कैसे होटल तक पहुंचूं |
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............................................................जारी 

1 comment:

Anonymous said...

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